अमेरिका के मोंटाना के बिलिंग्स शहर में रविवार शाम एक परिवार के 8 लोगों की हत्या कर दी गई। घटना उस समय हुई जब परिवार के लोग एक साथ डिनर कर रहे थे। आरोपी ने सबको गोली मारने के बाद घर में आग लगा दी। फिर खुद को भी शूट कर लिया। आरोपी के अलावा मरने वाले लोग एक ही परिवार की चार पीढ़ियों से थे। इनमें 4 बच्चे भी शामिल हैं। पुलिस के मुताबिक, उन्हें रविवार शाम करीब 6 बजे घर से गोली चलने की सूचना मिली थी। पुलिस मौके पर पहुंची तो घर के पीछे से गोलियों की आवाज आ रही थी। घर के बाहर एक व्यक्ति घायल मिला। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। वही इस घटना का संदिग्ध माना जा रहा है। पुलिस को बच्चे के बेहोश होने की सूचना मिली थी घटना के दौरान 911 पर पुलिस को घर में गोली चलने और एक बच्चे के बेहोश होने की सूचना मिली थी। इसके बाद मौके पर दमकल की गाड़ियां भेजी गईं। कुछ देर बाद एक और फायर इंजन भेजने को कहा गया। डिस्पैचर ने पूछा कि क्या बच्चे को गोली लगी है। पुलिस ने बताया कि इसकी पुष्टि नहीं हुई थी। सिर्फ इतना पता था कि बच्चा बेहोश है और यह भी साफ नहीं था कि वह सांस ले रहा है या नहीं। पुलिस पहुंची तो फायरिंग की आवाज आ रही थी इमरजेंसी टीमें रविवार शाम करीब 6:10 बजे मौके पर पहुंचीं। पुलिस ने घर के बाहर एक व्यक्ति को देखा। इसी दौरान घर के अंदर से गोलियों की आवाज भी आ रही थी। आग तेजी से फैल रही थी, इसलिए दमकलकर्मी तुरंत घर के अंदर नहीं जा सके। फायर चीफ मैट हॉपेल ने बताया कि आग तेजी से फैली और घर का बड़ा हिस्सा जल गया। आग बुझाने के लिए डाला गया पानी और जला हुआ मलबा जांच में परेशानी पैदा कर रहा है। इससे पुलिस को मौके से सबूत जुटाने में समय लग रहा है। पड़ोसी ने सुनी पटाखों जैसी आवाज घर से तीन मकान दूर रहने वाले डेविड हिलर ने बताया कि रविवार शाम 6 बजे के बाद उन्हें पटाखों जैसी आवाज सुनाई दी। बाद में एक पड़ोसी ने फोन कर इलाके में गोलीबारी की जानकारी दी। हिलर ने बाहर निकलकर देखा तो पुलिसकर्मी हथियारों के साथ गाड़ियों की आड़ में खड़े थे और घर से काला धुआं उठ रहा था। हत्या की वजह अभी सामने नहीं आई पुलिस के मुताबिक, संदिग्ध व्यक्ति मृतकों को जानता था, लेकिन हत्या के पीछे की वजह अभी सामने नहीं आई है। आग कैसे लगी, इसकी भी जांच की जा रही है। अधिकारियों ने कहा है कि जांच पूरी होने तक मामले से जुड़ी कुछ जानकारियां सार्वजनिक नहीं की जाएंगी। अमेरिका में मास शूटिंग की हाल की घटनाएं… 22 अगस्त: ओरेगन के फॉरेस्ट ग्रोव में एक घर में 5 लोगों की हत्या हुई। मृतकों में आरोपी की पार्टनर, उसकी मां और दादी समेत पांच लोग शामिल थे। संदिग्ध बाद में वॉशिंगटन में मृत मिला। 14 अगस्त: मिशिगन के मिसॉकी काउंटी में हुई गोलीबारी में 6 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में संदिग्ध शूटर भी शामिल है। घटना में एक 13 साल की बच्ची भी घायल हुई, जिसे चार गोलियां लगी थीं। 15 अगस्त: वर्जीनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के कैंपस के पास हुई गोलीबारी में 5 लोग घायल हुए। पुलिस ने 19 वर्षीय संदिग्ध को गिरफ्तार किया। ————————- यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका में भारतीय इंजीनियर ने पत्नी की हत्या की: भारत में रह रही गर्लफ्रेंड को शव की फोटो भेजी; जमानत के लिए ₹47 करोड़ देने होंगे अमेरिका में एक भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर को पत्नी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। पुलिस का आरोप है कि उसने पत्नी का गला घोंटकर हत्या की। पूरी खबर पढ़ें…
RSS प्रमुख मोहन भागवत मंगलवार, 25 अगस्त को अमेरिका के न्यूयॉर्क पहुंचे। यह अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के तीन देशों के वैश्विक संपर्क दौरे का पहला पड़ाव है। यह दौरा विदेशी स्थानीय संगठनों के निमंत्रण पर RSS के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों के तहत हो रहा है। न्यूयॉर्क पहुंचने पर भागवत का तिलक लगाकर स्वागत किया गया। भागवत भारतीय मूल के लोगों और स्थानीय संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत करेंगे। यह दौरा RSS के शताब्दी वर्ष के दौरान हो रहा है। मैडिसन स्क्वायर गार्डन में होगा कार्यक्रम भागवत शनिवार को न्यूयॉर्क सिटी के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल ऑननेस सेलिब्रेशंस’ कार्यक्रम में शामिल होंगे। यह सबसे बड़े और सबसे विविध सामुदायिक कार्यक्रमों में से एक होगा। कार्यक्रम का आयोजन अमेरिकन हिंदूज फॉर इंगेजमेंट एंड डायलॉग (AHEAD) फोरम कर रहा है। भागवत के संबोधन में देश-विदेश की काफी दिलचस्पी रहने की उम्मीद है। यह कार्यक्रम हिंदू त्योहार रक्षाबंधन के पारंपरिक आयोजन के साथ होगा। इसका आधुनिक संदेश एकता, नागरिक जिम्मेदारी और वैश्विक सद्भाव पर केंद्रित रहेगा। आयोजकों ने बताया कि कार्यक्रम में दिन की थीम से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। प्रमुख धार्मिक वक्ता भी इसमें शामिल होंगे। 25 अगस्त से तीन देशों का दौरा RSS के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने इससे पहले X पर एक पोस्ट में बताया था कि भागवत 25 अगस्त से अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जाएंगे। यह दौरा विदेशी स्थानीय संघों और संगठनों के निमंत्रण पर हो रहा है। पोस्ट में लिखा था, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत 25 अगस्त 2026 से अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन का दौरा करेंगे। उन्हें विदेशी स्थानीय संघों और संगठनों ने आमंत्रित किया है। यह दौरा RSS के चल रहे शताब्दी वर्ष के अवसर पर हो रहा है।” USCIRF की टिप्पणी पर विदेश मंत्रालय का जवाब शुक्रवार को विदेश मंत्रालय ने RSS को लेकर अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) की हालिया टिप्पणियों पर जवाब दिया। मंत्रालय ने अमेरिकी संस्था को पक्षपाती बताया और कहा कि उसकी विश्वसनीयता नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि USCIRF भारत के बारे में बार-बार गलत और उकसाने वाले बयान देता रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे बयानों को नजरअंदाज करना चाहिए। जायसवाल ने कहा, “हम सभी जानते हैं कि यह एक पक्षपाती संस्था है। कई वर्षों से यह भारत के बारे में गलत और उकसाने वाले बयान देती रही है। हमें ऐसी संस्थाओं को नजरअंदाज करना चाहिए, क्योंकि उनका अपना एजेंडा है और उनमें विश्वसनीयता नहीं है।” विदेश मंत्रालय का यह बयान USCIRF के अधिकारियों की उस अपील के बाद आया, जिसमें RSS पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। अधिकारियों ने अमेरिकी सरकार से RSS नेताओं को उच्चस्तरीय राजनयिक सम्मान नहीं देने और उनसे बैठक नहीं करने को भी कहा था। मार्च की रिपोर्ट में RSS और RAW का नाम USCIRF की हालिया टिप्पणियां मार्च में जारी उसकी सालाना रिपोर्ट के बाद आईं। रिपोर्ट में आयोग ने भारत पर धार्मिक स्वतंत्रता के कथित उल्लंघन को लेकर आलोचना की थी। आयोग ने RSS और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) समेत व्यक्तियों और संस्थाओं पर लक्षित प्रतिबंध लगाने का समर्थन किया था। भारत ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज किया था। भारत ने रिपोर्ट को “तथ्यों को तोड़-मरोड़कर और चुनिंदा तरीके से पेश करने वाला” बताया था। भारत ने कहा था कि यह रिपोर्ट “संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक कथाओं” पर आधारित है।
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के बेटे सुलैमान ईसा खान ने दावा किया है कि पाकिस्तान तानाशाही की तरफ बढ़ रहा है। उन्होंने अपने पिता के लंबे समय से जेल में होने को इसका उदाहरण बताया। न्यूज एजेंसी ANI के साथ वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुलैमान ने कहा कि पिछले कई साल से उनके पिता के साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है और इसमें सेना की बड़ी भूमिका है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में इमरान खान की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर चर्चा की गई। सुलैमान के साथ उनके भाई कासिम खान, अंतरराष्ट्रीय वकील जेरेड जेनसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों तथा मीडिया के सलाहकार सैयद बुखारी भी शामिल हुए। इमरान के बेटे बोले- पिता से नहीं मिल पा रहे इमरान के बेटों ने कहा कि वे जेल में बंद अपने पिता से मिलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोशिशें लगातार नाकाम हो रही हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने उनके वीजा आवेदन को बार-बार टाला या खारिज किया है। कासिम खान ने कहा, “उन्हें देखने का कोई भी मौका मिले तो हम तुरंत जाना चाहेंगे। हम पाकिस्तान आना चाहते हैं, लेकिन अब हालात और निराशाजनक होते जा रहे हैं। हमारे वीजा आवेदन खारिज किए गए, टाले गए और बार-बार अटकाए गए।” कासिम ने कहा, “मेरे पिता को लगातार एकांत कारावास में रखा जा रहा है। उन्हें 6×8 फुट की एक ऐसी कोठरी में 23 घंटे तक बंद रखा जाता है, जिसमें न खिड़की है और न ही रोशनी। उनकी उम्र 73 साल है और उनकी एक आंख की 85 फीसदी नजर जा चुकी है। वह आज भी अपने सिद्धांतों पर मजबूती से कायम हैं, लेकिन अब इसकी कीमत उनका शरीर चुका रहा है।” वकील का आरोप- जनरल मुनीर मनमाना शासन चला रहे इमरान खान के अंतरराष्ट्रीय वकील जेरेड जेनसर ने पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने देश के सैन्य नेतृत्व को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया और सेना प्रमुख असीम मुनीर पर ‘ऑथॉरिटेरियनिज्म’ यानी दमनकारी शासन का आरोप लगाया। जेनसर ने कहा, इमरान खान और उनकी पत्नी के खिलाफ जिस तरह कार्रवाई हो रही है, वह किसी लोकतांत्रिक सरकार के तरीके जैसी नहीं है। उन्होंने दावा किया कि इमरान खान के खिलाफ सैकड़ों मामले मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर दर्ज किए गए हैं। यह मामला अब सिर्फ उनकी जेल तक सीमित नहीं है। जेनसर के मुताबिक, उनकी गिरफ्तारी उन लोगों के लिए भी एक चेतावनी है, जो पाकिस्तान में सत्ता को चुनौती देने की कोशिश कर सकते हैं। जेनसर ने आगे कहा, उन्हें जेल में रखकर शासन पाकिस्तान के लोगों को साफ संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि उन्हें सत्ता के खिलाफ खड़ा होने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। जेनसर ने कहा, “कल्पना कीजिए कि अगर हम इमरान खान के साथ ऐसा कर सकते हैं, जिन्हें पूरी दुनिया जानती है, तो उस व्यक्ति के साथ क्या किया जा सकता है, जिसे दुनिया नहीं जानती?” इमरान खान के इलाज को लेकर भी विवाद इमरान खान की सेहत और जेल में उनके इलाज को लेकर भी विवाद बना हुआ है। 18 अगस्त को पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि इमरान खान को इलाज के लिए 48 घंटे के भीतर अदियाला जेल से इस्लामाबाद के शिफा इंटरनेशनल अस्पताल ले जाया जाए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि इमरान खान की जांच एक स्वतंत्र मेडिकल पैनल करे। इसमें हृदय रोग विशेषज्ञ, आंखों के डॉक्टर, सामान्य चिकित्सक और उनके निजी डॉक्टर डॉ. फैसल सुल्तान को शामिल किया जाना था। हालांकि, 20 अगस्त को अधिकारियों ने इमरान खान को शिफा इंटरनेशनल अस्पताल ले जाने के बजाय पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (PIMS) पहुंचाया। वहां कई घंटों तक उनकी मेडिकल जांच की गई। इसके बाद उन्हें चिकित्सकीय रूप से फिट घोषित कर वापस अदियाला जेल भेज दिया गया। इमरान खान की टीम का आरोप है कि जेल से शिफा अस्पताल की दिशा में एक ‘डमी काफिला’ भेजा गया, ताकि ऐसा लगे कि इमरान खान को वहां ले जाया जा रहा है। टीम ने यह भी दावा किया कि उनके निजी डॉक्टर डॉ. फैसल सुल्तान शिफा अस्पताल में उनका इंतजार कर रहे थे, लेकिन उन्हें इमरान खान की जांच करने का मौका नहीं दिया गया। इमरान से फिर मिलीं बहन नूरीन नियाजी इमरान खान की बहन नूरीन नियाजी ने मंगलवार को अदियाला जेल में उनसे मुलाकात की। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद यह लगातार दूसरे हफ्ते है, जब नूरीन ने अपने भाई से मुलाकात की है। सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त को आदेश दिया था कि कैदी इमरान खान की उनके परिवार के सदस्यों से सप्ताह में एक बार मुलाकात कराई जाए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि सरकार उनके बेटों से सप्ताह में दो बार फोन पर बात कराने की व्यवस्था करे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इमरान खान के परिवार ने अदालत को भरोसा दिलाया था कि वे मीडिया से बात नहीं करेंगे। PTI के वकील अवैस यूनुस चौधरी के मुताबिक, मंगलवार को नूरीन नियाजी की इमरान खान से मुलाकात करीब 45 मिनट चली। उन्होंने कहा कि इमरान की दो और बहनें भी जेल के बाहर गाड़ी में इंतजार कर रही थीं। नूरीन नियाजी के जेल से बाहर आने के बाद तीनों बहनें बिना मीडिया से बात किए वहां से चली गईं। ———————————- यह खबर भी पढ़ें… इमरान खान अस्पताल से फिर जेल भेजे गए:डॉक्टर बोले- पूर्व पीएम को जेल में रखना सुरक्षित; देर रात हॉस्पिटल में भर्ती किया था
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को मेडिकल जांच के बाद शुक्रवार को इस्लामाबाद के शिफा इंटरनेशनल हॉस्पिटल से वापस अडियाला जेल भेज दिया गया। पूरी खबर यहां पढ़ें…
18 दिन पहले सऊदी, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच मक्का में एक डिफेंस एग्रीमेंट हुआ। इसमें NATO की तरह करार है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। अब इसमें कुछ और इस्लामिक देशों के शामिल होने की अटकलें लग रही हैं। इनमें सबसे बड़ा नाम है भारत का पड़ोसी- बांग्लादेश। क्या वाकई ‘इस्लामिक NATO’ जॉइन करेगा बांग्लादेश, ये भारत के लिए कितना बड़ा खतरा और सरकार कैसे काउंटर करेगी; आज के एक्सप्लेनर में जानेंगे… सवाल-1: मक्का एग्रीमेंट में बांग्लादेश के शामिल होने की चर्चा क्यों उठी? जवाबः कोई औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन बांग्लादेश के दो मंत्रियों ने बयानों से चर्चा शुरू हुई…
सवाल-2: तो बांग्लादेश मक्का पैक्ट में शामिल होगा या नहीं? जवाब: सीनियर डिफेंस जर्नलिस्ट मनोज जोशी कहते हैं, ‘अगर ये सुन्नी देशों के बीच का पैक्ट है, तो बांग्लादेश भी इसमें शामिल हो सकता है। अगर इसका मकसद मिडिल ईस्ट की रीजनल सिक्योरिटी है, तो इसमें बांग्लादेश की कोई खास अहमियत नहीं है।’ स्ट्रैटेजिक एनालिस्ट ब्रह्म चेलानी भी कहते हैं, ‘ये पैक्ट 4 सुन्नी देशों का गठबंधन बन सकता है। सत्ताधारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, BNP के इस्लामिक ताकतों के साथ गहरे रिश्ते रहे हैं। रहमान की विदेश नीति उनकी पार्टी की उसी पुरानी स्ट्रैटेजी की तरफ जाती दिख रही है।’ दरअसल, बांग्लादेश में इस वक्त BNP की सरकार है, जो अपने कट्टर सुन्नी इस्लामिक रुख के लिए जानी जाती है। बीते कुछ समय से ये कट्टर रुख बढ़ रहा है, इसके कुछ संकेत हैं… पैक्ट में शामिल होने से बांग्लादेश को सऊदी अरब से विदेशी रोजगार, निवेश और तेल मिल सकता है। तुर्किये से डिफेंस टेक्नोलॉजी, हथियार और ट्रेनिंग मिल सकती है। पाकिस्तान इस्लामी मंचों पर राजनीतिक समर्थन दे सकता है। हालांकि बांग्लादेश के पूर्व राजनयिक एम शाहिदुल इस्लाम लिखते हैं, ‘बांग्लादेश को अपने फैसले दूसरों को खुश करने के लिए नहीं लेने चाहिए। मक्का पैक्ट की लागत बहुत ज्यादा है, लेकिन फायदा स्पष्ट नहीं है। समझौते में शामिल दूसरे देश बांग्लादेश जैसे छोटे देश पर दबाव भी बना सकते हैं। बांग्लादेश को पूछना होगा कि क्या उसे भारत-पाकिस्तान या ईरान-सऊदी के संघर्ष से दूर रहने की आजादी होगी।’
सवाल-3: अगर बांग्लादेश मक्का-पैक्ट में शामिल हुआ, तो भारत के लिए क्या खतरा? जवाब: दो बड़े खतरे हैं… 1. साउथ एशिया में भारत का प्रभाव, सिक्योरिटी, आर्थिक रिश्तों पर असर 2. पाकिस्तान से जंग हुई, तो मुश्किल बढ़ेगी सवाल-4: भारत इसे कैसे काउंटर करेगा? जवाब: भारत को घेरने का इरादा तो दिखता है, लेकिन लंबे समय तक भारत जैसी इकॉनोमिक पावर का विरोध करना मुमकिन नहीं है। भारत 2 तरह की तैयारी कर सकता है… 1. सऊदी, तुर्किये जैसे देशों से रिश्ते बेहतर करना 2. अहम समुद्री रूट्स पर नेवी को मजबूत करना 3. मक्का पैक्ट का उद्देश्य साफ नहीं, भारत को कड़ी नजर रखनी चाहिए ———— ये खबर भी पढ़िए… क्या जम्मू-कश्मीर पर भारत के पाले में अमेरिका, अमेरिकी राजदूत सर्जियो बोले- ये भारत का अहम हिस्सा; ट्रम्प का असली मकसद क्या 19 अगस्त 2026 को भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर जम्मू-कश्मीर में सीएम उमर अब्दुल्ला से मिले। उन्होंने वहीं से बयान दिया- ‘जम्मू-कश्मीर भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मैं यहां पहली बार आया। ये बहुत खूबसूरत जगह है।’ पूरी खबर पढ़िए…
अमेरिका और रूस के बीच तनाव के बीच अमेरिकी वायुसेना का एक बड़ा मिलिट्री प्लेन मंगलवार को मॉस्को में उतरा। C-17A ग्लोबमास्टर III की इस लैंडिंग ने इसलिए ध्यान खींचा, क्योंकि रूस की राजधानी में किसी अमेरिकी सैन्य प्लेन का पहुंचना बेहद असामान्य है। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर इस प्लेन को रूस क्यों भेजा गया? फ्लाइट-ट्रैकिंग मॉनिटर के मुताबिक, प्लेन ने मॉस्को के समय के अनुसार सुबह करीब 8:50 बजे लातविया की राजधानी रीगा से उड़ान भरी और लगभग 74 मिनट बाद मॉस्को पहुंचा। इस उड़ान की एक और खास बात यह रही कि प्लेन रूस के हवाई क्षेत्र से होकर मॉस्को पहुंचा। किसी अमेरिकी सैन्य प्लेन को इस रास्ते से उड़ान भरने के लिए रूसी अधिकारियों की मंजूरी जरूरी होती है। प्लेन के मिशन पर अब भी सस्पेंस रिकॉर्ड के मुताबिक, यही प्लेन 23 अगस्त को वॉशिंगटन डीसी के पास जॉइंट बेस एंड्रयूज से रीगा पहुंचा था। यह वही अमेरिकी सैन्य अड्डा है जहां राष्ट्रपति के विमानों का बेड़ा रहता है, जिसमें एयर फोर्स वन भी शामिल है। अमेरिका और रूस दोनों ने अब तक यह नहीं बताया कि प्लेन को मॉस्को क्यों भेजा गया था। प्लेन में कौन था और क्या सामान था, इसकी जानकारी भी सामने नहीं आई है। मॉस्को में अमेरिकी सैन्य प्लेन की असामान्य लैंडिंग के बाद प्लेन पर नजर रखने वाले लोगों और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच कई कयास लगाए जाने लगे। कुछ लोगों ने इसे कैदियों की अदला-बदली, यूक्रेन युद्ध को लेकर किसी गुप्त बातचीत या अमेरिकी दूतावास से जुड़े काम से जोड़कर देखा। हालांकि, इनमें से किसी भी दावे की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अमेरिकी C-17 को मॉस्को भेजने के पीछे वजह क्या थी? C-17 ग्लोबमास्टर- टैंक से सैनिकों तक ले जाने में सक्षम C-17A ग्लोबमास्टर III अमेरिकी वायुसेना का बहुत बड़ा सामान ढोने वाला सैन्य प्लेन है। इसका इस्तेमाल सैनिकों, सैन्य गाड़ियों और भारी सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जाता है। इस प्लेन को बोइंग ने बनाया है। इसकी लंबाई करीब 174 फीट और दोनों पंखों की चौड़ाई करीब 170 फीट है। यह प्लेन करीब 1,70,900 पाउंड यानी लगभग 77 टन वजन ले जा सकता है। इसमें एक साथ 102 पूरी तरह तैयार पैराट्रूपर्स या करीब 69 टन वजन वाला M1 अब्राम्स टैंक ले जाया जा सकता है। इसकी उड़ने की सामान्य रफ्तार करीब 518 मील प्रति घंटा है। ज्यादा से ज्यादा वजन के साथ यह बिना दोबारा ईंधन लिए करीब 2,760 मील तक उड़ सकता है। हवा में ही ईंधन भरने की सुविधा मिलने पर यह इससे कहीं ज्यादा दूरी तय कर सकता है। इतना बड़ा प्लेन होने के बावजूद C-17 करीब 3,500 फीट लंबी रनवे से भी उड़ान भर सकता है और उतर सकता है। इसकी एक खासियत यह भी है कि यह अपनी ताकत से पीछे की ओर भी चल सकता है। अमेरिकी वायुसेना इसका इस्तेमाल कहां करती है? C-17 का काम सिर्फ सैनिकों और हथियारों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना नहीं है। अमेरिकी वायुसेना इसका इस्तेमाल सैनिकों और सामान को पहुंचाने, हवा से सामान गिराने, घायल लोगों को बाहर निकालने और जरूरत के समय मदद पहुंचाने के लिए भी करती है। यह कोई लड़ाकू प्लेन या बम गिराने वाला प्लेन नहीं है। इसका मुख्य काम भारी सामान और सैन्य उपकरणों को जल्दी एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना है। प्लेन में क्या था, अभी पता नहीं मॉस्को जाने वाला यह प्लेन RCH4555 नाम से उड़ रहा था। सार्वजनिक फ्लाइट जानकारी से यह पता चलता है कि प्लेन कहां से चला और किस रास्ते से मॉस्को पहुंचा। लेकिन प्लेन में कौन था और उसके अंदर क्या सामान था, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है। यही वजह है कि रूस और अमेरिका के बीच तनाव के इस दौर में इस उड़ान ने इतना ध्यान खींचा है। फिलहाल कैदियों की अदला-बदली, रूस-अमेरिका के बीच किसी खास बातचीत या अमेरिकी दूतावास से जुड़े काम जैसी बातें सिर्फ अंदाजे हैं। इनमें से किसी की भी पुष्टि नहीं हुई है। जब तक अमेरिका या रूस की तरफ से कोई जानकारी नहीं आती, तब तक यह साफ नहीं होगा कि अमेरिकी C-17 प्लेन को अचानक मॉस्को भेजने की असली वजह क्या थी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कनाडा से जुड़ी झील का नाम बदलने की बात कही है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि वे ‘लेक ओंटारियो’ का नाम बदलकर ‘लेक अमेरिका’ रखने पर विचार कर रहे हैं। लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा की सीमा पर स्थित है। ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय आया है, जब दोनों पड़ोसी देशों के बीच टैरिफ को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। अमेरिका और कनाडा ने एक-दूसरे पर 50% टैरिफ लगा दिया है। न्यूज एजेंसी AP के मुताबिक, लेक ओंटारिया का नाम बदलने को लेकर फिलहाल कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ है और न ही औपचारिक प्रक्रिया शुरू की गई है। यह पहली बार नहीं है जब ट्रम्प ने किसी जगह का नाम बदलने की बात कही हो। जनवरी 2025 में उन्होंने अमेरिकी सरकारी दस्तावेजों में ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ को ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ कहने का आदेश दिया था। हालांकि, उस फैसले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिली थी। क्यों अहम है लेक ओंटारियो? लेक ओंटारियो उत्तरी अमेरिका की पांच बड़ी झीलों (ग्रेट लेक्स) में से एक है। इसका उत्तरी किनारा कनाडा के ओंटारियो प्रांत और दक्षिणी किनारा अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य से जुड़ा है। यह झील दोनों देशों के लिए पेयजल, माल परिवहन, मत्स्य पालन और पर्यटन का अहम स्रोत है। सेंट लॉरेंस नदी के जरिए यह अटलांटिक महासागर से जुड़ती है, इसलिए उत्तर अमेरिका के व्यापारिक नेटवर्क में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। इसके प्रबंधन और संरक्षण के लिए अमेरिका और कनाडा के बीच कई समझौते भी हैं। क्या अमेरिका अकेले नाम बदल सकता है? विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका अपने सरकारी रिकॉर्ड, नक्शों और दस्तावेजों में किसी स्थान का नाम बदल सकता है। लेकिन यदि वह स्थान किसी दूसरे देश के साथ साझा है, तो नया नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतः स्वीकार नहीं हो जाता। यानी अमेरिका अपने आधिकारिक दस्तावेजों में लेक ओंटारियो को कोई नया नाम दे सकता है, लेकिन कनाडा या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं उसे मानने के लिए बाध्य नहीं होंगी। यही स्थिति पहले ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ मामले में भी देखने को मिली थी। कनाडा से क्यों बढ़ रहा है तनाव? हाल के महीनों में अमेरिका और कनाडा के बीच टैरिफ, व्यापारिक नियमों और सीमा से जुड़े मुद्दों पर मतभेद बढ़े हैं। ट्रम्प प्रशासन ने कनाडा पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की बात कही है, जबकि कनाडा ने भी कई अमेरिकी कदमों का विरोध किया है। विश्लेषकों का मानना है कि लेक ओंटारियो को ‘लेक अमेरिका’ कहने का सुझाव केवल नाम बदलने का मुद्दा नहीं है, बल्कि कनाडा के साथ जारी आर्थिक और राजनीतिक टकराव के बीच दिया गया एक प्रतीकात्मक संदेश भी हो सकता है। ट्रम्प के लिए नाम बदलना नया नहीं ट्रम्प अपने राजनीतिक संदेशों में प्रतीकों और नामों का इस्तेमाल पहले भी करते रहे हैं। ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ को ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ कहने का फैसला भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया था। उस समय भी बहस छिड़ गई थी कि क्या कोई देश अकेले किसी अंतरराष्ट्रीय या साझा भौगोलिक क्षेत्र का नाम बदल सकता है। खबर अपडेट हो रही है…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कनाडा से जुड़ी झील का नाम बदलने की बात कही है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि वे ‘लेक ओंटारियो’ का नाम बदलकर ‘लेक अमेरिका’ रखने पर विचार कर रहे हैं। लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा की सीमा पर स्थित है। ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय आया है, जब दोनों पड़ोसी देशों के बीच टैरिफ को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। अमेरिका और कनाडा ने एक-दूसरे पर 50% टैरिफ लगा दिया है। न्यूज एजेंसी AP के मुताबिक, लेक ओंटारिया का नाम बदलने को लेकर फिलहाल कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ है और न ही औपचारिक प्रक्रिया शुरू की गई है। यह पहली बार नहीं है जब ट्रम्प ने किसी जगह का नाम बदलने की बात कही हो। जनवरी 2025 में उन्होंने अमेरिकी सरकारी दस्तावेजों में ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ को ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ कहने का आदेश दिया था। हालांकि, उस फैसले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिली थी। क्यों अहम है लेक ओंटारियो? लेक ओंटारियो उत्तरी अमेरिका की पांच बड़ी झीलों (ग्रेट लेक्स) में से एक है। इसका उत्तरी किनारा कनाडा के ओंटारियो प्रांत और दक्षिणी किनारा अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य से जुड़ा है। यह झील दोनों देशों के लिए पीने के पानी, सामान की आवाजाही, मछली पालन और पर्यटन के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। सेंट लॉरेंस नदी के जरिए यह अटलांटिक महासागर से जुड़ती है, इसलिए यहां से सामान की आवाजाही भी होती है। झील की देखभाल और सुरक्षा के लिए अमेरिका और कनाडा मिलकर काम करते हैं और कई समझौते कर चुके हैं। लेक ओंटारियो को उसका नाम कैसे मिला? ‘ओंटारियो’ नाम मूलनिवासी ह्यूरॉन लोगों की भाषा से आया माना जाता है। इसका अर्थ ‘सुंदर झील’ है। बाद में यूरोपीय लोगों ने भी इस नाम का इस्तेमाल शुरू किया और यही नाम प्रचलित हो गया। इसी से कनाडा के ओंटारियो राज्य का नाम भी पड़ा। यूरोपीय मानचित्रों में यह नाम 17वीं सदी से दिखाई देने लगा था। यानी ‘ओंटारियो’ नाम नया नहीं है, बल्कि सदियों पुराना है। एक दिलचस्प बात यह भी है कि लेक ओंटारियो ग्रेट लेक्स में सबसे छोटी झील है, लेकिन इसका आर्थिक महत्व बहुत बड़ा है। क्या अमेरिका अकेले नाम बदल सकता है? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका अपने सरकारी रिकॉर्ड, नक्शों और दस्तावेजों में किसी स्थान का नाम बदल सकता है। लेकिन यदि वह स्थान किसी दूसरे देश के साथ साझा है, तो नया नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार नहीं हो जाता। यानी अमेरिका अपने आधिकारिक दस्तावेजों में लेक ओंटारियो को कोई नया नाम दे सकता है, लेकिन कनाडा या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं उसे मानने के लिए बाध्य नहीं होंगी। यही स्थिति पहले ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ मामले में भी देखने को मिली थी। जनवरी 2025 में ट्रम्प ने अमेरिकी सरकारी इस्तेमाल में ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ का नाम बदलकर ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ करने का आदेश दिया था। अमेरिका ने इसे अपने आधिकारिक रिकॉर्ड में लागू कर दिया, लेकिन मैक्सिको और दूसरे देशों ने पुराने नाम का इस्तेमाल जारी रखा। ————— यह खबर भी पढ़ें… कनाडाई PM बोले- अमेरिका और हमारे बीच जंग के हालात: ट्रम्प के टैरिफ को हमला बताया; US पर जवाबी टैरिफ लगाने का ऐलान किया कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिका के साथ बढ़ते ट्रेड विवाद को लेकर कहा है कि “हम जंग में हैं, क्योंकि हम पर हमला हुआ है।” उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ को कनाडा पर हमला बताया। पूरी खबर पढ़ें…
ब्रिटेन से मेडिकल टूरिज्म के तहत उत्तरी साइप्रस में आईवीएफ कराने वाले ब्रिटेन के 30 परिवारों के साथ बड़ी धोखाधड़ी हुई। आरोप है कि आईवीएफ क्लिनिक ने उनकी पसंद के स्पर्म-एग डोनर इस्तेमाल करने का दावा किया था, लेकिन 11 बच्चों के डीएनए टेस्ट से पता चला कि ये उन स्पर्म-एग डोनर के नहीं हैं, जिसे उनके माता-पिता ने चुना था। आईवीएफ से पैदा इन बच्चों का डीएनए तुर्किये और अरब देशों के लोगों के डीएनए से मिल रहा है, जबकि उनके माता-पिता ने फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया जैसे पश्चिम यूरोपीय देशों के पूरी तरह से स्क्रीन किए गए और स्वस्थ डोनर्स को चुना था। बीबीसी की खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, इस अंतरराष्ट्रीय घोटाले के लगभग आधे मामले अकेले ‘डोगस आईवीएफ सेंटर’ से सामने आए हैं। दुनिया के सबसे बड़े स्पर्म बैंक ‘क्रायोस इंटरनेशनल’ ने स्पष्ट किया है कि उसने 2016 में ही डोगस क्लिनिक को ब्लैकलिस्ट कर दिया था और वहां कभी स्पर्म की सप्लाई ही नहीं की। इसके बावजूद क्लिनिक सालों तक क्रायोस के साथ अपने आधिकारिक जुड़ाव का झूठा विज्ञापन देकर संतान चाहने वाले जोड़ों को ठगता रहा। निजी डेटा की अनदेखी – माता-पिता ने डोनर की मेडिकल हिस्ट्री, रूप-रंग, शिक्षा और शौक के आधार पर चयन किया था, ताकि बच्चा 18 साल की उम्र में अपने जैविक मूल को जान सके। फर्जी डोनर के इस्तेमाल से बच्चों के मूलभूत मानवाधिकारों का हनन हुआ है। ब्रिटिश फर्टिलिटी सोसाइटी के अनुसाार, 30 से अधिक बच्चों के मामलों में ऐसा होना एक संगठित आपराधिक नेटवर्क, गंभीर लापरवाही और संस्थागत धोखाधड़ी है। उत्तरी साइप्रस तुर्किये के कब्जे में है और कानून लचर हैं। वैश्विक फर्टिलिटी रिपोर्ट्स और मेडिकल टूरिज्म डेटा के अनुसार, सस्ता होने से हर साल 5-8 हजार विदेशी जोड़े आईवीएफ ट्रीटमेंट के लिए नार्दन साइप्रस आते हैं और पिछले 10 वर्षों में 50,000 से 70,000 विदेशी नागरिकों ने नॉर्दन साइप्रस के क्लिनिकों में आईवीएफ ट्रीटमेंट कराया है। इनमें बड़ी संख्या ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के लोगों की है। रैचेल का दावा – 13 साल बाद डीएनए टेस्ट से शक पक्का हुआ रिपोर्ट में रैचेल नाम की एक मां का केस बताया गया है। रैचेल ने 2012 में डोगस में करीब 4.43 लाख रु. में आईवीएफ कराया। रैचेल ने क्रायोस वेबसाइट से डेनमार्क के एक डोनर को चुना था। प्रोफाइल में लिखा था कि 18 साल बाद बच्चा चाहे तो डोनर की पहचान जान सकता है। रैचेल का कहना है कि क्लिनिक ने बार-बार मेडिकल रिपोर्ट भेजने से इनकार किया, जिससे शक बढ़ा। अब डीएनए टेस्ट से यह सामने आया कि जोना उनका बायोलॉजिकल बेटा है, लेकिन चुना गया डोनर उसका पिता नहीं है। रैचेल ने कहा कि दुख यह है कि जोना भविष्य में अपने डोनर से संपर्क का मौका खो सकता है।
फ्रांस के एक गांव में सोमवार को टॉरनेडो आया। इसमें 41 लोग घायल हुए और सैकड़ों घरों को नुकसान पहुंचा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, टॉरनेडो से सबसे ज्यादा नुकसान करीब 1,000 आबादी वाले पोमास गांव में हुआ। अधिकारियों के मुताबिक, यहां करीब 300 घरों को नुकसान पहुंचा और कुछ घरों की छतें पूरी तरह उड़ गईं। परिवहन मंत्री फिलिपे तबारो ने बताया कि ट्रेनें लेट हुईं, सड़कें बंद करनी पड़ीं और हवाई अड्डों पर देरी और उड़ानें रद्द हुईं। देश के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से के कई इलाकों में तूफान को लेकर ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया था। खबर लगातार अपडेट हो रही है…
लुधियाना में नशे की लत ने थाईलैंड की एक युवती की जिंदगी इस कदर बदल दी कि वह सड़क पर भटकने और खुदकुशी की कोशिश करने तक पहुंच गई। करीब डेढ़-दो साल पहले लुधियाना आई थी, यहां मसाज पार्लर में काम किया। धीरे-धीरे उसे आइस (चिट्टा), भांग और शराब की लत लग गई। नशे के कारण उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ गई और वह कई बार सड़कों पर दौड़ती और लोगों से झगड़ती रही। होटल से नौकरी जाने के बाद वह सड़क पर रहने को मजबूर हो गई। युवती वह बार-बार थाईलैंड में अपनी 13 साल की बेटी होने की बात कह रही है। सोशल मीडिया पर उसकी वीडियो सामने आने के बाद लुधियाना के जसकीरत सिंह ने उसकी मदद की और मनुखता दी सेवा सोसायटी से संपर्क किया। फिलहाल युवती को सुपनियां दे घर में रखा गया है, जहां उसका इलाज चल रहा है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट युवती की कहानी सिलसिलेवार जानिए… परिवार को तलाश रही संस्था *********** ये खबर भी पढ़ें: मोहाली में विदेशी युवती से गैंगरेप, देह व्यापार कराया: चंडीगढ़ में फ्रेंडशिप की; इनकार पर हाथ-पैर बांधकर पीटा, मोमबत्ती से जलाया युगांडा से मेडिकल वीजा पर आई युवती से चंडीगढ़ में 3 युवकों ने फ्रेंडशिप की। इसके बाद उसे रहने के लिए अपने साथ मोहाली ले गए। वहां लस्सी में निकोटिन का नशा पिलाकर उसका गैंगरेप किया। यही नहीं, उससे देह व्यापार तक कराने लगे। उसने विरोध किया तो हाथ-पैर बांधकर उसे पीटा गया। इसका खुलासा तब हुआ, जब युवती को कुछ दिन पहले लुधियाना की एक समाज सेवी संस्था के पास लाया गया। (पढ़ें पूरी खबर)

