इटली के मशहूर लग्जरी फैशन ब्रांड फेंडी का एक हैंडबैग इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोर रहा है। इसकी खासियत इसकी ऊंची कीमत ही नहीं, बल्कि इसका ऐसा डिजाइन है, जिसने कई भारतीय उपयोगकर्ताओं को नवरात्रि के दौरान बाजारों में दिखने वाले रंगीन बैग और पारंपरिक सजावटी सामान की याद दिला दी। मोतियों, शीशों और कढ़ाई से सजे इस बैग की तस्वीरें सामने आते ही लोग इसकी तुलना भारतीय बाजारों में मिलने वाले मिलते-जुलते सामान से करने लगे। मामला तब और सुर्खियों में आ गया, जब उद्योगपति हर्ष गोयनका ने बैग के डिजाइन और कीमत को लेकर सवाल उठाए।
बायोकॉन की संस्थापक किरण मजूमदार-शॉ भी इस चर्चा में शामिल हुईं और भारतीय कारीगरों को उचित पहचान दिए जाने की बात कही। इसके बाद सोशल मीडिया पर बहस सिर्फ एक बैग तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारतीय पारंपरिक कला, कारीगरों की मेहनत और वैश्विक फैशन में उनके योगदान को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई।
39,500 मोती और 475 शीशों से तैयार हुआ बैग
फेंडी की वेबसाइट पर यह बैग “बैगेट 26424: बहुरंगी री-एडिशन” नाम से दर्ज है। ब्रांड के अनुसार, इसे पूरी तरह हाथ से तैयार किया गया है। इसमें करीब 39,500 मोती और 475 शीशे लगाए गए हैं। कंपनी का कहना है कि इस बैग को तैयार करने में 138 घंटे से अधिक समय लगता है। यह बैग इटली में बनाया गया है और इसकी कीमत करीब 8.3 लाख रुपये बताई गई है।
When craftsmanship becomes design
Discover how sequins, beads, and mirrors are transformed into unique works of art through the skilled hands of Chanakya artisans
#FENDI https://t.co/SzcVBIwVcM
— Fendi (@Fendi) April 19, 2026
500 रुपये के बाजार वाले बैग से होने लगी तुलना
बैग की तस्वीर सामने आने के बाद कई भारतीय सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने इसके चमकीले रंगों और शीशों वाले डिजाइन की तुलना गुजरात समेत भारत के अलग-अलग बाजारों में मिलने वाले पारंपरिक बैग से की। आरपीजी समूह के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने भी इस समानता पर सवाल उठाया। उन्होंने फेंडी के बैग की कीमत की तुलना भारत में मिलने वाले कम कीमत के समान दिखने वाले बैग से करते हुए भारतीय कारीगरों को उचित श्रेय दिए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने इस मामले की तुलना पिछले साल सामने आए प्रादा के कोल्हापुरी चप्पल विवाद से भी की।
After the Prada Kolhapuri chappal scandal, here comes the Fendi “Navratri” bag. Charging ₹8.3 Lakhs for a design that looks exactly like a ₹500 bag available in the streets of Gujarat. And zero credit to Indian artisans. When will luxury brands stop colonising our crafts? https://t.co/mneHhBUQNt
— Harsh Goenka (@hvgoenka) September 14, 2026
किरण मजूमदार-शॉ ने भी जताई आपत्ति
हर्ष गोयनका की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए बायोकॉन की संस्थापक किरण मजूमदार-शॉ ने भी फेंडी के डिजाइन को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भारतीय पारंपरिक कारीगरी का इस्तेमाल करने के साथ उन कारीगरों को पहचान मिलनी चाहिए, जिन्होंने इन कलाओं को पीढ़ियों तक जीवित रखा है। उनके अनुसार, भारतीय कारीगरी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान और पहचान मिलनी चाहिए।
प्रादा के कोल्हापुरी चप्पल विवाद की याद हुई ताजा
फेंडी के बैग को लेकर शुरू हुई बहस ने प्रादा के कोल्हापुरी चप्पल विवाद को भी चर्चा में ला दिया। उस मामले में भी प्रादा के जूतों की डिजाइन की तुलना महाराष्ट्र की पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पलों से की गई थी। विवाद के बाद प्रादा ने अपनी वेबसाइट पर कोल्हापुरी जूतियों से जुड़े सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ की जानकारी शामिल की थी। इसी पुराने मामले का हवाला देते हुए सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने फेंडी के बैग को लेकर भी भारतीय कारीगरों की पहचान और पारंपरिक कला के व्यावसायिक इस्तेमाल पर सवाल उठाए।
सोशल मीडिया पर अलग-अलग राय
फेंडी के बैग को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों की राय एक जैसी नहीं है। कुछ उपयोगकर्ताओं ने इसे भारतीय कारीगरी से मिलता-जुलता बताते हुए ब्रांड के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। कुछ लोगों ने तो फेंडी के उत्पादों के बहिष्कार की बात भी कही। वहीं, कुछ उपयोगकर्ताओं ने इस बहस का रुख भारत की अपनी फैशन और लग्जरी इंडस्ट्री की ओर मोड़ दिया। उनका सवाल था कि अगर भारतीय डिजाइन और पारंपरिक कारीगरी इतनी समृद्ध है, तो भारत ने इन्हीं कलाओं और डिजाइनों पर आधारित ऐसे वैश्विक ब्रांड क्यों नहीं बनाए, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना सकें।
AI का ऐसा डर कि Google DeepMind के रिसर्चर ने छोड़ दी नौकरी, जानें क्या है वजह

