ट्रम्प ने 5 दिन में ही प्रेस सेक्रेटरी को हटाया:वकील होने के दावे पर सवाल उठे, पहली ब्रीफिंग में जुबान लड़खड़ाईं थी

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपनी नई प्रेस सेक्रेटरी केटी जकारिया को पद से हटा दिया है। जकारिया ने सोमवार को काम शुरू किया था और सिर्फ 5 दिन बाद, 16 अक्टूबर को उन्होंने पद छोड़ दिया। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहा कि जकारिया पद से हट रही हैं। ट्रम्प ने उनसे नौकरी पर दोबारा विचार करने को कहा था। जकारिया के वकील होने की योग्यता पर सवाल उठे थे। इसके अलावा वे अपनी पहली प्रेस ब्रीफिंग सही से नहीं दे पाईं थीं। एक सवाल पर अपने पति को उन्होंने गलती से माय प्रेसिडेंट कह दिया था। जकारिया के पास वकालत का लाइसेंस नहीं मिला ट्रम्प ने जकारिया को प्रेस सेक्रेटरी बनाने का ऐलान करते हुए कहा था कि उन्होंने पेपरडाइन यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की है। लेकिन उनके पास अमेरिका में वकालत का लाइसेंस होने का सबूत नहीं मिला। गुरुवार को फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में जकारिया ने कहा कि उन्होंने वकालत की परीक्षा पास नहीं की है। अमेरिका में वकील बनने के लिए आमतौर पर परीक्षा पास कर लाइसेंस लेना जरूरी होता है। जकारिया ने अंतरराष्ट्रीय कारोबारी कानून के क्षेत्र में काम करने की बात कही थी, लेकिन कानून की पढ़ाई करना और वकालत का लाइसेंस होना अलग-अलग बातें हैं। जकारिया इससे पहले ट्रम्प की सोशल मीडिया कंपनी ट्रम्प मीडिया एंड टेक्नोलॉजी ग्रुप में कम्युनिकेशन सलाहकार थीं। उनके लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक, उन्होंने जून 2026 में यह काम शुरू किया था। इससे पहले वह कुछ समय अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग में जनसंपर्क से जुड़ा काम भी कर चुकी थीं। ट्रम्प बोले- मीडिया उन्हें परेशान कर रहा शुक्रवार को व्हाइट हाउस से निकलते समय ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने जकारिया से पद पर बने रहने के फैसले पर दोबारा सोचने को कहा था। ट्रम्प के मुताबिक, उन्होंने जकारिया से कहा कि उन्हें मीडिया के दबाव में परेशान होने की जरूरत नहीं है। वे चाहें तो नौकरी छोड़ सकती हैं। ट्रम्प ने कहा, मुझे नहीं लगता कि मीडिया के केटी को परेशान करने की वजह से उन्हें इतना कष्ट उठाना चाहिए। शायद यह नौकरी जकारिया के लिए सही नहीं है। पहली ब्रीफिंग के बाद भी हुई आलोचना जकारिया ने 13 अक्टूबर को व्हाइट हाउस में पहली बार प्रेस ब्रीफिंग की थी। जो 14 मिनट चली। उनके जवाबों की बहुत आलोचना हुई थी। करोलिन लेविट की जगह मिली थी जिम्मेदारी जकारिया को करोलिन लेविट की जगह व्हाइट हाउस का प्रेस सेक्रेटरी बनाया गया था। ट्रम्प ने उनकी नियुक्ति का ऐलान करते हुए उनकी तारीफ की थी। इससे पहले ट्रम्प के पहले कार्यकाल में एंथनी स्कारामुची ने व्हाइट हाउस के कम्युनिकेशन डायरेक्टर के रूप में 10 दिन काम किया था। इस तरह जकारिया का कार्यकाल उनसे भी छोटा रहा। ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में इन महिलाओं की भी कुर्सी गई क्रिस्टी नोएम – गृह सुरक्षा मंत्री: मार्च 2026 में ट्रम्प ने उन्हें पद से हटाया। विभाग के कामकाज को लेकर आलोचना हुई थी। पैम बॉन्डी – अटॉर्नी जनरल: अप्रैल 2026 में हटाई गईं। एपस्टीन फाइलों और कामकाज को लेकर सवाल उठे थे। लॉरी चावेज-डीरिमर – श्रम मंत्री: अप्रैल 2026 में निजी क्षेत्र में जाने के लिए पद छोड़ा। तुलसी गबार्ड – राष्ट्रीय खुफिया निदेशक: जून 2026 में इस्तीफा दिया। उन्होंने पति की बीमारी को कारण बताया। ——————— यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका के स्कूल में गोलीबारी, 4 की मौत: इनमें 3 बच्चे, स्थानीय नागरिक ने हमलावर को मार गिराया; इस साल स्कूलों में फायरिंग का 26वां मामला अमेरिका के ओरेगन राज्य के बेंड शहर में गुरुवार को एक स्कूल में गोलीबारी हुई। इसमें 3 बच्चों समेत 4 लोगों की मौत हो गई। पूरी खबर पढ़ें…

ट्रम्प ने 5 दिन में ही प्रेस सेक्रेटरी को हटाया:वकील होने के दावे पर सवाल उठे, पहली ब्रीफिंग में जुबान लड़खड़ाईं थी

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपनी नई प्रेस सेक्रेटरी केटी जकारिया को पद से हटा दिया है। जकारिया ने सोमवार को काम शुरू किया था और सिर्फ 5 दिन बाद, 16 अक्टूबर को उन्होंने पद छोड़ दिया। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहा कि जकारिया पद से हट रही हैं। ट्रम्प ने उनसे नौकरी पर दोबारा विचार करने को कहा था। जकारिया के वकील होने की योग्यता पर सवाल उठे थे। इसके अलावा वे अपनी पहली प्रेस ब्रीफिंग सही से नहीं दे पाईं थीं। एक सवाल पर अपने पति को उन्होंने गलती से माय प्रेसिडेंट कह दिया था। जकारिया के पास वकालत का लाइसेंस नहीं मिला ट्रम्प ने जकारिया को प्रेस सेक्रेटरी बनाने का ऐलान करते हुए कहा था कि उन्होंने पेपरडाइन यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की है। लेकिन उनके पास अमेरिका में वकालत का लाइसेंस होने का सबूत नहीं मिला। गुरुवार को फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में जकारिया ने कहा कि उन्होंने वकालत की परीक्षा पास नहीं की है। अमेरिका में वकील बनने के लिए आमतौर पर परीक्षा पास कर लाइसेंस लेना जरूरी होता है। जकारिया ने अंतरराष्ट्रीय कारोबारी कानून के क्षेत्र में काम करने की बात कही थी, लेकिन कानून की पढ़ाई करना और वकालत का लाइसेंस होना अलग-अलग बातें हैं। जकारिया इससे पहले ट्रम्प की सोशल मीडिया कंपनी ट्रम्प मीडिया एंड टेक्नोलॉजी ग्रुप में कम्युनिकेशन सलाहकार थीं। उनके लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक, उन्होंने जून 2026 में यह काम शुरू किया था। इससे पहले वह कुछ समय अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग में जनसंपर्क से जुड़ा काम भी कर चुकी थीं। ट्रम्प बोले- मीडिया उन्हें परेशान कर रहा शुक्रवार को व्हाइट हाउस से निकलते समय ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने जकारिया से पद पर बने रहने के फैसले पर दोबारा सोचने को कहा था। ट्रम्प के मुताबिक, उन्होंने जकारिया से कहा कि उन्हें मीडिया के दबाव में परेशान होने की जरूरत नहीं है। वे चाहें तो नौकरी छोड़ सकती हैं। ट्रम्प ने कहा, मुझे नहीं लगता कि मीडिया के केटी को परेशान करने की वजह से उन्हें इतना कष्ट उठाना चाहिए। शायद यह नौकरी जकारिया के लिए सही नहीं है। पहली ब्रीफिंग के बाद भी हुई आलोचना जकारिया ने 13 अक्टूबर को व्हाइट हाउस में पहली बार प्रेस ब्रीफिंग की थी। जो 14 मिनट चली। उनके जवाबों की बहुत आलोचना हुई थी। करोलिन लेविट की जगह मिली थी जिम्मेदारी जकारिया को करोलिन लेविट की जगह व्हाइट हाउस का प्रेस सेक्रेटरी बनाया गया था। ट्रम्प ने उनकी नियुक्ति का ऐलान करते हुए उनकी तारीफ की थी। इससे पहले ट्रम्प के पहले कार्यकाल में एंथनी स्कारामुची ने व्हाइट हाउस के कम्युनिकेशन डायरेक्टर के रूप में 10 दिन काम किया था। इस तरह जकारिया का कार्यकाल उनसे भी छोटा रहा। ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में इन महिलाओं की भी कुर्सी गई क्रिस्टी नोएम – गृह सुरक्षा मंत्री: मार्च 2026 में ट्रम्प ने उन्हें पद से हटाया। विभाग के कामकाज को लेकर आलोचना हुई थी। पैम बॉन्डी – अटॉर्नी जनरल: अप्रैल 2026 में हटाई गईं। एपस्टीन फाइलों और कामकाज को लेकर सवाल उठे थे। लॉरी चावेज-डीरिमर – श्रम मंत्री: अप्रैल 2026 में निजी क्षेत्र में जाने के लिए पद छोड़ा। तुलसी गबार्ड – राष्ट्रीय खुफिया निदेशक: जून 2026 में इस्तीफा दिया। उन्होंने पति की बीमारी को कारण बताया। ——————— यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका के स्कूल में गोलीबारी, 4 की मौत: इनमें 3 बच्चे, स्थानीय नागरिक ने हमलावर को मार गिराया; इस साल स्कूलों में फायरिंग का 26वां मामला अमेरिका के ओरेगन राज्य के बेंड शहर में गुरुवार को एक स्कूल में गोलीबारी हुई। इसमें 3 बच्चों समेत 4 लोगों की मौत हो गई। पूरी खबर पढ़ें…

भारत को सोने का नया सप्लायर मिल सकता है:ऑस्ट्रेलिया में सोने की खोज पर 13 हजार करोड़ खर्च, यहां दुनिया का सबसे बड़ा सोना भंडार

ऑस्ट्रेलिया में सोने की नई खदानें तलाशने के लिए एक साल में रिकॉर्ड 13 हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। यहां दुनिया का सबसे बड़ा सोना भंडार है। ऐसे में आने वाले समय में ऑस्ट्रेलिया भारत के लिए सोने का नया सप्लायर बन सकता है। फिलहाल भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर सोना आयात करता है, जबकि कुल आयात में ऑस्ट्रेलिया की हिस्सेदारी सिर्फ 2.27% है। ऑस्ट्रेलिया में गोल्ड रश, ड्रिलिंग मशीनों की मांग तेज पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में अकेले 10,625 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। यहां सोने की तलाश के लिए ड्रिलिंग मशीनों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। सोने की नई खदानें खोजने की इस होड़ को ‘गोल्ड रश’ कहा जा रहा है। अनुमान है कि यहां करीब 13 हजार टन सोना मौजूद है। यह दुनिया में मौजूद सोने के कुल संसाधनों का करीब 20% है। सोने की खोज में तेजी भारत के लिए भी अहम है। दुनिया में सोने के आभूषणों की कुल मांग में भारत की हिस्सेदारी करीब 30% बताई जाती है। भारत में सोने का उत्पादन बहुत कम होता है। इसलिए अपनी जरूरत पूरी करने के लिए उसे दूसरे देशों से सोना खरीदना पड़ता है। 2026 की पहली तिमाही में भारत ने करीब 1.61 लाख करोड़ रुपए का सोना आयात किया। भास्कर एनालिसिस: सोने की खोज पर पैसा क्यों लगा रही हैं कंपनियां? 1. जंग और अनिश्चितता से बढ़ी सोने की मांग दुनिया में जंग और आर्थिक अनिश्चितता के कारण सोने की कीमतों में तेजी आई है। ऐसे समय में सोने की खदानों में निवेश करना कंपनियों के लिए फायदेमंद हो सकता है। यही वजह है कि वे सोने के नए भंडार खोजने पर ज्यादा पैसा खर्च कर रही हैं। जून 2026 की तिमाही में ऑस्ट्रेलिया में सोने की खोज पर खर्च 23.6% बढ़ गया। 2. सोने की खोज पर सबसे ज्यादा खर्च ऑस्ट्रेलिया में जून 2026 की तिमाही के दौरान अलग-अलग धातुओं की खोज पर सबसे ज्यादा पैसा सोने के लिए खर्च किया गया। सोना: 3,883 करोड़ रुपए लौह अयस्क: 1,606 करोड़ रुपए तांबा, निकल, जस्ता और सीसा: 1,217 करोड़ रुपए कोयला: 401 करोड़ रुपए इन आंकड़ों से पता चलता है कि ऑस्ट्रेलिया में कंपनियों का ध्यान सोने के नए भंडार खोजने पर ज्यादा है। 3. दुनिया में सोने के उत्पादन में ऑस्ट्रेलिया की बड़ी हिस्सेदारी 2025 में ऑस्ट्रेलिया ने 314 टन सोने का उत्पादन किया। दुनिया में इस दौरान कुल 3,300 टन सोना निकाला गया था। यानी दुनिया के कुल उत्पादन में ऑस्ट्रेलिया की हिस्सेदारी करीब 9.5% रही। रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में सोने का उत्पादन एक साल में 10% से ज्यादा बढ़ा। 4. भारत को ऑस्ट्रेलिया से क्या फायदा हो सकता है? भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर सोना दूसरे देशों से खरीदता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया से आयात बढ़ने पर भारत के पास सोना खरीदने के लिए एक और विकल्प होगा। ऑस्ट्रेलिया में खनन और कारोबार से जुड़े नियम सख्त हैं। वहां सोने के स्रोत और पर्यावरण से जुड़े नियमों का भी ध्यान रखा जाता है। इससे भारतीय कंपनियों को यह जांचने में मदद मिल सकती है कि वे सोना कहां से खरीद रही हैं। पश्चिम एशिया में जंग के कारण दुबई के रास्ते भारत आने वाली सोने की खेप भी प्रभावित हुई थी। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया से कारोबार बढ़ने पर भारत को सोना मंगाने के लिए एक दूसरा रास्ता मिल सकता है। 5. क्या इससे भारत में सोना सस्ता होगा? अगर ऑस्ट्रेलिया में नई खदानें मिलती हैं और वहां सोने का उत्पादन बढ़ता है, तो दुनिया के बाजार में सोने की सप्लाई बढ़ सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सोना सस्ता हो ही जाएगा। सोने की कीमत इस बात पर भी निर्भर करती है कि दुनिया में उसकी मांग कितनी है, उत्पादन पर कितना खर्च आता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें किस दिशा में जाती हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया की खदानों में कितना अंतर? सोना सीधे जमीन से शुद्ध रूप में नहीं निकलता। इसे उस पत्थर और मिट्टी से निकाला जाता है, जिसमें सोना मिला होता है। इसे सोने का अयस्क कहते हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया की खदानों में एक टन अयस्क से मिलने वाले सोने की मात्रा में बड़ा अंतर है। ऑस्ट्रेलिया के अयस्क में भारत के मुकाबले प्रति टन करीब 8.5 गुना ज्यादा सोना मिलता है। भारत में सोने की सप्लाई कहां से आती है? भारत में सोने की जरूरत तीन मुख्य तरीकों से पूरी होती है: 82% – आयात से: दूसरे देशों से सोना खरीदा जाता है। 16% – रिसाइक्लिंग से: पुराने गहनों और सोने को दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। 2% – देश में खनन से: भारत की अपनी खदानों से सोना निकाला जाता है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… अमेरिका में 30 हजार भारतीय मजदूरों ने काम छोड़ा:इनके पास पूरे कागजात नहीं, पकड़े जाने का डर अमेरिका के कैलिफोनिया में करीब 30 हजार भारतीय मजदूरों को खेती का काम छोड़ना पड़ा है। इनमें से कई मजदूरों के पास अमेरिका में रहने और काम करने के पूरे कागजात नहीं हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

चुनाव जीतकर भी क्या PM नहीं बन पाएंगे नेतन्याहू:दक्षिणपंथी वोटों के बंटने का डर; हाथ से निकल सकती है सत्ता

इजराइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने चुनाव के बाद सत्ता गंवाने का खतरा है। उनके अपने दक्षिणपंथी खेमे की छोटी पार्टियां उनके लिए मुश्किल खड़ी कर रही हैं। इनके कारण वोट बंट सकते हैं। वहीं, चुनाव के बाद ये पार्टियां नेतन्याहू की सरकार में शामिल होने से भी इनकार कर सकती हैं। चुनाव से 11 दिन पहले नेतन्याहू इन पार्टियों के वोट अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ, विपक्षी नेता गादी आइजनकोट अपनी पार्टी को विपक्ष का सबसे बड़ा दल बनाने में जुटे हैं, ताकि प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत हो सके। 1. नेतन्याहू के लिए छोटी पार्टियां क्यों बनीं चुनौती? इजराइल में दक्षिणपंथी वोटों के लिए बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को ओफर विंटर और योआज हेंडेल की पार्टियों से चुनौती मिल रही है। नेतन्याहू चाहते हैं कि दक्षिणपंथी मतदाता उनकी पार्टी को वोट दें, ताकि चुनाव के बाद उनकी सरकार बनाने की संभावना मजबूत रहे। नेतन्याहू ने विंटर की पार्टी को वोट न देने की अपील की है। उन्हें डर है कि विंटर दक्षिणपंथी वोट लेकर चुनाव के बाद एविगडोर लिबरमैन के साथ जा सकते हैं। यानी वोट मिलने के बावजूद नेतन्याहू को इन पार्टियों का समर्थन मिले, यह जरूरी नहीं है। 2. वोट बंटने से नेतन्याहू को कैसे नुकसान हो सकता है? 3. विंटर ने नेतन्याहू को समर्थन देने पर शर्त रखी 4. विपक्ष में भी PM पद के लिए एक नाम पर सहमति नहीं नेतन्याहू को हराने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों में भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर सहमति नहीं है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि उनकी पार्टी याशर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बने। इसके लिए वे दूसरी विपक्षी पार्टियों के समर्थकों को अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहे हैं। आइजनकोट का मानना है कि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनने से प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत होगा। लेकिन इससे दूसरी विपक्षी पार्टियों को नुकसान हो सकता है। ऐसे में चुनाव के बाद नेतन्याहू के खिलाफ सभी विपक्षी दल एकजुट हो पाएंगे या नहीं, यह भी अहम होगा। नेतन्याहू को देश के लिए खतरा मानते हैं आइजनकोट आइजनकोट का आरोप है कि नेतन्याहू 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रहे। उनका कहना है कि किसी नेता की पहचान उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके नतीजों से होती है। उन्होंने नेतन्याहू को एंटी-लीडर बताते हुए कहा कि किसी भी नाकामी की जिम्मेदारी नेता को खुद लेनी चाहिए, लेकिन नेतन्याहू ऐसा नहीं करते। आइजनकोट का मानना है कि देश को ऐसी सरकार चाहिए, जो गलतियों की जिम्मेदारी ले और इजराइल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के करीब लाए। आइजनकोट की पार्टी याशर विपक्षी खेमे का नेतृत्व करने की कोशिश कर रही है। लेख में दिए गए सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त नेता के सवाल पर आइजनकोट नेतन्याहू से आगे चल रहे थे। एक सर्वे में उन्हें 41% और नेतन्याहू को 38% लोगों ने पसंद किया। दूसरे सर्वे में आइजनकोट को 44% और नेतन्याहू को 38% समर्थन मिला। 5. बहुमत के बिना भी सरकार बनाने की कोशिश करेंगे आइजनकोट इजराइल की संसद में 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए आमतौर पर 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इससे कम समर्थन के साथ भी सरकार बन सकती है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट इसी संभावना पर विचार कर रहे हैं। वे ऐसी सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जिसे अरब पार्टियों के मतदान से दूर रहने पर संसद में मंजूरी मिल जाए। हालांकि, यह अभी सिर्फ एक संभावना है। आइजनकोट के लिए सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा। 6. सरकार नहीं बनी तो कार्यवाहक PM बने रह सकते हैं नेतन्याहू विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि चुनाव के बाद जल्द नई सरकार बने, ताकि बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री न बने रहें। इजराइल में अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच पांच बार चुनाव हुए थे। इस दौरान नेतन्याहू कुल 19 महीने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। आइजनकोट इसी स्थिति से बचने के लिए अल्पमत सरकार बनाने का विकल्प तलाश रहे हैं। हालांकि, इसके लिए भी उन्हें संसद में जरूरी समर्थन जुटाना होगा। ——————- ये खबर भी पढ़ें… चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते नेतन्याहू:बोले- तेहरान ने हमला किया तब भी विरोधी मुझे जिम्मेदार ठहराएंगे; 27 अक्टूबर को वोटिंग इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते। बुधवार को इजराइली आर्मी रेडियो से बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ईरान पर हमला करना ठीक नहीं होगा। पूरी खबर यहां पढ़ें…

चुनाव जीतकर भी क्या PM नहीं बन पाएंगे नेतन्याहू:दक्षिणपंथी वोटों के बंटने का डर; हाथ से निकल सकती है सत्ता

इजराइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने चुनाव के बाद सत्ता गंवाने का खतरा है। उनके अपने दक्षिणपंथी खेमे की छोटी पार्टियां उनके लिए मुश्किल खड़ी कर रही हैं। इनके कारण वोट बंट सकते हैं। वहीं, चुनाव के बाद ये पार्टियां नेतन्याहू की सरकार में शामिल होने से भी इनकार कर सकती हैं। चुनाव से 11 दिन पहले नेतन्याहू इन पार्टियों के वोट अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ, विपक्षी नेता गादी आइजनकोट अपनी पार्टी को विपक्ष का सबसे बड़ा दल बनाने में जुटे हैं, ताकि प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत हो सके। 1. नेतन्याहू के लिए छोटी पार्टियां क्यों बनीं चुनौती? इजराइल में दक्षिणपंथी वोटों के लिए बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को ओफर विंटर और योआज हेंडेल की पार्टियों से चुनौती मिल रही है। नेतन्याहू चाहते हैं कि दक्षिणपंथी मतदाता उनकी पार्टी को वोट दें, ताकि चुनाव के बाद उनकी सरकार बनाने की संभावना मजबूत रहे। नेतन्याहू ने विंटर की पार्टी को वोट न देने की अपील की है। उन्हें डर है कि विंटर दक्षिणपंथी वोट लेकर चुनाव के बाद एविगडोर लिबरमैन के साथ जा सकते हैं। यानी वोट मिलने के बावजूद नेतन्याहू को इन पार्टियों का समर्थन मिले, यह जरूरी नहीं है। 2. वोट बंटने से नेतन्याहू को कैसे नुकसान हो सकता है? 3. विंटर ने नेतन्याहू को समर्थन देने पर शर्त रखी 4. विपक्ष में भी PM पद के लिए एक नाम पर सहमति नहीं नेतन्याहू को हराने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों में भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर सहमति नहीं है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि उनकी पार्टी याशर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बने। इसके लिए वे दूसरी विपक्षी पार्टियों के समर्थकों को अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहे हैं। आइजनकोट का मानना है कि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनने से प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत होगा। लेकिन इससे दूसरी विपक्षी पार्टियों को नुकसान हो सकता है। ऐसे में चुनाव के बाद नेतन्याहू के खिलाफ सभी विपक्षी दल एकजुट हो पाएंगे या नहीं, यह भी अहम होगा। नेतन्याहू को देश के लिए खतरा मानते हैं आइजनकोट आइजनकोट का आरोप है कि नेतन्याहू 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रहे। उनका कहना है कि किसी नेता की पहचान उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके नतीजों से होती है। उन्होंने नेतन्याहू को एंटी-लीडर बताते हुए कहा कि किसी भी नाकामी की जिम्मेदारी नेता को खुद लेनी चाहिए, लेकिन नेतन्याहू ऐसा नहीं करते। आइजनकोट का मानना है कि देश को ऐसी सरकार चाहिए, जो गलतियों की जिम्मेदारी ले और इजराइल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के करीब लाए। आइजनकोट की पार्टी याशर विपक्षी खेमे का नेतृत्व करने की कोशिश कर रही है। लेख में दिए गए सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त नेता के सवाल पर आइजनकोट नेतन्याहू से आगे चल रहे थे। एक सर्वे में उन्हें 41% और नेतन्याहू को 38% लोगों ने पसंद किया। दूसरे सर्वे में आइजनकोट को 44% और नेतन्याहू को 38% समर्थन मिला। 5. बहुमत के बिना भी सरकार बनाने की कोशिश करेंगे आइजनकोट इजराइल की संसद में 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए आमतौर पर 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इससे कम समर्थन के साथ भी सरकार बन सकती है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट इसी संभावना पर विचार कर रहे हैं। वे ऐसी सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जिसे अरब पार्टियों के मतदान से दूर रहने पर संसद में मंजूरी मिल जाए। हालांकि, यह अभी सिर्फ एक संभावना है। आइजनकोट के लिए सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा। 6. सरकार नहीं बनी तो कार्यवाहक PM बने रह सकते हैं नेतन्याहू विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि चुनाव के बाद जल्द नई सरकार बने, ताकि बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री न बने रहें। इजराइल में अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच पांच बार चुनाव हुए थे। इस दौरान नेतन्याहू कुल 19 महीने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। आइजनकोट इसी स्थिति से बचने के लिए अल्पमत सरकार बनाने का विकल्प तलाश रहे हैं। हालांकि, इसके लिए भी उन्हें संसद में जरूरी समर्थन जुटाना होगा। ——————- ये खबर भी पढ़ें… चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते नेतन्याहू:बोले- तेहरान ने हमला किया तब भी विरोधी मुझे जिम्मेदार ठहराएंगे; 27 अक्टूबर को वोटिंग इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते। बुधवार को इजराइली आर्मी रेडियो से बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ईरान पर हमला करना ठीक नहीं होगा। पूरी खबर यहां पढ़ें…

अल्बानिया में महंगी शिक्षा के खिलाफ छात्र सड़कों पर उतरे:सरकारी इमारतों और बैंकों में आग लगाई; अभी 11 देशों में छात्र आंदोलन चल रहा

अल्बानिया की राजधानी तिराना में महंगी शिक्षा और खराब सुविधाओं के खिलाफ अब छात्र सड़कों पर उतर आए हैं। छात्र प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय, सरकारी इमारतों और कई बैंकों की शाखाओं में आग लगा दी। भीड़ को हटाने के लिए पुलिस ने आंसू गैस और पानी का इस्तेमाल किया। इस दौरान दर्जनों पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी घायल हो गए। अल्बानिया में जारी यह विरोध ऐसे समय हो रहा है, जब भारत, फ्रांस, जर्मनी समेत दुनिया के कुल 11 देशों में छात्र अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। अल्बानिया में प्रदर्शन से जुड़ी 5 तस्वीरें… कई महीनों से नाराज थे छात्र, सरकार पर अनदेखी का आरोप अल्बानिया में छात्रों की नाराजगी अचानक नहीं बढ़ी है। वे कई महीनों से पढ़ाई के बढ़ते खर्च और डिग्री लेने के बाद नौकरी मिलने की कम संभावनाओं को लेकर आवाज उठा रहे हैं। छात्रों का कहना है कि शिक्षा महंगी होती जा रही है, जबकि पढ़ाई पूरी करने के बाद भी रोजगार के पर्याप्त मौके नहीं मिल रहे हैं। अल्बानिया के पत्रकार आर्लिस अलिकाज ने अल जजीरा से कहा कि मौजूदा प्रदर्शन कई महीनों से दबे गुस्से का नतीजा हैं। तिराना के इंस्टीट्यूट फॉर पॉलिटिकल स्टडीज के प्रोफेसर और शोधकर्ता अफ्रिम क्रास्निकी के मुताबिक, छात्र और युवा करीब तीन महीने तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते रहे, लेकिन उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया। उनका आरोप है कि सरकार ने बातचीत करने के बजाय कई बार छात्रों की छवि खराब करने की कोशिश की। अब लोगों का गुस्सा सिर्फ सरकार के खिलाफ नहीं है। सरकारी संस्थानों की जवाबदेही की कमी और लोगों की शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होने से भी नाराजगी बढ़ी है। ट्रम्प के दामाद के लग्जरी रिसॉर्ट बनाने का भी विरोध एदी रामा 2013 से अल्बानिया के प्रधानमंत्री हैं। पिछले साल मई में वे चौथी बार इस पद पर चुने गए थे। हालांकि, इसके बाद उनकी सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ी है। मौजूदा प्रदर्शन रामा के लिए अब तक के सबसे गंभीर जन विरोध में से एक माने जा रहे हैं। सरकार के खिलाफ विरोध कुछ महीने पहले ही शुरू हो गया था। इसकी एक वजह देश के दक्षिणी तट पर लग्जरी रिसॉर्ट बनाने की योजना भी है। इस परियोजना से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर जुड़े हैं। गुरुवार को रॉयटर्स से बातचीत में रामा ने इस्तीफे की मांग खारिज कर दी। उन्होंने कहा कि सरकारें लोकतांत्रिक चुनावों से बदलती हैं। पिछले साल देश में चुनाव हुए थे, क्रांति नहीं। 2018 में भी शिक्षा के खर्च पर बड़ा आंदोलन हुआ था —————————- यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में शिक्षकों की कमी को लेकर आंदोलन हिंसक हुआ:धमाके में 15 साल के छात्र का हाथ उड़ा; 5 हजार गिरफ्तार, 87% गिरफ्तार नाबालिग फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर छात्र सड़कों पर उतर गए हैं। सितंबर में शुरू हुआ यह आंदोलन अब पूरे देश में फैल गया है। छात्र स्कूलों में बढ़ती भीड़, जर्जर इमारतों और शिक्षकों की कमी का विरोध कर रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…

बांग्लादेश- यूनिवर्सिटी में मंदिर के पास गोमांस पकाने पर विवाद:छात्रों का आज गाय काटने का ऐलान; प्रशासन ने पहले रोका, फिर छूट दी

बांग्लादेश की जगन्नाथ यूनिवर्सिटी में 12 अक्टूबर को मंदिर के पास गोमांस की खिचड़ी बनाने को लेकर विवाद हो गया। इसके दो दिन बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कैंपस में पशु काटने से बचने का नोटिस जारी किया। इसके विरोध में मुस्लिम छात्रों के एक समूह ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर को गाय काटकर दावत करने का ऐलान कर दिया। विवाद बढ़ने पर प्रशासन ने दूसरा नोटिस जारी कर कहा कि छात्रों को ऐसे आयोजन करने का अधिकार है, लेकिन इससे दूसरों की धार्मिक गतिविधियों में बाधा नहीं आनी चाहिए। इस्लामिक कल्चर विभाग के छात्रों ने रखा था कार्यक्रम 12 अक्टूबर को जगन्नाथ यूनिवर्सिटी के इस्लामिक हिस्ट्री एंड कल्चर विभाग के 17वें बैच के छात्रों ने कैंपस में गोमांस की खिचड़ी बनाने का कार्यक्रम रखा। यह जगह यूनिवर्सिटी के केंद्रीय मंदिर के पास थी। मंदिर समिति के सदस्य सचिव जॉय साहा ने BBC बांग्ला को बताया कि गोमांस की खिचड़ी बनते देख कुछ हिंदू छात्रों ने विरोध किया। मामला बढ़ने पर यूनिवर्सिटी के प्रॉक्टर ने हस्तक्षेप किया। इसके बाद आयोजकों ने मंदिर से कुछ दूरी पर जाकर खाना बनाया। आयोजकों ने कहा कि उनका किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का इरादा नहीं था। उन्होंने चूल्हा बनाने में इस्तेमाल हुईं मंदिर के पास रखी ईंटें वापस रख दीं और खाना बनाने के लिए कैंटीन से लोहे का चूल्हा मंगाया। साहा के मुताबिक, मंदिर समिति को ईंटों से ज्यादा आपत्ति मंदिर के इतने करीब खाना बनाने पर थी। उसी रात सनातनी छात्रों ने कैंपस में मार्च निकाला। इसके बाद सोशल मीडिया पर विवाद बढ़ गया। प्रशासन ने पशु वध पर रोक का नोटिस जारी किया 14 अक्टूबर को यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कैंपस में पशु वध से बचने के लिए नोटिस जारी किया। इसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य, साफ-सफाई और स्वच्छ वातावरण बनाए रखने का हवाला दिया गया था। नोटिस में ढाका साउथ सिटी कॉर्पोरेशन के नियमों का भी जिक्र था। बांग्लादेश के पशु वध और मांस गुणवत्ता नियंत्रण कानून, 2011 के तहत तय बूचड़खानों के बाहर पशु काटने पर कानूनी पाबंदियां हैं। नियम तोड़ने पर जेल या जुर्माना हो सकता है। यूनिवर्सिटी के प्रॉक्टर डॉ. एमडी आजम खान ने बीबीसी बांग्ला को बताया कि प्रशासन को कैंपस में पशु काटने की योजना की जानकारी मिली थी। दुर्गा पूजा के दौरान किसी नए विवाद से बचने के लिए छात्रों से ऐसा नहीं करने की अपील की गई थी। नोटिस के विरोध में छात्रों ने दावत का ऐलान किया प्रशासन के फैसले से नाराज छात्रों के एक समूह ने शुक्रवार को गाय काटकर दावत करने की घोषणा की। आयोजन समिति के एक सदस्य ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बीबीसी बांग्ला को बताया कि छात्र पहले दुर्गा पूजा के बाद कार्यक्रम करना चाहते थे, लेकिन नोटिस जारी होने के बाद उन्होंने इसे शुक्रवार को ही करने का फैसला किया। आयोजकों के मुताबिक, कार्यक्रम के लिए चंदा इकट्ठा करके एक गाय खरीदी गई है। सोशल मीडिया पर कार्यक्रम में शामिल होने के लिए 70 टका रजिस्ट्रेशन फीस रखी गई। आयोजकों ने बताया कि गाय काटने का कार्यक्रम मंदिर के सामने करने के बजाय आर्ट्स बिल्डिंग के पास खुले मैदान में किया जा सकता है। प्रशासन ने दूसरे नोटिस में आयोजन की छूट दी छात्रों के विरोध के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने दूसरा नोटिस जारी कर अपनी स्थिति साफ की। इसमें कहा गया कि 12 अक्टूबर को खिचड़ी बनाने को लेकर हुआ विवाद प्रॉक्टर के हस्तक्षेप से उसी दिन सुलझा लियागया था। अगले दिन संबंधित पक्षों के बीच बातचीत से भी मामला निपट गया था। प्रशासन ने कहा कि पशु वध से बचने की अपील का मकसद धार्मिक तनाव बढ़ने से रोकना था। हालांकि, इससे गलतफहमी पैदा हुई, जिसके लिए उसने खेद जताया। दूसरे नोटिस में स्पष्ट किया गया कि छात्रों को कैंपस में पशु वध समेत कार्यक्रम आयोजित करने का अधिकार है, लेकिन किसी आयोजन से दूसरे लोगों की धार्मिक गतिविधियों में बाधा नहीं आनी चाहिए। जगन्नाथ यूनिवर्सिटी केंद्रीय छात्र संघ के महासचिव अब्दुल अलीम आरिफ ने बीबीसी बांग्ला को बताया कि छात्र संघ और प्रशासन के बीच बैठक हुई है। उनके मुताबिक, दोनों पक्ष कार्यक्रम आयोजित करने पर सहमत हुए हैं। आरिफ इस्लामी छात्र शिबिर के नेता भी हैं, जो जमात-ए-इस्लामी से जुड़ा छात्र संगठन है। मंदिर समिति ने कहा- मंदिर के सामने न हो आयोजन केंद्रीय मंदिर प्रबंधन समिति के सदस्य सचिव जॉय साहा ने कहा कि समिति को कैंपस में गाय काटने पर आपत्ति नहीं है, लेकिन यह मंदिर के सामने नहीं होना चाहिए और इससे मंदिर की गतिविधियों में बाधा नहीं आनी चाहिए। प्रॉक्टर आजम खान ने भी कहा कि अगर छात्र शुक्रवार को विरोध स्वरूप गाय काटते हैं, तो उन्हें संयमित तरीके से आयोजन करना चाहिए, ताकि धार्मिक भावनाओं को लेकर कोई नया विवाद न हो। ——————– ये खबर भी पढ़ें…

UAE शाही परिवार की बहू को रिहैब कैंप भेजा गया:कोकीन के नशे में बेहोश मिली थी; 3 साल का बच्चे को अकेला छोड़ दिया था

UAE के शाही परिवार की बहू महराह अल नाहयान को लंदन में बच्चे की देखभाल में लापरवाही के मामले में सजा सुनाई गई है। इसके तहत उन्हें दो साल तक रिहैब प्रोग्राम में शामिल होना होगा। साथ ही उन्हें 7.7 लाख का जुर्माना भी भरना पड़ेगा। 4 महीने पहले वह लंदन की सड़क पर बेहोश मिली थीं। उनके पास 3 साल का बच्चा बिना जूते पहने स्कूटर से खेल रहा था। बच्चा व्यस्त सड़क पर चल रही गाड़ियों के करीब था। कोर्ट में महराह ने माना कि उन्होंने उस वक्त कोकीन ली थी। शादी के जरिए UAE के शाही परिवार से जुड़ी हैं महराह 32 साल की महराह अल नाहयान शादी के जरिए अबू धाबी के शासक परिवार अल नाहयान से जुड़ी हैं। यह परिवार दुनिया के सबसे अमीर और प्रभावशाली शाही परिवारों में गिना जाता है। न्यूयॉर्क पोस्ट के मुताबिक, परिवार की कुल संपत्ति करीब 300 अरब डॉलर है। अबू धाबी UAE के सात अमीरात में सबसे बड़ा है। यह देश का राजनीतिक केंद्र भी है। UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान इसी परिवार से हैं और अबू धाबी के शासक भी हैं। कोर्ट की सुनवाई के दौरान बताया गया कि महराह को हर महीने करीब 10 लाख रुपए मिलते हैं। महराह सड़क पर 30 मिनट तक बेहोश पड़ी थी यह घटना 13 जून को पश्चिमी लंदन में हुई थी। कोर्ट में बताया गया कि महराह लोहे की रेलिंग के सहारे बेहोश पड़ी थीं। पास में एक आदमी भी बेहोश था। वहीं, 3 साल का बच्चा खेल रहा था। वहां से गुजर रहे लोगों ने बच्चे को अकेला देखा तो उसकी मदद के लिए आगे आए। उन्होंने पुलिस के पहुंचने तक बच्चे को अपने पास रखा। एक शख्स ने घटना का वीडियो भी बनाया था। कोर्ट के मुताबिक, महराह करीब 30 मिनट तक बेहोश रहीं। जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने लोगों से पूछा कि वे इतनी चिंता क्यों कर रहे हैं। उन्होंने कहा, यह कोई कत्लखाना नहीं है, आपको इतनी परवाह क्यों है? आप इतने परेशान क्यों हैं? पुलिस ने महराह के बैग की तलाशी ली। उसमें नशे के इस्तेमाल से जुड़ा सामान मिला, लेकिन कोई गैरकानूनी नशीला पदार्थ नहीं मिला। वकील का दावा- घटना वाले दिन उन्होंने कोकीन नहीं ली थी कोर्ट में बताया गया कि महराह ने बेहोश मिलने से पहले के कुछ दिनों में कोकीन ली थी। हालांकि, उनके वकील स्टीफन वुलो KC ने कहा कि उन्होंने घटना वाले दिन नशा नहीं किया था। वह पिछले दिनों नशा करने के कारण बहुत थक गई थीं। वकील ने बताया कि महराह को अपनी गलती का पछतावा है और वह नशे की लत छोड़ना चाहती हैं। वह तीन महीने का इलाज करा रही हैं, जो अक्टूबर के आखिर तक पूरा होना था। इलाज के बाद महराह गिल्डफोर्ड इलाके में घर किराए पर लेने की योजना बना रही हैं। वहां वह दिन में इलाज कराएंगी और नशे की लत छोड़ने में मदद करने वाले समूह नारकोटिक्स एनोनिमस की बैठकों में शामिल होंगी। घटना के बाद से महराह सरे के वोकिंग इलाके में प्रायरी क्लिनिक में नशे की लत का इलाज करा रही हैं। उनके वकील ने कहा कि महराह जानती हैं कि उस दिन उनसे बहुत बड़ी गलती हुई थी। जज बोले- बच्चे की जान भी जा सकती थी साउथवार्क क्राउन कोर्ट में मंगलवार को महराह ने बच्चे की देखभाल में लापरवाही करने का जुर्म कबूल किया। जज जेरेमी जॉनसन ने कहा कि जब महराह बेहोश थी तब बच्चे की जान को खतरा था। जज ने कहा कि बच्चा सड़क पर भटक सकता था, खो सकता था या कोई अनजान व्यक्ति उसे नुकसान पहुंचा सकते थे। वह डर भी सकता था। जज के मुताबिक, नशे के असर में बच्चे को सड़क पर नंगे पैर अकेला छोड़ना उसकी सुरक्षा के प्रति लापरवाही थी ———————

UAE शाही परिवार की बहू को रिहैब कैंप भेजा गया:कोकीन के नशे में बेहोश मिली थी, 3 साल के बच्चे को अकेला छोड़ दिया था

UAE के शाही परिवार से जुड़ी 32 साल की महराह अल नाहयान को लंदन में बच्चे की देखभाल में लापरवाही के मामले में सजा सुनाई गई है। उन्हें दो साल तक रिहैब कार्यक्रम में शामिल होना होगा। साथ ही करीब 7.7 लाख रुपये का जुर्माना भी भरना पड़ेगा। यह मामला 13 जून का है। उस दिन महराह पश्चिमी लंदन की एक सड़क पर बेहोश मिली थीं। उनके पास उनका 3 साल का बच्चा बिना जूते पहने स्कूटर से खेल रहा था। बच्चा व्यस्त सड़क पर चल रही गाड़ियों के करीब था। कोर्ट में महराह ने माना कि उन्होंने कोकीन का इस्तेमाल किया था। सड़क किनारे 30 मिनट तक बेहोश पड़ी रहीं कोर्ट में बताया गया कि 13 जून को महराह लोहे की रेलिंग के सहारे बेहोश पड़ी थीं। उनके पास ही एक अन्य व्यक्ति भी बेहोश था। वहीं, उनका 3 साल का बच्चा अकेले खेल रहा था। वहां से गुजर रहे लोगों ने बच्चे को अकेला देखा तो उसकी मदद के लिए आगे आए। उन्होंने पुलिस के पहुंचने तक बच्चे को अपने पास रखा। इस दौरान एक व्यक्ति ने घटना का वीडियो भी बनाया था। कोर्ट के मुताबिक, महराह करीब 30 मिनट तक बेहोश रहीं। होश आने पर उन्होंने लोगों से पूछा कि वे इतनी चिंता क्यों कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “यह कोई कत्लखाना नहीं है। आपको इतनी परवाह क्यों है? आप इतने परेशान क्यों हैं?” पुलिस ने महराह के बैग की तलाशी ली। उसमें नशे के इस्तेमाल से जुड़ा सामान मिला, लेकिन कोई गैरकानूनी नशीला पदार्थ नहीं मिला। वकील ने कहा- घटना वाले दिन नशा नहीं किया था कोर्ट में बताया गया कि महराह ने बेहोश मिलने से पहले के कुछ दिनों में कोकीन ली थी। हालांकि, उनके वकील स्टीफन वुलो ने कहा कि उन्होंने घटना वाले दिन नशा नहीं किया था। वकील के मुताबिक, पिछले दिनों नशा करने के कारण वह बहुत थक गई थीं। वकील ने कोर्ट को बताया कि महराह को अपनी गलती का पछतावा है और वह नशे की लत छोड़ना चाहती हैं। वह तीन महीने का इलाज करा रही थीं, जो अक्टूबर के आखिर तक पूरा होना था। घटना के बाद से महराह सरे के वोकिंग इलाके में प्रायरी क्लिनिक में नशे की लत का इलाज करा रही हैं। इलाज के बाद उनकी गिल्डफोर्ड इलाके में घर किराए पर लेने की योजना है। वहां वह दिन में इलाज कराएंगी और नशे की लत छोड़ने में मदद करने वाले समूह नारकोटिक्स एनोनिमस की बैठकों में शामिल होंगी। जज बोले- बच्चे की जान भी जा सकती थी मंगलवार को लंदन के साउथवार्क क्राउन कोर्ट में महराह ने बच्चे की देखभाल में लापरवाही करने का जुर्म कबूल किया। जज जेरेमी जॉनसन ने कहा कि जब महराह बेहोश थीं, तब बच्चे की जान को खतरा था। जज के मुताबिक, बच्चा सड़क पर भटक सकता था, खो सकता था या कोई अनजान व्यक्ति उसे नुकसान पहुंचा सकता था। इस घटना से बच्चा डर भी सकता था। जज ने कहा कि नशे के असर में बच्चे को सड़क पर नंगे पैर अकेला छोड़ना उसकी सुरक्षा के प्रति लापरवाही थी। UAE के शाही परिवार से जुड़ी हैं महराह 32 साल की महराह अल नाहयान शादी के जरिए अबू धाबी के शासक परिवार अल नाहयान से जुड़ी हैं। हालांकि, सार्वजनिक रिपोर्टों में उनके पति का नाम और शाही परिवार में उनका सटीक रिश्ता स्पष्ट नहीं किया गया है। अबू धाबी का शासक परिवार दुनिया के सबसे अमीर और प्रभावशाली शाही परिवारों में गिना जाता है। परिवार की कुल संपत्ति करीब 300 अरब डॉलर है। अबू धाबी UAE के सात अमीरात में सबसे बड़ा है और देश का राजनीतिक केंद्र भी है। UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान इसी परिवार से हैं और अबू धाबी के शासक भी हैं। ——————— यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका के स्कूल में गोलीबारी, 4 की मौत: इनमें 3 बच्चे, स्थानीय नागरिक ने हमलावर को मार गिराया; इस साल स्कूलों में फायरिंग का 26वां मामला अमेरिका के ओरेगन राज्य के बेंड शहर में गुरुवार को एक स्कूल में गोलीबारी हुई। इसमें 3 बच्चों समेत 4 लोगों की मौत हो गई। पूरी खबर पढ़ें…

अमेरिका में 30 हजार भारतीय मजदूरों ने काम छोड़ा:इनके पास पूरे कागजात नहीं, पकड़े जाने का डर; फल-सब्जियों के दाम बढ़ने की आशंका

अमेरिका के कैलिफोनिया में करीब 30 हजार भारतीय मजदूरों को खेती का काम छोड़ना पड़ा है। इनमें से कई मजदूरों के पास अमेरिका में रहने और काम करने के पूरे कागजात नहीं हैं। ऐसे में इमिग्रेशन एजेंसी ICE के छापों और पकड़े जाने के डर से मजदूर खेतों में काम करने से बच रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक खेतों में मजदूरों की कमी हुई तो फल और सब्जियों के दाम 30 से 32% तक बढ़ सकते हैं। कैलिफोर्निया में हजारों लोग हिरासत में कैलिफोर्निया में डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार है। ट्रम्प ने राज्य सरकार पर प्रवासियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया है। इसके बाद ICE वहां भी कार्रवाई कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो महीनों में हजारों खेत मजदूरों को पकड़कर हिरासत केंद्रों में रखा गया है। कुछ लोगों को देश से निकाला भी गया है। अमेरिका में एक लाख भारतीय मजदूर खेती का काम करते हैं अमेरिका में बिना जरूरी कागजात के रह रहे करीब 7.5 लाख भारतीयों में से लगभग एक लाख खेती से जुड़े काम करते हैं। इमिग्रेशन एजेंसी ICE ग्रामीण इलाकों और खेतों में भी छापे मार रही है। कैलिफोर्निया से लेकर कैंसस तक कई जगह खेतों में मजदूरों की कमी देखी जा रही है। ट्रम्प सरकार प्रवासियों को देश से निकालने की कार्रवाई को अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है। बिना वकील के अपना पक्ष रखना मुश्किल अमेरिका में जरूरी कागजात के बिना रह रहे लोगों को भी कुछ कानूनी अधिकार मिले हैं। लेकिन कई प्रवासियों के लिए इन अधिकारों का इस्तेमाल करना मुश्किल हो गया है। कई प्रवासियों के पास वकील करने के पैसे नहीं हैं। ऐसे में उन्हें अपनी बात रखने का पूरा मौका मिले बिना ही अमेरिका से निकाला जा सकता है। पॉलिटिको की रिसर्च के मुताबिक, 40 से ज्यादा अदालतें करीब 5 हजार प्रवासियों के पक्ष में फैसला सुना चुकी हैं। इसके बावजूद सरकार इन प्रवासियों को इमिग्रेशन वकील नहीं दे रही है। छापों से बचने के लिए काम बदल रहे भारतीय ICE की कार्रवाई के डर से कई भारतीय मजदूर खेतों को छोड़ पेट्रोल पंप, किराना दुकान और इमारतों के निर्माण से जुड़े कामों में लग गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन जगहों पर फिलहाल छापों का डर कम है। कुछ भारतीय मजदूर मैक्सिको भी चले गए हैं लेकिन उनकी संख्या कम है। वहां खेतों में काम करने पर अमेरिका के मुकाबले कम पैसे मिलते हैं। ट्रम्प की चुनावी रणनीति से खेती पर असर पड़ेगा? मैसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टॉम जुराविच के मुताबिक मिडटर्म चुनाव में समर्थन हासिल करने के लिए ट्रम्प सरकार प्रवासियों को देश से निकालने पर जोर दे रही है। लेकिन इस कार्रवाई का असर खेती पर पड़ सकता है। अमेरिका में लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया से आए मजदूर खेतों में काम करते हैं। उन्हें अपने देश के मुकाबले ज्यादा मजदूरी मिलती है, लेकिन कई बार उनकी मजदूरी अमेरिकी मजदूरों से कम होती है। ट्रम्प की रणनीती से किसानों का नुकसान अमेरिका के खेतों में मशीनों के साथ मजदूरों की भी जरूरत होती है। अगर मजदूर कम हो गए, तो फसलों की बुवाई, देखभाल और कटाई का काम प्रभावित होगा। इससे किसानों को नुकसान हो सकता है और खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी खेती को हर साल करीब 6 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। स्ट्रॉबेरी जैसी जल्दी खराब होने वाली फसलों पर इसका असर ज्यादा पड़ सकता है। अमेरिकी खेती प्रवासी मजदूरों पर कितनी निर्भर? अमेरिका के नेशनल एग्रीकल्चरल वर्कर्स सर्वे के मुताबिक, खेतों में काम करने वाले करीब 45% मजदूर दूसरे देशों से आए हैं। पिछले साल किसानों ने खेतों में मजदूरों की भर्ती के लिए 4.15 लाख पद निकाले थे। लेकिन इन नौकरियों के लिए सिर्फ 182 श्वेत लोगों ने आवेदन किया। ————————- ये खबर भी पढ़ें… अमेरिका के स्कूल में गोलीबारी, 4 की मौत: इनमें 3 बच्चे, स्थानीय नागरिक ने हमलावर को मार गिराया अमेरिका के ओरेगन राज्य के बेंड शहर में गुरुवार को एक स्कूल में गोलीबारी हुई। इसमें 3 बच्चों समेत 4 लोगों की मौत हो गई। CNN के मुताबिक, हमलावर को एक स्थानीय नागरिक ने गोली मार दी, इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। हमलावर की उम्र करीब 16 साल थी। पूरी खबर यहां पढ़ें…