रिलायंस के पास रिफाइनिंग की असाधारण क्षमता! जामनगर दौरे से पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का बड़ा बयान

Marco Rubio Jamnagar Refinery: गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज की दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी के दौरे से ठीक पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) ने कंपनी की रिफाइनिंग क्षमताओं की जमकर तारीफ की है। नेटवर्क18 के एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी को दिए एक विशेष इंटरव्यू में रुबियो ने कहा कि रिलायंस ग्लोबल एनर्जी सेक्टर में एक बेहद महत्वपूर्ण प्लेयर है और उनका दौरा वेनेजुएला तथा पश्चिमी गोलार्ध से कच्चे तेल के आयात और प्रसंस्करण को बढ़ाने पर केंद्रित होगा।

‘रिलायंस के पास रिफाइनिंग की असाधारण क्षमता’

बुधवार को जामनगर स्थित रिलायंस रिफाइनरी का दौरा करने जा रहे अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा, ‘रिलायंस एक बेहद महत्वपूर्ण कंपनी है। उसके पास कच्चे तेल को रिफाइन करने की असाधारण क्षमता है।’ रुबियो ने ये भी कहा कि रिलायंस की रिफाइनिंग क्षमताएं भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविध बनाने में बड़ी मदद कर सकती हैं।

वेनेजुएला के कच्चे तेल पर रिलायंस के साथ सहयोग का बड़ा प्लान

रुबियो ने कहा कि वेनेजुएला में कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ रहा है और भारत का इतिहास रहा है कि वह वेनेजुएला के भारी और उच्च-सल्फर तेल को आसानी से रिफाइन कर लेता है।

उन्होंने स्पष्ट किया, ‘पश्चिमी गोलार्ध से आने वाले तेल को जब भारत में रिफाइन किया जाता है, तो यह भारत के लिए भी फायदेमंद है और हमारे लिए भी।’ अमेरिकी विदेश मंत्री ने अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र में रिलायंस के मौजूदा निवेश और रिफाइनिंग क्षमताओं की भी सराहना की।

जामनगर में है दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स

रिलायंस इंडस्ट्रीज जामनगर में दुनिया का सबसे बड़ा सिंगल-साइट रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स चलाती है, जिसकी कच्चा तेल प्रसंस्करण क्षमता लगभग 14 लाख बैरल प्रति दिन है।

इस कॉम्प्लेक्स में दो बड़ी रिफाइनरी शामिल हैं, जो वेनेजुएला द्वारा उत्पादित भारी और उच्च-सल्फर ग्रेड जैसे जटिल कच्चे तेल को भी आसानी से प्रोसेस करने में सक्षम हैं।

‘बस कुछ हफ्तों की बात…’, भारत से ट्रेड डील पर US विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दे दिया बहुत बड़ा संकेत

Disclaimer: मनीकंट्रोल नेटवर्क18 ग्रुप का हिस्सा है। नेटवर्क18 का नियंत्रण इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट के पास है, जिसकी एकमात्र लाभार्थी रिलायंस इंडस्ट्रीज है।

Marco Rubio Interview: ‘भारत-अमेरिका ट्रेड डील जल्द’, जानिए ईरान युद्ध, आतंकवाद से लेकर रूसी तेल की खरीद पर क्या बोले मार्को रुबियो

Marco Rubio Interview: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत के साथ ट्रेड डील, रूस से तेल खरीदने, पाकिस्तान, ईरान और क्वाड जैसे अहम मुद्दों पर बात की। नेटवर्क18 के ग्रुप एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील लगभग तैयार है। इसे पूरा होने में महीनों नहीं, बल्कि कुछ हफ्ते लगने की उम्मीद है।

रुबियो ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ अपने रिश्तों की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के पास आपसी संबंध मजबूत करने के असाधारण अवसर हैं। रुबियो ने रूस से तेल खरीद, पाकिस्तान में आतंकवाद और ईरान युद्ध के बारे में भी बात की।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील

रुबियो ने कहा कि ट्रेड डील अब अंतिम चरण में है। कुछ तकनीकी मुद्दों को सुलझाना और समझौते की भाषा को अंतिम रूप देना बाकी है। उनके मुताबिक, घोषणा से पहले जरूरी है कि दोनों देश हर शर्त पर सहमत हों। उन्हें उम्मीद है कि डील कुछ हफ्तों में पूरी हो जाएगी।

भारत को दूसरे देशों के मुकाबले बेहतर टैरिफ मिलने के सवाल पर रुबियो ने कहा कि किसी भी ट्रेड डील का मकसद मौजूदा स्थिति से बेहतर शर्तें हासिल करना होता है। लेकिन इससे भी जरूरी है कि दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते लंबे समय तक टिकाऊ रहें।

उन्होंने कहा कि हर देश के अपने राष्ट्रीय हित होते हैं। भारत अपने हितों की रक्षा करेगा और अमेरिका भी ऐसा ही करेगा। लेकिन दोस्ती और सहयोग की वजह से दोनों देश मतभेदों को सुलझा सकते हैं। रुबियो के मुताबिक, समझौता ऐसा होना चाहिए, जो कुल मिलाकर दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो।

रूस से तेल खरीदने पर भारत की स्थिति समझते हैं रुबियो

अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ और प्रतिबंध लगाने की बात करता है, जबकि खुद भी रूस से डीजल खरीद रहा है। इस सवाल पर रुबियो ने कहा कि यूक्रेन युद्ध पांचवें साल में पहुंच चुका है और इसे खत्म करना जरूरी है। लेकिन रूस पर प्रतिबंधों का असर सिर्फ उसी देश पर नहीं पड़ता। रूस के साथ कारोबार करने वाले दूसरे देशों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि अमेरिका के सामने दो चुनौतियां हैं। पहली, रूस पर दबाव बनाना, ताकि वह युद्ध खत्म करने के लिए समझौते पर आए। दूसरी, यह देखना कि इस दबाव का असर दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था पर कितना पड़ रहा है।

रुबियो के मुताबिक, यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका के हितों के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को भी देखना जरूरी है। उन्होंने माना कि रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच तनाव है। उम्मीद जताई कि ट्रेड डील और बातचीत से मतभेद कम हो सकते हैं।

अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ नफरत

अमेरिका के इलिनॉय स्टेट में एक हिंदू मंदिर पर हमले की कथित साजिश और भारतीयों के खिलाफ नफरत के सवाल पर रुबियो ने कहा कि कोई भी देश ऐसी घटनाओं से पूरी तरह अछूता नहीं है। हर समाज में कुछ लोग अज्ञानता और नफरत के कारण गलत काम करते हैं।

हालांकि, उन्होंने इस बात से इनकार किया कि अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ नफरत व्यापक स्तर पर फैली हुई है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं के बाद भारतीय-अमेरिकी समुदाय के साथ आसपास के लोग भी पीड़ितों के समर्थन में खड़े होते हैं।

रुबियो ने विस्कॉन्सिन में सिख समुदाय के साथ हुई एक भयावह घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने अमेरिका में यहूदी विरोधी घटनाओं में बढ़ोतरी पर चिंता जताई। उनके मुताबिक, नेताओं को ऐसी नफरत को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, न ही उसका बचाव करना चाहिए या उसे नजरअंदाज करना चाहिए।

पाकिस्तान पर अमेरिकी नीति

पाकिस्तान को लेकर अमेरिकी नीति पर रुबियो ने कहा कि अमेरिका दुनिया में कहीं भी आतंकवाद और उसे समर्थन देने वालों के खिलाफ है। हालांकि, विदेश मंत्री के तौर पर उन्हें उन देशों के साथ भी संबंध बनाए रखने पड़ते हैं, जिनसे कुछ मुद्दों पर मतभेद हैं।

राहुल जोशी ने उन्हें याद दिलाया कि 2025 में अमेरिकी सीनेटर रहते हुए रुबियो ने पाकिस्तान को अमेरिकी सुरक्षा सहायता रोकने से जुड़ा विधेयक लाने की बात कही थी, अगर वह भारत के खिलाफ आतंकवाद को समर्थन देता है। उनसे पूछा गया कि क्या अब उनकी नीति बदल गई है।

रुबियो ने कहा कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं और भौगोलिक स्थिति के लिहाज से भी अमेरिका के लिए उससे बातचीत करना जरूरी है। उन्होंने इसकी तुलना भारत के ईरान के साथ संबंधों से की। उनके मुताबिक, भारत को भी ईरान के नेताओं से बातचीत करनी पड़ती है, भले ही कुछ मुद्दों पर मतभेद हों।

रुबियो ने कहा कि पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए रखने से अमेरिका को उन मुद्दों पर बातचीत करने का मौका मिल सकता है, जिनसे भारत को चिंता है। इससे आतंकवाद को समर्थन देने वाली गतिविधियों को रोकने में मदद मिलने की उम्मीद भी की जा सकती है।

ईरान और होर्मुज स्ट्रेट पर तनाव

ईरान के साथ संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर हमलों को लेकर रुबियो ने कहा कि ईरान की सरकार के साथ समझौता करना मुश्किल है। उन्होंने ईरान की तुलना नाजी जर्मनी से की और आरोप लगाया कि ईरान व्यावसायिक जहाजों को निशाना बना रहा है। और ऐसे नाविकों की जान खतरे में डाल रहा है, जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है।

रुबियो ने कहा कि अमेरिका हर रात समुद्री जहाजों की सुरक्षा के लिए काम कर रहा है। उनके मुताबिक, ईरान की ओर से दागे जाने वाले ज्यादातर ड्रोन और मिसाइलों को नष्ट कर दिया जाता है। हालांकि, कुछ हमले जहाजों तक पहुंच जाते हैं। इससे जहाजों को नुकसान होता है और लोगों की जान भी जाती है।

उन्होंने खास तौर पर भारतीय नाविकों की मौत का जिक्र किया। रुबियो ने कहा कि समुद्र में बड़ी संख्या में भारतीय नाविक काम करते हैं। इसी वजह से इन हमलों में कई भारतीयों की भी जान गई है। उन्होंने ईरान से ऐसे हमले रोकने की अपील की।

क्वाड की बैठक साल के अंत से पहले

रुबियो ने उम्मीद जताई कि क्वाड देशों के नेताओं की बैठक इस साल के अंत से पहले होगी। उन्होंने बताया कि बैठक फिलीपींस की राजधानी मनीला में आसियान सम्मेलन के दौरान आयोजित करने पर सहमति बनी है। हालांकि, तारीख अभी तय नहीं हुई है।

क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। रुबियो ने बताया कि विदेश मंत्री बनने के बाद उनकी पहली बैठक क्वाड से जुड़ी थी, जिसमें जयशंकर भी शामिल थे। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच सात या आठ बार बातचीत हो चुकी है। उन्होंने अटलांटा में G20 के दौरान एक और बैठक होने की जानकारी भी दी।

रुबियो के मुताबिक, क्वाड अब सिर्फ बैठकों और समझौतों तक सीमित नहीं है। इसके तहत ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगली शिखर बैठक में भी ऐसे फैसलों और उनके नतीजों की घोषणा होनी चाहिए, जिनका वास्तविक असर दिखाई दे।

जयशंकर के साथ रिश्तों की तारीफ

रुबियो ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ अपने रिश्तों को शानदार बताया। उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री बनने के बाद उनकी पहली बैठक में जयशंकर शामिल थे। इसके बाद दोनों कम से कम 12 बार मिल चुके हैं। जयशंकर चार बार अमेरिका भी गए हैं। दोनों की मुलाकातें अंतरराष्ट्रीय बैठकों और सम्मेलनों में भी हुई हैं।

रुबियो ने कहा कि जब भी दोनों किसी बैठक या कार्यक्रम के लिए एक ही शहर में होते हैं, तो मिलने का समय जरूर निकालते हैं। उनके मुताबिक, पिछले डेढ़ साल में दोनों के बीच मजबूत कामकाजी रिश्ता बना है। इससे कई संवेदनशील और मुश्किल मुद्दों को संभालने में मदद मिली है।

जामनगर में रिलायंस से मुलाकात क्यों?

रुबियो ने अपनी जामनगर यात्रा को रिलायंस की रिफाइनिंग क्षमता और ऊर्जा सहयोग से जोड़ा। उन्होंने कहा कि रिलायंस के पास कच्चे तेल को उपयोगी उत्पादों में बदलने की असाधारण क्षमता है। उन्होंने इसे भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए अहम बताया।

रुबियो के मुताबिक, रिलायंस भारत को ऊर्जा आपूर्ति के अलग-अलग स्रोतों से जोड़ने में मदद कर सकती है। उन्होंने वेनेजुएला के तेल का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक, वेनेजुएला अपना तेल उत्पादन बढ़ा रहा है और भारत लंबे समय से इस तरह के कच्चे तेल को रिफाइन करने में सक्षम रहा है।

उन्होंने यह भी बताया कि रिलायंस ने अमेरिका में रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश किया है। रुबियो ने कहा कि जामनगर में कंपनी के कामकाज को देखने और उसके अधिकारियों से बातचीत करने का मकसद ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाशना है।

उन्होंने कहा कि खास तौर पर पश्चिमी गोलार्ध से आने वाले कच्चे तेल को रिफाइन करने में सहयोग दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो सकता है। इससे भारत को ऊर्जा आपूर्ति के नए विकल्प मिलेंगे और अमेरिका को भी लाभ होगा।

‘बस कुछ हफ्तों की बात…’, भारत से ट्रेड डील पर US विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दे दिया बहुत बड़ा संकेत

‘एक ही शहर में हों तो मिलना तय!’ एस जयशंकर संग अपनी केमिस्ट्री और Quad पर बोले मार्को रुबियो

Marco Rubio S Jaishankar Relation: भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और अमेरिका के रिश्तों को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। नेटवर्क18 के एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी को दिए एक स्पेशल इंटरव्यू में रुबियो ने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ अपने गहरे और मजबूत कामकाजी रिश्तों की तारीफ की। उन्होंने कहा कि दोनों देश QUAD के जरिए अपने रणनीतिक सहयोग को एक नए मुकाम पर ले जा रहे हैं।

‘एक ही शहर में हों तो मिलना तय’: जयशंकर संग मजबूत केमिस्ट्री

मार्को रुबियो ने खुलासा किया कि पिछले डेढ़ साल के दौरान वे और विदेश मंत्री एस. जयशंकर कम से कम 12 बार मिल चुके हैं। रुबियो के अमेरिकी विदेश मंत्री बनने के बाद उनकी पहली मुलाकात भी जयशंकर के साथ ही हुई थी।

रुबियो ने कहा, ‘जब भी हम किसी वैश्विक सम्मेलन, अंतरराष्ट्रीय बैठक या एक ही शहर में होते हैं, तो हम एक-दूसरे से मिलना कभी नहीं भूलते। हमने एक बेहद सकारात्मक और मजबूत वर्किंग रिलेशनशिप बनाई है।’

उन्होंने जोर देकर कहा कि इसी मजबूत बॉन्डिंग की बदौलत दोनों देश पिछले डेढ़ साल में कई नाजुक और संवेदनशील मुद्दों को बहुत आसानी से सुलझाने में सफल रहे हैं।

Quad सम्मेलन में होंगे ऐतिहासिक फैसले

भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की सदस्यता वाले ग्रुप Quad के भविष्य पर बात करते हुए रुबियो ने कहा कि यह संगठन अब सिर्फ बैठकों और समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर ठोस कार्रवाई की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि आगामी क्वाड लीडर्स समिट केवल एक ‘गेट-टुगेदर’ नहीं होगी। इस शिखर सम्मेलन में चारों देश ठोस और बड़े फैसलों का ऐलान करेंगे।

वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत-US के रिश्ते बेहद अहम

मार्को रुबियो ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच वैश्विक मामलों को लेकर एक जैसी सोच है। दोनों देशों के पास रक्षा, सुरक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में अपने संबंधों को और गहराई तक ले जाने के ‘असाधारण अवसर’ मौजूद हैं।

‘नाजी जर्मनी जैसा है ईरानी शासन…’, मार्को रुबियो बोले- ‘कट्टरपंथी शिया मौलवियों’ से समझौता बेहद मुश्किल

‘नाजी जर्मनी जैसा है ईरानी शासन…’, मार्को रुबियो बोले- ‘कट्टरपंथी शिया मौलवियों’ से समझौता बेहद मुश्किल

Marco Rubio On Iran: भारत आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ईरान और उसकी शीर्ष नेतृत्व प्रणाली पर जमकर निशाना साधा है। नेटवर्क18 के एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी को दिए इंटरव्यू में रुबियो ने कहा कि ईरान के साथ शांति समझौते पर पहुंचना बेहद मुश्किल है, क्योंकि देश की कमान थियोलॉजी यानी धार्मिक नीतियों से संचालित होने वाले ‘कट्टरपंथी शिया मौलवियों’ के हाथों में है।

नाजी U-Boat रणनीति से की तुलना, भारतीय नाविकों की मौतों पर जताई चिंता

मार्को रुबियो ने होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाने के लिए ईरान की कड़ी आलोचना की। उन्होंने ईरान की इन हरकतों की तुलना द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी की सबमरीन रणनीतियों से की।

रुबियो ने कहा, ‘ईरान खुलेआम कह रहा है कि वे निर्दोष नाविकों को मारने और कमर्शियल जहाजों को डुबोने की कोशिश कर रहे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ऐसा कभी नहीं देखा गया। पूरी दुनिया को एक साथ आकर इसकी कड़ी निंदा करनी चाहिए।’

उन्होंने बताया कि इन हमलों में कई भारतीय नाविकों ने भी अपनी जान गंवाई है, क्योंकि वैश्विक मर्चेंट नेवी में भारतीय नाविकों की बड़ी संख्या है। वैसे अमेरिकी नौसेना अधिकांश ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को रास्ते में ही नष्ट कर रही है।

‘कट्टरपंथी मौलवियों के हाथ में कमान’, कूटनीति पर संकट

तेहरान के साथ राजनयिक समझौते और भविष्य में सैन्य तनाव की संभावना पर रुबियो ने स्पष्ट किया कि ईरानी नेतृत्व की कट्टरपंथी सोच के कारण बातचीत आगे नहीं बढ़ पा रही है।

उन्होंने कहा, ‘ईरानी शासन के साथ डील करना बहुत कठिन है। दुर्भाग्य से वे समझौता करना नहीं जानते और वे कट्टरपंथी शिया मौलवियों द्वारा नियंत्रित हैं।’ रुबियो ने स्पष्ट किया कि उनका हमला सामान्य शिया समुदाय पर नहीं, बल्कि शासन चला रहे कट्टरपंथियों पर है।

अमेरिका की ‘इकोनॉमिक एस्फिक्सिया’ नीति जारी रहेगी

अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि वाशिंगटन तेहरान पर असाधारण आर्थिक दबाव बनाना जारी रखेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान अपने नागरिकों की भलाई के बजाय मिलने वाले हर डॉलर का उपयोग आतंकवाद को स्पॉन्सर करने, मिसाइलें और ड्रोन बनाने में करता है।

इससे पहले अगस्त में अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने ईरान के खिलाफ ‘इकोनॉमिक एस्फिक्सिया’ यानी आर्थिक तौर पर पंगु बनाने की रणनीति का ऐलान किया था, जिसके तहत डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, गोल्ड, एविएशन और शिपिंग सेक्टर्स पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए हैं।

‘बस कुछ हफ्तों की बात…’, भारत से ट्रेड डील पर US विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दे दिया बहुत बड़ा संकेत

‘बस कुछ हफ्तों की बात…’, भारत से ट्रेड डील पर US विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दे दिया बहुत बड़ा संकेत

Marco Rubio On Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर एक बेहद सकारात्मक और बड़ी खबर आई है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील अब अपने अंतिम चरण में है और कुछ ही हफ्तों के भीतर इस पर औपचारिक मुहर लग सकती है। आपको बता दें कि मार्को रुबियो भारत की दो दिवसीय यात्रा पर आए हुए हैं।

‘महीनों नहीं, हफ्तों की बात’

नेटवर्क18 ग्रुप के एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी को दिए इंटरव्यू में मार्को रुबियो ने बताया कि दोनों देश समझौते के बेहद करीब हैं और अब केवल तकनीकी और कानूनी बारीकियों को सुलझाया जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘तकनीकी विवरण बहुत मायने रखते हैं क्योंकि भाषा का अर्थ दोनों पक्षों के लिए एक जैसा होना चाहिए। इसलिए अब बातचीत इसी स्तर पर टिकी है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन को उम्मीद है कि यह समझौता महीनों नहीं, बल्कि ‘कुछ हफ्तों के भीतर’ सामने आ जाएगा’।

क्या भारत को मिलेंगे बेहतर टैरिफ रेट्स?

जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत को अन्य देशों की तुलना में अधिक अनुकूल टैरिफ दरें मिलेंगी, तो रुबियो ने कहा कि किसी भी व्यापारिक सौदे का मुख्य उद्देश्य ही वर्तमान दरों में सुधार करना होता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह समझौता ऐसा होना चाहिए जो दीर्घकालिक रूप से दोनों देशों के आर्थिक हितों को पूरा करे।

रुबियो ने स्वीकार किया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा। उन्होंने कहा, ‘जब आप मित्र और सहयोगी होते हैं, तो यही बात आपको मतभेदों को मिटाने और पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौता करने की अनुमति देती है।’

केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल के बयान से भी मिले थे संकेत

मार्को रुबियो की यह टिप्पणी भारतीय अधिकारियों के बयानों के बिल्कुल अनुकूल है। हाल ही में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि द्विपक्षीय व्यापार समझौते की पहली किश्त को अंतिम रूप दे दिया गया है और यह कानूनी मसौदे के चरण में है। भारत समकक्ष अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में प्रतिस्पर्धी लाभ हासिल करते ही इस सौदे को लागू करेगा।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर जल्द लगेगी मुहर? मार्को रुबियो ने दिए बड़े संकेत

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो मंगलवार को तीन दिवसीय भारत दौरे पर मुंबई पहुंचे हैं। इस दौरे के दौरान भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा होने की उम्मीद है। अमेरिका के विदेश मंत्री रुबियो ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ होने वाली बैठक से पहले दोनों देशों के बीच सहयोग और आगे की योजनाओं को लेकर अपनी बात रखी। उनके इस दौरे को भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। मुंबई में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मार्को रुबियो ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी बात रखी।

उन्होंने यूक्रेन युद्ध, अमेरिका के हथियार नियंत्रण से जुड़े मामलों और रूस से तेल खरीदने को लेकर जारी चर्चाओं जैसे विषयों पर चर्चा की। इन मुद्दों को लेकर भारत और अमेरिका के बीच होने वाली बातचीत पर भी सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

पॉजिटिव नतीजे देखने को मिलेगा

लंबे समय से चर्चा में चल रहे भारत-अमेरिका द्विपक्षीय समझौते की स्थिति पर बात करते हुए मार्को रुबियो ने साफ किया कि अमेरिकी विदेश विभाग सीधे तौर पर व्यापार समझौते पर बातचीत नहीं करता है। उन्होंने कहा, “​​ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत की जिम्मेदारी विदेश विभाग की नहीं है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हमारी अहम भूमिका है। मैं और मेरे काउंटरपार्ट, नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर इस समझौते को लेकर काफी गंभीर हैं। हम इसे पूरा करने के बेहद करीब हैं। मेरा मानना है कि समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अब केवल कुछ मुद्दों पर काम करना बाकी है, इसलिए इसके जल्द पूरा होने की उम्मीद है।”

उन्होंने आगे कहा कि, “हम चाहते हैं कि जल्द ही इस बारे में अच्छी खबर सामने आए और इसके बाद समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएं। हमें पूरा भरोसा है कि आने वाले समय में इस दिशा में पॉजिटिव नतीजे देखने को मिलेंगे।”

रिलायंस के साथ होगी बैठक

इसके अलावा, उन्होंने बताया कि अमेरिकी डेलीगेशन वेनेजुएला में तेल उत्पादन को लेकर रिलायंस के साथ बैठक करेगा। उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी पेट्रोलियम खरीद के स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में काफी प्रगति की है, जिसे उन्होंने एक समझदारी भरा कदम बताया।

ग्लोबल एनर्जी जरूरतों को पूरा करने में भारत की भूमिका पर बात करते हुए मार्को रुबियो ने कहा कि, “भारत तेल रिफाइनिंग के मामले में काफी मजबूत है। उन्होंने बताया कि भारत के पास भारी कच्चे तेल को साफ करने और उससे उपयोगी ईंधन बनाने की क्षमता है और वह पहले भी ऐसा कर चुका है।” रुबियो के मुताबिक, “वेनेजुएला से तेल की आपूर्ति बढ़ने पर भारत इसका इस्तेमाल कर सकता है। उन्होंने ये भी कहा कि भारत के पास वेनेजुएला में पहले से ही तेल उत्पादन से जुड़े अधिकार हैं, जिनकी मदद से वह वहां अपना तेल उत्पादन बढ़ा सकता है।”

मार्को रुबियो ने तेल को लेकर क्या कहा

उन्होंने आगे कहा, “ये सभी सकारात्मक बातें हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि दुनिया भर में चल रही घटनाओं के कारण तेल की आपूर्ति में जो कमी आ सकती है, उसे केवल वेनेजुएला ही पूरा कर सकता है। लेकिन मेरा मानना है कि लंबे समय में वेनेजुएला इसमें अहम योगदान दे सकता है और कम समय में भी कुछ राहत पहुंचा सकता है। यह उन मुद्दों में से एक है, जिन पर हम चर्चा करेंगे। भारत के साथ इस विषय पर पहले भी बातचीत हो चुकी है और वह इसके लिए तैयार नजर आ रहा है। भारत इस दिशा में आगे बढ़ने को इच्छुक है, हालांकि पाबंदियों से जुड़ी कुछ बाधाएं सामने आ सकती हैं, जिनका हमें समाधान निकालना होगा।”

दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत बनाना

अपने भारत दौरे के महत्व पर बात करते हुए मार्को रुबियो ने कहा कि, “भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस साल चार बार अमेरिका का दौरा कर चुके हैं।” उन्होंने भारत को दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश और सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए कहा कि, अमेरिका के लिए भारत एक अहम व्यापारिक और कारोबारी साझेदार है। रुबियो ने दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग और क्वाड में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका का भी जिक्र किया। उन्होंने भारत को अमेरिका का मजबूत रणनीतिक साझेदार बताया और कहा कि दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए अमेरिकी अधिकारियों को भारत के अधिक दौरे करने चाहिए।

यूक्रेन को लेकर क्या कहा

इसके अलावा, मार्को रुबियो ने यूक्रेन युद्ध और अमेरिका के हथियार नियंत्रण से जुड़े अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपनी बात रखी। उन खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए, जिनमें कहा गया था कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी रक्षा प्रणाली इस्तेमाल करने वाले सहयोगी देशों को यूक्रेन के लिए पैट्रियट मिसाइलें भेजने की मंजूरी रोक दी थी, रुबियो ने कहा कि यूक्रेन को जानबूझकर किसी भी तरह की मदद से वंचित नहीं किया जा रहा था। उन्होंने यह भी बताया कि ट्रंप उन आरोपों से नाराज थे, जिनमें कहा जा रहा था कि उनके फैसलों से यूक्रेन की स्थिति कमजोर हो रही है।

इसके अलावा, मार्को रुबियो ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अगर चीन, रूस और अमेरिका के बीच हथियारों पर नियंत्रण को लेकर सहमति बनती है, तो यह पूरी दुनिया के लिए एक सकारात्मक कदम होगा। उन्होंने संकेत दिया कि इन तीनों देशों के बीच इस मुद्दे पर बातचीत आगे बढ़ने से वैश्विक सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

रुबियो ने मोदी-पेजेशकियन की मुलाकात में ट्रेड डील से किया इनकार, देशों को ईरान पर प्रतिबंधों को लेकर चेताया

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बुधवार को कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान किसी ट्रेड डील पर बातचीत कर रहे हैं। साथ ही, उन्होंने दूसरे देशों को चेतावनी दी कि वे तेहरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद न करें।

रुबियो ने फॉक्स न्यूज रेडियो के ‘द ब्रायन किल्मीड शो’ में एक इंटरव्यू के दौरान ये बातें कहीं। उनसे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) समिट के दौरान बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की मुलाकात के बारे में पूछा गया था।

रूबियो ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच कोई ट्रेड डील हुई है। जाहिर है, हर देश अपनी विदेश नीति बनाता है और दुनिया भर के कई देश ईरान की सरकार से बातचीत करते हैं।”

इस बात पर प्रतिक्रिया देते हुए कि पीएम मोदी और पेजेशकियन के बीच ट्रेड डील होने की संभावना दिख रही है, रूबियो ने आगे कहा: “मेरा मतलब है कि हमने भी ईरान की सरकार के कुछ लोगों से मुलाकात की है, क्योंकि कुछ बातचीत हुई है और उनसे संपर्क भी रहा है।”

रूबियो ने US प्रतिबंधों को लेकर चेतावनी दी

रूबियो ने कहा कि US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वॉशिंगटन का रुख साफ कर दिया है: देशों को ईरान की मदद नहीं करनी चाहिए कि वह US प्रतिबंधों से बच सके।

रूबियो ने कहा, “किसी भी देश को ऐसे तरीके बनाने में उनकी मदद नहीं करनी चाहिए जिनसे वे कमाई कर सकें और उस पैसे का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने और परमाणु हथियार बनाने की कोशिश में कर सकें।”

उन्होंने आगे कहा, “और अगर देश ऐसा करने का फैसला करते हैं, तो हमें उन पर भी प्रतिबंध लगाने होंगे।”

रुबियो का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत ईरान के साथ अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंध बनाए हुए है, और साथ ही पश्चिम एशिया में चल रहे व्यापक युद्ध के बीच अमेरिका के साथ भी बातचीत कर रहा है।

मोदी-पेजेशकियन की मुलाकात में क्या हुआ?

फरवरी में ईरान-अमेरिका के बीच तनाव शुरू होने के बाद, प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को बिश्केक में पेजेशकियन से अपनी पहली द्विपक्षीय बातचीत की।

बैठक के दौरान, मोदी ने कहा कि भारत ईरान के साथ अपने व्यापार के दायरे को “बढ़ाना और उसमें विविधता लाना” चाहता है। साथ ही, उन्होंने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति के प्रयासों के लिए नई दिल्ली के समर्थन को भी दोहराया।

दोनों नेताओं ने इस टकराव और आम नागरिकों, नागरिक बुनियादी ढांचे और नेविगेशन की आजादी की सुरक्षा की जरूरत पर भी चर्चा की।

पेजेशकियान ने पीएम मोदी से आग्रह किया कि वे बातचीत को बढ़ावा देने और लड़ाई खत्म करने में मदद के लिए, संघर्ष में शामिल देशों के साथ भारत के व्यापक संपर्कों का इस्तेमाल करें।

भारत ने ईरान और अन्य संबंधित पक्षों के साथ चाबहार बंदरगाह के भविष्य पर भी बातचीत जारी रखी है। यह दोनों देशों के बीच एक अहम कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट है, जिस पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण अनिश्चितता बनी हुई है।

नई दिल्ली का मानना ​​है कि इस क्षेत्र में विवादों को बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाया जाना चाहिए, साथ ही उसे अपने व्यापार, कनेक्टिविटी और व्यापक रणनीतिक हितों की भी रक्षा करनी चाहिए।

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अमेरिका ने की वेनेजुएला से तेल के लिए दुनिया की सबसे बड़ी डील, अब सस्ता होगा पेट्रोल!

अमेरिका ने वेनेजुएला के साथ एक ऐसा सौदा किया है, जिसके तहत इसे 6500 करोड़ बैरल से अधिक के प्रूवेन यानी मिल चुके तेल भंडार पर मेजॉरिटी कंट्रोल मिलेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार तड़के यह दावा किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इस सौदे के बारे में ऐलान किया। ट्रंप ने दुनिया के इतिहास में इसे अब तक की सबसे बड़ी ऑयल डील कहा है और कहा कि इससे अमेरिका का तेल भंडार दोगुना से अधिक हो जाएगा। हालांकि उन्होंने समझौते की वित्तीय शर्तों का खुलासा नहीं किया और यह भी स्पष्ट नहीं किया कि इसके बदले वेनेजुएला को क्या मिलेगा। उन्होंने कहा कि यह सौदा अमेरिका और वेनेजुएला के बीच पहले से मजबूत होते संबंधों को और मजबूत करेगा।

दावा: अमेरिका और वेनेजुएला, दोनों के लिए फायदे का सौदा

ट्रंप के अनुसार अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज के साथ मिलकर निजी कंपनियों की साझेदारी के जरिए इस सौदे पर बातचीत की। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस समझौते को अमेरिकी और वेनेजुएला के लोगों के लिए बहुत बड़ी जीत बताया। ट्रंप कीके ऐलान के तुरंत बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व नाम Twitter) पर उन्होंने कहा कि इस समझौते से अमेरिका को स्थिर और कम लागत वाला तेल मिलेगा, तो वेनेजुएला में लगभग $10 हजार करोड़ के निजी निवेश, हजारों अच्छी सैलरी वाली नौकरियां और देश की अर्थव्यवस्था को फिर से ट्रैक पर लाने में मदद मिल सकती है।

वेनेजुएला में बढ़ रहा अमेरिका का दखल!

दोनों देशों के बीच यह समझौता वेनेजुएला में महीनों तक चली अमेरिका की गहरी दखलंदाजी के बाद हुआ है जोकि जनवरी में लंबे समय से राष्ट्रपति रहे निकोलस मादुरो को हटाए जाने और उनके पकड़े जाने के बाद शुरू हुई थी। मादुरो के उपराष्ट्रपति रहे रोड्रिगेज ने फिर अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर कमान संभाली और अमेरिका ने उनकी सरकार के साथ बेहतर साझेदारी की उम्मीद की। वेनेजुएला में दुनिया का सबसे बड़ा प्रूवेन तेल भंडार है, जिसका अनुमान लगभग 30 हजार करोड़ बैरल है।

एक्सियोस ने गुरुवार को दो अमेरिकी अधिकारियों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तेल के ऐसे 12 प्रोडक्टिव ऑयल फील्ड्स के बारे में बातचीत चल रही थी, जिनमें लगभग 9000 करोड़ बैरल का पक्का भंडार है। रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियां मालिकाना हक के बदले इन जगहों को डेवलर करेंगी, तो वेनेजुएला को तेल से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा मिलेगा। वेनेजुएला में अभी हर दिन लगभग 12.5 लाख बैरल कच्चा तेल निकलता है।

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गाजा पर अब किसका होगा शासन? जानिए हमास के हथियार छोड़ने की सहमति के बाद अब क्या बदलेगा

Hamas agrees to phased disarmament in Gaza: गाजा में जारी संघर्ष के बीच एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। फिलिस्तीनी संगठन हमास ने एक रोडमैप पर सहमति जताई है। इसके तहत वह अपने हथियार डालेगा और गाजा का प्रशासनिक नियंत्रण एक फिलिस्तीनी नागरिक समिति को सौंपेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिस्र, कतर और तुर्की के मध्यस्थों के साथ काहिरा में हमास नेताओं की बातचीत के बाद इस कथित ऐतिहासिक समझौते का ऐलान किया है। हालांकि इस रोडमैप के सामने आते ही कई सवाल भी खड़े हुए हैं। सवाल ये उठ रहा है कि अब गाजा पर वास्तविक अधिकार किसका होगा, हथियारों और सुरक्षा पर किसका नियंत्रण रहेगा और गाजा में हुए विध्वंश के बाद इसके पुनर्निर्माण का खर्चा कौन उठाएगी।

इस समझौते में कई शर्तें, पेच और अनसुलझे मुद्दे मौजूद हैं। आइए इसको समझने की कोशिश करते हैं –

1- गाजा का प्रशासन कौन देखेगा?

प्रस्तावित रोडमैप के तहत गाजा के रोजमर्रा के सिविल एडमिनिस्ट्रेशन को संभालने की जिम्मेदारी नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा को दी जाएगी। यह फिलिस्तीनी टेक्नोक्रेट्स की एक गैर-राजनीतिक समिति होगी। इस समिति में हमास की कोई हिस्सेदारी या भागीदारी नहीं होगी। यह समिति सरकारी सेवाओं, कर्मचारियों के प्रबंधन, वित्त और दूसरे प्रशासनिक काम स्वतंत्रता पूर्वक देखेगी।

2- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगरानी और पुनर्निर्माण कौन देखेगा?

गाजा के प्रशासनिक कामकाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर की निगरानी और सुरक्षा से अलग रखा गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता वाला गाजा बोर्ड ऑफ पीस रणनीति, स्थिरता और पुनर्निर्माण की फंडिंग की निगरानी करेगा। ट्रंप के पास इसके चार्टर के तहत व्यापक कार्यकारी अधिकार हैं। इसके फाउंडिंग एग्जीक्यूटिव बोर्ड में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर शामिल हैं। अल जजीरा के मुताबिक एक अलग गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड का भी प्रस्ताव है। ये पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को डायरेक्शन देने और क्षेत्रीय कूटनीतिज्ञों के साथ तालमेल बिठाने का काम करेगा।

3- गाजा में सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी?

जैसे-जैसे हमास हथियार छोड़ने के मामले को आगे बढ़ाएगा और अपने कंट्रोल वाले इलाकों को खाली करेगी, वैसे ही सुरक्षा व्यवस्था दो स्तरों पर संभाली जाएगी। हमास द्वारा खाली किए गए इलाकों की कमान एक नई फिलिस्तीनी पुलिस फोर्स संभालेगी। इस ट्रांजिशन के दौरान सुरक्षा में सहयोग के लिए एक बहुराष्ट्रीय इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स तैनात की जाएगी। इजरायल ने गाजा में बहुराष्ट्रीय बल को प्रवेश देने के लिए कानूनी ढांचे को मंजूरी दे दी है। रॉयटर्स को एक इजरायली अधिकारी ने बताया कि शुरुआती मिशन में युगांडा और मोरक्को जैसे देशों के लगभग 200 कर्मी शामिल होंगे। हर देश की टुकड़ी के लिए अलग से इजरायली मंजूरी की जरूरत होगी। ये टुकड़ियां कब तैनात की जाएंगी, इसकी कोई तारीख अभी तय नहीं है।

4- हमास के हथियारों और सुरंगों का क्या होगा?

हथियारों को लेकर रोडमैप और जमीनी दावों में अंतर देखने को मिल रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक इस रोडमैप गाजा में हमास और अन्य सभी सशस्त्र समूहों को पूरी तरह से हथियार छोड़ना होगा। रॉयटर्स को हमास के एक सूत्र ने बताया कि मसौदे के अनुसार हमास के भारी हथियारों को जमा कर फिलिस्तीनी प्रशासन के नियंत्रण में रखा जाएगा और इन हथियारों को इजरायल को नहीं सौंपा जा सकता। बातचीत में शामिल एक राजनयिक ने रॉयटर्स को बताया कि योजना में सुरंगों, हथियारों के जखीरे और हथियार निर्माण सुविधाओं को नष्ट करने का भी आह्वान किया गया है ताकि प्रक्रिया के अंत में गाजा में कोई उग्रवादी ढांचा न बचे।

5- क्या इजरायल ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया है?

इजरायल ने अभी तक घोषित शर्तों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है। ट्रंप के ऐलान से पहले एक इजरायली अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि इजरायल ने 15-सूत्रीय प्रस्ताव को खारिज कर दिया था क्योंकि यह पूर्ण निरस्त्रीकरण और विसैन्यीकरण की उसकी मांग का संतोषजनक जवाब नहीं देता था। एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक इजरायल को अभी भी इस बात का पूरा यकीन नहीं है कि हमास हथियार डाल ही देगा। गाजा के बड़े हिस्से पर इजरायली सेना का नियंत्रण है। रोडमैप इजरायल की चरणबद्ध वापसी को भी हमास के हथियार डालने के साथ जोड़ा तो गया है लेकिन अंतिम वापसी की कोई समय-सीमा सार्वजनिक नहीं की गई है। हमास के एक सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि यह दस्तावेज फिलहाल एक ड्राफ्ट एग्रीमेंट है। इससे यह साफ होता है कि अंतिम सहमति बनने से पहले कई पेचीदा मुद्दों को सुलझाना बाकी है।

‘जहाज पर हमला किया तो पुल या पावर प्लांट उड़ा देंगे’, ईरान को ट्रंप की कड़ी चेतावनी

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को धमकी दी कि अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में किसी जहाज पर हमला करता है, तो अमेरिका हर बार ईरान के किसी पुल या पावर प्लांट को निशाना बनाएगा। इसमें राजधानी तेहरान में मौजूद ठिकाने भी शामिल हो सकते हैं।

ट्रंप ने यह धमकी अपने ‘ट्रुथ सोशल’ पोस्ट के जरिए दी। इससे अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ गया है, जो पहले से ही संघर्ष विराम टूटने और हाल ही में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद बढ़ा हुआ था। बता दें कि ट्रंप को बुधवार को ही इन सैनिकों के शव मिलने वाले थे।

ट्रंप ने अपनी पोस्ट में लिखा था, “अब से, जब भी ईरान ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में किसी जहाज पर मिसाइल, रॉकेट, ड्रोन या किसी अन्य हथियार से हमला करेगा, तो अमेरिका उसके एक पुल या पावर प्लांट पर बम गिराकर उसे नष्ट कर देगा।”

ट्रंप ने साफ तौर पर कहा कि इन लक्ष्यों में “तेहरान शहर के पास या उसके अंदर मौजूद ठिकाने” भी शामिल हैं।

गौरतलब है कि ट्रंप पहले भी ईरान के बिजली संयंत्रों, पानी की सुविधाओं और दूसरे बुनियादी ढांचों पर हमला करने की धमकी दे चुके हैं। जानकारों ने चेतावनी दी है कि ऐसे हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत युद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं।

इससे पहले बुधवार को, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो ने ईरान पर आरोप लगाया कि वह अमेरिका के साथ समझौता करने को लेकर “गंभीर” नहीं है, साथ ही उन्होंने दोहराया कि वॉशिंगटन मध्य पूर्व में “कूटनीति के लिए प्रतिबद्ध” है।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने लगातार 11वीं रात ईरानी ठिकानों पर हमले किए हैं। अमेरिका का कहना है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से सुरक्षित और खुला करने की कोशिश कर रहा है। यह रास्ता वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और युद्ध के दौरान ईरान के लिए दबाव बनाने का एक बड़ा साधन बन गया है।

CENTCOM ने बताया कि उसने मिलिट्री ऑपरेशन सेंटर, ड्रोन स्टोर करने की जगहों और मिलिट्री लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले किए।

फिलीपींस में आसियान (ASEAN) विदेश मंत्रियों की बैठक में बोलते हुए, रुबियो ने कहा कि तेहरान और वॉशिंगटन के बीच एक मुख्य विवाद यह है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में ट्रैफिक को नियंत्रित करने का “अधिकार मांगता है”, जबकि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उसे यह अधिकार नहीं है।

रुबियो ने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर हम मध्य पूर्व में एक ऐसी मिसाल कायम करते हैं, जहां कोई राष्ट्र किसी अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर नियंत्रण करने, शुल्क वसूलने और भुगतान न करने पर आपके जहाजों को उड़ाने का फैसला कर सकता है, तो हमने एक बहुत ही खतरनाक मिसाल कायम कर दी है, जो दुनिया के अन्य हिस्सों में, इस क्षेत्र सहित, दोहराई जाएगी।”

रुबियो ने अप्रत्यक्ष रूप से चीन की ओर इशारा करते हुए कहा कि “दुनिया के सभी क्षेत्रों में से, यह वह क्षेत्र है जहां मुझे अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में नौवहन की स्वतंत्रता के महत्व के बारे में सिखाने की आवश्यकता नहीं है।”

बाद में दिन में दिए गए अलग-अलग बयानों में, रुबियो ने कहा कि वाशिंगटन युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत करने को तैयार है।

उन्होंने कहा, “अमेरिका कूटनीतिक समझौते तक पहुंचना चाहता है। अगर ईरान के साथ ऐसा कोई समझौता संभव हो, जिसमें वह कहे कि हम अब आतंकवाद को समर्थन नहीं देंगे और परमाणु हथियार या उसे बनाने के लिए जरूरी चीजों को आगे नहीं बढ़ाएंगे, तो अमेरिका इसके लिए तैयार है।”

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि “फिलहाल वे डील करने को लेकर गंभीर नहीं लगते।” उन्होंने आगे कहा कि तेहरान ने पिछले महीने हुए समझौते (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) में कुछ वादे किए थे, “और दो हफ्ते के अंदर ही उन्हें तोड़ दिया।”

अमेरिकी नौसेना ने पहले भी साउथ चाइना सी में विवादित द्वीपों के आस-पास “फ्रीडम ऑफ नेविगेशन” (आजादी से आवाजाही) ऑपरेशन चलाए हैं। इन द्वीपों पर चीन के साथ-साथ कई दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के भी दावे हैं, जबकि चीन अपनी “नाइन-डैश लाइन” के जरिए लगभग पूरे समुद्र पर अपना अधिकार बताता है।

यह सब ‘परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ के 2016 के उस फैसले के बावजूद हो रहा है, जिसमें कहा गया था कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत चीन के दावों का कोई आधार नहीं है। हालांकि, चीन ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया है।

तेल की कीमतों में उछाल

बुधवार सुबह कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स (सितंबर डिलीवरी) 3.7% बढ़कर 94.33 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) फ्यूचर्स (सितंबर डिलीवरी) में 3.5% की तेजी आई और यह 87.28 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।

बता दें कि अमेरिका और ईरान ने 17 जून को एक अंतरिम समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें सैन्य अभियानों को रोकने, होर्मुज को फिर से खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी शर्तों सहित एक स्थायी समझौते पर बातचीत के लिए 60 दिन का समय तय करने की बात कही गई थी। लेकिन इस दस्तावेज में होर्मुज के भविष्य के प्रबंधन का मुद्दा अनसुलझा ही रह गया।

ईरान ने इस बात का मतलब यह भी निकाला कि होर्मुज (स्ट्रेट) से गुजरने वाले ट्रैफिक को मैनेज करने में तेहरान की भूमिका है और शुरुआती 60 दिनों के बाद समुद्री सेवाओं के लिए शुल्क भी लिया जा सकता है, लेकिन अमेरिका का कहना था कि यह जलमार्ग बिना किसी अनिवार्य ईरानी शुल्क या प्रतिबंध के खुला रहना चाहिए।

ईरान और ओमान – जिनकी सीमाएं भी होर्मुज जलडमरूमध्य से लगती हैं – ने 23 जून को एक संयुक्त बयान में कहा कि “होर्मुज से जुड़ी सभी व्यवस्थाओं में जलडमरूमध्य के दोनों तटीय देशों की संप्रभुता और संप्रभु अधिकारों का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए।”

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