“पुतिन शांति चाहते हैं, जेलेंस्की युद्ध बढ़ाना चाहते हैं!” रूस-यूक्रेन संघर्ष पर ट्रंप का बड़ा बयान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस-यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को लेकर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पर निशाना साधा है। ट्रंप ने कहा कि पुतिन इस युद्ध को खत्म करना चाहते हैं, न कि इसे अगले 10 साल तक चलते हुए देखना चाहते हैं। बता दें कि ट्रंप ने यह दावा जेलेंस्की के साथ हुई बातचीत के बाद किया। ट्रंप ने कहा, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन युद्ध खत्म करना चाहते हैं, जबकि यूक्रेनी नेता संघर्ष को लंबा खींचना चाहते हैं।

ट्रंप ने कहा, “आज जेलेंस्की के साथ हमारी मीटिंग हुई, और उनके नजरिए से यह मीटिंग अच्छी नहीं रही। मुझे लगता है कि उन्होंने अपनी स्थिति का जरूरत से ज्यादा फायदा उठाने की कोशिश की। मैं शांति चाहता हूं, न कि 10 साल तक चलने वाली जंग या कोई खेल-तमाशा। हम शांति चाहते हैं! वह लड़ते रहना चाहते हैं, जबकि हम मौतों को रोकना चाहते हैं। पिछले हफ्ते 2,000 लोग मारे गए। राष्ट्रपति पुतिन इसे खत्म करना चाहते हैं, जबकि जेलेंस्की हमें 10 साल की लड़ाई में उलझाए रखना चाहते हैं। ऐसा नहीं होगा।”

इससे पहले ट्रंप ने दावा किया था कि यूक्रेन के साथ युद्ध के कारण रूस ने दुर्भाग्य से अपने डीजल तेल उद्योग के कुछ हिस्सों पर से नियंत्रण खो दिया है।

ट्रंप ने अपने ‘ट्रुथ सोशल’ प्लेटफॉर्म पर लिखा, “उनकी कई डीजल रिफाइनरियों को उड़ा दिया गया है और वे कम से कम कुछ समय के लिए तो बंद ही हैं। यूक्रेन के साथ चल रहे इस बेतुके और कभी न खत्म होने वाले युद्ध को खत्म किया जाना चाहिए। पूरी दुनिया को नुकसान हो रहा है क्योंकि हर महीने 25,000 लोग, जिनमें ज्यादातर सैनिक हैं, मारे जा रहे हैं। कितनी शर्म की बात है!”

ट्रंप के साथ बैठक से ‘बहुत कुछ बदल सकता है’- जेलेंस्की

ट्रंप से बातचीत के बाद, जेलेंस्की ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति उनसे न्यूयॉर्क में मिलने के लिए सहमत हो गए हैं। उन्होंने कहा कि इस बैठक से “बहुत कुछ बदल सकता है” और इससे “राजनयिक गति” मिलेगी।

जेलेंस्की ने कहा कि उन्होंने अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर के कीव दौरे के लिए ट्रंप का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने यह भी बताया कि दोनों पक्षों ने यूक्रेन के हालात पर विस्तार से चर्चा की।

जेलेंस्की ने आगे कहा, “शांति की कोशिश हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है।” उन्होंने बताया कि तनाव कम करने और सुरक्षा से जुड़े अहम मुद्दों को सुलझाने के लिए कई प्रस्तावों पर चर्चा हुई है। इनमें ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और लोगों की जान की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं।

उन्होंने यह भी बताया, “हम अमेरिकी टीम के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और बहुत गंभीर कदम उठाने के लिए तैयार हैं।”

जेलेंस्की ने ट्रंप का लिंडसे ग्राहम के समर्थन वाले बिल को कानून का रूप देने के लिए भी धन्यवाद किया। उन्होंने एक बार फिर कहा कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि युद्ध का समाधान शांति के जरिए निकाला जाना चाहिए।

जेलेंस्की ने कहा, “यूक्रेन के साथ खड़े रहने वाले हर व्यक्ति का धन्यवाद। हमारी मदद करने वाले सभी लोगों का भी धन्यवाद।”

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Trump ने भारत पर 100% टैरिफ लगाने वाले बिल पर हस्ताक्षर किया, जानिए अब आगे क्या होगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस बिल पर हस्ताक्षर कर दिया है, जिसमें रूस से ऑयल खरीदने वाले भारत जैसे देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रावधान शामिल है। हालांकि, इस बिल का असल मकसद रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है, लेकिन इसका असर भारत और चीन सहित उन पांच देशों पर पड़ेगा जो रूस से ज्यादा ऑयल इंपोर्ट करते हैं।

रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी टैरिफ का खतरा

इस बिल का नाम लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026 है। पिछले महीने सीनेट ने इस बिल को मंजूरी दे दी थी। हाल में हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में भी यह बिल 262-159 से पारित हो गया था। अब ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद यह बिल प्रभावी हो गया है। यह बिल ट्रंप को उन देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का अधिकार देता है जो रूस से तेल और गैस खरीदते हैं।

डोनाल्ड ट्रंप को मिला 100 फीसदी टैरिफ लगाने का अधिकार 

यह ध्यान में रखना जरूरी है कि इस बिल के प्रावधान अपने आप प्रभावी नहीं होंगे। अब ट्रंप को भारत और चीन जैसे देशों पर 100 टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है। अब उनके ऊपर है कि वह किस तरह इस बिल का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, अमेरिका कई बार रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की बात कह चुका है।

ये देश 100 फीसदी टैरिफ वाले इस बिल के दायरे में नहीं आएंगे 

इंडिया और चीन उन देशों में शामिल हैं, जो रूस से ज्यादा तेल खरीदते हैं। इसलिए इन देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगने का खतरा मंडरा रहा है। इस बिल में यह गया है कि उन देशों को इस बिल के दायरे से बाहर रखा जाएगा, जिनकी रूस के नेचुरल गैस के एक्सपोर्ट्स में 15 फीसदी से कम हिस्सेदारी है।

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रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की रही है टेढ़ी नजर 

रूस और यूक्रेन में 2022 में लड़ाई शुरू हुई थी, जो अब तक चल रही है। लड़ाई शु्रू होने के बाद अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए थे। लेकिन, इसका रूस पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। हालांकि, प्रतिबंध के बाद रूस ने कम कीमत पर अपना ऑयल बेचने की पेशकश की, जिसका फायदा भारत और चीन उठा रहे हैं। अमेरिका का मानना है कि भारत और चीन के तेल खरीदने से रूस के पास पैसा आ रहा है, जिसका इस्तेमाल वह यूक्रेन के खिलाफ हमलों के लिए कर रहा है।

H-1B Visa पर ट्रंप का बड़ा एक्शन, $1 लाख फीस का आदेश एक और साल के लिए बढ़ाया; भारतीय IT प्रोफेशनल्स पर क्या होगा असर?

अमेरिका में नौकरी का सपना देखने वाले लाखों विदेशी प्रोफेशनल्स, खासकर भारतीय IT कर्मचारियों के लिए H-1B वीजा से जुड़ी एक अहम खबर सामने आई है। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B नॉन-इमिग्रेंट वीजा प्रोग्राम की निगरानी को सख्त करने वाले एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर साइन किए हैं। इसके तहत H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाने वाले आदेश की अवधि एक साल के लिए बढ़ा दी गई है। हालांकि, इस मामले को लेकर कानूनी लड़ाई अभी अदालत में जारी है, लेकिन ट्रंप के इस फैसले के बाद अमेरिका की इमिग्रेशन पॉलिसी और विदेशी कर्मचारियों की भर्ती को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।

बता दें की ट्रंप ने कुछ एम्प्लॉयर्स, थर्ड-पार्टी प्लेसमेंट ग्रुप्स और आउटसोर्सिंग फर्मों पर आरोप लगाया है कि वे कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों से कुशल अमेरिकी कर्मचारियों को बदलने के लिए इस सिस्टम का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं।

व्हाइट हाउस ने यह नया आदेश 18 सितंबर 2026 को जारी किया। इसका नाम “Enhancing Program Integrity and Interagency Coordination in the Administration of the H-1B Nonimmigrant Visa Program” है। इस आदेश का मकसद H-1B वीजा प्रोग्राम की निगरानी और नियमों को और सख्त करना है।

अमेरिका ने वेतन में अंतर और नौकरियों के नुकसान का हवाला दिया

आदेश के अनुसार, H-1B प्रोग्राम को खास हुनर ​​वाले और बहुत ज्यादा स्पेशलाइज्ड विदेशी अस्थायी कर्मचारियों को अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लाने के लिए बनाया गया था। हालांकि, इसमें कहा गया है कि इस प्रोग्राम का “बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल” किया गया है, जिससे कुशल अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कर्मचारियों को रखा गया और वेतन कम हुआ।

व्हाइट हाउस ने दावा किया कि सस्ते H-1B कर्मचारियों की वजह से घरेलू वेतन पर दबाव पड़ता है। उसने कहा कि H-1B वीजा धारक, H-1B पर निर्भर उद्योगों में उसी तरह के काम करने वाले अमेरिका में जन्मे कर्मचारियों की तुलना में $9,000 से $20,000 कम कमाते हैं, जबकि समान वेतन का कानूनी नियम है।

आदेश में यह भी कहा गया है कि टेक्नोलॉजी सेक्टर की कंपनियों ने 2022 से 2026 के बीच 8 लाख से 13 लाख अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकालते हुए भी लाखों कर्मचारियों के लिए H-1B वीजा की मांग की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि कुछ कंपनियों ने नौकरी से निकाले गए अमेरिकी कर्मचारियों से ही उनकी जगह लेने वाले विदेशी कर्मचारियों को ट्रेनिंग दिलवाई।

आदेश में कहा गया, “सस्ते H-1B कर्मचारियों का गलत इस्तेमाल घरेलू वेतन पर दबाव डालता है। कानून के तहत H-1B कर्मचारियों को उनके घरेलू कर्मियों के बराबर वेतन मिलना चाहिए, फिर भी H-1B वीजा धारक अमेरिका में जन्मे समान स्तर के कर्मचारियों की तुलना में बहुत कम कमाते हैं। वेतन में यह अंतर $9,000 से शुरू होकर H-1B पर निर्भर उद्योगों में $20,000 तक पहुंच जाता है।”

आउटसोर्सिंग’ करने वाली कंपनियां चर्चा में

आदेश में कहा गया है कि कुछ आउटसोर्सिंग कंपनियां H-1B वीजा वाले कर्मचारियों का इस्तेमाल थर्ड-पार्टी क्लाइंट कंपनियों के अमेरिकी कर्मचारियों की जगह लेने के लिए करती हैं। इसके बाद इन कंपनियों का काफी काम विदेशों में ट्रांसफर कर दिया जाता है।

आदेश के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में इस तरह के आउटसोर्सिंग मॉडल पर काम करने वाली छह सबसे बड़ी H-1B इस्तेमाल करने वाली कंपनियों ने 25,000 से ज्यादा H-1B वीजा रजिस्ट्रेशन किए। आदेश में एक विदेशी मंत्री के बयान का भी जिक्र किया गया है, जिसमें कहा गया कि H-1B वीजा अब ‘आउटसोर्सिंग वीजा’ बन गया है।

वहीं, व्हाइट हाउस ने H-1B प्रोग्राम के इस कथित गलत इस्तेमाल को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंता बताया है। उसके मुताबिक, अमेरिकी जांच एजेंसियों ने H-1B पर निर्भर कुछ आउटसोर्सिंग कंपनियों के खिलाफ वीजा धोखाधड़ी, पैसे की हेराफेरी की साजिश और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को लेकर जांच की है।

आदेश में आगे कहा गया है कि इस तरह के दुर्व्यवहार अमेरिकियों को विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में करियर बनाने से हतोत्साहित कर सकते हैं और इन क्षेत्रों में अमेरिका की लीडरशिप को खतरे में डाल सकते हैं।

एजेंसियां ​​एम्प्लॉयर द्वारा कर्मचारियों की छंटनी की जांच करेंगी

नए आदेश के तहत, विदेश, श्रम और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के सचिवों को H-1B वीजा की अर्जियों, लेबर कंडीशन एप्लीकेशन और वीजा की प्रक्रिया के दौरान वाणिज्य और शिक्षा विभाग के सचिवों के साथ मिलकर काम करना होगा। इसमें स्मॉल बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के एडमिनिस्ट्रेटर भी शामिल होंगे।

ये सभी एजेंसियां कर्मचारियों की सैलरी, रोजगार, शिक्षा, इंडस्ट्री और अर्थव्यवस्था से जुड़ी अन्य जानकारी आपस में साझा करेंगी। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि H-1B वीजा से जुड़े नियम इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट के मुताबिक लागू किए जा रहे हैं।

नए आदेश के तहत इमिग्रेशन अधिकारियों को यह भी देखना होगा कि H-1B वीजा के लिए स्पॉन्सर करने वाली किसी कंपनी ने पिछले एक साल में सीधे या किसी अन्य तरीके से कर्मचारियों की छंटनी की है या नहीं। साथ ही यह भी जांचा जाएगा कि कंपनी भविष्य में ऐसी छंटनी करने की योजना तो नहीं बना रही है, जिससे समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों पर नकारात्मक असर पड़े।

आदेश के मुताबिक, 30 दिनों के भीतर, लेबर डिपार्टमेंट के ‘वेज एंड आवर डिवीजन’ को पहले जमा किए गए ‘लेबर कंडीशन एप्लीकेशन’ के डेटा की समीक्षा शुरू करनी होगी, ताकि यह तय किया जा सके कि क्या स्पॉन्सर करने वाले एम्प्लॉयर्स के खिलाफ आगे कोई कार्रवाई करने की रूरत है।

अमेरिकी सरकार की जांच में क्या सामने आया?

आदेश के मुताबिक, अमेरिका के कई सरकारी विभागों और एजेंसियों ने H-1B वीजा का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों में बड़े स्तर पर कथित गड़बड़ियों की जानकारी दी है। आरोप है कि कुछ कंपनियां कम वेतन और कम स्किल वाले विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखने के लिए H-1B प्रोग्राम का गलत इस्तेमाल कर रही हैं।

जांच में जिन कथित नियमों के उल्लंघन का जिक्र किया गया है, उनमें अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कर्मचारियों को रखना, नौकरी की जिम्मेदारियों और काम की परिस्थितियों के बारे में गलत जानकारी देना, ऐसी नौकरियों को ‘स्पेशलिटी ऑक्युपेशन’ बताना जो इसके योग्य नहीं हैं, जरूरी वेतन को कम दिखाना और फर्जी या संदिग्ध डिग्री देने वाले संस्थानों (डिप्लोमा मिल) की डिग्री के आधार पर H-1B आवेदन जमा करना शामिल है।

वहीं, ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी वर्कफोर्स की सुरक्षा और उन्हें प्राथमिकता देने के लिए और कदम उठाने की जरूरत है, साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि H-1B प्रोग्राम राष्ट्रीय हित में काम करे।

इस आदेश के तहत विदेश, वाणिज्य, श्रम और होमलैंड सिक्योरिटी विभागों के सचिवों को इसे लागू करने के लिए जरूरी नियम, नीतियां और ऑपरेशनल गाइडेंस जारी करने या अपनाने का अधिकार दिया गया है।

व्हाइट हाउस ने कहा कि इस आदेश को लागू करते समय मौजूदा कानूनों और उपलब्ध फंड का ध्यान रखा जाएगा। साथ ही, यह भी कहा गया कि इस आदेश से अमेरिकी सरकार या उसकी एजेंसियों के खिलाफ कोई ऐसा कानूनी अधिकार या लाभ नहीं बनता, जिसे अदालत में लागू कराया जा सके।

क्या है H-1B वीजा कार्यक्रम?

अमेरिकी कांग्रेस द्वारा 1990 में शुरू किया गया यह वीजा कार्यक्रम विशेष रूप से उन प्रौद्योगिकी (टेक) कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो भारत और चीन से प्रतिभाशाली पेशेवरों की भर्ती करना चाहती हैं। H-1B वीजा कार्यक्रम के तहत अमेरिकी कंपनियां विदेशी कुशल पेशेवरों को नौकरी पर रख सकती हैं। तकनीकी, इंजीनियरिंग, आईटी, वित्तीय सेवाओं और अन्य विशेषज्ञ क्षेत्रों में काम करने वाले हजारों पेशेवर हर साल इस वीजा के माध्यम से अमेरिका जाते हैं। यह कार्यक्रम विशेष रूप से भारतीय और चीनी पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

किन लोगों पर लागू नहीं होगा आदेश

यह आदेश उन विदेशी नागरिकों पर लागू नहीं होता जो पहले से छात्र वीजा पर अमेरिका में मौजूद हैं और बाद में H-1B वीजा प्राप्त करते हैं। इसके अलावा मौजूदा H-1B वीजा के नवीनीकरण पर भी यह नियम लागू नहीं किया गया है.।इसी कारण नए आवेदकों और पहली बार वीजा प्रायोजन कराने वाली कंपनियों पर इसका प्रभाव अधिक माना जा रहा है।

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रूस पर ट्रंप का शिकंजा, 100% टैरिफ वाले बिल पर किया साइन, जानें भारत और चीन पर कैसे पड़ेगा असर

Russia Sanctions Bill: भारत और चीन जैसे देशों के लिए एक बड़ी और चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाले नए कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस बिल से उन्हें उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है जो रूस से तेल और गैस खरीदते हैं।

Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 के तहत रूस के एनर्जी सेक्टर, सीनियर अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और उन टैंकरों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, जिन्हें पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन टैंकरों को आमतौर पर ‘शैडो फ्लीट’ कहा जाता है।

भारत-चीन पर कैसे पड़ेगा असर?

बुधवार को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने यह कानून 262-159 के अंतर से पास कर दिया। इससे पहले इस बिल को सीनेट से मंजूरी मिल चुकी थी। नए कानून के तहत रूस से तेल या गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े खरीदार देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत या चीन पर तुरंत 100% टैरिफ लगा दिया जाएगा। टैरिफ लगाना है या नहीं और अगर लगाना है तो किस दर पर, इसका फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करेंगे।

जानकारी के मुताबिक, इस कानून का मकसद एनर्जी एक्सपोर्ट से मॉस्को की कमाई कम करना और यूक्रेन युद्ध को लेकर उस पर दबाव बढ़ाना है।

कब लागू हो सकता है टैरिफ?

यह कानून राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर लागू हो जाएगा। इसके तहत, उन देशों से आयातित सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाना जरूरी है, जो कानून बनने से पहले के 12 महीनों में कुल मात्रा के हिसाब से रूसी कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के शीर्ष पांच खरीदार रहे हों। अगर किसी देश का रूसी गैस आयात, लागू अवधि के दौरान रूस के कुल निर्यात का 15 प्रतिशत से कम रहा हो और उसने उस आयात को कम करने के लिए “महत्वपूर्ण कदम” उठाए हों, तो उसे गैस से जुड़े शुल्कों से छूट मिलती है।

भारत ने रिश्तों पर असर पड़ने की चेतावनी दी

भारत ने वॉशिंगटन को पहले ही चेतावनी दे दी है कि नए कदमों से दोनों देशों के रिश्तों पर असर पड़ सकता है। नई दिल्ली ने कहा है कि वह एनर्जी सिक्योरिटी के लिए प्रतिबद्ध है और मार्केट की स्थितियों के आधार पर अलग-अलग सप्लायर्स से तेल खरीदना जारी रखेगी।

बता दें कि भारत, रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में से एक है। जबकि चीन भी एक बड़ा खरीदार है, इसलिए नए कानून के तहत दोनों देशों पर असर पड़ सकता है।

वहीं, इस कानून से ट्रंप को टैरिफ के बारे में बड़े फैसले लेने की छूट मिलती है और कुछ खास स्थितियों में छूट देने का भी प्रावधान है।

भारत के लिए यह कानून ऐसे समय में आया है, जब नई दिल्ली, रूस से तेल खरीदने को लेकर वॉशिंगटन के बढ़ते दबाव और अपनी एनर्जी की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।

शी जिनपिंग के दौरे से बढ़ सकती है टेंशन

सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप के इस कदम से ठीक पहले, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 24 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति से बातचीत के लिए वॉशिंगटन आने वाले हैं।

यह बैठक एक दशक में शी की पहली व्हाइट हाउस यात्रा होगी और इस साल दोनों नेताओं के बीच आमने-सामने की दूसरी मुलाकात होगी। इससे पहले उनकी मुलाकात मई में बीजिंग में हुई थी।

इस बैठक में व्यापार एक अहम मुद्दा हो सकता है। इसके अलावा ताइवान को लेकर तनाव, ईरान युद्ध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अमेरिका-चीन के बीच टैरिफ (आयात शुल्क) को लेकर बनी अस्थायी शांति को आगे बढ़ाने की कोशिशों पर भी चर्चा हो सकती है।

गौरतलब है कि रूस पर लगाए गए नए प्रतिबंधों वाला कानून दोनों देशों के बीच दबाव का एक और मुद्दा बन सकता है, क्योंकि चीन रूस से ऊर्जा खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में शामिल है।

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रूस पर नए प्रतिबंधों वाले बिल पर ट्रंप जल्द लगाएंगे मुहर, जानें भारत पर क्या होगा इसका असर?

Russia Sanctions Bill: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूस पर नए और कड़े प्रतिबंध लगाने वाले बिल पर जल्द हस्ताक्षर करने वाले हैं। इस बिल के तहत ट्रंप को भारत समेत उन देशों पर 100% तक टैरिफ (शुल्क) लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस से तेल और गैस खरीदते हैं।

अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स द्वारा इस कानून को मंजूरी दिए जाने के बाद, व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने गुरुवार को ANI को बताया, “राष्ट्रपति इस बिल पर दस्तखत करने की योजना बना रहे हैं।”

बता दें कि Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 नाम के इस बिल को अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 262-159 वोटों से पास कर दिया है। यह बिल पहले ही अमेरिकी सीनेट से मंजूर हो चुका है और अब इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर का इंतजार है।

भारत ने द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ने की चेतावनी दी

यह घटनाक्रम तब हुआ जब विदेश मंत्रालय ने कहा कि वॉशिंगटन को बता दिया गया है कि रूसी तेल की खरीद से जुड़े टैरिफ का असर द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है।

नई दिल्ली ने कहा कि वह ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए “पूरी तरह प्रतिबद्ध” है और बाजार की स्थितियों के आधार पर अलग-अलग विक्रेताओं से सप्लाई लेना जारी रखेगी।

मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “भारत ने भी अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का अपना इरादा साफ कर दिया है।”

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए रूसी कच्चा तेल खरीदता रहा है।

बता दें कि प्रस्तावित बिल के तहत ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की बड़ी शक्ति मिल सकती है। भारत और चीन ऐसे देशों में शामिल हैं, जिन पर यह टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि, इस बिल में भारत पर 100% टैरिफ अपने आप लगाने का प्रावधान नहीं है।

ट्रेड बातचीत पर नया दबाव

इस कदम से भारत और अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड बातचीत भी मुश्किल में पड़ सकती है। अमेरिका, भारतीय सामान के एक्सपोर्ट के लिए सबसे बड़ी जगह है। अप्रैल-अगस्त के दौरान अमेरिका को होने वाला भारतीय सामान का एक्सपोर्ट बढ़कर 42.79 अरब डॉलर हो गया, जो एक साल पहले 40.39 अरब डॉलर था।

रॉयटर्स के सूत्रों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरियों ने सितंबर और अक्टूबर के लिए रूसी क्रूड का इंतजाम पहले ही कर लिया है।

भारतीय रिफाइनरियां वॉशिंगटन के साथ बातचीत करना चाहते हैं, जिसमें संभावित छूट या कोटा शामिल हो सकता है। उनका कहना है कि रूसी सप्लाई में कटौती से लागत बढ़ सकती है, खासकर ऐसे समय में जब ग्लोबल ऑयल मार्केट पहले से ही दबाव में है।

वहीं, भारत-अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता अभी भी बिना किसी नतीजे के चल रही है और दोनों पक्ष समझौते तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।

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‘ब्याज दरें जल्द कम करें…’ फेड की दर वृद्धि के बाद ट्रंप ने 1% या उससे कम रेट की मांग की

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को एक बार फिर ब्याज दरों में कटौती की मांग की है। खास बात यह है कि ट्रंप की यह मांग ऐसे समय आई है, जब फेडरल रिजर्व ने 2023 के बाद पहली बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी का फैसला किया है। हालांकि, इस बार ट्रंप ने फेडरल रिजर्व के प्रमुख केविन वार्श पर सीधे निशाना साधने से परहेज किया है। अब चलिए जानते हैं ट्रंप ने आखिर ब्याज दरों में कटौती की मांग क्यों की, और फेड ने इसके उलट दरें बढ़ाने का फैसला क्यों लिया?

गुरुवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा, “हम दुनिया के लगभग हर देश का ‘बोझ उठा’ रहे हैं, और ऐसा अब और नहीं चल सकता। यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के लिए ब्याज दरें कम करें, और जल्द करें!”

ट्रंप ने कहा कि अमेरिका में ब्याज दरें 1% या उससे कम होनी चाहिए, क्योंकि देश की क्रेडिट रेटिंग बहुत अच्छी है और निवेश तेजी से बढ़ रहा है, जिससे कम लागत पर उधार लेना सही ठहराया जा सकता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि जिन देशों के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा है, उनके साथ व्यापार बंद करने से हर साल कम से कम 1.5 ट्रिलियन डॉलर कमाए जा सकते हैं। दरअसल, उनका तर्क था कि व्यापार घाटा असल में नुकसान ही है।

उन्होंने ‘ट्रुथ सोशल’ पोस्ट में लिखा, “अमेरिका में ब्याज दरें 1% या उससे कम होनी चाहिए, क्योंकि हमारी क्रेडिट रेटिंग दुनिया में सबसे अच्छी है — और इसमें कोई शक नहीं है। हमारे देश में नए निवेश तेजी से बढ़ रहे हैं! अगर हम उन सभी देशों के साथ व्यापार बंद कर दें जिनके साथ हमारा व्यापार घाटा है — और ऐसे ज्यादातर देश हैं — तो हम हर साल कम से कम 1.5 ट्रिलियन डॉलर कमा सकते हैं। ‘Deficit’ शब्द असल में ‘Loss’ के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक फैंसी शब्द है।”

बता दें कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने बुधवार को 2023 के बाद पहली बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की। वहीं, इस फैसले के साथ फेड ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस मांग को नजरअंदाज कर दिया जिसमें उन्होंने ब्याज दरें घटाने की मांग की थी। सेंट्रल बैंक के प्रमुख केविन वार्श ने कहा कि महंगाई अभी भी काफी ज्यादा है और लंबे समय से ऊंचे स्तर पर बनी हुई है।

फेड की फेडरल ओपन मार्केट कमिटी ने सर्वसम्मति से ब्याज दरों को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 3.75 से 4.00% के बीच करने के लिए वोट किया। कमिटी का कहना है कि दरें बढ़ने से महंगाई को उसके 2% के लक्ष्य तक जल्द वापस लाने में मदद मिलेगी।

ट्रंप द्वारा नियुक्त किए गए फेडरल रिजर्व के प्रमुख केविन वॉर्श ने कहा कि यह फैसला “गंभीर” था, लेकिन इसे लेना जरूरी था।

उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “साफ बात यह है कि महंगाई बहुत ज्यादा है और काफी समय से ऐसी ही बनी हुई है।”

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अमेरिका कर रहा है DMK के वादे की नकल! श्रीधर वेम्बू अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कैश स्कीम पर क्या बोले?

जोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से अमेरिकी एडल्ट्स को $5000 देने के वादे की तुलना तमिलनाडु की चुनावी राजनीति से कर दी है। वेम्बू ने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति असल में भारत के तमिलनाडु की पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) की नकल कर रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में श्रीधर वेम्बू ने लिखा कि हमने इसका आविष्कार तमिलनाडु में किया और इसे पूरे भारत में फैलाया। राष्ट्रपति ट्रंप DMK की नकल कर रहे हैं।

क्या है डोनाल्ड ट्रंप का $5000 ट्रम्प डिविडेंड वादा?

श्रीधर वेम्बू का यह कमेंट डोनाल्ड ट्रंप के उस चुनावी वादे के बाद सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि अगर रिपब्लिकन पार्टी नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों में प्रतिनिधि सभा और सीनेट पर अपना कंट्रोल बनाए रखती है, तो वह हर अमेरिकी एडल्ट को $5000 भेजेंगे। ट्रंप के वादे को ट्रंप डिविडेंड नाम दिया गया है।

1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की लागत और भारी घाटा

ट्रंप के इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी की जरूरत होगी और इससे 1 ट्रिलियन डॉलर (1 खरब डॉलर) से अधिक का खर्च आ सकता है। यह स्थिति तब है जब अमेरिका पहले से ही लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर के एनुअल बजट घाटे का सामना कर रहा है और उसका नेशनल कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर को पार कर चुका है। ट्रंप ने सुझाव दिया है कि टैरिफ से मिलने वाले रेवेन्यू की मदद से अमेरिकी लोगों को ये पैसा दिया जाएगा। वैसे रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप ने जितने का वादा कर दिया है वो टैरिफ से आने वाले रेवेन्यू से भी ज्यादा बैठ रहा है।

इस पर ‘कमिटी फॉर ए रिस्पॉन्सिबल फेडरल बजट’ के सीनियर पॉलिसी डायरेक्टर मार्क गोल्डवेन ने कहा कि ट्रंप कांग्रेस की मंजूरी के बिना यह भुगतान नहीं कर सकते। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब सरकार पहले से ही बड़े बजट घाटे में चल रही है तो ऐसे में डिविडेंड शब्द का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।

आपको बता दें कि श्रीधर वेम्बू द्वारा DMK का जिक्र तमिलनाडु के दशकों पुराने राजनीतिक इतिहास को ध्यान में रखकर किया गया है। तमिलनाडु में वेलफेयर स्कीम्स को चुनावी राजनीति के साथ जोड़ने का इतिहास काफी पुराना है। यहां 1950 और 1960 के दशक में मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में के कामराज ने मुफ्त शिक्षा का विस्तार किया और स्कूली बच्चों के लिए मिड डे मील स्कीम शुरू की थी।

1967 के विधानसभा चुनाव में DMK के संस्थापक सीएन अन्नादुरई ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए रियायती दरों पर चावल देने का वादा किया था। DMK ने यह चुनाव जीता और इस योजना को लागू किया। बाद में फाइनेंशियल दिक्कतों की वजह से इसे सीमित करना पड़ा। 2006 के चुनाव में एम करुणानिधि की अगुवाई वाली DMK ने मुफ्त कलर टीवी, रियायती चावल, गैस चूल्हे और अन्य लाभ देने का वादा किया। इसी तरह 2011 के चुनाव में ये कंपीटिशन और तेज हो गया। तब DMK और AIADMK दोनों ने मिक्सर, ग्राइंडर, पंखे और लैपटॉप जैसे घरेलू सामान देने के वादे किए।

तमिलनाडु से निकलकर पूरे भारत में फैला यह मॉडल

तमिलनाडु से शुरू हुआ यह मॉडल बाद में देश के दूसरे हिस्सों में भी फैल गया। आम आदमी पार्टी ने 2015 में दिल्ली चुनाव प्रचार में मुख्य रूप से सब्सिडी वाली बिजली और मुफ्त पानी का वादा किया था। इसके बाद से भारत भर के राजनीतिक दलों ने मुफ्त बिजली, लोन माफी, मुफ्त सार्वजनिक परिवहन, कैश स्कीम, लैपटॉप और दूसरे डायरेक्ट फायदे देने शुरू कर दिए.

ट्रंप के पुराने वादे: DOGE डिविडेंड और टैरिफ रिफंड

ऐसा नहीं है कि ट्रंप कोई पहली बार कुछ इस तरह का वादा कर रहे हैं। इससे पहले उन्होंने एलन मस्क के डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (DOGE) द्वारा की गई बचत को जनता में बांटने के लिए DOGE डिविडेंड का प्रचार किया था। इसके अलावा उन्होंने टैरिफ रिफंड का विचार भी पेश किया था। इसमें सुझाव दिया गया था कि इंपोर्ट फी से मिलने वाले रेवेन्यू को अंततः जनता को लौटाया जा सकता है।

Brent Crude 105 डॉलर के पार पहुंचा, अमेरिका-ईरान में बढ़ते टेंशन का असर

क्रूड ऑयल की कीमतों में 10 सितंबर को भी तेजी जारी रही। ब्रेंट क्रूड का प्राइस 105 डॉलर पर पहुंच गया। इस साल 25 मई के बाद पहली बार ब्रेंट क्रूड का भाव इस लेवल पर पहुंचा है। अमेरिका और ईरान के बीच टेंशन लगातार बढ़ रहा है, जिसका असर क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ रहा है।

चीन की क्रूड की खरीदारी का भी कीमतों पर असर

क्रू्ड ऑयल की कीमतों में तेजी की कुछ दूसरी वजहें भी हैं। चीन ने फिर से क्रूड ऑयल की अच्छी खरीदारी शुरू कर दी है। उधर, सऊदी अरब ने कहा है कि उसके क्रूड के उत्पादन में तेज गिरावट आई है। इसका असर क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ा है। ईरान ने अमेरिकी हमलों के जवाब में जॉर्डन में अमेरिकी युद्धपातों पर मिसाइल से हमले किए हैं। इससे हालात लगातार खराब होने की तरफ बढ़ रहे हैं।

WTI क्रूड की कीमतें भी 100 डॉलर के पार

भारतीय समय के मुताबिक, शाम 6:45 बजे ब्रेंट क्रूड का प्राइस 4 फीसदी उछलकर 105.41 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। WTI क्रूड भी 4.41 फीसदी उछाल के साथ 100 डॉलर प्रति बैरल के पार हो गया। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ट ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ लड़ाई नवंबर में मिड टर्म इलेक्शंस के बाद खत्म होगी। इधर, ईरान ने कहा है कि अगर अमेरिका हमले जारी रखता है तो वह जवाबी हमले करेगा।

अगस्त के लेवल से 30 फीसदी चढ़ चुका है क्रूड

अगस्त की शुरुआत के मुकाबले ब्रेंट क्रूड की कीमत 30 फीसदी चढ़ चुकी है। बताया जाता है कि सऊदी अरब में क्रूड का उत्पादन गिरकर इस साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है। इसकी वजह हूती विद्रोहियों की धमकी है, जिसमें कहा गया है कि वे सऊदी अरब के पश्चिमी बंदरगाहों से गुजरने वाले ऑयल टैंकर्स को निशाना बनाएंगे।

चीन की खरीदारी पर निर्भर करेगी कीमतें 

एनालिस्ट्स का कहना है कि मध्यपूर्व में टेंशन बढ़ने की वजह से ब्रेंट फिर से 100 डॉलर के पार हो गया है, लेकिन इसका इस लेवल पर टिके रहना चीन के रुख पर निर्भर करेगा। चीन दुनिया में क्रूड ऑयल का सबसे बड़ा इंपोर्टर है। उसने हाल के कुछ महीनों में क्रूड की खरीदारी बढ़ाई है। इसका असर क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ा है।

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क्रूड में उछाल भारत के लिए चिंता की बात

क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें भारत के लिए चिंता की बात है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी क्रूड ऑयल इंपोर्ट करता है। क्रूड महंगा होने का असर भारत के इंपोर्ट बिल पर पड़ता है। लंबे समय तक क्रूड की कीमतें हाई लेवल पर बने रहने पर ऑयल मार्केटिंग कंपनियां फिर पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा सकती हैं। साथ ही सीएनजी और पीएनजी के दाम भी बढ़ सकते हैं, जिसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ेगा।

सत्या निकेतन बिल्डिंग हादसा : 7 मौतों के बाद CJP की बड़ी मांग, दिल्ली के सभी PG का होगा सेफ्टी ऑडिट

सत्या निकेतन बिल्डिंग हादसा : 7 मौतों के बाद CJP की बड़ी मांग, दिल्ली के सभी PG का होगा सेफ्टी ऑडिट

दिल्ली के सत्या निकेतन इलाके में पांच मंजिला हॉस्टल की इमारत गिरने की दर्दनाक घटना के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने सरकार से राजनीतिक जवाबदेही तय करने और राजधानी के सभी पेइंग गेस्ट (PG) आवासों का व्यापक सेफ्टी ऑडिट कराने की मांग की है। हादसे में अब तक 7 लोगों की मौत की बात सामने आई है, जबकि कई लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका जताई गई थी।

 

CJP के संस्थापक और संयोजक अभिजीत दिपके ने हादसे पर दुख जताते हुए सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि छात्रों को अक्सर असुरक्षित और खतरनाक आवासों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जबकि सरकारी बुनियादी ढांचे और राजनीतिक प्रतिष्ठानों पर बड़े पैमाने पर खर्च किया जाता है। CJP ने हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये मुआवजा और घायलों को 20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की मांग की है।

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सत्या निकेतन हादसे पर CJP ने क्या कहा?

 

CJP की एक टीम संगठन के सह-प्रभारी और नॉर्थ जोन प्रमुख दीपक बालियान तथा राष्ट्रीय संयुक्त सचिव बालकृष्ण शुक्ला के नेतृत्व में घटनास्थल पर पहुंची। टीम ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास हादसे वाली जगह पर स्थानीय लोगों और आपातकालीन कर्मचारियों के साथ राहत एवं बचाव कार्य में सहयोग किया।

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CJP संस्थापक अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से छात्रों की सुरक्षा को लेकर सवाल किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने एक दिन पहले दिल्ली विश्वविद्यालय का दौरा किया था और अपने राजनीतिक भाषण में 'दिमागी नक्सल' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया, लेकिन शैक्षणिक बुनियादी ढांचे की स्थिति पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। दिपके ने कहा कि साउथ कैंपस में हॉस्टल की इमारत गिर गई और छात्रों के मलबे में फंसे होने की आशंका है। उन्होंने सवाल उठाया कि खराब और जर्जर बुनियादी ढांचे की कीमत छात्रों को आखिर कब तक चुकानी पड़ेगी?

 

उन्होंने छात्रों के लिए सुरक्षित क्लासरूम, हॉस्टल और बेहतर मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित करने की मांग की।

मलबे में दबे छात्रों को लेकर चिंता

 

हादसे में गिरी इमारत को उसके मालिकों द्वारा 'Hostel Daze' नाम दिया गया था। हादसे के बाद राहत एवं बचाव अभियान चलाया गया। CJP ने कहा कि उसके स्वयंसेवक घटनास्थल पर मौजूद रहेंगे और सभी छात्रों का पता चलने तक प्रभावित परिवारों की मदद और बचाव अभियान की निगरानी करेंगे।

 

संगठन ने दिल्ली में छात्र आवासों की निगरानी में नगर निगम की भूमिका की भी जांच कराने की मांग की है। इसके साथ ही राजधानी के सभी PG और हॉस्टल का तत्काल सुरक्षा ऑडिट कराने की मांग की गई है।

 

स्थानीय लोगों ने खुद शुरू किया था बचाव अभियान

 

घटनास्थल पर मौजूद CJP की टीम के मुताबिक, आपातकालीन सेवाओं के पहुंचने से पहले ही स्थानीय लोगों ने अपने स्तर पर मलबे में फंसे लोगों को निकालने की कोशिश शुरू कर दी थी। स्थानीय लोगों के अनुसार, इमारत में करीब 15 कमरे थे और प्रत्येक कमरे में दो से तीन छात्र रहते थे। बताया गया कि बेसमेंट में निर्माण या मरम्मत का काम भी चल रहा था।

 

अभिजीत दिपके ने कहा कि एक तरफ अलग-अलग राज्यों में भव्य बीजेपी भवन बनाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ छात्रों को असुरक्षित और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे में पढ़ने और रहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक इमारत का मामला नहीं है, बल्कि देश के युवाओं के भविष्य और उनकी सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।

 

  • सत्या निकेतन हादसे की निष्पक्ष और तेज जांच हो।
  • हादसे के लिए जिम्मेदारी तय की जाए।
  • मृतकों के परिजनों को 1 करोड़ रुपये मुआवजा दिया जाए।
  • घायलों को 20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता मिले।
  • दिल्ली के सभी PG और हॉस्टल का व्यापक सेफ्टी ऑडिट कराया जाए।
  • छात्र आवासों की निगरानी में लापरवाही की जांच हो।
  • PG और हॉस्टल में सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।

MBBS इंटर्न डॉक्टरों का उग्र प्रदर्शन, CM हाउस घेराव से पहले पुलिस ने चलाया वॉटर कैनन

MBBS इंटर्न डॉक्टरों का उग्र प्रदर्शन, CM हाउस घेराव से पहले पुलिस ने चलाया वॉटर कैनन

भोपाल में एमबीबीएस इंटर्न डॉक्टरों का आंदोलन सोमवार को उग्र हो गया। अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे इंटर्न डॉक्टर हमीदिया अस्पताल से मुख्यमंत्री निवास का घेराव करने के लिए निकले थे। इस दौरान पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोकने के लिए वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया। प्रदर्शनकारियों को रोकने के दौरान पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज के आरोप के बाद मामला और गरमा गया।

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जानकारी के अनुसार, बड़ी संख्या में इंटर्न डॉक्टर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। जब प्रदर्शनकारी हमीदिया अस्पताल से सीएम हाउस की ओर बढ़ने लगे तो पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की। इसके बाद मौके पर तनावपूर्ण स्थिति बन गई और प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए वॉटर कैनन चलाया गया।

 

पुलिस पर लाठीचार्ज का आरोप

 

इंटर्न डॉक्टरों ने आरोप लगाया कि वे शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने उनके साथ मारपीट की और लाठीचार्ज किया। पुलिस कार्रवाई के विरोध में कई इंटर्न डॉक्टर मौके पर ही धरने पर बैठ गए।

 

प्रदर्शनकारी इंटर्न डॉक्टरों ने सवाल उठाया कि शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज क्यों किया। उन्होंने इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

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30 हजार रुपये प्रतिमाह स्टाइपेंड की मांग

 

इंटर्न डॉक्टरों की प्रमुख मांगों में उनका प्रतिमाह स्टाइपेंड बढ़ाकर 30 हजार रुपये किए जाने की मांग शामिल है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनकी मांग राज्य स्तर से जुड़ी हुई है और सरकार को इस पर जल्द फैसला लेना चाहिए।

 

मौके पर पहुंचे भोपाल कलेक्टर

 

स्थिति को संभालने के लिए भोपाल कलेक्टर प्रियंक मिश्रा भी मौके पर पहुंचे। उन्होंने आंदोलन कर रहे इंटर्न डॉक्टरों से बातचीत की और उनकी मांगों को सुना। कलेक्टर ने कहा कि इंटर्न डॉक्टरों की मांग राज्य स्तरीय है और उनकी बात हेल्थ कमिश्नर तक पहुंचा दी गई है।

उन्होंने यह भी कहा कि शहर की कानून-व्यवस्था को बिगड़ने नहीं दिया जाएगा और जरूरत पड़ने पर प्रशासन सख्त कदम उठाने के लिए तैयार है। हालांकि, मौके पर मौजूद अधिकारियों की समझाइश के बावजूद इंटर्न डॉक्टरों का विरोध जारी रहा और पुलिस कार्रवाई के विरोध में वे धरने पर बैठे रहे। अब इस पूरे मामले में सरकार की ओर से इंटर्न डॉक्टरों की स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग पर क्या फैसला लिया जाता है और पुलिस कार्रवाई को लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।