UP Board Exam 2027: नए पैटर्न का होगा यूपी बोर्ड 12वीं के छात्र का प्रश्न पत्र, 80 नंबर की लिखित परीक्षा में हर यूनिट से आएंगे सवाल

UP Board Exam 2027: उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (UPMSP) ने शैक्षिक सत्र 2026-27 में इंटरमीडिएट यानी 11वीं और 12वीं कक्षा के परीक्षा पैटर्न में बदलाव की घोषणा की है। यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF)-2023 और राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र (PARAKH) की सिफारिशों के आधार पर नए सत्र से कक्षा 11 में लागू किया जाएगा। इसके तहत यूपी बोर्ड की इंटरमीडिएट कक्षा की लिखित परीक्षा 80 नंबरों की होगी, जबकि 20 नंबर आंतरिक मूल्यांकन के लिए होंगे।

वर्तमान में यूपी बोर्ड की 12वीं कक्षा में भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, गृह विज्ञान जैसे विषयों में 70-70 नंबर की लिखित और 30-30 नंबर की प्रायोगिक परीक्षा होती है। वहीं हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, अर्थशास्त्र जैसे गैर प्रायोगिक विषयों में 100-100 नंबर की लिखित परीक्षा होती है। लेकिन इन बदलावों के लागू होने के बाद अब गैर प्रायोगिक विषयों में भी 20-20 नंबर का आंतरिक मूल्यांकन और प्रायोगात्मक परीक्षा 30-30 अंकों की बजाय 20-20 नंबर की कराने का निर्णय लिया गया है। अगले शैक्षणिक सत्र से यह बदलाव कक्षा 11 से लागू करने की तैयारी है।

11वीं-12वीं के पेपर में होंगे 35% अनुप्रयोग आधारित प्रश्न

राज्य शिक्षा संस्थान के विशेषज्ञों ने कक्षा 11 व 12 के लिए इतिहास, भूगोल, इकोनॉमिक्स और सिविक्स के सैंपल पेपर तैयार किए हैं। इनमें परख के सुझावों के अनुसार सबसे ज्यादा 35% अंकों के सवाल एप्लिकेशन बेस्ड होंगे। पहले यूपी बोर्ड में ज्ञान (20%), बोध (30%), एप्लिकेशन बेस्ड (30%) और कौशल (20%) के चार बिन्दुओं आधार पर प्रश्नपत्र सेट किया जाता था और मूल्यांकन होता था। मगर अब नए प्रश्नपत्र के जरिए ज्ञान (17.5%), बोध (17.5%), अनुप्रयोग (35%), विश्लेषण (22%), मूल्यांकन (4%) और सृजन (4%) छह मानकों के आधार पर छात्रों को परखा जाएगा।

हर यूनिट आएगा पेपर में सवाल

यूपी बोर्ड इंटरमीडिएट के प्रश्नपत्र नए सिरे से तैयार किए जा रहे हैं। इसमें हर यूनिट से प्रश्न पूछना अनिवार्य किया गया है और हर यूनिट का वेटेज भी निर्धारित किया गया है। छात्रों के लिए हर यूनिट को पढ़ना जरूरी होगा, क्योंकि बाहरी विकल्प के प्रश्न पेपर में नहीं रखे गए हैं। वर्णनात्मक प्रश्नों की संख्या कम की गयी है। प्रत्येक विस्तृत उत्तरीय प्रश्नों में आंतरिक विकल्प में रूप में प्रश्न दिए गए हैं जो उसी यूनिट, उसी उद्देश्य और उसी कठिनाई स्तर के होंगे। पेपर में दिए गए सवालों से छात्रों में मूल्यांकन करने की क्षमता, विश्लेषण एक सृजनात्मक शक्ति के विकास को बढ़ावा मिलेगा।

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IGNOU Admission Update: 4 साल की ग्रेजुएशन के बाद अब 1 साल में होगी मास्टर डिग्री, इग्नू ने इन विषयों में लॉन्च किए कोर्स

IGNOU Admission Update: इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी यानी IGNOU ने छात्रों के लिए खास सुविधा को शुरू कर दिया है। यूनिवर्सिटी 1 साल में पूरी होने वाली मास्टर डिग्री के लिए 9 नए कोर्सेज लॉन्च कर रही हैं। यह पहल नेशनल एजुकेशन पॉलिसी यानी NEP 2020 के की जा रही है, जिसका मकसद छात्रों को पढ़ाई में ज्यादा सहजता देना है।

लेकिन यह सुविधा हर किसी के लिए नहीं उपलब्ध होगी। यह सिर्फ उन छात्रों के लिए है, जिन्होंने 4 साल का अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम यानी FYUP कम्पलीट कर लिया है। जिन छात्रों ने सामान्य तरीके से सिर्फ 3 साल की ग्रेजुएशन डिग्री पूरी की है, वे इस 1 साल वाले कोर्स के लिए मान्य नहीं माने जाएंगे। उन्हें IGNOU के पुराने वाले 2 साल के मास्टर डिग्री कोर्स में ही दाखिला लेना होगा।

IGNOU ने 9 नए 1 साल के मास्टर डिग्री कोर्स शुरू कर दिए हैं। इनमें MA इकोनॉमिक्स, MA सोशियोलॉजी, MA हिस्ट्री, MCom, MA जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन, MA इंग्लिश, MA हिंदी, MA संस्कृत और MA उर्दू को शामिल किया गया हैं। इन कोर्स में दाखिला लेने के लिए छात्रों को सबसे पहले अपना आधार कार्ड रजिस्ट्रेशन के दौरान उपयोग करना होगा। इन नए कोर्सेज के लिए आवेदन की आखिरी तारीख 31 अगस्त 2026 तक बढ़ा दी गई है। छात्र इस मौके का फायदा जल्द से जल्द आवेदन करके उठा सकते हैं।

आवेदन कैसे करें

इन कोर्स में एडमिशन लेने के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होगा। छात्रों को IGNOU के ऑफिशियल एडमिशन पोर्टल ignouadmission.samarth.edu.in पर क्लिक करना होगा। फिर “New Registration” के ऑप्शन पर क्लिक करके अपनी वैलिड ईमेल आईडी और मोबाइल नंबर डालें।

रजिस्ट्रेशन होने के बाद उसी लॉगिन डिटेल्स से साइन इन करके अपनी पसंद का कोर्स और स्टडी सेंटर का चुनाव करें। इसके बाद जरूरी पर्सनल, एकेडमिक और कम्युनिकेशन डिटेल्स डालें। मांगे गए दस्तावेज तय फॉर्मेट में अपलोड करें। सारी डिटेल्स भरने के बाद आवेदन फीस जमा करके फॉर्म सबमिट कर दें। यह नई सुविधा उन छात्रों के लिए सहज है, जिन्होंने 4 साल की ग्रेजुएशन पूरी कर ली है। अब उन्हें मास्टर डिग्री के लिए 2 साल की जगह सिर्फ 1 साल में ही करनी होगी।

Study Abroad India: सरकार ने संसद में दिया जवाब, अब विदेशी यूनिवर्सिटी करेंगी भारत का रुख और भारत से विदेश पढ़ने जा रहे छात्र घटे

Study Abroad India: हर साल बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विदेश पढ़ने जाते हैं। लेकिन, ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन (BoI) द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि पढ़ाई के मकसद से विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में गिरावट आई है। यह क्रम लगातार दूसरे साल बना रहा है। 2025 में विदेश जाते समय 6,19,264 भारतीयों ने पढ़ाई या शिक्षा को अपनी यात्रा का मकसद बताया। यह 2024 में 7,60,060 और 2023 में 8,94,758 से कम था। यह जानकारी शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में दी।

एक तरफ, विदेश में पढ़ाई करने जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में कमी आई है। वहीं, यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने ऑस्ट्रेलिया, इटली, यूनाइटेड किंगडम (UK) और यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका (USA) के फॉरेन हायर एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन्स (FHEIs) को 16 लेटर ऑफ इंटेंट (LoIs) जारी किए हैं। यूजीसी ने कर्नाटक में छह, महाराष्ट्र में छह, दिल्ली एनसीआर में तीन और तमिलनाडु में एक एफएचईआई को एनओआई जारी किए हैं। महाराष्ट्र के छह एलओआई में से, चार एफएचईआई (यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क, यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल, यूनिवर्सिटी ऑफ एबरडीन और इलिनोइस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) को मुंबई में एकेडमिक ऑपरेशन शुरू करने के लिए लेटर ऑफ अप्रूवल दिया गया है। यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्प्टन और यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स ने पहले ही गुरुग्राम और बेंगलुरु में अपने कैंपस बना लिए हैं।

भारतीय छात्रों की विदेश में पढ़ाई करने की संख्या कम होने के साथ ही कई प्रतिष्ठित भारतीय संस्थानों ने अपने ओवरसीज कैंपस खोले हैं। विदेश में कैंपस खोलने वाले संस्थानों में आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान शामिल हैं। आईआईटी मद्रास, आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद ने क्रमशः 2023 में जांजीबार, 2024 में अबू धाबी और 2025 में दुबई में अपने विदेशी परिसर स्थापित किए हैं। आईआईएम अहमदाबाद ने मध्य-पूर्व, एशिया और अफ्रीका के छात्रों के लिए सितंबर 2025 में दुबई परिसर में एक साल का पूर्णकालिक एमबीए कार्यक्रम और एक सामान्य प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम में 35 छात्र हैं।

इधर, बीओआई द्वारा जारी विदेश पढ़ने जाने वाले छात्रों का पांच साल का डेटा महामारी के बाद तेजी से बढ़ोतरी और फिर लगातार गिरावट दिखाता है। 2021 में, 4,45,580 भारतीयों ने पढ़ाई या शिक्षा को अपना घोषित मकसद बताकर विदेश यात्रा की। 2022 में यह संख्या बढ़कर 7,52,100 हो गई और फिर 2023 में और बढ़कर 8,94,758 हो गई। तब से, यह संख्या 2024 में घटकर 7,60,060 और 2025 में 6,19,264 हो गई है।

कोविड के बाद 2022 में पढ़ाई के लिए विदेश जाने वाले भारतीयों की संख्या में लगभग 69% की बढ़ोतरी हुई। 2023 में यह और 19% बढ़ी। लेकिन 2024 में दिशा बदल गई। पिछले साल की तुलना में यह संख्या लगभग 15% कम हो गई। 2025 में यह गिरावट और बढ़ गई। विदेश पढ़ने जाने वाले छात्रों की संख्या में लगभग 18.5% की कमी आई। 2025 में विदेश जाने वाले स्टूडेंट की संख्या 2023 के मुकाबले लगभग 2.76 लाख कम थी। वहीं, यह 2021 के मुकाबले अभी भी लगभग 1.74 लाख ज़्यादा थी।

पांच साल के इस क्रम को सरकार ने दो फेज में बांटा

पहला रिकवरी और एक्सपेंशन फेज। छात्र मोबिलिटी 2021 में 4.46 लाख से बढ़कर 2022 में 7.52 लाख हो गई और फिर 2023 में 8.9 लाख को पार कर गई। दूसरा चरण 2024 में शुरू हुआ। यह संख्या आठ लाख से नीचे आ गई और फिर 2025 में और गिरकर 6.19 लाख हो गई। सरकार ने इस क्रम को किसी एक वजह से नहीं जोड़ा है। शिक्षा मंत्रालय ने कहा कि विदेश में पढ़ाई करने का फैसला अफोर्डेबिलिटी, फाइनेंस तक पहुंच, विदेशी समाजों के संपर्क में आना और पढ़ाई की किसी खास ब्रांच के लिए एप्टीट्यूड जैसे फैक्टर्स पर निर्भर करता है।

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Pralhad Joshi: धर्मेंद्र प्रधान की जगह प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्री क्यों बनाया गया? माने जाते हैं मोदी सरकार के भरोसेमंद संकटमोचक

Pralhad Joshi: केंद्र सरकार में वरिष्ठ मंत्री प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिलने की चर्चाओं के बीच उनकी प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक अनुभव एक बार फिर सुर्खियों में हैं। मोदी सरकार में उन्हें ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारियां प्रभावी ढंग से संभाली हैं। अब उन्हें शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया गया है। अब उनके सामने देश की परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करने और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लंबित सुधारों को गति देने जैसी बड़ी चुनौतियां होंगी।

प्रह्लाद जोशी वर्तमान में उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इससे पहले वह संसदीय कार्य मंत्री के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। संसद में विभिन्न दलों के बीच समन्वय बनाने, विधेयकों को आगे बढ़ाने और जटिल राजनीतिक परिस्थितियों से निपटने के कारण उन्हें सरकार का अनुभवी रणनीतिकार माना जाता है।

शिक्षा मंत्रालय के सामने होंगी कई बड़ी चुनौतियां

शिक्षा मंत्रालय का दायित्व मिलने के बाद जोशी की सबसे पहली प्राथमिकता राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की विश्वसनीयता को मजबूत करना होगी। परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली में सुधार और कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली को आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना पड़ सकता है।

इसके अलावा परीक्षा में गड़बड़ियों और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने, नए कानूनी प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन और छात्रों के बीच विश्वास बहाल करने की दिशा में भी तेजी से काम करना होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर रहेगा फोकस

संकट प्रबंधन के साथ-साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के विभिन्न प्रावधानों को लागू करना, उच्च शिक्षा में सुधार, कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना और केंद्र व राज्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना भी नई जिम्मेदारी का अहम हिस्सा माना जाएगा। सरकार की कोशिश होगी कि शिक्षा मंत्रालय की नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया और दीर्घकालिक सुधार योजनाओं पर किसी तरह का असर न पड़े और छात्रों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले समय पर लिए जाएं।

नवनियुक्त केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने पदभार संभाल लिया है। धर्मेंद्र प्रधान के शनिवार 25 जुलाई को पद से इस्तीफा देने के बाद जोशी को शिक्षा मंत्री नियुक्त किया गया। जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। वह उपभोक्ता मामलों के मंत्री भी हैं।

‘विनम्रता के साथ जिम्मेदारी स्वीकार करता हूं’

प्रह्लाद जोशी ने शनिवार को कहा कि उन्होंने दायित्व और विनम्रता की भावना के साथ यह जिम्मेदारी स्वीकार की है। शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान के पद से इस्तीफा देने के बाद जोशी को शिक्षा मंत्री नियुक्त किया गया है। जोशी को उपभोक्ता मामलों के मंत्री की अपनी मौजूदा जिम्मेदारी के साथ-साथ शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री ने मुझे एक जिम्मेदारी सौंपी है। मैं इस जिम्मेदारी को कर्तव्य भावना और विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं।”

उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के पिछले 12 वर्षों में कई ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की गई हैं। पिछले चार-पांच वर्षों में धर्मेंद्र प्रधान ने भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू किया है…प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में मैं अपनी पूरी क्षमता के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करूंगा।”

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इससे पहले, देशभर में CJP के नेतृत्व में नीट पेपर लीक मामले में छात्रों के प्रदर्शनों के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। प्रधान ने कहा कि यह उनके लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का मामला नहीं है। पिछले 10 दिनों में सामने आई घटनाओं को देखकर वह परेशान हैं।

पेपर लीक हुआ फिर पीछे पड़ गए कॉकरोच और अब देना पड़ा इस्तीफा! जानिए कौन हैं धर्मेंद्र प्रधान

Who Is Dharmendra Pradhan: देश भर में नीट पेपर लीक विवाद और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में चल रहे छात्र आंदोलनों के भारी दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आज, शनिवार 25 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। कभी खुद छात्र राजनीति के दौरान पेपर लीक और सरकारी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले धर्मेंद्र प्रधान के लिए यह एक अजीब ऐतिहासिक मोड़ रहा। जिस राजनीति से वे उभरे थे, अंततः उसी तरह के एक बड़े छात्र आंदोलन ने उन्हें पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

आइए आपको बताते हैं छात्र आंदोलन से से लेकर मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री तक के धर्मेंद्र प्रधान के सफर की पूरी कहानी।

कौन हैं धर्मेंद्र प्रधान?

26 जून 1969 को ओडिशा के तालचेर में जन्मे धर्मेंद्र प्रधान पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता देबेंद्र प्रधान के पुत्र हैं। राजनीति उन्हें विरासत में जरूर मिली, लेकिन उनकी पहचान छात्र राजनीति से बनी। उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के साथ छात्र राजनीति की शुरुआत की और बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने।

1997 का पेपर लीक आंदोलन

साल 1997 में ओडिशा की तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान प्रश्नपत्र लीक विवाद हुआ था। तब ABVP के राष्ट्रीय सचिव रहे धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में करीब 1,500 छात्रों ने भुवनेश्वर में मुख्यमंत्री आवास के पास सचिवालय का घेराव किया था। इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने सख्त बल प्रयोग किया था, जिसमें धर्मेंद्र प्रधान को गंभीर चोटें आई थीं और उनके शरीर में कई जगह फ्रैक्चर भी हुए थे। इस घटना ने उन्हें ओडिशा में छात्र राजनीति का एक बड़ा चेहरा बना दिया।

विधायक से सांसद: चुनावी राजनीति का सफर

धर्मेंद्र प्रधान ने साल 2000 में ओडिशा की पल्लहड़ा सीट से विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी चुनावी राजनीति की शुरुआत की थी। इसके बाद वे 2004 में ओडिशा की देवगढ़ सीट से पहली बार लोकसभा पहुंचे। उन्होंने बिहार और मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। 2024 के आम चुनाव में वे ओडिशा की संबलपुर लोकसभा सीट से भारी मतों से जीतकर फिर से संसद पहुंचे।

मोदी सरकार में बढ़ा कद, संभाले कई बड़े मंत्रालय

2014 में जब नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई, तब से ही धर्मेंद्र प्रधान सरकार के सबसे भरोसेमंद और प्रमुख चेहरों में से एक रहे हैं।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय: 2014 में स्वतंत्र प्रभार मंत्री के रूप में उन्होंने इस महत्वपूर्ण आर्थिक मंत्रालय की कमान संभाली, जिसमें उन्होंने ‘उज्जवला योजना’ जैसे कई बड़े सुधार लागू किए।

कौशल विकास और इस्पात मंत्रालय: 2017 में उन्हें कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय का प्रभार मिला और 2019 में कैबिनेट मंत्री के रूप में उन्होंने इस्पात मंत्रालय भी संभाला।

जुलाई 2021 में शिक्षा मंत्री की कमान और NEP का क्रियान्वयन

जुलाई 2021 में रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के हटने के बाद धर्मेंद्र प्रधान को देश का केंद्रीय शिक्षा मंत्री बनाया गया। उनके कार्यकाल का सबसे बड़ा काम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) को जमीनी स्तर पर लागू करना रहा। शिक्षा मंत्री रहते हुए वे नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की साख और परीक्षाओं के प्रबंधन को लेकर लगातार चुनौतियों से घिरे रहे।

नीट-यूजी 2026 परीक्षा में पेपर लीक और धांधली के गंभीर आरोपों के बाद विपक्षी दलों और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) सहित कई छात्र युवा संगठनों ने उनके इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले कई दिनों से मोर्चा खोला हुआ था, जिसके बाद आज उन्होंने पीएम मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया है।

CBSE Class 9 R3 evaluation: तीसरी भाषा का मूल्यांकन सिर्फ लिखने-पढ़ने पर नहीं बोलने और सुनने के आधार पर होगा, जानें कैसे मिलेंगे नंबर

CBSE Class 9 R3 evaluation: सीबीएसई बोर्ड ने कक्षा 9 में पढ़ रहे छात्रों के लिए यह बड़ा और अहम अपडेट है। बोर्ड ने शैक्षिक सत्र 2026-27 से 9वीं कक्षा में नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत 3 भाषा नियम लागू किया है। सीबीएसई ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा नौ की तीसरी भाषा (आर-3) के लिए नया असेसमेंट फ्रेमवर्क लागू कर दिया है। बोर्ड ने मूल्यांकन के नियम तय किए हैं, जिसके तहत तीसरी भाषा में लिखने-पढ़ने की बजाय बोलने और सुनने में सर्वाधिक अंक मिलेंगे।

बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा की पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया स्कूल स्तर पर ही की जाएगी। इसके तहत विभिन्न स्तर पर छात्रों का मूल्यांकन पूरे साल किया जाएगा। सीबीएसई के अनुसार यह पाठ्यक्रम एनसीईआरटी ने विकसित किया है। इसका उद्देश्य छात्रों में भाषा को पहले सुनकर समझने और बोलने का आत्मविश्वास विकसित करना है, ताकि वे स्वाभाविक रूप से भाषा का प्रयोग कर सकें। सीबीएसई ने बताया है कि आर3 भाषा के लर्निंग रिसोर्स एनसीईआरटी की वेबसाइट पर उपलब्ध करा दिए गए हैं और सभी संबद्ध स्कूलों से इन्हें कक्षा शिक्षण में शामिल करने को कहा गया है।

R3 मूल्यांकन के लिए बोर्ड ने अपनाई ‘ओरल फर्स्ट पेडागोजी’

बोर्ड ने 9वीं कक्षा में R3 के मूल्यांकन के लिए ‘ओरल-फर्स्ट पेडागोजी’ (मौखिक-प्रथम शिक्षण पद्धति) को अपनाया है। इसके 100 अंकों का स्कूल-आधारित मूल्यांकन किया जाएगा। 9वीं कक्षा के छात्रों को आंतरिक मूल्यांकन में सर्वाधिक 40 अंक सुनने और बोलने के कौशल के लिए जाएंगे। वहीं, तीसरी भाषा पढ़ने के कौशल के लिए 20 अंक रखे गए हैं। जबकि, रचनात्मक लेखन के लिए 15 अंक, पाठ्यपुस्तक आधारित लेखन के लिए 10 और प्रोजेक्ट वर्क के लिए 15 अंक तय किए गए हैं।

पूरे साल चलेगा सुनने और बोलने का मूल्यांकन

सीबीएसई बोर्ड की R3 के लिए बनाई गई नई व्यवस्था के तहत परीक्षार्थियों का सुनने और बोलने का मूल्यांकन पूरे शैक्षणिक सत्र के दौरान विभिन्न कक्षा गतिविधियों के माध्यम से किया जाएगा। शिक्षकों को निर्धारित सूची में से किसी भी आठ गतिविधियों का मूल्यांकन करना होगा और प्रत्येक गतिविधि के लिए पांच अंक निर्धारित होंगे। इन गतिविधियों में सुनकर प्रश्नों के उत्तर देना, चित्र या घटना का वर्णन करना, समूह चर्चा, स्वयं एवं परिवार का परिचय देना, रोल प्ले, वाद-विवाद, दैनिक जीवन से जुड़े संवाद और अन्य मौखिक गतिविधियां शामिल हैं। यह मूल्यांकन 40 अंकों का होगा। बोर्ड ने स्कूलों को छात्रों की रुचि के अनुसार गतिविधियों का चयन करने के लिए भी प्रोत्साहित किया है।

R3 पढ़ने और लिखने के लिए 20 नंबर तय

बोर्ड ने R3 के पठन कौशल यानी रीडिंग स्किल के लिए 20 अंक निर्धारित किए हैं। इसमें अध्ययन सामग्री से लगभग 100-100 शब्दों के दो पठित गद्यांश दिए जाएंगे, जिन पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न, सही-गलत, रिक्त स्थान पूर्ति और अति लघु उत्तरीय प्रश्न पूछे जाएंगे। वहीं, 15 अंक के रचनात्मक लेखन (क्रिएटिव राइटिंग) में 30-40 शब्दों का अनौपचारिक निमंत्रण या संदेश, चित्र वर्णन, 100 शब्दों तक की सरल कहानी और दैनिक जीवन की परिस्थितियों पर आधारित संवाद लेखन शामिल होगा। इसके अतिरिक्त पाठ्य सामग्री पर आधारित लेखन कौशल के लिए 10 अंक तय हैं, जिनमें लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न पूछे जाएंगे।

R3 पर प्रोजेक्ट के लिए 15 नंबर और 5 नंकर का वाइवा

बोर्ड ने R3 के मूल्यांकन में 15 अंकों का प्रोजेक्ट वर्क भी अनिवार्य किया है। इसके लिए स्थानीय रीति-रिवाज, त्योहार, लोक कला, तकनीकी नवाचार, स्थानीय साहित्यकार या क्षेत्रीय संस्कृति जैसे विषय सुझाए गए हैं। बोर्ड ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि प्रोजेक्ट का मूल्यांकन उसकी सजावट के आधार पर नहीं, बल्कि छात्र की मौलिकता, शोध, समझ और विषयवस्तु की गुणवत्ता के आधार पर किया जाएगा। प्रोजेक्ट के साथ पांच अंकों का मौखिक परीक्षण (वाइवा) भी होगा।

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