अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हेलिकॉप्टर मरीन वन और एक यात्री विमान के करीब पहुंचने की वजह सामने आई है। जांच के मुताबिक, रेडियो संपर्क में आई खराबी के कारण एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स को हेलिकॉप्टर की उड़ान से पहले मिलने वाली जरूरी चेतावनी नहीं मिल पाई। यह घटना 4 अगस्त को हुई थी। ट्रम्प को लेकर मरीन वन व्हाइट हाउस के पास से उड़ान भर रहा था, तभी रीगन नेशनल एयरपोर्ट से एक यात्री विमान को भी टेकऑफ की मंजूरी मिल गई। दोनों विमान कुछ देर के लिए काफी करीब आ गए, लेकिन पायलटों की सतर्कता से टकराव टल गया। जांच में यह भी सामने आया कि एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स को इस रेडियो खराबी की जानकारी एक हफ्ते पहले ही हो गई थी। इसके बावजूद घटना वाले दिन राष्ट्रपति की सुरक्षा में चूक हुई। व्हाइट हाउस में निर्माण के कारण रेडियो में खराबी आई जांच में पता चला कि व्हाइट हाउस में चल रहे निर्माण के कारण मरीन वन के उड़ान भरने की जगह बदल दी गई थी। हेलिकॉप्टर अब द एलिप्स से उड़ान भर रहा था। नई जगह और रीगन एयरपोर्ट के पास लगे रेडियो रिसीवर के बीच सीधा संपर्क ठीक नहीं था। इसी वजह से हेलिकॉप्टर की रेडियो कॉल कंट्रोल टावर तक सही तरीके से नहीं पहुंच पा रही थी। एक हफ्ते पहले मीटिंग में दिक्कत पर चर्चा हुई थी घटना से करीब एक हफ्ते पहले 30 जुलाई को मरीन वन के पायलटों और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स की बैठक हुई थी। इसमें तीन मिनट पहले दी जाने वाली उड़ान चेतावनी के कंट्रोल टावर तक नहीं पहुंचने की बात सामने आई थी। तब तय किया गया था कि रेडियो संपर्क न होने पर किसी दूसरे विमान या व्यक्ति के जरिए यह सूचना दी जाएगी। 4 अगस्त को पायलटों ने ज्वाइंट बेस एनाकोस्टिया-बोलिंग के जरिए भी कंट्रोल टावर तक संदेश पहुंचाने की कोशिश की। हालांकि, यह तरीका भी काम नहीं आया। कंट्रोलर्स को मरीन वन के उड़ान भरने की जानकारी नहीं मिली और इसी दौरान यात्री विमान को टेकऑफ की मंजूरी दे दी गई। ट्रम्प का हेलिकॉप्टर और विमान सिर्फ 1.3 किमी दूर थे NTSB के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, दोनों विमानों के बीच सबसे कम दूरी करीब 1.3 किलोमीटर थी। उनकी ऊंचाई में भी महज 250 फीट का अंतर रह गया था। यात्री विमान के टक्कर से बचाने वाले सिस्टम ने चेतावनी दी थी। मरीन वन के पायलटों ने भी विमान को देख लिया और कुछ देर रुक गए, जिससे दोनों अलग हो गए। FAA के नियम के मुताबिक, ऐसे हालात में दो विमानों के बीच कम से कम 2.4 किलोमीटर की दूरी या ऊंचाई में 500 फीट का अंतर होना जरूरी है। अब रेडियो सिस्टम ठीक किया गया घटना के बाद FAA की तकनीकी टीम ने रेडियो सिस्टम की जांच की। रिसीवर को रिहायशी इलाके से हटाकर रीगन एयरपोर्ट के कंट्रोल टावर के ऊपर लगा दिया गया। इसके बाद किए गए परीक्षणों में रेडियो संपर्क ठीक पाया गया। यह घटना पिछले साल के रीगन एयरपोर्ट हादसे के बाद और गंभीर मानी जा रही है। 29 जनवरी 2025 को एक यात्री विमान और अमेरिकी सेना के ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर की टक्कर में 67 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद एयरपोर्ट के आसपास हेलिकॉप्टर और विमानों की आवाजाही को लेकर सुरक्षा नियम कड़े किए गए थे। ————————————— यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने माना- ईरान के डर से प्लेन बदलना पड़ा:हमला होता तो एयरफोर्स वन पर होता; ट्रक में छिपकर दूसरे विमान तक पहुंचे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मान लिया है कि उन्होंने पिछले महीने तुर्किये में ईरान के डर से प्लेन बदला था। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे जिस प्लेन से NATO समिट में हिस्सा लेने गए थे उस पर हमले का सबसे ज्यादा खतरा था। पूरी खबर पढ़ें…
‘हालात काबू में हैं, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है।’ नेपाल में तबाही के बाद CM सम्राट चौधरी के इस बयान ने बिहार के 21 जिलों के लोगों को फौरी तौर पर राहत तो दी है। लेकिन साथ ही आगे की चुनौती के लिए भी आगाह कर दिया है। नेपाल में क्या फिर तबाही आने वाली है, अगर आई तो बिहार का क्या होगा, गंगा-गंडक-कोसी में क्या चल रहा, समझेंगे; बूझे की नाही में…। क्या नेपाल में फिर से बाढ़ आने की संभावना है? वैज्ञानिकों ने आगे के खतरे से इनकार नहीं किया है। एक्सपर्ट ने चेतावनी दी है कि घाटी की अस्थिर ढलानें और आंशिक रूप से ढहा हुआ ग्लेशियर आने वाले दिनों में मलबे के नए बहाव से दूसरी बाढ़ की स्थिति पैदा कर सकता है। नेपाल के गृह मंत्री सूडान गुरुंग ने कहा कि ल्हेन्डे नदी अभी पूरी तरह से साफ नहीं हुई है। ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने कहा कि बादलों के ढके होने के कारण क्षेत्र की उपग्रह से निगरानी करने में भी दिक्कत आई है। वहीं, काठमांडू यूनिवर्सिटी के जलवायु शोधकर्ता और प्रोफेसर रिजन भक्त कायस्थ ने कहा, ‘शुरुआत में चिंता थी कि ऊपर की ओर एक और बड़ी झील बन सकती है, लेकिन अभी तक ऐसी झील के अस्तित्व की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।’ कायस्थ ने कहा, ‘जोखिम अभी भी बना हुआ है। बढ़ता तापमान ग्लेशियरों के पिघलने, बर्फ और चट्टानों के टूटने तथा हिमालय में हिमस्खलन की संभावना को बढ़ाता है। लेकिन हम सटीक रूप से यह नहीं कह सकते कि अगली घटना कहां होगी।’ नेपाल में ग्लेशियर टूटेगा तो बिहार को खतरा क्यों बिहार से करीब 400 फीट की ऊंचाई (समुंद्र तल से) पर स्थित नेपाल की सभी नदियों का पानी घूम फिर कर बिहार ही आता है। इससे नदियों के 3 रूट से ऐसे समझिए… रूट-1ः नेपाल की नारायणी से चंपारण, सारण तबाह रूट-2ः नेपाल की सप्तकोशी से सहरसा-सुपौल का एरिया प्रभावित रूट-3ः UP के रास्ते भी बिहार में आता है नेपाल का पानी मतलब यह कि नेपाल के उत्तर में हादसा हो या पश्चिम में सारा पानी बिहार ही पहुंचेगा। ऐसे में नेपाल की नदियों की हलचल का बिहार पर ज्यादा असर पड़ता है। अब नीचे के मैप से समझिए…नदियों का रूट …दूसरा ग्लेशियर टूटा तो क्या बिहार में बिगड़ेंगे हालात? बिल्कुल। अभी ताजा हालात है कि नेपाल के रसुवा जिले में बुधवार को आई बाढ़ के बाद बिहार के गंडक बैराज के सभी 36 गेट खोल दिए गए हैं। वाल्मीकिनगर बैराज से हर घंटे औसतन डेढ़ लाख से ज्यादा क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक, गंडक में 3 मीटर ऊंची लहरें उठ सकती हैं, फ्लैश फ्लड आने की भी आशंका है। अब 2 कारणों से समझिए, कैसे बिगड़ सकते हैं हालात… 1. गंगा-गंडक उफान पर, पानी का बढ़ रहा दबाव बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के मुताबिक, 27 अगस्त की शाम 4 बजे तक गोपालगंज के डुमरियाघाट में गंडक, पटना में गंगा, खगड़िया में बुढ़ी गंडक, सीवान के दरौली में घाघरा, कटिहार के कुरसेला में कोसी नदी खतरे के निशान को पार कर चुकी हैं। नेपाल के पानी के कारण गंडक और गंगा में पानी का फ्लो बढ़ रहा है। खगड़िया में गंगा और बूढ़ी गंडक में पानी के कारण 20 पंचायतों में 50 हजार से ज्यादा घर पानी में डूब गए हैं। अगर नेपाल में दूसरा ग्लेशियर टूटा तो बिहार में हालात खराब हो जाएंगे। क्योंकि अभी ही नदियों में पानी काफी बढ़ गया है। आगे पानी आने पर तबाही ही मचेगी। CM सम्राट चौधरी ने 27 अगस्त को निरीक्षण करने के बाद कहा, ‘खतरा अभी टला नहीं है। भगवान की कृपा रही तो सब ठीक होगा।’ 2. अगले 5 दिन तक बिहार और नेपाल में बारिश का अलर्ट नेपाल और बिहार में अगले 5 दिन तक यानी 2 सितंबर तक बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। मौसम विभाग के मुताबिक, आज यानी 28 अगस्त को बिहार में तेज बारिश का अलर्ट है। वहीं, नेपाल में भारी बारिश की चेतावनी दी गई है। हालांकि, 29 अगस्त से 2 सितंबर तक नेपाल और बिहार में रुक-रुक कर धीमी बारिश की चेतावनी दी गई है। अगर मौसम विभाग का अनुमान सही साबित हुआ तो यह बिहार के गंडक, कोसी, गंगा के किनारे रहने वाले लोगों को खासा दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है। …लेकिन राहत की 2 बातें पहली- बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के मुताबिक, नेपाल की सभी 22 नदियों का जलस्तर 27 अगस्त की शाम 5 बजे तक खतरे के निशान से नीचे हैं। खास बात है कि त्रिशूली यानी नारायणी और भोटेकोशी यानी सप्तकोशी नदी खतरे के निशान से क्रमशः 4 और 3 फीट नीचे बह रही है। मतलब अभी वहां नदियों में ज्यादा पानी नहीं है। अगर थोड़ी बारिश हुई भी तो नदियां उफान नहीं मारेंगी, बशर्ते ग्लेशियर या बादल न फट जाए। दूसरी- जल संसाधन विभाग के मुताबिक, गंडक बैराज का अपस्ट्रीम 353.770 फीट और डाउनस्ट्रीम 350.930 फीट है। जो तय मानक 362 फीट से करीब 8 फीट कम है। इसका मतलब हुआ कि अभी बैराज पर 8 फीट ज्यादा तक पानी स्टोर किया जा सकता है। अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम के पानी के स्तर में मामूली अंतर (2.84 फीट) बता रहा है कि बांध के गेट खुले हुए हैं और बांध पर ज्यादा दबाव नहीं है। मतलब पानी की गति सामान्य व नियंत्रित है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार को लेक ओंटारियो का नाम बदलकर ‘लेक अमेरिका’ करने के आदेश पर साइन किए। आदेश के मुताबिक, 30 दिनों में यह प्रक्रिया पूरी होगी और इसके बाद अमेरिका के सरकारी नक्शों व रिकॉर्ड में नया नाम इस्तेमाल किया जाएगा। ट्रम्प ने इस फैसले की तुलना मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलकर ‘अमेरिका की खाड़ी’ करने से की। उन्होंने मजाक में कहा कि अब अमेरिका के पास एक खाड़ी और एक झील है, शायद आगे अटलांटिक या प्रशांत महासागर का नाम बदलने के बारे में भी सोचना पड़े। वहीं, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने लेक ओंटारियो का नाम बदलने के फैसले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा- हम जानते हैं अमेरिका नाम बदल रहा है, लेकिन कनाडाई भी जानते हैं कि हकीकत में इसका नाम लेक ओंटारियो ही है। पहले भी, अब भी और हमेशा। कनाडा इस झील को लेक ओंटारियो ही बुलाएगा। लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा के बीच स्थित पांच बड़ी झीलों में से एक है। इसके एक तरफ न्यूयॉर्क और दूसरी तरफ कनाडा का ओंटारियो प्रांत है। दोनों देशों की सीमा भी इसी झील से होकर गुजरती है। ट्रम्प ने कहा था- नाम बदलने पर विचार कर रहा ट्रम्प ने 25 अगस्त को पहली बार लेक ओंटारियो का नाम बदलने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि अमेरिका का कनाडा के साथ ज्यादा कारोबार होने की उम्मीद नहीं है, इसलिए झील का नाम बदलने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इसके दो दिन बाद उन्होंने इस फैसले को आधिकारिक बनाने के लिए आदेश पर साइन कर दिए। ट्रम्प ने अपने आदेश में कहा कि लेक ओंटारियो अमेरिका की अर्थव्यवस्था और विरासत का अहम हिस्सा है। यह व्यापार, जहाजरानी, रक्षा, कृषि और ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि ग्रेट लेक्स के संरक्षण पर अमेरिका ने पिछले 10 साल में करीब 4 अरब डॉलर यानी 38 हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं। अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापार को लेकर तनाव नाम बदलने का फैसला अमेरिका और कनाडा के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव के बीच आया है। हाल ही में अमेरिका ने कनाडा के करीब 20 अरब डॉलर यानी लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपए के सामान पर 50% टैरिफ लगाने का फैसला किया है। इसके जवाब में कनाडा ने भी अमेरिकी सामान पर उतना ही टैरिफ लगाने का ऐलान किया। ट्रम्प ने कहा कि व्यापार के मामले में कनाडा से निपटना सबसे मुश्किल है। उन्होंने आरोप लगाया कि कनाडा अमेरिका के साथ ठीक व्यवहार नहीं करता और वह किसी भी हाल में यह स्वीकार नहीं कर सकते। लेक ओंटारियो के नाम पर पड़ा ओंटारियो प्रांत का नाम लेक ओंटारियो का नाम यूरोपीय लोगों के अमेरिका पहुंचने से भी पहले से चला आ रहा है। यह नाम ह्यूरॉन समुदाय की भाषा के एक शब्द से निकला है, जिसका अर्थ ‘चमकते पानी की झील’ बताया जाता है। बाद में कनाडा के ओंटारियो प्रांत का नाम भी इसी झील के नाम पर रखा गया। हालांकि, नाम बदलने को लेकर एक अहम बात है। दुनिया की अंतरराष्ट्रीय झीलों और जलक्षेत्रों के नाम तय करने वाली कोई एक वैश्विक संस्था नहीं है। अमेरिका अपने सरकारी दस्तावेजों और नक्शों में इसे ‘लेक अमेरिका’ कह सकता है, लेकिन कनाडा अपनी तरफ से पुराने नाम ‘लेक ओंटारियो’ का इस्तेमाल जारी रख सकता है। क्या अमेरिका अकेले नाम बदल सकता है? अमेरिकी सरकार अपने आधिकारिक दस्तावेजों, सरकारी नक्शों और रिकॉर्ड में किसी जगह के लिए नया नाम इस्तेमाल करने का फैसला कर सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे देश भी उस नाम को स्वीकार करने के लिए बाध्य होंगे। लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा दोनों से जुड़ी है। इसलिए अगर अमेरिकी सरकार अपने दस्तावेजों में इसे ‘लेक अमेरिका’ कहना शुरू भी कर दे, तो कनाडा अपने सरकारी रिकॉर्ड में ‘लेक ओंटारियो’ नाम जारी रख सकता है। दूसरे देश और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी अमेरिकी नाम को अपने आप अपनाने के लिए बाध्य नहीं होंगी। यानी नाम बदलने से झील का मालिकाना हक नहीं बदल जाएगा। ‘लेक अमेरिका’ नाम इस्तेमाल करने से झील का कनाडाई हिस्सा अमेरिकी क्षेत्र नहीं बन जाएगा। ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ का नाम बदल चुके हैं ट्रम्प ट्रम्प के लिए किसी जगह का नाम बदलना नया नहीं है। जनवरी 2025 में उन्होंने ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ को अमेरिकी सरकारी इस्तेमाल के लिए ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ करने का आदेश दिया था। इसके बाद अमेरिकी एजेंसियों ने अपने रिकॉर्ड और नक्शों में नया नाम इस्तेमाल करना शुरू किया, लेकिन मेक्सिको ने इसे स्वीकार नहीं किया। तब मेक्सिको ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का हवाला देते हुए कहा था कि अमेरिका अपने अधिकार क्षेत्र के आधार पर पूरे गल्फ का नाम अकेले नहीं बदल सकता। हालांकि, लेक ओंटारियो और गल्फ ऑफ मेक्सिको की कानूनी स्थिति अलग है। गल्फ समुद्री क्षेत्र है, जबकि लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा के बीच साझा झील है। अमेरिका-कनाडा के बीच विवाद की 5 बड़ी वजहें 1. टैरिफ की नई लड़ाई सबसे बड़ा विवाद टैरिफ को लेकर है। अमेरिका ने कनाडा के करीब 20 अरब डॉलर के सामान पर 50% तक अतिरिक्त शुल्क लगाया है। इसमें शराब, डेयरी, फर्नीचर, हॉकी उपकरण और कई दूसरे सामान शामिल हैं। बातचीत टूटने के बाद कनाडा ने भी डॉलर-फॉर-डॉलर जवाबी टैरिफ लगाने का फैसला किया है। 2. कनाडा को 51वां राज्य कहना ट्रम्प कई बार कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात कह चुके हैं। ट्रम्प का कहना है कि अमेरिका व्यापार के मामले में कनाडा को अरबों डॉलर का फायदा पहुंचाता है। यदि कनाडा अमेरिका का हिस्सा बन जाता है, तो यह व्यापारिक असमानता और टैरिफ से जुड़े विवाद अपने आप खत्म हो जाएंगे। 3. ट्रूडो को कनाडा का गवर्नर कहना ट्रम्प ने कई बार कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को तंजिया लहजे में ‘गवर्नर’ कहकर संबोधित किया था। कनाडाई नेताओं और जनता ने इसे अपनी संप्रभुता का अपमान माना। 4. सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और फेंटानिल तस्करी अमेरिका और कनाडा के बीच बढ़ती सीमा सुरक्षा चिंताएं भी बड़े विवाद का कारण बनी हैं। ट्रम्प प्रशासन का आरोप रहा है कि कनाडा की उत्तरी सीमा से अवैध प्रवासियों की घुसपैठ और खतरनाक नशीली दवाओं (विशेषकर फेंटानिल) की तस्करी अमेरिका में बढ़ रही है। अमेरिका ने कनाडा से अपनी सीमाओं पर सख्त निगरानी और सख्त आव्रजन नीतियां लागू करने की मांग की है। 5. डेयरी और कृषि विवाद अमेरिका लंबे समय से कनाडा की ‘सप्लाई मैनेजमेंट’ सिस्टम का विरोध करता रहा है, जो कनाडाई डेयरी और पोल्ट्री (मुर्गी पालन) मार्केट को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाती है। अमेरिका चाहता है कि कनाडा अपने डेयरी बाजार को अमेरिकी किसानों के लिए पूरी तरह खोले। ————————– यह खबर भी पढ़ें… कनाडाई PM बोले- अमेरिका और हमारे बीच जंग के हालात: ट्रम्प के टैरिफ को हमला बताया; US पर जवाबी टैरिफ लगाने का ऐलान किया कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिका के साथ बढ़ते ट्रेड विवाद को लेकर कहा है कि “हम जंग में हैं, क्योंकि हम पर हमला हुआ है।” उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ को कनाडा पर हमला बताया। पूरी खबर पढ़ें…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार को लेक ओंटारियो का नाम बदलकर ‘लेक अमेरिका’ करने के आदेश पर साइन किए। आदेश के मुताबिक, 30 दिनों में यह प्रक्रिया पूरी होगी और इसके बाद अमेरिका के सरकारी नक्शों व रिकॉर्ड में नया नाम इस्तेमाल किया जाएगा। ट्रम्प ने इस फैसले की तुलना मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलकर ‘अमेरिका की खाड़ी’ करने से की। उन्होंने मजाक में कहा कि अब अमेरिका के पास एक खाड़ी और एक झील है, शायद आगे अटलांटिक या प्रशांत महासागर का नाम बदलने के बारे में भी सोचना पड़े। वहीं, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने लेक ओंटारियो का नाम बदलने के फैसले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा- हम जानते हैं अमेरिका नाम बदल रहा है, लेकिन कनाडाई भी जानते हैं कि हकीकत में इसका नाम लेक ओंटारियो ही है। पहले भी, अब भी और हमेशा। कनाडा इस झील को लेक ओंटारियो ही बुलाएगा। लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा के बीच स्थित पांच बड़ी झीलों में से एक है। इसके एक तरफ न्यूयॉर्क और दूसरी तरफ कनाडा का ओंटारियो प्रांत है। दोनों देशों की सीमा भी इसी झील से होकर गुजरती है। ट्रम्प ने कहा था- नाम बदलने पर विचार कर रहा ट्रम्प ने 25 अगस्त को पहली बार लेक ओंटारियो का नाम बदलने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि अमेरिका का कनाडा के साथ ज्यादा कारोबार होने की उम्मीद नहीं है, इसलिए झील का नाम बदलने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इसके दो दिन बाद उन्होंने इस फैसले को आधिकारिक बनाने के लिए आदेश पर साइन कर दिए। ट्रम्प ने अपने आदेश में कहा कि लेक ओंटारियो अमेरिका की अर्थव्यवस्था और विरासत का अहम हिस्सा है। यह व्यापार, जहाजरानी, रक्षा, कृषि और ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि ग्रेट लेक्स के संरक्षण पर अमेरिका ने पिछले 10 साल में करीब 4 अरब डॉलर यानी 38 हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं। अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापार को लेकर तनाव नाम बदलने का फैसला अमेरिका और कनाडा के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव के बीच आया है। हाल ही में अमेरिका ने कनाडा के करीब 20 अरब डॉलर यानी लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपए के सामान पर 50% टैरिफ लगाने का फैसला किया है। इसके जवाब में कनाडा ने भी अमेरिकी सामान पर उतना ही टैरिफ लगाने का ऐलान किया। ट्रम्प ने कहा कि व्यापार के मामले में कनाडा से निपटना सबसे मुश्किल है। उन्होंने आरोप लगाया कि कनाडा अमेरिका के साथ ठीक व्यवहार नहीं करता और वह किसी भी हाल में यह स्वीकार नहीं कर सकते। लेक ओंटारियो के नाम पर पड़ा ओंटारियो प्रांत का नाम लेक ओंटारियो का नाम यूरोपीय लोगों के अमेरिका पहुंचने से भी पहले से चला आ रहा है। यह नाम ह्यूरॉन समुदाय की भाषा के एक शब्द से निकला है, जिसका अर्थ ‘चमकते पानी की झील’ बताया जाता है। बाद में कनाडा के ओंटारियो प्रांत का नाम भी इसी झील के नाम पर रखा गया। हालांकि, नाम बदलने को लेकर एक अहम बात है। दुनिया की अंतरराष्ट्रीय झीलों और जलक्षेत्रों के नाम तय करने वाली कोई एक वैश्विक संस्था नहीं है। अमेरिका अपने सरकारी दस्तावेजों और नक्शों में इसे ‘लेक अमेरिका’ कह सकता है, लेकिन कनाडा अपनी तरफ से पुराने नाम ‘लेक ओंटारियो’ का इस्तेमाल जारी रख सकता है। क्या अमेरिका अकेले नाम बदल सकता है? अमेरिकी सरकार अपने आधिकारिक दस्तावेजों, सरकारी नक्शों और रिकॉर्ड में किसी जगह के लिए नया नाम इस्तेमाल करने का फैसला कर सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे देश भी उस नाम को स्वीकार करने के लिए बाध्य होंगे। लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा दोनों से जुड़ी है। इसलिए अगर अमेरिकी सरकार अपने दस्तावेजों में इसे ‘लेक अमेरिका’ कहना शुरू भी कर दे, तो कनाडा अपने सरकारी रिकॉर्ड में ‘लेक ओंटारियो’ नाम जारी रख सकता है। दूसरे देश और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी अमेरिकी नाम को अपने आप अपनाने के लिए बाध्य नहीं होंगी। यानी नाम बदलने से झील का मालिकाना हक नहीं बदल जाएगा। ‘लेक अमेरिका’ नाम इस्तेमाल करने से झील का कनाडाई हिस्सा अमेरिकी क्षेत्र नहीं बन जाएगा। ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ का नाम बदल चुके हैं ट्रम्प ट्रम्प के लिए किसी जगह का नाम बदलना नया नहीं है। जनवरी 2025 में उन्होंने ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ को अमेरिकी सरकारी इस्तेमाल के लिए ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ करने का आदेश दिया था। इसके बाद अमेरिकी एजेंसियों ने अपने रिकॉर्ड और नक्शों में नया नाम इस्तेमाल करना शुरू किया, लेकिन मेक्सिको ने इसे स्वीकार नहीं किया। तब मेक्सिको ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का हवाला देते हुए कहा था कि अमेरिका अपने अधिकार क्षेत्र के आधार पर पूरे गल्फ का नाम अकेले नहीं बदल सकता। हालांकि, लेक ओंटारियो और गल्फ ऑफ मेक्सिको की कानूनी स्थिति अलग है। गल्फ समुद्री क्षेत्र है, जबकि लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा के बीच साझा झील है। अमेरिका-कनाडा के बीच विवाद की 5 बड़ी वजहें 1. टैरिफ की नई लड़ाई सबसे बड़ा विवाद टैरिफ को लेकर है। अमेरिका ने कनाडा के करीब 20 अरब डॉलर के सामान पर 50% तक अतिरिक्त शुल्क लगाया है। इसमें शराब, डेयरी, फर्नीचर, हॉकी उपकरण और कई दूसरे सामान शामिल हैं। बातचीत टूटने के बाद कनाडा ने भी डॉलर-फॉर-डॉलर जवाबी टैरिफ लगाने का फैसला किया है। 2. कनाडा को 51वां राज्य कहना ट्रम्प कई बार कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात कह चुके हैं। ट्रम्प का कहना है कि अमेरिका व्यापार के मामले में कनाडा को अरबों डॉलर का फायदा पहुंचाता है। यदि कनाडा अमेरिका का हिस्सा बन जाता है, तो यह व्यापारिक असमानता और टैरिफ से जुड़े विवाद अपने आप खत्म हो जाएंगे। 3. ट्रूडो को कनाडा का गवर्नर कहना ट्रम्प ने कई बार कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को तंजिया लहजे में ‘गवर्नर’ कहकर संबोधित किया था। कनाडाई नेताओं और जनता ने इसे अपनी संप्रभुता का अपमान माना। 4. सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और फेंटानिल तस्करी अमेरिका और कनाडा के बीच बढ़ती सीमा सुरक्षा चिंताएं भी बड़े विवाद का कारण बनी हैं। ट्रम्प प्रशासन का आरोप रहा है कि कनाडा की उत्तरी सीमा से अवैध प्रवासियों की घुसपैठ और खतरनाक नशीली दवाओं (विशेषकर फेंटानिल) की तस्करी अमेरिका में बढ़ रही है। अमेरिका ने कनाडा से अपनी सीमाओं पर सख्त निगरानी और सख्त आव्रजन नीतियां लागू करने की मांग की है। 5. डेयरी और कृषि विवाद अमेरिका लंबे समय से कनाडा की ‘सप्लाई मैनेजमेंट’ सिस्टम का विरोध करता रहा है, जो कनाडाई डेयरी और पोल्ट्री (मुर्गी पालन) मार्केट को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाती है। अमेरिका चाहता है कि कनाडा अपने डेयरी बाजार को अमेरिकी किसानों के लिए पूरी तरह खोले। ————————– यह खबर भी पढ़ें… कनाडाई PM बोले- अमेरिका और हमारे बीच जंग के हालात: ट्रम्प के टैरिफ को हमला बताया; US पर जवाबी टैरिफ लगाने का ऐलान किया कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिका के साथ बढ़ते ट्रेड विवाद को लेकर कहा है कि “हम जंग में हैं, क्योंकि हम पर हमला हुआ है।” उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ को कनाडा पर हमला बताया। पूरी खबर पढ़ें…
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर आई बाढ़ में 200 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो गई है। करीब 1,500 लोग अब भी लापता हैं। दावा किया जा रहा कि काफी जानें बचाई जा सकती थीं, अगर चीन ने समय पर चेता दिया होता। तो क्या वाकई नेपाल में हुई भीषण तबाही के पीछे चीन जिम्मेदार है; दोनों देशों के बीच आपदाओं की वार्निंग देने का क्या सिस्टम है, इसी पर आज का एक्सप्लेनर… सवाल-1: नेपाल में आई बाढ़ के पीछे चीन पर क्या आरोप लग रहे? जवाब: नेपाली पत्रकार परशुराम काफ्ले ने X पर लिखा, ‘चीन ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। अगर बीजिंग के डिजास्टर डिटेक्शन सिस्टम से अर्ली वार्निंग मिल जाती, तो नेपाल में ज्यादा जानें बचाई जा सकती थीं। नेपाल हमेशा चीन की चिंताओं का ध्यान रखता है। इस एकतरफा प्यार की कीमत चुकानी पड़ रही है।’ नेपाल के मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, नेपाल और चीन के बीच मौसम से जुड़ी जानकारियां शेयर करने की व्यवस्था है, लेकिन इस घटना के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं दी गई। नेपाल के मौसम विभाग की सीनियर साइंटिस्ट विभूति पोखरेल कहती हैं, ‘हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अभी तक वे नहीं बता पाए हैं कि बाढ़ की वजह क्या है।’ 2016 में भी नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर रसुवागढ़ी इलाके में भीषण बाढ़ आई थी। तब भी एक्सपर्ट्स ने कहा था कि दोनों देशों के बीच समय रहते इन्फॉर्मेशन शेयर की गई होती, तो नुकसान कम किया जा सकता था। सवाल-2: दोनों देशों के बीच ऐसे हादसों की जानकारी देने का नियम है या नहीं? जवाब: नेपाल और चीन के बीच मौसम और आपदा से जुड़ी जानकारियां साझा करने की बात तय हुई थी, लेकिन इस पर कोई औपचारिक समझौता नहीं हो पाया है। दरअसल, 8 जुलाई 2025 को रसुवागढ़ी बॉर्डर पॉइंट से 35 किलोमीटर ऊपर चीन के इलाके में तिब्बत के पहाड़ों पर ‘पुरेपु’ नाम की ग्लेशियर झील फटी। इससे भोटेकोशी नदी के आसपास करीब 100 किमी तक के इलाके में बाढ़ का मलबा पहुंचा। एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद नेपाल और चीन ने तीन बातें तय की थीं… नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में एनवायरनमेंट स्टडीज के प्रोफेसर सुदीप ठाकुर बताते हैं, ‘तिब्बत में मौसम से जुड़ी इन्फॉर्मेशन इकठ्ठा करने की व्यवस्था है, लेकिन उसे नेपाल के साथ साझा नहीं किया जाता है। चीन को वैज्ञानिक जानकारी देने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन शायद नेपाल सरकार ही मजबूती से अपनी मांग उनके सामने रख ही नहीं पाई है।’ नेपाल की डिजास्टर स्टडी सेंटर के डायरेक्टर वसंत अधिकारी भी कहते हैं कि अब तक जानकारी शेयर करने की कोई व्यवस्था नहीं है। सवाल-3: जानकारी शेयर न करने के आरोप पर चीन ने क्या कहा है? जवाब: चीन ने सीधे तौर पर इसका कोई जवाब नहीं दिया है, हालांकि चीनी दूतावास ने अपने बयान में कहा है कि भूकंप के चलते बाढ़ आई है और ये भूकंप नेपाल की तरफ आया था। बयान में कहा गया, ‘रसुवा-ग्यिरोंग बॉर्डर इलाके में आई बाढ़ से चीन बेहद दुखी है। नेपाल की तरफ आए भूकंप के चलते हिमस्खलन हुआ और फिर मलबा बहा। इससे सीमा के दोनों तरफ लोगों की मौत हुई।’ दरअसल, पहले कहा गया था कि रिक्टर स्केल पर करीब 5 की तीव्रता के भूकंप के चलते बर्फ का ग्लेशियर टूटा, हालांकि बाद में अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे ने साफ किया कि भूकंप जैसा झटका बर्फ और चट्टान के टूटने से पैदा हुआ था। हालांकि चीनी दूतावास ने ये जरूर कहा है, ‘भविष्य में सीमा पार मौसम और आपदाओं से जुड़ी जानकारियां साझा करने के लिए बेहतर तरीके से काम करेंगे।’ सवाल-4: बर्फ का पहाड़ चीन में गिरा या नेपाल में? जवाब: नेपाल की डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, NDRRMA के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने की जगह नेपाल-चीन सीमा चौकी से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। अथॉरिटी के वैज्ञानिक प्रकाश पोखरेल के मुताबिक, ‘ये इलाका नेपाली हिस्से में आता है, न कि चीन की तरफ।’ हालांकि, नेपाली मौसम वैज्ञानिक विभूति पोखरेल कहती हैं, ‘हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अब तक ये पता नहीं है कि घटना नेपाल में हुई या चीन की तरफ हुई है।’ दरअसल, मानसून सीजन के चलते उस इलाके में काफी बादल हैं। इसलिए सेटेलाइट तस्वीरों से ये साफ नहीं हो पा रहा है कि ग्लेशियर टूटने की सटीक लोकेशन क्या है। मोटे तौर पर जहां ग्लेशियर टूटा, वो इलाका सेंट्रल हिमालयन रेंज की क्रेस्टलाइन पर है। यानी अगर पहाड़ की एक तरफ की ढलान नेपाल में है, तो उसी पहाड़ की दूसरी तरफ की ढलान तिब्बत में है, जिस पर चीन का कंट्रोल है। करीब 8000 मीटर की ऊंचाई पर बर्फ और ग्लेशियर जमा रहते हैं, जो पिघलकर दोनों तरफ की नदियों के लिए पानी का सोर्स बनते हैं। तकनीकी तौर पर अगर ऊंचाई पर कोई ग्लेशियर टूटे, तो उसका असर नीचे दोनों देशों के तरफ की नदियों पर पड़ सकता है। पोइकू नदी तिब्बत के ग्लेशियर से निकलती है। फिर सीमा पार करके नेपाल में दाखिल होती है और वहां भोटेकोशी कही जाती है, इसी की सहायक नदी ल्हेंदे में बाढ़ आई। एक बात और है- चीन के मुताबिक, पहले भूकंप आया और फिर ग्लेशियर टूटा। जबकि नेपाल सहित दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिक मानते हैं कि पहले ग्लेशियर टूटा, जिससे भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ। सवाल-5: ग्लेशियर टूटने से नेपाल में इतनी भीषण तबाही कैसे आई?
जवाबः पूरी घटना 3 स्टेप में समझिए…. 1. ग्लेशियर टूटा: 26 अगस्त की सुबह करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर करीब 2000 फीट का ग्लेशियर टूटा और 4 हजार फीट नीचे गिर गया। 2: नदी में पानी जमा हुआ: सुबह करीब 8:37 बजे पिघला ग्लेशियर अपने साथ चट्टानों और मलबे को लेकर ल्हेंदे नदी से टकराया। इससे ल्हेंदे नदी पर एक अस्थायी बांध बन गया और पीछे पानी जमा होने लगा। 3. नदी का बांध टूटने से सैलाब बह चला: सुबह करीब 9 बजे बढ़ते पानी के दबाव से नदी का बांध टूटा, तो एक विशाल सैलाब बनकर निचले इलाकों की तरफ बह चला। आगे भोटे कोशी और त्रिशुली नदी में मलबे वाली बाढ़ आ गई। नेपाल के रसुवा से नुवाकोट, धादिंग होते हुए चितवन तक भयावह बाढ़ का असर हुआ। रसुवा में करीब एक दर्जन बस्तियां प्रभावित हुईं। बाढ़ धादिंग जिले के गल्छी तक पहुंची और आगे मुग्लिन की ओर बढ़ने की चेतावनी दी गई। खतरा अभी टला नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नेपाल-चीन बॉर्डर के पास नदी में अब भी एक मलबे का अवरोध जमा है, जो किसी भी वक्त टूटकर सैलाब की एक दूसरी लहर छोड़ सकता है। जिस त्रिशुली नदी में यह बाढ़ आई है वह आगे नारायणी नदी से मिलती है। यह भारत के बिहार तक आती है, जहां इसे गंडक नदी कहते हैं। इसे बिहार और यूपी के इलाके भी हाई अलर्ट पर रखे गए हैं। ——— ये वीडियो भी देखिए… 2000 फीट चौड़ा ग्लेशियर टूटा, बिना भूकंप कांपने लगी धरती:देखिए नेपाल की तबाही का शुरू से आखिर तक एक-एक सीन 26 अगस्त, सुबह 8:30 बजे। नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर मौसम साफ था। किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले 30 मिनट में क्या होने वाला है। शुरुआत से आखिर तक नेपाल की तबाही का एक-एक सीन, वीडियो देखिए…
नेपाल में 26 अगस्त की बाढ़ से हुई तबाही सैटेलाइट से भी दिखाई दे रही है। सैलाब में गांव और बाजार बह गए, सड़कें और पुल मलबे में दब गए। हर तरफ मटमैला पानी और पहाड़ी मलबा नजर आ रहा है। इस बाढ़ ने नेपाल-तिब्बत बॉर्डर के पूरे इलाके का नक्शा बदल दिया। नीचे देखिए तबाही से पहले और बाद की 9 सैटेलाइट तस्वीरें… सभी तस्वीरें तिब्बत सीमा से लगे नेपाल के रसुआ जिले की हैं। जहां त्रिशूली नदी ने अपने किनारे बसे गांवों और बस्तियों को 6 घंटे की बाढ़ में अपने चपेट में ले लिया। अब ग्राफिक्स में देखिए कहां और कैसे हुआ हादसा… ———————— ये खबर भी पढ़ें…. तिब्बत में लैंडस्लाइड से नेपाल में आई बाढ़, 210 मौतें:1500 लापता; 300 भारतीय की तलाश जारी, आज 21 भारतीयों का रेस्क्यू नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर बुधवार सुबह आई अचानक बाढ़ में 210 लोगों की मौत हो गई। इनमें नेपाल में 207 और तिब्बत में 3 लोगों की जान गई है। करीब 1,500 लोग अब भी लापता हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल के मुताबिक वहां कुल 826 लोग लापता हैं। इसमें 300 से ज्यादा भारतीय हैं। पूरी खबर पढ़ें…
दुनिया के सबसे अमीर और टेक दिग्गजों में अब पशु-पालन और खेती का शौक बढ़ रहा है। अमेरिका में खेती की जमीन अब सिर्फ किसान की जरूरत नहीं, अरबपतियों के लिए बड़ा निवेश और शौक बन चुकी है। कोई यहां मवेशी पाल रहा है, तो कोई जमीन खरीदकर भविष्य ज्यादा सुरक्षित कर रहा है। मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग हवाई के काउआई द्वीप पर करीब 2,871 करोड़ रु. के 4,000 एकड़ कोउलाउ रेंच पर वाग्यू और एंगस नस्ल के मवेशी पाल रहे हैं। वहीं, रेडिट के सह-संस्थापक एलेक्सिस ओहानियन फ्लोरिडा में अपने फार्म पर केले के बाग और मधुमक्खी पालन कर रहे हैं। हालांकि, इन दिग्गजों के खेती-बारी का नया शौक अमेरिका में कृषि जमीनों को एक बेहद महंगे ‘एसेट क्लास’ में बदल दिया है। ‘ द लैंड रिपोर्ट’ के अनुसार, माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स के पास 2.75 लाख एकड़ कृषि भूमि है, जिससे वे अमेरिका के 44वें सबसे बड़े भूस्वामी बन गए हैं। अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस 4.62 लाख एकड़ और वॉलमार्ट घराने से जुड़े स्टेन क्रोनके 27 लाख एकड़ जमीन के मालिक हैं। क्रोनके ने 2025 में न्यू मैक्सिको में 9.38 लाख एकड़ जमीन खरीदी, जिसे अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी रैंच बिक्री बताया गया। अलग-अलग राज्यों में इन जमीनों पर आलू, गाजर, प्याज, सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी फसलें उगाई जाती हैं। कुछ किसानों को लीज पर भी दी जाती है। पीपुल्स कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में कृषि भूमि 411 लाख करोड़ की परिसंपत्ति बन चुकी है। अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक, बीते वर्ष खेतों के मूल्य में 4.3% की बढ़ोतरी हुई। नेशनल यंग फार्मर्स कोएलिशन की पॉलिसी निदेशक एरिन फॉस्टर के अनुसार, जमीन की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि पहली बार खेती में उतरने वाले युवा या छोटे किसान प्रतिस्पर्धा से पूरी तरह बाहर हो गए हैं। जमीन में निवेश क्यों? महंगाई के साथ बढ़ती है कीमत महंगाई से सुरक्षित बचाव – सीमित प्राकृतिक संसाधन होने के कारण जमीन की कीमतें हमेशा महंगाई के साथ बढ़ती हैं। एआई और डेटा सेंटर्स की मांग – टेक कंपनियों (एआई हाइपरस्केलर्स) को विशाल डेटा सेंटर बनाने के लिए बड़े भूभाग की जरूरत होती है। लाइफस्टाइल और नॉन-फाइनेंशियल फायदे – कोरोना महामारी के बाद बड़े परिसरों में शिकार, मछली पकड़ने और खुद का ऑर्गेनिक अन्न उगाने का रुझान बढ़ा है।
बिहार से करीब 300 किलोमीटर दूर नेपाल में तिब्बत से आई अचानक बाढ़ ने तबाही मचा दी है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के पानी ने रसुवा, टिमुरे और स्याब्रुबेसी इलाके को तहस-नहस कर दिया है। गांव के गांव बह गए, बाजार तबाह हो गए, पुल टूट गए और सड़कें कट गईं। नेपाल में आई तबाही पर बिहार सरकार अलर्ट है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से गृह मंत्री अमित शाह ने बात की है और NDRF की टीम को सीमावर्ती जिलों में तैनात कर दिया है। नेपाल में आई तबाही से बिहार को खतरा क्यों, क्या यहां भी तबाही मचेगी, समझेंगे; बूझे की नाही में…। सवाल-1: नेपाल के रसुवा में बाढ़ और तबाही कैसे आई है? जवाबः 26 अगस्त की सुबह करीब 9 बजे नेपाल के रसुवा और नुवाकोट जिले में भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में अचानक बहुत तेज पानी आया। पानी तिब्बत की तरफ से आया और कुछ ही समय में घर, सड़क, पुल और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बहा ले गया। उस समय रसुवा में ऐसी भारी स्थानीय बारिश की सूचना नहीं थी, इसलिए सामान्य बारिश से आई बाढ़ की संभावना कम मानी जा रही है। कैसे हुआ? कितना नुकसान? नेपाल पुलिस के मुताबिक, अब तक 95 लोगों के मौत की खबर है। नेपाल के पर्यटन विभाग के मुताबिक 500 से ज्यादा लोगों का पता नहीं चल रहा है। इनमें 133 भारतीय समेत 300 से ज्यादा विदेशी पर्यटक हैं। सवाल-2: भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में आई तबाही से बिहार को खतरा क्यों? जवाबः नेपाल में आई तबाही से बिहार के खतरों को समझने के लिए भोट कोशी और त्रिशूली नदियों के तंत्रों को समझना होगा… त्रिशूली नदी के पानी से 5 जिलों को खतरा रसुवा नेपाल का उत्तरी, हिमालयी जिला है और चीन के तिब्बत से लगा है। टिमुरे/रसुवागढ़ी और स्याब्रुबेसी इसी क्षेत्र में हैं। यहां की नदियां ऊंचे हिमालय से निकलकर बहुत तेज ढाल वाले एरिया में नीचे उतरती हैं। इसी क्षेत्र में त्रिशूली नदी का डिस्चार्ज अचानक बढ़ता है तो पानी तेजी से नीचे आता है। भोटेकोशी से कोसी इलाके में खतरा भोटेकोशी नेपाल के उत्तरी हिस्से में चीन-तिब्बत सीमा से निकलने वाली हिमालयी नदी है। यह सिंधुपालचोक क्षेत्र से होकर बहती है। हालांकि, अबकी बार 2008 वाले हालात नहीं सवाल-3: कितना नुकसान हो सकता है, बिहार सरकार क्या कर रही है? जवाबः अभी नुकसान का आकलन करना जल्दीबाजी होगी। गंडक और कोसी बेसिन की नदियों में पानी बढ़ना चालू है। लेकिन गति सामान्य है। CM सम्राट चौधरी ने मुख्य सचिव, आपदा प्रबंधन और जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति की समीक्षा की। डिप्टी CM और जल संसाधन मंत्री विजय चौधरी ने कहा कि लोग सतर्क रहें, घबराएं नहीं। अगले 24 घंटे अलर्ट रहने की जरूरत है। समस्या पहले से बड़ी है, लेकिन फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है। गंडक नदी पर दबाव बढ़ने की आशंका है। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से बाढ़ राहत के लिए अतिरिक्त टीमों की तैनाती की गई है। राहत एवं बचाव के लिए जरूरी सामग्री भी उपलब्ध कराई गई है। सरकार अलर्ट, बोली-डरे नहीं सवाल-4ः नेपाल की नदियों से बिहार में क्यों आती है बाढ़? जवाबः नेपाल बिहार से करीब 400 फीट ऊंचाई (समुंद्र तल से) पर स्थित है। नेपाल में भारी बारिश होती है तो पानी ऊपर से नीचे की तरफ नेचुरल ग्रेविटी के कारण आता है। नेपाल में कोई बड़ा डैम नहीं है। जिससे पानी को कंट्रोल किया जा सके। नेपाल हिमालय पर बसा है। इसका करीब 75% हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र है। कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला बलान, महानंदा और अधवारा नदियों का समूह यहां से निकलता है। नेपाल में बारिश होने पर पानी इन्हीं नदियों के रास्ते गंगा नदी तक पहुंचता है। 129 साल से चल रही हाई डैम बनाने की बात उत्तर बिहार को बाढ़ से मुक्ति दिलाने के लिए 1897 से ही भारत और नेपाल की सरकारों के बीच सप्तकोशी नदी पर बांध की बात चल रही है। इसे लेकर आजादी से पहले और बाद में दोनों देशों की सरकारों के बीच कई बार वार्ताएं हुईं। आखिरकार 1991 में दोनों देशों के बीच इसे लेकर एक समझौता भी हुआ। 2004 में इस प्रस्तावित बांध की संभावनाओं को तलाशने के लिए नेपाल के धरान में एक संयुक्त परियोजना कार्यालय भी बना है। मगर 129 साल से अधिक समय बीतने के बावजूद आज तक नेपाल के बराह क्षेत्र से 1.6 किमी उत्तर की दिशा में प्रस्तावित इस बांध के निर्माण को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। 21 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक की। इसके बाद वित्त मंत्री ने कोसी-मेची परियोजना के पहले चरण की राशि जारी करने और दूसरे चरण की तकनीकी मंजूरी देने का निर्देश जल शक्ति मंत्रालय को दिया है। CM सम्राट चौधरी ने कहा कि बाढ़ के स्थायी समाधान के लिए कोसी नदी पर उच्च बांध की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट जल्द बनेगी। JDU नेता संजय झा ने बताया, ‘नेपाल में हाई डैम का निर्माण एकमात्र समाधान है, जिसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) 2028 तक बन जाएगी।’
नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर बुधवार सुबह अचानक आई बाढ़ में 160 लोगों की मौत हो गई। नेपाल में 157 और तिब्बत में 3 लोगों की जान गई, जबकि 844 लोग अब भी लापता हैं। बाढ़ में 19 पुल, करीब 40 किलोमीटर सड़कें और 13 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट तबाह हो गए। बाढ़ का पानी करीब 30 फीट तक ऊपर आ गया था। तेज बहाव में घर, गाड़ियां और सरकारी ढांचे बह गए। शुरुआत में माना जा रहा था कि बाढ़ से पहले भूकंप आया था, लेकिन अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे के मुताबिक चीन की तरफ ल्हेंदे नदी में पहाड़ का बड़ा हिस्सा खिसककर गिरा था। इसी लैंडस्लाइड से 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ। इसके बाद ल्हेंदे नदी से पानी और मलबे का सैलाब भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में पहुंचा, जिससे बाढ़ आई। बहाव इतना तेज था कि लोगों और मलबे को करीब 150 किलोमीटर दूर चितवन तक बहा ले गया, जहां अब तक 33 शव बरामद किए गए हैं। राहतकर्मी खराब मौसम और टूटे रास्तों के बीच मलबे में दबे लोगों की तलाश कर रहे हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जा रहे कई श्रद्धालु भी बाढ़ की चपेट में आ गए। नेपाल में लापता लोगों में 466 विदेशी और 113 नेपाली शामिल हैं, जिनमें 133 भारतीय और 37 NRI भी हैं। भास्कर नॉलेजः कैसे आई बाढ़, कितना असर और भारत पर इम्पैक्ट बाढ़ की वजह को लेकर 3 आशंकाएं 1. लैंडस्लाइड से नदी का रास्ता रुका: यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) की जांच में पता चला कि नेपाल-तिब्बत सीमा पर चीन की ल्हेंदे नदी में पहाड़ का बड़ा हिस्सा खिसककर गिरा। इससे नदी का बहाव रुका और पानी-मलबा जमा होने के बाद अचानक तेज बहाव आया। इस घटना से 5.2 तीव्रता के भूकंप जितनी ऊर्जा पैदा हुई थी। ल्हेंदे का पानी भोटेकोशी नदी में पहुंच गया, जिससे बाढ़ आ गई। 2. भूकंप से ग्लेशियल फटने की आशंका: नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद में बताया कि सुबह 8:37 बजे तिब्बत क्षेत्र में भूकंप आया और करीब तीन मिनट बाद फ्लैश फ्लड की सूचना मिली। इससे आशंका जताई जा रही है कि भूकंप के झटकों से ग्लेशियल आउटबर्स्ट हुआ होगा। 3. ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट: एक संभावना यह भी है कि बर्फ और मलबे से नदी का रास्ता रुकने के बाद अस्थायी झील बनी और उसका पानी अचानक बाहर निकला। विशेषज्ञ अभी यह जांच रहे हैं कि क्या इस घटना में ग्लेशियल झील भी फूटी थी। बारिश को फिलहाल वजह नहीं माना जा रहा है, क्योंकि नेपाल के जल विज्ञान एवं मौसम विभाग के मुताबिक बाढ़ से पहले रसुवा में भारी बारिश नहीं हुई थी। नदी किनारे रहने वालों को खतरा बरकरार नेपाल के फ्लड फोरकास्टिंग डिविजन ने चेतावनी दी है कि भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के इलाकों में खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। चीन की ओर नदी के रास्ते में बनी झील अभी पूरी तरह खाली नहीं हुई है। लोगों से नदी के आसपास जाने से बचने और सुरक्षित स्थानों पर रहने की अपील की गई है। नेपाल में पिछले साल भी भोटेकोशी नदी में विनाशकारी बाढ़ आई थी, जिसमें 11 लोगों की मौत हुई थी। नेपाल-चीन को जोड़ने वाला मितेरी पुल भी बह गया था। भारत में कहां-कितना असर होगा भारत में इसका असर मुख्य रूप से बिहार की गंडक नदी और उससे जुड़ी छोटी-बड़ी नदियों में दिखने की आशंका है। नेपाल से करीब 3 मीटर ऊंची फ्लड वेव आने का अलर्ट है। पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली में खास सतर्कता बरती जा रही है। सीतामढ़ी और शिवहर पर भी नजर है। नेपाल का पानी त्रिशूली नदी से होते हुए गंडक तक पहुंचेगा। इसके बाद बिहार के निचले इलाकों में पानी बढ़ सकता है। यूपी के महाराजगंज और कुशीनगर में भी अलर्ट जारी किया गया है। खबर से जुड़े पल-पल की अपडेट्स के लिए नीचे दिए ब्लॉग से गुजर जाइए…
26 अगस्त की सुबह 9 बजे। तिब्बत से सटे नेपाल के रसुवा जिले की भोटेकोशी नदी में अचानक तेज बाढ़ आ गई। कुछ ही मिनटों में सड़कें, इमारतें, गांव बह गए। सैकड़ों लोग लापता हैं, जिनमें भारत-अमेरिका समेत 26 देशों के नागरिक शामिल हैं। रात 9 बजे तक 95 मौतों की पुष्टि हो चुकी है। शुरुआती आकलन के मुताबिक, तबाही की वजह ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ यानी GLOF है। करीब एक साल पहले, जुलाई 2025 में भी इसी इलाके में तिब्बत की एक ग्लेशियर झील तापमान बढ़ने से फट गई थी, जिसमें 9 लोगों की जान गई थी। ये एक पैटर्न-सा बनता जा रहा है। GLOF की जद में भारत के भी कई इलाके हैं। 5 गुना बढ़ गईं ग्लेशियर झीलें, खतरे में भारत के 6 प्रदेश IIT रोपड़ और सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ने एक साझा स्टडी की। इसी महीने जारी रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में 1990 में सिर्फ 107 ग्लेशियर झीलें थीं। 2024 तक यह संख्या बढ़कर 669 हो गई, यानी 525% की बढ़ोत्तरी। 669 में से 88 झीलों पर नेपाल जैसी ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ का खतरा मंडरा रहा है। 9 झीलों को ‘बेहद ज्यादा खतरनाक’, 18 को ‘ज्यादा खतरनाक’ और 26 को ‘मध्यम खतरनाक’ श्रेणी में रखा गया है। रिसर्चर्स ने दो झीलों पर खास मॉडलिंग की- ब्यास बेसिन की हिमसू झील और सतलुज बेसिन की एक बेनाम झील। अगर ब्यास झील का नेचुरल डैम टूट जाए, तो 1,385 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड की बाढ़ आएगी। यानी हर सेकेंड करीब 14 लाख लीटर पानी बहेगा। इससे हर सेकेंड ओलंपिक साइज के 6 स्विमिंग पूल भरे जा सकते हैं। इसी तरह सतलुज झील से 3,507 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड पानी का सैलाब आएगा। यानी हर सेकेंड करीब 35 लाख लीटर पानी बहेगा। इससे डैम और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट समेत 588 इमारतों को खतरा है। हिमालय का बढ़ता तामपान इस खतरे को और बढ़ा रहा है। जुलाई 2026 में आई IIT खड़गपुर की एक स्टडी बताती है कि ऊंचाई वाले इलाकों का तापमान पिछले 20 सालों में करीब 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि इससे ग्लेशियर पिघलने और नदियों के बहाव में बड़ा बदलाव आ सकता है। ग्लेशियर झीलें अचानक कैसे फट जाती हैं? पहाड़ों पर ऊंचाई पर मौजूद ग्लेशियर जब पिघलते हैं, तो उनका पानी आसपास के निचले इलाके या किसी चट्टानी दीवार के सहारे इकट्ठा होने लगता है। ये धीरे-धीरे एक झील का रूप ले लेता है, जिसे ‘ग्लेशियल लेक’ कहते हैं। ये झील ग्लेशियर के सामने या उसकी निचली सतह पर भी बन सकती है। इन झीलों को बर्फ, पहाड़ का मलबा या चट्टान की एक नैचुरल दीवार यानी ‘डैम’ रोककर रखती है। जब ये दीवार किसी वजह से अचानक टूट जाती है, तो झील में जमा लाखों-करोड़ों क्यूबिक मीटर पानी बहुत तेज रफ्तार से बेकाबू होकर नीचे की तरफ बहता है। इसी को ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड, GLOF या ग्लेशियर की झील फटना कहते हैं। GLOF में पानी के बहाव की रफ्तार आम बारिश से आई बाढ़ के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती है, जिससे यह रास्ते में आने वाली हर चीज को बहुत तेजी से काटती-छांटती और बहाती चली जाती है। ग्लेशियर झील 3 वजहों से फट सकती हैं… 1. ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियर का तेजी से पिघलना 2. बर्फ या चट्टान का झील में गिरना 3. भारी बारिश से झील का ओवरफ्लो होना GLOF की तबाही कैसे रोकी जा सकती है? नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, NDMA और नेशनल GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम के मुताबिक, क्या नेपाल की बाढ़ से भारत में फौरन कोई खतरा? इसलिए भोटेकोशी में अधिक पानी आने पर उसका पानी सुनकोशी और फिर कोसी नदी तंत्र में शामिल हो सकता है। इससे सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जिले काफी प्रभावित हो सकते हैं। 2008 में नेपाल के कुसहा में कोसी नदी का तटबंध टूट गया था। इसके बाद कोसी नदी अपने नए/प्राकृतिक रास्ते को छोड़कर सैकड़ों साल पुराने पूर्व की ओर वाले रास्ते पर बहने लगी। इससे अचानक नदी का रुख घनी आबादी और नए इलाकों की तरफ मुड़ गया, जिससे बिहार के 34 लाख से अधिक लोग बिना किसी पूर्व चेतावनी के भीषण बाढ़ की चपेट में आ गए। हालांकि, इस बार रसुवा में लैंडस्लाइड, भूस्खलन या हिम झील टूटने से अचानक नदी में भारी मात्रा में पानी आ गया है। लेकिन नदी ने अपना रास्ता नहीं बदला है। वह अपने तय रास्ते पर बह रही है। इस कारण एक्सपर्ट तटबंध टूटने की संभावना व्यक्त नहीं कर रहे हैं। पानी के भारी दबाव और संभावित बढ़ोतरी को देखते हुए पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकिनगर गंडक बैराज के सभी 36 फाटक खोल दिए गए हैं। बिहार के 8 जिलों में हाईअलर्ट जारी किया गया है। ये जिले पश्चिमी चंपारण (बगहा), पूर्वी चंपारण (मोतिहारी), गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी और शिवहर हैं। ———— ये खबरें भी पढ़ें- नेपाल में बाढ़ से तबाही, सैकड़ों लापता, 95 मौतें:पावर प्लांट-पुल बहे; 133 भारतीय लापता, कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जा रहे थे नेपाल की बाढ़ से गंडक नदी में अचानक पानी बढ़ा:बैराज के 36 गेट खोले गए, मोतिहारी-गोपालगंज समेत बिहार के 8 जिलों में हाई अलर्ट

