अब माता-पिता या दादा-दादी की जानकारी नहीं होगी जरूरी, EC ने 20 राज्यों में नए वोटर्स के लिए Form 6 का नियम बदला

अगर आप पहली बार वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाने जा रहे हैं, तो आपके लिए एक जरूरी अपडेट है। दरअसल, जिन 20 राज्यों में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) का काम पूरा हो चुका है, वहां नए वोटरों को अब वोटर लिस्ट में अपने माता-पिता के नाम या जानकारी देने की जरूरत नहीं होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि चुनाव आयोग ने ‘Form 6’ में बदलाव किया है, ताकि इन राज्यों में आवेदन करने वाले लोग माता-पिता और दादा-दादी की जानकारी मांगने वाले SIR से जुड़े अतिरिक्त घोषणा-पत्र (डिक्लेरेशन) के बिना ही फॉर्म जमा कर सकें। हालांकि, जिन राज्यों में SIR का काम अभी भी चल रहा है, वहां नए वोटरों को यह घोषणा-पत्र जमा करना जारी रखना होगा।

Form 6 में बदलाव का यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब कुछ दिन पहले चुनाव आयोग के तीन सदस्यों वाले पैनल के अंदर ही इस बदलाव को लेकर अंदरूनी विरोध की खबर सामने आई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस घोषणा को जोड़ने पर आपत्ति जताई थी। वहीं, ‘The Indian Express’ के पास मौजूद अंदरूनी रिकॉर्ड से पता चलता है कि उन्होंने ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ में संशोधन किए बिना इसे जोड़ने की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए थे।

हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR और Form 6 पर उसके फैसलों को तीनों कमिश्नरों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी। 26 सितंबर को जारी एक स्पष्टीकरण में, चुनाव आयोग ने कहा कि Form 6 के साथ लगे SIR डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया था और 1960 के नियमों के तहत तय फॉर्म का इस्तेमाल उन समयों में किया जाएगा जब SIR की प्रक्रिया नहीं चल रही होगी।

क्या बदला है?

पहले जब कोई व्यक्ति पहली बार वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करता था, तो उसे अपने माता-पिता या दादा-दादी का पिछली SIR वाली वोटर लिस्ट में दर्ज विवरण देने की जरूरत नहीं थी।

लेकिन SIR की प्रक्रिया के दौरान Form 6 में एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। इसके तहत नए आवेदकों से पुरानी वोटर लिस्ट से अपना संबंध साबित करने के लिए कुछ जानकारी मांगी जाती थी। इसमें माता-पिता या दादा-दादी से जुड़ी जानकारी भी शामिल थी।

अब जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां नए वोटरों को Form 6 भरते समय यह अतिरिक्त घोषणा देने की जरूरत नहीं होगी।

चुनाव आयोग ने कहा है कि बिहार और पश्चिम बंगाल समेत 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR का काम पूरा हो चुका है। युवा और पहली बार वोट देने वाले लोग, साथ ही वे लोग जिनके नाम SIR के दौरान या उसके बाद छूट गए थे, वे लगातार अपडेट होने वाली प्रक्रिया के जरिए नाम जुड़वाने के लिए अप्लाई कर सकते हैं।

जिन राज्यों में SIR चल रहा है, वहां क्या होगा?

जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया अभी भी चल रही है, वहां यह जरूरत बनी रहेगी।

इन इलाकों में नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करने वाले नए वोटरों को SIR से जुड़ा डिक्लेरेशन (घोषणा-पत्र) और Form 6 जमा करना होगा। इसमें पिछली वोटर लिस्ट से अपना संबंध साबित करने के लिए जरूरी जानकारी भी देनी होगी।

इससे SIR प्रक्रिया के दौरान वोटर का नाम जुड़वाने और SIR पूरा होने के बाद लगातार अपडेट होने की अवधि के दौरान नाम जुड़वाने के बीच अंतर हो जाता है।

चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR के दौरान या SIR के बाद के समय में, Form 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आयोग ने कहा, “Declaration Form एक अतिरिक्त दस्तावेज था जिसे उन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में मांगा गया था जहां 24 जून, 2025 के SIR आदेश के अनुसार SIR किया गया था। यह उस समय आयोग के सर्वसम्मत फैसले के अनुसार था। वहीं, 26 सितंबर, 2026 को जारी आयोग के प्रेस नोट के अनुसार, उन सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए जहां SIR पूरा हो चुका है और जहां यह अभी शुरू होना है, Declaration Form की कोई जरूरत नहीं होगी।”

इससे SIR प्रक्रिया के दौरान वोटर एनरोलमेंट और SIR पूरा होने के बाद लगातार अपडेट होने की अवधि के दौरान एनरोलमेंट के बीच अंतर पैदा होता है।

EC में मतभेद की वजह बना ‘Form 6’

CEC और दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेदों की खबरों में ‘Form 6’ से जुड़ा विवाद भी एक अहम मुद्दा था।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, संधू और जोशी की आपत्तियों के बावजूद ECINET पोर्टल पर अतिरिक्त घोषणा (डिक्लेरेशन) को शामिल किया गया था। दोनों आयुक्तों का तर्क था कि ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ में संशोधन किए बिना, प्रशासनिक या सॉफ्टवेयर बदलाव के जरिए कानूनी रूप से अनिवार्य ‘Form 6’ में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।

बता दें कि यह विवाद सिर्फ ‘Form 6’ तक ही सीमित नहीं था। खबरों के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने SIR प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दों पर आपत्तियां जताई थीं, जिनमें मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने, ECINET सिस्टम के कामकाज और वोटर लिस्ट के डेटा तक पहुंच जैसे मामले शामिल थे।

इसके बाद EC ने पॉलिसी-लेवल पर बंटवारे के सुझाव को खारिज कर दिया। EC का कहना था कि कई सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था के कामकाज में आपसी जांच-पड़ताल और अलग-अलग राय होना सामान्य बात है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

जानकारी के लिए बता दें कि Form 6 वह कानूनी आवेदन है जिसका इस्तेमाल योग्य नागरिक वोटर लिस्ट में अपना नाम शामिल करवाने के लिए करते हैं। SIR के दौरान इसमें जोड़ी गई अतिरिक्त घोषणा को लेकर इसलिए विवाद हुआ, क्योंकि पहली बार वोटर बनने वाले लोगों से पुरानी वोटर लिस्ट से जुड़े परिवार के सदस्यों की जानकारी मांगी जा रही थी।

वहीं, इस फैसले को वापस लेने का मतलब है कि किसी राज्य में SIR प्रक्रिया पूरी होने के बाद, आवेदकों को SIR से जुड़ी परिवार की अतिरिक्त जानकारी देने के बजाय सामान्य Form 6 प्रक्रिया का पालन करना होगा।

यह भी पढ़ें: कल का मौसम: 1 अक्टूबर को इन राज्यों में मूसलाधार! केरल, कर्नाटक से उत्तर-पूर्व तक भारी बारिश और आंधी का अलर्ट

विपक्ष की बैठक आज

नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में हुई गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों को लेकर हुए खुलासे के बाद विपक्षी पार्टियों की एक अहम बैठक बुधवार को होगी। विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की पार्टियों के नेताओं की यह बैठक दिल्ली में होगी। हालांकि बैठक से पहले विपक्ष का बिखराव भी साफ दिख गया है। कई पार्टियों के नेता इसमें नहीं शामिल हो रहे हैं।

पिछली बैठक की ही तरह इस बार भी डीएमके और आम आदमी पार्टी इस बैठक में नहीं शामिल होंगे। गौरतलब है कि इस बैठक के समन्वय का काम कांग्रेस पार्टी देख रही है और बताया जा रहा है कि उसने आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल को न्योता नहीं दिया। बहरहाल, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव भी बैठक में नहीं शामिल होंगे। यह भी कहा जा रहा है कि उनके चाचा रामगोपाल यादव भी बैठक से दूर रहेंगे और पार्टी की ओर से कोई अन्य नेता शामिल होगा। उद्धव ठाकरे भी बैठक के लिए दिल्ली नहीं आ रहे हैं। वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक में शामिल होंगे।

विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की पिछले तीन साल में यह आठवीं बैठक है। जून 2024 में लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद यह तीसरी बैठक है। लोकसभा के चुनाव नतीजों के तुरंत बाद एक बैठक हुई थी। उसके दो साल बाद आठ जून 2026 को बैठक हुई थी। उसमें एसआईआर और चुनाव आयोग को लेकर चर्चा हुई। उसमें तय हुआ था कि दो महीन बाद अगस्त में हैदराबाद में बैठक होगी। लेकिन वह बैठक नहीं हुई। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट के बाद ममता बनर्जी ने विपक्ष की बैठक बुलाने की पहल की।

बहरहाल, बैठक से एक दिन पहले मंगलवार को बताया गया कि अखिलेश यादव 30 सितंबर को लखनऊ में किसानों के सम्मेलन में शामिल होंगे। कहा जा रहा है कि उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से इस बारे में बात भी की है। हालांकि कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि अखिलेश राज्यसभा चुनाव के नामांकन से जुड़ी व्यस्तता के कारण नहीं आएंगे।

बैठक में कांग्रेस की ओर से मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी शामिल होंगे। तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी भी इसमें शामिल होंगे। राजद के तेजस्वी यादव, जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और सीपीएम के महासचिव एमए बेबी बैठक में शामिल होंगे। शरद पवार की पार्टी के भी बैठक में शामिल होने की खबर है। गौरतलब है कि पिछले दिनों एमए बेबी ने दिल्ली में अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की थी। लेकिन उन्होंने केजरीवाल को बैठक का न्योता नहीं दिया क्योंकि यह काम कांग्रेस को करना है।

महाराष्ट्र के चुनाव अधिकारी ने भी की है शिकायत

नई दिल्ली। चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट में बताया गया था कि मतदाता पंजीयन अधिकारी यानी ईआरओ से लेकर जिला निर्वाचन अधिकारी और मुख्य चुनाव अधिकारी तक को चुनाव आयोग के सेंट्रल डेटाबेस तक पूरी एक्सेस नहीं मिल रही थी। गोवा की घटना के हवाले यह खबर थी। अब महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी यानी सीईओ की चिट्ठी से भी इसकी पुष्टि होती है।

महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी एस चोकलिंगम का 24 सितंबर को लिखी एक चिट्ठी सामने आई है। चोकलिंगम ने इसमें वोटर रिकॉर्ड की गड़बड़ियों से जुड़े मामलों में ईआरओ को ज्यादा अधिकार देने और सॉफ्टवेयर में चार बदलाव की मांग की है। उनका कहना है कि किसी वोटर के रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिलने पर हर मामले में एक जैसी प्रक्रिया लागू नहीं होनी चाहिए। उनके हिसाब से ईआरओ को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि किस वोटर को सुनवाई के लिए बुलाना है, कौन से दस्तावेज लेने हैं और किन मामलों को अपने स्तर पर निपटाया जा सकता है।

गौरतलब है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों पर लिखित आपत्ति जताई थी। बहरहाल, महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी ने अपनी चिट्ठी में खासतौर से उन मामलों का जिक्र किया, जिनमें रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिलने के बाद मतदाताओं को नोटिस दिया जाता है। उनका कहना है कि बुजुर्गों, दिव्यांगों और दूसरे कमजोर वर्गों के लोगों को हर मामले में व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उन्होंने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि सॉफ्टवेयर में ईआरओ को मामले के हिसाब से फैसला लेने का विकल्प मिलना चाहिए। हालांकि विवाद के बीच 26 सितंबर को दिल्ली में चुनाव आयोग की बैठक हुई, जिसमें कई नियमों में बदलाव किया गया।

उद्धव और राज ठाकरे करेंगे प्रदर्शन

मुंबई। मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानियों और एसआईआर में गड़बड़ी के खिलाफ महाराष्ट्र में रविवार, चार अक्टूबर को एक बड़ा प्रदर्शन होगा। पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने मंगलवार को साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसका ऐलान किया। चुनाव आयोग के खिलाफ यह प्रदर्शन रविवार को भायखाला से शुरू होगा और बीएमसी मुख्यालय तक जाएगा। उद्धव ठाकरे की शिव सेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने बताया है कि इस प्रदर्शन की तैयारियों के कारण उद्धव बुधवार को ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली नहीं जा रहे हैं। वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक से जुड़ेंगे।

ज्ञानेश और एसआईआर पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मनमाने कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को अवैध घोषित करने के लिए दायर की गई याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गया है। सर्वोच्च अदालत ने अगले हफ्ते इस पर सुनवाई का फैसला किया है। इससे पहले मंगलवार को यह याचिका पेश की गई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने इस मामले में जल्दी सुनवाई की अपील की और कहा कि चुनाव आयोग में मनमाने फैसले से संवैधानिक सवाल खड़े हो रहे है। इस याचिका में देश भर में हुए एसआईआर को अवैध घोषित करने की मांग भी की गई है।

गौरतलब है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने पिछले दिनों एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार मनमाने तरीके से फैसले कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में 14 बार आयोग के फैसले पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इस रिपोर्ट के बाद पूर्ण आयोग की एक बैठक हुई, जिसमें कई चीजों को ठीक करने का फैसला हुआ।

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने मंगलवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच के सामने इस मामले का जिक्र किया और जल्दी सुनवाई की मांग की। विकास सिंह ने कहा कि बहुसदस्यीय आयोग का अर्थ ही है कि आयोग में फैसला या तो आम सहमति से हो या बहुमत से हो।

विकास सिंह ने कहा कि अगर एसआईआर का फैसला बहुमत से या एकमत से नहीं हुआ है तो फिर यह आयोग का फैसला कैसे माना जाएगा। इसे गंभीर संवैधानिक संकट बताते हुए उन्होंने जल्दी सुनवाई की अपील की, जिस पर चीफ जस्टिस ने इसे अगले हफ्ते के लिए सूचीबद्ध करने को कहा।

चुनाव आयोग के काम भी तो ऐसे हैं!

जब से ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने चुनाव आयोग के अंदर की खींचतान और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों की खबर छापी है तब से एक बड़ी जमात ऐसी है, जिसको संवैधानिक संस्था की साख की चिंता सताने लगी है। लेकिन सवाल है कि क्या किसी अखबार ने या किसी विपक्षी राजनीतिक दल ने चुनाव आयोग या किसी अन्य संवैधानिक संस्था की साख खराब की है? चुनाव आयोग ने अपनी साख तो खुद ही खराब की है। उसके काम ऐसे हैं, जिनसे उसकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। यह सिर्फ एसआईआर का मामला नहीं है। चाहे आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में कार्रवाई करने का मामला हो या दलबदल के मामले में फैसला देना हो या चुनाव चिन्ह आवंटित करना हो, सबमें चुनाव आयोगी की पक्षधरता भाजपा के साथ दिखाई देती है। इसलिए उसकी साख पर चौतरफा सवाल खड़े हो रहे हैं।

ताजा मामला पश्चिम बंगाल का है, जहां कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है कि वह ‘फेडअप’ हो गया चुनाव आयोग के रवैए से। सोचें, ऐसा क्या काम कर दिया चुनाव आयोग ने कि हाई कोर्ट के कहना पड़ा कि ‘फेडअप’ हो गए! असल में पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहा है। नंदीग्राम और रेजीनगर में। भाजपा को पता है कि रेजीनगर जीतना संभव नहीं है इसलिए सारी ताकत नंदीग्राम पर है, जो मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की पारंपरिक सीट है। इस सीट से नामांकन की प्रक्रिया खत्म होने से पहले चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिन्ह फ्रीज कर दिया और दोनों ध़ड़ों यानी ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के खेमे को अलग अलग चुनाव चिन्ह आवंटित किया। ममता बनर्जी खेमे को फुटबॉल खेलता हुआ खिलाड़ी और ऋतब्रत बनर्जी को लिफाफा चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया। इसी मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग पर टिप्पणी की। असल में लिफाफा चुनाव चिन्ह पहले से इंडियन सेकुलर फ्रंट यानी आईएसएफ को मिला हुआ है। उसी ने चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी।

अब सोचें, एक पार्टी प्रदेश में हैं, जिसने पिछली बार कांग्रेस और लेफ्ट से अलायंस करके चुनाव लड़ा था और उस पार्टी के एक विधायक भी हैं, नौशाद सिद्दीकी। उस पार्टी को लिफाफा चुनाव चिन्ह मिला हुआ है। चुनाव आयोग ने वही चिन्ह ममता बनर्जी की पार्टी से दलबदल करके अलग गुट बनाने वाले ऋतब्रत बनर्जी की पार्टी को आवंटित कर दिया। इसका सीधा मकसद यह है कि नंदीग्राम में मतदाता कंफ्यूज हों और थोड़े से ही सही लेकिन मुस्लिम मतदाता लिफाफा देख कर ऋतब्रत बनर्जी को वोट कर दें। इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। सोचें, पहले ममता बनर्जी की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे से मुख्यमंत्री ने खुद मुलाकात की और उनको मैदान से हटाया। फिर जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन दिया तो उनको पुलिस ने 20 साल पुराने मामले में गिरफ्तार कर लिया और फिर चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के एक गुट को लिफाफा चुनाव चिन्ह दे दिया। सोचें, एक उपचुनाव जीतने के लिए क्या क्या किया जा रहा है! बहरहाल, इस मामले की सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई और तीखी टिप्पणी की। जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि वे थक गए हैं चुनाव आयोग के इस रवैए से। जैसे ही कोई चुनाव आता है आयोग विवाद खड़ा करने वाला फैसला कर देता है। अदालत ने कहा कि 189 संभावित चुनाव चिन्ह थे, जिसमें से आयोग ने चुन कर लिफाफा चुनाव चिन्ह ऋतब्रत बनर्जी को दे दिया। हाई कोर्ट की इस टिप्पणी आयोग के पक्षपात का एक पुख्ता सबूत है।

रवैया जब टच एंड गो का है तब साथ आ कर भी विपक्ष कैसे आंदोलन ख़ड़ा करेगा?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों के खिलाफ विपक्षी पार्टियों की बैठक 30 सितंबर को दिल्ली में हो रही है। मई में भी विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की एक बैठक दिल्ली में हुई थी। तब जिन पार्टियों ने उससे दूरी बनाई थी वे भी इस बार की बैठक में शामिल हो रही हैं। इससे पार्टियों की गंभीरता का अहसास हो रहा है। लेकिन क्या सिर्फ एक साथ आकर बैठक कर लेना पर्याप्त होगा? देश के सामने जो अभूतपूर्व संकट दिख रहें हैं उससे निपटने के लिए पार्टियों की साझा बैठक या नेताओं के बेहद आक्रामक बयान या सोशल मीडिया का अभियान पर्याप्त नहीं है।

पार्टियों को संकट की व्यापकता को समझना होगा और मुकाबले के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे। सबसे पहले तो ‘इंडिया’ ब्लॉक को ही औपचारिक रूप देना होगा। 2023 में शरद पवार के घर पर हुई बैठक के बाद से ही इसका इंतजार हो रहा है कि इसका एक संयोजक होगा और एक सचिवालय बनेगा। लेकिन अभी तक ये दोनों काम नहीं हुए। जून 2024 में चुनाव हारने के बाद तो दो साल तक इसकी बैठक भी नहीं हुई।

ऐसा नहीं है कि विपक्षी पार्टियों को कोई चैरिटी का काम करना है। संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के अभियान ने ही 2024 के चुनाव में कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों को राजनीतिक सफलता दिलाई थी। इसलिए अगर पार्टियां गंभीरता से एसआईआर की गड़बड़ियों को पकड़ती हैं, उन्हें जनता के बीच ले जाती हैं, चुनाव आय़ोग और सरकार को कठघरे में खड़ा करती हैं तो उनको इसका राजनीतिक लाभ भी मिलेगा। एक समय था जब विपक्ष मुद्दों की तलाश करता था और उन पर आंदोलन करके सरकार को जवाबदेह बनाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है।

यह बहुत दिलचस्प है कि इन दिनों आम लोग सरकार की कमियां खोज रहे हैं। नीट पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी का खुलासा छात्रों ने किया। उन्होंने न सिर्फ पेपर लीक का पता लगाया, बल्कि परीक्षा कराने का ठेका ब्लैकलिस्टेड कंपनी को दिए जाने का खुलासा भी छात्रों ने किया। पहली बार अगर नरेंद्र मोदी सरकार के किसी मंत्री का इस्तीफा हुआ तो वह छात्रों के आंदोलन और उनके दबाव में हुआ। नीट पेपर लीक का खुलासा करने से लेकर ब्लैकलिस्टेड कंपनी को परीक्षा का ठेका देने के लिए बार बार टेंडर बदलने का खुलासा सार्थक सिद्धांत और निसर्ग अधिकारी जैसे युवा छात्रों ने किया।

इसी तरह इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियों के इंजन खराब होने का मुद्दा कुछ यूट्यूबर्स और इन्फ्लूएंसर्स ने उठाया। मनीष कश्यप ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया। आम लोगों से जुड़े इस मुद्दे पर भी सरकार बैकफुट पर आई। इसी तरह यूपीआई पर शुल्क लगाने के सरकार के फैसले के खिलाफ व्यापारी लड़ रहे हैं और आम लोग सोशल मीडिया में माहौल बना रहे हैं। ऐसे ही राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का खुलासा मंदिर के ही एक कर्मचारी ने किया। इन सारे मुद्दों पर गहराई से काम करने की जरुरत थी। लेकिन विपक्ष ने सिर्फ संसद सत्र में इन मुद्दों को उठाया।

असल में विपक्ष का रवैया टच एंड गो का है। वह हर मुद्दे को छूकर आगे बढ़ जा रहा है। जबकि इतिहास गवाह है कि किसी भी मुद्दे पर सरकार को जिम्मेदार ठहराने और सत्ता विरोधी माहौल बनाने के लिए सतत चलने वाले प्रयास की जरुरत होती है। उस पर गंभीरता से शोध करना होता है, उसके हर आयाम को समझना और जनता को समझाना होता है। बोफोर्स का मामला निरंतर दो साल से ज्यादा चला था तब जाकर राजीव गांधी की सरकार के खिलाफ माहौल बना। भ्रष्टाचार का आंदोलन लगातार तीन साल चला तब लोगों की दिलदिमाग में मनमोहन सिंह की सरकार को पलट देने और कांग्रेस को सजा देने की भावना बनी। यहां कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां समझ रही हैं कि वे संसद में मुद्दा उठा देंगी, संसद परिसर में हंगामा कर देंगी या एक साझा बैठक कर लेंगी या कोई प्रेजेंटेशन हो जाएगा तो उससे सरकार के खिलाफ माहौल बन जाएगा तो ऐसा नहीं होने वाला है। यह सरकार पहले की सरकारों की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वाली नहीं है। वह लगातार आरोपों को काउंटर करती है और नए नैरेटिव पैदा करती है।

इसलिए विपक्ष अगर चाहता है कि एसआईआर की गड़बड़ियों या चुनाव आयोग की मनमानियों पर देश में एक राजनीतिक माहौल बने तो उसके प्रयासों में निरंतरता दिखनी चाहिए। बारीकी से इस पर काम करके लोगों के सामने एक एक तथ्य रखना चाहिए। सिर्फ मोटामोटी यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि ज्ञानेश कुमार ने मनमानी की, 13 करोड़ लोगों के नाम काट दिए या जिला व प्रदेश के चुनाव अधिकारियों को सेंट्रल डेटाबेस का एक्सेस नहीं दिया। विपक्ष को इसकी तह में जाना होगा।

अभी ऐसा लग रहा है कि पार्टियां ऊपर ऊपर मामले को देख रही हैं। उनके प्रयास में निरंतरता भी नहीं है। राहुल गांधी ने पिछले साल सितंबर में कर्नाटक की आलंद विधानसभा सीट को लेकर खुलासा किया था। उन्होंने 6,018 वोट काटे जाने का दावा किया था और कहा था कि कर्नाटक के बाहर से मोबाइल नंबर से नाम कटवाने के आवेदन भेजे गए और नाम कटे। उन्होंने सूर्यकांत नाम के एक व्यक्ति को मंच पर पेश किया। सूर्यकांत ने बताया कि उन्होंने किसी का नाम काटने का आवेदन नहीं दिया लेकिन उनके नाम से आवेदन करके 14 मिनट में 12 नाम कटवाए गए। राहुल गांधी ने महाराष्ट्र को लेकर भी इस तरह के दावे किए। लेकिन उसके बाद सन्नाटा हो गया।

यह बहुत बड़ी बात है कि किसी भी व्यक्ति के नाम या फोन नंबर का इस्तेमाल करके दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के नाम काटे जा रहे हैं या काटे जा सकते हैं। अभी चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि पश्चिम बंगाल में न्यायाधिकरणों के सामने 38 लाख आवेदन लंबित हैं, जिनमें से 22 लाख आवेदन नाम जोड़ने के हैं और 16 लाख आवेदन नाम काटने के हैं। क्या यह विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं है कि वह पता लगाए कि ये 16 लाख लोग कौन हैं, जो अपना नाम कटवाना चाहते हैं? पिछले दिनों बंगाल के माल्दा और मुर्शिदाबाद दोनों जगह से खबर आई थी कि थोक में फॉर्म सात भर कर लोगों के नाम कटवाने की कोशिश की गई।

कई जगह जागरूक बीएलओ ने इसे रोका भी। दिल्ली में 47 लाख यानी एक तिहाई मतदाताओं के नाम कट गए। इनमें 43 लाख लोगों के नाम इस आधार पर कटे हैं कि वे स्थायी रूप से शिफ्ट हो गए हैं। सोचें, इतनी बड़ी संख्या में दिल्ली से शिफ्ट होकर लोग कहां जा रहे हैं? अब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि धीरे धीरे सेंट्रल डेटाबेस के एक्सेस को सेंट्रलाइज किया जा रहा है और ईआरओ, डीईओ और सीईओ को संपूर्ण व बिना शर्त एक्सेस नहीं मिल रही है। अगर इस खुलासे को कर्नाटक, बंगाल या दिल्ली की खबरों से मिला कर देखें तो यह संभव है कि योजनाबद्ध तरीके से मतदाताओं की प्रोफाइलिंग करके उनके नाम काटे जाने का बड़ा खुलासा हो।

साझा बैठक करने या आंदोलन करके ऑप्टिक्स बनाने से पहले कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को बारीकी से तमाम गड़बड़ियों पर काम करने की जरुरत है। यह समय लेने और थका देने वाला काम है। लेकिन कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के पास संसाधन की कमी नहीं है। अगर उनको लग रहा है कि एसआईआर के जरिए बहुत बड़ी कोई गड़बड़ी हो रही है तो उन्हें इसका खुलासा करने के लिए बड़े पैमाने पर ही काम करना होगा। अमेरिका के वाटरगेट स्कैंडल से लेकर भारत के बोफोर्स घोटाले तक जितने बड़े मामले खुले हैं उनमें लोगों को खपना पड़ा है। ऊपर ऊपर मुद्दे को छू देने और उस पर बयान देने से सरकार न तो जवाबदेह बनेगी और न आम जनता इसे गंभीरता से लेगी। जनता को यह दिखाना होगा कि विपक्ष या योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे सिविल सोसायटी के लोग क्या लेकर सरकार से लड़ रहे हैं। इस पर कल विचार करेंग। (जारी)

ज्ञानेश के खिलाफ 10 राज्यों में प्रदर्शन

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस के प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। सोमवार को कांग्रेस पार्टी ने देश के 10 राज्यों में प्रदर्शन किया। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने आगरा में ज्ञानेश कुमार के घर पर जाकर प्रदर्शन किया, उनके घर पर कालिख पोत दी और दीवार पर लिख दिया, ‘ज्ञानेश कुमार गद्दार, वोट चोर’। राजधानी दिल्ली में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किया। इससे पहले कांग्रेस ने 25 सितंबर को देश के सभी राज्यों की राजधानियों में प्रदर्शन और विरोध मार्च किया था।

सोमवार, 28 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, गुजरात, दिल्ली और केरलम में प्रदर्शन किया। राजस्थान के जयपुर में कांग्रेस के सारे दिग्गज नेता विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्हें रोकने के लिए पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। विरोध में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा भी शामिल थे।

गौरतलब है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के खुलासे के बाद कांग्रेस पार्टी दावा कर रही है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में गड़बड़ी के आरोपों की पुष्टि हो गई है। इसे लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग हो रही है। उत्तर प्रदेश में सोमवार को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कई जगह प्रदर्शन किए। राजधानी लखनऊ में चुनाव आयोग का कार्यालय घेरने जा रहे कार्यकर्ताओं की पुलिस से धक्का मुक्की हुई तो वाराणसी में ज्ञानेश कुमार को पोस्टर को जूतों से पीटा गया। पूर्वांचल के गोरखपुर लेकर पश्चिमी यूपी के सहारनपुर और मुरादाबाद में भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं की पुलिस से भिड़ंत हुई।

गौरतलब है कि पिछले दिनों ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक खोजी रिपोर्ट छपी थी, जिसमें दावा किया गया था कि पिछले 10 महीनों में 14 बार दोनों चुनाव आयुक्तों ने आयोग के फैसलों पर आपत्ति जताई लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनकी अदेखी की। बहरहाल, सोमवार को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मध्य प्रदेश में भी जोरदार विरोध किया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में कार्यकर्ता मुख्य चुनाव अधिकारी कार्यालय का घेराव करने पहुंचे हैं। इस दौरान पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच धक्कामुक्की हुई। कई कार्यकर्ता बैरिकेड्स पर भी चढ़ गए। इसी तरह का प्रदर्शन दूसरे राज्यों में भी हुआ।

चार महीने में सुलझाएं तृणमूल विवाद

नई दिल्ली। राजनीतिक दलों में विभाजन को लेकर संभवतः पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के सामने एक समय सीमा रखी है। सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग से कहा है कि तृणमूल कांग्रेस में विभाजन और उनके नाम व चुनाव चिन्ह पर दावेदारी से जुड़े विवाद को चुनाव आयोग चार महीने में सुलझाए। सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों को एक महीने में अपनी दलीलें पूरी करने और इसके बाद चुनाव आयोग को तीन महीने में फैसला देने का निर्देश दिया है। यानी पूरी प्रक्रिया तार महीने में पूरी करनी होगी।

इससे पहले सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने विवाद को सुलझाने के लिए छह महीने का समय देने की अपील की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। गौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक ममता बनर्जी ने यह याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समय सीमा तय की। असल में चुनाव आयोग ने एक अंतरिम फैसले में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल रोक दिया गया था। पश्चिम बंगाल की दो सीटों पर हो रहे उपचुनाव में चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को अलग अलग नाम और अलग चुनाव चिन्ह आवंटित किए हैं।

गौरतलब है कि शिव सेना के नाम और चुनाव चिन्ह से जुड़ा विवाद करीब चार साल से लंबित है, जबकि एनसीपी का मामला भी तीन साल से पेंडिंग है। दोनों मामलों में अलग अलग गुटों ने पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा किया है। बहरहाल, सोमवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को सुझाव दिया है कि वह तृणमूल कांग्रेस के विवाद को जल्दी सुलझाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करें। कोर्ट ने कहा कि इन आधुनिक तकनीकों की मदद से जटिल कानूनी दस्तावेजों को पढ़ने और समझने का काम बहुत तेजी से हो सकता है।

कब तक रहेंगे ज्ञानेश, लोकसभा चुनाव कौन कराएगा?

यह लाख टके का सवाल है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार कब तक अपने पद पर बने रहेंगे? वे पिछले साल जनवरी में मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए थे और किसी बाहरी कारण से नहीं हटे या हटाए गए तो जनवरी 2029 तक पद पर रहेंगे। यानी लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले वे रिटायर हो जाएंगे। गौरतलब है कि चुनाव आयोग में नियुक्ति के नियमों के मुताबिक आय़ुक्त नियुक्ति की तारीख से छह साल तक या 65 साल की उम्र तक पद पर रह सकते हैं। इनमें जो पहले पूरा होगा उस दिन रिटायर होना होगा। ज्ञानेश कुमार जनवरी 2029 में 65 साल के हो जाएंगे। लोकसभा चुनाव की अधिसूचना मार्च में जारी होगी। इसका अर्थ है कि अगर ज्ञानेश कुमार अपना कार्यकाल पूरा करते हैं तब भी लोकसभा चुनाव नया आयुक्त कराएगा। केंद्र सरकार उनको सेवा विस्तार भी नहीं दे सकती है क्योंकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि सीबीआई, ईडी के निदेशकों को भी पांच साल तक सेवा विस्तार देने का कोई कानून नहीं था लेकिन सरकार ने कानून बना दिया और चहेते लोगों को लंबे समय तक पद पर रखना शुरू कर दिया है।

बहरहाल, सवाल यह है कि ज्ञानेश कुमार कार्यकाल पूरा करेंगे या बीच में रिटायर कराए जाएंगे? जितनी बदनामी उनकी हो गई है और उस हिसाब से को उनको खुद ही पद छोड़ देना चाहिए लेकिन वे इतने नैतिक मूल्यों वाले होते तो इतना विवाद ही क्यों होता? जानकार सूत्रों के मुताबिक अब दोनों चुनाव आयुक्तों के साथ ज्ञानेश कुमार की बैठक हो गई है और कई एसआईआर से जुड़े नियमों में कई बड़े बदलाव कर दिए गए हैं। इसलिए ज्ञानेश कुमार को नहीं हटाया जाएगा। लेकिन सूत्रों की इस बात को अंतिम नहीं माना जा सकता है। उनके खिलाफ विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक आंदोलन करेगा और कॉकरोच जनता पार्टी भी सड़कों पर उतरेगी। ऐसे में उनको बनाए रखना मुश्किल होगा। अगले चक्र का चुनाव शुरू होने तक अगर उनको नहीं हटाया जाता है तो उनकी देखरेख में होने वाले चुनाव की विश्वसनीयता बहुत खराब होगी।

केंद्र सरकार उनको हटा दे और बाहर से किसी को लाकर सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं नियुक्त करे तब तो सुखबीर सिंह संधू मुख्य चुनाव आयुक्त बनेंगे। अन्यथा वे नहीं बन पाएंगे। अगर किसी तरह से बन भी गए तो लोकसभा चुनाव नहीं करा पाएंगे क्योंकि उनकी उम्र 63 साल हो गई है और वे जुलाई 2028 में रिटायर हो जाएंगे। ज्ञानेश कुमार की मनमानियों पर सवाल उठाने वाले दूसरे चुनाव आयुक्त विवेक जोशी का कार्यकाल बचा हुआ है। वे फरवरी 2031 तक पद पर रहेंगे। अगर कोई बड़ी उलटफेर नहीं हुई तो वे अगले लोकसभा चुनाव से पहले, जनवरी 2029 में ज्ञानेश कुमार के रिटायर होने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त बन जाएंगे। अगर ज्ञानेश कुमार की मनमानियों पर सवाल उठाने वाला और दबाव डाल कर एसआईआर में चीजें ठीक कराने वाला चुनाव आयुक्त अगर मुख्य चुनाव आयुक्त बनता है तो निश्चित रूप से चुनाव की विश्वसनीयता बनेगी। विपक्ष भी इसका विरोध नहीं कर पाएगा और न सवाल उठा पाएगा। यह अलग बात है कि चाहे एसएस संधू हों या विवेक जोशी दोनों भाजपा की राज्य सरकारों और मोदी सरकार में अच्छे पदों पर काम करने के बाद ही चुनाव आयोग में पहुंचे हैं। इसलिए किसी से भी टीएन शेषन या जेएम लिंगदोह जैसे कामकाज की उम्मीदग नहीं करनी चाहिए।