500 रुपये से शुरू किया मशरूम बिजनेस, आज 3 लाख रुपये महीने का टर्नओवर, जानें युवक की सफलता की कहानी

बहुत से लोग अपना बिजनेस शुरू करना चाहते हैं, लेकिन पैसों की कमी की वजह से ऐसा नहीं कर पाते। आमतौर पर बिजनेस शुरू करने के लिए ज्यादा निवेश की जरूरत होती है। लेकिन कुछ ऐसे कारोबार भी होते हैं जिन्हें बहुत कम निवेश से शुरू किया जा सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी की एक शख्स ने 500 रुपये से भी कम खर्च में कारोबार शुरू किया और आज अच्छी कमाई कर रहा है। ये कहानी कर्नाटक के रहने वाले महेश हनुमंत कोलूर की है। महेश ने बेहद कम निवेश के साथ मशरूम की खेती शुरू कर एक सफल कारोबार खड़ा कर दिया।

कृषि में डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने 2021 में अपने घर के एक छोटे से कमरे से इस काम की शुरुआत की। शुरुआत में ये सिर्फ एक छोटा प्रयास था, लेकिन लगातार सीखने और मेहनत के दम पर उन्होंने इसे बड़े बिजनेस में बदल दिया। आज उनका मशरूम कारोबार हर महीने करीब 3 लाख रुपये का टर्नओवर करता है।

कैसे शुरू की खेती

महेश ने अपने घर के 10×10 फीट के एक छोटे कमरे से मशरूम की खेती शुरू की। उन्होंने 65 रुपये में एक किलो ऑयस्टर मशरूम स्पॉन खरीदा और उससे 30 मशरूम बैग तैयार किए। महेश ने बताया, “गेहूं का भूसा, स्पॉन और पॉलीबैग मिलाकर मेरा कुल खर्च 500 रुपये से भी कम था। शुरुआत में अनुभव की कमी के कारण 10 बैग खराब हो गए, लेकिन बाकी बैगों से करीब 500 से 600 ग्राम मशरूम प्रति बैग मिला। इस तरह मुझे कुल लगभग 10 किलो मशरूम की पैदावार हुई।” महेश की पहली फसल स्थानीय बाजार में 180 से 220 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकी, जिससे करीब दो महीने में उन्हें लगभग 2,000 रुपये की कमाई हुई।

300 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा मशरूम

उन्होंने कहा, “इस पहली कमाई ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया और आगे काम करने की हिम्मत दी।” इसके बाद उन्होंने मुनाफे की रकम खर्च करने के बजाय कारोबार में दोबारा निवेश किया। अगले चरण में उन्होंने 200 मशरूम बैग तैयार किए और साफ-सफाई, नमी और तापमान को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने पर ध्यान दिया। महेश ने बताया, “करीब तीन महीने बाद मैंने लगभग 250 किलो मशरूम की पैदावार ली, जिसे स्थानीय बाजार में औसतन 300 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा। मशरूम की खेती मैंने ज्यादातर ट्रायल एंड एरर के जरिए सीखी।”

शुरुआत में आई परेशानियों से महेश ने हार नहीं मानी, बल्कि हर गलती से सीख लेकर अपनी खेती के तरीके बेहतर किए। हर नई फसल के साथ उनका अनुभव बढ़ता गया और इसी भरोसे के दम पर उन्होंने अपने कारोबार का विस्तार किया। साल 2022 में उन्होंने ऑयस्टर मशरूम के साथ मिल्की मशरूम की खेती भी शुरू की। उन्होंने ऐसी किस्मों को चुना जो स्थानीय मौसम के अनुकूल थीं और जिन्हें कम लागत में आसानी से उगाया जा सकता था। महेश के मुताबिक, बटन मशरूम की तुलना में ऑयस्टर और मिल्की मशरूम की बाजार में अच्छी मांग रहती है, इसलिए इनसे बेहतर कीमत मिलने की संभावना भी अधिक होती है।

बनाए मशरूम कुकीज

ताजे मशरूम जल्दी खराब होने से महेश को नुकसान का डर रहता था। इसका समाधान निकालते हुए उन्होंने मशरूम से लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाले वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स बनाना शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने ऑर्गेनिक ऑयस्टर मशरूम, रागी और गुड़ से बनी मशरूम कुकीज तैयार कीं। महेश ने बताया, “शुरुआत में मैंने ये मशरूम कुकीज अपने दोस्तों और परिवार के लोगों को चखने के लिए दी थीं। सभी को उनका स्वाद काफी पसंद आया। इसके बाद मैंने इन्हें लैब में टेस्ट कराया। रिपोर्ट में पता चला कि इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम है, जिससे ये हेल्थ का ध्यान रखने वाले लोगों और डायबिटीज़ के मरीजों के लिए भी अच्छा विकल्प बन सकती हैं।”

बढ़ाई मशरूम की खेती

मशरूम कुकीज को अच्छा रिस्पॉन्स मिलने के बाद महेश ने अपने उत्पाद दूसरे शहरों में भी बेचना शुरू किया। वह हर सप्ताहांत बेंगलुरु के ऑर्गेनिक किसान बाजारों में जाते थे, जहां ग्राहकों से मिले फीडबैक के आधार पर उन्होंने अपने प्रोडक्ट्स को और बेहतर बनाया। जैसे-जैसे महेश के कारोबार का विस्तार हुआ, उनके घर का छोटा सेटअप पर्याप्त नहीं रहा। बढ़ती मांग को देखते हुए उन्होंने 2023 में 30×20 फीट की एक नई मशरूम उत्पादन यूनिट शुरू की। इस यूनिट में एक समय में अलग-अलग चरणों में करीब 1,000 मशरूम बैग तैयार किए जा सकते हैं। आज उनकी यह यूनिट रोजाना लगभग 50 किलो ऑयस्टर और मिल्की मशरूम का उत्पादन कर रही है।

महेश ने कहा, “ताजे मशरूम ज्यादा दिनों तक सुरक्षित नहीं रहते और उनकी बाजार कीमत भी सीमित होती है। इसलिए हम रोज़ाना करीब 45 किलो मशरूम से वैल्यू-एडेड उत्पाद तैयार करते हैं। हमारा लक्ष्य सिर्फ मशरूम बेचना नहीं, बल्कि लोगों तक हेल्दी और ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्ट्स पहुंचाने वाला एक मजबूत ब्रांड बनाना है।”

मशरूम पाउडर बनाया

महेश ने बताया कि उनकी यूनिट में हर दिन करीब 45 किलो मशरूम से कुकीज, चकली, अचार, मशरूम पाउडर और सूखे मशरूम जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। उन्होंने कहा, “सूखे मशरूम की बिरयानी और सूप बनाने में अच्छी मांग है, जबकि हेल्थ का ध्यान रखने वाले ग्राहकों के बीच मशरूम पाउडर तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।” उन्होंने बताया कि ताजे मशरूम करीब 400 रुपये प्रति किलो बिकते हैं, जबकि प्रोसेस्ड प्रोडक्ट्स से अधिक कमाई होती है। 200 ग्राम मशरूम अचार की कीमत 150 रुपये और 200 ग्राम मशरूम पाउडर की कीमत 500 रुपये रखी गई है।

महेश के अनुसार, मशरूम की प्रोसेसिंग शुरू करने के बाद उनके कारोबार में बड़ा बदलाव आया। उन्होंने कहा, “इससे सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अगर ताजे मशरूम तुरंत नहीं बिकते, तो वे खराब नहीं होते। दूसरी बात, कई लोग सीधे मशरूम खाना पसंद नहीं करते, लेकिन मशरूम से बनी कुकीज, सूप और स्नैक्स आसानी से खा लेते हैं। वहीं प्रोसेस्ड प्रोडक्ट्स की कीमत भी ताजे मशरूम के मुकाबले कई गुना अधिक मिलती है।”

महेश ने अब अपने मशरूम कारोबार को सिर्फ थोक खरीदारों तक सीमित नहीं रखा है। वह अपने उत्पाद किसान बाजारों, स्थानीय किराना दुकानों, चाय की दुकानों और होटलों तक भी पहुंचा रहे हैं। फिलहाल वह हुबली की एक लैब से मशरूम स्पॉन मंगवाते हैं और आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके साथ ही वह मशरूम की खेती शुरू करने के इच्छुक लोगों को प्रशिक्षण भी देते हैं और अपने अनुभव के आधार पर कारोबार से जुड़ी जरूरी और व्यावहारिक जानकारी साझा करते हैं।

फ्रांस में कृषि कानून का विरोध, पर्यावरण मंत्री का इस्तीफा:कीटनाशकों के इस्तेमाल की मंजूरी से मंत्री नाराज, बोलीं- यह मधुमक्खियों के लिए नुकसानहेद

फ्रांस की पर्यावरण मंत्री मोनिक बारबू ने इस्तीफा देने का ऐलान किया है। उन्होंने यह फैसला उन्होंने विवादित कृषि बिल के विरोध में लिया है, जिसमें दो प्रतिबंधित कीटनाशकों के इस्तेमाल की मंजूरी दी गई है। एसोसिएटेड प्रेस (AP) के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि ये कीटनाशक मधुमक्खियों और दूसरे परागण करने वाले कीड़ों के लिए नुकसानदायक हैं। पर्यावरण मंत्री बनीं बारबू आज राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को अपना इस्तीफा सौंपेंगी। फ्रांस की संसद ने मंगलवार को यह बिल पारित किया था। सरकार ने दावा किया कि वह ये कानून किसानों की मदद के लिए लाया जा रहा है। उसका कहना है कि किसानों को घटती कमाई और खेती की बढ़ती लागत जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। बिल के दो प्रावधानों से सबसे ज्यादा विवाद 1. प्रतिबंधित कीटनाशकों एसेटामिप्रिड और फ्लुपाइराडीफ्यूरोन के इस्तेमाल की अस्थायी मंजूरी देना। इसका इस्तेमाल चुकंदर, सेब और चेरी की खेती में किया जा सकेगा। 2. अगले 10 वर्षों में किसानों के लिए पानी के भंडारण (वॉटर स्टोरेज) की अनुमति की सीमा दोगुनी करना। इन्हीं प्रावधानों को लेकर पर्यावरणविदों और सरकार के भीतर भी विरोध बढ़ गया। इसके विरोध में पर्यावरण मंत्री मोनिक बारबू ने पद छोड़ने का फैसला किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने उनसे किए गए वादे के विपरीत इस प्रावधान को हटाने पर कोई चर्चा ही नहीं होने दी। बारबू ने सोशल मीडिया पर लिखा, पिछले नौ महीनों में मैंने जंगलों, साफ पानी, स्वच्छ हवा, उपजाऊ मिट्टी और जैव विविधता की रक्षा के लिए काम किया। लेकिन विरोधी ताकतें इतनी मजबूत हो गई हैं कि मैं अपने मकसद पूरे नहीं कर पा रही। राजनीति मेरी दुनिया नहीं है और अगर राजनीति ऐसी ही होती है, तो यह कभी मेरी दुनिया नहीं बन सकती। वहीं, सरकार का कहना है कि नए प्रावधान लाने का फैसला उन किसानों की मदद के लिए लिया गया है, जो मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। पहले भी विवाद में रहा है यह कीटनाशक एसेटामिप्रिड और फ्लुपाइराडीफ्यूरोन रसायन नियोनिकोटिनॉइड नाम के कीटनाशकों के समूह में आते हैं। यूरोपीय संघ (EU) के नियमों के तहत इनका इस्तेमाल कुछ शर्तों के साथ किया जा सकता है, लेकिन फ्रांस में इन पर फिलहाल प्रतिबंध है। एसेटामिप्रिड पर फ्रांस ने 2018 में प्रतिबंध लगाया था, क्योंकि इसे मधुमक्खियों और दूसरे परागण करने वाले कीड़ों के लिए हानिकारक माना गया था। एक साल पहले भी इस रसायन पर बैन हटाने की कोशिशें हुई थीं लेकिन फ्रांस की सुप्रीम कोर्ट ने इससे इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह फैसला पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा के अनुरूप नहीं है।

Lucknow Housing Scheme: लखनऊ समेत UP के 6 जिलों में बनेंगे 13.36 लाख सस्ते घर, जानिए LDA का पूरा प्लान

UP SCR Affordable Housing Plan: उत्तर प्रदेश के राज्य राजधानी क्षेत्र (SCR) में रहने वाले और घर खरीदने का सपना देखने वाले लोगों के लिए बड़ी खबर है। लखनऊ सहित एससीआर के 6 प्रमुख जिलों में बड़े स्तर पर आवासीय योजनाएं आकार लेने जा रही हैं। इस योजना के तहत कुल 48.75 लाख आवास बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें आम और गरीब लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए 13.36 लाख किफायती यानी सस्ते मकान शामिल होंगे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस महा-परियोजना से लगभग 33.40 लाख लोगों को सीधा लाभ मिलेगा। आइए जानते हैं कि किस जिले में कितने घर बनेंगे, जमीन की क्या तैयारी है और किस एजेंसी को इसका जिम्मा दिया गया है।

वर्ष 2051 की जरूरतों को ध्यान में रखकर खींचा गया खांचा

SCR के गठन के बाद लखनऊ और इसके आसपास के क्षेत्र रोजगार और व्यापार के बड़े केंद्र के रूप में विकसित हो रहे हैं। बाहरी जिलों से आने वाले लोगों के लिए किफायती आवास उपलब्ध कराने के मकसद से 10 जुलाई को हुई विभिन्न विभागों की समीक्षा बैठक में इस मेगा प्लान को मंजूरी दी गई।

2051 तक कुल जरूरत: 48.75 लाख घर।

सस्ते घर (EWS & LIG): 13.36 लाख घर।

योजना का क्षेत्रफल: कुल 70 हजार एकड़ में आवासीय योजनाएं विकसित होंगी।

पहला चरण: शुरुआती चरण में 9,940 एकड़ जमीन पर आवासीय परियोजनाएं धरातल पर उतारी जाएंगी।

जिला-वार डेटा: किस जिले में कितने बनेंगे सस्ते आवास?

एससीआर में शामिल लखनऊ, बाराबंकी, सीतापुर, उन्नाव, हरदोई और रायबरेली में घरों की जरूरत और सस्ते मकानों का आंकड़ा कुछ इस प्रकार है:

एससीआर में शामिल लखनऊ, बाराबंकी, सीतापुर, उन्नाव, हरदोई और रायबरेली में घरों की जरूरत और सस्ते मकानों का आंकड़ा कुछ इस प्रकार है:

किस जिले में कितनी भूमि की होगी जरूरत?

लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार के अनुसार, इन योजनाओं को आकार देने के लिए कुल 70,000 एकड़ जमीन की जरूरत होगी।

लखनऊ: 35,600 एकड़

उन्नाव: 7,500 एकड़

रायबरेली: 7,400 एकड़

सीतापुर: 7,300 एकड़

बाराबंकी: 6,900 एकड़

हरदोई: 4,200 एकड़

किन-किन लोकेशनों पर आएंगी आवासीय योजनाएं?

इस पूरे प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने की मुख्य जिम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA), सूडा (SUDA) और उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद को सौंपी गई है। सीतापुर रोड पर नैमिष नगर, आगरा एक्सप्रेसवे के पास वरुण विहार, सुलतानपुर रोड किसान पथ के पास आईटी सिटी और वेलनेस सिटी।  सीतापुर के नैमिषारण्य, हरदोई के संडीला इंडस्ट्रियल एरिया, बाराबंकी में सूडा, उन्नाव के नवाबगंज और रायबरेली के बछरावां में हाउसिंग बोर्ड की योजनाएं आएंगी।

मकान का साइज, स्टाइल और संभावित कीमत

एरिया साइज: इन सस्ते आवासों का क्षेत्रफल औसतन 83.5 वर्ग मीटर (लगभग 898.78 वर्ग फीट) रखा जाएगा।

ग्रुप हाउसिंग बनाम प्लॉट: रायबरेली में प्लॉट्स और ग्रुप हाउसिंग का अनुपात 50-50 प्रतिशत रहेगा। जबकि बाकी जिलों में ग्रुप हाउसिंग (फ्लैट्स) की संख्या अधिक होगी और प्लॉट्स अपेक्षाकृत कम रहेंगे।

कीमत: राजधानी लखनऊ में फिलहाल 15 से 20 लाख रुपये में सस्ते फ्लैट मिल जाते हैं। हालांकि, एससीआर भविष्य की दीर्घकालिक योजना है, इसलिए इन नए मकानों की अंतिम दरें आने वाले समय में तय की जाएंगी।

क्यों अलग माना जा रहा है जेन-ज़ी का यह छात्र आंदोलन और कहां चूकी मोदी सरकार?

Gen Z student protest in Delhi

Gen Z student protest in Delhi: दिल्ली में छात्रों के 'संसद मार्च' की शुरुआत परीक्षा में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की मांग से हुई थी। लेकिन समय के साथ यह प्रदर्शन केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा। प्रदर्शन में शामिल कई छात्र इसे सरकारी जवाबदेही, संस्थागत भरोसे और युवाओं के भविष्य से जुड़े व्यापक सवालों से जोड़कर देख रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में नागरिकता कानून, किसान आंदोलन और महिला पहलवानों के प्रदर्शन जैसे कई बड़े आंदोलन हुए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि मौजूदा छात्र आंदोलन को अलग क्यों माना जा रहा है?

1. मुद्दा केवल शिक्षा मंत्री तक सीमित नहीं रहा

शुरुआत में प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की जिम्मेदारी तय करने और इस्तीफे की मांग कर रहे थे। लेकिन अब प्रदर्शन में शामिल कई छात्र सरकार की समग्र शिक्षा नीति और परीक्षा प्रणाली को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भी सवाल उठा रहे हैं।

 

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि जब किसी मंत्री का सार्वजनिक रूप से बचाव किया जाता है, तो उस विभाग से जुड़े विवाद केवल मंत्रालय तक सीमित नहीं रहते बल्कि सरकार की व्यापक राजनीतिक जवाबदेही का हिस्सा बन जाते हैं। वहीं सरकार का कहना रहा है कि परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए कई कदम उठाए गए हैं और अनियमितताओं पर कार्रवाई की जा रही है। ALSO READ: छात्रों के बाद किसान आंदोलन की तैयारी, शंभु और खनौरी बॉर्डर बंद, भारी सुरक्षा बल तैनात

2. नेतृत्व से अधिक नेटवर्क आधारित आंदोलन

इस आंदोलन की एक खास बात यह भी है कि इसका संचालन किसी एक राजनीतिक दल, छात्र संगठन या प्रमुख चेहरे तक सीमित दिखाई नहीं देता। सोशल मीडिया के जरिए अलग-अलग शहरों के छात्र एक-दूसरे से जुड़े और विरोध प्रदर्शनों का समन्वय करते दिखे। ऐसे विकेंद्रीकृत आंदोलनों को पारंपरिक राजनीतिक ढांचे से अलग माना जाता है क्योंकि इनमें निर्णय लेने का केंद्र स्पष्ट नहीं होता।

3. साझा मुद्दों ने व्यापक समर्थन की कोशिश की

प्रदर्शन का मुख्य फोकस परीक्षा प्रणाली, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर रहा है। ये ऐसे विषय हैं जिनका असर अलग-अलग राज्यों, जातियों और सामाजिक समूहों के युवाओं पर पड़ता है।

 

इसी वजह से आंदोलन को किसी एक पहचान आधारित राजनीति के दायरे में रखना अपेक्षाकृत कठिन माना जा रहा है। हालांकि सरकार समर्थक कुछ समूहों ने आंदोलन की मंशा और राजनीतिक पृष्ठभूमि पर सवाल भी उठाए हैं। ALSO READ: सोनम वांगचुक ने अनशन खत्म करने के लिए रखीं 3 शर्तें, संसद मार्च से पहले आंदोलन में आया बड़ा मोड़

4. संस्थानों पर भरोसे का सवाल

प्रदर्शन में शामिल कई छात्रों का कहना है कि उन्हें अदालतों, जांच एजेंसियों और अन्य संस्थागत प्रक्रियाओं से अपेक्षित राहत नहीं मिली। इसी वजह से उन्होंने सार्वजनिक विरोध को अपनी बात रखने का प्रभावी माध्यम माना।

हालांकि न्यायपालिका और अन्य संस्थाएं समय-समय पर ऐसे मामलों में सुनवाई और हस्तक्षेप करती रही हैं। इसलिए यह धारणा सभी पक्षों द्वारा समान रूप से स्वीकार नहीं की जाती।

5. जवाबदेही की मांग आंदोलन का केंद्रीय विषय

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग यह रही है कि बार-बार सामने आने वाले पेपर लीक और भर्ती संबंधी विवादों के लिए स्पष्ट जिम्मेदारी तय की जाए।
 

विश्लेषकों का कहना है कि यह आंदोलन केवल किसी एक परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी संस्थानों की विश्वसनीयता और युवाओं के भविष्य से जुड़े व्यापक सवाल उठा रहा है।

6. सरकार की प्रतिक्रिया पर बहस

सरकार की ओर से अब तक प्रशासनिक कदम, जांच और कुछ मामलों में कार्रवाई की जानकारी दी गई है। दूसरी ओर प्रदर्शनकारी इसे अपर्याप्त बताते हुए लगातार विरोध जारी रखे हुए हैं।
 

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार सरकार के सामने चुनौती केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नहीं, बल्कि युवाओं के बीच भरोसा कायम रखने की भी है। आने वाले समय में सरकार बातचीत, नीति सुधार या प्रशासनिक कार्रवाई—किस रास्ते को प्राथमिकता देती है, इस पर भी नजर रहेगी।

7. युवाओं की राजनीतिक भागीदारी का नया संकेत?

इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद इसका सामाजिक और पीढ़ीगत स्वरूप है। बड़ी संख्या में ऐसे छात्र इसमें शामिल हैं जो पहली बार किसी सार्वजनिक आंदोलन का हिस्सा बने हैं।

 

दुनिया के कई देशों में हाल के वर्षों में छात्रों और युवाओं ने जलवायु परिवर्तन, आर्थिक संकट, शिक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे मुद्दों पर बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया है। भारत में भी कुछ विश्लेषक इस प्रदर्शन को उसी व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति के संदर्भ में देख रहे हैं, हालांकि इसकी दिशा और राजनीतिक प्रभाव का आकलन अभी जल्दबाजी होगा।
 

दिल्ली का यह छात्र आंदोलन फिलहाल केवल परीक्षा प्रणाली के विरोध तक सीमित नहीं दिखाई देता। यह युवाओं की आकांक्षाओं, रोजगार, शिक्षा और सरकारी जवाबदेही से जुड़े व्यापक प्रश्नों को सामने ला रहा है।

 

हालांकि यह कहना अभी जल्द होगा कि इसका दीर्घकालिक राजनीतिक असर क्या होगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस आंदोलन ने युवाओं की चिंताओं और सार्वजनिक संस्थानों में भरोसे के सवाल को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में सरकार की प्रतिक्रिया और आंदोलन की दिशा, दोनों ही इसके महत्व को तय करेंगे।

Q1 Results: टाटा ग्रुप की कंपनी का मुनाफा 32% बढ़ा, शेयरों पर रहेगी नजर

Q1 Results: टाटा ग्रुप की एग्री-इनपुट कंपनी Rallis India ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1) के नतीजे जारी कर दिए हैं। कंपनी का प्रदर्शन इस बार उम्मीद से बेहतर रहा। मुनाफा और रेवेन्यू, दोनों में बढ़ोतरी हुई है।

कंपनी का शुद्ध मुनाफा 31.6% बढ़कर ₹125 करोड़ हो गया। पिछले साल की समान तिमाही में यह ₹95 करोड़ था।

रेवेन्यू और EBITDA दोनों बढ़े

जून तिमाही में Rallis India का रेवेन्यू 6.8% बढ़कर ₹1,022 करोड़ रहा। पिछले साल की समान तिमाही में यह कम था। वहीं, EBITDA 23.3% बढ़कर ₹185 करोड़ पहुंच गया।

कंपनी का EBITDA मार्जिन 15.7% से बढ़कर 18.1% हो गया। इसका मतलब है कि कंपनी पहले के मुकाबले ज्यादा मुनाफे के साथ कारोबार कर रही है। बेहतर प्राइसिंग, लागत पर नियंत्रण और प्रोडक्ट मिक्स में सुधार से मार्जिन मजबूत हुआ।

Crop Care बिजनेस ने दिखाई मजबूती

Rallis India के Crop Care कारोबार का रेवेन्यू 7% बढ़कर ₹697 करोड़ पहुंच गया। इस कारोबार में रिटेल यानी B2C बिजनेस 19% बढ़ा। हालांकि, B2B कारोबार में 19% की गिरावट दर्ज की गई। इसके बावजूद कुल कारोबार बढ़त में रहा।

तिमाही के दौरान कंपनी ने फसल सुरक्षा से जुड़े Balwan, Prodim Ultra और Kengen नाम के तीन नए प्रोडक्ट लॉन्च किए। कंपनी ने फील्ड प्रोग्राम्स पर भी जोर दिया। साथ ही इन्वेंट्री मैनेजमेंट में सुधार किया। इसका फायदा कारोबार पर साफ दिखाई दिया।

Seeds कारोबार में भी अच्छी ग्रोथ

Rallis India का Seeds कारोबार भी मजबूत रहा। इस सेगमेंट का रेवेन्यू 6% बढ़कर ₹325 करोड़ पहुंच गया। प्री-सीजन डिमांड और सही समय पर प्रोडक्ट प्लेसमेंट का फायदा कंपनी को मिला।

तिमाही के दौरान कंपनी ने कपास, धान और बाजरा कैटेगरी में 9 नए प्रोडक्ट लॉन्च किए। इनमें उत्तर भारत के लिए दो नए कॉटन हाइब्रिड भी शामिल हैं। इसके अलावा Dhaanya ब्रांड के तहत हर्बीसाइड-टॉलरेंट डायरेक्ट-सीडेड राइस भी बाजार में उतारा गया।

कंपनी ने क्या कहा?

Rallis India के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ डॉ. ज्ञानेंद्र शुक्ला ने कहा कि कंपनी ने मजबूत रणनीति और बेहतर परिचालन की बदौलत अच्छा प्रदर्शन किया है। उन्होंने कहा कि मुनाफे में सुधार के साथ-साथ नए प्रोडक्ट्स पर भी लगातार निवेश किया जा रहा है।

उनके मुताबिक, कंपनी आगे भी भारतीय किसानों के लिए नए और बेहतर कृषि समाधान विकसित करने पर फोकस बनाए रखेगी। साथ ही सभी कारोबारों में अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को और मजबूत करेगी।

नतीजों से पहले सोमवार को Rallis India का शेयर 2.6% की बढ़त के साथ ₹240 पर बंद हुआ।

Bitcoin Price Today: बिटकॉइन एक साल में 45% क्रैश हुआ, एक्सपर्ट्स बोले – अभी दूर रहने में ही भलाई

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कमजोर मानसून का असर: खरीफ बुवाई पिछले साल से 6% पीछे, दालों-तिलहन की खेती पर पड़ा ये इंपैक्ट

Weak Monsoon Impact: देश के कई प्रमुख फसल उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की भारी कमी और बारिश में देरी का सीधा असर इस साल खरीफ फसलों की बुवाई पर देखने को मिल रहा है। मनी कंट्रोल के ईशान गेरा की रिपोर्ट के मुताबिक 17 जुलाई तक देश में खरीफ फसलों का रकबा पिछले साल की तुलना में 6 प्रतिशत पीछे चल रहा है। किसानों ने इस अवधि तक 65.82 मिलियन हेक्टेयर में बुवाई की है जबकि 2025 की इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा 70.05 मिलियन हेक्टेयर था। बारिश की इस लगातार बनी हुई कमी से सबसे ज्यादा मार दालों, मोटे अनाज, तिलहन और कपास की खेती पर पड़ी है। आइए जानते हैं कि मानसून की सुस्ती ने किस फसल की बुवाई को कितना प्रभावित किया है और देश में पानी के जलाशयों का क्या हाल है.

दालों की बुवाई में आई सबसे बड़ी गिरावट (15.1% की कमी)

खरीफ फसलों में दालों की खेती सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। दालों का कुल रकबा पिछले साल के 81.52 लाख हेक्टेयर से 15.1 प्रतिशत घटकर अब 69.23 लाख हेक्टेयर रह गया है। अरहर की बुवाई में करीब 18 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है और यह घटकर 2.48 मिलियन हेक्टेयर पर आ गई है। मूंग का रकबा 11 प्रतिशत घटकर 2.398 मिलियन हेक्टेयर रहा। उड़द की बुवाई में लगभग 6 प्रतिशत की कमी आई है और यह 1.351 मिलियन हेक्टेयर दर्ज की गई।

क्यों चिंताजनक है यह गिरावट?

दालों की बुवाई में यह कमी बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत घरेलू उत्पादन और खपत के बीच के अंतर को पूरा करने के लिए पहले से ही आयात पर निर्भर रहता है।

धान, मोटे अनाज, तिलहन और कपास का क्या है हाल?

राहत की बात यह है कि धान की बुवाई पर मानसून की कमी का असर अपेक्षाकृत कम पड़ा है। यह 16.64 मिलियन हेक्टेयर पर पहुंच चुकी है जो पिछले साल की इसी अवधि के 16.78 मिलियन हेक्टेयर की तुलना में सिर्फ 0.8 प्रतिशत कम है। मोटे अनाज के रकबे में 11.2 प्रतिशत की तेज गिरावट आई है। यह पिछले साल के 13.41 मिलियन हेक्टेयर से गिरकर 11.9 मिलियन हेक्टेयर पर आ गया है। इसमें बाजरा की बुवाई में 18.5 प्रतिशत और मक्का की बुवाई में 5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। तिलहन का रकबा 5.5 प्रतिशत घटकर 14.71 मिलियन हेक्टेयर रह गया है। कपास की बुवाई में भी 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

मानसून में 24% की कमी, इन राज्यों में गंभीर सूखा

1 जून से 19 जुलाई के बीच भारत में 253.2 मिमी बारिश दर्ज की गई है जो सामान्य स्तर से 24 प्रतिशत कम है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश का यह घाटा अलग अलग है-

  • पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत: सामान्य से 35 प्रतिशत कम बारिश
  • दक्षिण प्रायद्वीप: 27 प्रतिशत की कमी
  • उत्तर-पश्चिम भारत: 23 प्रतिशत की कमी
  • मध्य भारत: 14 प्रतिशत की कमी

राज्यों के स्तर पर बारिश का घाटा

कृषि के लिहाज से महत्वपूर्ण कई राज्यों में बारिश का गंभीर संकट बना हुआ है। बिहार में सामान्य से 44 प्रतिशत कम बारिश हुई है। झारखंड में 41 प्रतिशत की कमी देखने को मिली है। पंजाब में ये कमी 41 प्रतिशत की है। केरल में 34 प्रतिशत कम बारिश हुई है। तेलंगाना में 31 प्रतिशत बारिश कम हुई है। तटीय कर्नाटक में 31 फीसदी कम बारिश देखने को मिली है।

जलाशयों का जलस्तर पिछले साल से 39% नीचे

कम बारिश की वजह से देश के जलाशयों में पानी का भंडारण भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अभी देश के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल क्षमता का सिर्फ 34.46 प्रतिशत पानी ही बचा है। यह उपलब्ध पानी पिछले साल की इसी अवधि के जलस्तर का सिर्फ 60.84 प्रतिशत ही है। यानी 39 प्रतिशत की भारी गिरावट देखने को मिली है। यह जलस्तर पिछले 10 वर्षों के औसत स्तर से भी 1.8 प्रतिशत नीचे चला गया है।

सपा-कांग्रेस से सावधान और सतर्क रहेंगे तो सुरक्षित रहेंगे, इनसे सटेंगे तो खतरा बढ़ेगा : योगी

CM Yogi Barabanki Speech

CM Yogi Barabanki Speech: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को बाराबंकी की धरा से प्रदेशवासियों को आगाह किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस व समाजवादी पार्टी विरासत, विकास, गांव-गरीब, किसानों, नौजवानों और महिलाओं की जन्मजात विरोधी हैं। इनसे सावधान और सतर्क रहेंगे तो सुरक्षित रहेंगे अन्यथा जैसे ही इनसे सटेंगे तो खतरा बढ़ेगा। सीएम ने बुजुर्गों से अपील की कि युवाओं को सपा की गुंडागर्दी, उपद्रव, सरकारी धन की डकैती व लूट के बारे में बताइए। मुख्यमंत्री ने लोधेश्वर महादेव के सामने से जाने वाली सड़क को टूलेन से फोरलेन बनाने और गेट को भव्य बनाने के लिए प्रस्ताव मांगा।

 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को बाराबंकी में रामनगर व दरियाबाद विधानसभा क्षेत्र के विकास के लिए 542 करोड़ से अधिक की 82 परियोजनाओं का लोकार्पण/शिलान्यास किया। सीएम ने साहित्यिक विभूतियों, खिलाड़ियों, किसानों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, सीमा की सुरक्षा करने वाले युवाओं आदि का नाम लेकर बाराबंकी को विरासत, आध्यात्मिकता, साहित्य, समर्पण, युवा शक्ति से ओतप्रोत, स्वतंत्रता आंदोलन में अविस्मरणीय योगदान वाली प्रतिभाशाली व समृद्ध धरा बताया। 

 

कब्रिस्तान की बाउंड्रीवाल तक तो विकास की लौ पहुंची लेकिन लोधेश्वर महादेव मंदिर पर ध्यान नहीं दिया गया

सीएम ने कहा कि बाराबंकी को लोधेश्वर महादेव का आशीर्वाद प्राप्त है। सोमवार को बाबा का दर्शन कर अंतःकरण से आनंद की अनुभूति हुई। यहां अगल-बगल के कई जनपदों से श्रद्धालु आते हैं, फिर भी मंदिर जीर्ण-शीर्ण ही रहा। आजादी के बाद भी आपके पैसे से विकास की लौ कब्रिस्तान की बाउंड्रीवाल तक तो पहुंची, लेकिन लोधेश्वर महादेव मंदिर, केडी सिंह बाबू की हवेली, पारिजात के महाभारत कालीन वृक्ष के संरक्षण, महादेवा, अयोध्या, काशी विश्वनाथ, गोला गोकर्णनाथ, महापुरुषों, वीरांगनाओं आदि के नाम पर योजनाओं के लिए पैसा नहीं मिला।

 

हमारी सरकार भगवान लोधेश्वर महादेव का कॉरिडोर बना रही है, जिससे देश-प्रदेश के हर कोने से यहां आने वाला श्रद्धालु अभिभूत होगा और बाराबंकीवालों को आशीर्वाद व धन्यवाद देकर जाएगा। सरकार गोला गोकर्णनाथ में भी भव्य कॉरिडोर बना रही है। विंध्यवासिनी मंदिर का कॉरिडोर बन गया। पहले काशी में गंदगी थी और गलियां संकरी थीं लेकिन अब वह भी दिव्य-भव्य बन गई है। देश से जो भी काशी व अयोध्या आता है, हमें भी धन्यवाद देकर जाता है। 

केडी सिंह बाबू की हवेली बिक जाए, हमारी सरकार यह कतई स्वीकार नहीं करेगी

मुख्यमंत्री ने कहा कि हॉकी में 36 वर्ष बाद भारतीय टीम ने ओलंपिक में पदक जीता लेकिन उससे पहले मेजर ध्यानचंद व केडी सिंह बाबू के समय भारत ने लगातार तीन बार स्वर्ण पदक जीता था। जिस खिलाड़ी ने हॉकी को पूरा जीवन दिया, उन केडी सिंह बाबू की हवेली बिक जाए, हमारी सरकार यह कतई स्वीकार नहीं करेगी। हमने तय किया कि वहां संग्रहालय का निर्माण होगा। सीएम ने अमेरिका के न्यू जर्सी में हुए फीफा विश्वकप का भी जिक्र करते हुए कहा कि स्पेन व अर्जेंटीना के मैच को देखकर लोगों में गजब का उत्साह था। ऐसे ही जब हॉकी चलती है तो भारत की निगाहें उस पर रहती हैं। मेजर ध्यानचंद व केडी सिंह बाबू ने इसे नई ऊंचाई दी थी। 

सनातन सुरक्षित तो सब सुरक्षित

सीएम ने कहा कि विरासत के संरक्षण व सनातन मूल्यों के रक्षा के लिए महापुरुषों ने योगदान दिया। राजा बलभद्र सिंह, लाखन पासी, बिजली पासी, महाराज सुहेलदेव, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह ने देश को गुलामी से मुक्त कराने के लिए योगदान दिया। सुहेलदेव ने जहां सालार मसूद को मारा था, हमारी सरकार ने बहराइच में वहीं उनका भव्य स्मारक बनाया है। लखनऊ में वीरांगना उदा देवी, गोरखपुर में झलकारी बाई, बदायूं में अवंती बाई के नाम पर पीएसी बटालियन, बांदा में महारानी दुर्गावती, औरैया में लोकमाता अहिल्याबाई मेडिकल कॉलेज, अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि एयरपोर्ट, निषादराज नाम पर रैनबसेरा का निर्माण किया है। देश के लिए योगदान व सनातन के लिए समर्पण देने वाले महापुरुषों को सरकार ने सम्मान दिया है। सनातन की सुदृढ़ नींव पर ही हमारा भविष्य सुरक्षित होगा। सनातन सुरक्षित है तो हम सभी सुरक्षित हैं। सनातन पर खतरा आया तो कोई बच नहीं पाएगा। लोगों को बांटने वाले इन सपाइयों व कांग्रेसियों के नमूनों के मुंह संकट के समय बंद हो जाते हैं। 

कट्टा- बम बनवाने वाले कराते थे गुर्गों से वसूली

सीएम ने कहा कि कब्रिस्तान की बाउंड्रीवाल बनाने और कांवड़ यात्रा, जन्माष्टमी, रामनवमी की शोभायात्रा, दुर्गापूजा के पंडाल पर प्रतिबंध लगाना सपा के लिए निरपेक्षता का मानक था। हमें ऐसे धर्मनिरपेक्षता को उखाड़ फेंककर सनातन की सुदृढ़ भूमि पर सुरक्षित भारत का निर्माण करना होगा। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सनातन को अपमानित करने वाले लोग त्योहारों के पहले उपद्रव और गुर्गों से वसूली कराते थे। इन लोगों ने गांवों- शहरों में कट्टा-बम बनवाना शुरू कर दिया, जिससे व्यापारी व बेटी की इज्जत से खिलवाड़ होता था। अब लखनऊ में बने ब्रह्मोस मिसाइल से पाकिस्तान व उसके आका बाप-बाप कहकर चिल्लाते हैं। निवेश आने से अब यूपी में ही युवाओं को नौकरी मिल रही है। 

बुजुर्गों से बोले- युवाओं को सपा की गुंडागर्दी, उपद्रव व लूट के बारे में बताइए

सीएम ने कहा कि समाजवादी जाति से जाति को लड़ा रही है। एक समय कहावत थी कि देख सपाई, बिटिया घबराई। सीएम ने बुजुर्गों से अपील की कि युवाओं को इनकी गुंडागर्दी, उपद्रव, डकैती, अराजकता, लूट के बारे में बताइए। उन्होंने कहा कि सैफई घराना ने आमजन के पैसे पर लूट मचाई थी। सपा जिस जेपीएनआईसी को बना रही थी, उसकी कीमत 200 करोड़ थी, लेकिन 864 करोड़ खर्च होने के बावजूद भी बिल्डिंग अधूरी थी। हमारी सरकार से पहले सपा ने पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का शिलान्यास किया। सीएम ने यहां भी उनके घोटाले को उजागर किया। कहाकि जिसके लिए वे 15,200 करोड़ का एस्टिमेट बनाए थे। दो वर्ष बाद जमीन आने पर हमने प्रधानमंत्री जी से इसका शिलान्यास कराया और 11,800 करोड़ रुपये में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे बनाया। गोमती रिवर फ्रंट का कुल एस्टिमेट 167 करोड़ रुपये था, लेकिन 1700 करोड़ खर्च होने के बावजूद वह अधूरा ही रहा।

CM Yogi Barabanki Speech

डबल इंजन सरकार ने रोकी सपा की डकैती और कांग्रेस की लूट 

सीएम ने कहा कि एक प्रधानमंत्री ने तो कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर यहां तक कह दिया कि 100 में से 15 पैसे ही नीचे आम जनता तक जाता है। भाजपा की डबल इंजन सरकार ने सपा की डकैती और कांग्रेस की लूट को रोका। इस पैसे से अब नौजवान को छात्रवृत्ति, बेटी की शादी, कन्या सुमंगला योजना का लाभ, टैबलेट, किसानों को सम्मान निधि, गरीबों को प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री आवास योजना, स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिल रहा है। जिस पैसे से यह कब्रिस्तान की बाउंड्रीवाल बना रहे थे, उस पैसे का हमने मुंह घुमा दिया और अब इससे कॉरिडोर बन रहा है। सैफई सिडिंकेट का युवाओं की नौकरी पर कब्जा था। नौकरियों की नीलामी होती थी, लेकिन अब बाराबंकी के युवाओं को भी निष्पक्ष रूप से सरकारी नौकरी मिल रही है। 

सनातन विरोधी है सपा-कांग्रेस का चरित्र

मुख्यमंत्री ने विपक्षियों (सपा-कांग्रेस) के वास्तविक चरित्र को सनातन विरोधी बताया, कहा कि य़ह जनता के हक, विकास की परियोजनाओं पर डकैती डालते थे। इनके कारनामों से यूपी के सामने पहचान का संकट था। देश में यूपी टॉप-3 इकॉनमी बन गया है। अब बाढ़ बचाव का स्थायी समाधान और गोमती नदी का सुंदरीकरण-पुनरुद्धार हो रहा है। लखनऊ व अयोध्या के बीच स्टेट कैपिटल रीजन (एससीआर) में शामिल बाराबंकी का विकास कोई रोक नहीं सकता।  

सपा चट कर जाती थी राशन

सीएम ने कहा कि हमने दरियाबाद के विधायक सतीश चंद्र शर्मा को खाद्य व रसद राज्यमंत्री बनाया तो वे यहां के साथ ही अन्य जनपदों का भी विकास कर रहे हैं। सपा गरीब का राशन चट कर जाती थी, लेकिन अब हर गरीब का राशन उसे ही मिलता है। धांधली करने वालों पर कार्रवाई होती है। सपा व कांग्रेस के समय गरीब को पेंशन, छात्रों को छात्रवृत्ति दिए जाने से पहले घूस लिया जाता है। आज सीधे अकाउंट में पैसा जाता है, बीच में घूसखोरी नहीं चल सकती। रामनगर ने जिन्हें 2022 और बाराबंकी ने जिन्हें 2024 में चुना, उन्हें विकास की चर्चा करने की फुर्सत नहीं है। इन लोगों ने एक बार भी विकास के प्रस्ताव नहीं दिए। यदि रामनगर विधानसभा और बाराबंकी लोकसभा में कमल खिला होता तो यह क्षेत्र भी विकास की बुलंदियों को छू रहा होता। 

 

इस अवसर पर कारागार राज्यमंत्री सुरेश राही, खाद्य व रसद राज्यमंत्री सतीश चंद्र शर्मा, विधायक साकेंद्र प्रताप वर्मा, दिनेश रावत, विधान परिषद सदस्य अंगद कुमार सिंह, इंजी. अवनीश कुमार सिंह, जिला पंचायत प्रशासक राजरानी रावत, उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के अध्यक्ष बैजनाथ रावत, भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष व पूर्व सांसद प्रियंका रावत, क्षेत्रीय अध्यक्ष अवधेश द्विवेदी, जिलाध्यक्ष राम सिंह वर्मा आदि मौजूद रहे।

यूपी में जीरो पॉवर्टी अभियान के पात्र परिवारों का बने अंत्योदय कार्ड : CM योगी

Yogi Government Zero Poverty Campaign: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन की छठी बैठक में प्रदेश में संचालित प्रमुख आधारभूत संरचना, औद्योगिक विकास, निवेश, जनकल्याण और सेवा वितरण से जुड़ी परियोजनाओं की व्यापक समीक्षा की। बैठक में मुख्यमंत्री ने जीरो पॉवर्टी अभियान को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए निर्देश दिए कि ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन की विशेष टीम गठित कर पात्र परिवारों का अंत्योदय कार्ड बनवाया जाए और उन्हें आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री आवास सहित सभी पात्र योजनाओं से चरणबद्ध रूप से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं का समग्र लाभ प्रत्येक पात्र परिवार तक पहुंचना चाहिए।

 

बैठक में बताया गया कि जीरो पॉवर्टी अभियान के तहत 12.50 लाख परिवारों का सर्वेक्षण किया गया है। इनमें लगभग 9 लाख परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना के पात्र पाए गए हैं, जबकि लगभग 5 लाख परिवारों को मुख्यमंत्री आवास योजना के माध्यम से लाभान्वित किया जाना है। इसके अतिरिक्त 6.67 लाख परिवारों के पास अभी आयुष्मान कार्ड उपलब्ध नहीं हैं। इनमें से लगभग 5 लाख लोगों का भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड में पंजीकरण हो चुका है, जबकि शेष पात्र परिवारों का पंजीकरण कराया जा रहा है। साथ ही 10.60 लाख परिवारों के एक सदस्य को कौशल प्रशिक्षण से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

 

बैठक में बताया गया कि प्रदेश की प्रमुख एक्सप्रेसवे परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण का कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। फर्रुखाबाद लिंक एक्सप्रेसवे के लिए 88.45 प्रतिशत, झांसी लिंक एक्सप्रेसवे के लिए 72.71 प्रतिशत, आगरा-लखनऊ-पूर्वांचल लिंक एक्सप्रेसवे के लिए 63 प्रतिशत तथा जेवर लिंक एक्सप्रेसवे के लिए 59.35 प्रतिशत भूमि उपलब्ध कराई जा चुकी है। मुख्यमंत्री ने मेरठ-हरिद्वार, विंध्य, विंध्य-पूर्वांचल तथा नोएडा-जेवर लिंक एक्सप्रेसवे सहित सभी प्रस्तावित परियोजनाओं की समीक्षा करते हुए संबंधित जिलाधिकारियों को 31 जुलाई तक भूमि उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

 

उन्होंने कहा कि भूमि संबंधी विषयों में संवाद सीधे भूमिस्वामियों से स्थापित किया जाए। बैठक में लखनऊ नाइट सफारी परियोजना की समीक्षा करते हुए बताया गया कि 15 जुलाई को उच्चतम न्यायालय से इसके क्रियान्वयन की अनुमति मिल चुकी है। मुख्यमंत्री ने सभी औपचारिकताएं शीघ्र पूरी कर परियोजना को समयबद्ध रूप से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए।

 

ग्रेटर नोएडा में विकसित हो रहे मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक हब एवं मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट हब की समीक्षा के दौरान बैठक में बताया गया कि 323 हेक्टेयर में से 301 हेक्टेयर भूमि प्राप्त हो चुकी है। लॉजिस्टिक पार्क के लिए पांच कंपनियों ने पंजीकरण कराया है और आवंटन प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री ने परियोजना की सभी औपचारिकताएं समयबद्ध ढंग से पूरी करने के निर्देश दिए। औद्योगिक विकास प्राधिकरणों के लिए मॉडल बिल्डिंग बायलॉज की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को ध्यान में रखते हुए आवश्यक संशोधनों को शीघ्र अंतिम रूप दिया जाए।

 

लखनऊ में विकसित किए जा रहे टेक्सटाइल पार्क की प्रगति की समीक्षा के दौरान बताया गया कि परियोजना की आधारभूत संरचना तेजी से विकसित हो रही है। मुख्यमंत्री ने निर्माण कार्यों में तेजी बनाए रखते हुए इसे प्रदेश के वस्त्र एवं परिधान उद्योग के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने के निर्देश दिए। बैठक में उन्नाव की एक्वा ब्रिज परियोजना तथा कानपुर के बिनगवां स्थित 40 एमएलडी तृतीयक उपचार संयंत्र से पनकी ताप विद्युत संयंत्र को जलापूर्ति उपलब्ध कराने वाली परियोजना की भी समीक्षा की गई। मुख्यमंत्री ने लंबित तकनीकी एवं प्रशासनिक औपचारिकताएं शीघ्र पूरी कर दोनों परियोजनाओं को समयबद्ध रूप से क्रियान्वित करने के निर्देश दिए।

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि आधारभूत संरचना के विकास के साथ जनसुरक्षा से जुड़े मानकों का कठोर अनुपालन भी सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने सभी शासकीय एवं निजी मेडिकल कॉलेजों, चिकित्सा संस्थानों, जिला चिकित्सालयों तथा होटलों में वैध फायर एनओसी की समीक्षा करते हुए जहां आवश्यकता हो वहां तत्काल कार्रवाई कर अग्नि सुरक्षा मानकों का शत-प्रतिशत अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

 

बैठक में लखनऊ नगर निगम क्षेत्र में सीवर लाइन एवं मैनहोल के ऊपर से गुजर रही हाईटेंशन विद्युत लाइनों की स्थिति की भी समीक्षा की गई। मुख्यमंत्री ने संबंधित विभागों को आपसी समन्वय से ऐसे सभी स्थलों का शीघ्र समाधान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

 

प्रदेश की विद्युत वितरण व्यवस्था की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री ने सभी विद्युत फीडरों का विस्तृत विश्लेषण कर बिजली आपूर्ति, राजस्व वसूली, हानि-लाभ तथा ओवरलोड की स्थिति के आधार पर सुधारात्मक कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए। उन्होंने तकनीकी दक्षता, वित्तीय अनुशासन और उपभोक्ता सुविधा को समान प्राथमिकता देने पर जोर दिया। बैठक में बुंदेलखंड औद्योगिक विकास प्राधिकरण (बीडा) में भूमि अधिग्रहण की प्रगति की भी समीक्षा की गई। मुख्यमंत्री ने कहा कि बुंदेलखंड में औद्योगिक विकास की गति बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रशासनिक निर्णयों में अनावश्यक विलंब नहीं होना चाहिए।

 

डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड के उपयोग की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि इस निधि का उपयोग स्थानीय आवश्यकताओं और जनहित के कार्यों में पारदर्शिता एवं गुणवत्ता के साथ किया जाए। सांसद निधि एवं विधायक निधि से स्वीकृत विकास परियोजनाओं की समीक्षा के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रस्तावित कार्य स्थानीय आवश्यकताओं से सीधे जुड़े होते हैं। उन्होंने जिलाधिकारियों को इन परियोजनाओं की नियमित समीक्षा कर निर्धारित समयसीमा में पूर्ण कराने के निर्देश दिए।

 

'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' योजना की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री ने जल संरक्षण एवं सूक्ष्म सिंचाई को कृषि विकास की रणनीति का अभिन्न हिस्सा बनाने पर बल दिया तथा किसानों को आधुनिक सिंचाई तकनीकों से जोड़ने के लिए समन्वित प्रयास करने के निर्देश दिए। ग्राम पंचायतों में डिजिटल लाइब्रेरी की स्थापना की प्रगति की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इसका उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री और डिजिटल संसाधनों तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराना है। उन्होंने इस कार्य को निर्धारित समयसीमा में पूरा करने के निर्देश दिए।

किसान बनने का सपना हुआ पूरा, 61 वर्षीय पूर्व फौजी ड्रैगन फ्रूट की खेती से कमा रहे 4 लाख रुपये

रिटायरमेंट के बाद ज्यादातर लोग सुकून भरी जिंदगी की तलाश करते हैं, लेकिन ओडिशा के प्रताप चंद्र राउल ने अपनी दूसरी पारी को एक नई पहचान देने का फैसला किया। दशकों तक देश की सेवा करने के बाद उन्होंने खेती को अपना नया लक्ष्य बनाया और कुछ अलग करने की ठानी। बालासोर के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ उनका यह सफर आज कई लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है।

सीमित जमीन, नई सोच और सीखने की इच्छा के दम पर प्रताप ने ऐसी फसल चुनी, जो उनके इलाके में अभी ज्यादा प्रचलित नहीं थी। उनकी मेहनत ने न सिर्फ एक छोटे खेत को कमाई का जरिया बनाया, बल्कि यह भी दिखाया कि सही योजना और लगन से खेती में नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

हाथों में थामी खेती की कमान

प्रताप ने 1984 में मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद भारतीय सेना जॉइन की थी। करीब 26 साल सेवा देने के बाद सितंबर 2010 में वह रिटायर हुए। इसके बाद उन्होंने ओडिशा पुलिस में हवलदार के रूप में एक दशक तक काम किया। साल 2020 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर गांव लौटने का फैसला किया। लेकिन उनका उद्देश्य सिर्फ आराम करना नहीं था। वह कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिससे कम जमीन में भी अच्छी आमदनी हासिल की जा सके। प्रताप ने कहा, “मैं ऐसा किसान बनना चाहता था जो अपने इलाके में कुछ नया करे। मेरा लक्ष्य था साबित करना कि छोटी जमीन भी सही योजना के साथ बड़ा फायदा दे सकती है।”

खेती का अनुभव नहीं था, फिर भी सीखने से नहीं पीछे हटे

प्रताप के परिवार का खेती से कोई पुराना संबंध नहीं था। शुरुआत में उनके लिए खेती पूरी तरह नया क्षेत्र था। उन्होंने कई महीनों तक अलग-अलग फसलों के बारे में जानकारी जुटाई। उन्होंने इंटरनेट, यूट्यूब वीडियो, सोशल मीडिया समूहों और अनुभवी किसानों से बातचीत के जरिए खेती की बारीकियां सीखीं। कई विकल्पों पर विचार करने के बाद उन्हें ड्रैगन फ्रूट सबसे बेहतर विकल्प लगा।

इस फल ने उन्हें इसलिए आकर्षित किया क्योंकि:

  • इसमें पानी की जरूरत अपेक्षाकृत कम होती है
  • गर्म मौसम में इसकी पैदावार अच्छी होती है
  • एक बार पौधा लगाने के बाद करीब 25 साल तक उत्पादन मिल सकता है

गुजरात से लाए खास किस्म के पौधे, शुरू किया नया प्रयोग

मार्च 2022 में प्रताप ने करीब 1.3 लाख रुपये लगाकर अपना ड्रैगन फ्रूट फार्म तैयार किया। उन्होंने 1,000 पौधे, 70 कंक्रीट पोल, 900 फीट जीआई पाइप और अन्य जरूरी सामान खरीदा। उन्होंने गुजरात से ड्रैगन फ्रूट की सात बेहतरीन किस्में मंगाईं, जिनमें शामिल थीं:

  • वियतनाम रेड
  • थाई जंबो
  • मोरक्कन रेड
  • हाइब्रिड जायंट रेड
  • इजरायली येलो
  • ताइवान पिंक
  • व्हाइट ड्रैगन फ्रूट

कम जमीन में ज्यादा उत्पादन के लिए उन्होंने पारंपरिक पोल सिस्टम की जगह हाई-डेंसिटी रैलिंग सिस्टम अपनाया। इससे एक ही क्षेत्र में ज्यादा पौधे लगाए जा सके और बेलें तेजी से बढ़ने लगीं।

पहली फसल ने दिया झटका

किसी भी नए किसान की तरह प्रताप को शुरुआत में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। मार्च 2023 में पहली बार फसल तैयार हुई, लेकिन उत्पादन केवल करीब 50 किलो रहा। फल भी उम्मीद से छोटे निकले। वह इतने निराश हुए कि उन्होंने उन्हें बाजार तक नहीं पहुंचाया। लेकिन प्रताप ने इस असफलता को हार नहीं माना। उन्होंने अपनी गलतियों को समझा और खेती के तरीके में बदलाव शुरू किया।

रसायनों को छोड़ा

प्रताप ने रासायनिक उर्वरकों की जगह पूरी तरह जैविक खेती अपनाने का फैसला किया। उन्होंने गाय के गोबर, गोमूत्र, फल-सब्जियों के कचरे, प्याज के अवशेष, मिट्टी और केंचुओं से प्राकृतिक खाद तैयार करनी शुरू की। इस बदलाव का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। पौधों की सेहत सुधरी, फलों का आकार बढ़ा और उत्पादन हर साल बेहतर होता गया।

छोटी जमीन से बढ़ी कमाई

साल 2024 में उनके खेत से करीब 200 किलो ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन हुआ। जैविक फल होने के कारण ग्राहकों ने इसे अच्छी कीमत पर खरीदा और उन्हें लगभग 50 हजार रुपये की कमाई हुई। इसके बाद 2025 में उत्पादन तेजी से बढ़ा। अप्रैल से नवंबर के बीच करीब 900 किलो फल तैयार हुए।

उन्होंने लगभग:

  • 650 किलो फल सीधे ग्राहकों को करीब 220 रुपये प्रति किलो बेचे
  • बाकी फल थोक विक्रेताओं को करीब 200 रुपये प्रति किलो की दर से बेचे

सिर्फ फलों की बिक्री से उनकी आमदनी करीब 1.4 लाख रुपये तक पहुंच गई।

फल के साथ पौधों से भी कमाई का नया रास्ता

प्रताप ने कमाई का दायरा सिर्फ फलों तक सीमित नहीं रखा। वह हर साल करीब 2,000 ड्रैगन फ्रूट पौधों की नर्सरी तैयार करते हैं, जिससे उन्हें लगभग 50 हजार रुपये अतिरिक्त मिलते हैं। उन्होंने अपनी छत पर भी 22 पौधे लगाए हैं, जिनसे हर साल करीब 20 किलो फल मिलते हैं। ऑफ-सीजन में वह पौधों की कटाई-छंटाई और अगले उत्पादन की तैयारी में जुट जाते हैं।

अब स्ट्रॉबेरी से बढ़ाएंगे कमाई के मौके

ड्रैगन फ्रूट में सफलता हासिल करने के बाद प्रताप अब नई फसलों की ओर भी बढ़ रहे हैं। उन्होंने एक छोटे क्षेत्र में स्ट्रॉबेरी की खेती का प्रयोग किया, जो सफल रहा। अब उनका लक्ष्य है कि ड्रैगन फ्रूट के ऑफ-सीजन में दूसरी फसलों के जरिए अतिरिक्त आमदनी बनाई जाए।

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नोएडा में यमुना-हरनंदी दोआब के किनारे बनेगा 500 करोड़ का 4 लेन रिवरफ्रंट रोड, अथॉरिटी ने दी मंजूरी जानिए सारी डिटेल

नोएडा अथॉरिटी ने यमुना-हरनंदी दोआब के किनारे 29 किलोमीटर लंबी चार-लेन वाली सड़क बनाने के लिए 500 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। यह सड़क नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे का एक विकल्प होगी और इसका मकसद इलाके में ट्रैफिक जाम को कम करना है। News 18 की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने बताया कि प्रस्तावित कॉरिडोर से यात्रा का समय कम होगा, कनेक्टिविटी बेहतर होगी और ग्रेटर नोएडा की 75 ग्रुप हाउसिंग सोसाइटियों, 25 सेक्टरों और 20 गांवों में रहने वाले लगभग पांच लाख लोगों को सीधा फायदा होगा।

नोएडा अथॉरिटी के CEO कृष्णा करुणेश ने कहा, “नोएडा अथॉरिटी इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 500 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। यह एक्सप्रेसवे यात्रियों को काफी राहत देगा और नदी के किनारे सुनियोजित विकास में मदद करेगा।”

25 सेक्टर, 20 गांव लाभान्वित होंगे

अधिकारियों के अनुसार, इस नए प्रोजेक्ट से नोएडा के कई रिहायशी सेक्टरों में कनेक्टिविटी बेहतर होगी। इनमें सेक्टर 94, 124, 125, 126, 127, 128, 129, 130, 131, 132, 133, 134, 135, 150, 151, 152, 153, 154, 155, 158, 159, 163, 164 और 168 शामिल हैं।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, जिन गांवों को फायदा होने की उम्मीद है उनमें रायपुर, बख्तावरपुर, असगरपुर जहांगीर, सुल्तानपुर, शाहपुर गोवर्धनपुर, शाहपुर गढ़ी, नंगला नंगली, रोहिल्लापुर, नंगला वाजिदपुर, छपरौली, मंगरौली, मोहियापुर, बदौली, झट्टा, दल्लूपुरा, गुजरान डेरिन, कमबक्शपुर, याकूतपुर, गुलावली और मोमनाथल शामिल हैं।

मौजूदा सड़क को अपग्रेड किया जाएगा

अधिकारियों ने बताया कि यमुना तटबंध के किनारे 11.2 किलोमीटर लंबी मौजूदा फोर-लेन सड़क का नवीनीकरण पहले से ही 34 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से किया जा रहा है, जिसमें से अब तक 11 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।

नए प्रस्ताव के तहत, यमुना दोआब वाले हिस्से को चौड़ा करके फोर-लेन सड़क बनाई जाएगी, जबकि हरनंदी दोआब के किनारे 17 किलोमीटर लंबा नया फोर-लेन कॉरिडोर विकसित किया जाएगा।

यह कॉरिडोर सेक्टर 150 तक जाएगा, जहां यह कोंडली-बांगर की तरफ से आने वाली मौजूदा 75 मीटर चौड़ी सड़क से जुड़ेगा, जिससे यात्रियों के लिए एक लगातार वैकल्पिक रास्ता बन जाएगा।

बहुत कम जमीन अधिग्रहण की उम्मीद

अधिकारियों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट के लिए बड़े स्तर पर जमीन अधिग्रहण की संभावना कम है। इसकी वजह यह है कि उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के पास पहले से ही दोआब क्षेत्र में 22 से 28 मीटर चौड़ी जमीन उपलब्ध है।

News18 की रिपोर्ट के अनुसार, उपलब्ध जमीन फोर-लेन कॉरिडोर बनाने के लिए काफी होने की उम्मीद है, जिससे किसानों से कृषि भूमि अधिग्रहण करने की जरूरत कम हो जाएगी।

CEO कृष्णा करुणेश ने यह भी कहा कि जिन जगहों पर जमीन के मालिक सहमत होंगे, वहां तटबंध (embankment) को और बढ़ाया जा सकता है।

उन्होंने कहा, “जहां किसान सहमत होंगे, हम उनकी मंजूरी से तटबंध को बाहर की ओर बढ़ा सकते हैं। अथॉरिटी किसी भी जमीन के अधिग्रहण के लिए मुआवजा देने को तैयार है।”

व्यस्त एक्सप्रेसवे पर दबाव कम करने की तैयारी

नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर अभी लगभग 10 लाख गाड़ियां चलती हैं, जिससे पीक आवर्स (सबसे ज्यादा भीड़-भाड़ वाले समय) में बहुत ज्यादा जाम लगता है।

अधिकारियों का कहना है कि प्रस्तावित रिवरफ्रंट रोड और सैद्धांतिक रूप से मंजूर किए गए अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से मौजूदा एक्सप्रेसवे पर ट्रैफिक का दबाव काफी कम होने की उम्मीद है।

बता दें कि यह नया कॉरिडोर तेजी से विकसित हो रहे यमुना-हरनंदी दोआब क्षेत्र के भविष्य के शहरी विकास में भी मदद करेगा। इस इलाके में स्पोर्ट्स सिटी और जेपी विश टाउन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के कारण रिहायशी इलाकों का विस्तार तेजी से हो रहा है।

न्यूज 18 के अनुसार, कृष्णा करुणेश ने कहा, “तटबंध के विस्तार से न केवल ट्रैफिक की समस्याएं हल होंगी, बल्कि क्षेत्रीय विकास को भी गति मिलेगी। इससे स्थानीय निवासियों को बेहतर आवागमन की सुविधा मिलेगी और इलाके की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।”