भीलवाड़ा पहुंचे संघ प्रमुख मोहन भागवत, आचार्य पुलक सागर से की धर्मचर्चा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत मंगलवार को भीलवाड़ा पहुंचे।

श्री भागवत ने यहां शास्त्री नगर स्थित सूर्य महल में चल रहे आचार्य पुलक सागर महाराज के चातुर्मास कार्यक्रम में शिरकत करके उनका आशीर्वाद लिया। इस दौरान दोनों महानुभावों के बीच करीब 40 मिनट तक महत्वपूर्ण विषयों पर धर्म चर्चा हुई। बातचीत का मुख्य केंद्र बिंदु सामाजिक समरसता, जातिवाद से ऊपर उठकर समाज में एकजुटता कायम करना और राष्ट्र निर्माण में सहयोग जैसे गंभीर मुद्दे रहे। इस दौरान आचार्य पुलक सागर के जीवन पर आधारित और उनकी भक्त सरोज शाह द्वारा लिखित पुस्तक ‘एक और मुक्तिदूत’ का विमोचन भी संघ प्रमुख मोहन भागवत ने किया।

Also Read : योगी ने बुलंदशहर में दिवंगत विधायक के परिजनों से की मुलाकात

चर्चा के दौरान यूजीसीसी के मुद्दे पर भी बातचीत हुई, जिस पर श्री भागवत ने स्पष्ट किया कि यह फिलहाल केवल एक प्रस्ताव के स्तर पर है और समाज को इंसान से इंसान के स्तर पर कभी नहीं बांटा जायेगा । आचार्य पुलक सागर ने बताया कि राजनीति से कोसों दूर यह बैठक पूरी तरह से सामाजिक शांति, आपसी भाईचारे और देश के सर्वांगीण विकास को समर्पित रही।

Pic Credit : ANI

संघ परिवार: किस का पैरोकार?

आरएसएस

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका में कहा: “यदि कोई हिन्दू सोचे, कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं रहना चाहिए, तो वह हिन्दू नहीं है। यदि आप अपने को हिन्दू कहना चाहते हैं, तो आप को विश्वास होना चाहिए कि सभी रास्ते एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं।” पूछना चाहिए: यदि वे इतना अभेद मानते हैं, तो उन के शिष्य ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ का नारा किसलिए दिया? भाजपा और कांग्रेस दोनों का तो लक्ष्य ही नहीं, रास्ता, देश, समाज सब कुछ एक है।

आरएसएस नेता ने अमेरिका में कहा: “यदि कोई हिन्दू सोचे, कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं रहना चाहिए, तो वह हिन्दू नहीं है। यदि आप अपने को हिन्दू कहना चाहते हैं, तो आप को विश्वास होना चाहिए कि सभी रास्ते एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं।”

पूछना चाहिए: यदि वे इतना अभेद मानते हैं, तो उन के शिष्य ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा किसलिए दिया? भाजपा और कांग्रेस दोनों का तो लक्ष्य ही नहीं, रास्ता, देश, समाज सब कुछ एक है।

जब आप इस्लाम व हिन्दू धर्म का लक्ष्य एक मानते हैं; तब आरएसएस एवं कांग्रेस तो सहोदर जैसे हैं — एक ही हिन्दू समाज के जाए! तब इस से इतना द्वेष क्यों? एक ओर, विजातीय, नृशंस, साम्राज्यवादी मतवाद को सनातन धर्म के समान उद्देश्यधारी बता रहे! जबकि घर में ऐसी घृणा कि एक राष्ट्रीय दल को मिटा देने की घोषणा। यह दोहरी मति क्या दर्शाती है?

यह भी पूछें: जब आप ने “हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा” — तब क्या मुसलमानों का ठेका ले लिया, जो उन्हें अतिरिक्त बल पहुँचा कर हिन्दुओं पर चोट करते रहते हैं? इस्लामियों की पैरोकारी करते हैं जिन्हें ताकत, समझ, और नजर की कमी नहीं!

पर सब से ऊपर यह प्रश्न:  किस हिन्दू ने कहा कि ‘भारत में मुसलमान नहीं रहना चाहिए’? यदि उत्तर न मिले, तो यह अनुचित आरोप था। उस से हिन्दुओं की घोर बदनामी हुई। पूरी दुनिया में हुई!

आखिर संघ नेता के मुँह से — जो खुद हिन्दू हैं और इतने महत्वपूर्ण जिन के पैर भारत का प्रधानमंत्री छूता है — यह आरोप कि हिन्दू सोचते हैं कि भारत में मुसलमान न रहे, हिन्दुओं को फासिस्ट, असहिष्णु, साबित करने के सिवा और क्या था? अखिल विश्व को संदेश गया कि भारत में मुसलमान पीड़ित, वंचित हैं! क्या यही सच है?

सच तो उलटा है। यहाँ मुस्लिम नेता ही सदैव धमकी देते और दंगे करते रहे हैं। यह पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर ने भी कहा था कि दंगे करना मुस्लिम राजनीति का औजार है। जिस पर तब जिन्ना से लेकर आज के ओवैसी जूनियर तक घमंड भी दिखाते रहे हैं। पश्चिमी पंजाब, सिंध, और कश्मीर से हिन्दुओं को मुस्लिमों ने मार भगाया। शेष भारत के लिए भी वही मकसद है, जिस की झलक असम, बंगाल में मिलती रहती है।

पर संघ नेता ने उलटा ही संदेश दुनिया को दिया! उन का बयान हिन्दुओं पर एक क्रूर चोट है। यहाँ हजार साल से हिन्दू ही इस्लामियों से पीड़ित होता रहा है। तब उसी को उत्पीड़क कहना? आज यदि भारत में न्याय होता तो संघ नेता को कठघरे में खड़ा कर हिसाब लेता। पर अफसोस! अंग्रेजों के जाते ही यहाँ सामुदायिक न्याय उठ गया।

फलत: आज भी भारत के अनेक इलाकों में हिन्दू ही असुरक्षित जीवन झेलते हैं। उस जिहाद से सशंकित जिस का घोषित मकसद दुनिया को गैर-मुस्लिमों (काफिरों) से खाली कराना है। इस क्रम में गत आठ दशकों में ही एक तिहाई से अधिक भारत हिन्दुओं से खाली करा चुका है!

संघ नेता यह सब जानते हैं।  क्या उन्होंने कभी कश्मीर में संघ की रैली की है? क्या आज भी कर सकते हैं? जबकि मुसलमान भारत के किसी भी शहर में रैली कर सकते हैं। सो, जिस ने कश्मीर को हिन्दुओं से खाली करा लिया उस पर कुछ कहने के बजाए उन्होंने आक्रामक को ही पीड़ित बता दिया!

वह भी, जब इस्लामी नेता, संगठन अपनी टेक दुहराते रहते हैं। जो उन के संस्थापक की बुनियादी टेक थी। यह मुहम्मद के शब्द थे: ‘‘तुम सुरक्षित रहोगे, अगर इस्लाम कबूल कर लो। यह पूरी दुनिया अल्लाह की और मेरी है।’’ (सहीह बुखारी, 4:53:392)। उसी टेक पर तब से इस्लाम का अभियान बढ़ता गया है।

आज भी मुस्लिम नेता मुहम्मद की बातों को अपना कानून मानते व लागू करते हैं। जो लाहौर, ढाका, श्रीनगर, पहलगाम, आदि में लागू किया। आज संघ-भाजपा राज में भी देश में अनेक गाँव, मुहल्ले हिन्दुओं से खाली हो रहे हैं। संघ के अपने अखबार में भी उस की रिपोर्टें, फोटो समेत छपती रही हैं।

वही इस्लाम का लक्ष्य है। उसी पर बढ़ते, लड़ते उस के लड़ाके जान लेते और देते हैं। उसी टेक पर कि मूर्तिपूजकों, क्रिश्चियनों, नास्तिकों, आदि को सब को इस्लाम कबूल करना होगा। सीधे-सीधे नहीं, तो ‘जेरे खंजर’ (अल्लामा इकबाल)।

क्या हिन्दू धर्म का भी वही लक्ष्य है, जो संघ नेता ने कहा?

तमाम मुहम्मदी दस्तों, खलीफाओं, मौलानाओं, सुल्तानों, लीडरों ने जब जहाँ जितना जोर चला, गैर-मुस्लिमों को यही विकल्प दिया था:  इस्लाम या मौत! यह दुनिया भर की तारीख में दर्ज है। वह जगह-जगह अभी भी हो रहा है — जिस समय संघ के नेता उलटे बयान देकर हिन्दुओं को बदनाम कर रहे हैं।

यह कितना बड़ा धर्म-द्रोह, सत्य-द्रोह, देश-द्रोह है — इसे ठंडे दिमाग से परखना चाहिए। जिस समय जम्मू-कश्मीर, मुर्शिदाबाद, मराड, कैराना, उदयपुर, पहलगाम, आदि अनेक जगहों में हिन्दू भगाए और कत्ल किए जा रहे हैं, और जिस पर संघ-भाजपा चुप रहते हैं — उसी समय ये मुस्लिमों को भारत में उत्पीड़ित जैसे होने का सर्टिफिकेट दे रहे हैं!

इस का लाभ उठाते हुए स्थानीय जिहादी जहाँ-तहाँ हिन्दू बस्तियाँ खाली करा लेंगे। जिस का पहले तो समाचार दबाया जाएगा। यदि किसी ने छाप भी दिया, तब कहा जाएगा: ‘आखिर मुसलमान कितना बर्दाश्त करेंगे, प्रतिक्रिया होगी ही’! यानी, भारत में मुसलमानों की हिंसा ‘उत्पीड़ित का प्रतिरोध’ है।

इस झूठी दलील को बल पहुँचाना वह धर्म-द्रोह है जो भारत के हिन्दू नेता अपने ही समाज के विरुद्ध करते रहे हैं। गाँधी, नेहरू से लेकर वाजपेई, भागवत तक ने अपने-अपने तरीके यह किया है — उत्पीड़क जिहाद को ढाल दे देना, और उत्पीड़ित हिन्दू की ही भर्त्सना।

यही करके हिन्दू नेता अपनी मतिहीनता, अज्ञान, और  अटपटापन छिपाते रहे हैं। ताकि उन की आरामपसंद राजनीति चलती रहे। ऊपर से महात्मा, उदार, मानवतावादी, चमत्कारी होने का सेहरा भी मिले।

यदि इस अन्याय को कोई कठघरे में खड़ा नहीं करता, तो यह लुप्त नहीं हो जाता! अनेक देसी-विदेशी इतिहासकार इसे दर्ज करते रहे हैं। जिस का कभी खंडन नहीं हुआ, क्योंकि किया ही नहीं जा सकता। केवल मौन के षड्यंत्र से उसे दबाने की कोशिश रही है।

केवल 1947 से अब तक हुई हिंसा में मुसलमानों की तुलना में नौ गुना हिन्दू मारे गए हैं। सामूहिक विस्थापन के आँकड़े भी वही कहते हैं। पाकिस्तान -बंगलादेश से उत्पीड़न के मारे हिन्दू लाखों में भारत आते रहे, जबकि उसी कारण भारत से पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिम कोई न थे!

सो, मुस्लिम राजनीति की स्थाई विशेषता रही है: आरोप लगाना, शिकायत करना, माँगें रखना, कोसना, और दंगे करना। हिन्दू राजनीति की स्थाई विशेषता: मान लेना, छूट देना, खुशामद करना, भीरुता, आत्म-निन्दा, और आत्म-समर्पण। इसी क्रम में भारत तोड़ एक अलग इस्लामी ‘पाक’ देश भी बन गया।

उन्हीं विशेषताओं का लाभ उठाकर मुस्लिम नेता बची ‘नापाक’ जमीन भी पाक बनाने की योजना में लगे हुए हैं। क्योंकि बचे भारत में भी किसी शासक ने आज तक हिन्दुओं से नहीं पूछाः कि ‘‘क्या हमारे राज में तुम सुरक्षित महसूस करते हो?’’

यह विगत अस्सी सालों से भारत का सब से उपेक्षित सवाल है। इसीलिए यहाँ नन्दीमर्ग, मराड, गोधरा, कैराना, शाहीन बाग जैसी घटनाएं अनवरत दुहराती हुई हैं। हिन्दुओं पर उत्पीड़न से किसी राजनीतिक हानि का भय नहीं। उन्हें हिन्दू नेता भी बेधड़क चोट पहुँचाते हैं।

इस प्रकार, हिन्दू समाज दरअसल नेतृत्वविहीन है! उस के कथित नेता भ्रामक या निजी स्वार्थ की दुनिया में रहते हैं।  इस्लामियों की सेवा, उन से शाबासी पाने, अपने को महात्मा और दैवी बताने की झक पालते हैं। हिन्दुओं से ही वोट, धन और शक्ति हासिल करते हैं, फिर उन्हीं पर चोट करते हैं। यह कितनी मूढ़ता, और कितना विश्वासघात है — इस का हिसाब इतिहास करेगा।

जब वोट लेना हो तब संघ परिवार हिन्दुओं पर एकाधिकार जताता है। यह प्रचार कि दूसरे दलों को वोट देने वाला हिन्दू ‘प्रॉब्लम’ है। वैसे हिन्दू को सोशल मीडिया पर गालियाँ दी जाती हैं। जिसे उन का आईटी सेल प्रेरित करता है। किन्तु जब हिन्दुओं पर संकट आए, तब ‘हमने हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा’ कह कर पल्ला झाड़ लेना। यह विश्वासघात नहीं तो क्या है?

पर यही वर्तमान युग की हिन्दू राजनीति है। गाँधीजी से आज तक बार-बार देखी जाती:  सज्जन पर चढ़ना और दुर्जन से बचना। अज्ञानी, अहंकारी, आरामपसंद राजनीति। जिसे ज्ञान, न्याय, या कर्तव्य से अधिक कुर्सी से लगाव है। जिस समुदाय में निरंतर ऐसे ही नेता रहें, उस का भविष्य भाग्य-भरोसे ही है।

लंदन में पहली बार गंगा आरती, हजारों लोग शामिल हुए:थेम्स नदी के किनारे वाराणसी घाटों जैसी झलक

लंदन में रविवार को पहली बार थेम्स नदी के किनारे गंगा आरती का आयोजन हुआ। इस आरती में हजारों लोग शामिल हुए थे। भजन और मंत्रों के जाप के साथ हुई आरती ने थेम्स के किनारे वाराणसी के घाटों जैसी झलक दिखाई। चिन्मय मिशन UK ने टोटली थेम्स फेस्टिवल के साथ मिलकर यह आयोजन किया। यह चिन्मय मिशन के 75 साल पूरे होने के मौके पर हो रहे कार्यक्रमों का हिस्सा था। आरती के जरिए नदी, प्रकृति और जीवन के लिए आभार जताया गया। फीडबैक को देखते हुए थेम्स नदी के किनारे गंगा आरती हर साल आयोजित की जा सकती है। भजन, मंत्र और दीपों के साथ हुई आरती कार्यक्रम में भजन, मंत्रोच्चार और संगीत प्रस्तुतियां हुईं। बड़ी संख्या में लोगों ने आरती में हिस्सा लिया और दिए जलाकर नदी के लिए सम्मान जताया। चिन्मय मिशन UK की रेजिडेंट टीचर ब्रह्मचारिणी श्रीप्रिया चैतन्य ने कहा कि पीढ़ियों से लोग गंगा के किनारे नदी, प्रकृति और जीवन के लिए सम्मान जताने के लिए दिए जलाते हैं। थेम्स पर हुई यह आरती इसी भावना को लंदन तक पहुंचाने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि चिन्मय मिशन के लिए गंगा सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रवाह का भी प्रतीक है। मिशन के संस्थापक स्वामी चिन्मयानंद ने वेदांत के ज्ञान को लोगों तक पहुंचाने के लिए अपना जीवन लगा दिया था। चिन्मय मिशन के 75 साल पूरे होने के मौके पर यह आयोजन उनकी इसी विरासत को याद करने का एक तरीका था। थेम्स में नहीं बहाए गई पूजा सामाग्री इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि आरती के दौरान थेम्स नदी में कोई दिए, फूल या दूसरी पूजा सामग्री नहीं डाली गई। चिन्मय मिशन के प्रवक्ता ने बताया कि आरती में इस्तेमाल किए गए दीपक भी नदी में नहीं छोड़े गए, बल्कि किनारे पर ही रखे गए। कार्यक्रम में कचरा कम करने और सिंगल-यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल घटाने पर भी ध्यान दिया गया। यानी आयोजन में धार्मिक परंपरा के साथ नदी और पर्यावरण की जिम्मेदारी को भी जोड़ा गया। चिन्मय मिशन के 350 से ज्यादा केंद्र चिन्मय मिशन की स्थापना 1951 में हुई थी। यह वेदांत पर आधारित वैश्विक संगठन है और दुनिया भर में इसके 350 से ज्यादा केंद्र हैं। वहीं, टोटली थेम्स फेस्टिवल 1997 से आयोजित हो रहा है। इसमें थेम्स नदी से जुड़े कला, पर्यावरण, विरासत और शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम होते हैं। ————————– ये खबर भी पढ़ें… ब्रिटेन पहुंचे मोहन भागवत, हिंदू संगठनों ने स्वागत किया 100 से ज्यादा ब्रिटिश हिंदू संगठनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का ब्रिटेन पहुंचने पर स्वागत किया। पूरी खबर पढ़ें…

RSS चीफ मोहन भागवत लंदन के मंदिर-गुरुद्वारे में पहुंचे:ब्रिटेन के 20 संगठनों ने मेयर को लेटर लिखकर दौरे का बॉयकॉट किया

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को लंदन के मंदिरों और गुरुद्वारे के दौरे के साथ अपने विदेश दौरे के ब्रिटेन चरण की शुरुआत की। यह जानकारी RSS ने दी। RSS के केंद्रीय कार्यकारी दल के सदस्य सुनील अंबेकर और ब्रिटेन दौरे के समन्वयक संगठन Integral UK के संयोजक रोहित अंबेकर ने मीडिया कॉन्फ्रेंस में बताया कि भागवत इस दौरान धर्मगुरुओं, शिक्षाविदों, रिसर्चर्स और अन्य प्रमुख लोगों से मिलेंगे। उन्होंने कहा कि भागवत RSS के निस्वार्थ सेवा और सामाजिक सद्भाव के अनुभव के साथ ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, का संदेश साझा करेंगे। RSS के मुताबिक, लंदन का कार्यक्रम भागवत के अमेरिका और कनाडा दौरे में दिए गए संदेश को आगे बढ़ाता है। यह RSS की शताब्दी वर्ष से जुड़े तीन देशों के आउटरीच कार्यक्रम का हिस्सा है। मंदिर और गुरुद्वारे पहुंचे सुनील अंबेकर और रोहित अंबेकर ने बताया कि अंतरधार्मिक संवाद के तहत भागवत विल्सडन स्थित श्री स्वामीनारायण मंदिर और खालसा जथा ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारा जा चुके हैं। उन्हें लंदन के एक जैन मंदिर में भी जाना है। ब्रिटेन दौरे का मुख्य कार्यक्रम रविवार को होगा। इसमें ‘सेलिब्रेशन ऑफ वननेस’ थीम पर सामुदायिक नेताओं का स्वागत समारोह और ‘सभ्यतागत संवाद’ रखा गया है। यह कार्यक्रम ब्रिटेन में 1966 में स्थापित हिंदू सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) UK ने शुरू किया है। इसे Integral UK का समर्थन मिला है। प्रवक्ताओं के मुताबिक, पूरे ब्रिटेन के 310 से ज्यादा सामुदायिक संगठन और एसोसिएशन इसमें शामिल होने की उम्मीद है। बंद कमरे में बैठकें और प्रवासी भारतीयों से मुलाकात भागवत बुधवार को लंदन पहुंचे थे। गुरुवार को उन्होंने ‘बंद कमरे में हुई गोलमेज बैठकों’ के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके बाद कारोबार और राजनीति से जुड़े प्रवासी भारतीय समुदाय के प्रमुख लोगों की बड़ी सभा हुई। सुनील अंबेकर ने बताया कि ब्रिटेन के लोग RSS को समझने में काफी रुचि रखते हैं। उन्होंने कहा कि भागवत ने लोगों की ओर से उठाए गए सभी मुद्दों पर बात की। उनके मुताबिक, कार्यक्रम में भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिकों के साथ ब्रिटेन के नेता, संसद से जुड़े लोग, कारोबारी, करोड़पति और अरबपति तथा FTSE 100 कंपनियों और अन्य कॉरपोरेट्स से जुड़े लोग शामिल थे। हालांकि, प्रवक्ता ने कार्यक्रम में शामिल लोगों के बारे में ज्यादा जानकारी देने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम को गोपनीय तरीके से आयोजित किया गया था, ताकि चर्चा खुलकर हो सके। भागवत के दौरे पर उठी चिंताओं पर RSS का जवाब ब्रिटेन में कुछ सिविल सोसाइटी समूहों और सांसदों ने भागवत के दौरे को लेकर चिंता जताई है। इस पर सुनील अंबेकर ने कहा, “हम शांति, एकीकरण और एकता के लिए यहां हैं। इसलिए हम हर किसी से बातचीत के लिए तैयार हैं। लोकतंत्र में अलग-अलग आवाजें हो सकती हैं। ऐसी आवाजें उठना सामान्य बात है।” उन्होंने कहा कि RSS को लेकर कई गलतफहमियां हैं, क्योंकि बुनियादी समझ में कमी है। उनके मुताबिक, “भारत किसी राष्ट्र-राज्य की राजनीतिक अवधारणा जैसा नहीं है। यह एक सांस्कृतिक अवधारणा है।” सुनील अंबेकर ने कहा कि हिंदुत्व कोई स्थिर अवधारणा नहीं है। इसमें हर तरह के धर्म और सभी धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान और सत्य में विश्वास की बात है। उन्होंने कहा, “यही हिंदुत्व है, यही भारत है। मुझे लगता है कि यह दौरा इन विचारों को साफ करने में मदद करेगा।” रविवार को सार्वजनिक संबोधन RSS प्रमुख का रविवार को प्रवासी भारतीय समुदाय को दिया जाने वाला सार्वजनिक संबोधन लाइव प्रसारित किए जाने की उम्मीद है। RSS प्रमुख के साथ ब्रिटेन के मीडिया के लिए कोई बातचीत नहीं रखी गई है। भागवत के कार्यक्रम में शामिल होने वाले सभी लोगों की पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। —————————– ये खबर भी पढ़ें… न्यूयॉर्क में भागवत बोले- भारत के DNA में एकता-विविधता: हम अलग होकर भी एकदूसरे से जुड़े RSS प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 29 अगस्त को करीब 42 मिनट स्पीच दी। उन्होंने कहा कि एकता और विविधता भारत के DNA में है। लोग अलग दिखते हैं, उनके रहने के तरीके हैं, लेकिन सभी के बीच एक जन्मजात जुड़ाव है। पूरी खबर पढ़ें…

ब्रिटेन पहुंचे मोहन भागवत, हिंदू संगठनों ने स्वागत किया:सरकार ने संसद में कहा- दौरा इमिग्रेशन नियमों की शर्तें पूरी करता है; पहले उठे थे सवाल

100 से ज्यादा ब्रिटिश हिंदू संगठनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का ब्रिटेन पहुंचने पर स्वागत किया। वे तीन देशों के दौरे के अंतिम चरण में गुरुवार को लंदन पहुंचे हैं। भागवत का दौरा संगठन की स्थापना के 100 साल पूरे होने के मौके पर चलाए जा रहे अंतरराष्ट्रीय संपर्क अभियानों का हिस्सा है। इस दौरे के तहत वे अमेरिका और कनाडा भी जा चुके हैं। ब्रिटेन के सुरक्षा मंत्री डैन जार्विस ने गुरुवार को संसद में लिखित सवाल का जवाब देते हुए कहा कि भागवत की यात्रा देश के इमिग्रेशन नियमों की शर्तें पूरी करती है। दरअसल, ब्रिटिश-भारतीय सांसद नादिया व्हिटोम ने पिछले हफ्ते संसद में सवाल पूछा था कि कि क्या इस दौरे की पूरी समीक्षा नियमों के तहत की गई है मंत्री ने कहा- सभी लोगों को इमिग्रेशन नियम पूरे करने होंगे

मंत्री डैन जार्विस ने जवाब दिया कि गृह मंत्रालय व्यक्तिगत मामलों पर टिप्पणी नहीं कर सकता। हालांकि, मंत्रालय खतरों की पूरी श्रेणी से निपटने और हिंसा व व्यक्तियों तथा समुदायों के खिलाफ नफरत को बढ़ावा देने वाले विचार फैलाने वालों पर कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा, “ब्रिटेन में प्रवेश की मांग करने वाले सभी लोगों को इमिग्रेशन नियमों की शर्तें पूरी करनी होंगी।” 2018 में भी अमेरिका गए थे भागवत मोहन भागवत इससे पहले सितंबर 2018 में अमेरिका गए थे। उन्होंने शिकागो में 7 से 9 सितंबर 2018 तक आयोजित दूसरे वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस में हिस्सा लिया था। इस कार्यक्रम में 60 देशों से करीब 2,500 प्रतिनिधि शामिल हुए थे। भागवत ने कांग्रेस के उद्घाटन सत्र में मुख्य भाषण दिया था। 2018 के इस दौरे की उपलब्ध रिपोर्टों में भागवत की किसी अमेरिकी राजनयिक से मुलाकात या उन्हें किसी औपचारिक राजनयिक सम्मान दिए जाने का जिक्र नहीं मिलता। उनका दौरा मुख्य रूप से वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस और उससे जुड़े कार्यक्रमों पर केंद्रित था। —————————– ये खबर भी पढ़ें… न्यूयॉर्क में भागवत बोले- भारत के DNA में एकता-विविधता:हम अलग होकर भी एकदूसरे से जुड़े, गलत सोच इंसान को जानवरों के करीब ले जाती है RSS प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 29 अगस्त करीब 42 मिनट स्पीच दी। पूरी खबर पढ़ें…

Nepal Flash Flood: तबाही के बाद नेपाल में फिर मंडरा रहा बाढ़ का खतरा, भोटेकोशी नदी का जलस्तर बढ़ा, जारी हुआ अलर्ट

Nepal Flash Flood: नेपाल में 26 अगस्त को आए विनाशकारी बाढ़ ने सबकुछ तबाह कर दिया। बाढ़ में अब तक कम से कम 800 लोगों के मरने की खबर है वहीं हजारों लोग लापता है। अभी लोग इस तबाही से उबर भी नहीं पाए हैं कि नेपाल में एक बार फिर बाढ़ का खतरे का अलर्ट आने लगा। भोटेकोशी नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद अधिकारियों ने रविवार को नई चेतावनी जारी की है। बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों से सतर्क रहने और सुरक्षित जगह पर जाने के लिए तैयार रहने को कहा गया है। वहीं, राहत और बचाव टीमें पहले आई बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में लगातार काम कर रही हैं।

लोगों को भेजा जा रहा अलर्ट

रविवार सुबह लोगों के मोबाइल पर बाढ़ को लेकर चेतावनी मैसेज भेजे जा रहे है। इसके बाद से पहले से प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों की चिंता और बढ़ गई। वहींलगातार मिल रही अलग-अलग चेतावनियों के कारण प्रभावित गांवों के लोगों के बीच भी डर और असमंजस का माहौल बना हुआ है। इसी बीच राहत और बचाव दल काठमांडू को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से जोड़ने वाले प्रमुख हाईवे को फिर से खोलने में जुटे हुए हैं। बाढ़ प्रभावित इलाकों में खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है।

चीन से मिली जानकारी

नेपाल में बाढ़ को लेकर जारी नई चेतावनी चीन से मिली ताजा जानकारी के बाद जारी की गई है। नेपाल की आपदा प्रबंधन एजेंसी के प्रमुख धर्म राज उप्रेती ने बताया कि ऊपरी इलाकों में पानी का बहाव बढ़ने की सूचना मिली है। इसके बाद नदी के आसपास रहने वाले लोगों को सतर्क रहने और किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार रहने को कहा गया है। न्यूज एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, करीब 5.6 किलोमीटर दूर बना एक बड़ा गड्ढा अब भी चिंता का कारण बना हुआ है, जिसमें बड़ी मात्रा में पानी जमा है। अधिकारियों ने इसकी स्थिति पर लगातार नजर रखने की बात कही है।

लापता लोगों की तलाश जारी

26 अगस्त को आए बाढ़ और भूस्खलन ने नेपाल के कई हिस्सों में भारी तबाही मचाई है और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है। नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन से हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। आपदा एजेंसी के अनुसार, देश में मृतकों की संख्या बढ़कर 788 हो गई है, जबकि 2,502 लोग अब भी लापता हैं। वहीं, चीन की सीमा से लगे प्रभावित क्षेत्र में भी भारी नुकसान हुआ है, जहां अधिकारियों ने 16 लोगों की मौत और 546 लोगों के लापता होने की जानकारी दी है। राहत और बचाव अभियान के बीच लापता लोगों की तलाश लगातार जारी है।

ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटने से आई बाढ़

नेपाल और तिब्बत में आई भीषण बाढ़ के बाद सैकड़ों विदेशी नागरिकों के लापता होने की खबर है। इनमें कई लोग नौकरी, पहाड़ों की यात्रा और धार्मिक यात्रा के लिए हिमालयी क्षेत्र में पहुंचे थे। बताया जा रहा कि ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटने और बड़ी मात्रा में पानी व मलबा नीचे आने से नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ गया। तेज बहाव की चपेट में आने से कई घर, पुल और अन्य ढांचे बह गए, जिससे नेपाल और तिब्बत के कई इलाकों में भारी नुकसान हुआ है।

Mohan Bhagwat Canada Visit: ‘हिंदू जागे तो दुनिया जागेगी’, कनाडा में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने दिया एकता का संदेश

Mohan Bhagwat Canada Visit: ‘हिंदू जागे तो दुनिया जागेगी’, कनाडा में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने दिया एकता का संदेश

Mohan Bhagwat Canada Visit: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने कनाडा के टोरंटो में आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु-एम्ब्रेस द वर्ल्ड इन फ्रेंडशिप’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए हिंदू पहचान, विविधता, एकता और भारत की सभ्यतागत सोच पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि हिंदू शब्द को किसी एक भाषा, पूजा पद्धति या जीवनशैली तक सीमित नहीं किया जा सकता। हिंदू विचारधारा की मूल भावना अलग-अलग विविधताओं को स्वीकार करने और उनमें मौजूद एकता को पहचानने की है।

मोहन भागवत ने आगे कहा कि हिंदू की पहचान किसी खास भाषा, पूजा के तरीके या जीवन जीने की शैली से तय नहीं होती। उन्होंने कहा कि हिंदू विचार सभी को स्वीकार करने और सभी का सम्मान करने की भावना पर आधारित है।

उन्होंने कहा, “जब मैं हिंदू कहता हूं तो हिंदू शब्द को किसी विशेष भाषा, किसी विशेष पूजा या किसी विशेष जीवनशैली से परिभाषित नहीं किया जा सकता।” भागवत ने जोर देकर कहा कि हिंदू विचारधारा में ‘सबका सम्मान और सबकी स्वीकृति’ का भाव है।

‘विविधता स्वाभाविक है, एकता वास्तविकता’

RSS प्रमुख ने भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता का जिक्र करते हुए कहा कि देश में जाति, पंथ और भाषाओं की अनेकता हमेशा से रही है। उनके मुताबिक, अलग-अलग होना स्वाभाविक है, लेकिन एकता मूल वास्तविकता है।

उन्होंने कहा, “कई जातियां हैं, कई पंथ हैं, कई भाषाएं हैं। सब कुछ अनेक है। विविधता स्वाभाविक है, जबकि एकता वास्तविकता है।” भागवत ने कहा कि भारत की प्राचीन सभ्यतागत सोच यह सिखाती है कि विविधता को एकता के लिए खतरा नहीं माना जाना चाहिए। बल्कि उसका सम्मान और संरक्षण किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विविधता एकता की अभिव्यक्ति है। यही विविधता समाज को सुंदर बनाती है।

‘हिंदू जागे तो दुनिया जागेगी’

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में सेवा और मानवता की भावना को भी हिंदू विचार से जोड़ा। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा जरूरतमंदों की मदद करने की रही है और कई बार भारत ने बिना मांगे भी दूसरों की सहायता की है। उन्होंने कहा, “जब भी दुनिया में कहीं भारत से मदद मांगी गई, भारत ने कभी मना नहीं किया। बल्कि बिना मांगे भी मदद का हाथ बढ़ाया। यही भारत की परंपरा और उसका डीएनए है।”

इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि आपने यह बात सुनी होगी कि अगर हिंदू जागता है तो दुनिया जागती है। भागवत ने कहा कि हिंदू आध्यात्मिक परंपरा लोगों को विविधता के भीतर एकता देखने की सीख देती है। इसमें केवल मनुष्यों ही नहीं। बल्कि जीव-जंतुओं और निर्जीव प्रकृति के साथ भी जुड़ाव की भावना पर जोर दिया जाता है।

‘वसुधैव कुटुंबकम’ का किया जिक्र

RSS प्रमुख ने अपने भाषण में भारत की प्राचीन अवधारणा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे पूरी दुनिया को एक परिवार मानने वाली सोच बताया। उन्होंने कहा कि खुले विचारों वाले और ज्ञान रखने वाले लोग इस विचार को स्वीकार करते हैं कि पूरी पृथ्वी एक परिवार है। भागवत के मुताबिक, इंसानों के बीच बाहरी रूप-रंग को लेकर भले ही अंतर दिखाई दे। लेकिन मूल रूप से सभी एक हैं। इसी सोच से दूसरों की सेवा करने का दायित्व पैदा होता है। उन्होंने कहा, “दूसरों की सेवा करना हमारा कर्तव्य है। हमने यह ज्ञान प्राप्त किया है, जो हमें स्थायी खुशी और संतुष्टि देता है।”

‘भारत विश्वगुरु बना, महाशक्ति बनकर नहीं’

मोहन भागवत ने भारत के वैश्विक प्रभाव की तुलना केवल सैन्य या आर्थिक ताकत से करने के बजाय सेवा और मानवीय मूल्यों से की। उन्होंने कहा कि भारत ने दुनिया पर अपना प्रभाव किसी सुपरपावर के रूप में नहीं बनाया, बल्कि अपने चरित्र और दुनिया की सेवा के कारण ‘विश्वगुरु’ बना। उन्होंने कहा, “कोई भारत को सुपरपावर कह सकता है, लेकिन भारत सुपरपावर नहीं था। उसने दुनिया की सेवा की और अपने चरित्र के कारण ‘विश्वगुरु’ बना, ‘महाशक्ति’ नहीं।”

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलिश शरणार्थियों का उदाहरण

भागवत ने भारत की शरण देने की परंपरा को समझाने के लिए इतिहास के कई उदाहरण दिए। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलिश शरणार्थियों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जब पोलैंड के लोग युद्ध और संकट के कारण परेशान थे, तब जामनगर के महाराजा ने उन्हें शरण और सुरक्षा दी। उन्हें तब तक संरक्षण दिया गया, जब तक वे सुरक्षित रूप से अपने देश लौटने की स्थिति में नहीं आ गए।

ये भी पढ़ें- US-Iran War: अमेरिका का ईरान पर फिर बड़ा हमला, होर्मुज स्ट्रेट में की जमकर बमबारी, तेहरान ने जॉर्डन के अमेरिकी ठिकानों पर दागी मिसाइलें

न्होंने भारत की हालिया मानवीय सहायता का भी उदाहरण दिया। भागवत ने मध्य-पूर्व के एक युद्ध क्षेत्र से भारतीय नागरिकों की निकासी का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सैन्य विमानों ने न केवल भारतीयों बल्कि सात अन्य देशों के नागरिकों को भी सुरक्षित निकाला।

कनाडा में भागवत बोले- मदद करना भारत की परंपरा:विविधता ही हमारे देश की खूबसूरती, दूसरों को अलग मानने की सोच छोड़नी चाहिए

RSS प्रमुख मोहन भागवत सोमवार को टोरंटो में ‘हिंदू विश्व बंधु’ कार्यक्रम में शामिल हुए। उन्होंने कार्यक्रम में कहा कि मुश्किल वक्त में दूसरों की मदद करना भारत की पुरानी परंपरा रही है। दुनिया में कहीं भी संकट आया और भारत से मदद मांगी गई, तो भारत ने कभी पीछे हटकर इनकार नहीं किया। कई बार भारत ने बिना मदद मांगे भी दूसरों की सहायता की है। भागवत ने कहा- भारत में विविधता एकता के खिलाफ नहीं, बल्कि उसकी खूबसूरती है। देश में अलग-अलग जाति, पंथ, भाषाएं और संस्कृतियां हैं, लेकिन ये सभी एक ही समाज का हिस्सा हैं। उन्होंने विविधता को स्वीकार करने और उसका सम्मान करने की बात कही। उन्होंने कहा कि ‘ये मेरा, वो तुम्हारा’ जैसी सोच से ऊपर उठने की जरूरत है। अलग-अलग रूप और पहचान के बावजूद सभी में एक ही दिव्यता है। इसलिए दूसरों को अलग या पराया मानने के बजाय सभी के साथ भाईचारे और सेवा की भावना रखनी चाहिए। भागवत बोले- भारत ने मुस्लिम-ईसाई, सभी को स्वीकार किया भागवत ने कहा कि हिंदू सभी का सम्मान और स्वीकार करते हैं। दुनिया में कहीं किसी पर अत्याचार हुआ और उसने शरण मांगी, तो उसे भारत में जगह मिली। भारत में मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी और दूसरे समुदाय रहते हैं। लोग सिर्फ शरण लेने ही नहीं, बल्कि ज्ञान हासिल करने के लिए भी भारत आए हैं। उन्होंने कहा कि इंसान को फूल की तरह होना चाहिए। कली फूल बने और अपनी खुशबू पूरे वातावरण में फैलाए। इसी तरह व्यक्ति को विकसित होकर मानवता के लिए समर्पित होना चाहिए। एक हिंदू की सोच यह होनी चाहिए कि मुझे भी आगे बढ़ना है, मुझे सफल होना है, क्योंकि मुझे सेवा करनी है। भागवत के भाषण की 5 बड़ी बातें कार्यक्रम में 8 प्रांतों से पहुंचे 2,500 से ज्यादा लोग टोरंटो में ‘हिंदू विश्व बंधु’ कार्यक्रम का आयोजन कैनेडियन हिंदूज फॉर आउटरीच, रिलेशंस एंड डायलॉग (CHORD) ने किया था। कार्यक्रम में पूर्व कनाडाई रक्षा मंत्री और अल्बर्टा के पूर्व प्रीमियर जेसन केनी भी मौजूद थे। आयोजकों के मुताबिक, कनाडा के आठ प्रांतों से 2,500 से ज्यादा लोग पहुंचे। मोहन भागवत 17 दिनों के तीन देशों के विदेश दौरे पर हैं और कनाडा उनके दौरे का दूसरा पड़ाव है। वह 25 अगस्त को न्यूयॉर्क पहुंचे थे। अमेरिका में कार्यक्रमों के बाद अब वे कनाडा पहुंचे हैं। दौरे में अमेरिका और कनाडा के बाद ब्रिटेन भी शामिल है। —————————— भागवत से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… न्यूयॉर्क में भागवत के कार्यक्रम से पहले तिरंगे का अपमान, रिजिजू बोले- RSS या भाजपा की आलोचना करने की आजादी लेकिन देश का अपमान महंगा पड़ेगा केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने न्यूयॉर्क में RSS प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम स्थल के बाहर भारतीय झंडे के अपमान को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। रिजिजू ने घटना का वीडियो शेयर करते हुए लिखा- हमने हमेशा कहा है कि RSS, BJP या सरकार की आलोचना करने की आजादी है, लेकिन हमारे झंडे और मेरे देश का अपमान मत करो। यह बहुत महंगा पड़ेगा। पूरी खबर पढ़ें…

Kashmiri Pandits: दशकों बाद कश्मीर में लौटी उम्मीद! शोपियां में कश्मीरी पंडितों ने रखी राम मंदिर की नींव, लोगों की यादों से जुड़ा है पूरा इतिहास

Kashmiri Pandits News: कश्मीर घाटी से विस्थापन के दशकों बाद कश्मीरी पंडित समुदाय ने शनिवार (29 अगस्त) को शोपियां के एक मोहल्ला में राम मंदिर के पुनर्निर्माण की दिशा में बड़ा कदम उठाया। यहां समुदाय के सैकड़ों लोग एकत्र हुए और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान के बाद भगवान राम मंदिर की आधारशिला रखी। यह कार्यक्रम कश्मीरी पंडितों के लिए धार्मिक आस्था के साथ-साथ अपनी पुरानी जड़ों और विरासत से जुड़ने का बेहद भावुक क्षण रहा।

दशकों तक विस्थापन झेलने के बाद, कश्मीरी पंडितों ने पारंपरिक पूजा और हवन के साथ जम्मू-कश्मीर के शोपियां के टाक मोहल्ले में ऐतिहासिक राम मंदिर के पुनर्निर्माण की नींव रखी। 1989 में आगजनी से क्षतिग्रस्त और बाद में अतिक्रमण का शिकार हुई इस जगह को स्थानीय प्रशासन की कोशिशों से समुदाय को वापस सौंपा गया। जबकि पुरातत्व और विरासत विभाग ने पुनर्निर्माण के लिए फंड मंजूर किया।

समुदाय और स्थानीय निवासियों ने इस पहल को सिर्फ एक मंदिर के निर्माण के तौर पर नहीं। बल्कि कश्मीरी पंडितों की कश्मीर घाटी में वापसी, उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के पुनरुद्धार और कश्मीर की साझा सांस्कृतिक पहचान की बहाली की उम्मीद के प्रतीक के तौर पर देखा।

1989 में जला दिया गया था राम मंदिर

इस मंदिर का इतिहास कश्मीर के बेहद संवेदनशील दौर से जुड़ा हुआ है। साल 1989 में घाटी में उग्रवाद के दौर के बीच शोपियां में मौजूद राम मंदिर को जला दिया गया था। इसके बाद मंदिर की जमीन पर कथित तौर पर अतिक्रमण भी किया गया। समय बीतने के साथ कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर घाटी से विस्थापन हुआ। इसके बाद यह धार्मिक स्थल भी समुदाय की स्मृतियों का हिस्सा बनकर रह गया। लेकिन अब करीब साढ़े तीन दशक बाद अब उसी जमीन पर मंदिर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई है।

सैकड़ों लोग हुए धार्मिक कार्यक्रम में शामिल

राम मंदिर की आधारशिला रखने के कार्यक्रम में कश्मीरी पंडित समुदाय के सैकड़ों सदस्य शामिल हुए। इस दौरान पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान किया गया। राम मंदिर के पुनर्निर्माण की औपचारिक शुरुआत की गई। कार्यक्रम में मौजूद लोगों के लिए यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था। बल्कि उन पुरानी यादों से दोबारा जुड़ने का अवसर था, जो विस्थापन के कारण उनसे दूर हो गई थीं।

प्रशासन की पहल से पुनर्निर्माण का रास्ता साफ

राम मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए प्रशासन की ओर से भी महत्वपूर्ण पहल की गई है। इंडिया टुडे के मुताबिक, पुरातत्व एवं विरासत विभाग ने अपनी विरासत संरक्षण पहल के तहत इस परियोजना के लिए धनराशि स्वीकृत की है। इस कदम से शोपियां के इस पुराने धार्मिक स्थल को दोबारा विकसित करने और क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं धार्मिक विरासत को संरक्षित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

‘यह सिर्फ मंदिर का निर्माण नहीं, हमारी जड़ों से जुड़ने का प्रयास’

कार्यक्रम में शामिल कुछ कश्मीरी पंडितों ने कहा कि यह मंदिर उनके लिए केवल ईंट-पत्थर से बनने वाली कोई इमारत नहीं है। यह शोपियां के साथ उनके पैतृक संबंध, उनकी धार्मिक आस्था और कश्मीर की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान में समुदाय की मौजूदगी की याद है। उनका कहना था कि मंदिर का दोबारा निर्माण उस विरासत को पुनर्जीवित करने की कोशिश है। इससे कश्मीरी पंडित विस्थापन के कारण लंबे समय से दूर रहे हैं।

स्थानीय लोगों ने भी किया स्वागत

मंदिर के पुनर्निर्माण की पहल का स्थानीय निवासियों ने भी स्वागत किया है। लोगों का कहना है कि कश्मीरी पंडित कश्मीर के इतिहास, संस्कृति और साझा विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, समुदाय से जुड़े पुराने धार्मिक स्थलों का पुनरुद्धार घाटी की साझी और समावेशी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने में योगदान दे सकता है।

एक स्थानीय निवासी ने न्यूज एजेंसी IANS से कहा, “दशकों पहले यहां एक मंदिर हुआ करता था। लेकिन धीरे-धीरे वह जर्जर हो गया। फिर उसका अस्तित्व खत्म हो गया। लेकिन अब हालात बेहतर हुए हैं। सरकार ने इसे फिर से बनाने की पहल की है। स्थानीय लोगों और प्रशासन ने इसके लिए बहुत मेहनत की है। आज यहां मंदिर का पुनर्निर्माण हो रहा है। हम इस प्रयास की सराहना करते हैं।”

अन्य लोगों ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि करीब 35 साल से अधिक समय बाद शोपियां में राम मंदिर की आधारशिला रखा जाना कश्मीरी पंडितों के लिए सिर्फ एक निर्माण कार्य की शुरुआत नहीं। बल्कि विस्थापन, पीड़ा और पुरानी यादों के बीच अपनी जड़ों की ओर लौटने की उम्मीद का प्रतीक बन गया है।

ये भी पढ़ें- Mohan Bhagwat New York Visit: ‘अगर कोई हिंदू नहीं चाहता कि भारत में मुस्लिम रहें, तो…’; न्यूयॉर्क में क्या बोले RSS प्रमुख मोहन भागवत?

Nepal Flood Update: नेपाल में फिर विनाशकारी त्रासदी का खतरा! भोटे कोशी नदी में बाढ़ का बहाव बढ़ा, रसुवा में हाई अलर्ट

Nepal-Tibet Flood Update: पड़ोसी देश नेपाल में हालिया भीषण बाढ़ की त्रासदी के बीच एक बार फिर भोटे कोशी नदी को लेकर चिंता बढ़ गई है। नेपाल के नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDRRMA) ने रविवार (20 अगस्त) सुबह बताया कि रसुवा में भोटेकोशी नदी में बाढ़ का बहाव फिर बढ़ गया है। ऐसे में नदी के आसपास रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की अपील की गई है। NDRRMA के अनुसार, रसुवा जिला प्रशासन कार्यालय को सूचना मिली है कि भोटे कोशी नदी में बढ़े हुए बाढ़ प्रवाह की आवाज सुनाई दे रही है। इसके बाद नदी के आसपास के इलाकों में विशेष सावधानी बरतने को कहा गया है।

रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग में हाई अलर्ट

NDRRMA ने खास तौर पर रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग जिलों में नदी के आसपास रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। लोगों से नदी के किनारे जाने से बचने और किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में सुरक्षित स्थान की ओर जाने के लिए तैयार रहने को कहा गया है।

नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी ने रविवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में लिखा, “रसुवा के जिला प्रशासन कार्यालय को जानकारी मिली है कि भोटे कोशी नदी में बाढ़ का बहाव तेज होने की आवाज सुनी गई है। इसलिए, हम रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग तक नदी के आस-पास के इलाकों में सावधानी बरतने का अनुरोध करते हैं। जैसे ही और जानकारी मिलेगी, हम आगे की अपडेट देंगे।”

यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब नेपाल में कुछ दिन पहले आई विनाशकारी बाढ़ में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ है। फिलहाल, राहत एवं बचाव अभियान अभी भी जारी है। रविवार को बचाव अभियान का पांचवां दिन है। नेपाल-चीन सीमा के इलाकों में भयानक अचानक आई बाढ़ और मलबे के बहाव से हुई तबाही के बाद टीमें बचे हुए लोगों और लापता लोगों की तलाश कर रही हैं।

आगे की जानकारी का इंतजार

NDRRMA ने कहा है कि जैसे-जैसे अतिरिक्त जानकारी प्राप्त होगी, लोगों को आगे अपडेट किया जाएगा। हालांकि, नेपाल के बाढ़ पूर्वानुमान विभाग ने बाद में कहा कि भोटे कोशी क्षेत्र में बड़े स्तर की बाढ़ का तत्काल खतरा नहीं है, लेकिन नदी के आसपास सावधानी बरतना जरूरी है। फिलहाल प्रशासन की अपील है कि नदी किनारे रहने वाले लोग किसी भी अफवाह पर भरोसा न करें और आधिकारिक चेतावनियों पर नजर बनाए रखें।

मरने वालों की संख्या 691 हुई

अधिकारियों से मिली ताजा जानकारी के मुताबिक, नेपाल और चीन के तिब्बत इलाके में मरने वालों की कुल संख्या 691 हो गई है। जबकि 3,000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं। अधिकारियों ने 675 मौतों और 2,498 लोगों के लापता होने की सूचना दी है। जबकि चीनी अधिकारियों ने तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में 16 मौतों और 546 लोगों के लापता होने की जानकारी दी है। अब तक नेपाल में 3,700 से ज्यादा लोगों को बचाया जा चुका है। यह भयानक आपदा 26 अगस्त को आई थी। पहाड़ी सीमावर्ती इलाके में मलबे का भारी बहाव और अचानक आई बाढ़ ने घरों, सड़कों, पुलों और अन्य चीजों को नष्ट कर दिया था।

बचाव अभियान जारी

खराब मौसम के कारण कुछ समय के लिए रोके जाने के बाद नेपाली अधिकारियों ने खोज और बचाव अभियान फिर से शुरू किया। बचे हुए लोगों को निकालने और अलग-थलग पड़े समुदायों तक राहत सामग्री पहुंचाने के लिए हेलीकॉप्टर तैनात किए गए हैं। बचाव दल कई अहम जगहों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जिनमें रसुवा में अपर त्रिशूली-1 पनबिजली परियोजना भी शामिल है, जहां अधिकारियों का मानना ​​है कि 100 से ज्यादा लोग कीचड़ से भरी सुरंग के अंदर फंसे हो सकते हैं।

चीनी तरफ बुरी तरह क्षतिग्रस्त ग्यिरोंग सीमा क्रॉसिंग के आसपास भी खोज अभियान जारी है। इस बीच, भारत ने भोजन, दवाइयों और कंबल जैसी राहत सामग्री भेजी है। उन इलाकों में संपर्क बहाल करने में मदद के लिए तकनीकी टीमें और पहले से तैयार पुल (प्री-फैब्रिकेटेड ब्रिज) देने की भी पेशकश की है, जहां इंफ्रास्ट्रक्चर बह गया है।

ये भी पढ़ें- Mohan Bhagwat New York Visit: ‘अगर कोई हिंदू नहीं चाहता कि भारत में मुस्लिम रहें, तो…’; न्यूयॉर्क में क्या बोले RSS प्रमुख मोहन भागवत?