2026 के इकोनॉमिक्स नोबेल का ऐलान आज:भारतीय मूल के अर्थशास्त्री राज चेट्टी का नाम भी चर्चा में; गरीबी से निकलने के मौके बताए

2026 के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार का ऐलान आज होगा। संभावित दावेदारों में भारतीय मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री राज चेट्टी का नाम भी चर्चा में है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री राज चेट्टी ने सरकारी आंकड़ों की मदद से यह समझाने की कोशिश की है कि किसी व्यक्ति के आगे बढ़ने के मौके किन बातों पर निर्भर करते हैं। उनके काम से यह समझने में मदद मिलती है कि कुछ शहरों में गरीब परिवारों के बच्चों को अच्छी कमाई करने और बेहतर जिंदगी पाने के ज्यादा मौके क्यों मिलते हैं, जबकि दूसरी जगहों पर उनके लिए आगे बढ़ना मुश्किल होता है। नोबेल के लिए 6 और अर्थशास्त्री भी दावेदार राज चेट्टी के अलावा कंपनियों के विलय, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोजगार और अमीर-गरीब के बीच बढ़ते अंतर पर रिसर्च करने वाले अर्थशास्त्रियों के नाम भी संभावित दावेदारों में शामिल हैं। 1. कंपनियों के विलय से कीमतों पर असर बताने वाले एरियल पेक्स हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री एरियल पेक्स ने कंपनियों के बीच मुकाबले और उनके एक होने से बाजार पर पड़ने वाले असर पर रिसर्च की है। उन्होंने स्टीवन बेरी और जेम्स लेविनसोहन के साथ मिलकर 1995 में अमेरिकी कार बाजार पर एक अहम शोधपत्र लिखा था। उनकी रिसर्च से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि दो कंपनियों के एक होने से सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं या नहीं। इससे सरकार को यह तय करने में भी मदद मिलती है कि किसी कंपनी के विलय से ग्राहकों को नुकसान हो सकता है या नहीं। 2. AI से अर्थव्यवस्था समझने वाली सुसान एथी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सुसान एथी ने अर्थशास्त्र में AI और मशीन लर्निंग के इस्तेमाल पर काम किया है। इन तकनीकों की मदद से बड़ी मात्रा में आंकड़ों का विश्लेषण किया जा सकता है। उनकी रिसर्च से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि किसी योजना से लोगों को वास्तव में फायदा हुआ या नहीं। उदाहरण के लिए, नौकरी की ट्रेनिंग देने से लोगों की कमाई बढ़ी या नहीं और किन लोगों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिला। 2007 में एथी को जॉन बेट्स क्लार्क मेडल मिला था। यह 40 साल से कम उम्र के अर्थशास्त्रियों को उनके अहम काम के लिए दिया जाता है। वह यह पुरस्कार पाने वाली पहली महिला थीं। 3. टैक्स और सरकारी कर्ज का लोगों की बचत पर असर बताने वाले रॉबर्ट बैरो हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री रॉबर्ट बैरो ने इस बात पर रिसर्च की है कि भविष्य में टैक्स बढ़ने की आशंका लोगों के खर्च और बचत को कैसे बदल सकती है। मान लीजिए, सरकार कर्ज लेकर लोगों का टैक्स घटा देती है। ऐसे में कुछ लोग अतिरिक्त पैसे खर्च करने के बजाय बचा सकते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकार भविष्य में कर्ज चुकाने के लिए टैक्स बढ़ा सकती है। इस विचार को ‘रिकार्डियन इक्विवेलेंस’ कहा जाता है। हालांकि, इस पर अर्थशास्त्रियों के बीच लंबे समय से बहस होती रही है। 4. अमीर-गरीब के बीच बढ़ते अंतर पर रिसर्च करने वाले थॉमस पिकेटी और इमैनुएल साएज पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के थॉमस पिकेटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के इमैनुएल साएज ने इस बात पर रिसर्च की है कि समाज की कुल कमाई और संपत्ति का कितना हिस्सा अमीर लोगों के पास जाता है। उनके काम से यह समझने में मदद मिलती है कि अमीर और गरीब के बीच आर्थिक अंतर कैसे बढ़ता है और समय के साथ कमाई का बंटवारा किस तरह बदलता है। उनकी रिसर्च ने दुनिया भर में आर्थिक असमानता पर चर्चा को बढ़ावा दिया है। 5. तकनीक और विदेशी व्यापार का नौकरियों पर असर बताने वाले डेविड ऑटोर मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के अर्थशास्त्री डेविड ऑटोर ने इस बात पर रिसर्च की है कि कंप्यूटर, नई तकनीक और दूसरे देशों से व्यापार बढ़ने का नौकरियों पर क्या असर पड़ता है। उन्होंने चीन के साथ बढ़ते व्यापार का भी अध्ययन किया है। उनकी रिसर्च से यह समझने में मदद मिलती है कि सस्ते विदेशी सामान के आने से कुछ उद्योगों और उनमें काम करने वाले लोगों पर क्या असर पड़ सकता है। उनका काम आज AI और ऑटोमेशन के कारण नौकरियों में होने वाले बदलावों को समझने में भी उपयोगी है। 6. बच्चों की सेहत का भविष्य पर असर बताने वाली जेनेट करी येल यूनिवर्सिटी की अर्थशास्त्री जेनेट करी ने बच्चों की सेहत और उनकी आर्थिक स्थिति के बीच संबंधों पर रिसर्च की है। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि बचपन में गरीबी, प्रदूषण और खराब स्वास्थ्य का असर बड़े होने के बाद भी कैसे बना रहता है। उनकी रिसर्च बताती है कि बचपन में खराब माहौल का असर आगे चलकर व्यक्ति की सेहत और कमाई पर पड़ सकता है। उनके काम से यह समझने में मदद मिलती है कि बच्चों को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं और बेहतर माहौल देना क्यों जरूरी है। अर्थशास्त्र का नोबेल बाकी पुरस्कारों से अलग है अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार अल्फ्रेड नोबेल की मूल वसीयत में शामिल नहीं था। स्वीडन के केंद्रीय बैंक ने 1968 में इसकी शुरुआत की थी। इसका आधिकारिक नाम ‘अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में आर्थिक विज्ञान में स्वेरिग्स रिक्सबैंक पुरस्कार’ है। यह पुरस्कार ऐसे शोध को सम्मान देता है, जिसने अर्थव्यवस्था को समझने या उससे जुड़े फैसले लेने के तरीकों में अहम योगदान दिया हो। विजेता चुनते समय यह भी देखा जाता है कि किसी शोध का लंबे समय में कितना असर पड़ा है। ———————- ये खबर भी पढ़ें…. भारतवंशी नवनीतम पिल्लै को शांति का नोबेल:ट्रम्प पर तंज, दोस्तों से कहा- आप और तालियां बजाओगे, तो शायद यह पुरस्कार बांट लूं कनाडा की लेखिका और कवयित्री ऐन कार्सन को 2026 का साहित्य नोबेल पुरस्कार दिया गया है। नोबेल समिति ने उन्हें ऐसी रचनाओं के लिए सम्मानित किया है, जिनमें उन्होंने पुराने यूनानी-रोमन साहित्य को आज की जिंदगी, प्यार, रिश्तों और दुख से जोड़ा। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Nobel Peace Prize 2026: भारतीय मूल की नावी पिल्लई को मिला शांति का नोबेल, जानें कौन हैं और क्यों चुनी गईं

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय न्याय के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाली  नावी पिल्लई  को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने का ऐलान किया गया है। नॉर्वे की नोबेल समिति ने शुक्रवार, 9 अक्टूबर को नवनेथम ‘नावी’ पिल्लई को शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों के लिए चुना। भारतीय तमिल मूल के परिवार में जन्मीं पिल्ले ने अपने करियर में भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम किया। उनका सफर इस बात की मिसाल है कि कानून के जरिए भी अन्याय के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ी जा सकती है।

रंगभेद के दौर में शुरू हुआ संघर्ष

नावी पिल्लई का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में एक भारतीय तमिल मूल के परिवार में हुआ था। उस समय देश में रंगभेद की व्यवस्था लागू थी, जिसमें नस्ल के आधार पर लोगों के अधिकार और अवसर तय होते थे। ऐसे माहौल में पिल्ले ने कानून का रास्ता चुना और वकील के रूप में उन लोगों के अधिकारों की पैरवी की, जिन्हें भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता था।

उनके करियर का एक अहम हिस्सा रंगभेद का विरोध करने वाले लोगों को कानूनी सहायता देना रहा। उन्होंने नेल्सन मंडेला और अन्य रंगभेद-विरोधी कार्यकर्ताओं के समर्थन में काम किया। आगे चलकर उनका योगदान दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय न्याय और मानवाधिकारों के क्षेत्र तक पहुंचा।

अंतरराष्ट्रीय न्याय और जवाबदेही पर जोर

नोबेल समिति के अनुसार, नवी पिल्ले ने अपने लंबे करियर में हिंसा और संघर्ष से प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने की दिशा में काम किया। उन्होंने सरकारों और राष्ट्रीय नेताओं को जवाबदेह ठहराने के प्रयास किए। उनके काम में अंतरराष्ट्रीय कानून के महत्व और मानवाधिकारों की रक्षा पर खास जोर रहा।

गाजा पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को लेकर भी चर्चा में रहीं

नावी पिल्लई संयुक्त राष्ट्र के उस जांच आयोग की अध्यक्ष भी रहीं, जिसने फिलिस्तीनी क्षेत्र में इजरायल की कार्रवाई की जांच की थी। आयोग ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला कि इजरायल ने गाजा में नरसंहार किया है। हालांकि, इजरायल ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए इसे ‘निंदनीय’ बताया था। इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक बहस को जन्म दिया।

कब मिलेगा नोबेल शांति पुरस्कार और कितनी है इनामी राशि?

नावी पिल्लई को यह सम्मान 10 दिसंबर 2026 को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में प्रदान किया जाएगा। यह तारीख स्वीडिश उद्योगपति अल्फ्रेड नोबेल की पुण्यतिथि है, जिन्होंने अपनी वसीयत के जरिए इन पुरस्कारों की शुरुआत की थी।

नोबेल शांति पुरस्कार के साथ 12 मिलियन स्वीडिश क्रोनर यानी लगभग 12 लाख अमेरिकी डॉलर की राशि दी जाती है।  नावी पिल्लई का चयन मानवाधिकारों, न्याय और अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र में उनके योगदान को वैश्विक पहचान देता है।

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आज मिलेगा शांति का नोबेल,ट्रम्प 7 साल से मांग रहे:कनाडा के PM दावेदार, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का नाम भी चर्चा में

2026 के नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान आज नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प करीब 7 साल से नोबेल मांग रहे हैं। उनके लिए नोबेल शांति पुरस्कार की चर्चा 2019 में तेज हुई थी। उस वक्त ट्रम्प ने उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन से बातचीत की थी। ट्रम्प के समर्थकों ने इसे दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की कोशिश बताया। जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने भी कथित तौर पर ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया था। इस बार ट्रम्प के साथ कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, पोप लियो XIV और यहां तक कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) का नाम भी चर्चा में है। नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में होगी। 2025 में की विजेता ने अपना नोबेल ट्रम्प को सौंपा पिछले साल भी ट्रम्प ने कई बार नोबेल देने की मांग की थी। उन्होंने भारत-पाकिस्तान समेत 8 युद्धों को रोकने का दावा किया। ट्रम्प खुद कई बार कह चुके हैं कि उन्होंने शांति के लिए काम किया है और उन्हें नोबेल मिलना चाहिए। 2025 का पुरस्कार वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो को मिला। बाद में मचाडो ने अपना नोबेल मेडल ट्रम्प को सौंप दिया। उन्होंने इसे वेनेजुएला की आजादी के लिए ट्रम्प के समर्थन के सम्मान के तौर पर बताया। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का नाम क्यों आया इस साल की नोबेल रेस में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का नाम सबसे अलग है। ISS पर अमेरिका, रूस, फ्रांस और कनाडा के अंतरिक्ष यात्री साथ काम करते हैं। धरती पर इन देशों के बीच राजनीतिक तनाव और मतभेद हैं, लेकिन अंतरिक्ष स्टेशन पर उनके वैज्ञानिक एक साथ काम करते हैं। ओस्लो पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक हाकोन जेरलोव ने इसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग का उदाहरण बताया है। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पृथ्वी से करीब 400 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में मौजूद है। यह करीब 28 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी का चक्कर लगाता है। सूडान का आम लोगों का नेटवर्क भी दावेदार सूडान के इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स (ईआरआर) का नाम भी प्रमुख दावेदारों में है। 2023 में सूडान में गृहयुद्ध शुरू होने के बाद विदेशी राहतकर्मी बड़ी संख्या में देश छोड़कर चले गए। इसके बाद स्थानीय लोगों ने खुद अपने इलाकों में राहत का काम संभाला। उन्होंने सामुदायिक रसोई और क्लिनिक चलाए। विदेश में रहने वाले सूडानी लोगों ने भी पैसे भेजकर इन अभियानों की मदद की। अंतरराष्ट्रीय सहायता कम होने के बावजूद यह नेटवर्क लोगों तक जरूरी मदद पहुंचाता रहा। शांति का नोबेल स्वीडन की बजाय नॉर्वे में क्यों? नोबेल के बाकी पुरस्कार स्वीडन में दिए जाते हैं, लेकिन शांति का नोबेल नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में दिया जाता है। इसकी वजह करीब 130 साल पुरानी है। यह व्यवस्था खुद अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी वसीयत में तय की थी। 1895 में लिखी अपनी वसीयत में नोबेल ने तय किया था कि शांति पुरस्कार का फैसला नॉर्वे की संसद द्वारा चुनी गई समिति करेगी। उस समय स्वीडन और नॉर्वे एक ही राजा के अधीन थे, हालांकि दोनों की अपनी संसद और अलग राजनीतिक व्यवस्था थी। नोबेल ने यह नहीं बताया था कि शांति पुरस्कार के लिए उन्होंने नॉर्वे को ही क्यों चुना।
नोबेल की 1896 में मौत हुई और 1901 से पुरस्कार दिए जाने लगे। उस समय स्वीडन और नॉर्वे एक संघ में थे। 1905 में दोनों देश अलग हो गए, लेकिन नोबेल की वसीयत में शांति पुरस्कार के लिए नॉर्वे को दी गई जिम्मेदारी जारी रही। इसी वजह से आज भी फिजिक्स, केमिस्ट्री, मेडिसिन, साहित्य और अर्थशास्त्र के नोबेल स्वीडन में, जबकि शांति का नोबेल नॉर्वे में दिया जाता है। ——————— ये खबर भी पढ़ें… 2026 का साहित्य नोबेल कनाडाई लेखिका ऐन कार्सन को:ग्रीक-रोमन साहित्य को आधुनिक दुनिया से जोड़ा, चर्चित किताब ‘द ब्यूटी ऑफ द हसबैंड’ कनाडा की लेखिका और कवयित्री ऐन कार्सन को 2026 का साहित्य नोबेल पुरस्कार दिया गया है। नोबेल समिति ने उन्हें ऐसी रचनाओं के लिए सम्मानित किया है, जिनमें उन्होंने पुराने यूनानी-रोमन साहित्य को आज की जिंदगी, प्यार, रिश्तों और दुख से जोड़ा। पूरी खबर यहां पढ़ें…

बच्चों को वसीयत में देनी चाहिए प्रॉपर्टी या जीवनकाल में कर देना चाहिए गिफ्ट? एक्सपर्ट से जानिए किसमें है ज्यादा फायदा

अपनी जीवनभर की कमाई और संपत्ति को बच्चों के नाम ट्रांसफर करना हर माता-पिता का एक बड़ा फैसला होता है। अक्सर विरासत या वसीयत से जुड़े फैसले माता-पिता के न रहने के बाद ही परिवार में चर्चा का विषय बनते हैं। लेकिन ऐसे में अक्सर प्रॉपर्टी को लेकर इसके दावेदारों, भाई-बहनों में विवाद और मतभेद पैदा होते भी हम देखते हैं। ऐसे में यह सवाल बहुत जरूरी हो जाता है कि क्या बच्चों को संपत्ति वसीयत के जरिए देनी चाहिए या अपने जीवनकाल में ही गिफ्ट (कर देनी चाहिए?

कानूनी और फाइनेंस एक्सपर्ट के मुताबिक अपने जीवनकाल में ही सरप्लस प्रॉपर्टी को गिफ्ट कर देना एक समझदारी भरा विकल्प हो सकता है। इससे माता-पिता अपने जीवनकाल में ही अपने इरादों को स्पष्ट कर सकते हैं, बच्चों की आशंकाओं को दूर कर सकते हैं और किसी भी मतभेद को समय रहते सुलझा सकते हैं।

…लेकिन सबसे पहले अपनी फाइनेंशियल सिक्यॉरिटी सुनिश्चित करें

अपने जीवनकाल में बच्चों को प्रॉपर्टी या धन गिफ्ट करने की योजना बनाते समय वरिष्ठ नागरिकों को सबसे पहले ये बुनियादी बात समझनी चाहिए कि देने से ज्यादा जरूरी उनके लिए ये सवाल है कि वो खुद के लिए कितना बचाकर रखें। एक्सपर्ट्स की साफ राय है कि माता-पिता को सबसे पहले अपना जीवनस्तर बनाए रखने, नियमित खर्चों को पूरा करने,भविष्य के स्वास्थ्य और इलाज संबंधी जरूरतों के लिए पर्याप्त फंड और प्रॉपर्टी अलग रख लेनी चाहिए। इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ होने वाले अचानक के खर्चों और इमर्जेंसी के लिए एक बफर रखना बेहद जरूरी है। ऐसा इसलिए ताकि संपत्ति गिफ्ट करने के बाद उन्हें फाइनेंशियली अपने बच्चों पर निर्भर न होना पड़े।

दिल्ली हाई कोर्ट की वकील विनीता सेजवाल का कहना है कि लाइफटाइम गिफ्टिंग प्लान की नींव गिफ्ट देने वाले के अपने वित्तीय भविष्य को सुरक्षित करने पर टिकी होती है। वरिष्ठ नागरिकों को अपने जीवनस्तर को बनाए रखने,नियमित खर्चों को पूरा करने और भविष्य की चिकित्सीय व स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए पर्याप्त धनराशि अलग रखनी चाहिए। साथ ही अप्रत्याशित परिस्थितियों के लिए पर्याप्त रिजर्व भी रखना चाहिए।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके लिए कोई तय मानक फॉर्मूला नहीं हो सकता। यह कैलकुलेशन वरिष्ठ नागरिक की आय, कुल संपत्ति, उनकी देनदारियों और वित्तीय जरूरतों पर निर्भर करती है। सिर्फ वही संपत्ति या धन बच्चों को गिफ्ट करने के लिए माना जाना चाहिए जो इन सभी जरूरतों को पूरा करने के बाद वास्तव में सरप्लस हो।

जीवनकाल में गिफ्ट देने से उत्तराधिकार क्यों आसान हो जाता है?

अपने जीवनकाल में संपत्ति ट्रांसफर करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि माता-पिता अपनी उपस्थिति में ही अपने फैसलों की वजह बता सकते हैं। यह बात तब और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जब बच्चों को अलग-अलग मूल्य या अलग-अलग प्रकार की संपत्तियां दी जा रही हों।

दिल्ली हाई कोर्ट की वकील गुडीपति गायत्री कश्यप के मुताबिक,’मौत के बाद पूरी संपत्ति को बंटवारे के लिए छोड़ने की तुलना में जीवनकाल में गिफ्ट देना उत्तराधिकार का एक बहुत अधिक प्रभावी तरीका हो सकता है। यह माता-पिता को अपने इरादों को स्पष्ट करने, बच्चों के बीच की चिंताओं को दूर करने और अपनी मौजूदगी में मतभेदों को सुलझाने का मौका देता है।”

अक्सर माता-पिता के निधन के बाद विवाद सिर्फ कानूनी हक तक सीमित नहीं रहते बल्कि इस बात पर भी बहस होती है कि माता-पिता की सेवा किसने ज्यादा की, उन्हें किसने पैसा ज्यादा दिया, या किसी एक बच्चे को ज्यादा तरजीह दी गई या नहीं। इसीलिए ट्रांसपेरेंसी बहुत जरूरी है। अगर माता-पिता असमान रूप से गिफ्ट दे रहे हैं तो उन्हें इसके पीछे के कारणों को स्पष्ट करना चाहिए। साथ ही यह गिफ्टिंग प्लान वसीयत सहित अन्य व्यापक उत्तराधिकार योजनाओं से मेल खाता होना चाहिए।

कैश, शेयर्स या प्रॉपर्टी: क्या गिफ्ट करना ज्यादा बेहतर?

जीवनकाल में संपत्ति देने के लिए कोई एक एसेट क्लास सबसे बेहतर नहीं कहा जा सकता। यह फैसला लिक्विडिटी की जरूरत, टैक्स के नियमों और इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वरिष्ठ नागरिक को खुद उस संपत्ति से आय या व्यक्तिगत उपयोग की जरूरत है या नहीं। कैश ट्रांसफर करने में सबसे आसान है और जिसे मिलता है उसे तुरंत लिक्विडिटी मिल जाती है। लिस्टेड शेयर्स और म्यूचुअल फंड को भी ट्रांसफर करना और इनके डॉक्युमंट्स तैयार करना आसान होता है। प्रॉपर्टी, जमीन और सोना की बात करें तो अगर आपका उद्देश्य ऐसी संपत्तियों को पास ऑन करना है जिनका मूल्य समय के साथ बढ़ता है तो इन्हें चुना जा सकता है।

हालांकि, अचल संपत्ति मामले में बेहद सावधानी बरतने की जरूरत होती है क्योंकि यह लिक्विड नहीं होती और न ही इसे आसानी से बांटा जा सकता है। इसके अलावा अचल संपत्ति के ट्रांसफर में वैल्युएशन, स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन का खर्च आता है।

गांधी लॉ एसोसिएट्स के पार्टनर राहिल पटेल कहते हैं कि वरिष्ठ नागरिकों को अपने जीवनकाल में धन या संपत्ति तभी ट्रांसफर करनी चाहिए जब वे अपने अपेक्षित रहने के खर्चों, स्वास्थ्य सेवा, आपात स्थितियों और दीर्घायु जोखिमों को आराम से पूरा करने के लिए पर्याप्त संपत्तियों को सुरक्षित कर लें। प्राथमिकता वित्तीय स्वतंत्रता होनी चाहिए, न कि संपत्ति देने के बाद बच्चों पर निर्भर हो जाना।

सही कानूनी डॉक्युमेंटेशन है बेहद जरूरी

जीवनकाल में दिए जाने वाले किसी भी गिफ्ट को महज एक अनौपचारिक पारिवारिक समझ नहीं मानना चाहिए। खासकर जब बड़ी संपत्ति शामिल हो, तो उसका सही डॉक्युमेंटेशन होना जरूरी है। राहिल पटेल के अनुसार, अचल संपत्ति (मकान, जमीन आदि) के मामले में एक रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड की जरूरत होती है। इसके लिए राज्य के नियमों के अनुसार स्टाम्प ड्यूटी और पंजीकरण शुल्क देना पड़ सकता है।

दस्तावेजीकरण तब और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है जब बच्चों के बीच संपत्ति का असमान रूप से बांटी जा रही हो। सही लिखापढ़ी न होने पर भविष्य में जबरदस्ती संपत्ति लेने, दबाव डालकर प्रॉपर्टी ट्रांसफर कराने जैसे आरोप लग सकते हैं और मामला विवादित हो सकता है।

जीवनकाल में संपत्ति गिफ्ट करने का मतलब यह नहीं है कि आप अपनी सारी धन-दौलत बांट दें। इसका सही उद्देश्य यह है कि जब माता-पिता खुद वित्तीय रूप से सुरक्षित हों और अपने इरादों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में सक्षम हों तब वे अपनी सरप्लस प्रॉपर्टी को प्लान बनाकर ट्रांसफर कर दें। जरूरत के हिसाब से फाइनेंशियल रिजर्व, ट्रांसपेरेंसी और सही लीगल डॉक्यूमेंटेशन के साथ किया गया ट्रांसफर अगली पीढ़ी को बिना किसी पारिवारिक कलह के प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने का एक सुरक्षित रास्ता बनाता है।

 

 

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