₹4 लाख से कम सैलरी वाले सावधान! टैक्स तो नहीं लगेगा, पर ITR भरना है जरूरी; जानिए ये 6 कड़े नियम

ITR Filing Rules Below Exemption Limit: एसेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए बिना लेट फीस इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करने की अंतिम तिथि 31 जुलाई 2026 है जो बेहद करीब है। आयकर विभाग के अनुसार, अब तक 3 करोड़ से अधिक करदाता अपना ITR फाइल कर चुके हैं।

आमतौर पर माना जाता है कि नई टैक्स व्यवस्था के तहत ₹4 लाख और पुरानी टैक्स व्यवस्था के तहत ₹2.5 लाख से अधिक की सालाना कमाई पर ही आईटीआर भरना अनिवार्य होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी सालाना कमाई इस बेसिक छूट सीमा से कम होने के बावजूद भी आपको जेल या पेनल्टी से बचने के लिए ITR दाखिल करना पड़ सकता है?

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 139(1) के तहत ऐसे 6 विशेष नियम तय किए गए हैं, जिनके दायरे में आने पर आईटीआर भरना अनिवार्य हो जाता है। आइए इन्हें आसान भाषा में समझते हैं।

इन 6 स्थितियों में कम कमाई पर भी अनिवार्य है ITR भरना

अगर आपकी सालाना आय बेसिक छूट सीमा से कम है, फिर भी इनमें से कोई एक शर्त पूरी होने पर आपको ITR दाखिल करना ही होगा:

1- करंट अकाउंट में ₹1 करोड़ से ज्यादा का डिपॉजिट: अगर आपने वित्त वर्ष के दौरान अपने एक या एक से अधिक चालू खातों में ₹1 करोड़ या उससे अधिक की नकदी जमा की है।

2- विदेश यात्रा पर ₹2 लाख से अधिक का खर्च: अगर आपने अपने या किसी अन्य व्यक्ति के फॉरेन ट्रैवल जैसे- हवाई टिकट, टूर पैकेज आदि पर ₹2 लाख से ज्यादा खर्च किए हैं।

3- ₹1 लाख से ज्यादा का बिजली बिल: अगर पूरे साल में आपका बिजली बिल कुल मिलाकर ₹1 लाख से अधिक आया है।

4- TDS या TCS की सीमा पार होना: अगर वित्त वर्ष के दौरान आपका कुल TDS/TCS कटान ₹25,000 या उससे अधिक है (60 वर्ष से कम उम्र के लोगों के लिए)। वहीं, वरिष्ठ नागरिकों (60 वर्ष या उससे ऊपर) के लिए यह सीमा ₹50,000 रखी गई है।

5- सेविंग्स अकाउंट में ₹50 लाख या उससे अधिक जमा: अगर वित्त वर्ष में आपके एक या एक से अधिक बचत खातों में कुल ₹50 लाख या उससे ज्यादा जमा हुए हैं।

6- विदेशी संपत्ति या विदेशी बैंक खाते में साइनिंग अथॉरिटी: अगर आप भारत के निवासी हैं और विदेश में कोई संपत्ति, फाइनेंशियल शेयर या किसी विदेशी बैंक खाते का साइनिंग राइट रखते हैं।

कम कमाई के बावजूद ITR फाइल करने के 4 बड़े फायदे

भले ही कानूनन आपके लिए आईटीआर भरना अनिवार्य न हो, फिर भी वॉलंटरी रिटर्न दाखिल करने के कई बड़े फायदे मिलते हैं:

लोन मिलने में आसानी: होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन के आवेदन के दौरान ITR सबसे मजबूत ‘इनकम प्रूफ’ का काम करता है।

वीजा प्रोसेसिंग: कई देशों जैसे- अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपियन देश का वीजा हासिल करने के लिए पिछले 2-3 सालों का ITR जमा करना अनिवार्य होता है।

TDS रिफंड का दावा: अगर आपका टीडीएस कटा है, तो उसे वापस पाने के लिए रिटर्न भरना ही एकमात्र तरीका है।

नुकसान को आगे ले जाना: शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड या बिजनेस में हुए नुकसान को भविष्य के मुनाफे से सेट-ऑफ करने के लिए समय पर ITR फाइल करना जरूरी होता है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

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Financial Planning and Budgeting Tips: नौकरी में प्रमोशन होना, बंपर सैलरी हाइक मिलना या बिजनेस से होने वाली कमाई का बढ़ना हर किसी को एक सुखद अहसास देता है। इसे देखकर लगता है कि हमारे वित्तीय लक्ष्य बिल्कुल सही रास्ते पर हैं। इसके बावजूद, एक कड़वी हकीकत यह भी है कि समाज में ‘मोटी सैलरी’ कमाने वाले कई लोग भी महीने का अंत आते-आते पैसों की तंगी से जूझने लगते हैं।

असल में दिक्कत यह नहीं है कि वे हर महीने कितना कमा रहे हैं, बल्कि समस्या उस अंतर में है जो उनके बैंक खाते में आने वाले पैसे और चुपके से जेब से बाहर जाने वाले खर्चों के बीच होता है। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि आज के दौर में ‘अफोर्डेबिलिटी’ का मतलब केवल यह नहीं है कि आप आज कोई चीज खरीद सकते हैं या नहीं, बल्कि इसका मतलब यह है कि क्या आप अपनी बचत को नुकसान पहुंचाए या बिना कर्ज लिए उसे लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं।

आइए जानते हैं कुछ ऐसे प्रैक्टिकल बजटिंग टिप्स, जो आपकी अच्छी सैलरी को असल मायने में आपकी ‘आर्थिक सुरक्षा’ में बदल सकते हैं।

1. CTC के भ्रम से बाहर निकलें, ‘इन-हैंड सैलरी’ से बनाएं बजट

ज्यादातर लोग अपने सालाना कॉस्ट-टू-कंपनी (CTC) या ग्रॉस सैलरी के हिसाब से अपने खर्चों की प्लानिंग करने की गलती कर बैठते हैं। सीटीसी का आंकड़ा नौकरी बदलते समय या सैलरी नेगोशिएशन के दौरान तो बहुत काम आता है, लेकिन घर का बजट चलाने में इससे कोई मदद नहीं मिलती।

आपको हमेशा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि टैक्स (TDS), प्रोविडेंट फंड (PF) और अन्य कटौतियों के बाद हर महीने आपके बैंक अकाउंट में वास्तविक रूप से कितना पैसा क्रेडिट हो रहा है। अगर आप खाते में आने वाली रकम से बड़े आंकड़े पर अपना बजट तैयार करेंगे, तो महीने के आखिरी हफ्ते में निराशा ही हाथ लगेगी।

2. फिक्स्ड खर्चे बयां करते हैं आपके बजट का सच

अपने वित्तीय स्वास्थ्य को समझने का सबसे आसान तरीका यह है कि आप उन खर्चों की एक लिस्ट बनाएं जिन्हें आप किसी भी कीमत पर टाल नहीं सकते। इसमें आपके घर का किराया या होम लोन की EMI, बच्चों की स्कूल फीस, इंश्योरेंस प्रीमियम, कार लोन, राशन का खर्च और बिजली-पानी के यूटिलिटी बिल शामिल होते हैं।

इन अनिवार्य खर्चों को अलग करने के बाद जो रकम बचती है, वही आपके बजट की असली ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ तय करती है। इस एक्सरसाइज को करने के बाद बहुत से लोगों को यह देखकर हैरानी होती है कि अपनी मर्जी से खर्च करने के लिए उनके पास उतनी बड़ी रकम बची ही नहीं है, जितना वे मानकर चल रहे थे।

3. ‘लाइफस्टाइल अपग्रेड’ करने से पहले दो बार सोचें

सैलरी में बढ़ोतरी होते ही अक्सर लोग बड़े वित्तीय कमिटमेंट कर लेते हैं। जैसे ही आय बढ़ती है, एक बड़ा घर किराए पर लेना, महंगी कार खरीदना या हर वीकेंड पर महंगे रेस्टोरेंट में जाना बहुत आसान और किफायती लगने लगता है। इस बदलाव का सबसे बड़ा चैलेंज यह है कि ये लाइफस्टाइल अपग्रेड धीरे-धीरे आपके स्थायी फिक्स्ड खर्चों में बदल जाते हैं।

अगर भविष्य में कभी नौकरी में कोई बदलाव होता है, बिजनेस में मंदी आती है या किसी आपातकालीन स्थिति के कारण आपकी आय कम होती है, तो इन बढ़े हुए फिक्स्ड कमिटमेंट्स को संभालना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि फाइनेंशियल प्लानर्स हमेशा सैलरी हाइक मिलने के कम से कम 3 से 6 महीने बाद तक कोई बड़ा लाइफस्टाइल अपग्रेड न करने की सलाह देते हैं।

4. पहले बचत करें, फिर बचे हुए पैसों को खर्च करें

मिडिल क्लास और नौकरीपेशा लोगों में बजटिंग की सबसे आम गलती यह होती है कि वे महीने भर खुलकर खर्च करते हैं और सोचते हैं कि महीने के अंत में जो कुछ बचेगा, उसे बचा लेंगे। हकीकत में महीने के अंत तक बचने वाली यह रकम या तो बेहद मामूली होती है या फिर शून्य होती है।

वित्तीय सलाहकार हमेशा यह सुझाव देते हैं कि आपको अपनी बचत और निवेश (जैसे- म्यूचुअल फंड एसआईपी या पीपीएफ) को महीने के किसी अन्य जरूरी बिल की तरह देखना चाहिए। जैसे ही सैलरी अकाउंट में आए, सबसे पहले इमरजेंसी फंड, रिटायरमेंट या लॉन्ग टर्म गोल्स के लिए पैसे अलग कर दें। ऐसा करने से फिजूलखर्ची के चक्कर में आपकी बचत कभी नहीं छूटेगी।

5. अनचाहे खर्चों और आपातकाल के लिए रखें जगह

एक ऐसा बजट जो केवल तभी काम करता है जब सब कुछ आपकी प्लानिंग के मुताबिक चल रहा हो, असल में एक बेहद कमजोर बजट है। जिंदगी में कभी भी मेडिकल इमरजेंसी, घर या गाड़ी की अचानक मरम्मत, पारिवारिक संकट या कुछ समय के लिए नौकरी छूटने जैसी परिस्थितियां आ सकती हैं।

इसी वजह से एक मजबूत इमरजेंसी फंड का होना और खुद पर बहुत ज्यादा कर्ज (EMIs का बोझ) न लादना समझदारी की निशानी है। यही एक छोटी सी तैयारी एक सामान्य वित्तीय असुविधा और एक बड़े वित्तीय संकट के बीच का अंतर तय करती है।

कुल मिलाकर आपकी फाइनेंशियल सिक्योरिटी इस बात से तय नहीं होती कि आपकी सैलरी कितनी बड़ी है। यह इस बात से तय होती है कि क्या आप बिना क्रेडिट कार्ड या कर्ज के जाल में फंसे अपने सभी मासिक खर्चों को पूरा कर पा रहे हैं और भविष्य के लिए पर्याप्त बचत कर रहे हैं या नहीं। हर दो-तीन महीने में अपने खर्चों का रिव्यू करना आपको चौंकाने वाले नतीजे दे सकता है। कई बार फायदा ज्यादा कमाने से नहीं, बल्कि यह समझने से होता है कि आप उसे खर्च कैसे कर रहे हैं।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

ITR Filing 2026: ₹12.75 लाख तक सैलरी है, फिर भी देना पड़ सकता है टैक्स! जानिए क्यों

ITR Filing 2026: न्यू टैक्स रिजीम में कई नौकरीपेशा लोगों को लगता है कि अगर उनकी सालाना सैलरी ₹12.75 लाख तक है, तो उन्हें कोई इनकम टैक्स नहीं देना होगा। लेकिन हर मामले में ऐसा नहीं होता।

अगर आपकी कमाई का कुछ हिस्सा ऐसे स्रोतों से आया है, जिन पर अलग टैक्स दर लागू होती है, तो आपको टैक्स देना पड़ सकता है। भले ही आपकी सैलरी पर Section 87A के तहत टैक्स छूट मिल रही हो।

किन कमाई पर देना पड़ सकता है टैक्स?

Section 87A की छूट सिर्फ उस आय पर मिलती है, जिस पर सामान्य टैक्स स्लैब लागू होता है। लेकिन कुछ तरह की कमाई पर अलग नियम हैं। उन पर यह छूट नहीं मिलती। इनमें शामिल हैं…

  • शेयर बेचने पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन
  • लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन
  • लॉटरी से जीती रकम
  • घुड़दौड़ से कमाई
  • ऑनलाइन गेमिंग या फैंटेसी गेम्स से कमाई

यानी आपकी कुल आय ₹12.75 लाख से कम हो सकती है। फिर भी इन स्रोतों से कमाई हुई है, तो उस हिस्से पर टैक्स देना पड़ सकता है।

ऐसा क्यों होता है?

सरकार ने Section 87A की छूट सिर्फ सामान्य टैक्स स्लैब वाली आय के लिए दी है। जिन कमाई पर पहले से अलग टैक्स दर तय है, उन पर यह छूट लागू नहीं होती।

उदाहरण के लिए, अगर आपने ऑनलाइन गेमिंग या फैंटेसी स्पोर्ट्स से पैसे जीते हैं, तो उस कमाई पर 30% की फ्लैट टैक्स दर लगती है। गेमिंग प्लेटफॉर्म TDS भी काटते हैं। ऐसे में Section 87A का फायदा नहीं मिलेगा।

ITR भरते समय ये गलती न करें

  • अगर आपकी ऐसी कोई कमाई है, तो उसे ITR में जरूर दिखाएं।
  • कैपिटल गेन को सही तरह शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म में दर्ज करें।
  • खरीद और बिक्री की पूरी जानकारी भरें।
  • AIS और Form 26AS से आंकड़ों का मिलान करें।
  • लॉटरी, घुड़दौड़ और ऑनलाइन गेमिंग से हुई कमाई भी जरूर बताएं।
  • सिर्फ इसलिए पूरी आय को टैक्स-फ्री न मान लें कि आपकी सैलरी ₹12.75 लाख से कम है।

अगर आपने ऐसी आय छिपाई या गलत जानकारी दी, तो बाद में इनकम टैक्स विभाग की तरफ से टैक्स डिमांड या नोटिस आ सकता है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

8th Pay Commission के तहत सीनियर कंसल्टेंट से यंग प्रोफेशनल बनने का मौका, 1.8 लाख तक सैलरी! फुल डिटेल जानिए

8th Pay Commission Job and Salary details: केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन, भत्तों और पेंशन ढांचे की समीक्षा और उसमें बदलाव की सिफारिशें करने के लिए गठित आठवें केंद्रीय वेतन आयोग के साथ काम करने का एक शानदार मौका है। 8वें वेतन आयोग ने कंसल्टेंट पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मंगाए हैं। इसकी लास्ट डेट नजदीक आ रही है। आपको बता दें कि इस भर्ती के लिए इच्छुक और योग्य प्रोफेशनल्स के पास आवेदन करने के लिए 31 अगस्त तक का समय है।

हमारे सहयोगी ‘सीएनबीसी टीवी 18’ की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने सबसे पहले 10 अप्रैल को अधिसूचना जारी कर तीन अलग-अलग कैटेगिरी में कांट्रैक्ट के आधार पर आवेदन मांगे थे। आयोग सैलरी स्ट्रक्चर, मुआवजा, लीगल रीसर्च, डेटा विश्लेषण और पॉलिसी से जुड़ी स्टडी जैसे काम के लिए सीनियर कंसल्टेंट, कंसल्टेंट और यंग प्रोफेशनल्स की हायरिंग कर रहा है। आइए इस भर्ती से जुड़ी वैकेंसी, योग्यता, सैलरी और काम के स्वरूप की पूरी डिटेल विस्तार से जानते हैं:-

वैकेंसी की पूरी डिटेल (उम्र सीमा और अनुभव)

रिपोर्ट के मुताबिक इन वैकेंसी के लिए एज और एक्सपीरिंस को कैलकुलेट करने के लिए कट-ऑफ डेट 1 अप्रैल 2026 तय की गई है। इस भर्ती के तहत सीनियर कंसल्टेंट के लिए अधिकतम 5 पद निकाले गए हैं। इसके लिए ऊपरी आयु सीमा 45 वर्ष और न्यूनतम रेलेवेंट एक्सपीरियंस 10 वर्ष होना चाहिए।

इसी तरह कंसल्टेंट पद के लिए भी अधिकतम 5 वैकेंसियां हैं। इसमें आवेदन करने की ऊपरी आयु सीमा 40 वर्ष और न्यूनतम प्रासंगिक अनुभव 6 वर्ष निर्धारित किया गया है। यंग प्रोफेशनल के लिए सबसे ज्यादा यानी मैक्सिमम 10 पद हैं। इसके लिए उम्मीदवारों की ऊपरी आयु सीमा 32 वर्ष और न्यूनतम प्रासंगिक अनुभव 4 वर्ष होना जरूरी है।

क्या योग्यता है जरूरी?

आवेदकों के पास नीचे दी गई योग्यताओं में से कोई एक योग्यता होनी चाहिए:-

फाइनेंस, ह्यूमन रिसोर्सेज, इंडस्ट्रियल रिलेशंस या इससे जुड़े विषयों में मास्टर्स डिग्री या MBA, या

LL।B डिग्री के साथ बार काउंसिल/बार एसोसिएशन में क्रेडेंशियल होना चाहिए और ट्रिब्यूनल या अदालतों के समक्ष लीगल रीसर्च या सर्विस मैटर में प्रासंगिक अनुभव होना चाहिए।

अनिवार्य योग्यता: सभी कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए एक्सेल, स्प्रेडशीट और प्रेजेंटेशन टूल्स का ज्ञान होना अनिवार्य है। जिन उम्मीदवारों के पास वेतन, मुआवजा या स्टैबिलिशमेंट से जुड़े मामलों का अनुभव है उन्हें चयन में वरीयता दी जाएगी।

सैलरी और कार्यकाल

ये नियुक्तियां पूरी तरह से कांट्रैक्ट बेसिस पर होंगी। ये शुरुआत में एक साल या वेतन आयोग के कार्यकाल तक (जो भी पहले हो) के लिए की जाएंगी। प्रदर्शन के आधार पर कार्यकाल को आगे बढ़ाया भी जा सकता है।

पदों के हिसाब से तय मासिक मानदेय इस प्रकार है:-

सीनियर कंसल्टेंट: फुल-टाइम के लिए ₹1.8 लाख, 12 दिनों के पार्ट-टाइम के लिए ₹90000 और 6 दिनों के पार्ट-टाइम के लिए ₹45000

कंसल्टेंट: फुल-टाइम के लिए ₹1.2 लाख, 12 दिनों के पार्ट-टाइम के लिए ₹60000 और 6 दिनों के पार्ट-टाइम के लिए ₹30000

यंग प्रोफेशनल: फुल-टाइम के लिए ₹90000, 12 दिनों के पार्ट-टाइम के लिए ₹45000 और 6 दिनों के पार्ट-टाइम के लिए ₹22500

इस सैलरी में से इनकम टैक्स और अन्य लागू कटौतियां (TDS) की जाएंगी।

चयनित कंसल्टेंट्स को क्या काम करना होगा?

ऑफिशियल गाइडलाइंस के मुताबिक चुने गए प्रोफेशनल्स को आयोग के साथ नीचे दिए गए काम करने होंगे:-

मौजूदा वेतन, भत्तों, पेंशन और उपलब्ध परिलब्धियों के ढांचे का विश्लेषण करना।

वेतन और मुआवजे के ट्रेंड्स की पहचान करने के लिए डेटा, रिपोर्ट्स और सर्वे का अध्ययन करना।

आयोग के अधिकार क्षेत्र से जुड़े मामलों पर लीगल रीसर्च करना।

डेटा इकट्ठा करने के लिए केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों के साथ समन्वय करना।

मानव संसाधन, मुआवजा, ग्रेच्युटी और बोनस तंत्र पर विशेष अध्ययनों में सहायता प्रदान करना।

आयोग को प्राप्त होने वाले ज्ञापनों और प्रतिवेदनों का विश्लेषण करना।

आयोग की सिफारिशों से पड़ने वाले राजकोषीय प्रभाव का अनुमान लगाना।

रिपोर्ट्स, प्रेजेंटेशन और अन्य विश्लेषणात्मक सामग्री तैयार करना।

आवेदन कैसे करें?

इच्छुक उम्मीदवारों को 8वें केंद्रीय वेतन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध लिंक के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन सबमिट करना होगा। आयोग ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि किसी भी प्रकार के फिजिकल या हार्ड-कॉपी आवेदनों को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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ITR 2026: सैलरी स्लैब के हिसाब से न्यू टैक्स रिजीम में सीधे बचा सकते हैं करीब 1.5 लाख रुपये का टैक्स! ये रहा पूरा कैलकुलेशन

Income Tax Return 2026: हर साल जब इनकम टैक्स रिटर्न यानी ITR फाइल करने का सीजन शुरू होता है तो टैक्स पेयर्स के सामने सबसे पहला और बड़ा सवाल यही होता है कि ओल्ड टैक्स रिजीम को चुनें या न्यू टैक्स रिजीम के साथ जाएं। हर कोई अपने हिसाब से टैक्स की देनदारी को कैलकुलेट कर रहा हैं। लेकिन कुछ थंब रूल ऐसे सामने आए हैं जो टैक्स की देनदारी का मामला काफी हद तक साफ कर दे रहे हैं। पर इंडिविजुअल टैक्स पेयर्स को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सैलरी पर्सन टू पर्सन वैरी करती है और कोई एक रूल आपकी टैक्स देनदारी का पूरा असल खाका नहीं खींच सकता।

इसके लिए आपको एक्सपर्ट अडवाइस की हमेशा जरूरत पड़ती है। एक बात और ध्यान देने वाली है कि अब न्यू टैक्स रिजीम डिफॉल्ट विकल्प है। यानी अगर आप आईटीआर फाइल करते समय कोई विकल्प नहीं चुनते हैं तो आपका रिटर्न अपने आप न्यू टैक्स रिजीम के तहत प्रोसेस किया जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एक्टिव रूप से ओल्ड टैक्स रिजीम को चुनना अब भी फायदेमंद है? इसके पीछे के गणित को समझने की कोशिश करते हैं।

क्या कहता है टैक्स का गणित?

ग्रांट थॉर्नटन भारत (Grant Thornton Bharat) द्वारा वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए की गई एक तुलनात्मक गणना के मुताबिक न्यू टैक्स रिजीम कई सैलरी स्लैब में भारी बचत दे रही है। इस कैलकुलेशन में 60 वर्ष से कम उम्र के एक ऐसे सैलरडी पर्सन को आधार बनाया गया है जो ओल्ड रिजीम के तहत कुल 4.25 लाख रुपये के डिडक्शन (छूट) का दावा करता है। इसमें नीचे दिए गए डिडक्शन शामिल हैं:-

धारा 80C के तहत: 150000 रुपये (1961 के अधिनियम की धारा 80C / 2025 के अधिनियम की धारा 123)

धारा 80D के तहत: 25000 रुपये (1961 के अधिनियम की धारा 80D / 2025 के अधिनियम की धारा 126)

HRA (हाउस रेंट अलाउंस): 200000 रुपये

स्टैंडर्ड डिडक्शन (Standard Deduction): 50000 रुपये

इसके मुकाबले न्यू टैक्स रिजीम में केवल 75000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन शामिल किया गया है। इस गणना में लागू सरचार्ज और 4% हेल्थ एंड एजुकेशन सेस को भी जोड़ा गया है।

विभिन्न सैलरी लेवल पर टैक्स लायबिलिटी

25 लाख रुपये की सैलरी पर: ओल्ड टैक्स रिजीम के तहत 452400 रुपये का टैक्स बनता है जबकि न्यू टैक्स रिजीम में यह बिल सिर्फ 319800 रुपये आता है। यानी न्यू टैक्स रिजीम चुनने पर सीधे 132600 रुपये की बचत होती है।

50 लाख रुपये की सैलरी पर: यहां भी दोनों रिजीम के टैक्स का अंतर 132600 रुपये ही रहता है और न्यू टैक्स रिजीम जीतती है।

75 लाख और 1 करोड़ रुपये की सैलरी पर: इस लेवल पर 10 फीसदी का सरचार्ज भी लागू हो जाता है। इसके बावजूद न्यू टैक्स रिजीम में टैक्सपेयर्स को करीब 1.46 लाख रुपये की सीधी बचत मिलती है।

तो क्या ओल्ड टैक्स रिजीम पूरी तरह खत्म हो चुकी है?

ऐसा सभी टैक्स पेयर्स के केस में नहीं कहा जा सकता। ओल्ड टैक्स रिजीम न्यू टैक्स रिजीम को केवल तभी टक्कर दे पाती है जब आपके डिडक्शंस (कटौतियां) इस सामान्य बास्केट से काफी ज्यादा हों। अगर आपके पास बड़े डिडक्शंस हैं जैसे:-

  • धारा 24(b) के तहत होम लोन के ब्याज पर 2 लाख रुपये तक की छूट।
  • मेट्रो शहरों में रहने के कारण मिलने वाला ज्यादा HRA
  • धारा 80CCD(1B) के तहत NPS (नेशनल पेंशन सिस्टम) में योगदान।
  • सीनियर सिटीजन माता-पिता के लिए चुकाया गया बड़ा 80D हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम।

अदर आप इन सभी को मिला देते हैं और आपका कुल डिडक्शन ब्रेक-ईवन थ्रेशोल्ड को पार कर जाता है तो ओल्ड रिजीम बेहतर हो सकती है। मौजूदा स्लैब के तहत अधिकांश इनकम लेवल के लिए यह ब्रेक-ईवन पॉइंट करीब 8 लाख रुपये के कुल डिडक्शन पर बैठता है। यानी भारी होम लोन और फुल HRA क्लेम करने वाला व्यक्ति इस लिमिट तक पहुंच सकता है लेकिन जो व्यक्ति सिर्फ 80C और एक सामान्य हेल्थ पॉलिसी के भरोसे है वह न्यू रिजीम का मुकाबला नहीं कर पाएगा।

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ग्रांट थॉर्नटन भारत की टैक्स पार्टनर ऋचा साहनी का कहना है कि पुराने और नए टैक्स रिजीम के बीच चयन कोई ऐसा फैसला नहीं है जो हर किसी पर फिट बैठे। हालांकि न्यू रिजीम कम टैक्स रेट्स और अधिक सरलता की पेशकश करती है लेकिन ओल्ड रिजीम उन खास कैटेगरी के टैक्सपेयर्स के लिए बेहतर परिणाम दे सकती है जो बड़े पैमाने पर डिडक्शंस और एग्जेंप्शन (छूट) का लाभ उठाते हैं। इसलिए टैक्सपेयर्स को केवल हेडलाइन टैक्स रेट्स पर भरोसा करने के बजाय अपना फैसला लेने से पहले एक पर्सनलाइज्ड टैक्स कैलकुलेशन जरूर करनी चाहिए।

सालाना रिजीम बदलने की फ्लेक्सिबिलिटी

सैलरीड करदाताओं के लिए एक अच्छी बात यह है कि वे किसी एक रिजीम में लॉक नहीं होते हैं। ऋचा साहनी के मुताबिक, सैलरीड टैक्सपेयर्स के पास हर साल दोनों रिजीम के बीच चयन करने की फ्लेक्सिबिलिटी होती है। वे अपनी इनकम प्रोफाइल, डिडक्शंस और एग्जेंप्शंस के आधार पर सालाना अपनी स्थिति का मूल्यांकन कर सकते हैं और जो अधिक फायदेमंद हो, उसे चुन सकते हैं।

इस सालाना बदलाव का व्यावहारिक महत्व भी है। आपके एम्प्लॉयर (कंपनी) ने TDS काटने के लिए किस रिजीम का इस्तेमाल किया था उससे आपका आईटीआर बाउंड नहीं होता है। अगर कंपनी ने न्यू टैक्स रिजीम के हिसाब से टीडीएस काटा है लेकिन कैलकुलेशन के बाद आपके लिए ओल्ड रिजीम ज्यादा फायदेमंद निकलती है तो आप आईटीआर फाइल करते समय ओल्ड रिजीम चुन सकते हैं और बची हुई रकम को रिफंड के रूप में क्लेम कर सकते हैं।

बिजनेस या प्रोफेशनल इनकम वाले टैक्सपेयर्स को ओल्ड रिजीम में वापस जाने का केवल एक ही मौका (Form 10-IEA के जरिए) मिलता है, इसलिए उन्हें अपना विकल्प चुनते समय अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

फाइल करने से पहले क्या करें?

रिटर्न दाखिल करने से पहले इनकम टैक्स पोर्टल पर मौजूद कैलकुलेटर का इस्तेमाल करें, जिसमें मुश्किल से 10 मिनट का समय लगता है। थंब रूल यह है कि अगर आपके डिडक्शंस कम हैं तो बिना किसी उलझन के न्यू टैक्स रिजीम चुनें और यदि डिडक्शंस ज्यादा हैं तो दोनों रिजीम में टैक्स कैलकुलेट करके तुलना कर लें। चूंकि ये दोनों रिजीम आने वाले भविष्य में एक साथ रहेंगी, इसलिए यह कोई वन-टाइम फैसला नहीं है बल्कि इसे अपनी सालाना आदत बना लें।

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ITR Refund: ई-वेरिफिकेशन में देरी होने पर भी मिलेगा रिफंड, ITAT के फैसले से टैक्सपेयर्स को बड़ी राहत

ITR Refund: कई टैक्सपेयर समय पर इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करते हैं, लेकिन ई-वेरिफिकेशन में देरी कर देते हैं। इसके बाद भी रिफंड मिल सकता है, लेकिन इसके लिए एक शर्त है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को ई-वेरिफिकेशन में हुई देरी माफ (Condone) करनी होगी।

हाल ही में दिल्ली आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने टैक्सपेयर्स के पक्ष में अहम फैसला दिया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि अगर सेंट्रल प्रोसेसिंग सेंटर (CPC) देरी माफ कर चुका है, तो सिर्फ इसी तकनीकी वजह से रिफंड नहीं रोका जा सकता।

ITAT ने कहा कि अगर किसी टैक्सपेयर पर कोई टैक्स बकाया नहीं है, तो उसका पैसा रोककर रखना संविधान के अनुच्छेद 265 के खिलाफ होगा। इस अनुच्छेद के मुताबिक, कानून की अनुमति के बिना न कोई टैक्स लगाया जा सकता है और न ही वसूला जा सकता है।

आखिर क्या था पूरा मामला?

यह मामला दिल्ली के एक टैक्सपेयर से जुड़ा है। उन्होंने आकलन वर्ष 2015-16 के लिए 3 सितंबर 2015 को धारा 139(1) के तहत समय पर ITR दाखिल किया था।

उन्होंने चालू साल के नुकसान, अनएब्जॉर्ब्ड डेप्रिसिएशन और पिछले सालों के नुकसान का सेट-ऑफ लिया। इसके बाद उनकी टैक्स योग्य आय शून्य (Nil) रही। टैक्सपेयर ने करीब 17.08 लाख रुपये के रिफंड का दावा भी किया। यह रकम मुख्य तौर पर किराये की आय पर कटे TDS की थी। लेकिन वह तय समय के भीतर ITR का ई-वेरिफिकेशन नहीं कर पाए।

टैक्सपेयर ने ट्रिब्यूनल को बताया कि उनके 83 साल के पिता गंभीर रूप से बीमार थे। उन्हें बार-बार अस्पताल ले जाना पड़ रहा था। इसी वजह से समय पर ई-वेरिफिकेशन नहीं हो सका। बाद में उन्होंने CPC के पास देरी माफ करने की अर्जी दी। CPC ने इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद 16 फरवरी 2018 को ITR का ई-वेरिफिकेशन पूरा किया गया। इसके बावजूद आयकर विभाग ने धारा 143(1) के तहत रिटर्न प्रोसेस नहीं किया। रिफंड भी जारी नहीं हुआ।

टैक्सपेयर ने इसके बाद धारा 154 के तहत रेक्टिफिकेशन की अर्जी दी। लेकिन असेसिंग ऑफिसर ने इसे खारिज कर दिया। बाद में पहली अपीलीय प्राधिकरण ने भी यही फैसला बरकरार रखा। इसके बाद टैक्सपेयर ITAT पहुंचा।

ITAT ने क्या कहा?

दिल्ली ITAT ने टैक्सपेयर की अपील स्वीकार कर ली। ट्रिब्यूनल ने कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि किराये की आय पर TDS काटा गया था। इसका रिकॉर्ड भी आयकर विभाग के पास मौजूद था। ITAT ने कहा कि CPC पहले ही ई-वेरिफिकेशन में हुई देरी माफ कर चुका था। ऐसे में आयकर विभाग उसी वजह से रिफंड रोक नहीं सकता।

ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि जब किसी टैक्सपेयर पर कोई टैक्स बकाया नहीं है, तब उसका पैसा रोककर रखना सरकार के अनुचित लाभ (Unjust Enrichment) के बराबर होगा।

ITAT ने संविधान के अनुच्छेद 265 का हवाला भी दिया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि कानून की अनुमति के बिना कोई टैक्स नहीं वसूला जा सकता। सिर्फ तकनीकी आधार पर TDS की रकम रोकना इस संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ है।

इसी आधार पर ITAT ने निचली अथॉरिटी के आदेश रद्द कर दिए। साथ ही, असेसिंग ऑफिसर और CPC को कानून के मुताबिक रिफंड जारी करने के लिए जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया।

इस फैसले का क्या मतलब है?

ITAT ने साफ किया कि इस मामले में सिर्फ इसलिए रिफंड नहीं रोका जा सकता क्योंकि ITR का ई-वेरिफिकेशन तय समय के बाद हुआ था। खास बात यह है कि CPC पहले ही उस देरी को माफ कर चुका था।

ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि TDS की रकम विभाग के रिकॉर्ड में मौजूद थी। नुकसान का सेट-ऑफ करने के बाद टैक्सपेयर पर कोई टैक्स भी बकाया नहीं था।

ITAT ने कहा कि एक बार देरी माफ हो जाने के बाद उसी तकनीकी आधार पर रिफंड रोकना गलत है। ऐसा करना सरकार के अनुचित लाभ के बराबर होगा। यह संविधान के अनुच्छेद 265 की भावना के भी खिलाफ है।

हालांकि, ट्रिब्यूनल ने यह भी साफ किया कि यह फैसला इसी मामले के तथ्यों के आधार पर दिया गया है। यहां टैक्सपेयर ने ITR समय पर दाखिल किया था। साथ ही, ई-वेरिफिकेशन में हुई देरी को CPC पहले ही माफ कर चुका था।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

₹4000 तक बढ़ेगी टेक-होम सैलरी, लेकिन रिटायरमेंट पर होगा ₹80 लाख का भारी नुकसान! एक्सपर्ट से समझिए नए EPF नियम का पूरा गणित

New EPF Rules Take Home Salary vs Retirement: नए लेबर कोड के तहत मिलने वाली फ्लैक्सिबिलिटी के कारण अब कई कंपनियों में कर्मचारियों को भविष्य निधि (EPF) में अपना योगदान घटाकर न्यूनतम वैधानिक सीमा पर लाने का विकल्प मिल सकता है। ऐसा करने से आपकी हर महीने हाथ में आने वाली सैलरी तो तुरंत बढ़ जाएगी, लेकिन वित्तीय सलाहकारों का कहना है कि यह तात्कालिक खुशी आपके रिटायरमेंट के बड़े फंड को भारी चपत लगा सकती है।

यह फैसला पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप हर महीने बचने वाले एक्स्ट्रा पैसे का क्या करेंगे? उसे अनुशासन के साथ सही जगह निवेश करेंगे या सिर्फ खर्च कर देंगे? आइए एक्सपर्ट्स के हवाले से समझते हैं कि पीएफ में कटौती करने का यह नया नियम क्या है और इसके दूरगामी वित्तीय परिणाम क्या हो सकते हैं।

क्या बदल गया है ईपीएफ का नया फ्रेमवर्क?

टैक्सस्पैनर(Taxspanner) के को-फाउंडर और सीईओ सुधीर कौशिक के मुताबिक, ईपीएफ योगदान का मूल सिद्धांत अभी भी 12 प्रतिशत ही है, लेकिन असली पेंच उस ‘वेतन आधार’ का है जिस पर यह 12% लागू होता है।

पहले का नियम: कई कंपनियां या तो वास्तविक बेसिक सैलरी पर 12% पीएफ काटती थीं या इसे ₹15000 प्रति माह की वैधानिक सीमा पर सीमित रखती थीं, जिससे न्यूनतम अनिवार्य पीएफ योगदान ₹1800 प्रति माह होता था।

नया नियम: नए लेबर कोड के तहत, केवल वैधानिक वेतन सीमा (₹15000) तक ही 12% का अनिवार्य योगदान लागू रहेगा। इस सीमा से अधिक वेतन पर पीएफ काटना पूरी तरह स्वैच्छिक होगा, जो कंपनी और कर्मचारी की आपसी सहमति पर निर्भर करेगा।

इसका मतलब है कि अगर आप वर्तमान में अपनी पूरी बेसिक सैलरी पर अधिक पीएफ कटवा रहे हैं, तो आप और आपकी कंपनी आपसी सहमति से इसे घटाकर केवल अनिवार्य ₹1800 प्रति माह के स्तर पर ला सकते हैं। इससे आपकी मंथली टेक-होम सैलरी तो बढ़ जाएगी, लेकिन रिटायरमेंट फंड छोटा हो जाएगा।

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किन्हें पीएफ योगदान घटाने की गलती ‘बिल्कुल नहीं’ करनी चाहिए?

प्रोमोर फिनटेक की को-फाउंडर और डायरेक्टर निशा संघवी के अनुसार, यह विकल्प ज्यादातर नौकरीपेशा लोगों के लिए सही नहीं है। इन 5 तरह के लोगों को पीएफ कम करने से बचना चाहिए:

जिनकी मुख्य बचत सिर्फ ईपीएफ है: अधिकांश वेतनभोगियों के लिए पीएफ ही एकमात्र ऐसी बचत है जो हर महीने ऑटोमैटिक होती है। बिना निवेश अनुशासन के, हाथ में आने वाला एक्स्ट्रा पैसा सिर्फ खर्चों में उड़ जाएगा।

कंपनी का मैचिंग कॉन्ट्रिब्यूशन खोने का डर: अगर कंपनी आपकी पूरी बेसिक सैलरी पर 12% योगदान दे रही है और आपने अपना स्वैच्छिक हिस्सा घटा लिया, तो मुमकिन है कि कंपनी भी वैधानिक सीमा से ऊपर अपना योगदान बंद कर दे। यानी आप कंपनी की तरफ से मिलने वाला फ्री रिटायरमेंट बेनिफिट खो देंगे।

40 और 50 की उम्र वाले कर्मचारी: जिनके पास नौकरी के कम साल बचे हैं, उन्हें कंपाउंडिंग का फायदा कम मिलता है। इसलिए योगदान घटाने से उनके रिटायरमेंट फंड पर बहुत बड़ा और बुरा असर पड़ेगा।

रूढ़िवादी या सेफ इन्वेस्टर्स: वित्तीय वर्ष 2026 के लिए ईपीएफ 8.25% की सरकारी गारंटीड ब्याज दर दे रहा है, जो पूरी तरह टैक्स-फ्री है। इतनी सुरक्षा के साथ इतना बढ़िया रिटर्न किसी अन्य फिक्स्ड-इनकम प्रोडक्ट में मिलना नामुमकिन है।

टेक-होम सैलरी बढ़ाने का लॉन्ग-टर्म नुकसान

एक्सपर्ट निशा संघवी ने एक आसान उदाहरण से इसके वित्तीय नुकसान को समझाया है:

मान लीजिए किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी ₹50000 है। अभी 12% के हिसाब से उसका पीएफ योगदान ₹6000 प्रति माह जाता है।

नए नियमों के तहत अगर वह न्यूनतम अनिवार्य सीमा चुनता है, तो उसका पीएफ केवल ₹1800 कटेगा, जिससे उसकी टेक-होम सैलरी में हर महीने ₹4200 बढ़ जाएंगे।

कंपाउंडिंग का नुकसान: अगर यह ₹4200 पीएफ खाते में ही रहते और 8.25% की दर से बढ़ते, तो 25 सालों में यह रकम करीब ₹41 से ₹42 लाख बन जाती।

डबल झटका: अगर आपकी देखा-देखी आपकी कंपनी ने भी एक्स्ट्रा हिस्से पर अपना मैचिंग कॉन्ट्रिब्यूशन बंद कर दिया, तो आपके रिटायरमेंट कॉर्पस में सीधे ₹80 लाख से ज्यादा का बड़ा नुकसान होगा।

इसके अलावा, जो एक्स्ट्रा पैसा आपकी टेक-होम सैलरी में जुड़ेगा, वह आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से पूरी तरह टैक्स के दायरे में आएगा, जबकि पीएफ में रहने पर यह टैक्स-फ्री कंपाउंड होता। यहां आपको बता दें कि सालाना ₹2.5 लाख से अधिक के कर्मचारी योगदान के ब्याज पर ही टैक्स लगता है।

किन्हें चुनना चाहिए कम पीएफ का विकल्प?

यह विकल्प केवल दो ही परिस्थितियों में फायदेमंद हो सकता है:

महंगे लोन चुकाने के लिए: अगर आप 12 से 14 प्रतिशत की भारी ब्याज दर वाला पर्सनल या क्रेडिट कार्ड लोन चुका रहे हैं, तो पीएफ घटाकर लोन का प्री-पेमेंट करना 8.25% के पीएफ रिटर्न से बेहतर परिणाम देगा।

अनुशासित इक्विटी निवेशक: जो लोग हाथ में आने वाले इस अतिरिक्त पैसे को बिना चूके हर महीने लंबी अवधि के लिए इक्विटी म्यूचुअल फंड में डाइवर्ट करने का पक्का अनुशासन रखते हैं।

एक्सपर्ट की सलाह है कि कोई भी फैसला लेने से पहले अपनी कंपनी की ईपीएफ पॉलिसी जांचें। अगर अतिरिक्त पैसा केवल रोजमर्रा के सामान्य खर्चों या लाइफस्टाइल को अपग्रेड करने में जाने वाला है, तो पीएफ योगदान को बिल्कुल न छुएं। आज की थोड़ी सी नकदी का आराम, कल के बुढ़ापे के बड़े फंड को दांव पर लगाने जैसा है।

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल पर विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त किए गए विचार और निवेश टिप्स उनके अपने हैं, वेबसाइट या उसके प्रबंधन के नहीं। मनीकंट्रोल यूजर्स को सलाह देता है कि वे कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट्स से जांच कर लें।

Income Tax Return: अगर आपके फॉर्म 16 में टैक्स जीरो है तो भी न करें ये भूल! इन 4 बड़े फायदों के लिए जरूर फाइल करें ITR

नौकरीपेशा लोगों के बीच अक्सर यह आम धारणा होती है कि अगर उनके फॉर्म 16 में कोई टैक्स नहीं कटा है या फिर कोई टैक्स देनदारी नहीं बनती है तो उन्हें इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने की कोई जरूरत नहीं है। टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक फॉर्म 16 में टैक्स लायबिलिटी निल होने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको आईटीआर दाखिल करने से छूट मिल गई है। ऐसा न करना आपको भारी पड़ सकता है।

फॉर्म 16 नहीं है आपकी वित्तीय स्थिति की पूरी तस्वीर

King Stubb & Kasiva, Advocates and Attorneys के पार्टनर आदित्य भट्टाचार्य का कहना है कि एक आम गलतफहमी यह है कि अगर फॉर्म 16 में कोई टीडीएस या देय टैक्स नहीं है तो आईटीआर फाइल करने की जरूरत नहीं है। हालांकि, फॉर्म 16 सिर्फ इंप्लॉयर द्वारा भुगतान किए गए वेतन और काटे गए टैक्स (अगर कोई है तो) का एक रिकॉर्ड है। यह किसी व्यक्ति की पूरी वित्तीय तस्वीर को नहीं दर्शाता है। आईटीआर फाइल करने की अनिवार्यता इनकम टैक्स एक्ट के प्रावधानों, आपकी कुल आय और वित्तीय वर्ष के दौरान किए गए वित्तीय लेनदेन पर निर्भर करती है।

इन 4 बड़े फायदों के लिए जरूर फाइल करें ITR

भले ही आपके फॉर्म 16 में टैक्स जीरो दिख रहा हो लेकिन नीचे दी गई स्थितियों और फायदों के लिए आपको आईटीआर जरूर दाखिल करना चाहिए-

1- टैक्स रिफंड का दावा करने के लिए

कई बार ऐसा होता है कि बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के ब्याज पर टीडीएस काट लेते हैं या फिर नौकरी बदलने की स्थिति में पिछला इंप्लॉयर नौकरी छोड़ने से पहले टैक्स काट लेता है। भले ही वित्तीय वर्ष के अंत में आपकी कुल अंतिम टैक्स देनदारी शून्य ही क्यों न हो, लेकिन इस कटे हुए एक्स्ट्रा टैक्स को वापस पाने का एकमात्र जरिया आईटीआर है। बिना रिटर्न फाइल किए आप रिफंड क्लेम नहीं कर सकते।

2- वित्तीय घाटे को आगे बढ़ाने के लिए

अगर आप शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड या प्रॉपर्टी से कोई कैपिटल लॉस उठाते हैं तो नियमों के तहत आप इस घाटे को भविष्य के मुनाफे के साथ एडजस्ट कर सकते हैं। यह लाभ आपको तभी मिलेगा जब आप निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना आईटीआर दाखिल करेंगे। डेडलाइन चूकने का मतलब है कि आप इस मूल्यवान टैक्स लाभ को हमेशा के लिए खो देंगे।

3- इन विशेष सरकारी शर्तों/नियमों को पूरा करने के लिए

टैक्स एक्सपर्ट्स के अनुसार भले ही आपका अंतिम टैक्स शून्य हो लेकिन अगर आप वित्तीय वर्ष में निम्नलिखित में से किसी भी शर्त के दायरे में आते हैं तो आपके लिए आईटीआर फाइल करना कानूनी रूप से अनिवार्य हो जाता है:

  • एक या अधिक सेविंग्स बैंक अकाउंट्स में 50 लाख रुपये से अधिक जमा करना।
  • एक या अधिक करंट अकाउंट्स (चालू खातों) में 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक जमा करना।
  • अपने या किसी अन्य व्यक्ति के लिए विदेश यात्रा पर 2 लाख रुपये से अधिक खर्च करना।
  • एक वित्तीय वर्ष में 1 लाख रुपये से अधिक का बिजली बिल चुकाना।
  • अगर आप भारत के निवासी हैं और विदेशों में संपत्ति रखते हैं, किसी विदेशी संस्था में वित्तीय हित रखते हैं, विदेशी बैंक खाते में हस्ताक्षर करने का अधिकार रखते हैं या विदेशी संपत्तियों के लाभार्थी हैं।
  • वर्ष के दौरान कुल टीडीएस (TDS) या टीसीएस (TCS) 25000 रुपये या उससे अधिक हो (वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह सीमा 50000 रुपये है)।
  • ऐसे प्रोफेशनल्स जिनकी कुल प्राप्तियां 10 लाख रुपये से अधिक हैं, भले ही उनकी टैक्स योग्य आय बुनियादी छूट सीमा से कम ही क्यों न हो।

4- लोन और वीजा के लिए पुख्ता इनकम प्रूफ

‘दिनेश आर्जव एंड एसोसिएट्स, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स’ की पार्टनर और एनआरआई टैक्स एक्सपर्ट प्रियल गोयल जैन कहती हैं कि कंप्लायंस के नजरिए से परे आपका आईटीआर चुपचाप आपके लिए दूसरी जगहों पर भी बहुत काम करता है। बैंक और वीजा कार्यालय अक्सर आय के प्रमाण के रूप में इसी दस्तावेज को मांगते हैं। इसलिए रिकॉर्ड में आईटीआर का होना बेहद फायदेमंद है, भले ही तकनीकी रूप से आपके लिए इसे फाइल करना जरूरी न रहा हो।

ऐसे में फॉर्म 16 में जीरो टैक्स देखकर आईटीआर न भरने की धारणा नुकसानदेह हो सकती है। ‘AQUILAW’ की लीड कंसलटेंट (टैक्स) – IDT डिंपल जोगानी के मुताबिक, फाइलिंग की आवश्यकता को नजरअंदाज करने से टैक्सपेयर्स न सिर्फ अपना रिफंड खो सकते हैं बल्कि नुकसान को कैरी फारवर्ड करने का मौका भी गंवा सकते हैं। अगर आयकर विभाग बाद में यह पाता है कि आपके लिए फाइलिंग अनिवार्य थी तो आपको स्पष्टीकरण के लिए नोटिस भी मिल सकता है। मामले के तथ्यों के आधार पर लेट फाइलिंग फीस, ब्याज या अन्य परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने अब ऐसी गलतफहमियों की गुंजाइश को खत्म कर दिया है। इंप्लॉयर, बैंकों, म्यूचुअल फंडों, स्टॉक एक्सचेंजों और अन्य वित्तीय संस्थानों से मिलने वाली जानकारी अब टैक्सपेयर के एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) और टैक्सपेयर इंफॉर्मेशन समरी (TIS) में दिखाई देती है। इसके जरिए इनकम टैक्स डिपार्टमेंट आपके द्वारा किए गए वित्तीय लेनदेन की तुलना आपके रिटर्न में घोषित आय से आसानी से कर लेता है।

एक्सपर्ट्स की सलाह: सिर्फ फॉर्म 16 पर न रहें निर्भर

जैसे-जैसे टैक्स फाइलिंग का सीजन तेज हो रहा है विशेषज्ञ टैक्सपेयर्स को सलाह देते हैं कि वे ‘जीरो टीडीएस’ को ‘जीरो कंप्लायंस’ समझने की भूल न करें। सिर्फ फॉर्म 16 पर निर्भर रहने की बजाय, व्यक्तियों को अपनी आय के सभी स्रोतों की समीक्षा करनी चाहिए। अपने फॉर्म 26AS और एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) की जांच करनी चाहिए। यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे आईटीआर फाइल करने की शर्तों के दायरे में आते हैं या नहीं।

ITR 2026: अपने इनकम टैक्स रिटर्न पर चाहिए मैक्सिमम रिफंड तो आईटीआर फाइल करते समय अपनाएं ये 5 शानदार तरीके

Income Tax Return Best Strategies: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने का सीजन आते ही टैक्सपेयर्स के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि वे अपना टैक्स रिफंड कैसे बढ़ाएं। टैक्स रिफंड को अधिकतम करना सिर्फ आखिरी समय में डिडक्शन ढूंढने तक सीमित नहीं है बल्कि इसकी शुरुआत इस बात से होती है कि आपका टैक्स रिटर्न आपकी इनकम, निवेश और पहले से भुगतान किए गए टैक्स को बिल्कुल सही-सही दर्शाता हो।

क्या होता है इनकम टैक्स रिफंड?

इनकम टैक्स रिफंड तब जारी किया जाता है जब किसी वित्तीय वर्ष के दौरान टैक्सपेयर द्वारा चुकाया गया टैक्स, उसकी वास्तविक टैक्स देनदारी से अधिक हो जाता है। यह एक्स्ट्रा टैक्स सोर्स पर टैक्स कटौती (TDS), सोर्स पर टैक्स कलेक्शन (TCS) या एडवांस टैक्स के रूप में जमा हो सकता है। टैक्सपेयर्स अपना आईटीआर दाखिल करके इस एक्स्ट्रा टैक्स अमाउंट को क्लेम कर सकते हैं। आपको बता दें कि रिटर्न फाइल करने के बाद रिफंड का स्टेटस इनकम टैक्स ई-फाइलिंग पोर्टल और दूसरे ऑप्शन की मदद से ऑनलाइन ट्रैक भी किया जा सकता है।

क्लियरटैक्स की टैक्स एक्सपर्ट चांदनी आनंदन के मुताबिक टैक्सपेयर्स को अपने लिए लागू सभी उपलब्ध छूटों और कटौतियों को क्लोजली रिव्यू करना चाहिए। दोनों टैक्स रिजीम के फायदों की तुलना करनी चाहिए और यह वेरिफाई करना चाहिए कि टैक्स डॉक्युमेंट्स में दी गई जानकारी ऑफिशियल रिकॉर्ड से मैच करती हो। आपकी छोटी सी गलती भी रिफंड में देरी कर सकती है या नोटिस का कारण बन सकती है।

मैक्सिमम रिफंड पाने की 5 शानदार स्ट्रैटिजी

अपने इनकम टैक्स रिफंड को अधिकतम करने के लिए टैक्सपेयर्स को नीचे दिए गए तरीकों को अपनाना चाहिए:

1- दोनों टैक्स रिजीम (Old vs New) की तुलना करें

रिटर्न फाइल करने से पहले पुरानी और नई दोनों टैक्स व्यवस्थाओं के तहत अपनी टैक्स देनदारी की तुलना करें। उस रिजीम का चयन करें जिसमें आपका टैक्स आउटगो सबसे कम हो। अगर वित्त वर्ष के दौरान आपका अधिक टीडीएस कट चुका है तो सही रिजीम चुनकर आप अपना रिफंड काफी हद तक बढ़ा सकते हैं।

2- ओल्ड टैक्स रिजीम के तहत डिडक्शंस का पूरा लाभ उठाएं

अगर आप ओल्ड टैक्स रिजीम चुनते हैं तो आप अलग-अलग कटौतियों के माध्यम से अपनी टैक्स योग्य इनकम को कम कर सकते हैं। इसके लिए नीचे दी गई जानकारी को देखें-

सेक्शन 80C: पीपीएफ, ईएलएसएस, ईपीएफ, एनएससी, जीवन बीमा प्रीमियम और 5 साल की टैक्स-सेविंग एफडी में निवेश करके आप ₹1.5 लाख तक की कटौती का दावा कर सकते हैं।

सेक्शन 80D: हेल्थ इंश्योरेंस के प्रीमियम के माध्यम से ₹25000 से ₹50000 तक की अतिरिक्त टैक्स बचत का दावा किया जा सकता है। यह क्लेम इंश्योर्ड शख्स और परिवार के सदस्यों की उम्र पर निर्भर करता है।

सेक्शन 24(b) और HRA: सैलरीड कर्मचारी निर्धारित शर्तों के अधीन हाउस रेंट अलाउंस (HRA) छूट का दावा कर सकते हैं। साथ ही खुद के घर के होम लोन के ब्याज पर ₹2 लाख तक की कटौती पा सकते हैं।

3- नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) का अतिरिक्त फायदा

नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में योगदान करने वाले लोग सेक्शन 80C की सीमा के ऊपर और अतिरिक्त सेक्शन 80CCD(1B) के तहत ₹50000 तक की एक्स्ट्रा कटौती का दावा कर सकते हैं। सेक्शन 80CCD(2) के तहत एंप्लॉयर के योगदान पर भी टैक्स लाभ मिलता है। यह कटौती दोनों टैक्स रिजीम (पुरानी और नई) में उपलब्ध है। इसके तहत एंप्लॉयर की कैटेगिरी के आधार पर ओल्ड रिजीम में वेतन के 10 प्रतिशत तक और न्यू रिजीम में 14 प्रतिशत तक के एंप्लॉयर योगदान पर दावा किया जा सकता है।

4- स्टैंडर्ड डिडक्शन और टैक्स रिबेट

सैलरीड टैक्सपेयर्स टैक्स योग्य इनकम की गणना करते समय ऑटोमेटिकली स्टैंडर्ड डिडक्शन के हकदार होते हैं। यह कटौती ओल्ड रिजीम के तहत ₹50000 और न्यू रिजीम के तहत ₹75000 है। इसके अलावा पात्र टैक्सपेयर्स सेक्शन 87A के तहत रिबेट का लाभ उठा सकते हैं जिससे अगर टैक्स योग्य आय निर्धारित सीमा के भीतर रहती है तो टैक्स देनदारी शून्य हो सकती है।

इसके अलावा फैमिली पेंशन प्राप्तकर्ताओं को सेक्शन 57(iia) के तहत कटौती मिलती है। यह कटौती ओल्ड रिजीम में ₹15000 तक और न्यू रिजीम में ₹25000 तक उपलब्ध है, जो टैक्स योग्य आय को कम करके रिफंड की पात्रता में सुधार करती है।

5- रिफंड क्लेम करने के लिए अपनाएं ये जरूरी स्टेप्स

रिफंड का दावा करने के लिए आईटीआर दाखिल करना अनिवार्य है, भले ही टैक्सपेयर के लिए सामान्य रूप से रिटर्न दाखिल करना जरूरी न हो। रिफंड प्रक्रिया को तेज करने के लिए इन बातों का ध्यान रखें:

सही ITR फॉर्म चुनें: इनकम के सोर्स, आवासीय स्थिति और टैक्सपेयर की श्रेणी के आधार पर सही फॉर्म चुनें। गलत फॉर्म चुनने से रिपोर्टिंग में त्रुटियां हो सकती हैं और रिफंड अटक सकता है।

आय की सटीक गणना: अपनी आय के सभी स्रोतों, लागू कटौतियों और छूटों को सही ढंग से घोषित करें।

TDS डिटेल वेरिफाई करें: रिटर्न में पहले से भरे हुए टीडीएस डिटेल का फॉर्म 16, फॉर्म 16A या अन्य संबंधित रिकॉर्ड से मिलान जरूर करें ताकि कोई विसंगति न रहे।

सही बैंक खाते का डिटेल दें: अपने एक्टिव बैंक खाते की सही जानकारी दर्ज करें क्योंकि रिफंड सीधे रिटर्न से लिंक बैंक खाते में ही क्रेडिट किया जाता है। गलत जानकारी देने से ट्रांसफर फेल हो सकता है।

तुरंत ई-वेरिफिकेशन पूरा करें: रिटर्न दाखिल करने के बाद जितनी जल्दी हो सके इसे ई-वेरीफाई करें। वेरिफिकेशन के बाद ही रिटर्न प्रोसेस होता है और समय पर वेरिफिकेशन से रिफंड जल्दी जारी होने में मदद मिलती है।

Income Tax Refund: पूरा इनकम टैक्स रिफंड नहीं मिला? ये 7 कारण हो सकते हैं जिम्मेदार

Income Tax Refund: ITR फाइल करने के बाद ज्यादातर लोगों को 4 से 5 हफ्तों में टैक्स रिफंड मिल जाता है। लेकिन कई बार खाते में उतनी रकम नहीं आती, जितनी आपने क्लेम की थी। इसकी वजह यह है कि इनकम टैक्स विभाग रिटर्न प्रोसेस करते समय आपकी जानकारी का दोबारा मिलान करता है। अगर कोई गड़बड़ी मिलती है, तो रिफंड की रकम कम हो सकती है।

पूरा रिफंड क्यों नहीं मिलता?

रिटर्न प्रोसेस करते समय इनकम टैक्स विभाग Form 26AS, AIS, TIS, TDS स्टेटमेंट और दूसरी जानकारियों का मिलान करता है। अगर इनमें अंतर मिलता है, तो रिफंड कम हो सकता है। इसके लिए ये 7 कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।

  • TDS या TCS की जानकारी में गड़बड़ी
  • बैंक ब्याज या कैपिटल गेन जैसी टैक्स योग्य आय छूट जाना
  • गलत टैक्स छूट (Deduction) का दावा
  • एडवांस टैक्स या सेल्फ-असेसमेंट टैक्स की गलत जानकारी
  • टैक्स के कैलकुलेशन में गलती
  • धारा 234A, 234B और 234C के तहत ब्याज लगना
  • पुराने असेसमेंट ईयर की बकाया टैक्स डिमांड

अगर विभाग कोई बदलाव करता है, तो धारा 143(1) के तहत इंटिमेशन भेजता है। इसमें रिफंड कम होने की वजह भी बताई जाती है।

रिफंड की रकम कैसे तय होती है?

इनकम टैक्स विभाग आपकी आय, टैक्स छूट और टैक्स क्रेडिट का मिलान करता है। इसके लिए वह कंपनी, बैंक और दूसरी वित्तीय संस्थाओं से मिली जानकारी का इस्तेमाल करता है।

इसके बाद आपकी कुल टैक्स देनदारी दोबारा निकाली जाती है। फिर TDS, TCS, एडवांस टैक्स और सेल्फ-असेसमेंट टैक्स को एडजस्ट किया जाता है। अगर आपने जरूरत से ज्यादा टैक्स जमा किया है, तो बची हुई रकम रिफंड के रूप में मिलती है। अगर पुराने साल का कोई टैक्स बकाया है, तो उसे भी रिफंड से एडजस्ट किया जा सकता है।

पुराने टैक्स बकाया का क्या होगा?

अगर किसी पुराने असेसमेंट ईयर का टैक्स बकाया है, तो इनकम टैक्स विभाग उसे आपके रिफंड से एडजस्ट कर सकता है। हालांकि, ऐसा करने से पहले विभाग ई-फाइलिंग पोर्टल पर सूचना देता है।

टैक्सपेयर्स को डिमांड स्वीकार करने, आंशिक रूप से मानने या उस पर आपत्ति दर्ज कराने का मौका मिलता है। तय समय तक जवाब नहीं मिलने या जवाब पर फैसला होने के बाद ही एडजस्टमेंट किया जाता है।

ब्याज भी घटा सकता है रिफंड

अगर आपने ITR देर से फाइल की है, एडवांस टैक्स कम भरा है या उसकी किस्त समय पर जमा नहीं की है, तो धारा 234A, 234B और 234C के तहत ब्याज देना पड़ सकता है।

यह ब्याज आपकी कुल टैक्स देनदारी में जुड़ जाता है। ऐसे में TDS पूरा कटा होने पर भी रिफंड कम मिल सकता है।

अगर रिफंड कम मिले तो क्या करें?

अगर आपको लगता है कि रिफंड गलत तरीके से कम किया गया है, तो सबसे पहले धारा 143(1) के तहत मिला इंटिमेशन पढ़ें। उसमें पूरी वजह लिखी होती है।

अगर कोई गलती दिखे, तो रेक्टिफिकेशन के लिए आवेदन करें। Form 16, Form 16A, Form 26AS, AIS, TIS, टैक्स चालान, निवेश के दस्तावेज, कैपिटल गेन का हिसाब, ITR की कॉपी और पुराने टैक्स रिकॉर्ड संभालकर रखें। जरूरत पड़ने पर यही दस्तावेज काम आएंगे।

रिफंड कम होने से कैसे बचें?

ITR फाइल करने से पहले Form 26AS, AIS और TIS का अच्छी तरह मिलान करें। बैंक ब्याज, कैपिटल गेन और दूसरी सभी टैक्स योग्य आय जरूर शामिल करें। सही ITR फॉर्म चुनें। टैक्स छूट और टैक्स क्रेडिट का दावा दस्तावेजों के आधार पर ही करें।

बैंक अकाउंट पहले से प्री-वैलिडेट रखें। ITR फाइल करने के बाद समय पर ई-वेरिफिकेशन करें। रिटर्न सबमिट करने से पहले एक बार पूरी जानकारी जरूर जांच लें। इससे रिफंड में कटौती या देरी की संभावना काफी कम हो जाती है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।