पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, सभी सुरक्षित हैं। सूचना मंत्रालय के मुताबिक, हमले में 4 लोगों की मौत हुई है, जिनमें 2 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। हूती विद्रोहियों ने कहा कि उन्होंने अदन में सऊदी अरब के सैन्य अभियान मुख्यालय पर हमला किया। हूती मीडिया ने हथियारों के भंडार को निशाना बनाने का दावा भी किया। हालांकि, इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है। अदन यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार की अंतरिम राजधानी है। देश में सरकार और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच लंबे समय से संघर्ष जारी है। सऊदी अरब के समर्थन से लड़ रही यमन की सरकार यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है और हूतियों के खिलाफ लड़ रहे सरकारी सेनाओं को हवाई मदद देता है। वहीं, ईरान पर हूती विद्रोहियों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। राष्ट्रपति भवन परिसर पर हमले से यमन में संघर्ष और बढ़ने की आशंका है। हूतियों ने कहा है कि उनका निशाना सऊदी सैन्य अभियान से जुड़े ठिकाने थे। रिपोर्ट- चीन की मदद से मिसाइल बना रहे हूती विद्रोही यमन के हूती विद्रोही चीन से मंगाए गए पुर्जों की मदद से नई बैलिस्टिक मिसाइल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन की संस्था कॉन्फ्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च (CAR) की बुधवार को जारी रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, विद्रोही ईरान में डिजाइन हुई खैबर शिकन मिसाइल जैसी मिसाइल तैयार करना चाहते हैं, जिसकी मारक क्षमता करीब 1500 किलोमीटर है। अगर हूती ऐसा हथियार बनाने में सफल होते हैं, तो वे सऊदी अरब के अलावा इजराइल को भी ज्यादा सटीक तरीके से निशाना बना सकते हैं। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई ———————- ये खबर भी पढ़ें… इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूस की तेल रिफाइनरियों पर फिर हमले करने का ऐलान किया है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की हमले रोकने की अपील मानने से इनकार कर दिया। जेलेंस्की ने अमेरिका के रूस से डीजल खरीदने के फैसले को गलत बताते हुए कहा कि इससे रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए पैसा मिलेगा। उन्होंने ने गुरुवार को फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा, “अब बहुत हो चुका।” उन्होंने यह नहीं बताया कि रूसी रिफाइनरियों पर हमले कब शुरू होंगे। ट्रम्प की अपील पर यूक्रेन ने रोके थे हमले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने 11 अक्टूबर को रूस और यूक्रेन के बीच एनर्जी सीजफायर का ऐलान किया था। उन्होंने दोनों देशों से ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने की अपील की थी। यूक्रेन ने इस अपील के बाद रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले रोक दिए थे। हालांकि, यूक्रेन का आरोप है कि रूस ने उसके बिजलीघरों और बिजली सप्लाई करने वाले दूसरे ठिकानों पर हमले जारी रखे। वहीं रूसी राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने दावा किया था कि यूक्रेन ने रूसी रिफाइनरियों पर हमले कभी बंद ही नहीं किए थे। यूक्रेन का कहना है कि उसने अमेरिकी राष्ट्रपति की अपील का पालन किया। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने तेल ठिकानों पर यूक्रेन के हमलों को ट्रम्प के लिए सीधी चुनौती बताया था। अमेरिका ने रूस से डीजल खरीदने का समझौता किया ट्रम्प ने पिछले हफ्ते रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के साथ आने वाले महीनों में लाखों टन डीजल खरीदने का समझौता करने का ऐलान किया था। इसके बाद अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने रूस से डीजल निर्यात पर लगी पाबंदियां हटा दीं। ये प्रतिबंध 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद लगाए गए थे, ताकि पुतिन को युद्ध के लिए मिलने वाला पैसा कम किया जा सके। जेलेंस्की ने इस समझौते की आलोचना करते हुए कहा कि एक तरफ यूक्रेन के लोग युद्ध में जान गंवा रहे हैं, दूसरी तरफ अमेरिका रूस के साथ ऊर्जा कारोबार कर रहा है। उन्होंने कहा कि रूस को तेल और डीजल बेचकर मिलने वाला पैसा युद्ध जारी रखने में मदद करेगा। जेलेंस्की ने कहा कि अमेरिका और रूस के बीच ऊर्जा कारोबार बढ़ रहा है, जबकि यूक्रेन के लोग लड़ रहे हैं, जान गंवा रहे हैं और अपने देश को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। रूस के मिसाइल हमलों की जानकारी नहीं मिलने का आरोप जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेन को हाल के दिनों में रूसी बैलिस्टिक मिसाइल हमलों के बारे में पहले जैसी खुफिया जानकारी नहीं मिली। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने रूस के ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने के लिए यूक्रेन पर दबाव बनाया था। यूक्रेन की राजधानी कीव में रूसी हमलों के बाद करीब 6 लाख लोग बिजली से वंचित हो गए थे। जेलेंस्की के मुताबिक, रूस ने दर्जनों बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जिन्होंने यूक्रेन के ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचाया। अमेरिका के स्टारलिंक सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम के सैन्य इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाए जाने की खबरें भी सामने आईं। स्टारलिंक की मदद से यूक्रेनी सेना युद्ध के मैदान में कम्युनिकेशन बनाए रखती है। यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने गुरुवार को कहा कि वे जांच कर रहे हैं कि चलते हुए उपकरणों के लिए स्टारशील्ड की कनेक्टिविटी बहाल हुई है या नहीं। स्टारशील्ड, स्टारलिंक का सैन्य इस्तेमाल वाला सिस्टम है, जिसका खर्च अमेरिकी रक्षा मंत्रालय उठाता है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि यूक्रेन के साथ खुफिया जानकारी साझा करना कम नहीं किया गया है। उन्होंने ऐसी मदद रोकने की धमकी देने से भी इनकार किया। जेलेंस्की बोले- अमेरिका जैसा मजबूत साथी खो रहे जेलेंस्की ने ब्रिटिश पत्रकार पियर्स मॉर्गन को दिए इंटरव्यू में कहा कि उन्हें ट्रम्प के फैसलों से धोखा महसूस हुआ है। उन्होंने कहा कि यूक्रेन को अपने देश को बचाने के लिए अमेरिका और ट्रम्प पर भरोसा है, लेकिन हाल के फैसले दोनों देशों के बीच साझेदारी के अनुरूप नहीं हैं। जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेन अमेरिका जैसे मजबूत साझेदार को खो रहा है। उन्होंने ट्रम्प के पुतिन के साथ समझौते करने और तानाशाहों की तारीफ करने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पुतिन को “असली बुराई” बताते हुए कहा, “ट्रम्प उनसे दोस्ती कैसे कर सकते हैं? मुझे लगता है कि यह एक गलती है।” यूरोपीय नेताओं ने रूस की रिफाइनरियों पर हमले का समर्थन किया ब्रसेल्स में यूरोपीय नेताओं ने रूस की तेल रिफाइनरियों पर हमले फिर शुरू करने के जेलेंस्की के फैसले का ज्यादातर समर्थन किया। एस्टोनिया के प्रधानमंत्री क्रिस्टन मिहाल ने कहा कि रूस की रिफाइनरियों और उसकी ऊर्जा बेचने की क्षमता को जितना जल्दी नुकसान पहुंचे, उतना बेहतर है, क्योंकि रूस तेल बेचकर युद्ध के लिए पैसा जुटाता है। नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटन ने अमेरिका-रूस डीजल समझौते की आलोचना करते हुए कहा कि इससे दुनिया के बाजार में कीमतें कम होने की संभावना नहीं है, लेकिन पुतिन को युद्ध के लिए पैसा जरूर मिलेगा। उन्होंने इसे ट्रम्प का गलत फैसला बताया। हालांकि, बुल्गारिया के प्रधानमंत्री रुमेन रादेव ने कहा कि वह किसी भी तेल रिफाइनरी पर हमले का समर्थन नहीं करते। रूस की रिफाइनरी पर ड्रोन हमले के बाद आग लगी गुरुवार तड़के यूक्रेनी ड्रोन ने रूस के रियाजान इलाके में एक तेल रिफाइनरी पर हमला किया। इसके बाद वहां आग लग गई। यह इलाका मॉस्को से करीब 300 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है। रियाजान के गवर्नर पावेल माल्कोव और रूस के रक्षा मंत्रालय ने हमले के बाद आग लगने की जानकारी दी। एक वरिष्ठ यूक्रेनी अधिकारी ने भी पुष्टि की कि यूक्रेन ने रिफाइनरी को निशाना बनाया था। हालांकि, आग से हुए नुकसान की पूरी जानकारी सामने नहीं आई है। यह हमला जेलेंस्की के उस बयान के कुछ घंटे बाद हुआ, जिसमें उन्होंने रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले फिर शुरू करने की बात कही थी। ——————————– ये खबर भी पढ़ें… मस्क ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड घटाई:रूस के खिलाफ सेना के ऑपरेशन पर असर; यही सर्विस भारत में शुरू करना चाहते हैं मस्क अमेरिकी अरबपति इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड पर लिमिट लगा दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत पर 100% टैरिफ लगाने को लेकर करीब 10 दिन में फैसला ले सकते हैं। यह बात अमेरिकी दूत सर्जियो गोर ने ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में कही। गोर ने कहा कि भारत को प्रतिबंधों से छूट मिलेगी या नहीं, यह भी ट्रम्प ही तय करेंगे। अमेरिकी संसद ने 18 सितंबर को रूस से तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाने का बिल पास किया था। ट्रम्प ने भी इस कानून को मंजूरी दे दी है, लेकिन किसी देश पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। हालांकि कानून पारित होने के 30 दिनों के भीतर फैसला लेना जरूरी है। गोर ने कहा कि इस कानून का मकसद किसी देश को सजा देना नहीं, बल्कि रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने के लिए रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। अमेरिका दूसरे देशों के साथ मिलकर रूस को युद्ध के लिए मिलने वाले पैसे को धीरे-धीरे कम करना चाहता है। कानून में प्रतिबंध लगाने के तीन आधार सर्जियो गोर ने कहा कि संसद ने प्रतिबंधों के तीन विकल्प दिए हैं। इनमें तेल, गैस और प्रतिबंधों से बचने में मदद करना शामिल है। उन्होंने कहा, “इन प्रतिबंधों का निशाना किसी एक देश पर नहीं है। कांग्रेस ने तीन अलग-अलग श्रेणियां तय की हैं। पहली तेल, दूसरी गैस और तीसरी प्रतिबंधों से बचने में मदद करना है।” गोर ने कहा कि इन श्रेणियों में शामिल लोगों की पहचान आंकड़ों के आधार पर की जाती है। उन्होंने कहा कि भारत भी कई अन्य देशों के साथ इनमें से एक श्रेणी में आता है। ट्रम्प अब खुद रूस से डीजल खरीद रहे ट्रम्प अब खुद रूस से डीजल खरीदने जा रहे हैं। उन्होंने रूस से डीजल खरीदने पर लगी रोक 7 अप्रैल 2027 तक हटा दी है। अमेरिका में ईरान जंग के बाद डीजल की कीमतें बढ़कर 6.28 डॉलर प्रति गैलन हो गई हैं। माना जा रहा है कि कीमतें कम करने के लिए ट्रम्प ने यह फैसला लिया है। अमेरिका में जंग से पहले डीजल करीब 3.70 डॉलर प्रति गैलन बिक रहा था। अब इसकी कीमत 6.28 डॉलर हो गई है। 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले ईंधन की बढ़ती कीमतें ट्रम्प प्रशासन के लिए चुनौती बनी हुई हैं। ट्रम्प के मुताबिक, रूस तुरंत 3 लाख टन से ज्यादा डीजल भेजेगा। इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और फिर 10 लाख टन डीजल की आपूर्ति की जाएगी। आगे चलकर यह मात्रा 30 लाख टन तक पहुंच सकती है। भारत से ट्रेड डील पर भी बातचीत जारी गोर ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर कहा कि बातचीत में काफी प्रगति हुई है और बड़े मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। अब कुछ छोटे मुद्दों पर चर्चा बाकी है। दोनों देशों के बीच करीब डेढ़ साल से बातचीत चल रही है। उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत के साथ डिफेंस, आईटी, डेटा सेंटर और चिप मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना चाहता है। गोर ने भारत को AI डेवलपमेंट का बड़ा केंद्र बनने के लिए उपयुक्त बताया। उनके मुताबिक, भारतीय और अमेरिकी टेक कंपनियों की साझेदारी से दोनों देशों को फायदा होगा।
पाकिस्तान के पेशावर में गुरुवार को एक प्राइवेट स्कूल की छत गिरने से 21 लोगों की मौत हो गई। इनमें 20 छात्र और एक महिला टीचर शामिल हैं। सभी बच्चों की उम्र 13 साल या उससे कम है। यह हादसा दीर कॉलोनी इलाके में हुआ। इसमें 40 से ज्यादा लोग घायल भी हुए हैं। उनके इलाज के लिए अस्पताल में इमरजेंसी घोषित कर दी गई है। हादसे से जुड़ी 3 फोटोज खबर लगातार अपडेट हो रही है…
रूस से तेल खरीदने पर भारत पर दबाव बनाने वाला यूरोप खुद भी उससे बड़े पैमाने पर तेल-गैस खरीद रहा है। 2022 से अब तक यूरोपीय देशों ने रूस से करीब 30 लाख करोड़ रुपए का ईंधन खरीदा है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने जुलाई 2025 में गुजरात स्थित नायरा एनर्जी की रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाए थे, जिसमें रूस की तेल कंपनी रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी रही है। 2026 के शुरुआती नौ महीनों में भी करीब 2.03 लाख करोड़ रुपए की खरीद हुई। रूस के मुताबिक, जिन रास्तों से रूसी ऊर्जा खरीदने की छूट है, उनके जरिए यूरोप को तेल और गैस की सप्लाई जारी है। रूस से ईंधन छूट के नियम अलग-अलग यूरोप के सभी देशों की स्थिति एक जैसी नहीं है। वहीं, भारत की रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी प्रशासन अतिरिक्त आयात शुल्क लगा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत पर दबाव और यूरोपीय देशों को मिली छूट के नियम अलग-अलग क्यों हैं। भास्कर एनालिसिस: खरीद रोकने से यूरोप को मंहगाई का डर तेल-गैस महंगी हो सकती है यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप में गैस और बिजली की कीमतें बढ़ी थीं। रिपोर्ट में गैस की कीमतों में 46% और बिजली की कीमतों में 21% तक बढ़ोतरी का दावा किया गया है। रूस से सप्लाई पूरी तरह बंद होने पर कीमतें फिर बढ़ सकती हैं। इससे आम लोगों के बिल और कंपनियों की लागत बढ़ने का डर है। 2026 में भी रूस से गैस खरीद बढ़ी यूरोपीय संघ की ऊर्जा नियामक एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से मई 2026 के बीच यूरोप में रूस से पाइपलाइन के जरिए आने वाली गैस की खरीद पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 7% बढ़ी। रूस से तरल प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की खरीद भी 11% बढ़ी। इससे पता चलता है कि प्रतिबंधों के बावजूद यूरोप की रूस पर ऊर्जा निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दूसरे देशों से गैस खरीदना भी आसान नहीं यूरोप अमेरिका और दूसरे देशों से भी गैस खरीदता है। लेकिन दूसरे देशों से गैस मंगाने के लिए अलग इंतजाम और खर्च की जरूरत होती है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से भी ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है। ऐसे में रूस से खरीद तुरंत बंद करना यूरोप के लिए आसान नहीं है। पहले से हुए समझौते भी बड़ी वजह यूरोपीय कंपनियों ने रूस के साथ लंबे समय के लिए गैस खरीदने के समझौते कर रखे हैं। यूरोप की ऊर्जा नियामक एजेंसी के मुताबिक, रूसी एलएनजी खरीदने के लिए कुछ कंपनियों के सालाना 20 से 32 अरब घनमीटर तक के अनुबंध हैं। इन समझौतों और दूसरी जगह से गैस लाने के इंतजाम में समय लगने के कारण आयात बंद करना मुश्किल है। रूस की एलएनजी का सबसे बड़ा खरीदार EU है ऊर्जा पर नजर रखने वाली संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के मुताबिक, दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस से होने वाले एलएनजी निर्यात में यूरोपीय संघ (EU) की हिस्सेदारी 49% थी। चीन की हिस्सेदारी 24% रही। पाइपलाइन के जरिए भेजी जाने वाली रूसी गैस में भी यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 32% थी। चीन की हिस्सेदारी 31% और तुर्किये की 29% रही। यानी रूस से गैस खरीदने में यूरोप अब भी अहम भूमिका निभा रहा है। रूस से एलएनजी खरीदने वाले प्रमुख यूरोपीय देशों में फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन समेत नीदरलैंड्स भी शामिल है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… मस्क ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड घटाई: रूस के खिलाफ सेना के ऑपरेशन पर असर अमेरिकी अरबपति इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड पर लिमिट लगा दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
रूस से तेल खरीदने पर भारत पर दबाव बनाने वाला यूरोप खुद भी उससे बड़े पैमाने पर तेल-गैस खरीद रहा है। 2022 से अब तक यूरोपीय देशों ने रूस से करीब 30 लाख करोड़ रुपए का ईंधन खरीदा है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने जुलाई 2025 में गुजरात स्थित नायरा एनर्जी की रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाए थे, जिसमें रूस की तेल कंपनी रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी रही है। 2026 के शुरुआती नौ महीनों में भी करीब 2.03 लाख करोड़ रुपए की खरीद हुई। रूस के मुताबिक, जिन रास्तों से रूसी ऊर्जा खरीदने की छूट है, उनके जरिए यूरोप को तेल और गैस की सप्लाई जारी है। रूस से ईंधन छूट के नियम अलग-अलग यूरोप के सभी देशों की स्थिति एक जैसी नहीं है। वहीं, भारत की रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी प्रशासन अतिरिक्त आयात शुल्क लगा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत पर दबाव और यूरोपीय देशों को मिली छूट के नियम अलग-अलग क्यों हैं। भास्कर एनालिसिस: खरीद रोकने से यूरोप को मंहगाई का डर तेल-गैस महंगी हो सकती है यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप में गैस और बिजली की कीमतें बढ़ी थीं। रिपोर्ट में गैस की कीमतों में 46% और बिजली की कीमतों में 21% तक बढ़ोतरी का दावा किया गया है। रूस से सप्लाई पूरी तरह बंद होने पर कीमतें फिर बढ़ सकती हैं। इससे आम लोगों के बिल और कंपनियों की लागत बढ़ने का डर है। 2026 में भी रूस से गैस खरीद बढ़ी यूरोपीय संघ की ऊर्जा नियामक एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से मई 2026 के बीच यूरोप में रूस से पाइपलाइन के जरिए आने वाली गैस की खरीद पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 7% बढ़ी। रूस से तरल प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की खरीद भी 11% बढ़ी। इससे पता चलता है कि प्रतिबंधों के बावजूद यूरोप की रूस पर ऊर्जा निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दूसरे देशों से गैस खरीदना भी आसान नहीं यूरोप अमेरिका और दूसरे देशों से भी गैस खरीदता है। लेकिन दूसरे देशों से गैस मंगाने के लिए अलग इंतजाम और खर्च की जरूरत होती है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से भी ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है। ऐसे में रूस से खरीद तुरंत बंद करना यूरोप के लिए आसान नहीं है। पहले से हुए समझौते भी बड़ी वजह यूरोपीय कंपनियों ने रूस के साथ लंबे समय के लिए गैस खरीदने के समझौते कर रखे हैं। यूरोप की ऊर्जा नियामक एजेंसी के मुताबिक, रूसी एलएनजी खरीदने के लिए कुछ कंपनियों के सालाना 20 से 32 अरब घनमीटर तक के अनुबंध हैं। इन समझौतों और दूसरी जगह से गैस लाने के इंतजाम में समय लगने के कारण आयात बंद करना मुश्किल है। रूस की एलएनजी का सबसे बड़ा खरीदार EU है ऊर्जा पर नजर रखने वाली संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के मुताबिक, दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस से होने वाले एलएनजी निर्यात में यूरोपीय संघ (EU) की हिस्सेदारी 49% थी। चीन की हिस्सेदारी 24% रही। पाइपलाइन के जरिए भेजी जाने वाली रूसी गैस में भी यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 32% थी। चीन की हिस्सेदारी 31% और तुर्किये की 29% रही। यानी रूस से गैस खरीदने में यूरोप अब भी अहम भूमिका निभा रहा है। रूस से एलएनजी खरीदने वाले प्रमुख यूरोपीय देशों में फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन समेत नीदरलैंड्स भी शामिल है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… मस्क ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड घटाई: रूस के खिलाफ सेना के ऑपरेशन पर असर अमेरिकी अरबपति इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड पर लिमिट लगा दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
अमेरिका के इलिनॉय में के ऑरोरा इलाके में 19 साल का एक युवक हिंदू मंदिर पर हमला करने की योजना बना रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, युवक भारतीय मूल के लोगों से नफरत करता था। उसके घर से राइफल, कई भरी हुई मैगजीन और सैकड़ों गोलियां मिली हैं। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। एक व्यक्ति ने पुलिस को जानकारी दी थी आरोपी का नाम अलेक्जेंड्रोस पापोराकिस है। पुलिस के मुताबिक, 11 अक्टूबर को माउंट प्रॉस्पेक्ट पुलिस को एक व्यक्ति ने बताया कि उसे पापोराकिस के कुछ मैसेज मिले हैं। इन मैसेज के साथ एक दस्तावेज भी था, जिसमें हिंदू मंदिर में गोलीबारी करने की योजना का जिक्र था। पुलिस ने पापोराकिस को उसके घर से निकलते समय पकड़ लिया। इसके बाद उसके घर की तलाशी ली गई। उसके घर में मिली एक जैकेट पर ऐसा निशान भी था, जो गोरी नस्ल को दूसरों से बेहतर मानने वाले चरमपंथियों से जुड़ा है। पुलिस ने फिलहाल मंदिर का नाम नहीं बताया है। ऑरोरा में श्री वेंकटेश्वर स्वामी (बालाजी) मंदिर है, लेकिन इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि युवक इसी मंदिर को निशाना बनाना चाहता था। आतंकवादी धमकी देने और अवैध हथियार रखने के आरोप पापोराकिस पर आतंकवादी धमकी देने और गैरकानूनी तरीके से हथियार रखने के आरोप लगाए गए हैं। बुधवार को अदालत में सुनवाई के बाद जज ने उसे हिरासत में रखने का आदेश दिया। FBI शिकागो के अधिकारी रयान व्हेलन ने कहा कि एजेंसी चरमपंथी सोच से जुड़ी हिंसा की धमकियों का पता लगाने और उनकी जांच करने के लिए स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर काम करती है। 2 अक्टूबर को ओहायो में हिंदू मंदिर पर हमला हुआ था 2 अक्टूबर 2026 को अमेरिका के ओहायो राज्य के रिचमंड हाइट्स में स्थित श्री स्वामीनारायण वडताल धाम हिंदू मंदिर की खिड़कियों पर ईंटें फेंकी गईं थीं। घटना के समय मंदिर के अंदर पुजारी और श्रद्धालु मौजूद थे, लेकिन कोई घायल नहीं हुआ। पुलिस ने एक संदिग्ध की पहचान की थी। हालांकि, पुलिस के मुताबिक, घटना के पीछे धार्मिक या नस्लीय नफरत होने का कोई सबूत नहीं मिला था और जांच जारी थी। अमेरिका में पहले भी मंदिरों पर हमले हुए कोएलिशन ऑफ हिंदूज ऑफ नॉर्थ अमेरिका पहले भी अमेरिका में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा और मंदिरों में तोड़फोड़ को लेकर चिंता जताता रहा है। संगठन ने ऐसे मामलों की एक टाइमलाइन भी तैयार की है। अमेरिका में हेट क्राइम 30% बढ़ने का खतरा अमेरिका में नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव में इमिग्रेशन विरोध बड़ा मुद्दा बन रहा है। भारतीयों के खिलाफ हेट क्राइम के मामले 30% तक बढ़ने की आशंका है। न्यूयॉर्क के क्वींस इलाके में 20 साल से रेस्तरां चलाने वाले भारतवंशी मोमिन अली (बदला हुआ नाम) कहते हैं कि ट्रम्प के समर्थक श्वेत गुट भारतीयों के रेस्तरां में जासूसी करते हैं। प्रवासियों के मुद्दे से जुड़े संगठन एपीआई ने एक मॉड्यूल का अध्ययन कर चेताया है कि नवंबर तक भारतीयों के खिलाफ हेट क्राइम के मामले 58 हजार होने का खतरा है। जबकि इस साल जुलाई तक भारतीयों के खिलाफ हेट क्राइम के 44,535 मामले सामने आए थे। अमेरिका में चुनाव और भारतीयों से जुड़ा कोई भी मुद्दा सामने आने पर राष्ट्रपति ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी एंटी इमिग्रेशन मुद्दा उठाती है। भारतीयों के खिलाफ जॉब छीनने का आरोप भी लगाया जाता है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… OpenAI ऑफिस में जासूसी की कोशिश करने वाला गिरफ्तार: TV के पीछे रिकॉर्डर लगाया था अमेरिकी कंपनी OpenAI के सैन फ्रांसिस्को ऑफिस में जासूसी की कोशिश करने वाले कर्मचारी को FBI ने गिरफ्तार कर लिया है। कर्मचारी ने कॉन्फ्रेंस रूम में टीवी के पीछे रिकॉर्डिंग डिवाइस छिपा दिया था। पूरी खबर यहां पढ़ें…
यमन के हूती विद्रोही चीन से मंगाए गए पुर्जों की मदद से नई बैलिस्टिक मिसाइल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन की संस्था कॉन्फ्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च (CAR) की बुधवार को जारी रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, विद्रोही ईरान में डिजाइन हुई खैबर शिकन मिसाइल जैसी मिसाइल तैयार करना चाहते हैं, जिसकी मारक क्षमता करीब 1500 किलोमीटर है। अगर हूती ऐसा हथियार बनाने में सफल होते हैं, तो वे सऊदी अरब के अलावा इजराइल को भी ज्यादा सटीक तरीके से निशाना बना सकते हैं। हथियार बनाने के लिए जरूरी सामान जुटा रहे हूती रिपोर्ट के मुताबिक, यमन के अधिकारियों ने जुलाई में चीन से भेजे गए दो संदिग्ध सामानों की खेप पकड़ी थी। इनमें मिसाइल बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई अहम पुर्जे मिले। पकड़ी गई खेप चीन से भेजी गई थी। इसे यमन के होदेइदा बंदरगाह पहुंचाया जाना था। इजराइली अधिकारियों का कहना है कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल ईरान हथियारों की सप्लाई के लिए करता रहा है। पकड़ी गई खेप में क्या-क्या मिला? रिपोर्ट तैयार करने वाली संस्था के वरिष्ठ विश्लेषक फैबियन हिंज के मुताबिक, हूती ईरान में डिजाइन की गई खास तरह की मिसाइल बनाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इन पुर्जों का इस्तेमाल आम नागरिक कामों में करना मुश्किल है। हूतियों की हथियार बनाने की क्षमता पहले से ज्यादा हूती करीब दो दशक पहले यमन में एक विद्रोही संगठन के तौर पर उभरे थे। शुरुआत में उनके पास यमन की सेना से हासिल सोवियत दौर के और उत्तर कोरिया में बने हथियार थे। समय के साथ उन्हें ज्यादा आधुनिक हथियार और तकनीक मिलने लगी। ईरान पर निर्भरता घटाने की कोशिश क्यों? ईरान लंबे समय से हूतियों को हथियार बनाने की तकनीक, डिजाइन और जरूरी पुर्जे देता रहा है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, अब हूती चीन समेत दूसरे देशों से भी हथियार बनाने का सामान जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी थिंक टैंक फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के ईरान कार्यक्रम के वरिष्ठ निदेशक बेहनाम बेन तालेब्लू ने कहा कि हथियार बनाने के लिए कई जगहों से सामान मिलना किसी संगठन के लिए फायदेमंद होता है। उनके मुताबिक, ईरान पर रोक के बीच हूती सामान जुटाने के दूसरे रास्ते तलाश रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हूती अभी मिसाइल के लिए जरूरी जटिल सिस्टम के लिए ईरान पर निर्भर हैं। वे दूसरे देशों से मिले पुर्जों को जोड़कर कुछ हथियार बना सकते हैं, लेकिन आधुनिक हथियारों की पूरी तकनीक खुद विकसित नहीं कर सकते। चीन के लिए कूटनीतिक चुनौती बढ़ सकती है चीन ईरान और सऊदी अरब, दोनों से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है। 2023 में चीन ने दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने में भी भूमिका निभाई थी। चीन ने सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर हूतियों के हमलों की निंदा की है और संघर्ष कम करने की अपील की है। अब अगर चीन से आए पुर्जों का इस्तेमाल हूती मिसाइल बनाने में होने के दावे की पुष्टि होती है, तो सऊदी अरब और चीन के रिश्तों पर दबाव बढ़ सकता है। चीन सऊदी अरब का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है। मध्य पूर्व के विशेषज्ञ क्रिस्टियन उलरिचसन के मुताबिक, सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे और एयरपोर्ट पर हमलों के बाद चीन पर इस मुद्दे को लेकर ज्यादा दबाव पड़ सकता है। फिलहाल यह साफ नहीं होता कि चीन की सरकार ने जानबूझकर हूतियों को मिसाइल बनाने के लिए सामान भेजा था। ————————- यह खबर भी पढ़ें… होर्मुज में बारूदी सुरंग से टकराकर जहाज डूबा: जंग शुरू होने के बाद पहली बार ऐसा हुआ होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री बारूदी सुरंग से टकराकर बुधवार सुबह एक मालवाहक जहाज डूब गया। जहाज में 2500 कंटेनर थे। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने यह जानकारी दी। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते। बुधवार को इजराइली आर्मी रेडियो से बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ईरान पर हमला करना ठीक नहीं होगा। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान ने इजराइल पर हमला किया, तो उसे कड़ा जवाब दिया जाएगा। नेतन्याहू ने कहा कि अगर ईरान इजराइल पर मिसाइलें दागता है, तो उनके विरोधी इसके लिए भी उन्हें ही जिम्मेदार ठहराएंगे। विपक्ष का आरोप है कि नेतन्याहू चुनाव से पहले ईरान के साथ लड़ाई शुरू कर सकते हैं। जून के बाद से ईरान और इजराइल के बीच सीधा हमला नहीं अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमले किए थे। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और खाड़ी देशों पर हमले किए। जून के बाद से दोनों देशों के बीच सीधे हमले नहीं हुए हैं। नेतन्याहू ने कहा कि मिडिल-ईस्ट के कई देश इजराइल की सैन्य कामयाबी के बाद उससे संपर्क कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया कि क्या इजराइल सऊदी अरब को हूती विद्रोहियों के हमलों से बचाने में मदद कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक हफ्ते में सऊदी अरब पर हूतियों के हमले बढ़े हैं। शनिवार, 10 अक्टूबर को रियाद एयरपोर्ट पर हुए हमले में 13 लोगों की मौत हुई थी। 7 अक्टूबर के हमले के बाद भी सत्ता में लौट सकते हैं नेतन्याहू टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता में वापसी की संभावना बनी हुई है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे। इसे इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी नाकामी माना गया था। विपक्ष का आरोप है कि नेतन्याहू ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली और सुरक्षा में चूक के लिए सेना व अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया। हमले की जांच के लिए स्वतंत्र आयोग बनाने की मांग भी उठी, लेकिन इस पर विवाद बना रहा। इसके बावजूद विपक्ष नेतन्याहू को कड़ी चुनौती नहीं दे पा रहा है। कुछ सर्वे में विपक्ष आगे है, तो कुछ में नेतन्याहू का गठबंधन बढ़त बनाए हुए है। विपक्ष में एकजुटता की कमी का फायदा मिल सकता है टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक, विपक्षी नेताओं के बीच मतभेद नेतन्याहू के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। गादी आइजेनकोट, नफ्ताली बेनेट और एविगडोर लिबरमैन जैसे नेता उन्हें चुनौती दे रहे हैं, लेकिन विपक्ष अब तक एकजुट होकर चुनाव प्रचार नहीं कर पाया है। दूसरी ओर, नेतन्याहू टीवी कार्यक्रमों, सोशल मीडिया और जनसभाओं के जरिए अपने समर्थकों को जोड़ने में जुटे हैं। वह यह भी कोशिश कर रहे हैं कि दक्षिणपंथी पार्टियों के वोट आपस में न बंटें। छोटी पार्टियों के वोट तय करेंगे चुनाव का नतीजा इजराइल की संसद में 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। किसी पार्टी को संसद में सीटें पाने के लिए कम से कम 3.25% वोट हासिल करना जरूरी है। ऐसे में छोटी पार्टियों का प्रदर्शन भी अहम होगा। अगर कोई पार्टी जरूरी वोट नहीं जुटा पाती, तो उसे संसद में एक भी सीट नहीं मिलेगी। इससे दूसरी पार्टियों के लिए सरकार बनाने का रास्ता आसान हो सकता है। ———————- ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

