फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन:पेंशन से लेकर महंगाई तक, सरकार के फैसलों पर सड़कों पर उतर आते हैं लोग

फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। अधिकारियों के मुताबिक शनिवार को देशभर में हुए प्रदर्शनों में करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। कई जगह पुलिस से झड़प, दुकानों में लूटपाट और सरकारी इमारतों में आगजनी हुई। पेरिस और आसपास के इलाकों में 855 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि दुनिया के अमीर देशों में शामिल फ्रांस को लगातार आंदोलनों का सामना क्यों करना पड़ता है… 1. फ्रांस में प्रदर्शन करना लोगों की आदत नहीं, ताकत है फ्रांस में सरकार के फैसलों के खिलाफ सड़क पर उतरना कोई नई बात नहीं है। यहां छात्र, कर्मचारी और आम लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रदर्शन और हड़ताल करते रहे हैं। इसके पीछे फ्रांस का इतिहास भी एक बड़ी वजह है। 2. ट्रेड यूनियन और हड़तालें आंदोलन को बड़ा बनाती हैं फ्रांस में ट्रेड यूनियन कर्मचारियों को एकजुट कर बड़े पैमाने पर हड़तालें आयोजित करती हैं। इसका असर तब ज्यादा होता है, जब परिवहन, स्कूल और दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारी एक साथ काम बंद कर देते हैं। 1995 में इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेन जुप्पे की सरकार ने पेंशन में बदलाव का प्रस्ताव रखा था। इसके विरोध में रेलवे समेत कई क्षेत्रों के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। फ्रांस में रेल सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और पेरिस में लोगों को आने-जाने में परेशानी हुई। कई हफ्तों तक चले विरोध के बाद सरकार को अपनी प्रस्तावित योजना के अहम हिस्से वापस लेने पड़े। 3. फ्रांस में अमीर-गरीब की खाई भी विरोध की वजह फ्रांस में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता लंबे समय से एक मुद्दा रही है। इसका असर सिर्फ लोगों की कमाई और जीवनशैली पर नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी पड़ता है। फ्रांस की सरकारी संस्था INSEE के मुताबिक, देश के सबसे अमीर 10% परिवारों के पास कुल संपत्ति का करीब 47% हिस्सा है। वहीं, सबसे कम संपत्ति वाले 50% परिवारों के पास सिर्फ 8% संपत्ति है। यानी देश की आधी आबादी के मुकाबले अमीर परिवारों के पास कहीं ज्यादा संपत्ति है। आर्थिक असमानता का असर बच्चों की पढ़ाई में भी दिखाई देता है। OECD की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में अमीर परिवारों के बच्चों ने गणित में गरीब परिवारों के बच्चों के मुकाबले औसतन 113 अंक ज्यादा हासिल किए। 4. स्कूलों की खस्ता हालत भी 2026 में आंदोलन की वजह बनी फ्रांस स्कूलों की खराब हालत 2026 के आंदोनल की बड़ी वजह बनी। छात्रों की शिकायत है कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं और इसका असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसके पीछे फ्रांस की आर्थिक तंगी और उस पर बढ़ते कर्ज को भी वजह बताया जा रहा है। फ्रांस का सरकारी कर्ज उसकी GDP के 119.3% के बराबर है। धीमी आर्थिक विकास दर और कर्ज पर बढ़ते ब्याज के कारण सरकार पर बजट संभालने का दबाव है। सरकार को रक्षा, अस्पताल, नई तकनीक और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे क्षेत्रों पर भी खर्च करना है। ऐसे में शिक्षा सहित अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बजट तय करना चुनौती बन गया है। 5. फ्रांस में आंदोलन का असर यूरोप पर क्यों पड़ सकता है? फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों का असर यूरोप के दूसरे देशों की राजनीति पर भी पड़ सकता है। महंगाई, प्रवासन और सरकार की नीतियों से पहले से नाराज लोगों के बीच फिलिस्तीन के झंडे दिखने और दुकानों में लूटपाट के आरोप राष्ट्रीय पहचान और कानून-व्यवस्था पर बहस तेज कर सकते हैं। यूरोप में आर्थिक असंतोष नया नहीं है। फ्रांस के येलो वेस्ट आंदोलन से लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में महंगाई के खिलाफ हुए प्रदर्शनों तक, जीवन-यापन का बढ़ता खर्च लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह रहा है। वहीं, सीमा सुरक्षा और प्रवासन को लेकर भी कई देशों में बहस जारी है। ऐसे माहौल में फ्रांस में मरीन ले पेन की नेशनल रैली, जर्मनी में AfD और इटली में जॉर्जिया मेलोनी की पार्टी जैसे दक्षिणपंथी दलों को अपने मुद्दे उठाने का मौका मिल सकता है। फ्रांस में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता रहने से रक्षा, प्रवासन और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर यूरोपीय देशों के बीच सहमति बनाना भी मुश्किल हो सकता है। ————————— ये खबर भी पढ़ें…. फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और पुलिसकर्मियों को दौड़ाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

ट्रम्प ने इजराइलियों से कहा- नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री बनाएं:किसी और को चुना तो ईरान के खिलाफ अमेरिका को अकेले लड़ना पड़ेगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इजराइल के लोगों से प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री चुनने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बीबी नेतन्याहू आपको कभी निराश नहीं करेंगे। ट्रम्प ने चेतावनी दी कि अगर इजराइल ने नेतन्याहू के अलावा किसी दूसरे नेता को चुना, तो अमेरिका को ईरान के खिलाफ लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि वे ऐसा करने के इच्छुक नहीं हैं। ट्रम्प ने इजराइल के लोगों के नाम जारी संदेश में नेतन्याहू को ‘मजबूत, बहादुर और शानदार’ नेता बताया। ट्रम्प बोले- ईरान 51 साल से अमेरिका-इजराइल को मिटाने की धमकी दे रहा ट्रम्प ने ईरान पर पिछले 51 साल से इजराइल और अमेरिका को मिटाने की धमकी देने का आरोप लगाया। उन्होंने ईरान के नारे ‘इजराइल की मौत, अमेरिका की मौत’ का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे बयानों को नजरअंदाज करना खतरनाक है। उन्होंने दावा किया कि ईरान की सैन्य और आर्थिक ताकत को व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया है। ट्रम्प ने कहा कि अगर ईरान ने तेजी से अपना रवैया नहीं बदला, तो अमेरिका जल्द ही बाकी काम भी पूरा कर देगा। ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने नेतन्याहू को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते देखा है। उनके मुताबिक, ऐसे दबाव में आम लोग कमजोर पड़ जाते, लेकिन नेतन्याहू मजबूती से डटे रहे। उन्होंने यह भी कहा कि नेतन्याहू को इजराइल के भीतर से विरोध का सामना करना पड़ा है।

पाकिस्तान- 200 साल पुराने हिंदू मंदिर को तोड़ने की कोशिश:कमर्शियल प्लाजा बनाने के लिए राम लीला मंदिर को गिराने का आरोप

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में करीब 200 साल पुराने रामलीला मंदिर को तोड़ने की कोशिश की गई। आरोप है कि मंदिर की जगह कमर्शियल प्लाजा बनाने के लिए यह कदम उठाया गया। हिंदू समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरोध के बाद स्थानीय प्रशासन ने शनिवार को मंदिर को अपने कब्जे में लिया। इसके बाद इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ETPB) ने इसे सील कर दिया। यह मंदिर डेरा इस्माइल खान शहर के रहीम बाजार इलाके में स्थित है। डेरा सिविल सोसाइटी और स्थानीय व्यापार संघ के अध्यक्ष सोहेल अहमद अजमी के मुताबिक, उन्हें मंदिर गिराने की जानकारी मिली तो वे दूसरे लोगों के साथ मौके पर पहुंचे और काम रुकवाया। मंदिर की जमीन के मालिकाना हक की जांच की मांग घटना के बाद हिंदू समुदाय के सदस्यों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मंदिर की जमीन के मालिकाना हक और वहां व्यावसायिक निर्माण की वैधता की जांच कराने की मांग की। उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों से यह मामला पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में उठाने की अपील भी की। रामलीला मंदिर को डेरा इस्माइल खान की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत का हिस्सा माना जाता है। ETPB ने जिले की करीब 400 इमारतों को सांस्कृतिक विरासत के रूप में चिह्नित किया है। यह सरकारी संस्था बंटवारे के बाद भारत चले गए लोगों की छोड़ी संपत्तियों और अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्थलों का प्रबंधन करती है। धार्मिक स्थलों की सुरक्षा पर उठे सवाल ऑल पाकिस्तान हिंदू राइट्स मूवमेंट के अध्यक्ष हारून सरब डायल ने धार्मिक स्थलों को विशेष सुरक्षा देने की मांग की है। उन्होंने 2013 से 2026 के बीच धार्मिक संपत्तियों पर कथित अवैध कब्जे और उनकी बिक्री की जांच कराने की भी अपील की। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने भी धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर चिंता जताई है। आयोग की हालिया रिपोर्ट में हिंदू और ईसाई लड़कियों के अपहरण, जबरन शादी और धर्म परिवर्तन के मामलों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार का जिक्र किया गया है। आयोग ने धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की सिफारिश भी की है।

संडे प्रोफाइल : जॉन टर्नस:टर्नस के सामने एपल को एआई में आगे ले जाने की चुनौती

एपल के नए सीईओ जॉन टर्नस डिजाइन की खूबसूरती के साथ हार्डवेयर पर यकीन करते हैं। वे मानते हैं टेक्नोलॉजी से अलग हटकर दूसरी चीजों का भी महत्व है। टर्नस को हाल ही में टाइम मैगजीन के बेस्ट इन्वेंशन ऑफ 2026 के संस्करण के कवर पर जगह मिली है। सितंबर में एपल के बहुप्रतीक्षित फोल्डेबल फोन की लॉन्चिंग के दौरान जॉन टर्नस के हाथ कांप रहे थे। कार्यक्रम का यूट्यूब पर सीधा प्रसारण हो रहा था और कई लोगों ने इस पर ध्यान दिया। बाद में टर्नस ने बताया कि वे इतने उत्साहित थे कि रातभर सो नहीं पाए। इससे अपने प्रोडक्ट के प्रति उनका लगाव जाहिर होता है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले टर्नस ने एपल में 25 साल से ज्यादा समय तक काम किया है। इस दौरान उन्होंने आईफोन, मैक, आईपैड और एयरपॉड्स जैसे प्रोडक्ट को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाई। आईपैड की हर पीढ़ी और पहली पीढ़ी के एयरपॉड्स के हार्डवेयर विकास में वे शामिल रहे। मैक कंप्यूटर में इंटेल के प्रोसेसर की जगह एपल के अपने चिप लगाने के बदलाव में भी उन्होंने योगदान दिया। उनके काम में प्रोडक्ट को मजबूत और टिकाऊ बनाना और उनकी मरम्मत आसान करना भी शामिल रहा है। टर्नस से पहले एपल के सीईओ रहे टिम कुक और स्टीव जॉब्स की भूमिका अलग थी। कुक ने कंपनी के कारोबार को बढ़ाने, दुनिया भर में प्रोडक्ट पहुंचाने और सामान बनाने व सप्लाई करने की व्यवस्था को मजबूत करने पर काम किया। उनसे पहले स्टीव जॉब्स नए प्रोडक्ट की सोच, उनके डिजाइन और लोगों के इस्तेमाल के अनुभव पर ध्यान देते थे। आईफोन, आईपैड और आईपॉड जैसे प्रोडक्ट को दुनिया के सामने लाने में उनकी अहम भूमिका रही। टर्नस की खासियत यह है कि वे प्रोडक्ट के अंदरूनी हिस्सों, उसकी बनावट और काम करने के तरीके पर ध्यान देते हैं। वे यह सुनिश्चित करने में जुटे रहे कि प्रोडक्ट अच्छी तरह काम करें और लोगों के लिए उपयोगी हों। टर्नस का जन्म 1975 में हुआ था। आठ साल की उम्र में उनके पिता ने उन्हें एपल-2 कंप्यूटर दिया था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वर्चुअल रियलिटी से जुड़ी एक कंपनी में काम किया। 2001 में वे एपल की प्रोडक्ट डिजाइन टीम में इंजीनियर बने। 2013 में हार्डवेयर इंजीनियरिंग के वाइस प्रेसिडेंट और 2021 में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बने। इस दौरान कंपनी के कई बड़े प्रोजेक्ट्स में उनकी जिम्मेदारी बढ़ती गई। एपल के प्रोडक्ट डिजाइन वाइस प्रेसिडेंट रिचर्ड डिन्ह के अनुसार, कंपनी की अलग-अलग टीमों के बीच तालमेल बढ़ाने में टर्नस की अहम भूमिका रही है। अब उनके सामने एआई के क्षेत्र में एपल को आगे बढ़ाने की चुनौती है। दूसरी बड़ी टेक कंपनियां एआई पर तेजी से काम कर रही हैं, जबकि एपल की प्रगति पर सवाल उठे हैं। टर्नस का कहना है कि हम ऐसी एआई सुविधाओं पर काम कर रही है, जिनमें यूजर की निजी जानकारी सुरक्षित रहे। फिलहाल टर्नस डिजाइन स्टूडियो और यूजर्स से जुड़ी टीमों के साथ समय बिताते हैं।

कनाडा में सैन्य अड्डे पर धमाका, कई सैनिक मारे गए:रक्षा मंत्री बोले- ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा; यहां 1300 कर्मचारी तैनात थे

कनाडा के अल्बर्टा के सैन्य अड्डे पर शनिवार को जोरदार धमाके के बाद आग लग गई। इसमें कई सैनिक और कर्मचारी मारे गए। रक्षा मंत्री डेविड मैकगिन्टी ने हादसे की जानकारी दी। उन्होंने कहा, ‘मैंने ऐसा दर्दनाक दृश्य पहले कभी नहीं देखा।’ मृतकों और घायलों की संख्या फिलहाल नहीं बताई गई है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने सोशल मीडिया पर इसे गंभीर घटना बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन साथ मिलकर राहत और बचाव के काम में जुटी है। इस सैन्य अड्डे पर 1300 से ज्यादा सैनिक और कर्मचारी काम करते है। घटना के बाद की 3 तस्वीरें डॉक्टर बोले- स्वास्थ्य केंद्र मरीजों से भरे स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, विस्फोट के बाद तेज हवाओ के कारण आग सैन्य अड्डे के आसपास तेजी से फैल गई। कई इलाकों से दमकलकर्मी आग बुझाने के लिए पहुंचे। रॉयल एलेक्जेंड्रा अस्पताल के इमरजेंसी डॉक्टर वॉरेन थिर्स्क ने इसे 15 से 25 साल में एक बार होने वाली बड़ी आपदा बताया। उन्होंने कहा कि मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि शहर के स्वास्थ्य केंद्र पूरी तरह भर गए। अधिकारियों ने अभी तक यह नहीं बताया है कि धमाका कैसे हुआ और आग लगने की वजह क्या थी। रक्षा मंत्री मैकगिन्टी ने कहा कि कनाडा की रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) घटना की जांच कर रही है। यह कनाडा का सबसे व्यस्त सैन्य अड्डा है अल्बर्टा में यह सैन्य अड्डा कनाडा के अहम आर्मी ट्रेनिंग कैंप्स में से एक है। यहां सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार किया जाता है। यहां कनाडियन मैनूवर ट्रेनिंग सेंटर भी है, जहां जवान युद्ध के मैदान जैसी परिस्थितियों में ट्रेनिंग लेते हैं। इसके अलावा, यहां तीसरे कनाडाई डिवीजन के सैनिकों को भी सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है। ———————— यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका में चुनावी प्रचार में AI का इस्तेमाल बढ़ा:न्यूयॉर्क के मेयर को महंगाई की दवा बेचते, डेमोक्रेट उम्मीदवार को 9/11 पर हंसते दिखाया अमेरिका में मिडटर्म चुनाव से पहले राजनीतिक प्रचार में AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। उम्मीदवारों और राजनीतिक संगठनों ने AI से बने विज्ञापनों के प्रचार पर करीब 1300 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। पूरी खबर पढ़ें…

अमेरिका में चुनावी प्रचार में AI का इस्तेमाल बढ़ा:न्यूयॉर्क के मेयर को महंगाई की दवा बेचते, डेमोक्रेट उम्मीदवार को 9/11 पर हंसते दिखाया

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव से पहले राजनीतिक प्रचार में AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। उम्मीदवारों और राजनीतिक संगठनों ने AI से बने विज्ञापनों के प्रचार पर करीब 1300 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। एक विज्ञापन में न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और गवर्नर कैथी होकुल को महंगाई और अपराध का डर दूर करने वाली दवा बेचते दिखाया गया। एक दूसरे विज्ञापन में मिशिगन के डेमोक्रेटिक सीनेट उम्मीदवार डॉ. अब्दुल एल-सय्यद का AI से बना वीडियो दिखाया गया। इसमें वे ‘डेथ टू अमेरिका’ और ‘9/11 हमले का जश्न मनाओ’ लिखे कार्ड देखकर हंसते नजर आए। 80% AI विज्ञापन ट्रम्प की पार्टी ही बना रही अमेरिका की वेस्लेयन यूनिवर्सिटी की जांच में 220 से ज्यादा ऐसे वीडियो की पहचान हुई है जिनमें AI का इस्तेमाल किया गया था। वेस्लेयन मीडिया प्रोजेक्ट की प्रोफेसर एरिका फ्रैंकलिन फाउलर ने कहा, कई विज्ञापनों में AI का इस्तेमाल इतनी सफाई से किया गया कि बिना किसी जानकारी के यह पहचानना मुश्किल हो सकता है कि वीडियो में AI का इस्तेमाल हुआ है। इसका मकसद- विरोधियों को बदनाम करना AI से बनाए गए कुछ विज्ञापनों में राजनीतिक विरोधियों को ऐसे नेताओं के साथ दिखाया गया, जिनसे जुड़ने पर मतदाताओं के बीच विवाद हो सकता है। इनमें डेमोक्रेटिक पार्टी की हिलेरी क्लिंटन और अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज जैसे नेता शामिल हैं। ओक्लाहोमा में ‘मेक ओक्लाहोमा ग्रेट अगेन’ नाम के एक समूह ने डेमोक्रेटिक गवर्नर उम्मीदवार को हिलेरी क्लिंटन के साथ गले मिलते दिखाया। वीडियो में दोनों को हाथ पकड़े हुए दिखाया गया, जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प किनारे उदास खड़े नजर आए। स्क्रीन पर लिखा था, ‘क्लिंटन का समर्थक, ट्रम्प का विरोधी।’ चुनवी रैलियों में भीड़ के लिए भी AI का इस्तेमाल AI का इस्तेमाल चुनावी रैलियों में ज्यादा भीड़ दिखाने के लिए भी किया जा रहा है। वहीं, फ्लोरिडा के गवर्नर पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार जेम्स फिशबैक के एक विज्ञापन में उन्हें डेमोक्रेटिक सांसद इल्हान उमर और ईरान के नेताओं के साथ पार्टी करते दिखाया गया। वीडियो में ईरानी नेताओं को तलवारों से यहूदी धर्म के प्रतीक ‘स्टार ऑफ डेविड’ पर हमला करते दिखाया गया। राजनीतिक विज्ञापनों में AI का इस्तेमाल केवल नकली घटनाएं बनाने तक सीमित नहीं है। ओक्लाहोमा के रिपब्लिकन उम्मीदवार चिप कीटन के एक विज्ञापन की शुरुआत में उनकी पुरानी असली तस्वीर दिखाई गई। यह तस्वीर उस समय की थी, जब वे ओक्लाहोमा में पुलिस अधिकारी थे। AI की मदद से तस्वीर में उनका सिर ऊपर उठता और चेहरे पर बड़ी मुस्कान आती दिखाई गई। AI से 19 करोड़ में बनने वाले विज्ञापन 1 करोड़ में बन रहे हॉलीवुड की विज्ञापन कंपनी स्ट्रैटेजिक परसेप्शन के संस्थापक फ्रेड एन. डेविसे मुताबिक, AI विज्ञापन बनाने की लागत काफी कम कर रहा है। उन्होंने एक विज्ञापन का उदाहरण देते हुए बताया कि इसे पारंपरिक तरीके से बनाने पर करीब लगभग 19 करोड़ रुपए खर्च होते। इसमें कलाकारों, कपड़ों की व्यवस्था, खाने-पीने और कैमरा-लाइटिंग के साथ पूरे दिन की शूटिंग की जरूरत पड़ती। लेकिन AI की मदद से वही दृश्य तैयार करने पर खर्च करीब 1.8 करोड़ रुपए रह गया है। अब AI कम समय और कम खर्च में ऐसे विज्ञापन बना सकता है। कई बार दर्शकों को पता भी नहीं चलता कि वीडियो में दिखाई गई घटना असली नहीं है। डेमोक्रेटिक उम्मीदवार AI के इस्तेमाल में ज्यादा सतर्क डेमोक्रेटिक उम्मीदवार AI के इस्तेमाल को लेकर रिपब्लिकन उम्मीदवारों से ज्यादा सतर्क हैं। इसकी एक वजह यह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक इस तकनीक की ज्यादा आलोचना करते हैं और इस पर नियम बनाने की मांग करते हैं। वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और प्रोजेक्ट के सह-निदेशक ट्रैविस एन. रिडआउट ने कहा कि AI का इस्तेमाल करने से डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों और संगठनों की छवि को नुकसान पहुंचने का खतरा ज्यादा है, क्योंकि वे खुद इस तकनीक पर नियंत्रण के लिए नियम बनाने की मांग कर रहे हैं। —————————– यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका ने मदद रोकी तो यूक्रेन का क्या होगा:जेलेंस्की का साथ छोड़ पुतिन के साथ दिख रहे ट्रम्प; 1 सप्ताह में 4 झटके दिए रूस से करीब 5 साल से युद्ध लड़ रहे यूक्रेन के सामने अब नई मुसीबत खड़ी हो गई है। जिस अमेरिका के हथियारों और खुफिया जानकारी के दम पर यूक्रेनी सेना रूसी हमलों का मुकाबला कर रही है, उसी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…

फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS

फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। करीब एक महीने से चल रहा यह प्रदर्शन स्कूली छात्रों के बेहतर सुविधाओं और सरकारी सेवाओं में सुधार की मांग से शुरू हुआ था, जो अब बड़े सामाजिक आंदोलन में बदल गया है। कई जगह पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके गए, पुलिसकर्मियों को दौड़ाया गया। साथ ही एपल स्टोर्स से आईफोन लूटे गए। वहीं, लिमोज शहर में प्रदर्शनकारियों ने 143 साल पुराने टाउन हॉल में आग लगा दी। कुछ प्रदर्शनकारी जोकर और कैप्टन अमेरिका जैसे किरदारों की पोशाक पहनकर भी पहुंचे। देखें फ्रांस में जारी विरोध प्रदर्शन की 15 तस्वीरें… प्रदर्शन के दौरान आगजनी पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प अतरंगी पोशाक में प्रदर्शन के लिए पहुंचे लोग विरोध के दौरान दुकानों में लूट पोस्टर मैसेज के जरिए बेहतर शिक्षा की मांग ————————– फ्रांस में प्रदर्शन से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में महंगाई के खिलाफ 8 लाख लोग सड़कों पर:राष्ट्रपति भवन से 400 मीटर दूर हिंसक प्रदर्शन फ्रांस में बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों के विरोध में शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। फ्रांस 24 की रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी पेरिस में राष्ट्रपति भवन एलिजे पैलेस से महज 400 मीटर दूर प्रदर्शनकारियों ने हिंसक प्रदर्शन किया और गाड़ियों में आग लगा दी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

PAK-अफगानिस्तान सीमा पर गोलीबारी:7 पाकिस्तानी सैनिकों की मौत; इस साल दोनों देशों के बीच हमलों में 1100 आम नागरिक मारे जा चुके

पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर शनिवार को भारी गोलीबारी हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसमें 7 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए है। वहीं, पाकिस्तान ने दावा किया है कि जवाबी हमले में कई अफगान तालिबानी लड़ाके मारे गए और उनका एक सैन्य ठिकाना तबाह कर दिया गया। दोनों देशों के बीच यह झड़प विवादित डूरंड लाइन पर हुई। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में अब तक अफगानिस्तान में सीमा पार से होने वाली हिंसा के कारण 1100 से ज्यादा नागरिकों की मौत हुई है। पाकिस्तान बोला- अफगान लड़ाकों ने गोलीबारी की शुरूआत की पाकिस्तान ने कहा कि अफगान सीमा रक्षकों ने उसके चेकपॉइंट्स पर बिना उकसावे के गोलीबारी की। वहीं, अफगान सुरक्षा सूत्रों ने पाकिस्तान पर संघर्ष शुरू करने और बिना अनुमति सीमा चौकियां बनाने की कोशिश का आरोप लगाया। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के सैनिकों को नुकसान पहुंचाने के दावे किए हैं। अफगान सुरक्षा सूत्रों ने कहा कि पाकिस्तानी सैनिकों ने पहले गोलीबारी की। उनके मुताबिक, अफगान बलों ने जवाबी कार्रवाई की और पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों को नुकसान पहुंचाया। पाकिस्तान ने इसके उलट कहा कि अफगान सीमा रक्षकों ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के उत्तर-पश्चिमी कुर्रम जिले में उसके चेकपॉइंट्स पर गोली चलाई। पाकिस्तान का तालिबान ठिकाना नष्ट करने का दावा पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों ने शनिवार को हुई एक अलग गोलीबारी में कई अफगान तालिबान लड़ाकों को मारने का दावा किया। उन्होंने एक तालिबानी सैन्य बेस कैंप नष्ट करने की बात भी कही। इस्लामाबाद ने आरोप लगाया कि अफगान बलों ने आतंकियों को पाकिस्तानी क्षेत्र में घुसाने में मदद के लिए गोलीबारी की। इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने जवाबी कार्रवाई की। पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच क्या विवाद है? पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच पिछले साल अक्टूबर में सीमा पर बड़ी झड़पों के बाद से कई बार सैन्य टकराव हो चुका है। विवाद की एक बड़ी वजह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान का तालिबान प्रशासन TTP को पनाह देता है और उसके लड़ाके अफगान जमीन से सीमा पार हमलों की योजना बनाकर उन्हें अंजाम देते हैं। हालांकि, काबुल इन आरोपों को खारिज करता है। TTP, अफगान तालिबान का करीबी सहयोगी है और दोनों एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका का साथ दिया था, जिससे नाराज होकर TTP ने पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ लड़ाई शुरू की। संगठन पाकिस्तान सरकार को इस्लाम के खिलाफ मानता है। 2021 में अफगान तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद पाकिस्तान ने TTP को निशाना बनाकर अफगानिस्तान में हमले भी किए। 17 दिन पहले पाकिस्तान की एयरस्ट्राइक में बच्चों समेत 9 की मौत हुई थी पाकिस्तान ने 1 अक्टूबर को अफगानिस्तान में एयरस्ट्राइक की थी। इन हमलों में 9 लोगों की मौत और 11 लोग घायल हुए। मरने वालों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने दावा किया था कि इन हमलों में 3 घर तबाह हुए और यह अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है। हालांकि, पाकिस्तान ने कहा था कि उसने अफगानिस्तान में दो आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसमें कम से कम 22 लड़ाके मारे गए। ——————– यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में राष्ट्रपति भवन से 400 मीटर दूर हिंसक प्रदर्शन: 143 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत जलाई; महंगाई के खिलाफ 8 लाख लोग सड़कों पर फ्रांस में बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों के विरोध में शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पूरी खबर पढ़ें…

PAK-अफगानिस्तान सीमा पर गोलीबारी:7 पाकिस्तानी सैनिकों की मौत; इस साल दोनों देशों के बीच हमलों में 1100 आम नागरिक मारे जा चुके

पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर शनिवार को भारी गोलीबारी हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसमें 7 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए है। वहीं, पाकिस्तान ने दावा किया है कि जवाबी हमले में कई अफगान तालिबानी लड़ाके मारे गए और उनका एक सैन्य ठिकाना तबाह कर दिया गया। दोनों देशों के बीच यह झड़प विवादित डूरंड लाइन पर हुई। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में अब तक अफगानिस्तान में सीमा पार से होने वाली हिंसा के कारण 1100 से ज्यादा नागरिकों की मौत हुई है। पाकिस्तान बोला- अफगान लड़ाकों ने गोलीबारी की शुरूआत की पाकिस्तान ने कहा कि अफगान सीमा रक्षकों ने उसके चेकपॉइंट्स पर बिना उकसावे के गोलीबारी की। वहीं, अफगान सुरक्षा सूत्रों ने पाकिस्तान पर संघर्ष शुरू करने और बिना अनुमति सीमा चौकियां बनाने की कोशिश का आरोप लगाया। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के सैनिकों को नुकसान पहुंचाने के दावे किए हैं। अफगान सुरक्षा सूत्रों ने कहा कि पाकिस्तानी सैनिकों ने पहले गोलीबारी की। उनके मुताबिक, अफगान बलों ने जवाबी कार्रवाई की और पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों को नुकसान पहुंचाया। पाकिस्तान ने इसके उलट कहा कि अफगान सीमा रक्षकों ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के उत्तर-पश्चिमी कुर्रम जिले में उसके चेकपॉइंट्स पर गोली चलाई। पाकिस्तान का तालिबान ठिकाना नष्ट करने का दावा पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों ने शनिवार को हुई एक अलग गोलीबारी में कई अफगान तालिबान लड़ाकों को मारने का दावा किया। उन्होंने एक तालिबानी सैन्य बेस कैंप नष्ट करने की बात भी कही। इस्लामाबाद ने आरोप लगाया कि अफगान बलों ने आतंकियों को पाकिस्तानी क्षेत्र में घुसाने में मदद के लिए गोलीबारी की। इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने जवाबी कार्रवाई की। पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच क्या विवाद है? पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच पिछले साल अक्टूबर में सीमा पर बड़ी झड़पों के बाद से कई बार सैन्य टकराव हो चुका है। विवाद की एक बड़ी वजह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान का तालिबान प्रशासन TTP को पनाह देता है और उसके लड़ाके अफगान जमीन से सीमा पार हमलों की योजना बनाकर उन्हें अंजाम देते हैं। हालांकि, काबुल इन आरोपों को खारिज करता है। TTP, अफगान तालिबान का करीबी सहयोगी है और दोनों एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका का साथ दिया था, जिससे नाराज होकर TTP ने पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ लड़ाई शुरू की। संगठन पाकिस्तान सरकार को इस्लाम के खिलाफ मानता है। 2021 में अफगान तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद पाकिस्तान ने TTP को निशाना बनाकर अफगानिस्तान में हमले भी किए। 17 दिन पहले पाकिस्तान की एयरस्ट्राइक में बच्चों समेत 9 की मौत हुई थी पाकिस्तान ने 1 अक्टूबर को अफगानिस्तान में एयरस्ट्राइक की थी। इन हमलों में 9 लोगों की मौत और 11 लोग घायल हुए। मरने वालों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने दावा किया था कि इन हमलों में 3 घर तबाह हुए और यह अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है। हालांकि, पाकिस्तान ने कहा था कि उसने अफगानिस्तान में दो आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसमें कम से कम 22 लड़ाके मारे गए। ——————– यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में राष्ट्रपति भवन से 400 मीटर दूर हिंसक प्रदर्शन: 143 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत जलाई; महंगाई के खिलाफ 8 लाख लोग सड़कों पर फ्रांस में बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों के विरोध में शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पूरी खबर पढ़ें…

अमेरिका ने मदद रोकी तो यूक्रेन का क्या होगा:जेलेंस्की का साथ छोड़ पुतिन के साथ दिख रहे ट्रम्प; 1 सप्ताह में 4 झटके दिए

रूस से करीब 5 साल से युद्ध लड़ रहे यूक्रेन के सामने अब एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है। जिस अमेरिका के हथियारों और खुफिया जानकारी के दम पर यूक्रेनी सेना रूसी हमलों का मुकाबला कर रही है, उसी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। ट्रम्प ने महज एक सप्ताह में 4 ऐसे कदम उठाए, जिनसे यूक्रेन की मुश्किलें बढ़ गईं। अब सवाल है कि अगर ट्रम्प ने यूक्रेन को सैन्य मदद और खुफिया जानकारी देना बंद कर दिया, तो जेलेंस्की की सेना का क्या होगा? क्या यूक्रेन अमेरिकी मदद के बिना रूस का मुकाबला कर पाएगा? और ट्रम्प के बदले रुख से पुतिन को कितना फायदा मिल सकता है? 9 अक्टूबर: डीजल की बढ़ी कीमतों के लिए यूक्रेन युद्ध को जिम्मेदार ठहराया ट्रम्प ने रूस-यूक्रेन युद्ध को अमेरिका में डीजल की बढ़ती कीमतों की वजह बताया। इसके बाद उन्होंने रूसी डीजल की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी राहत दी। उनका कहना था कि इससे ईंधन की कीमतें कम करने में मदद मिलेगी। यह फैसला इसलिए अहम है, क्योंकि रूस तेल और गैस की बिक्री से बड़ी कमाई करता है। इस कमाई से उसे युद्ध का खर्च उठाने में भी मदद मिलती है। रूसी ईंधन की बिक्री पर राहत मिलने से मॉस्को को आर्थिक फायदा हो सकता है। 10 अक्टूबर: जेलेंस्की से कहा- नया राष्ट्रपति चुनो अगले दिन ट्रम्प ने सीधे जेलेंस्की के नेतृत्व पर सवाल उठा दिए। उन्होंने कहा कि यूक्रेन को नया राष्ट्रपति चुनना चाहिए, जो रूस के साथ समझौता करके युद्ध खत्म कर सके। ट्रम्प का आरोप था कि जेलेंस्की के पास युद्ध खत्म करने के कई मौके थे, लेकिन उन्होंने उनका फायदा नहीं उठाया। उनका कहना था कि यूक्रेन के राष्ट्रपति को रूस के साथ समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। 11 अक्टूबर: जेलेंस्की से बात किए बिना युद्धविराम का ऐलान तीसरे दिन ट्रम्प ने रूस-यूक्रेन युद्ध में ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने के लिए युद्धविराम का ऐलान किया। ऊर्जा ठिकानों में बिजली संयंत्र, तेल रिफाइनरी और ईंधन से जुड़े दूसरे महत्वपूर्ण ढांचे शामिल होते हैं। रूस और यूक्रेन दोनों एक-दूसरे के ऊर्जा ठिकानों पर हमले करते रहे हैं। इन हमलों से बिजली आपूर्ति, ईंधन की उपलब्धता और सैन्य अभियानों पर असर पड़ता है। लेकिन ट्रम्प के ऐलान के बाद विवाद खड़ा हो गया। जेलेंस्की ने कहा कि उन्हें इस समझौते की पहले से जानकारी नहीं थी। उन्होंने साफ किया कि यूक्रेन रूस के ऊर्जा ठिकानों पर हमले तभी रोकेगा, जब रूस भी यूक्रेन पर ऐसे हमले बंद करेगा। 13 अक्टूबर: स्टारलिंक सर्विस की स्पीड कम की यूक्रेन जिस इंटरनेट से अपने तेज रफ्तार ड्रोन उड़ा रहा था और रूस में हमले कर रहा था, उस पर अचानक स्पीड लॉक लगा दिया गया। पहले ये 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हमला करते थे। लॉक लगने के बाद इसकी रफ्तार 160 किमी प्रति घंटा रह गई। जैसे ही कोई ड्रोन इस रफ्तार से तेज हुआ, उस पर लगा इंटरनेट सिग्नल कट गया और ड्रोन गिरने लगा। जेलेंस्की ने इसका जिम्मेदार मस्क को बताया। बाद में मस्क ने इस पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह अमेरिकी सरकार कर रही है। अमेरिका ने मदद रोक दी तो यूक्रेन का क्या होगा? 1. मिसाइल हमलों की चेतावनी मिलने में दिक्कत: अमेरिका की खुफिया जानकारी यूक्रेन को रूसी मिसाइलों के हमलों के बारे में पहले से आगाह करने में मदद करती है। इससे सैनिकों और आम नागरिकों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचने का समय मिलता है। अमेरिकी जानकारी बंद होने पर यह व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। 2. पैट्रियट मिसाइलों की कमी: यूक्रेन पैट्रियट मिसाइलों की मदद से रूसी बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराने की कोशिश करता है। अगर अमेरिका इनकी आपूर्ति रोक देता है, तो यूक्रेन के शहरों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा करना और मुश्किल हो सकता है। 3. सैन्य अभियानों पर असर: अमेरिकी संचार तकनीक में रुकावट आने से ड्रोन के जरिए निगरानी और हमले करने, युद्ध के मैदान में सैनिकों की गतिविधियों पर नजर रखने और हमलों की योजना बनाने में मुश्किल होगी। 4. रूस पर दबाव बनाने की रणनीति कमजोर: यूक्रेन रूसी तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा ठिकानों पर हमले करके रूस की कमाई और युद्ध क्षमता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है। अगर अमेरिका इन हमलों का विरोध करता है और रूसी ईंधन की बिक्री पर राहत देता है, तो यूक्रेन की रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी मदद बंद होते ही यूक्रेन युद्ध हार जाएगा। यूक्रेन ने अपने देश में हथियारों का उत्पादन बढ़ाया है और यूरोपीय देश भी उसे सैन्य सहायता देते हैं। लेकिन अमेरिकी खुफिया जानकारी और कुछ खास हथियारों का पूरा विकल्प तैयार करना आसान नहीं होगा। ट्रम्प के फैसलों से रूस को क्या फायदा? रूस के लिए सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि यूक्रेन और अमेरिका के बीच मतभेद बढ़ने से कीव पर दबाव बढ़ेगा। अगर यूक्रेन को खुफिया जानकारी और हथियार कम मिलते हैं, तो उसे रूसी हमलों का मुकाबला करने में ज्यादा मुश्किल हो सकती है। रूसी ईंधन की बिक्री पर राहत मिलने से रूस को आर्थिक फायदा भी हो सकता है। वहीं, ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने का दबाव यूक्रेन की उस रणनीति को कमजोर कर सकता है, जिसके जरिए वह रूस की युद्ध क्षमता पर चोट करना चाहता है। ट्रम्प का जेलेंस्की का साथ छोड़ने की वजह क्या है? 1. युद्ध खत्म करने के लिए यूक्रेन पर दबाव: ट्रम्प चाहते हैं कि रूस और यूक्रेन के बीच जल्द समझौता हो। इसके लिए वे जेलेंस्की से रियायतें देने को कह रहे हैं। 2. रूस से रिश्ते सुधारने की कोशिश: ट्रम्प रूस के साथ बातचीत और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इससे यूक्रेन को मिलने वाली अमेरिकी मदद पर असर पड़ने की आशंका है। 3. अमेरिका में तेल की कीमतें घटाना: यूक्रेन के रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमलों से नाराज ट्रम्प ने कहा कि इन हमलों से डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं। वे रूस से डीजल की आपूर्ति बढ़ाकर कीमतें कम करना चाहते हैं। 4. पुतिन से समझौते की कोशिश: ट्रम्प ने रूस से डीजल कारोबार की अनुमति देने और जेलेंस्की पर हमले रोकने का दबाव बनाने जैसे कदम उठाए हैं। इससे रूस को आर्थिक फायदा मिल सकता है, जबकि यूक्रेन की स्थिति कमजोर पड़ने की आशंका है। —————————
यह खबर भी पढ़ें… मस्क ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड घटाई:रूस के खिलाफ सेना के ऑपरेशन पर असर
अमेरिकी अरबपति इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड पर लिमिट लगा दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…