Delhi protest: NEET आंदोलन से फिर करीब आए राहुल-अखिलेश? यूपी चुनाव से पहले युवाओं के मुद्दों पर BJP को घेरने की तैयारी

NEET protest: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब लगभग छह महीने का समय बचा है। ऐसे में NEET परीक्षा विवाद ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (SP) को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के खिलाफ एक नया और मजबूत राजनीतिक मुद्दा दे दिया है। दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन अब एक बड़े विपक्षी अभियान का रूप ले चुका है। इसमें पेपर लीक, बेरोजगारी और सरकारी भर्तियों में कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जा रहा है।

दोनों दलों का मानना है कि ये ऐसे मुद्दे हैं, जिनका असर उत्तर प्रदेश के करोड़ों युवा मतदाताओं पर पड़ सकता है। आगामी चुनाव में यह बड़ा चुनावी हथियार साबित हो सकता है।

राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच फिर दिखा तालमेल

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के बीच बढ़ता तालमेल ऐसे समय सामने आया है, जब उत्तर प्रदेश की राजनीति निर्णायक दौर में एंट्री  कर रही है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों का चर्चित ‘दो लड़के’ अभियान मतदाताओं को प्रभावित करने में विफल रहा था। गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। कांग्रेस-सपा गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बड़ा झटका दिया। इससे दोनों दलों का आत्मविश्वास बढ़ा और गठबंधन को नई राजनीतिक ऊर्जा मिली।

डिंपल यादव ने आंदोलन में निभाई सक्रिय भूमिका

20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा के बाद समाजवादी पार्टी की सांसद और अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव जंतर-मंतर पहुंचीं। अपनी पहचान बन चुकी गुलाबी साड़ी में पहुंचीं डिंपल कई घंटों तक घायल छात्रों के बीच रहीं। उन्होंने घायल छात्रों का हौसला बढ़ाया। बेहोश हुए एक छात्र की मदद की की। योगत्यता उपलब्ध कराने में सहयोग किया और प्रदर्शनकारियों के साथ लगातार मौजूद रहीं।

सोशल मीडिया पर उनके पुलिस बैरिकेड पर चढ़ने, घायल छात्रों की मदद करने और प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े रहने के वीडियो तेजी से वायरल हुए। सरकार के रवैये को असंवेदनशील बताते हुए उन्होंने कहा, “यह NEET नहीं, CHEAT है।” उनकी लगातार मौजूदगी ने समाजवादी पार्टी को युवाओं और छात्रों के प्रति संवेदनशील दल के रूप में पेश करने में मदद की।

युवाओं के जरिए बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश

उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में कल्याणकारी योजनाओं, रोजगार पहलों और राष्ट्रवादी राजनीति के जरिए पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के बीच मजबूत आधार बनाया है। विपक्ष का मानना है कि NEET विवाद बार-बार सामने आ रहे पेपर लीक के आरोप और बढ़ती बेरोजगारी युवाओं में असंतोष पैदा कर रहे हैं। कांग्रेस और सपा इसी नाराजगी को राजनीतिक समर्थन में बदलना चाहती हैं। दोनों दल खुद को छात्रों और युवाओं की आवाज के रूप में स्थापित कर इस आंदोलन को चुनावी मुद्दे में बदलने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में शुरू हुआ जॉइंट आंदोलन

NEET आंदोलन का असर उत्तर प्रदेश में भी तेजी से दिखाई दिया। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने लखनऊ सहित कई जिला मुख्यालयों पर संयुक्त प्रदर्शन किए। दोनों दलों के छात्र संगठनों ने आंदोलन का नेतृत्व किया। कई जगह पुलिस के साथ झड़पें हुईं। विपक्षी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी भी हुई, जिससे यह आंदोलन लगातार सुर्खियों में बना रहा। अब दोनों दलों ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान भी संयुक्त विरोध प्रदर्शन जारी रखने की योजना बनाई है।

सिर्फ NEET नहीं, कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी

दोनों दलों के सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी अब अपने अभियान को केवल NEET तक सीमित नहीं रखेंगी।

गठबंधन की योजना में शामिल प्रमुख मुद्दे हैं:-

कथित पेपर लीक

बेरोजगारी

सरकारी भर्तियों में देरी

राम मंदिर दान चोरी विवाद

किसानों के लिए खाद की कमी

नकली दवाओं का मुद्दा

बढ़ते बिजली बिल और बिजली दरें

विपक्ष की रणनीति है कि चुनाव तक जनता का ध्यान इन मुद्दों पर केंद्रित रखा जाए, ताकि बीजेपी पहचान की राजनीति और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए चुनावी एजेंडा तय न कर सके।

फिलहाल सीट बंटवारे का विवाद भी पड़ा ठंडा

कुछ समय पहले कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बराबर सीटों की हिस्सेदारी चाहेगी। गौतम ने कांग्रेस को गठबंधन का ‘बड़ा भाई’ तक बताया था।

इन बयानों से दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए थे। हालांकि, छात्र आंदोलन के बाद फिलहाल बातचीत का केंद्र सीटों की बजाय संयुक्त राजनीतिक अभियान बन गया है। इससे दोनों दल एकजुटता का संदेश देने में सफल रहे हैं।

युवा वोट बना सबसे बड़ा चुनावी रणक्षेत्र

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में युवा मतदाताओं को सबसे बड़ा चुनावी मैदान मान रही हैं। सपा का पारंपरिक मुस्लिम-यादव (MY) वोट बैंक अभी भी उसके साथ माना जाता है। जबकि कांग्रेस ऊंची जातियों, दलितों, शहरी मतदाताओं और पहली बार वोट डालने वाले युवाओं को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है। बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दे जाति और धर्म से ऊपर उठकर लगभग हर वर्ग के छात्रों को प्रभावित करते हैं। इसलिए इन्हें राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावी माना जा रहा है।

बीजेपी भी करेगी कड़ा मुकाबला

हालांकि बीजेपी इस चुनौती को आसानी से स्वीकार करने वाली नहीं है। 2024 लोकसभा चुनाव में झटका लगने के बावजूद भगवा पार्टी ने बाद के विधानसभा उपचुनावों में अपनी संगठनात्मक ताकत का प्रदर्शन किया है। बीजेपी आगामी चुनाव में अपनी कल्याणकारी योजनाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर, सरकारी भर्ती अभियानों और सुशासन के रिकॉर्ड को प्रमुखता से जनता के सामने रखेगी। पार्टी को भरोसा है कि उत्तर प्रदेश में उसका बूथ स्तर तक फैला मजबूत संगठन विपक्ष पर बढ़त बनाए रखेगा।

क्या NEET आंदोलन बनेगा चुनावी गेम चेंजर?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या NEET आंदोलन 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की दिशा बदल पाएगा। यदि राहुल गांधी और अखिलेश यादव युवाओं के गुस्से को चुनाव तक बनाए रखने और पेपर लीक, बेरोजगारी तथा छात्रों की आकांक्षाओं को चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बनाने में सफल रहते हैं, तो कांग्रेस-सपा गठबंधन 2024 के बाद बीजेपी के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती पेश कर सकता है।

ये भी पढ़ें- E20 Petrol Row: Meta, X और Google पर मुकदमा करेंगे नितिन गडकरी! एथेनॉल वाले पेट्रोल से जुड़ा है ये पूरा केस

वहीं यदि बीजेपी बहस का केंद्र फिर से विकास, सुशासन, कल्याणकारी योजनाओं और नेतृत्व पर ले जाने में सफल हो जाती है, तो जंतर-मंतर से उठी यह भावनात्मक लहर चुनाव तक पहुंचने से पहले कमजोर भी पड़ सकती है। ऐसे में उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य के करोड़ों युवा मतदाता आखिर किस राजनीतिक दल पर सबसे अधिक भरोसा जताते हैं।

Boomer को लेकर शशि थरूर ने अपने बेटे को दिया ऐसा ज्ञान कि मामला वायरल हो गया

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने एक बार फिर अपने मजाकिया अंदाज से लोगों का ध्यान खींचा है। इस बार उन्होंने अपने बेटे ईशान थरूर की सोशल मीडिया पोस्ट पर हल्के-फुल्के अंदाज में जवाब दिया। ईशान थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट करते हुए कहा कि छोटे बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखना चाहिए। उन्होंने जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक श्रीधर वेम्बू की उस राय का समर्थन किया, जिसमें छोटे बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात कही गई थी।

ईशान ने अपनी पोस्ट में लिखा, “मैं मानता हूं कि छोटे बच्चों को सोशल मीडिया पर नहीं होना चाहिए। लेकिन उससे पहले भारत में व्हाट्सऐप इस्तेमाल करने वाले ‘बूमर्स’ पर रोक लगाने की जरूरत है।” इस पर शशि थरूर ने मजेदार अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि भारत की परिस्थितियां पश्चिमी देशों से अलग हैं। इसलिए यहां लगभग हर पीढ़ी को “बेबी बूमर” कहा जा सकता है। उन्होंने मजाक में अपने बेटे से कहा कि इस हिसाब से उसकी पीढ़ी भी इससे अलग नहीं है।

क्या है ‘बूमर’

बूमर’ शब्द, ‘बेबी बूमर’ का छोटा रूप है। आम तौर पर इसका इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जाता है, जिनका जन्म दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1946 से 1964 के बीच हुआ था। हालांकि, भारत में यह शब्द अक्सर ऐसे बुजुर्गों या पुराने विचारों वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो बिना मांगे सलाह देते हैं या पारंपरिक सोच रखते हैं। जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने छोटे बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात उस समय कही थी, जब वह फ्रांस की संसद में पारित एक विधेयक पर प्रतिक्रिया दे रहे थे। इस विधेयक में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करने पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया था।

फ्रांस के संसद ने दी मंजूरी

इस सप्ताह फ्रांस की संसद के दोनों सदनों ने इस कानून को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही फ्रांस 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने वाला यूरोपीय संघ का पहला देश बन गया। नए कानून के तहत स्कूल परिसर में छात्रों के मोबाइल फोन इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि इससे छोटे बच्चों को मोबाइल स्क्रीन से बाहर निकलकर नई चीजें सीखने और वास्तविक दुनिया से जुड़ने का मौका मिलेगा।

उन्होंने कहा, “भारत में भी छोटे बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगनी चाहिए। मेरा मानना है कि बच्चों को मोबाइल पर समय बिताने के बजाय किताबें पढ़नी चाहिए, धूप में बाहर खेलना चाहिए और सोशल मीडिया से दूर रहना चाहिए।” हालांकि, वेम्बू के इस सुझाव पर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ लोगों ने उनके विचार का समर्थन किया, जबकि कई लोगों का कहना था कि सरकार को लोगों की निजी जिंदगी और उनके फैसलों में जरूरत से ज्यादा दखल नहीं देना चाहिए।

संडे प्रोफाइल : जो मैनचिन:अमेरिकी राजनीति में तीसरे विकल्प की खोज में जुटे डेमोक्रेटिक पार्टी के पूर्व सांसद

डेमोक्रेटिक पार्टी के पूर्व सांसद जो मैनचिन उन राजनेताओं में हैं, जिनका अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने में ज्यादा यकीन है। वे अमेरिका की दो ध्रुवीय राजनीति को अलग रास्ते पर ले जाने की नई पहल से सुर्खियों में हैं। राजनीति में कुछ हस्तियां हमेशा मुख्य धारा से अलग हटकर चलने की कोशिश करती हैं। दो बार सांसद रह चुके जो मैनचिन ऐसे ही हैं। वे अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए कुछ नया करते रहते हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी में रहते हुए उन्होंने कई बार पार्टी लाइन का विरोध किया था। उन्होंने मतभेदों के कारण 2024 में पार्टी छोड़ दी। अब वे नए रास्ते पर निकल पड़े हैं। उन्होंने स्वतंत्र लीडरशिप काउंसिल लॉन्च की है। 78 साल के मैनचिन अमेरिकी संसद के एक सदन-कांग्रेस के लिए चुनाव लड़ने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन करेंगे। 23 जुलाई को जब उन्होंंने एक समारोह में काउंसिल के गठन का ऐलान किया तो कैलिफोर्निया के सांसद केविन किली सहित कई उम्मीदवार मौजूद थे। मैनचिन का कहना है, हम एक अन्य पार्टी नहीं बना रहे हैं। हम उन लोगों का साथ देंगे जो किसी पार्टी के नहीं हैं, स्वतंत्र हैं। अमेरिका की दो दलीय राजनीति में तीसरी राजनीतिक ताकत बनाने के प्रयास बहुत कम हुए हैं। इसलिए उनकी पहल अहम है। अपने राजनीतिक करियर में मैनचिन मध्यमार्गी रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ने से पहले उन्होंने 2020-2024 के बीच जलवायु परिवर्तन और अमीरों पर टैक्स सहित कई मुद्दों पर संसद में पार्टी लाइन का विरोध किया था। जो मैनचिन का सफर वेस्ट वर्जीनिया के कोयला खदान क्षेत्र फार्मिंगटन से शुरू हुआ। उनके पिता शहर के मेयर थे। किराना दुकान संचालक उनके दादा जरूरतमंदों की मदद करते थे। उनसे प्रेरित होकर मैनचिन ने भी लोगों का हाल जानना और उनकी सहायता करना शुरू किया। इससे स्थानीय प्रभाव बढ़ता गया। वेस्ट वर्जीनिया यूनिवर्सिटी में छात्रों की एक पार्टी के दौरान उनकी मुलाकात गेल कोनेली से हुई, जो बाद में उनकी पत्नी बनीं। राजनीति में उनकी शुरुआत राज्य विधानसभा से हुई। 2004 में वे वेस्ट वर्जीनिया के गवर्नर बने और 2010 में पहली बार अमेरिकी सीनेट पहुंचे। वे कोयला उद्योग के समर्थक रहे हैं। 2021-22 में सीनेट में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकंस के 50-50 सदस्य होने से जो मैनचिन का वोट निर्णायक बन गया। उनके दबाव में राष्ट्रपति जो बाइडेन को कई विधेयकों में बदलाव करने पड़े। मैनचिन का कहना है कि डेमोक्रेटिक पार्टी में अब उनके जैसे अनुदारवादी नेताओं के लिए जगह नहीं है। वे राजनीतिक ध्रुवीकरण के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। गैलप के अनुसार अधिकांश अमेरिकी दोनों प्रमुख दलों के प्रति अनुकूल राय नहीं रखते, जबकि एक सर्वे में 45% लोगों ने खुद को निर्दलीय बताया। रिपब्लिकन प्रभाव वाले वेस्ट वर्जीनिया से उनका दो बार सीनेट जीतना उल्लेखनीय रहा, हालांकि 2024 में वे चुनाव हार गए थे।

Dharmendra Pradhan Resigns: CJP प्रोटेस्ट के पहले दिन ही धर्मेंद्र प्रधान ने कर दी थी इस्तीफे की पेशकश! फिर किसने मना कर दिया?

Dharmendra Pradhan Resigns: मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने पूर्व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर एक सनसनीखेज दावा किया है। उन्होंने दावा किया है कि तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में छात्र आंदोलन शुरू होने के पहले दिन ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) के आलकमान के सामने मंत्री पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी थी। विजयवर्गीय ने शनिवार 25 जुलाई को इंदौर में पत्रकारों से बातचीत में प्रधान की तारीफ करते हुए कहा कि उन्हें जो भी दायित्व सौंपा जाता है, वह उसे बड़ी ईमानदारी और समर्पण से निभाते हैं।

कैलाश विजयवर्गीय ने कहा, “पहले दिन से जैसे ही (छात्र) आंदोलन शुरू हुआ था, प्रधान ने पार्टी (BJP) अध्यक्ष से कहा कि अगर उन्हें ऐसा लगता है, तो वह (शिक्षा मंत्री के पद से) इस्तीफा दे देते हैं।” विजयवर्गीय के मुताबिक BJP अध्यक्ष ने उस समय प्रधान को यह कहते हुए इस्तीफा देने के लिए मना कर दिया था कि जब तक इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक वह इस्तीफा नहीं देंगे और किसी व्यक्ति से इस्तीफे की बात तक नहीं करेंगे।

BJP के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव विजयवर्गीय ने कहा कि बाद में बनीं परिस्थितियों के चलते जब पार्टी ने प्रधान के इस्तीफे का निर्णय लिया, तो उन्होंने तुरंत इस्तीफा दे दिया। पीटीआई के मुताबिक उन्होंने कहा, “प्रधान के इस्तीफे से उन सब विदेशी ताकतों के मंसूबे खत्म हो गए जो बांग्लादेश और श्रीलंका की तरह भारत में हिंसा फैलाकर अस्थिरता पैदा करना चाहती थीं। इसलिए प्रधान ने जो काम किया है, उसके लिए मैं उनको बधाई भी देता हूं।”

कांग्रेस और राहुल गांधी पर हमला

प्रधान के इस्तीफे को लेकर कांग्रेस नेताओं के जश्न मनाने पर विजयवर्गीय ने एक कहावत का इस्तेमाल करते हुए तंज कसा कि पड़ोसी के घर में बच्चा पैदा होने पर कांग्रेस ढोलक बजा रही है। उन्होंने कहा, “छात्र आंदोलन में कांग्रेस की क्या भूमिका थी? बच्चों ने आंदोलन किया, वे (कांग्रेस) जाकर उसके पीछे खड़े हो गए। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद विपक्ष बिल्कुल निराश हो गया है और निराशा के पल में उन्हें आशा की एक किरण कॉकरोच जनता पार्टी में दिखी।”

मंत्री ने पूछा कि क्या छात्र आंदोलन में किसी कांग्रेस नेता ने पुलिस का एक भी लट्ठ खाया है? लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने दीमक का काम करते हुए देश की शिक्षा व्यवस्था को अंदर से खोखला कर दिया है।

इस बयान पर पलटवार करते हुए विजयवर्गीय ने कहा, “मुझे राहुल गांधी की राजनीतिक विचारधारा और उनकी बुद्धि पर बहुत तरस आता है। मुझे लगता है कि उन्हें अभी जरा समझना पड़ेगा कि संघ है क्या?” उन्होंने कहा कि देश आज सही दिशा में जा रहा है और इसके पीछे संघ की मेहनत है।

प्रह्लाद जोशी ने शिक्षा मंत्री का कार्यभार संभाला

नवनियुक्त केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने पदभार संभाल लिया है। धर्मेंद्र प्रधान के शनिवार को पद से इस्तीफा देने के बाद जोशी को शिक्षा मंत्री नियुक्त किया गया। जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। वह उपभोक्ता मामलों के मंत्री भी हैं।

नीट पेपर लीक होने के खिलाफ देशभर में कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए। प्रदर्शनों के के बीच, प्रधान ने शनिवार को पद से इस्तीफा दे दिया। प्रधान ने अपने त्यागपत्र में कहा कि यह उनके लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय नहीं है। पिछले 10 दिनों के दौरान हुई घटनाओं से वह व्यथित हैं।

ये भी पढ़ें- Dharmendra Pradhan Resigns: किसी विवाद के कारण इस्तीफा देने वाले मोदी सरकार के दूसरे मंत्री हैं धर्मेंद्र प्रधान, पहले कौन थे?

CM योगी का बड़ा ऐलान, आक्रमणकारियों नहीं, भारत के राष्ट्रनायकों के नाम पर बनेंगे म्यूजियम

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आगरा में समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस आगरा में छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपना शौर्य दिखाया था, सपा सरकार वहां मुगल म्यूजियम बना रही थी। हमने कहा, उत्तर प्रदेश की जनता का पैसा किसी आक्रमणकारी के नाम पर म्यूजियम नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रनायकों के नाम पर म्यूजियम बनेगा। छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर भव्य म्यूजियम के निर्माण का कार्य इस वर्ष के अंत तक पूरा हो जाएगा। सीएम ने कहा कि डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कॉरिडोर का एक महत्वपूर्ण नोड आगरा के अंदर विकसित करने जा रहे हैं। 

 

सीएम ने 53 परियोजनाओं का लोकार्पण एवं शिलान्यास किया

 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को आगरा में आगरा उत्तर, आगरा ग्रामीण और आगरा दक्षिण विधानसभा क्षेत्रों के लिए 342 करोड़ रुपए से अधिक की 53 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण एवं शिलान्यास किया। कार्यक्रम स्थल पर मुख्यमंत्री का स्वागत 'जय श्री राम'  एवं 'भारत माता की जय' के नारों के साथ गदा भेंट कर किया गया। इस दौरान उन्होंने स्कूली छात्रों की प्रदर्शनी का निरीक्षण किया और बच्चों से बातचीत कर उन्हें चॉकलेट्स दी। साथ ही अन्य स्टॉल्स का भी अवलोकन किया। मुख्यमंत्री ने नन्हे शिशुओं को गोद में लेकर दुलारा, उन्हें तिलक लगाया और खिलौने भेंट किए। 

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज मुझे ब्रजभूमि में आगरा की इस पौराणिक और महाराजा सूरजमल की शौर्य एवं पराक्रम की इस धरा पर एक बार फिर से आने का अवसर प्राप्त हुआ है। उन्होंने इस धरा को नमन करते हुए कहा कि जब तीन महीने पहले जब मैं आया था, तब 6,500 करोड़ रुपये की परियोजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास का अवसर मुझे प्राप्त हुआ था। आज एक बार फिर से विधानसभाओं के कार्यक्रम की श्रृंखला में मुझे आगरा की इन तीन विधानसभाओं के साथ संवाद बनाने का अवसर प्राप्त हो रहा है। 

 

आगरा ने 2022 और 2024 में बीजेपी को अपना आशीर्वाद दिया

 

सीएम ने आगरा की जनता जनार्दन का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आगरा ने 2022, 2024 में डबल इंजन की भारतीय जनता पार्टी को अपना आशीर्वाद दिया है। इसका परिणाम यह है कि आगरा ने जो सोचा, उससे पहले डबल इंजन सरकार उस योजना को लेकर आगरा के अंदर आ गई। आज आगरा स्मार्ट सिटी के साथ-साथ सेफ सिटी के एक नए मॉडल की तरफ आगे बढ़ रहा है। आगरा का यह मॉडल अभी तीन दिन पहले माननीय उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद तो और भी उसका उज्ज्वल पक्ष हम सबके सामने आया है। 468 औद्योगिक इकाइयों के एनओसी से जुड़े हुए कार्यक्रम टीटीजेड के नाते जो पेंडिंग पड़े हुए थे, उन सबको स्वीकृति मिल गई। यानी अब आगरा में उद्योग लगने से कोई रोकेगा नहीं, कोई रोक भी नहीं पाएगा।

 

आगरा में इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने की दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि मुझे बताते हुए प्रसन्नता है कि आगरा में हम इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने की दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। अब आगरा एक बार ब्रजभूमि के औद्योगिक गतिविधियों का ही नहीं, टूरिज्म के भी एक नए केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। बेहतरीन कनेक्टिविटी हो गई है। आगरा के अंदर हर प्रकार की कनेक्टिविटी को मजबूती प्रदान करने की दिशा में डबल इंजन सरकार ने जो कार्य प्रारंभ किया, आज वह आप सबके सामने है। पेरू का इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर भारत के अंदर कहीं खुलना था, हम लोगों ने कहा कि आगरा में हम जमीन उपलब्ध करवाते हैं, और अब इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर ने यहां पर सफलतापूर्वक काम करना प्रारंभ कर दिया है। यहां के अन्नदाता किसानों को लाभ होगा, किसान के उत्पाद को वैल्यू एडिशन मिलेगा, और कई गुना दाम मिलने के बाद अन्नदाता किसानों की आमदनी बढ़ेगी। इससे उनके चेहरे पर खुशहाली आएगी। 

 

ट्रैफिक व्यवस्था को आधुनिक बनाने जैसे कार्य तेजी से आगे बढ़ाए जाएंगे

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्षों से टीटीजेडी के कारण लंबित पड़ी विकास परियोजनाओं को उच्चतम न्यायालय से हरी झंडी मिलने के बाद अब आगरा को स्मार्ट, सेफ और फ्यूचर रेडी सिटी के रूप में विकसित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। उन्होंने कहा कि अब शहर में मल्टी लेवल पार्किंग, इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर और ट्रैफिक व्यवस्था को आधुनिक बनाने जैसे कार्य तेजी से आगे बढ़ाए जाएंगे। आगरा के विकास के साथ-साथ किसानों के हितों का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों द्वारा किसानों की समस्याएं उठाए जाने पर सरकार ने उनका समाधान निकाला है। किसानों को उनकी जमीन का उचित मूल्य मिले, इसके लिए सर्किल रेट बढ़ाने की दिशा में काम किया गया है। उन्होंने कहा कि जहां नए मूल्य के अनुरूप भुगतान संभव नहीं होगा, वहां सरकार किसानों की जमीन का अधिग्रहण नहीं करेगी और किसी भी किसान को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।

 

10 नई टाउनशिप विकसित करने को मंजूरी दी गई

 

सीएम ने कहा कि आगरा से आने वाले विकास प्रस्तावों को सरकार प्राथमिकता के आधार पर स्वीकृति दे रही है। इसी क्रम में ग्रेटर आगरा परियोजना के तहत करीब 5,200 करोड़ रुपये की लागत से 10 नई टाउनशिप विकसित करने को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा आगरा-ग्वालियर रोड पर 1,500 करोड़ रुपये की लागत से अटलपुरम टाउनशिप विकसित की जा रही है, जहां करीब 10 हजार परिवारों के लिए आवास और व्यावसायिक सुविधाएं उपलब्ध होंगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि शहर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का कार्य सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है। साथ ही ओडीओपी और ओडीओसी योजना के तहत आगरा के लेदर उद्योग के बाद अब पेठा को भी वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में सरकार कार्य कर रही है।

 

500 महिलाओं के लिए श्रमजीवी हॉस्टल के निर्माण की घोषणा

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के संरक्षण पर भी सरकार विशेष ध्यान दे रही है। छत्रपति शिवाजी महाराज के आगरा प्रवास से जुड़ी ऐतिहासिक कोठी के अधिग्रहण को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा बटेश्वर धाम, कैलाश मंदिर, गुरु का ताल, गीत गोविंद वाटिका, अटल बिहारी वाजपेयी की जन्मस्थली बटेश्वर, फतेहपुर सीकरी और सौरीपुर जैन तीर्थ के विकास कार्यों को भी आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि आगरा में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की स्मृति में 500 महिलाओं के लिए श्रमजीवी हॉस्टल का निर्माण कराया जाएगा। इसके लिए राज्य सरकार ने स्वीकृति देने के साथ बजट भी जारी कर दिया है। 

 

आगरा में विकास परियोजनाओं पर तेजी से काम हो रहा

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि आगरा में हजारों करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं पर तेजी से काम किया जा रहा है। इन परियोजनाओं में पुल, फ्लाईओवर, सड़कों का चौड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण, पॉलिटेक्निक, आईटीआई, नए कॉलेज और विश्वविद्यालयों का निर्माण शामिल है। मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2017 से पहले जो प्रदेश में सरकार चला रहे थे, वे सिर्फ अपने विकास में व्यस्त थे। जनता का पैसा सैफई सिंडीकेट की लूट-खसोट और डकैती का माध्यम बन गया था। 

 

सपा और कांग्रेस पर मुख्यमंत्री ने साधा निशाना

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि समाजवादी पार्टी और उससे पहले कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में नौजवानों की नौकरियों में भ्रष्टाचार, गरीबों की योजनाओं में अनियमितता और किसानों के हितों की उपेक्षा हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि इन परिस्थितियों के कारण प्रदेश के युवाओं के सामने पहचान का संकट खड़ा हुआ, किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हुए तथा बेटियां और व्यापारी खुद को असुरक्षित महसूस करते थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में डबल इंजन की सरकार बिना रुके, बिना डिगे, बिना थके और बिना किसी भेदभाव के गांव, गरीब, किसान, नौजवान, महिलाओं सहित समाज के प्रत्येक वर्ग के उत्थान और विकास के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है।

 

यूपी में 9 सालों में 9 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी मिली

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार बिना किसी भेदभाव के गांव, गरीब, किसान, नौजवान, महिलाओं और समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए कार्य कर रही है। पिछले एक वर्ष में केंद्र सरकार ने 12 लाख युवाओं को सरकारी नौकरियां दी हैं, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने नौ वर्षों में नौ लाख युवाओं को सरकारी सेवाओं में नियुक्ति दी है। अब भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और आगरा, फिरोजाबाद, मथुरा सहित प्रदेश के सभी जिलों के युवाओं को समान अवसर मिल रहे हैं। अन्यथा इससे पहले सैफई सिंडीकेट उसमें कुंडली मारकर बैठ जाता था। चाचा-भतीजे की जोड़ी वसूली करके उस पूरे कार्यक्रम को इतना विवादित कर देते थे कि पूरा का पूरा अभियान फेल हो जाता था। न्यायालय को स्टे करना पड़ता था। 

 

2017 से पहले के मुख्यमंत्री 12 बजे सोकर उठते थे

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में अब बेटियों और व्यापारियों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। जो भी उनकी सुरक्षा में सेंध लगाने की कोशिश करेगा, उसके लिए केवल दो ही जगह हैं, जेल या जहन्नुम। उन्होंने कहा कि डबल इंजन की सरकार कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है। पिछली सरकारों पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके पास विकास के लिए न समय था, न सोच और न ही जनप्रतिनिधियों तथा जनता से संवाद की इच्छा। जहां पर मुख्यमंत्री 12 बजे सोकर उठता हो, 2 बजे तक तैयार होता हो, 5 बजे जिम चला जाता हो और 7 बजे के बाद अपनी मित्र मंडली के साथ मौज-मस्ती में लिप्त हो जाता हो, वहां का तो भगवान ही मालिक था। पहले प्रदेश के हर जिले में माफिया सक्रिय थे, थाने और तहसीलें गुंडों के प्रभाव में थीं तथा प्रदेश अराजकता, दंगों और कर्फ्यू के माहौल से जूझ रहा था।

 

आज यूपी दंगा, कर्फ्यू और माफियाराज से मुक्त होकर विकास की नई पहचान बन चुका

 

मुख्यमंत्री ने कहा आज उत्तर प्रदेश दंगा, कर्फ्यू और माफियाराज से मुक्त होकर विकास और सुशासन में नई पहचान बना चुका है। प्रदेश में कानून-व्यवस्था बेहतर हुई है और विकास की गति तेज हुई है। आगरा में सैकड़ों करोड़ रुपये की विकास परियोजनाएं इसी विकास यात्रा का हिस्सा हैं। उन्होंने याद दिलाया कि इससे पहले भी आगरा को 6,500 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की सौगात दी जा चुकी है। उन्होंने कहा कि डबल इंजन की सरकार बुलेट ट्रेन की गति से विकास कार्यों को आगे बढ़ा रही है और आगरा को स्मार्ट, सेफ एंड फ्यूचर रेडी सिटी के रूप में विकसित करने का लक्ष्य लेकर काम किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों के उत्साह की सराहना करते हुए आगरा ग्रामीण, आगरा उत्तरी और आगरा दक्षिण के नागरिकों का आभार व्यक्त किया।

 

 

मुख्यमंत्री ने विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों को चेक, टैबलेट व चाबी वितरित किए

 

-राघव शर्मा, डॉली त्यागी और चेतना राणा (स्वामी विवेकानंद युवा सशक्तीकरण योजना के तहत टैबलेट)

 

-सुनीता (चमड़ा उत्पाद के लिए टूल किट)

 

-सचिन कुमार, राम प्रकाश पचौरी (कृषि यंत्रीकरण योजना के तहत चाबी)

 

-उपासना (प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत चाबी)

 

-योगेश कुमार, मलखान सिंह (आयुष्मान भारत योजना के तहत आयुष्मान कार्ड)

 

-अमित गर्ग (66 लाख रुपए का चेक)

 

-शोभित बंसल, राजकुमार भगत, चित्रा चौहान (10 लाख रुपए का चेक)

 

-पुष्पा, नंद किशोर जैन (50 हजार रुपए का चेक)

 

ये रहे मौजूद 

इस अवसर पर  मंत्री भूपेंद्र चौधरी, प्रदेश की मंत्री बेबी रानी मौर्य,  मंत्री योगेंद्र उपाध्याय, मंत्री धर्मवीर प्रजापति, भारतीय जनता पार्टी के क्षेत्रीय अध्यक्ष पूरनलाल लोधी, महापौर हेमलता दिवाकर, जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. मंजू भदौरिया, सांसद नवीन जैन, सांसद राजकुमार चाहर, विधायक पुरुषोत्तम खंडेलवाल, धर्मपाल सिंह, डॉ. जी.एस. धर्मेश, चौधरी बाबूलाल, भगवान सिंह कुशवाहा, छोटेलाल वर्मा, रानी पक्षालिका सिंह, विधान परिषद सदस्य विजय शिवहरे, विधान परिषद सदस्य मानवेंद्र प्रताप सिंह, भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष प्रशांत पौनिया, महानगर अध्यक्ष राजकुमार गुप्ता समेत अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।

जालौन के पिछड़ेपन के जिम्मेदार अब घड़ियाली आंसू बहाकर युवाओं को गुमराह कर रहे

CM Yogi Adityanath Jalaun

CM Yogi Adityanath Jalaun: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जालौन में विकास परियोजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास कार्यक्रम के दौरान विपक्ष पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने बुंदेलखंड के पिछड़ेपन, सूखे और पलायन के लिए पिछली सरकारों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि लोगों को यह याद रखना चाहिए कि आखिर वे कौन लोग थे, जिन्होंने जालौन और बुंदेलखंड के पिछड़ेपन का आधार तैयार किया। जिन लोगों के काले कारनामों के कारण जालौन दस्यु प्रभावित क्षेत्र घोषित हो गया था, उन्हें भी याद करने की जरूरत है। सीएम योगी ने कहा कि बुंदेलखंड को अभाव और सूखे के कारण पलायन के लिए मजबूर करने वाले भी वे ही लोग थे। आज वही लोग घड़ियाली आंसू बहाकर नौजवानों को गुमराह करने का काम कर रहे हैं। 

 

उन्होंने सवाल किया कि यमुना, बेतवा और पहूज जैसी पावन नदियों की त्रिवेणी वाले क्षेत्र को आखिर क्यों पिछड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और हर योजना में यह क्षेत्र पीछे क्यों दिखाई देता था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ में शनिवार को जालौन के उरई, माधौगढ़ व कालपी विधानसभा क्षेत्रों में 1275 करोड़ रुपए की 375 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। उरई के स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम में सीएम ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया और विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों को किट/चेक/स्वीकृति पत्र भी वितरित किए। 

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज जालौन और पूरा बुंदेलखंड अपनी पुरानी पहचान से बाहर निकलकर विकास के नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है। आज बुंदेलखंड में 56 हजार एकड़ से बड़े क्षेत्रफल में भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र बीडा के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसकी कनेक्टिविटी का आधार जालौन बन रहा है। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे और फोरलेन कनेक्टिविटी ने जालौन की तस्वीर बदलने का काम किया है। अब यह क्षेत्र बीहड़ और दस्यु प्रभावित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि विकास और नई संभावनाओं के क्षेत्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा है।

कालपी का कागज बना ग्लोबल ब्रांड

सीएम योगी ने कहाकि जालौन के कालपी में तैयार होने वाला हस्तशिल्प कागज अब स्थानीय पहचान से निकलकर वैश्विक ब्रांड बन रहा है। कालपी के इस पारंपरिक कागज को जीआई टैग मिलने के बाद इसकी पहचान और बाजार दोनों का विस्तार हुआ है। आज कालपी का कागज देश की सीमाओं को पार कर ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका, जर्मनी और जापान जैसे देशों तक पहुंच रहा है। कालपी के कागज की खासियत इसकी पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया और स्थानीय हस्तशिल्प से जुड़ी पहचान है। जीआई टैग मिलने से इस उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान मिली है और इससे स्थानीय कारीगरों एवं उद्यमियों के लिए नए बाजार खुलने की उम्मीद बढ़ी है।

कोंच की रामलीला ने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया

सीएम योगी ने कहा कि इतिहास हमें इस बात का आगाह करता है। महर्षि वेदव्यास ने यहां जन्म लिया इस पावन धारा में और कहते हैं भगवान कृष्ण के पौत्र सांब ने प्राचीन सूर्य मंदिर का निर्माण भी यहीं पर करवाया था। याद करिए कोंच की रामलीला ने लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। यानी रामलीला का इतिहास कैसे होना चाहिए। ऐसी उरई, माधवगढ़ और कालपी विधानसभा क्षेत्र से जुड़ी धरा पर आज 1275 करोड़ रुपए की परियोजनाओं के लोकार्पण/शिलान्यास के लिए मुझे आने का अवसर प्राप्त हुआ।

 

सीएम योगी ने आदिशक्ति मां भगवती जालौन माता और बैरागढ़ की शारदा माता के श्रीचरणों में नमन करते हुए महर्षि वेदव्यास की पावन जन्मभूमि और इसी जालौन की तपोभूमि को कोटि-कोटि नमन किया। जालौन और कालपी अपने गौरवशाली इतिहास के लिए जाना जाता है। रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और नाना साहेब पेशवा की समर भूमि के रूप में जो धरती जानी जाती हो, कालपी का हैंडमेड कागज और यहां की विश्व विख्यात मटर इस जनपद को एक नई पहचान दिलाते हैं।

अपराधी के लिए जेल या जहन्नुम के अलावा कोई जगह नहीं

मुख्यमंत्री ने सपा और कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज उत्तर प्रदेश का नौजवान देश-दुनिया में सीना चौड़ा कर चल रहा है और उसके सामने पहचान का संकट नहीं है। योगी ने कहा कि सपा शासन में बुंदेलखंड के संसाधनों का माफिया ने जमकर दोहन किया और विकास के नाम पर वसूली होती थी। बुंदेलखंड के विकास के लिए आने वाला पैसा सैफई में फिल्मी कार्यक्रमों पर खर्च किया जाता था। आज यही धन फोरलेन कनेक्टिविटी, युवाओं के रोजगार और किसानों के हित में खर्च हो रहा है।

 

गरीबों को राशन, पेंशन, आयुष्मान भारत और रसोई गैस जैसी योजनाओं का लाभ मिल रहा है कानून-व्यवस्था का जिक्र करते हुए सीएम ने कहा कि अब बेटियां सुरक्षित माहौल में स्कूल जा रहीं हैं। किसी बेटी से छेड़छाड़ या व्यापारी का उत्पीड़न करने वाले अपराधी के लिए जेल या जहन्नुम के अलावा कोई जगह नहीं है। आज व्यापारी निर्भय होकर कारोबार और बेटियां स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

जालौन में सड़क-पेयजल परियोजनाओं को रफ्तार

सीएम योगी ने कहा कि जालौन जिले में सड़क, पेयजल और कनेक्टिविटी से जुड़ी कई परियोजनाओं को तेजी से पूरा किया जा रहा है। गोहन-माधौगढ़ से मध्य प्रदेश सीमा तक जिला मार्ग के चौड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण का कार्य पूरा हो चुका है। वहीं बंगरा-जगम्मनपुर मार्ग पर रामपुरा, निनावली, नारोल, राठौर और अनपुरा होते हुए मध्य प्रदेश सीमा तक टू-लेन सड़क का निर्माण भी पूरा होने की जानकारी दी गई। 

 

एट-बंगरा-बीकेपुर तथा कालपी-मदारीपुर संपर्क मार्ग भी तैयार हो चुके हैं। हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने के लिए करीब 100 करोड़ रुपये की नगरपालिका परिषद उरई, कोटा-मस्तकिल ग्राम पेयजल परियोजना और सलाघाट वाटर सप्लाई ग्रामीण पेयजल योजना पर काम जारी है। सीएम योगी ने कानून-व्यवस्था नीति का जिक्र करते हुए कहा कि संगठित अपराध में शामिल माफिया की 600 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियां जब्त की गई हैं। नकल माफिया के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जा रही। परीक्षा में गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। 

जालौन में आएंगे रोजगार के नए अवसर

मुख्यमंत्री ने कहा कि झांसी और चित्रकूट में बन रहे डिफेंस कॉरिडोर का लाभ जालौन को भी मिलेगा। जालौन से होकर कनेक्टिविटी विकसित होने के साथ यहां 56 हजार एकड़ में फ्यूचर रेडी इंडस्ट्रियल टाउनशिप बनाने की योजना है, जिससे लाखों युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। उन्होंने जालौन में डेटा सेंटर क्लस्टर विकसित करने की बात भी कही। मुख्यमंत्री ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समेत आधुनिक तकनीक के विकास के लिए डेटा सेंटर महत्वपूर्ण आधारभूत ढांचा है। चित्रकूट लिंक एक्सप्रेसवे का काम तेजी से चल रहा है। बुंदेलखंड के सभी सात जिलों को यूपी एग्रीज योजना में शामिल किया गया है। महिला शक्ति का उल्लेख करते हुए उन्होंने बैलैनी मिल्क प्रोड्यूसर के माध्यम से महिलाओं की क्षमता की सराहना की।

CM Yogi Adityanath Jalaun

सीएम योगी ने लाभार्थियों को प्रमाणपत्र, चेक वितरित किया 

  • गीता, रेनू, शकीला खातून और ममता (उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 13,14,30000 का चेक)
  • उमेदा (मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत पत्र)
  • आस्था ( कन्या सुमंगला योजना के तहत चेक)
  • शैलेंद्र सिंह सेंगर (कृषि यंत्र)
  • शिवा त्रिपाठी (प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत सोलार रूफ टॉप यंत्र, पत्र) 
  • विनय राजपूत (प्रधानमंत्री स्वनिध योजना के तहत पत्र)
  • रानी देवी (प्रधानमंत्री शहरीय आवास योजना के तहत पत्र)
  • समर सिंह (कुक्कुट योजना के तहत ब्याज मुक्त ऋण पत्र)
  • कुशाग्र गुप्ता (एआईएफ के तहत 4 करोड़ रुपए का चेक)
  • अंबदा रहमान (आयुष्मान भारत के तहत गोल्डन कार्ड)।

ये रहे मौजूद 

इस अवसर पर मंत्री संजय सिंह गंगवार, विधायक विनोद कुमार चतुर्वेदी, विधायक गौरी शंकर वर्मा, विधायक मूलचंद निरंजन, विधान परिषद सदस्य रमा निरंजन, विधान परिषद सदस्य बाबू लाल तिवारी, क्षेत्रीय अध्यक्ष राम किशोर साहू, जिलाध्यक्ष उर्विजा दीक्षित, जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ घनश्याम अनुरागी, गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता, पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य बाबा बालक दास, कोऑपरेटिव बैंक के सभापति बृजभूषण सिंह मुन्नू, अपना दल के अध्यक्ष अनिल कोदारी, राष्ट्रीय लोक दल के जिलाध्यक्ष रविंद्र श्रीवास्तव, नगर पालिका परिषद उरई की अध्यक्ष गिरिजा चौधरी, नगर पालिका परिषद कोंच के अध्यक्ष प्रदीप कुमार गुप्ता, नगर पालिका परिषद जालौन के अध्यक्ष नेहा पुनीत आदि मौजूद रहे।

 

H1B Visa Fee: अमेरिका जाने वाले भारतीयों को बड़ी राहत! H-1B वीजा पर ट्रंप के ₹95 लाख की फीस पर कोर्ट ने दिया बड़ा झटका

US Court Blocks Trump H-1B Visa Fee: अमेरिका में रहने के लिए जारी होने वाले H-1B वीजा पर एक बड़ी राहत वाली खबर आई है। एक संघीय अपील अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को बड़ा कानूनी झटका दिया है। अदालत ने नए H-1B वीजा पर करीब 95 लाख रुपये की भारी-भरकम फीस लगाने वाले आदेश पर रोक हटाने से साफ इनकार कर दिया है।

बोस्टन स्थित ‘फर्स्ट सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स’ की तीन जजों की पीठ ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें इस फीस को गैर-कानूनी करार दिया गया था। अदालत के इस फैसले से अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिकी टेक कंपनियों को बड़ी राहत मिली है।

अदालत ने क्यों लगाई $100,000 की वीजा फीस पर रोक?

यूएस डिस्ट्रिक्ट जज लियो टी. सोरोकिन ने 8 जून 2026 के अपने आदेश में कहा था कि ट्रंप प्रशासन द्वारा इतनी बड़ी फीस वसूलना एक तरह का ‘अवैध टैक्स’ है, क्योंकि अमेरिकी कांग्रेस ने राष्ट्रपति या कार्यपालिका को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं दिया है।

20 डेमोक्रेटिक शासित राज्यों के अटॉर्नी जनरल द्वारा दायर इस याचिका में तर्क दिया गया कि राष्ट्रपति ने संसद से कानून पास कराने के बजाय सिर्फ एक राष्ट्रपति घोषणापत्र के जरिए इस फीस को लागू कर अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया है।

अपील अदालत ने 1989 के अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अगर सरकार नागरिकों या कंपनियों पर कोई बड़ा वित्तीय बोझ (टैक्स या फीस) डालती है, तो उसके लिए संसद की स्पष्ट मंजूरी अनिवार्य है। ट्रंप प्रशासन यह साबित करने में विफल रहा कि उनके पास इसकी कानूनी मंजूरी थी।

क्या था ट्रंप प्रशासन का तर्क और फैसला?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सितंबर 2025 में एक प्रेसिडेंशियल प्रोक्लेमेशन के जरिए $100,000 की H-1B वीजा फीस लगाने का ऐलान किया था। प्रशासन का कहना था कि अमेरिकी कंपनियां कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को लाने के लिए H-1B वीजा कार्यक्रम का गलत इस्तेमाल करती हैं, जिससे अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छिन जाती हैं। सरकार के मुताबिक, इस भारी फीस का मकसद कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करने से हतोत्साहित करना था।

भारतीय IT प्रोफेशनल्स और टेक कंपनियों के लिए राहत क्यों?

H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को आईटी, इंजीनियरिंग और विज्ञान जैसे विशेष क्षेत्रों में विदेशी कुशल पेशेवरों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। अमेरिका हर साल कुल 85,000 H-1B वीजा करीब 65,000 रेगुलर कोटा और 20,000 अमेरिका से मास्टर डिग्री हासिल करने वालों के लिए जारी करता है। इस कोटे का बड़ा हिस्सा भारत और चीन के पेशेवरों को मिलता है।

इस नए नियम से पहले, अमेरिकी कंपनियों को एक H-1B कर्मचारी को स्पॉन्सर करने के लिए औसतन $2,000 से $5,000 (लगभग 1.6 लाख से 4.1 लाख रुपये) ही देने पड़ते थे। $100,000 की फीस लागू होने से कंपनियों के लिए विदेशी प्रतिभाओं को बुलाना बेहद खर्चीला हो जाता।

आगे क्या होगा?

अपील अदालत का यह स्टे खारिज होने का मतलब है कि जब तक इस पूरे मामले की अंतिम सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक ट्रंप प्रशासन $100,000 की इस बढ़ी हुई फीस को लागू नहीं कर सकता है। यानी फिलहाल पुरानी फीस प्रक्रिया के तहत ही H-1B वीजा आवेदन स्वीकार किए जाएंगे।

पेपर लीक हुआ फिर पीछे पड़ गए कॉकरोच और अब देना पड़ा इस्तीफा! जानिए कौन हैं धर्मेंद्र प्रधान

Who Is Dharmendra Pradhan: देश भर में नीट पेपर लीक विवाद और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में चल रहे छात्र आंदोलनों के भारी दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आज, शनिवार 25 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। कभी खुद छात्र राजनीति के दौरान पेपर लीक और सरकारी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले धर्मेंद्र प्रधान के लिए यह एक अजीब ऐतिहासिक मोड़ रहा। जिस राजनीति से वे उभरे थे, अंततः उसी तरह के एक बड़े छात्र आंदोलन ने उन्हें पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

आइए आपको बताते हैं छात्र आंदोलन से से लेकर मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री तक के धर्मेंद्र प्रधान के सफर की पूरी कहानी।

कौन हैं धर्मेंद्र प्रधान?

26 जून 1969 को ओडिशा के तालचेर में जन्मे धर्मेंद्र प्रधान पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता देबेंद्र प्रधान के पुत्र हैं। राजनीति उन्हें विरासत में जरूर मिली, लेकिन उनकी पहचान छात्र राजनीति से बनी। उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के साथ छात्र राजनीति की शुरुआत की और बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने।

1997 का पेपर लीक आंदोलन

साल 1997 में ओडिशा की तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान प्रश्नपत्र लीक विवाद हुआ था। तब ABVP के राष्ट्रीय सचिव रहे धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में करीब 1,500 छात्रों ने भुवनेश्वर में मुख्यमंत्री आवास के पास सचिवालय का घेराव किया था। इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने सख्त बल प्रयोग किया था, जिसमें धर्मेंद्र प्रधान को गंभीर चोटें आई थीं और उनके शरीर में कई जगह फ्रैक्चर भी हुए थे। इस घटना ने उन्हें ओडिशा में छात्र राजनीति का एक बड़ा चेहरा बना दिया।

विधायक से सांसद: चुनावी राजनीति का सफर

धर्मेंद्र प्रधान ने साल 2000 में ओडिशा की पल्लहड़ा सीट से विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी चुनावी राजनीति की शुरुआत की थी। इसके बाद वे 2004 में ओडिशा की देवगढ़ सीट से पहली बार लोकसभा पहुंचे। उन्होंने बिहार और मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। 2024 के आम चुनाव में वे ओडिशा की संबलपुर लोकसभा सीट से भारी मतों से जीतकर फिर से संसद पहुंचे।

मोदी सरकार में बढ़ा कद, संभाले कई बड़े मंत्रालय

2014 में जब नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई, तब से ही धर्मेंद्र प्रधान सरकार के सबसे भरोसेमंद और प्रमुख चेहरों में से एक रहे हैं।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय: 2014 में स्वतंत्र प्रभार मंत्री के रूप में उन्होंने इस महत्वपूर्ण आर्थिक मंत्रालय की कमान संभाली, जिसमें उन्होंने ‘उज्जवला योजना’ जैसे कई बड़े सुधार लागू किए।

कौशल विकास और इस्पात मंत्रालय: 2017 में उन्हें कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय का प्रभार मिला और 2019 में कैबिनेट मंत्री के रूप में उन्होंने इस्पात मंत्रालय भी संभाला।

जुलाई 2021 में शिक्षा मंत्री की कमान और NEP का क्रियान्वयन

जुलाई 2021 में रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के हटने के बाद धर्मेंद्र प्रधान को देश का केंद्रीय शिक्षा मंत्री बनाया गया। उनके कार्यकाल का सबसे बड़ा काम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) को जमीनी स्तर पर लागू करना रहा। शिक्षा मंत्री रहते हुए वे नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की साख और परीक्षाओं के प्रबंधन को लेकर लगातार चुनौतियों से घिरे रहे।

नीट-यूजी 2026 परीक्षा में पेपर लीक और धांधली के गंभीर आरोपों के बाद विपक्षी दलों और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) सहित कई छात्र युवा संगठनों ने उनके इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले कई दिनों से मोर्चा खोला हुआ था, जिसके बाद आज उन्होंने पीएम मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया है।

NEET Controversy: छात्रों की आड़ में अराजकता फैलाने की साजिश

-प्रो. संजय सिन्हा
neet exam controversy: पिछले कुछ दिनों में नीट परीक्षा को लेकर देश और प्रदेश में जो कुछ देखने को मिला, वह कई तरह के सवाल खड़े करता है। पहला तो यही कि क्या छात्रों की पढ़ाई-लिखाई या परीक्षा से जुड़ा मुद्दा राजनीतिक स्वार्थ और सत्ता संघर्ष का माध्यम बन गया है और इसी से जुड़ा सवाल यह भी है कि आखिर राजनीतिक दल क्यों इस आंदोलन को अराजकता की दिशा में ले जाना चाहते हैं? क्या यह वाकई अब छात्रों की लड़ाई रह गई है या फिर इसके बहाने मुद्दाविहीन विपक्ष द्वारा राजनीतिक जमीन तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है? यह सवाल उद्वेलित करने वाले हैं। कोई संशय नहीं कि नीट पेपर का लीक होना एक आपराधिक घटना है, चिंता का विषय है लेकिन जब कोई संवेदनशील मुद्दा राजनीतिक मंच में बदल जाता है तो कहानी नया रंग ले लेती है।

 

दिल्ली की सड़कों और उत्तर प्रदेश में राजनीतिक प्रदर्शन इस बात की पुष्टि करते हैं कि छात्रों की शिकायत को चेहरा बनाकर कुछ पार्टियां खासतौर पर सपा व कांग्रेस अपना खोया जनाधार हासिल करना चाहती हैं। विपक्षी दलों के बीच इस आंदोलन का नेतृत्व करने की होड़ मची है और इसका प्रमाण यह है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में एक धरना आयोजित हुआ, तो उसके बाद प्रदेश कांग्रेस ने एक समानांतर प्रदर्शन खड़ा कर दिया। छात्रों के एक प्रतिनिधि आंदोलन पर राजनीतिक दल यह साबित करने की कोशिश में जुट गए कि उस पर उनका नेतृत्व है। इस बात की चिंता भी नहीं कि उनकी यह कोशिश उनकी प्राथमिकता को उजागर कर देगी कि उनके लिए महत्वपूर्ण क्या है, छात्रों का हित या राजनीतिक मंच। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह द्वारा कांग्रेस के धरने पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया जाना इस बात का प्रमाण है कि विपक्षी खेमे में भी इस मुद्दे को लेकर आंतरिक कलह व खींचतान शुरू हो चुकी है।

प्रदर्शनरत छात्रों के लिए भी चिंतन का विषय

इस प्रकरण के एक और पहलू को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। प्रदर्शन के दौरान सामने आए कुछ वीडियो में कई छात्र व अभिभावक यह बयान देते नजर आए कि वे नीट पेपर लीक के विरोध में छात्रों के प्रदर्शन में आए थे, लेकिन धरनास्थल पर उपस्थित राजनेताओं ने बातचीत का रुख अन्य दिशाओं में मोड़ दिया। जब किसी छात्र आंदोलन के भीतर से ऐसी आवाज़ें उठने लगें कि मूल मुद्दे से हटकर बातें हो रही हैं, तो यह प्रदर्शनरत छात्रों के लिए भी चिंतन का विषय बनना चाहिए। एक आंदोलन जो शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षा की पवित्रता बचाने के लिए शुरू हुआ था, अगर वह अलग-अलग राजनीतिक नारों और असंबद्ध विवादों में उलझने लगे, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं छात्रों को होगा, जिनके नाम पर यह सब खड़ा किया गया।

 

संसद परिसर के आसपास सुरक्षा को लेकर उपजी चिंता भी एक गंभीर विषय है। किसी भी लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार बुनियादी है, लेकिन जब भीड़ किसी संवैधानिक संस्थान की सुरक्षा-सीमा के करीब पहुंचने की स्थिति पैदा करे, तो यह प्रशासन और आयोजकों दोनों के लिए एक गंभीर उत्तरदायित्व का प्रश्न बन जाता है। ऐसी स्थितियों में जिम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व से यह अपेक्षा की जाती है कि वह भीड़ को संयमित रखे, न कि उसे और उकसाए। लेकिन सपा व कांग्रेस नेता अराजकता को बढ़ावा देते दिखाई दिए। यदि आंदोलन को समर्थन देने वाले दलों ने सुरक्षा जोखिम की आशंका के बावजूद मार्च को प्रोत्साहित करना जारी रखा, तो यह सवाल वाजिब है कि क्या उनके लिए राजनीतिक लाभ, बच्चों की सुरक्षा से ऊपर है।

 यह कोई नई घटना नहीं

अब बात करते हैं मूल मुद्दे की। पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ी निस्संदेह एक वास्तविक और गंभीर समस्या है। लेकिन, यह कोई नई घटना नहीं है। बीते वर्षों में विभिन्न राज्यों में, चाहे किसी भी दल का शासन रहा हो, प्रश्नपत्रों के लीक होने की घटनाएं सामने आती रही हैं। अचरज की बात यह है कि जिन राजनीतिक दलों के शासनकाल में बार-बार भर्ती परीक्षाएं विवादों में रहीं, वही आज स्वयं को नैतिकता का सबसे बड़ा प्रहरी सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के दौरान पुलिस भर्ती, शिक्षक भर्ती, अधीनस्थ सेवा आयोग और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर अनेक विवाद सामने आए। चयन आयोगों में जाति विशेष के लोगों को प्रमुख बनाने पर सवाल खड़े हुए। भाई-भतीजावाद व रिश्वतखोरी के मामले भी सामने आए। सपा आज तक इन आरोपों पर बगलें झांकने लगती है।

 

इसी तरह बिहार में शिक्षक नियुक्तियों और अन्य परीक्षाओं को लेकर प्रश्न उठे। राजस्थान में कांग्रेस सरकार के दौरान भी ऐसा ही हुआ। पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती घोटाले ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। ऐसे उदाहरणों के बाद जनता छात्र आंदोलन में घुसे विपक्षी दलों से यह पूछने का अधिकार रखती है कि जब वे सत्ता में थे तब ऐसी घटनाओं को रोकने में क्यों विफल रहे। यदि पेपर लीक एक व्यवस्थागत समस्या है, जो अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग सरकारों के दौर में सामने आती रही है, तो इसका समाधान भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर खोजा जाना चाहिए।

 

यूपी में जहां 2017 से पहले की सरकारों ने प्रतियोगी परीक्षाओं को संगठित माफिया के हवाले कर दिया था और नियुक्तियों को भाई-भतीजावाद तक सीमित कर रखा था, योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक के जरिये इन अनियमितताओं को दूर करने का प्रयास किया, जिसके तहत कड़े कानूनी प्रावधान किए गए। इनमें एक करोड़ रुपये तक जुर्माना व उम्रकैद तक शामिल है। छात्रों का भविष्य सुरक्षित रखना, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बहाल करना, और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लाना। यह किसी एक दल की नहीं, बल्कि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की साझा जिम्मेदारी है। जब कोई सरकार पेपर लीक के मामलों में जांच एजेंसियों को सक्रिय करती है, दोषियों पर कार्रवाई करती है, और नई परीक्षा प्रणाली में सुधार के प्रस्ताव लाती है, तो इसे स्वीकार करने के बजाय केवल विरोध के लिए विरोध करना, समस्या के समाधान में बाधा ही उत्पन्न करता है। जनता यह अपेक्षा करती है कि जब कोई गंभीर मुद्दा सामने आए, तो सभी राजनीतिक दल मिलकर समाधान की दिशा में काम करें, न कि उसे चुनावी लाभ की दृष्टि से देखें।

 

पेपर लीक प्रकरण देश की शिक्षा व्यवस्था और लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। इसे राजनीतिक क्रेडिट की लड़ाई में बदलना छात्रों के साथ अन्याय होगा। ज़रूरत इस बात की है कि परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, अधिक सुरक्षित और अधिक जवाबदेह बनाया जाए सभी राजनीतिक दलों की साझा प्रतिबद्धता के माध्यम से। जब तक यह मूल उद्देश्य राजनीतिक बयानबाज़ी के शोर में दब कर रह जाएगा, तब तक न तो छात्रों को न्याय मिलेगा और न ही व्यवस्था में कोई स्थायी सुधार संभव हो पाएगा। सपा और कांग्रेस को आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वे वास्तव में छात्रों के भविष्य की चिंता में खड़े हैं, या केवल एक अवसर की तलाश में सड़कों पर उतरे हैं। (लेखक श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय, पलवल में डीन, स्किल फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज एंड रिसर्च हैं)

 

साइन होते ही अटक गई अमेरिका-सऊदी की न्यूक्लियर डील:ट्रम्प ने 24 घंटे में नई शर्त जोड़ी, बोले- इजराइल से रिश्ते सामान्य करे सऊदी

अमेरिका और सऊदी अरब के बीच करीब दो दशक से अटके परमाणु समझौते पर बुधवार को हस्ताक्षर हुए, लेकिन 24 घंटे के भीतर ही यह डील अटक गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने समझौते में नई शर्त जोड़ दी है। उन्होंने कहा कि डील तभी आगे बढ़ेगी, जब सऊदी अरब अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होकर इजराइल से राजनयिक रिश्ते सामान्य करेगा। ट्रम्प ने यह भी कहा कि सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) की अनुमति नहीं मिलेगी। बिना बताए डील की घोषणा से ट्रम्प नाराज वॉशिंगटन में हुए हस्ताक्षर समारोह में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट शामिल हुए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प इस बात से नाराज थे कि राइट ने उनकी मंजूरी के बिना समझौते की घोषणा कर दी। इसके बाद फॉक्स न्यूज और वॉल स्ट्रीट जर्नल में हुई आलोचना से उनकी नाराजगी और बढ़ गई। रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस ने ऊर्जा विभाग से समझौते की घोषणा टालने को कहा था, लेकिन विभाग ने हस्ताक्षर समारोह भी किया और मीडिया में इसकी जानकारी भी दी। हालांकि व्हाइट हाउस का कहना है कि अब्राहम अकॉर्ड्स की शर्त शुरू से ही ट्रम्प की नीति का हिस्सा थी। वहीं ऊर्जा विभाग ने किसी भी मतभेद से इनकार किया। ट्रम्प की नई शर्त ने सऊदी को भी चौंकाया CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प की घोषणा से सऊदी अरब भी हैरान रह गया। समझौते के मसौदे में कुछ शर्तें पूरी होने पर सऊदी अरब को अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिलने की बात थी, लेकिन ट्रम्प ने इसे सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया। दोनों देशों ने करीब दो दशक पहले परमाणु ऊर्जा सहयोग की पहल की थी। पिछले साल अक्टूबर में प्रारंभिक सहमति बनी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध और कांग्रेस की संभावित आपत्तियों के कारण समझौता महीनों तक अटका रहा। पिछले सप्ताह ऊर्जा विभाग को लगा कि ट्रम्प की मंजूरी मिल गई है, जिसके बाद इसकी घोषणा कर दी गई। परमाणु एक्सपर्ट्स ने यूरेनियम संवर्धन की अनुमति और IAEA के अतिरिक्त सुरक्षा प्रोटोकॉल की गैरमौजूदगी पर चिंता जताई। वहीं समर्थकों का तर्क था कि अगर अमेरिका पीछे हटता है तो चीन या रूस सऊदी अरब में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर सकते हैं। आखिर अब्राहम अकॉर्ड्स है क्या, जिसे लेकर डील अटक गई? दरअसल, अब्राहम अकॉर्ड्स 2020 में अमेरिका की पहल पर हुआ ऐसा समझौता है, जिसके तहत कुछ अरब देशों ने पहली बार इजराइल के साथ अपने रिश्ते सामान्य किए। यूएई, बहरीन, मोरक्को और सूडान इसके तहत इजराइल से जुड़ चुके हैं। अब अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब भी इसी समझौते का हिस्सा बने। ट्रम्प का मानना है कि अगर सऊदी इजराइल से रिश्ते सामान्य करता है, तो पश्चिम एशिया में अमेरिका का रणनीतिक गठजोड़ और मजबूत होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि बाइडेन प्रशासन भी सऊदी परमाणु समझौते को इजराइल से रिश्ते सामान्य करने से जोड़कर आगे बढ़ा रहा था। हालांकि 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और गाजा युद्ध के बाद यह प्रक्रिया रुक गई। सऊदी का कहना है कि फिलिस्तीन के लिए अलग राज्य का रास्ता साफ हुए बिना वह इजराइल से आधिकारिक रिश्ते नहीं बनाएगा। यही वजह है कि अब न्यूक्लियर डील भी इस शर्त पर अटक गई है। ट्रम्प ने यूरेनियम एनरिचमेंट पर इनकार क्यों किया परमाणु बिजलीघर चलाने के लिए यूरेनियम को एक खास स्तर तक एनरिच (संवर्धित) किया जाता है। लेकिन यही तकनीक अगर बहुत अधिक स्तर तक पहुंच जाए, तो उसी यूरेनियम का इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में भी किया जा सकता है। इसलिए यूरेनियम एनरिचमेंट को दुनिया की सबसे संवेदनशील परमाणु तकनीकों में माना जाता है। यही वजह है कि अमेरिका आमतौर पर किसी भी देश को अपनी जमीन पर यूरेनियम एनरिचमेंट की अनुमति देने से बचता है। उसे आशंका रहती है कि भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल सैन्य कार्यक्रम के लिए भी हो सकता है। सऊदी अरब को लेकर भी यही चिंता है, इसलिए ट्रम्प ने साफ कर दिया कि न्यूक्लियर डील होगी, लेकिन यूरेनियम एनरिचमेंट की इजाजत नहीं मिलेगी। ——————— अमेरिका-सऊदी परमाणु समझौते से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ईरान जंग के बीच अमेरिका का सऊदी से परमाणु समझौता:इजराइल के विरोध के बावजूद ट्रम्प की मंजूरी; एक्सपर्ट बोले- परमाणु हथियारों का खतरा बढ़ेगा सऊदी अरब ने बुधवार को अमेरिका के साथ एक अहम परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके तहत अमेरिका, सऊदी अरब को असैन्य (बिजली बनाने के लिए) परमाणु तकनीक देगा। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब पूरे मिडिल ईस्ट में युद्ध और तनाव का माहौल है। पूरी खबर यहां पढ़ें…