ज्ञानेश के खिलाफ महुआ ने दर्ज कराई शिकायत

नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने एक कदम आगे बढ़ कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज करा दी है। महुआ ने दिल्ली के संसद मार्ग थाने में ज्ञानेश के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूची में नियमों के खिलाफ बदलाव किए गए और पात्र मतदाताओं के नाम हटाए गए।

इस शिकायत में मुख्य रूप से चार आरोप लगाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि चुनाव आयोग की मंजूरी के बिना उसके नाम से पत्र या संदेश जारी किया गया है। इसमें यह भी आरोप है कि वीआईपी और प्रमुख लोगों के नाम मतदाता सूची में बनाए रखने के लिए अनौपचारिक निर्देश दिए गए। महुआ ने शिकायत में कहा है कि ऐसे मतदाताओं के खिलाफ भी अपील की गई, जिन्हें मतदाता सूची में शामिल करने का आदेश अदालतों ने दिया था। चौथा आरोप राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों को मतदाता सूची तक पूरी पहुंच नहीं देने की है।

उन्होंने शिकायत की कॉपी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर करते हुए ज्ञानेश कुमार को चोर कहा और यह भी कहा कि वे मनमाना काम करने वाले एक अधिकारी हैं, जिन्होंने बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना काम किया। गौरतलब है कि इस शिकायत से एक दिन पहले अंग्रेजी के एक अखबार ने ज्ञानेश कुमार के मनमाने तरीके से काम करने को लेकर एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

राहुल ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर गुरुवार को केंद्र सरकार तथा चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाये और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग की।

श्री गांधी ने आज यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि वोट की रक्षा करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है, लेकिन वोट चोरी से लाेकतंत्र और नागरिकों के अधिकारों का हनन हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित विभिन्न चुनावों में हेराफेरी की गयी है। उन्होंने कहा मैं 50 साल से भारतीय राजनीति देख रहा हूं और सत्ता विरोधी लहर भारतीय राजनीति का सच है। आज वोट को खत्म किया जा रहा है।विधानसभा और लोकसभा चुनावों में धांधली की गयी तथा वोट चोरी के जरिए चुने गये सांसद कानून बना रहे हैं।

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कांग्रेस नेता ने कहा कि आज दो चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाये हैं और श्री कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की पसंद से हुई है। उन्होंने 2023 में चुनाव आयोग की नियुक्ति से संबंधित कानून का भी उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने चयन समिति में इसका विरोध किया था।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य चुनाव आयुक्त के “रक्षक” हैं। उन्होंने श्री शाह का एक वीडियो भी दिखाया और कहा कि भाजपा लंबे समय से चुनावों में अपनी जीत का दावा करती रही है। उन्होंने जोर दिया कि चुनावी व्यवस्था में मौजूदा स्थिति के लिए श्री कुमार जिम्मेदार हैं और उनकी मांग है कि वह तत्काल इस्तीफा दें। उन्होंने कहा हम भारत में लोकतंत्र को खत्म नहीं होने देंगे। आज नहीं तो कल इन लोगों को सजा मिलेगी।

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ज्ञानेश की तानाशाही किसके कहने पर?

भारत का चुनाव आयोग कई बरसों से कई कारणों से निशाने पर है। पिछले साल जून में जब बिहार में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का अभियान शुरू किया तब से लेकर अब तक वह एसआईआर में मनमाने तरीके से नाम काटने, नए नाम जोड़ने, नाम हटाने के फैसले की समीक्षा करने जैसे कई मामलों को लेकर ज्यादा निशाने पर है। अब अंग्रेजी के अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें चुनाव आयोग में चल रही कई तरह की गड़बड़ियों और मनमानियों का खुलासा किया है। बुधवार, 23 सितंबर को प्रकाशित इस जांच रिपोर्ट की पहली कड़ी में जो खुलासे हुए हैं वो हैरान करने वाले हैं। इसके हिसाब से साफ दिख रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार आयोग में तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं। हर काम में उनकी मनमानी चल रही है। यहां तक की बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों एसएस संधु और विवेक जोशी को पता भी नहीं होता है कि आयोग में क्या फैसले हो रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 महीने में दोनों चुनाव आयुक्तों संधु और जोशी ने 14 बार अलग अलग मुद्दों पर अपनी आपत्ति जताई है या सवाल उठाया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि एक दिन तो चार बार दोनों आय़ुक्तों ने सवाल उठाए। कई बार उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे चिट्ठी लिखी और कई बार उनके साथ काम करने वाले उप चुनाव आयुक्तों को चिट्ठी लिखी लेकिन वह चिट्ठी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को मार्क की गई। लेकिन किसी भी चिट्ठी का न कोई प्रत्युत्तर मिला और न कोई कार्रवाई हुई। रिपोर्ट में बताया गया है कि थक हार कर दोनों आयुक्तों ने कई बड़ी गड़बड़ियों की जानकारी देश के सबसे बड़े अधिकारी यानी कैबिनेट सचिव को भी दी। शिकायतें सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त के मनमाने तरीके से काम करने के नहीं हैं, बल्कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई कामों को गैरकानूनी भी बताया है। इस पूरे मामले में चुनाव आयोग की ओर से सिर्फ यह सफाई आई है कि सारे फैसले एक राय से किए गए हैं।

बहरहाल, अब ऐसा नहीं हो सकता है कि कैबिनेट सचिव की ओर से उस शिकायत पर मुख्य चुनाव आयुक्त से कुछ नहीं हो पूछा गया हो या आगे इन शिकायतों की खबर प्रधानमंत्री कार्यालय तक नहीं पहुंची हो। लेकिन इसके बावजूद कोई सुनवाई नहीं हुई। ध्यान रहे दोनों चुनाव आयुक्त 1988 और 1989 बैच के सीनियर आईएएस अधिकारी हैं। संधु उत्तराखंड के मुख्य सचिव रहे हैं और जोशी हरियाणा के मुख्य सचिव रहे हैं। दोनों को भारत सरकार के साथ काम करने का अनुभव है। इसलिए दोनों अधिकारी जानते हैं कि केंद्र सरकार में कैसे कामकाज होता है। लेकिन उनके लिए भी हैरानी की बात है कि ज्ञानेश कुमार की मनमानी के मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानियों का ही जिक्र नहीं है, बल्कि उनकी टीम के दूसरे सदस्यों की मनमानी का भी जिक्र है। डीजी आईटी सीमा खन्ना और उनकी टीम किस तरह से काम कर रही है उसके बारे में भी दोनों आयुक्तों ने शिकायत की है। उनकी शिकायत तो कैबिनेट सचिव तक पहुंची थी। फिर भी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई होने की जानकारी नहीं है।

तो कैबिनेट सचिव किसके अधीन?

मुख्य चुनाव आय़ुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों को लेकर 14 बार सवाल उठाने और आपत्ति जताने के अलावा दोनों चुनाव आय़ुक्तों एसएस संधु और विवेक जोशी ने अपनी शिकायत देश के सबसे बड़े नौकरशाह यानी कैबिनेट सचिव तक भी पहुंचाई। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक कम से कम एक मौके पर दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को चिट्ठी लिख कर गड़डबड़ियों की सूचना दी। वह गड़बड़ी खासतौर से करीब एक अरब मतदाताओं के आंकड़ों की सुरक्षा और राज्यों व जिले से चुनाव अधिकारियों के अधिकार छीने जाने से जुड़ा था। इस मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ साथ डीजी आईटी के कामकाज पर भी सवाल उठा है। यह शिकायत ईसीआईनेट से जुड़ी थी। रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग की डीजी आईटी सीमा खन्ना ने कहा था कि ईसीआईनेट का प्लेटफॉर्म पूरी तरह से भरोसेमंद और कानूनी है। लेकिन इस दावे के तुरंत बाद कई गड़बड़ियां सामने आ गईं। हालांकि उनकी शिकायत पर भी कोई कार्रवाई होने की सूचना नहीं है।

दोनों चुनाव आयुक्तों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि इस प्लेटफॉर्म से राज्यों और जिलों के चुनाव अधिकारियों को कट ऑफ कर दिया गया। ऐसी कई घटनाएं सामने आईं, जिनसे ऐसा लगा कि सारी शक्तियां दिल्ली में केंद्रित की जा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मतदाताओं के नाम जोड़ने या हटाने या उन पर विचार करने का पूरा अधिकारी ईआरओ यानी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के ऊपर होती है। जिलों में आमतौर पर एसडीएम या उसका समकक्ष अधिकारी ईआरओ होता है। उसे कानूनी तौर पर यह अधिकार होता है कि वह मतदाता सूची में नाम जोड़े, हटाए या उन पर पुनर्विचार करे। लेकिन कई मामलों में ऐसा हुआ कि ईआरओ की एक्सेस रोक दी गई। डीजी आईटी सीमा खन्ना की टीम ने जिले के अधिकारियों को काम करने से रोक दिया। इसी बात की शिकायत दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव से की। उनका कहना है कि इससे मतदाता सूची की शुचिता और सुरक्षा दोनों प्रभावित होते हैं।

युवा मतदाताओं को प्रताडित करने के बदलाव?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों की जो शिकायत दोनों चुनाव आयुक्तों एसएस संधु और विवेक जोशी ने की है उसमें एक बड़ी शिकायत पहली बार के यानी युवा मतदाताओं को लेकर है। दोनों चुनाव आयुक्तों ने पहली बार नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म छह के प्रारूप में किए गए बदलाव पर सवाल उठाए थे। उनका कहना है कि फॉर्म छह के प्रारूप में जो बदलाव किया गया है वह मनमाना है और गैरकानूनी भी है। दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी शिकायत में लिखा है कि यह बदलाव युवाओं को परेशान और प्रताड़ित करने वाला है। उनका कहना है कि उनको इस बदलाव के बारे में पहले से कोई सूचना नहीं दी गई थी। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव को गैरकानूनी करार दिया है और यह भी कहा है कि केंद्र सरकार की अनुमति के बगैर चुनाव आयोग को यह काम करने का अधिकार नहीं है।

अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म छह में लोगों के सामने तीन स्टेटमेंट रखे जा रहे हैं। पहला, क्या आपका नाम पहले यानी 2000 या उसके आसपास हुई एसआईआर के बाद बनी मतदाता सूची में शामिल था? दूसरा, क्या आपके पिता या दादा में से किसी का नाम पिछली एसआईआर के बाद बनी मतदाता सूची में था? और तीसरा, क्या आपका या आपके माता, पिता में से किसी का या आपके दादा, दादी में से किसी का नाम मतदाता सूची में था? उनका कहना है कि प्रपत्र में इसका जवाब देना आनिवार्य नहीं किया गया है लेकिन इसका जवाब दिए बिना फॉर्म भरने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही है। दोनों चुनाव आयुक्तों का कहना है कि मतदाता रजिस्ट्रेशन के 1960 के कानून में बदलाव किए बगैर प्रपत्र में इस तरह की फेरबदल नहीं हो सकती है और यह काम केंद्र सरकार की अनुमति से होना चाहिए।

‘इंडियन एक्सप्रेस’ का क्या मकसद?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर लंबे समय से सवाल उठ रहे थे। उनसे पहले के मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार भी सवालों के घेरे में थे। लेकिन ज्ञानेश कुमार की ज्यादा बदनामी हुई। तभी इस समय उनके बारे में इतने विस्तार से रिपोर्ट के प्रकाशन का क्या मकसद हो सकता है? गौरतलब है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ पहले भी इस तरह की रिपोर्ट्स करता रहा है लेकिन पिछले कुछ समय से उसका स्पष्ट रूझान सरकार की ओर है। तभी इस रिपोर्ट और इसकी टाइमिंग को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। संदेह इसलिए पैदा हो रहा है क्योंकि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ बीच बीच में कुछ ऐसी रिपोर्ट छापता है, जो दिखती सरकार के खिलाफ है लेकिन उनका असल मकसद कुछ और होता है। सो, यह देखना दिलचस्प होगा कि इसका क्या मकसद है।

दो बातों की संभावना इसमें देखी जा रही है। पहली तो यह कि ज्ञानेश कुमार के कारण चुनाव आयोग और सरकार की जो बदनामी हुई है उसका ठीकरा उनके ऊपर ही फोड़ कर उनको हटाया जाए। गौरतलब है कि उनकी आईएएस बेटी, नोएडा की कलेक्टर हैं उनको लेकर भी अदालतों की बड़ी सख्त टिप्पणियां आ रही हैं। दूसरी संभावना यह भी है कि ज्ञानेश कुमार के मुकाबले दोनों चुनाव आयुक्तों की छवि चमकाई जा रही हो ताकि आगे उनमें से कोई मुख्य चुनाव आयुक्त बने तो उसकी साख बनी रहे। यही दो संभावनाएं इसलिए दिख रही हैं क्योंकि एसआईआर के जरिए वोट काटने और वोट जोड़ने का जो खेल हुआ है उसे रोकने की कोई मंशा सरकार की नहीं है। एसआईआर और परिसीमन ये दो ऐसी चीजें हैं, जिनसे भारतीय जनता पार्टी 2029 का लोकसभा चुनाव जीतने की उम्मीद कर रही है।

दिल्ली में मात्र नोटिस जबकि बंगाल में सीधे नाम कटे!

राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के पहले चरण के बाद मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित हो गई है। दिल्ली में 33 फीसदी के करीब लोगों के नाम काट दिए गए हैं। सोचें, पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में दिल्ली में 1.45 करोड़ मतदाता थे लेकिन अब जो मसौदा सूची प्रकाशित हुई है उसमें सिर्फ 97 लाख मतदाता हैं। करीब 47 लाख नाम काट दिए गए हैं। इनके अलावा बड़ी संख्या में नोटिस भेजा जा रहा है। अलग अलग कारणों से लाखों लोगों से जवाब तलब किया गया है। इसकी खूब चर्चा हो रही है कि चुनाव आयुक्त एसएस संधु और उनके परिजनों को नोटिस चला गया तो भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी और उनके बेटी को नोटिस चला गय, दिल्ली के उप राज्यपाल तरणजीत सिंह संधु और विदेश मंत्री एस जयशंकर को नोटिस गया, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी नोटिस भेजा गया। यह सूची लंबी है।

लोग चटखारे लेकर इन खबरों को पढ़ रहे हैं। ज्यादातर लोग इस बात से खुश हैं कि बड़े बड़े लोगों को भी जवाब देना होगा। एसआईआर में नोटिस जारी होने की प्रक्रिया का विरोध करने वाले कांग्रेस के इकोसिस्टम के लोग भी खुश हैं और कह रहे हैं कि चुनाव आयोग भस्मासुर हो गया है। यह भी कहा जा रहा है कि सिस्टम में जो गड़बड़ी की गई उसका खामियाजा अब बड़े लोग भी भुगत रहे हैं। लेकिन असल में भी क्या ऐसा ही है? ऐसा लग रहा है कि यह पश्चिम बंगाल में लाखों लोगों को नोटिस भेजने और नाम, पता या उम्र में गड़बड़ी के आधार पर लाखों लोगों के नाम काट देने के फैसले का औचित्य स्थापित करने के लिए जान बूझकर किया जा रहा है। ध्यान रहे जिन गड़बड़ियों पर दिल्ली में नोटिस भेजा जा रहा है वैसी गड़बड़ियों पर बंगाल में नाम काट दिए गए। यह उसी प्रक्रिया की मेनस्ट्रीमिंग करने का प्रयास है। इसके जरिए दिखाया जा रहा है कि बंगाल में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है, बल्कि वह सामान्य प्रक्रिया है।

ज्ञानेश की मनमर्जी में है चुनाव आयोग

नई दिल्ली। मनमाने तरीके से मतदाताओं के नाम काटने और जोड़ने के आरोपों से घिरे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। अंग्रेजी के अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने बुधवार, 23 सितंबर को एक खोजी रिपोर्ट के आधार पर दावा किया है कि दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को बिना बताए आयोग कई बड़े फैसले हुए। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों आयुक्तों ने पिछले 10 महीने में 14 बार इसकी शिकायत की है। इतना ही नहीं रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों आयुक्तों ने देश के कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन से भी इस बात की शिकायत की थी।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट दो चुनाव आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी ने कई फैसले उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना किए जाने का दावा किया है। दोनों ने आयोग के फैसलों पर 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच 14 बार लिखित आपत्ति जताई गईं। इनमें एक 16 अप्रैल का दिन ऐसा था, जिस दिन चार आपत्तियां दर्ज की गईं। इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गईं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ आपत्तियां उन उप चुनाव आयुक्तों को भी भेजी गईं, जो संबंधित काम की निगरानी कर रहे थे। बताया गया है कि यह विवाद बिहार में जून 2025 में शुरू हुए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद शुरू हुआ। गौरतलब है कि एसआईआर के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मतदाता सूचियों और मसौदा मतदाता सूचियों से अब तक 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए हैं। विपक्ष इस बात को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधता रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी ने नए मतदाताओं का नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म छह में किए गए बदलाव पर भी आपत्ति जताई थी। उनका कहना है कि यह बदलाव ‘अवैध और अनधिकृत’ है। उनका दावा है कि मतदाता पंजीयन कानून, 1960 में मनमाने तरीके से बदलाव किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त मानते हैं कि यह बदलाव युवाओं और पहली बार के मतदाताओं को प्रताड़ित करने वाला है।

ऐसे ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त एक अरब के करीब मतदाताओं की डाटा सुरक्षा को लेकर भी चिंतित थे। उन्होंने चुनाव आयोग की डीजी आईटी सीमा खन्ना को लेकर भी सवाल उठाए थे। उनका दावा है कि जिले के मतदाता पंजीयन अधिकारी यानी ईआरओ को ईसीआईनेट का इस्तेमाल करने से रोका गया। मतदाताओं के नाम जोड़ने या हटाने या उसमें बदलाव करने के  काम को केंद्रीकृत किया गया। सब कुछ दिल्ली के हाथ में कर दिया गया, जबकि नाम जोड़ने और हटाने का काम बुनियादी रूप से जिला स्तर पर ईआरओ को ही करना होता है।

आयोग ने आरोपों पर सफाई दी

नई दिल्ली। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट आने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त बुधवार की सुबह से ही ज्ञानेश कुमार के ऊपर चौतरफा हमले शुरू हो गए। इसके साथ ही सफाइयों का सिलसिला भी शुरू हुआ। पहले सूत्रों के हवाले से मीडिया को खबर दी गई कि चुनाव आयोग में सब कुछ ठीक है और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का फैसला तीनों चुनाव आयुक्तों की साझा सहमति से किया गया था। बाद में भारतीय जनता पार्टी भी चुनाव आयोग के समर्थन में उतरी। भाजपा के सांसद और प्रवक्ता संबित पात्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चुनाव आयोग का बचाव किया।

बहरहाल, जब सूत्रों के हवाले से दी गई सफाई से काम नहीं चला तो दोपहर में चुनाव आयोग की ओर से सफाई का एक पत्र जारी किया गया। इसमें आयोग ने एसआईआर को लेकर चुनाव आयुक्तों में मतभेद से जुड़ी खबरों को खारिज कर दिया। चुनाव आयोग ने कहा कि पिछले एक साल में लिए गए सभी फैसले आम सहमति से हुए हैं। आयोग ने अपनी सफाई में कहा कि किसी भी संस्थान में विचार विमर्श के दौरान अलग अलग राय और टिप्पणियां आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका मकसद पारदर्शिता बनाए रखना और कानूनी नियमों का पालन सुनिश्चित करना है।

पूरे विपक्ष का ज्ञानेश पर हमला

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ऊपर विपक्ष ने जोरदार हमला बोला है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट सामने आने के बाद राहुल गांधी सहित सभी विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग पर वोट चोरी के आरोप दोहराए। राहुल गांधी ने एक वीडियो जारी कर वोट चोरी को संविधान के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि समय आने पर किसी को छोड़ा नहीं जाएगा। अखिलेश यादव से लेकर अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे सबने ज्ञानेश कुमार को निशाना बनाया। कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग की।

असल में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में बताया गया है कि ज्ञानेश कुमार अपने संवैधानिक दायरे से बाहर निकल कर फैसले करते हैं और दो अन्य चुनाव आयुक्तों को फैसलों में शामिल नहीं करते हैं। दोनों आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार इसकी शिकायत की है। दोनों आयुक्तों ने ‘अवैध और अनधिकृत’ काम करने का आरोप भी मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगाया है। इस रिपोर्ट को लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपने एक वीडियो में कहा है, ‘मैं इलेक्शन कमीशन और इलेक्शन ऑफिसर्स को साफ कह रहा हूं कि आप जो कर रहे हो गलत कर रहे हो। ये राजद्रोह है, देश के खिलाफ है। टाइम आएगा। हम आपको पकड़ेंगे। बचने वाले नहीं हो’। कांग्रेस के सांसद और सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील अभिषेक सिंघवी ने इस मामले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि इस खुलासे के बाद ज्ञानेश कुमार को पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने महाभियोग की भी मांग की।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले की जांच की मांग करते हुए कहा है, ‘सभी चुनाव आयुक्त अपना सही काम नहीं कर पा रहे हैं। एक स्वतंत्र निकाय के सदस्यों को अगर न्यायपूर्ण कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं है या उनकी कोई सुनवाई नहीं है तो ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक हालात हैं। कुछ लोगों द्वारा सत्ता की कठपुतली बनकर लोकतंत्र को धोखा देना घोर सांविधानिक अपराध है। ये लोकतंत्र को मिटाने के किसी षड्यंत्र से कम नहीं है’।

आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने अखबार की रिपोर्ट को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, ‘वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने का अधिकार सिर्फ ईआरओ को है, फिर दिल्ली में बैठे लोग पूरे देश की वोटर लिस्ट कैसे बदल रहे हैं’? महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने चुनाव आयोग की आलोचना करते हुए कहा, ‘महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में बैलट पेपर का उपयोग करके फिर से चुनाव होने चाहिए’।