IIT-IIM के बाद लंदन में थी शानदार नौकरी, UPSC के लिए छोड़ा करियर; अब IAS दिव्या मित्तल ने दिया इस्तीफा

दिव्या मित्तल की कहानी उस सोच से बिल्कुल अलग है, जिसमें अच्छी पढ़ाई, विदेश की नौकरी और शानदार करियर को सफलता की आखिरी मंजिल माना जाता है। IIT Delhi और IIM Bangalore जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने लंदन में ट्रेडर के तौर पर काम किया। बाहर से उनकी जिंदगी पूरी तरह सफल नजर आती थी, लेकिन उनके मन में अपने देश के लिए कुछ करने की इच्छा बनी रही। इसी सोच ने उन्हें विदेश की नौकरी छोड़कर भारत लौटने और IAS बनने के लिए प्रेरित किया। करीब 13 साल तक सिविल सेवा में रहने के बाद अब उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

30 अगस्त को सोशल मीडिया पर साझा किए गए भावुक पोस्ट में उन्होंने अपने सफर और उससे जुड़ी यादों को साझा किया। उनका ये फैसला इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि उन्होंने सफलता की कई मंजिलें हासिल करने के बाद भी अपनी राह बदलने का साहस दिखाया।

साधारण परिवार से IIT और IIM तक का सफर

दिव्या मित्तल ने बताया कि वह एक साधारण माहौल में पली-बढ़ीं और एक अच्छा और सफल जीवन बनाने का सपना देखा था। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की और IIT Delhi में दाखिला लिया। इसके बाद उन्होंने IIM Bangalore से MBA किया और पढ़ाई पूरी करने के बाद लंदन में ट्रेडर के तौर पर काम शुरू किया। प्रतिष्ठित संस्थानों की डिग्री और विदेश में शानदार नौकरी के बावजूद उन्हें महसूस हुआ कि उनकी जिंदगी में कुछ कमी है।

लंदन की नौकरी छोड़ भारत लौटने का फैसला

विदेश में रहते हुए उन्हें अपने देश से दूर होने का एहसास लगातार परेशान करता रहा। Mittal के मुताबिक, उन्हें लगता था कि उनकी शिक्षा, आत्मविश्वास और मिले अवसरों पर देश का भी हक है। इसी सोच ने उन्हें वापस भारत आने और देश के लिए कुछ करने का फैसला लेने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने IAS को अपना रास्ता चुना और 2013 में सिविल सेवा में शामिल हो गईं।

उत्तर प्रदेश में अफसर रहते हुए बदली सफलता की परिभाषा

IAS बनने के बाद मित्तल ने उत्तर प्रदेश में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। वह Deoria, Mirzapur और Sant Kabir Nagar की District Magistrate भी रहीं। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के दौरान उनके सामने ऐसे कई मौके आए, जिन्होंने उनके लिए सफलता का मतलब बदल दिया। किसी परिवार को पहली बार जमीन का अधिकार मिलना, दिव्यांग लोगों को सम्मान के साथ आगे बढ़ने का मौका मिलना या किसानों के खेतों तक पानी पहुंचना इन अनुभवों ने उन्हें महसूस कराया कि सरकारी काम सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं है।

उन्होंने लिखा कि हर सरकारी फाइल के पीछे एक इंसान की जिंदगी जुड़ी होती है।

एक बुजुर्ग महिला का आशीर्वाद कभी नहीं भूल पाईं

Mirzapur के Lahuriya Dih गांव की एक घटना मित्तल के दिल में हमेशा के लिए बस गई। उन्होंने याद किया कि जब पहली बार गांव में पानी पहुंचा तो एक बुजुर्ग महिला ने यह देखकर कुछ नहीं कहा। इसके बजाय उसने कांपते हाथों से Mittal के सिर पर हाथ रखा और उन्हें आशीर्वाद दिया। Mittal के लिए वह पल किसी पद या उपलब्धि से कहीं बड़ा था। उन्होंने भावुक होकर कहा कि पद आज भले पीछे छूट जाए, लेकिन उस बुजुर्ग महिला का स्पर्श उनकी जिंदगीभर की याद बनकर रहेगा।

13 साल बाद समझ आया- देने से ज्यादा पाया

IAS के 13 सालों को याद करते हुए Mittal ने बताया कि शुरुआत में उन्हें लगता था कि वह लोगों को कुछ देने के लिए सेवा में आई हैं। लेकिन समय के साथ उनकी सोच बदल गई। उन्हें एहसास हुआ कि लोगों से मिले प्यार, भरोसे और सम्मान ने उन्हें कहीं ज्यादा समृद्ध किया। जब भी वह थकतीं या खुद मुश्किल दौर से गुजरतीं, लोगों का विश्वास उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता था।

पद छोड़ा, लेकिन सपना अब भी वही है

साधारण परिवेश से निकलकर IIT और IIM तक पहुंचना, लंदन में ट्रेडर बनना और फिर देश की सेवा के लिए IAS में आना Mittal का सफर कई मोड़ों से गुजरा है।

अब उन्होंने 13 साल की सेवा के बाद IAS से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि, पद छोड़ने के बावजूद उनका कहना है कि जिस भारत का सपना देखकर वह विदेश से वापस लौटी थीं, वह सपना आज भी उनके साथ है।

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उज्बेकिस्तान में पीएम मोदी ने छात्रों से बात की:स्टूडेंट्स ने हिंदी में सुनाया कविताएं; मोदी बोले- ये मेरे दिल की भावनाएं जैसी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्बेकिस्तान के दो दिवसीय दौरे के दौरान ताशकंद स्थित महात्मा गांधी सेंटर का दौरा किया। यहां उज्बेक छात्रों ने हिंदी में उनकी लिखी कविताओं की कुछ पंक्तियां सुनाईं। अपनी कविताएं छात्रों की आवाज में सुनकर मोदी भावुक हो गए और कहा कि हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं होने के बावजूद छात्रों ने कविताओं की भावनाओं को बिल्कुल उसी तरह व्यक्त किया, जैसी भावनाएं उनके दिल में थीं। इस दौरान मोदी ने उज्बेकिस्तान में भारत, महात्मा गांधी और तमिल संस्कृति को लेकर बढ़ती रुचि का जिक्र किया और तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में अनुवाद करने का सुझाव दिया। वहीं, उनकी यात्रा के दौरान दोनों देशों के रिश्ते कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप तक पहुंचे और 11 समझौतों का आदान-प्रदान हुआ। उज्बेकिस्तान में भारतीय संस्कृति का बढ़ा प्रभाव कार्यक्रम में एक उज्बेक इंडोलॉजिस्ट ने कहा कि शायद दुनिया में बहुत कम ऐसे देश होंगे जहां लोगों में भारत को लेकर इतना प्यार है। उन्होंने कहा कि उज्बेकिस्तान में लगभग हर नागरिक ‘नमस्ते’ शब्द से परिचित है। यह भी बताया कि उज्बेकिस्तान में भारतीय कला, नृत्य, संगीत, दर्शन और योग को लेकर भी लोगों की रुचि बढ़ रही है। तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में हो अनुवाद PM मोदी ने तमिल साहित्य और ‘तिरुक्कुरल’ का भी जिक्र किया। उन्होंने संस्थान की 80वीं वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में अनुवाद करने की दिशा में काम किया जा सकता है। कार्यक्रम में मौजूद वक्ता ने जवाब दिया कि इसके लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। मोदी ने कहा कि तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में अनुवाद होने से भारतीय दर्शन और विचारों को समझने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि दुनिया की प्राचीन भाषाओं में मौजूद दार्शनिक विचार यह बताते हैं कि सभ्यता की शुरुआत से ही मानव सोच कितनी गहरी रही है। खबर अपडे़ट हो रही है…

उज्बेकिस्तान में मोदी ने छात्रों से बात की:स्टूडेंट्स ने पीएम की कविताओं को हिंदी में सुनाया; मोदी बोले- भावनाएं बिल्कुल मेरे दिल जैसी थीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्बेकिस्तान के दो दिवसीय दौरे में ताशकंद के महात्मा गांधी सेंटर का दौरा किया। यहां उज्बेक छात्रों ने हिंदी में मोदी की लिखी कविताएं सुनाईं। अपनी कविताएं छात्रों से सुनकर मोदी भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि हिंदी छात्रों की मातृभाषा नहीं है, फिर भी उन्होंने कविताओं की भावनाओं को बिल्कुल वैसे ही समझकर पेश किया, जैसी भावनाएं उनके दिल में थीं। मोदी ने उज्बेकिस्तान में भारत, महात्मा गांधी और तमिल संस्कृति में बढ़ती रुचि का भी जिक्र किया। उन्होंने तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में अनुवाद करने का सुझाव दिया। मोदी की यात्रा के दौरान भारत और उज्बेकिस्तान के रिश्ते कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप तक पहुंचे। दोनों देशों के बीच 11 समझौतों, एमओयू और सहमतियों का आदान-प्रदान भी हुआ। उज्बेकिस्तान में भारतीय संस्कृति का प्रभाव कार्यक्रम में भारत और भारतीय संस्कृति का अध्ययन करने वाले एक उज्बेक इंडोलॉजिस्ट ने कहा कि शायद दुनिया में बहुत कम ऐसे देश होंगे, जहां लोगों में भारत को लेकर इतना प्यार है। उन्होंने बताया कि यहां लगभग हर नागरिक ‘नमस्ते’ शब्द से परिचित है। भारतीय कला, नृत्य, संगीत, दर्शन और योग में भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है। तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में हो अनुवाद PM मोदी ने तमिल साहित्य और ‘तिरुक्कुरल’ का भी जिक्र किया। उन्होंने संस्थान की 80वीं वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या तिरुक्कुरल का उज्बेक भाषा में अनुवाद करने की दिशा में काम किया जा सकता है। मोदी ने कहा भारतीय दर्शन और विचारों को समझने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया की प्राचीन भाषाओं में मौजूद दार्शनिक विचार यह बताते हैं कि सभ्यता की शुरुआत से ही मानव सोच कितनी गहरी रही है। क्या है तिरुक्कुरल? तिरुक्कुरल, जिसे ‘कुरल’ भी कहा जाता है, तमिल साहित्य की एक प्रसिद्ध रचना है। इसमें नैतिकता, अच्छे आचरण और जीवन से जुड़ी व्यावहारिक सीख दी गई है। इसे कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर ने लिखा था। माना जाता है कि इसकी रचना दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पांचवीं शताब्दी ईस्वी के बीच हुई। यह रचना धर्म या किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है और इसे पूरी मानवता के लिए उपयोगी विचारों के लिए जाना जाता है। भारत-उज्बेकिस्तान रिश्तों को मिली नई मजबूती PM मोदी की 29 से 30 अगस्त तक की दो दिवसीय उज्बेकिस्तान यात्रा से दोनों देशों के संबंधों को नई गति मिली है। भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने रिश्तों को ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ से बढ़ाकर ‘कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ कर दिया है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच 11 समझौतों का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत और व्यापक बनाना है। PM मोदी की यह यात्रा उज्बेक राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के निमंत्रण पर हुई। ————– यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब की पहली रक्षा बैठक आज:इस्तांबुल में तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री मिलेंगे; सैन्य प्रमुख भी शामिल होंगे
पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत पहली बैठक सोमवार को इस्तांबुल में होगी। बैठक में तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री के साथ सैन्य प्रमुख भी शामिल होंगे। पूरी खबर पढ़ें…

Bihar Train News: बाढ़ में डूबे गांव तो मवेशियों के लिए दौड़ी बिहार की ‘घास ट्रेन’, सुबह निकलते हैं किसान, शाम को लौटते हैं गठरियों के साथ

Bihar Train News: बिहार के खगड़िया जिले में जब बाढ़ दस्तक देती है, तो एक खास पैसेंजर ट्रेन इलाके में चर्चा का विषय बन जाती है। ‘न्यूज 18’ के मुताबिक, हालांकि इंडियन रेलवे के रिकॉर्ड में इस ट्रेन का नाम ‘समस्तीपुर-सहरसा पैसेंजर’ है। लेकिन स्थानीय लोग इसे प्यार से ‘घास ट्रेन’ भी कहते हैं। बाढ़ के मुश्किल दिनों में यह ट्रेन सिर्फ यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम नहीं करती। बल्कि सैकड़ों पशुपालकों और उनके मवेशियों के लिए ‘लाइफलाइन’ बन जाती है।

जब हर तरफ पानी भर जाता है तब सैकड़ों पशुपालक सुबह-सुबह इस पैसेंजर ट्रेन में सवार होकर सूखे इलाकों की ओर जाते हैं। वे चिलचिलाती धूप में अपने मवेशियों के लिए हरा चारा काटते हुए दिन बिताते हैं। फिर शाम को वे सभी भारी बंडलों के साथ रेलवे स्टेशन लौट आते हैं।

बाढ़ में मवेशियों के सामने चारे का संकट

रिपोर्ट के मुताबिक, खगड़िया के मानसी प्रखंड के निचले इलाकों में हर साल बाढ़ का पानी भर जाता है। इस दौरान धमसारा घाट, मटिहानी और रोहियार जैसे गांवों के आसपास के बड़े हिस्से जलमग्न हो जाते हैं। खेत और चरागाह पानी में डूब जाते हैं। पशुपालकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मवेशियों के लिए हरे चारे का इंतजाम करना होती है। मवेशियों पर निर्भर परिवारों के लिए उन्हें भूखा रखना संभव नहीं होता। ऐसे में पशुपालक रोजाना बाढ़ प्रभावित इलाके से बाहर निकलकर सूखे एरिया का रुख करते हैं, जहां उन्हें हरा चारा मिल सके।

सुबह ट्रेन में सवार होते हैं सैकड़ों पशुपालक

सुबह होते ही बड़ी संख्या में पशुपालक इस पैसेंजर ट्रेन में सवार हो जाते हैं। उनका मकसद किसी शहर में खरीदारी या काम के लिए जाना नहीं, बल्कि अपने मवेशियों के लिए चारा जुटाना होता है। ट्रेन उन्हें उन इलाकों तक पहुंचाने में मदद करती है जहां बाढ़ का असर कम है। और वहां हरा चारा उपलब्ध है।

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वहां पहुंचने के बाद पशुपालक दिनभर तेज धूप और गर्मी के बीच खेतों और खुले इलाकों से हरी घास काटते हैं। यह उनके लिए रोज का संघर्ष है। लेकिन अपने मवेशियों को बचाए रखने के लिए वे इस मेहनत को मजबूरी के साथ-साथ जिम्मेदारी के तौर पर भी निभाते हैं।

शाम होते ही ट्रेन का नजारा हो जाता है बिल्कुल अलग

दिनभर चारा काटने के बाद शाम को यही पशुपालक भारी-भारी गठरियों और बोरियों के साथ स्टेशन लौटते हैं। इसके बाद जब ट्रेन फकीया की ओर वापस रवाना होती है, तो इसका नजारा किसी आम पैसेंजर ट्रेन जैसा नहीं रहता। ट्रेन के दरवाजों से लेकर शौचालयों तक, लगभग हर जगह हरा चारा नजर आता है। डिब्बों में बड़ी-बड़ी गठरियां और बोरियां रखी होती हैं। उनके बीच बैठकर पशुपालक अपने घरों की ओर लौटते हैं।

इसी वजह से पड़ा नाम ‘घास ट्रेन’

स्थानीय लोगों के बीच यह ट्रेन धीरे-धीरे इतनी मशहूर हो गई कि इसका आधिकारिक नाम पीछे छूट गया और इसे ‘घास ट्रेन’ के नाम से पहचान मिलने लगी। न्यूज 18 के मुताबिक, बाढ़ के दौरान जब गांवों में पशुओं के लिए चारा जुटाना मुश्किल हो जाता है, तब यही ट्रेन पशुपालकों को सूखे इलाकों तक पहुंचाने और वहां से चारा वापस लाने का जरिया बनती है।

पशुपालकों और मवेशियों दोनों के लिए जीवनरेखा

फकीया इलाके के पशुपालकों के लिए यह ट्रेन महज एक यात्री ट्रेन नहीं है। बाढ़ जैसे कठिन हालात में यह उनके परिवार और मवेशियों दोनों को संभालने में अहम भूमिका निभाती है। एक तरफ जहां देश में ‘वंदे भारत’ और ‘राजधानी एक्सप्रेस’ जैसी ट्रेनों की रफ्तार और सुविधाओं की चर्चा होती है।

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वहीं, बिहार के इस बाढ़ प्रभावित इलाके में एक साधारण पैसेंजर ट्रेन अपनी अलग ही वजह से लोगों के लिए बेहद खास है। इसीलिए हर साल बाढ़ के मौसम में जब यह ट्रेन हरे चारे की गठरियों से भरकर लौटती है, तो लोग इसे फिर उसी प्यार और सम्मान से ‘घास ट्रेन’ कहकर पुकारते हैं।

Divya Mittal: कौन हैं दिव्या मित्तल जिन्होंने 13 साल करके छोड़ दी IAS की नौकरी और दिया इस्तीफा?

उत्तर प्रदेश की 2013 बैच की आईएएस दिव्या मित्तल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (आईएएस) के पद पर उन्होंने 13 सालों तक काम किया। वहीं सोशल मीडिया पर एक लंबे-चौड़े पोस्ट के जरिए उन्होंने इस बात की जानकारी दी है। अपने पोस्ट में दिव्या मित्तल ने लिखा, “आज मैंने 13 साल की इस यादगार यात्रा को अपनी इच्छा से खत्म करते हुए IAS से इस्तीफा दे दिया है।” वहीं इस पोस्ट के बाद से सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गई कि कौन है दिव्या मित्तल। दिव्या ने आईएएस ऑफिसर बनने के लिए लंदन से वापस भारत आई थी। आइए जानते हैं कौन हैं कौन है दिव्या मित्तल

कौन है दिव्या मित्तल

दिव्या मित्तल ने अपनी शुरुआती पढ़ाई दिल्ली से की है। वहीं 12वीं के बाद IIT दिल्ली में 2001 से 2005 के बीच बीटेक की डिग्री पूरी की। इसके बाद उन्होंने CAT परीक्षा पास की और IIM बेंगलुरु में MBA में प्रवेश लिया। 2005-07 के दौरान पढ़ाई पूरी होने के बाद दिव्या ने लंदन में नौकरी मिल गई। लेकिन लंदन में कुछ समय काम करने के बाद भारत लौटने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहले प्रयास में UPSC पास कर IPS सेवा हासिल की और इसके अगले प्रयास में ऑल इंडिया रैंक 68 हासिल करते हुए IAS के लिए चयनित हुईं।

देश के लिए कुछ करना था

सोशल मीडिया पर किए इमोशनल पोस्ट में दिव्या ने कहा, “आज मैंने 13 साल की इस यादगार यात्रा को अपनी इच्छा से खत्म करते हुए IAS से इस्तीफा दे दिया है। एक साधारण परिवार में पली-बढ़ी और एक अच्छे व सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात मेहनत करके IIT दिल्ली और IIM बैंगलोर से पढ़ाई की और इसके बाद लंदन में नौकरी भी मिल गई। लेकिन सब कुछ हासिल करने के बाद भी मन में कुछ कमी महसूस होती थी। अपने देश से दूर रहना हमेशा खलता था।”

‘मेरी पढ़ाई, मेरा आत्मविश्वास और दुनिया में कहीं भी अपने दम पर आगे बढ़ने की ताकत, सब इसी देश की देन थी। मुझे लगा कि इस मिट्टी का कर्ज चुकाना चाहिए। मैं चाहती थी कि जिस भारत का सपना मैंने देखा है, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। इसी सोच के साथ मैं वापस भारत आई और IAS अधिकारी बनने का मौका मिला।”

हर जगह से काफी कुछ सीखने को मिला

पोस्ट में आगे कहा, “इस दौरान मुझे बहुत कुछ करने और सीखने का मौका मिला। देवरिया ने मुझे सिखाया कि सही बात के साथ खड़ा होना कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। मीरजापुर ने सिखाया कि ‘असंभव’ कोई सच नहीं होता, यह सिर्फ हमारी सोच हो सकती है। मां विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर यह समझ आया कि असली ताकत किसी पद से नहीं, बल्कि उनकी कृपा और लोगों के भरोसे से मिलती है। मेरी सबसे बड़ी सीख यह रही कि अपने लिए देखे गए सपने तो पूरे हो चुके थे, अब बारी अपने लोगों के सपनों को पूरा करने की थी। इस जीवन में सबसे ज्यादा खुशी तब मिली, जब किसी परिवार को पहली बार जमीन का अधिकार मिला, किसी दिव्यांग व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का मौका मिला या किसी किसान के खेत तक पानी पहुंचा। लोगों के संघर्ष में उनके साथ चलते हुए मैंने जाना कि हर सरकारी फाइल के पीछे एक इंसान होता है और उसकी गरिमा का सम्मान करना ही असली न्याय है।”

मूर्ख थी जो सोचती थी

पोस्ट में आगे कहा, “मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आयी हूं। सच यह है कि सबसे ज्यादा मैंने ही पाया, और वो कर्ज और भी बढ़ता गया। लोगों ने मेरी खुशी में मुझसे भी ज्यादा खुश हुए। जब मैं खुद थकी या परेशान होती थी, तब भी उन्होंने मुझ पर पूरा भरोसा बनाए रखा। इसी भरोसे ने मुझे आगे बढ़ते रहने की ताकत दी। मुझे इतना प्यार, सम्मान और अपनापन मिला कि मेरी जिंदगी पूरी तरह भर गई। इस सफर में मेरे साथ काम करने वाले साथियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी बड़ा योगदान रहा, जिन्होंने हर कदम पर मेरा साथ दिया और मिलकर काम किया।”

 

नम आंखों से दे रही इस्तीफा

दिव्या ने पोस्ट के आखिर में कहा, “आज दिल में आभार है और आंखें नम हैं। बस एक तस्वीर बार-बार आंखों के सामने आ रही है। लहुरिया दह की पहाड़ी की वह बुजुर्ग मां, जिसने अपने गांव में पहली बार पानी पहुंचते देखा था। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस कांपते हाथों से मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। आज मेरा पद जरूर छूट गया है, लेकिन उनका वह प्यार भरा स्पर्श मैं जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगी। और इस देश की मिट्टी ने जो सपना मुझे दिया है, वह भी हमेशा मेरे साथ रहेगा।”

Raksha Bandhan 2026: बॉलीवुड की ये 7 फिल्में, जिनमें भाई-बहन के रिश्ते को बेहद खूबसूरती सेलिब्रेट किया गया

Raksha Bandhan 2026: बॉलीवुड ने हमें भाई-बहनों की कई यादगार कहानियां दी हैं, जिनमें दिखाया गया है कि उनके रिश्ते प्यार, नोक-झोंक, एक-दूसरे की रक्षा करने और ज़िंदगी भर साथ निभाने से कैसे भरे हो सकते हैं। इस रक्षा बंधन पर, उन फ़िल्मों को फिर से देखें जो भाई-बहनों के बीच के भावनात्मक जुड़ाव को खूबसूरती से दिखाती हैं। दिल को छू लेने वाले फ़ैमिली ड्रामा से लेकर त्याग और हिम्मत की कहानियों तक, ये फ़िल्में हमें याद दिलाती हैं कि भाई-बहनों की हर लड़ाई के पीछे अक्सर एक ऐसा रिश्ता होता है जो हर मुश्किल में मज़बूत बना रहता है।

दिल धड़कने दो (2015)

‘दिल धड़कने दो’ में प्रियंका चोपड़ा और रणवीर सिंह ने भाई-बहन आयशा और कबीर मेहरा का किरदार निभाया है। भले ही उनकी पर्सनैलिटी अलग-अलग है और वे अक्सर एक-दूसरे से सहमत नहीं होते, फिर भी वे एक-दूसरे को गहराई से समझते हैं। उनकी ईमानदारी भरी बातचीत और एक-दूसरे का साथ देना भाई-बहनों के उस असली रिश्ते को दिखाता है जिसमें मज़ाक-मस्ती, झुंझलाहट और सच्चा प्यार शामिल होता है।

हम साथ-साथ हैं (1999)

‘हम साथ-साथ हैं’ पारिवारिक रिश्तों का जश्न मनाती है, जिसमें पूरी कहानी के दौरान भाई-बहन एक-दूसरे का साथ देते हुए प्यार भरा रिश्ता निभाते हैं। प्रेम, विनोद और विवेक मुश्किल पलों में एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं, जबकि उनकी भाभियाँ परिवार का अहम हिस्सा बन जाती हैं। यह फ़िल्म आज भी परिवारों की पसंदीदा फ़िल्म बनी हुई है।

अग्निपथ (2012)

अग्निपथ में, विजय दीनानाथ चौहान का अपनी बहन शिक्षा के साथ बहुत गहरा और भावुक रिश्ता है। परिवार के बिखरने के बाद, विजय अपनी बहन की सुरक्षा करते हुए बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां उठाता है। उनका यह रिश्ता विजय के बदले और प्रायश्चित के सफर में एक निजी और भावुक पहलू जोड़ता है।

सरबजीत (2016)

सरबजीत फिल्म सरबजीत सिंह और उनकी बहन दलबीर कौर के बीच के खास रिश्ते को दिखाती है। पाकिस्तान में सरबजीत के जेल जाने के बाद, दलबीर उसकी रिहाई के लिए सालों तक लड़ती रहती है। उसका पक्का इरादा और हिम्मत दिखाती है कि जब भाई की जान दांव पर हो, तो एक बहन किस हद तक जा सकती है।

जोश (2000)

जोश फिल्म में शाहरुख खान और ऐश्वर्या राय बच्चन जुड़वां भाई-बहन मैक्स और शर्ली का किरदार निभाते हैं। कहानी में उनके भाई-बहन के रिश्ते को अहमियत दी गई है, जिसमें वे दुश्मनी, रोमांस और पारिवारिक तनावों का सामना करते हैं। मतभेदों के बावजूद, दोनों जुड़वां एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं, जिससे उनका रिश्ता फिल्म की खासियतों में से एक बन जाता है।

माई ब्रदर निखिल (2005)

‘माई ब्रदर… निखिल’ फिल्म निखिल और उसकी बहन अनामिका की दिल को छू लेने वाली कहानी है। जब HIV का पता चलने के बाद समाज उसके खिलाफ हो जाता है, तो अनामिका मजबूती से अपने भाई के साथ खड़ी रहती है। उसका बिना शर्त साथ देना, भाई-बहन के प्यार और अपनापन दिखाने के मामले में फिल्म के सबसे भावुक दृश्यों में से एक बन जाता है।

फिजा (2000)

फ़िज़ा और उसके भाई अमान के बीच का रिश्ता ही इस फ़िल्म का इमोशनल केंद्र है। मुंबई दंगों के बाद अमान के गायब हो जाने पर भी फ़िज़ा उसे ढूंढना नहीं छोड़ती। यह फ़िल्म एक बहन के अटूट प्यार, उम्मीद और अपने भाई को घर वापस लाने के पक्के इरादे को दिखाती है।

Down Syndrome बहन ने सिखाया प्यार का असली मतलब | Down Syndrome Sister Emotional story

Down Syndrome बहन ने सिखाया प्यार का असली मतलब | Down Syndrome Sister Emotional story

दुनिया ने Dimple में देखा कि वो क्या नहीं कर सकती थी।
लेकिन उसकी बहन ने देखा कि वो कितना प्यार कर सकती थी।
Dimple को Down syndrome था।
वो देर से बोलना सीख पाई और बहुत से लोग उसकी बात समझ नहीं पाते थे।
लेकिन उसकी बहन उसकी छोटी-छोटी आवाज़ों और चेहरे के भाव तक समझ जाती थी।
कभी-कभी तो जानबूझकर नाराज़ होने का नाटक करती,
सिर्फ इसलिए कि Dimple उसे गले लगाए और प्यार से चूमे।
आज Dimple इस दुनिया में नहीं है।
और सबसे बड़ा अफसोस ये है कि उसकी बहन उसे आखिरी बार देख भी नहीं पाई।
लेकिन शायद कुछ रिश्तों को आखिरी मुलाकात की जरूरत नहीं होती।
क्योंकि कुछ लोग शब्दों से नहीं,
दिल से समझे जाते हैं।

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मराठी सीखने के लिए ऑटो-कैब ड्राइवरों को 1 साल की मोहलत, CM फडणवीस का बड़ा ऐलान

Maharashtra Language Controversy: महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने गुरुवार को घोषणा की कि राज्य सरकार के भाषा संबंधी आदेश को लेकर हो रहे विरोध और राजनीतिक विवाद के बीच, ऑटो-रिक्शा और कैब ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए एक साल का समय दिया जाएगा। फडणवीस ने कहा कि अगले एक साल तक ड्राइवरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी, ताकि उन्हें मराठी का कामकाजी ज्ञान हासिल करने के लिए समय मिल सके।

फडणवीस ने कहा, “मैंने कैब और ऑटो ड्राइवरों से मुलाकात की। वे सभी इस बात से सहमत हैं कि हर किसी को मराठी आनी चाहिए, लेकिन उन्होंने कहा कि इस पेशे में अलग-अलग उम्र के लोग हैं और उनके लिए जल्दी मराठी सीखना मुश्किल है। उन्होंने एक योजना तैयार की है और इसके लिए एक साल का समय मांगा है। हालांकि, राज्य सरकार ने यह मांग मान ली है। इस साल कोई कार्रवाई नहीं होगी।”

बता दें कि यह घोषणा महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के उस बयान के कुछ दिनों बाद की गई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जो ड्राइवर मराठी का कामकाजी ज्ञान दिखाने में विफल रहेंगे, उनके ऑथराइजेशन बैज सस्पेंड किए जा सकते हैं।

मराठी भाषा को लेकर बढ़ा विवाद

महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर सख्ती के बीच मुंबई के कुछ ऑटो ड्राइवर बिहार और उत्तर प्रदेश लौटने लगे हैं। वहीं, पुणे में कुछ ड्राइवर RTO की कार्रवाई से बचने के लिए यात्रियों से बातचीत के दौरान सतर्कता बरत रहे हैं।

मराठी से जुड़ा नया नियम क्या है?

सरनाईक ने कहा था कि अगर ड्राइवर को मराठी की कामकाजी जानकारी नहीं है, तो उसका ड्राइवर बैज शुरू में एक महीने के लिए सस्पेंड कर दिया जाएगा। इस महीने की शुरुआत में बदले गए नियमों के मुताबिक, अगर ड्राइवर उस समय में भाषा नहीं सीख पाता है, तो बैज रद्द करने से पहले उसे तीन महीने का और समय दिया जाएगा।

मंत्री ने यह भी कहा था कि जो ड्राइवर चार महीने बाद भी मराठी नहीं सीख पाते हैं, वे असल में यह दिखा रहे होंगे कि उन्हें “भाषा से प्यार नहीं है” और उन्हें मराठी पहचान की जरूरत नहीं है।

इस बीच, सरनाईक ने मंगलवार को आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक नेता मुंबई और ठाणे में “मराठी-हिंदी” विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए।

बता दें कि भाषा से जुड़े इस नियम की वजह से दूसरे राज्यों से आए ड्राइवरों के बीच भी तनाव पैदा हो गया है। सोमवार को मुंबई के कांदिवली इलाके में चार ऑटो-रिक्शा ड्राइवरों ने कथित तौर पर मराठी बोलने वाले एक ड्राइवर के साथ मारपीट की, क्योंकि उसने मराठी भाषा की जानकारी की अनिवार्यता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से इनकार कर दिया था।

यह घटना उस समय हुई, जब बड़ी संख्या में ऑटो-रिक्शा ड्राइवर MG रोड पर सरकार की मराठी भाषा संबंधी अनिवार्यता के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने दूसरे ऑटो ड्राइवरों से भी अपने वाहन चलाना बंद करने को कहा।

सरकार के इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में भी चुनौती दी गई है। चार कैब ड्राइवरों ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और ऐप आधारित कैब ड्राइवरों के लिए काम चलाने लायक मराठी जानना जरूरी किए जाने वाले नियम पर रोक लगाने की मांग की है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 12 अगस्त को जारी सरकारी नोटिफिकेशन से लाखों “गरीब और प्रवासी” ड्राइवरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ सकता है। उन्होंने कोर्ट से इस नियम को लागू करने पर फिलहाल रोक लगाने की मांग की है।

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आज का एक्सप्लेनर:‘चीन ने जानबूझकर नेपाल को तबाही का अलर्ट नहीं दिया’, इस दावे में कितनी सच्चाई; क्या वाकई बच सकती थीं सैकड़ों जिंदगियां

26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर आई बाढ़ में 200 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो गई है। करीब 1,500 लोग अब भी लापता हैं। दावा किया जा रहा कि काफी जानें बचाई जा सकती थीं, अगर चीन ने समय पर चेता दिया होता। तो क्या वाकई नेपाल में हुई भीषण तबाही के पीछे चीन जिम्मेदार है; दोनों देशों के बीच आपदाओं की वार्निंग देने का क्या सिस्टम है, इसी पर आज का एक्सप्लेनर… सवाल-1: नेपाल में आई बाढ़ के पीछे चीन पर क्या आरोप लग रहे? जवाब: नेपाली पत्रकार परशुराम काफ्ले ने X पर लिखा, ‘चीन ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। अगर बीजिंग के डिजास्टर डिटेक्शन सिस्टम से अर्ली वार्निंग मिल जाती, तो नेपाल में ज्यादा जानें बचाई जा सकती थीं। नेपाल हमेशा चीन की चिंताओं का ध्यान रखता है। इस एकतरफा प्यार की कीमत चुकानी पड़ रही है।’ नेपाल के मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, नेपाल और चीन के बीच मौसम से जुड़ी जानकारियां शेयर करने की व्यवस्था है, लेकिन इस घटना के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं दी गई। नेपाल के मौसम विभाग की सीनियर साइंटिस्ट विभूति पोखरेल कहती हैं, ‘हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अभी तक वे नहीं बता पाए हैं कि बाढ़ की वजह क्या है।’ 2016 में भी नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर रसुवागढ़ी इलाके में भीषण बाढ़ आई थी। तब भी एक्सपर्ट्स ने कहा था कि दोनों देशों के बीच समय रहते इन्फॉर्मेशन शेयर की गई होती, तो नुकसान कम किया जा सकता था। सवाल-2: दोनों देशों के बीच ऐसे हादसों की जानकारी देने का नियम है या नहीं? जवाब: नेपाल और चीन के बीच मौसम और आपदा से जुड़ी जानकारियां साझा करने की बात तय हुई थी, लेकिन इस पर कोई औपचारिक समझौता नहीं हो पाया है। दरअसल, 8 जुलाई 2025 को रसुवागढ़ी बॉर्डर पॉइंट से 35 किलोमीटर ऊपर चीन के इलाके में तिब्बत के पहाड़ों पर ‘पुरेपु’ नाम की ग्लेशियर झील फटी। इससे भोटेकोशी नदी के आसपास करीब 100 किमी तक के इलाके में बाढ़ का मलबा पहुंचा। एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद नेपाल और चीन ने तीन बातें तय की थीं… नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में एनवायरनमेंट स्टडीज के प्रोफेसर सुदीप ठाकुर बताते हैं, ‘तिब्बत में मौसम से जुड़ी इन्फॉर्मेशन इकठ्ठा करने की व्यवस्था है, लेकिन उसे नेपाल के साथ साझा नहीं किया जाता है। चीन को वैज्ञानिक जानकारी देने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन शायद नेपाल सरकार ही मजबूती से अपनी मांग उनके सामने रख ही नहीं पाई है।’ नेपाल की डिजास्टर स्टडी सेंटर के डायरेक्टर वसंत अधिकारी भी कहते हैं कि अब तक जानकारी शेयर करने की कोई व्यवस्था नहीं है। सवाल-3: जानकारी शेयर न करने के आरोप पर चीन ने क्या कहा है? जवाब: चीन ने सीधे तौर पर इसका कोई जवाब नहीं दिया है, हालांकि चीनी दूतावास ने अपने बयान में कहा है कि भूकंप के चलते बाढ़ आई है और ये भूकंप नेपाल की तरफ आया था। बयान में कहा गया, ‘रसुवा-ग्यिरोंग बॉर्डर इलाके में आई बाढ़ से चीन बेहद दुखी है। नेपाल की तरफ आए भूकंप के चलते हिमस्खलन हुआ और फिर मलबा बहा। इससे सीमा के दोनों तरफ लोगों की मौत हुई।’ दरअसल, पहले कहा गया था कि रिक्टर स्केल पर करीब 5 की तीव्रता के भूकंप के चलते बर्फ का ग्लेशियर टूटा, हालांकि बाद में अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे ने साफ किया कि भूकंप जैसा झटका बर्फ और चट्टान के टूटने से पैदा हुआ था। हालांकि चीनी दूतावास ने ये जरूर कहा है, ‘भविष्य में सीमा पार मौसम और आपदाओं से जुड़ी जानकारियां साझा करने के लिए बेहतर तरीके से काम करेंगे।’ सवाल-4: बर्फ का पहाड़ चीन में गिरा या नेपाल में? जवाब: नेपाल की डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, NDRRMA के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने की जगह नेपाल-चीन सीमा चौकी से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। अथॉरिटी के वैज्ञानिक प्रकाश पोखरेल के मुताबिक, ‘ये इलाका नेपाली हिस्से में आता है, न कि चीन की तरफ।’ हालांकि, नेपाली मौसम वैज्ञानिक विभूति पोखरेल कहती हैं, ‘हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अब तक ये पता नहीं है कि घटना नेपाल में हुई या चीन की तरफ हुई है।’ दरअसल, मानसून सीजन के चलते उस इलाके में काफी बादल हैं। इसलिए सेटेलाइट तस्वीरों से ये साफ नहीं हो पा रहा है कि ग्लेशियर टूटने की सटीक लोकेशन क्या है। मोटे तौर पर जहां ग्लेशियर टूटा, वो इलाका सेंट्रल हिमालयन रेंज की क्रेस्टलाइन पर है। यानी अगर पहाड़ की एक तरफ की ढलान नेपाल में है, तो उसी पहाड़ की दूसरी तरफ की ढलान तिब्बत में है, जिस पर चीन का कंट्रोल है। करीब 8000 मीटर की ऊंचाई पर बर्फ और ग्लेशियर जमा रहते हैं, जो पिघलकर दोनों तरफ की नदियों के लिए पानी का सोर्स बनते हैं। तकनीकी तौर पर अगर ऊंचाई पर कोई ग्लेशियर टूटे, तो उसका असर नीचे दोनों देशों के तरफ की नदियों पर पड़ सकता है। पोइकू नदी तिब्बत के ग्लेशियर से निकलती है। फिर सीमा पार करके नेपाल में दाखिल होती है और वहां भोटेकोशी कही जाती है, इसी की सहायक नदी ल्हेंदे में बाढ़ आई। एक बात और है- चीन के मुताबिक, पहले भूकंप आया और फिर ग्लेशियर टूटा। जबकि नेपाल सहित दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिक मानते हैं कि पहले ग्लेशियर टूटा, जिससे भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ। सवाल-5: ग्लेशियर टूटने से नेपाल में इतनी भीषण तबाही कैसे आई?
जवाबः पूरी घटना 3 स्टेप में समझिए…. 1. ग्लेशियर टूटा: 26 अगस्त की सुबह करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर करीब 2000 फीट का ग्लेशियर टूटा और 4 हजार फीट नीचे गिर गया। 2: नदी में पानी जमा हुआ: सुबह करीब 8:37 बजे पिघला ग्लेशियर अपने साथ चट्टानों और मलबे को लेकर ल्हेंदे नदी से टकराया। इससे ल्हेंदे नदी पर एक अस्थायी बांध बन गया और पीछे पानी जमा होने लगा। 3. नदी का बांध टूटने से सैलाब बह चला: सुबह करीब 9 बजे बढ़ते पानी के दबाव से नदी का बांध टूटा, तो एक विशाल सैलाब बनकर निचले इलाकों की तरफ बह चला। आगे भोटे कोशी और त्रिशुली नदी में मलबे वाली बाढ़ आ गई। नेपाल के रसुवा से नुवाकोट, धादिंग होते हुए चितवन तक भयावह बाढ़ का असर हुआ। रसुवा में करीब एक दर्जन बस्तियां प्रभावित हुईं। बाढ़ धादिंग जिले के गल्छी तक पहुंची और आगे मुग्लिन की ओर बढ़ने की चेतावनी दी गई। खतरा अभी टला नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नेपाल-चीन बॉर्डर के पास नदी में अब भी एक मलबे का अवरोध जमा है, जो किसी भी वक्त टूटकर सैलाब की एक दूसरी लहर छोड़ सकता है। जिस त्रिशुली नदी में यह बाढ़ आई है वह आगे नारायणी नदी से मिलती है। यह भारत के बिहार तक आती है, जहां इसे गंडक नदी कहते हैं। इसे बिहार और यूपी के इलाके भी हाई अलर्ट पर रखे गए हैं। ——— ये वीडियो भी देखिए… 2000 फीट चौड़ा ग्लेशियर टूटा, बिना भूकंप कांपने लगी धरती:देखिए नेपाल की तबाही का शुरू से आखिर तक एक-एक सीन 26 अगस्त, सुबह 8:30 बजे। नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर मौसम साफ था। किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले 30 मिनट में क्या होने वाला है। शुरुआत से आखिर तक नेपाल की तबाही का एक-एक सीन, वीडियो देखिए…

45 वर्षीय रोजर फेडरर ने संन्यास के बाद भी किया कमाल, वापसी पर जीता मैच (Video)

स्विस टेनिस दिग्गज रोजर फेडरर ने आर्थर ऐश स्टेडियम में एक एग्ज़िबिशन इवेंट में खेलते हुए यूएस ओपन में जीत के साथ वापसी की। 2022 में संन्यास लेने के बाद से फेडरर ज़्यादातर लाइमलाइट से दूर रहे हैं, लेकिन ‘रोजर फेडरर: एन आइकन रिटर्न्स टू न्यूयॉर्क’ नाम के इवेंट में कोर्ट पर उनकी वापसी का बेसब्री से इंतज़ार किया जा रहा था।

20 बार के ग्रैंड स्लैम चैंपियन फेडरर – जिन्होंने आखिरी बार 2019 में यूएस ओपन में हिस्सा लिया था – ने मंगलवार को अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी एंडी रॉडिक के खिलाफ़ 6-3 से जीत हासिल की। इस दौरान न्यूयॉर्क की भीड़ में उनकी पत्नी मिर्का और उनके दो जुड़वां बच्चों के जोड़े भी मौजूद थे। इस महीने की शुरुआत में 45 साल के हुए फेडरर ने फिर जॉन मैकेनरो के साथ मिलकर रॉडिक और आंद्रे अगासी के खिलाफ़ एक डबल्स मैच जीता।

फेडरर ने कहा, “न्यूयॉर्क वापस आकर बहुत अच्छा लग रहा है। यह शानदार है। मेरे पास इस कोर्ट, यहाँ के फ़ैन्स और शहर से जुड़ी बेहतरीन यादें हैं। 2004, 2005 में यहीं से सब शुरू हुआ था – न्यूयॉर्क के लिए मेरा प्यार और यहाँ मिली जीत।” फेडरर को 29 अगस्त को इंटरनेशनल टेनिस हॉल ऑफ़ फ़ेम में शामिल किया जाएगा।

फेडरर ने 24 वर्षों में 1500 से अधिक मैच खेले हैं, हालांकि पिछले तीन साल उनके टेनिस जीवन के लिये काफी संघर्षपूर्ण साबित हुये। फेडरर ने 2003 में सिर्फ 21 साल की उम्र में विंबलडन के रूप में अपना पहला ग्रैंड स्लैम खिताब जीता था जबकि आखिरी बार उन्होंने 2021 के फ्रेंच ओपन में हिस्सा लिया था, जहां वह तीसरे राउंड की जीत के बाद रिटायर हो गए थे। इसके बाद से वह लगातार कोर्ट में वापसी का प्रयास कर रहे थे।

पिछले कुछ वर्षों में, फेडरर ने पुरुष एकल टेनिस में कई रिकॉर्ड तोड़े हैं। फेडरर ने 20 ग्रैंड स्लैम जीते हैं और 103 करियर एटीपी खिताब हासिल किए हैं। 2018 में फेडरर को 36 साल की उम्र में सबसे उम्रदराज होने के बावजूद विश्व नंबर 1 बनने का गौरव हासिल हुआ। स्विस आइकन ने अपने करियर में 223 युगल मैच खेले हैं। फेडरर ने 2018 में ऑस्ट्रेलियन ओपन में अपना आखिरी ग्रैंड स्लैम खिताब जीता था. इसके बाद वह 2019 के विंबलडन के फाइनल में पहुंचे थे, जहां एक रोमांचक मुकाबले में नोवाक जोकोविच ने उन्हें शिकस्त दी थी।