Urban Company Share Price: केंट RO हटाएगी Native वॉटर प्योरिफायर की बुराई वाले विज्ञापन, शेयर 7% तक उछला

होम सर्विसेज देने वाली अर्बन कंपनी के शेयरों में 24 अगस्त को अच्छी तेजी है। BSE पर शेयर की कीमत शुरुआती कारोबार में पिछले बंद भाव से 6.8 प्रतिशत तक उछलकर 169.45 रुपये के हाई तक गई। कंपनी का मार्केट कैप बढ़कर 25900 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है। इस उछाल की अहम वजह है- कंपनी और केंट RO सिस्टम के बीच हुए विवाद का नतीजा और UBS की ओर से ‘बाय’ रेटिंग के साथ शुरू किया गया कवरेज। दरअसल अर्बन कंपनी ने केंट RO सिस्टम के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में मानहानि और अपमानजनक प्रचार का केस दायर किया था।

कंपनी का आरोप था कि Kent RO के विज्ञापनों और सोशल मीडिया कंटेंट में उसके ‘Native’ वॉटर प्योरिफायर्स के बारे में गलत और गुमराह करने वाले दावे किए गए। मुकदमेबाजी के बाद केंट ने कहा है कि वह ‘Native’ वॉटर प्योरिफायर के बारे में अपमानजनक विज्ञापन हटा लेगी।

Urban Company ने शेयर बाजारों को बताया है कि उसने 11 अगस्त को यह केस दायर किया था। आरोप लगाया कि Kent RO का विज्ञापन कैंपेन उसके ‘Native’ M0, M1, M2, M1 Pro और M2 Pro वॉटर प्योरिफायर की दो साल की फिल्टर लाइफ और दो साल की सर्विस लाइफ वाली खूबियों को निशाना बना रहा है। Kent RO के विज्ञापनों में इन खूबियों को “मार्केटिंग का हथकंडा” बताया गया और दावा किया गया कि ग्राहकों के लिए ‘Native’ वॉटर प्योरिफायर का इस्तेमाल असुरक्षित और जोखिम भरा है।

12 अगस्त को हुई हाई कोर्ट में सुनवाई

इस मामले की सुनवाई 12 अगस्त को हाई कोर्ट में हुई। Kent RO से कहा गया कि वह 15 दिनों के अंदर विवादास्पद विज्ञापन और सोशल मीडिया कंटेंट हटा ले। इसके बाद Kent RO ने कहा कि वह केस से जुड़े विज्ञापनों को हटा लेगी और ऐसे ही या मिलते-जुलते दावे करने वाले दूसरे विज्ञापन या प्रमोशनल कंटेंट नहीं चलाएगी।

अर्बन कंपनी भारत, UAE, सिंगापुर और सऊदी अरब में एक मल्टी कैटेगरी होम सर्विस प्लेटफॉर्म के तौर पर काम करती है। इसके प्लेटफॉर्म पर क्लीनिंग, प्लंबिंग, इलेक्ट्रिक वर्क, अप्लायंसेज रिपेयर, ब्यूटी ट्रीटमेंट और मसाज थेरेपी जैसी सर्विसेज मिलती हैं। इसका InstaHelp वर्टिकल बुकिंग के 10-15 मिनट के अंदर सफाई, बर्तन धोने, कपड़े धोने और खाना बनाने के लिए लोग मुहैया कराने जैसी सर्विसेज देता है।

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UBS ने Urban Company पर दी ‘बाय’ रेटिंग

अर्बन कंपनी 17 सितंबर 2025 को ​लिस्ट हुई थी। इसका IPO 1,900.24 करोड़ रुपये का था। कंपनी में जून 2026 के आखिर तक प्रमोटर्स के पास 19.02 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। ब्रोकरेज फर्म UBS ने इस शेयर पर कवरेज शुरू किया है और इसे “बाय” रेटिंग दी है। टारगेट प्राइस 180 रुपये प्रति शेयर रखा है। मॉर्गन स्टेनली ने स्टॉक की रेटिंग को “अंडरवेट” से डबल अपग्रेड कर सीधा “ओवरवेट” कर दिया है। टारगेट प्राइस 128 रुपये से बढ़ाकर 165 रुपये प्रति शेयर कर दिया है।

अप्रैल-जून 2026 तिमाही में कंपनी को कंसोलिडेटेड बेसिस पर 92.12 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। एक साल पहले कंपनी 6.94 करोड़ रुपये के मुनाफे में थी। जून 2026 तिमाही में ऑपरेशंस से कंसोलिडेटेड रेवेन्यू सालाना आधार पर 43.85 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 528.34 करोड़ रुपये रहा।

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Urban Company का Kent RO पर मानहानि केस, हाई कोर्ट में विज्ञापन हटाने पर बनी बात

Urban Company ने Kent RO Systems के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में मानहानि और ब्रांड को बदनाम करने का मुकदमा दायर किया है। कंपनी का आरोप है कि Kent RO ने अपने विज्ञापनों और सोशल मीडिया पोस्ट में उसके Native वॉटर प्यूरीफायर को लेकर गलत और भ्रामक दावे किए।

कंपनी ने रविवार को शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि यह मुकदमा 11 अगस्त 2026 को दायर किया गया था।

किस बात पर हुआ विवाद?

Urban Company का कहना है कि Kent RO की विज्ञापन मुहिम में उसके Native M0, M1, M2, M1 Pro और M2 Pro वॉटर प्यूरीफायर के दो साल की फिल्टर लाइफ और दो साल तक सर्विसिंग की जरूरत नहीं वाले फीचर को निशाना बनाया गया।

कंपनी के मुताबिक Kent RO ने इन दावों को ‘मार्केटिंग गिमिक’ बताया और कहा कि Native वॉटर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करना उपभोक्ताओं के लिए ‘असुरक्षित’ और ‘जोखिम भरा’ है।

Kent RO ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई 12 अगस्त को दिल्ली हाई कोर्ट में हुई। सुनवाई के दौरान Kent RO ने अदालत से कहा कि वह विवादित विज्ञापन हटा देगा। साथ ही भविष्य में ऐसे विज्ञापन या प्रचार सामग्री भी नहीं चलाएगा, जिसमें दो साल की फिल्टर लाइफ या दो साल तक बिना सर्विसिंग वाले फीचर को लेकर Urban Company के खिलाफ इसी तरह के दावे किए जाएं।

Urban Company के मुताबिक अदालत ने Kent RO को 12 अगस्त से 15 दिनों के भीतर विवादित विज्ञापन और सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का निर्देश दिया। अदालत का आदेश 12 अगस्त को पारित हुआ था, जबकि इसे 22 अगस्त को हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया।

दोनों कंपनियों के बीच और भी कानूनी मामले

Urban Company ने बताया कि दोनों कंपनियों के बीच अन्य कानूनी मामले अभी भी अदालत में लंबित हैं। इनमें Kent RO की ओर से दायर पेटेंट उल्लंघन का मुकदमा, उस पेटेंट को चुनौती देने वाला Urban Company का जवाबी दावा और Kent RO के खिलाफ दायर टॉर्टियस इंटरफेरेंस का मामला शामिल है।

शेयरों में कैसी रही चाल?

Urban Company का शेयर शुक्रवार को 8.19% चढ़कर ₹157.41 पर बंद हुआ था। इस साल अब तक शेयर करीब 20% चढ़ चुका है। वहीं पिछले 12 महीनों में इसमें करीब 6% की गिरावट रही है।

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बच्चों को वसीयत में देनी चाहिए प्रॉपर्टी या जीवनकाल में कर देना चाहिए गिफ्ट? एक्सपर्ट से जानिए किसमें है ज्यादा फायदा

अपनी जीवनभर की कमाई और संपत्ति को बच्चों के नाम ट्रांसफर करना हर माता-पिता का एक बड़ा फैसला होता है। अक्सर विरासत या वसीयत से जुड़े फैसले माता-पिता के न रहने के बाद ही परिवार में चर्चा का विषय बनते हैं। लेकिन ऐसे में अक्सर प्रॉपर्टी को लेकर इसके दावेदारों, भाई-बहनों में विवाद और मतभेद पैदा होते भी हम देखते हैं। ऐसे में यह सवाल बहुत जरूरी हो जाता है कि क्या बच्चों को संपत्ति वसीयत के जरिए देनी चाहिए या अपने जीवनकाल में ही गिफ्ट (कर देनी चाहिए?

कानूनी और फाइनेंस एक्सपर्ट के मुताबिक अपने जीवनकाल में ही सरप्लस प्रॉपर्टी को गिफ्ट कर देना एक समझदारी भरा विकल्प हो सकता है। इससे माता-पिता अपने जीवनकाल में ही अपने इरादों को स्पष्ट कर सकते हैं, बच्चों की आशंकाओं को दूर कर सकते हैं और किसी भी मतभेद को समय रहते सुलझा सकते हैं।

…लेकिन सबसे पहले अपनी फाइनेंशियल सिक्यॉरिटी सुनिश्चित करें

अपने जीवनकाल में बच्चों को प्रॉपर्टी या धन गिफ्ट करने की योजना बनाते समय वरिष्ठ नागरिकों को सबसे पहले ये बुनियादी बात समझनी चाहिए कि देने से ज्यादा जरूरी उनके लिए ये सवाल है कि वो खुद के लिए कितना बचाकर रखें। एक्सपर्ट्स की साफ राय है कि माता-पिता को सबसे पहले अपना जीवनस्तर बनाए रखने, नियमित खर्चों को पूरा करने,भविष्य के स्वास्थ्य और इलाज संबंधी जरूरतों के लिए पर्याप्त फंड और प्रॉपर्टी अलग रख लेनी चाहिए। इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ होने वाले अचानक के खर्चों और इमर्जेंसी के लिए एक बफर रखना बेहद जरूरी है। ऐसा इसलिए ताकि संपत्ति गिफ्ट करने के बाद उन्हें फाइनेंशियली अपने बच्चों पर निर्भर न होना पड़े।

दिल्ली हाई कोर्ट की वकील विनीता सेजवाल का कहना है कि लाइफटाइम गिफ्टिंग प्लान की नींव गिफ्ट देने वाले के अपने वित्तीय भविष्य को सुरक्षित करने पर टिकी होती है। वरिष्ठ नागरिकों को अपने जीवनस्तर को बनाए रखने,नियमित खर्चों को पूरा करने और भविष्य की चिकित्सीय व स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए पर्याप्त धनराशि अलग रखनी चाहिए। साथ ही अप्रत्याशित परिस्थितियों के लिए पर्याप्त रिजर्व भी रखना चाहिए।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके लिए कोई तय मानक फॉर्मूला नहीं हो सकता। यह कैलकुलेशन वरिष्ठ नागरिक की आय, कुल संपत्ति, उनकी देनदारियों और वित्तीय जरूरतों पर निर्भर करती है। सिर्फ वही संपत्ति या धन बच्चों को गिफ्ट करने के लिए माना जाना चाहिए जो इन सभी जरूरतों को पूरा करने के बाद वास्तव में सरप्लस हो।

जीवनकाल में गिफ्ट देने से उत्तराधिकार क्यों आसान हो जाता है?

अपने जीवनकाल में संपत्ति ट्रांसफर करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि माता-पिता अपनी उपस्थिति में ही अपने फैसलों की वजह बता सकते हैं। यह बात तब और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जब बच्चों को अलग-अलग मूल्य या अलग-अलग प्रकार की संपत्तियां दी जा रही हों।

दिल्ली हाई कोर्ट की वकील गुडीपति गायत्री कश्यप के मुताबिक,’मौत के बाद पूरी संपत्ति को बंटवारे के लिए छोड़ने की तुलना में जीवनकाल में गिफ्ट देना उत्तराधिकार का एक बहुत अधिक प्रभावी तरीका हो सकता है। यह माता-पिता को अपने इरादों को स्पष्ट करने, बच्चों के बीच की चिंताओं को दूर करने और अपनी मौजूदगी में मतभेदों को सुलझाने का मौका देता है।”

अक्सर माता-पिता के निधन के बाद विवाद सिर्फ कानूनी हक तक सीमित नहीं रहते बल्कि इस बात पर भी बहस होती है कि माता-पिता की सेवा किसने ज्यादा की, उन्हें किसने पैसा ज्यादा दिया, या किसी एक बच्चे को ज्यादा तरजीह दी गई या नहीं। इसीलिए ट्रांसपेरेंसी बहुत जरूरी है। अगर माता-पिता असमान रूप से गिफ्ट दे रहे हैं तो उन्हें इसके पीछे के कारणों को स्पष्ट करना चाहिए। साथ ही यह गिफ्टिंग प्लान वसीयत सहित अन्य व्यापक उत्तराधिकार योजनाओं से मेल खाता होना चाहिए।

कैश, शेयर्स या प्रॉपर्टी: क्या गिफ्ट करना ज्यादा बेहतर?

जीवनकाल में संपत्ति देने के लिए कोई एक एसेट क्लास सबसे बेहतर नहीं कहा जा सकता। यह फैसला लिक्विडिटी की जरूरत, टैक्स के नियमों और इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वरिष्ठ नागरिक को खुद उस संपत्ति से आय या व्यक्तिगत उपयोग की जरूरत है या नहीं। कैश ट्रांसफर करने में सबसे आसान है और जिसे मिलता है उसे तुरंत लिक्विडिटी मिल जाती है। लिस्टेड शेयर्स और म्यूचुअल फंड को भी ट्रांसफर करना और इनके डॉक्युमंट्स तैयार करना आसान होता है। प्रॉपर्टी, जमीन और सोना की बात करें तो अगर आपका उद्देश्य ऐसी संपत्तियों को पास ऑन करना है जिनका मूल्य समय के साथ बढ़ता है तो इन्हें चुना जा सकता है।

हालांकि, अचल संपत्ति मामले में बेहद सावधानी बरतने की जरूरत होती है क्योंकि यह लिक्विड नहीं होती और न ही इसे आसानी से बांटा जा सकता है। इसके अलावा अचल संपत्ति के ट्रांसफर में वैल्युएशन, स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन का खर्च आता है।

गांधी लॉ एसोसिएट्स के पार्टनर राहिल पटेल कहते हैं कि वरिष्ठ नागरिकों को अपने जीवनकाल में धन या संपत्ति तभी ट्रांसफर करनी चाहिए जब वे अपने अपेक्षित रहने के खर्चों, स्वास्थ्य सेवा, आपात स्थितियों और दीर्घायु जोखिमों को आराम से पूरा करने के लिए पर्याप्त संपत्तियों को सुरक्षित कर लें। प्राथमिकता वित्तीय स्वतंत्रता होनी चाहिए, न कि संपत्ति देने के बाद बच्चों पर निर्भर हो जाना।

सही कानूनी डॉक्युमेंटेशन है बेहद जरूरी

जीवनकाल में दिए जाने वाले किसी भी गिफ्ट को महज एक अनौपचारिक पारिवारिक समझ नहीं मानना चाहिए। खासकर जब बड़ी संपत्ति शामिल हो, तो उसका सही डॉक्युमेंटेशन होना जरूरी है। राहिल पटेल के अनुसार, अचल संपत्ति (मकान, जमीन आदि) के मामले में एक रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड की जरूरत होती है। इसके लिए राज्य के नियमों के अनुसार स्टाम्प ड्यूटी और पंजीकरण शुल्क देना पड़ सकता है।

दस्तावेजीकरण तब और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है जब बच्चों के बीच संपत्ति का असमान रूप से बांटी जा रही हो। सही लिखापढ़ी न होने पर भविष्य में जबरदस्ती संपत्ति लेने, दबाव डालकर प्रॉपर्टी ट्रांसफर कराने जैसे आरोप लग सकते हैं और मामला विवादित हो सकता है।

जीवनकाल में संपत्ति गिफ्ट करने का मतलब यह नहीं है कि आप अपनी सारी धन-दौलत बांट दें। इसका सही उद्देश्य यह है कि जब माता-पिता खुद वित्तीय रूप से सुरक्षित हों और अपने इरादों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में सक्षम हों तब वे अपनी सरप्लस प्रॉपर्टी को प्लान बनाकर ट्रांसफर कर दें। जरूरत के हिसाब से फाइनेंशियल रिजर्व, ट्रांसपेरेंसी और सही लीगल डॉक्यूमेंटेशन के साथ किया गया ट्रांसफर अगली पीढ़ी को बिना किसी पारिवारिक कलह के प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने का एक सुरक्षित रास्ता बनाता है।

 

 

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Jantar Mantar Protest : जंतर-मंतर प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, 5 सदस्यीय कमेटी करेगी जांच, जानें कौन-कौन शामिल

Jantar Mantar Protest : जंतर-मंतर प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, 5 सदस्यीय कमेटी करेगी जांच,  जानें कौन-कौन शामिल

20 जुलाई को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने घटना की निष्पक्ष और विस्तृत जांच के लिए पांच सदस्यीय हाई पावर कमेटी (HPEC) का गठन किया है। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी करेंगे।

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प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई की होगी जांच

 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं और उसके बाद पुलिस की कार्रवाई के विभिन्न पहलुओं की जांच करेगी। खास तौर पर यह पता लगाया जाएगा कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पेलेट गन का इस्तेमाल नियमों के तहत किया गया था या इसका अनावश्यक इस्तेमाल हुआ। समिति प्रदर्शन स्थल पर मौजूद महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार और हिंसा के आरोपों की भी जांच करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जांच निष्पक्ष तरीके से की जानी चाहिए। समिति को तय समय सीमा के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत को सौंपनी होगी।

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कमेटी में कौन-कौन शामिल?

 

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस, अर्धसैनिक बलों और अन्य सुरक्षा कर्मियों पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के आरोपों की व्यापक जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति बनाई है।

 

इस समिति में शामिल सदस्य हैं:

 

  • जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी – सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और समिति के अध्यक्ष
  • जस्टिस रवि शंकर झा – पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
  • जस्टिस शालिंदर कौर – दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश
  • ऋषि कुमार शुक्ला – सीबीआई के पूर्व निदेशक
  • डॉ. एल.आर. बिश्नोई – मेघालय के सेवानिवृत्त डीजीपी
  • पुलिस पर बल प्रयोग के आरोपों की भी पड़ताल

 

समिति प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों की ओर से कथित बल प्रयोग से जुड़े आरोपों की जांच करेगी। इसके साथ ही पुलिस की ओर से लगाए गए उन आरोपों पर भी गौर किया जाएगा, जिनमें पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की बात कही गई है। इस जांच का उद्देश्य प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं और उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई से जुड़े सभी प्रमुख आरोपों और परिस्थितियों की निष्पक्ष पड़ताल करना है।

IB अधिकारी हत्या मामले में ताहिर हुसैन समेत 5 दोषियों को उम्रकैद, कोर्ट ने कहा- ‘शव को जानवर की तरह घसीटा गया’

Ankit Sharma Murder Case: दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में AAP के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और चार अन्य दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। बता दें कि फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दयाल पुर इलाके में हुए दंगों के दौरान उनकी बेरहमी हत्या कर दी गई थी।

सजा सुनाते हुए अदालत ने अपराध की प्रकृति पर कड़ी टिप्पणी की और इसे “बेहद बर्बर” कृत्य बताया। अदालत ने कहा, “जिस तरह से यह अपराध किया गया, वह बेहद बर्बर था और इसे सिर्फ धर्म के आधार पर अंजाम दिया गया है।”

दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने भी हत्या की भयानक प्रकृति पर जोर देते हुए कहा कि “अंकित शर्मा के शव को किसी जानवर की तरह घसीटा गया।” कोर्ट ने उनके साथ की गई बर्बरता को “घिनौना और विचलित करने वाला” बताया।

यह सजा AAP के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और अन्य आरोपियों को अंकित शर्मा की हत्या में शामिल होने का दोषी ठहराए जाने के बाद सुनाई गई है। बता दें कि अंकित शर्मा का शव फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के दौरान एक नाले में मिला था।

ताहिर हुसैन ने खुद को बेगुनाह बताया

गौरतलब है कि 26 वर्षीय इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या दंगों से जुड़े सबसे चर्चित मामलों में से एक बन गई थी। इस घटना को लेकर अभियोजन पक्ष का आरोप था कि शर्मा पर भीड़ ने हमला किया और उनकी हत्या कर दी, जबकि हुसैन ने पूरे ट्रायल के दौरान खुद को बेगुनाह बताया।

चार्जशीट के मुताबिक, 25 फरवरी को शाम करीब 5 बजे ताहिक हुसैन के घर के पास दो गुटों के बीच तनाव कम करने की कोशिश कर रहे शर्मा को कथित तौर पर भीड़ ने घेर लिया था।

प्रदीप भंडारी की प्रतिक्रिया

फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए, बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी (AAP) का संबंध 2020 के दिल्ली दंगों से था।

X पर एक पोस्ट में भंडारी ने लिखा, “IB अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के लिए ताहिर हुसैन को उम्रकैद की सजा मिली है! AAP दंगाइयों की पार्टी है! 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों के पीछे AAP का हाथ था!”

उनकी यह टिप्पणी दिल्ली कोर्ट द्वारा अंकित शर्मा हत्याकांड में ताहिर हुसैन और चार अन्य लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के कुछ ही समय बाद आई है। वहीं, आम आदमी पार्टी (AAP) ने दिल्ली दंगों से पार्टी को जोड़ने वाले सभी आरोपों से लगातार इनकार किया है।

कपिल मिश्रा ने फैसले का स्वागत किया

सजा सुनाए जाने के बाद, दिल्ली के कानून मंत्री कपिल मिश्रा ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया और इसे इस मामले में न्याय की शुरुआत बताया।

X पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा, “ताहिर हुसैन को उम्रकैद की सजा मिलना न्याय की शुरुआत है। अंकित शर्मा जी की जिस बेरहमी से हत्या की गई, मौत के बाद भी चाकू मारे गए और शव को नाले में फेंक दिया गया – यह निश्चित रूप से ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ (rarest of rare) मामला है। उम्मीद है कि हाई कोर्ट में यह उम्रकैद की सजा मौत की सजा में बदल जाएगी।”

हम हाई कोर्ट में अपील करेंगे

सजा सुनाए जाने के बाद ताहिर हुसैन ने कहा कि वह दिल्ली हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती देंगे। उन्होंने कोर्ट के बाहर पत्रकारों से कहा, “हम हाई कोर्ट में अपील करेंगे। हमें जरूर न्याय मिलेगा।”

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जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है?

यह लाख टके का सवाल है कि दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजे गए जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है? साथ यह भी सवाल है कि उनके खिलाफ लंबित महाभियोग के मामले की क्या स्थिति है? संसद के सत्र आ रहे हैं और जा रहे हैं। दुनिया भर की दूसरी बातों की चर्चा हो रही है। जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से होली के दिन कथित रूप से जले हुए नोट बरामद होने की घटना के डेढ़ साल हो गए। लेकिन यह पता ही नहीं चल रहा है कि इस मामले में क्या होना है? सुप्रीम कोर्ट ने घटना के तुरंत बाद एक कमेटी बना कर जांच कराई थी, जिसने कहा था कि नोट उनके घर से बरामद हुए थे। उसके बाद उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजों ने उनकी नियुक्ति का बड़ा विरोध किया। उन्हें बिना कोई काम दिए अदालत में रखा गया। इधर संसद में महाभियोग का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया और जजेज इन्क्वायरी एक्ट के हिसाब से स्पीकर ने जांच की कमेटी भी बना दी। कुछ दिन पहले जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा भी दे दिया। सवाल है कि क्या राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है? एक रिपोर्ट के मुताबिक इलाहाबाद हाई कोर्ट और भारत सरकार के न्याय विभाग के रिकॉर्ड में वे आज भी जज हैं। अगर ऐसा है तो इसका अर्थ है कि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है। तब भी सवाल है कि क्या वे महाभियोग के जरिए हटाए जाएंगे? अगर ऐसा होगा तो वे देश के पहले जज होंगे, जो महाभियोग के जरिए हटाए जाएंगे। यह भी सवाल है कि अगर इस्तीफा स्वीकार हो जाएगा तो क्या महाभियोग की प्रक्रिया समाप्त कर दी जाएगी?

Bhumi Pednekar: ‘आज हमारे… लिए एक बहुत बड़ा पल है’, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद भूमि पेडनेकर ने शेयर किया नोट

Bhumi Pednekar: एक्ट्रेस भूमि पेडनेकर ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। शनिवार को एक्ट्रेस ने अपने इंस्टाग्राम पर एक लंबा नोट लिखा और कहा कि यह पल एक मज़बूत और निष्पक्ष भारत की शुरुआत का प्रतीक है। एक्ट्रेस ने यह उम्मीद भी जताई कि यह अहम पल कमियों को पहचानने और उन्हें दूर करने की दिशा में एक सार्थक बदलाव लाएगा।

उन्होंने लिखा, “उम्मीद है कि इससे हमारा भारत और मज़बूत और बेहतर बनेगा। आज हमारे लोकतंत्र के लिए एक बहुत अहम पल है। ऐसे नागरिक जिन्होंने हार नहीं मानी और ऐसी लीडरशिप जिसने उनकी बात सुनी। युवाओं ने अपनी बात रखी; उनका पक्का इरादा, उनकी हिम्मत और बदलाव की ताकत में उनका भरोसा वाकई प्रेरणा देने वाला था।”

उन्होंने आगे कहा, “उस मंच पर बहुत कुछ कहा गया, लेकिन आखिर में वही आवाज़ गूंजी जो छात्र सही मायने में चाहते थे। मेरे लिए, जवाबदेही का मतलब है असल और समाधान-केंद्रित बदलाव लाना। कमियों को पहचानना और उन्हें दूर करना। ऐसा असली सुधार जो सच में हमारे छात्रों के भविष्य की चर्चा पर असर डाले। मुझे लगता है कि हर भारतीय के लिए—चाहे आप किसी सरकारी पद पर हों या आम नागरिक—देश, उसकी खुशहाली, उसके लोग और उसकी सुरक्षा हमेशा सबसे पहले होनी चाहिए। जय हिंद।”

राष्ट्रीय राजधानी के बीचों-बीच हफ़्तों तक चले बड़े छात्र विरोध-प्रदर्शनों और लगातार जन-आंदोलन के बाद, शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया। छात्र परीक्षा में गड़बड़ियों, खासकर NEET-UG पेपर लीक को लेकर उनके इस्तीफ़े की मांग कर रहे थे। उनका इस्तीफ़ा 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस की सख़्त कार्रवाई के बाद आया है।

पुलिस की इस कार्रवाई से पूरे देश में आक्रोश फैल गया और नाराज़ नागरिक बड़ी संख्या में जंतर-मंतर पर छात्रों का समर्थन करने के लिए उमड़ पड़े।

ये विरोध-प्रदर्शन दिल्ली से पहले मेट्रो शहरों और फिर छोटे कस्बों तक फैल गए। 18 जुलाई की सुबह, सोनम वांगचुक को 21 दिनों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पूरी करने के बाद जंतर-मंतर पर प्रदर्शन स्थल से दिल्ली पुलिस द्वारा ज़बरदस्ती हटाए जाने के बाद विरोध-प्रदर्शन और तेज़ हो गए।

अधिकारियों ने उनकी बिगड़ती सेहत, डॉक्टरी सलाह और दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। सोनम वांगचुक प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए भूख हड़ताल पर हैं।

Akanksha Puri: आकांक्षा पुरी ने खोली बॉलीवुड एक्टर्स की पोल, बोलीं- स्टार्स को प्रोटेस्ट में जाने के लिए मिल रहे पैसे, मुझे भी हुए थे ऑफर

Akanksha Puri: टीवी एक्ट्रेस आकांक्षा पुरी ने बॉलीवुड स्टार्स पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि उनके कलीग्स को चल रहे विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा बनने के बदले पैसे की पेशकश की जा रही है। गुरुवार को एक्ट्रेस ने IANS से ​​बात करते हुए कहा कि वह चाहती हैं कि लोग “सही बात” का समर्थन करें और “मार्केटिंग” से ऊपर उठें।

उन्होंने IANS से ​​कहा, “मैं बस यही चाहती हूं कि लोग सही बात का समर्थन करें। इसे मार्केटिंग का हिस्सा न बनाएं। इसके लिए पैसे न कमाएं। और अपनी ही रोजी-रोटी पर लात न मारें। सही बात का समर्थन करें। सही लोगों का समर्थन करें। मैं और खुलकर क्या कह सकती हूं? मुझे लगता है कि जो लोग मेरे साथ हैं – एक्टर्स, कंटेंट क्रिएटर्स – वे सभी जानते हैं कि बहुत से लोग और बहुत सी पार्टियां हमसे संपर्क कर रही हैं ताकि इसे मार्केटिंग का हिस्सा बनाया जा सके, लोगों की नज़र में आया जा सके और रैली में जाया जा सके।”

एक्ट्रेस ने कहा कि मैं इस बकवास का हिस्सा नहीं बनना चाहती। मैं सही चीज का साथ देना चाहती हूं। इसके लिए, चाहे मैं वहां मौजूद रहूं या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जब भी किसी को जरूरत होती है, मैं उनके साथ खड़ी होती हूं। मुझे बहुत बुरा लगा क्योंकि वे भारत का भविष्य हैं। वे छात्र हैं। और उनके साथ ऐसा होते देखना… जब मैंने वे विज़ुअल्स देखे, तो वे बहुत परेशान करने वाले थे। इसलिए मेरी गुज़ारिश है कि उनकी बात सुनी जाए और उन्हें सपोर्ट किया जाए।

18 जुलाई की सुबह, दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन स्थल से सोनम वांगचुक को ज़बरदस्ती हटा दिया, जिसके बाद विरोध प्रदर्शन और तेज़ हो गया। वांगचुक 21 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर थे। अधिकारियों ने उनकी बिगड़ती सेहत, डॉक्टरी सलाह और दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। सोनम वांगचुक प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग करते हुए भूख हड़ताल पर थे।

26 दिन बाद सोनम वांगचुक ने खत्म किया अनशन, कहा- लंबी बातचीत और देशहित में लिया फैसला

Sonam Wangchuk hunger strike: सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल खत्म कर दी है, क्योंकि सरकार ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि उनकी मांगें पूरी की जाएंगी। उन्होंने गुरुवार आधी रात के करीब मेदांता अस्पताल में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह से मुलाकात के बाद और सरकार का भरोसा मिलने के बाद अपना अनशन खत्म करने की घोषणा की।

वांगचुक ने X पर पोस्ट करते हुए लिखा, “अभी-अभी केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा, डॉ. जितेंद्र सिंह और लेह-लद्दाख की एपेक्स बॉडी के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में, मैंने आखिरकार 26 दिनों के बाद अपना अनशन खत्म किया।”

अपना वजन जल्द से जल्द हासिल करें- पीएम मोदी

वहीं, वांगचुक के अनशन समाप्त करने की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी X पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, “मैं सोनम जी से आग्रह करता हूं कि वे डॉक्टरों की सलाह के अनुसार अपनी दिनचर्या का पालन करें और जल्द से जल्द अपना वजन वापस हासिल करें।”

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि सोनम जी स्वस्थ रहें।”

जेपी नड्डा ने सुनाया सरकार का फैसला

अस्पताल में वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो और अन्य लोगों की मौजूदगी में सरकार के आश्वासनों को पढ़कर सुनाते हुए जेपी नड्डा ने कहा, “सरकार दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध करने वालों और 20 जुलाई, 2026 को संसद तक मार्च में शामिल होने वालों के खिलाफ केस दर्ज न करने को लेकर सकारात्मक है।” केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने आगे कहा कि सरकार पहले ही परीक्षाओं के लिए पेपर लीक और शिक्षा सुधारों पर संसद में चर्चा का आश्वासन दे चुकी है।

नड्डा ने कहा, “इसके अलावा, सरकार हाल ही में हुए NEET पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वालों के परिवारों को उचित मुआवजा देने पर भी सकारात्मक रूप से विचार कर रही है।”

वहीं, वांगचुक ने बताया कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के कुल 65 सांसदों ने उनसे मिलकर या पत्र लिखकर अनशन तोड़ने का आग्रह किया था।

लंबी बातचीत और देशहित में लिया गया फैसला

वांगचुक ने X पर कहा, “यह फैसला कई शर्तों पर लंबी बातचीत और देश में संभावित हिंसा को ध्यान में रखते हुए लिया गया। मैं जल्द ही एक अलग वीडियो में इन शर्तों के बारे में विस्तार से बताऊंगा। इस बीच, मैं आप सभी से अपील करता हूं कि आप बहुत सतर्क रहें और कहीं भी किसी भी तरह की हिंसा न होने दें।”

इस बीच, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शुक्रवार को कहा कि उसे “राहत और खुशी” है कि एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने अपनी 26 दिन की भूख हड़ताल खत्म कर दी है, लेकिन पार्टी ने जोर देकर कहा कि जंतर-मंतर पर उसका शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन तब तक जारी रहेगा जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं दे देते।

X पर एक पोस्ट में, CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने वांगचुक को उनके “असाधारण साहस और त्याग” के लिए धन्यवाद दिया।

दिपके ने कहा, “हमें राहत मिली है और हम शुक्रगुजार हैं कि सोनम सर ने 26 दिनों के बाद अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है। सर, आपकी असाधारण हिम्मत और त्याग के लिए आपका धन्यवाद। अपनी जान जोखिम में डालकर आपने पूरे देश की अंतरात्मा को जगाया। यह देश आपके जीवन को बहुत कीमती मानता है,”

उन्होंने आगे कहा, “जब तक धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, तब तक जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा।”

28 जून को आंदोलन में शामिल हुए थे वांगचुक

बता दें कि वांगचुक 28 जून को जंतर-मंतर पर CJP के नेतृत्व वाले आंदोलन में शामिल हुए थे। उन्होंने उन छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी जो प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के लिए जवाबदेही, शिक्षा प्रणाली में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे।

इसके बाद के 26 दिनों में वांगचुक का करीब 11 किलोग्राम वजन कम हो गया। इस दौरान उन्होंने लगातार लोगों से अपील की कि 20 जुलाई को हुए ‘संसद चलो’ मार्च पर पुलिस कार्रवाई के बावजूद आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण बनाए रखें।

वहीं, 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को विरोध स्थल से हटाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। पुलिस का कहना था कि उन्हें मेडिकल देखभाल की जरूरत थी। हालांकि, उनकी पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने दिल्ली हाई कोर्ट में इस कदम को चुनौती दी और कहा कि उन्हें उनकी मर्जी के बिना सरकारी अस्पताल में रखा जा रहा है। इसके बाद हाई कोर्ट ने उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भेजने की मंजूरी दी, जहां उन्होंने अपना अनशन जारी रखा।

मेदांता में रहने के दौरान, वांगचुक ने कहा कि वह अपने छात्रों और एक शिक्षक के तौर पर अपने काम पर लौटना चाहते हैं, लेकिन युवा प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा की गारंटी के बिना वह अपना अनशन खत्म नहीं कर सकते।

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पति के ऑफिस में शिकायत करना पड़ सकता है भारी! सुप्रीम कोर्ट ने पत्नियों को दी बड़ी नसीहत

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पत्नियों द्वारा अपने पतियों के एम्प्लॉयर (कंपनियों/संस्थानों) को पत्र लिखने के बढ़ते चलन पर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा है कि ऐसी शिकायतों से नौकरी खतरे में पड़ सकती है और आखिरकार गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) के दावों पर भी असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने पिछले हफ्ते ये टिप्पणियां कीं। वे एक महिला द्वारा दायर ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें मानहानि के मुकदमे को असम से गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) ट्रांसफर करने की मांग की गई थी।

यह याचिका पति के एक दोस्त द्वारा दायर मानहानि के मामले से जुड़ी थी। महिला ने ट्रांसफर की मांग इसलिए की थी क्योंकि वह गाजियाबाद में अपने पति के साथ पहले से ही कई कानूनी मामलों में उलझी हुई थी।

सुनवाई के दौरान, बेंच ने मामले को सुप्रीम कोर्ट मेडिएशन सेंटर (मध्यस्थता केंद्र) भेज दिया ताकि समझौते की संभावना तलाशी जा सके। जस्टिस नागरत्ना ने महिला के वकील से यह भी कहा कि वे उसे सभी विवाद सुलझाने और आरोप वापस लेने की सलाह दें।

बता दें कि यह मानहानि का मामला उस शिकायत से शुरू हुआ, जो महिला ने दिल्ली में एयर फोर्स अधिकारियों से की थी। उसने आरोप लगाया था कि उसके पति, जो एयर फोर्स में अफसर हैं, सर्विस के नियमों का उल्लंघन करके अपना अलग बिजनेस चला रहे हैं।

महिला के वकील ने दलील दी कि यह शिकायत तब की गई थी जब पति ने महिला और उसके भाई पर एयर फोर्स का हेलमेट चुराने का झूठा आरोप लगाया था।

वकील के अनुसार, इस शिकायत का मकसद उस सामान (हेलमेट) का पता लगाना था, जो उसके पति को मिला था। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि मानहानि की शिकायत पति ने खुद नहीं, बल्कि उनके दोस्त ने की थी।

सुनवाई के दौरान, जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कई पत्नियां वैवाहिक विवाद चलने के दौरान अपने पतियों के एम्प्लॉयर को पत्र लिखने का रास्ता अपनाती हैं।

उन्होंने कहा कि तलाक मांगना एक अलग बात है, लेकिन जीवनसाथी की आजीविका (रोजगार) छिनवाना उससे भी बुरा है।

जज ने आगे कहा कि वैवाहिक विवादों के दौरान जीवनसाथी के नियोक्ता (employer) को पत्र लिखना उन “सबसे बुरी चीजों” में से एक है जो एक पत्नी कर सकती है, क्योंकि इससे पति की नौकरी जा सकती है और भविष्य में गुजारा-भत्ता (maintenance) के दावे का आधार भी कमजोर हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह कोई नई बात नहीं है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बताया कि पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं।

हालांकि, ऐसी शिकायतों की कोई सटीक संख्या नहीं है, लेकिन पहले भी महिलाएं व्यभिचार या दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए नियोक्ताओं के पास गई हैं और कुछ मामलों में अपने पतियों की नौकरी खत्म करने की मांग भी की हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि नौकरी जाने से बाद में गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) देने में मुश्किल हो सकती है।

पहले भी कोर्ट ने ऐसे कानूनी मुद्दों पर की है सुनवाई

कोर्ट ने कहा, अदालतों ने पहले भी ऐसी शिकायतों के कानूनी प्रभावों पर विचार किया है। ऐसे मामलों में सबसे पुराने मामलों में से एक दिल्ली हाई कोर्ट के सामने आया था। यह मामला 1972 का है, जब एक वैवाहिक विवाद के दौरान अलग रह रही पत्नी ने लोकसभा को पत्र लिखा था। उसने अपने पति, जो वहां काम करते थे, पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था और दावा किया था कि पति ने उसके माता-पिता से पैसों और अन्य चीजों की मांग की थी।

बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि अगर पत्नी भरण-पोषण की मांग करना चाहती थी, तो उसे केवल यह बताने की जरूरत थी कि उसे मेंटेनेंस नहीं मिल रहा है। इसके लिए उसे ऐसे आरोप लगाने की जरूरत नहीं थी।

1980 के अपने आदेश में कोर्ट ने कहा था, “इस तरह की झूठी शिकायत अगर किसी कर्मचारी के नियोक्ता से की जाती है, तो यह निश्चित रूप से मानसिक क्रूरता (मेंटल क्रुएल्टी) के बराबर होगी। इससे कर्मचारी की छवि उसके नियोक्ता की नजरों में खराब होगी और उसके करियर व प्रमोशन के अवसरों पर भी असर पड़ सकता है। यह स्थिति उसके मानसिक शांति को प्रभावित कर सकती है।” पत्नी के पूरे व्यवहार पर विचार करने के बाद कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर शादी खत्म करने के फैसले को सही ठहराया था।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बाद में अदालतों ने भी इसी तरह का नजरिया अपनाया है। इसमें मद्रास हाई कोर्ट का जून का एक फैसला भी शामिल है, जिसमें कहा गया था कि “”बिना किसी ठोस सबूत के लगाए गए ऐसे आरोप, जो पति या पत्नी की प्रतिष्ठा और सम्मान को नुकसान पहुंचाते हैं, खासकर नियोक्ता या वरिष्ठ अधिकारियों के सामने लगाए गए आरोप, वैवाहिक रिश्ते को पूरी तरह नुकसान पहुंचा सकते हैं और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता माने जा सकते हैं।”

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एम्प्लॉयर, खासकर प्राइवेट कंपनियां, सिर्फ आरोपों के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकाल सकते और उन्हें कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के अनुसार जांच करनी पड़ सकती है, जबकि सरकारी कर्मचारियों के मामले में अलग सर्विस नियम लागू होते हैं।

इसमें यह भी कहा गया है कि प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले मामलों में ‘भारतीय न्याय संहिता’ की धारा 356 के तहत आपराधिक मानहानि की कार्रवाई भी शुरू की जा सकती है।

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