जंतर-मंतर पर दिपके का साया बने आशुतोष रांका कौन हैं? जानें IIT, LSE और मैकिन्से से आंदोलन तक का सफर

Who is Ashutosh Ranka: IIT कानपुर से इंजीनियरिंग, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई और फिर लंदन में मैकिन्से जैसी ग्लोबल कंपनी में भारी-भरकम पैकेज वाली नौकरी! आम तौर पर लोग ऐसे करियर का सपना देखते हैं, लेकिन आशुतोष रांका इस सब से आगे बढ़कर देश के सबसे बड़े छात्र आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन चुके हैं। NEET पेपर लीक को लेकर CJP के ‘पॉलिसी हेड’ के रूप में केंद्र सरकार से सीधी बात करने वाले आशुतोष रांका कौन हैं और कैसे एक कॉर्पोरेट कंसल्टेंट छात्रों की सबसे बड़ी आवाज बन गया, आइए आपको बताते हैं।

कौन हैं आशुतोष रांका?

आशुतोष रांका ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के आधिकारिक प्रवक्ता हैं। उन्हें इस पूरे आंदोलन का ‘पॉलिसी माइंड’ माना जा रहा है, क्योंकि वे शिक्षा सुधारों और सरकारी नीतियों के खिलाफ तार्किक और नीतिगत ड्राफ्ट तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

उन्होंने देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान IIT कानपुर से पढ़ाई की है और इसके बाद लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) जैसी विश्व प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की है। CJP में शामिल होने से पहले आशुतोष रांका लंदन में दुनिया की दिग्गज कंसल्टिंग फर्म मैकिन्से एंड कंपनी (McKinsey & Company) में कंसल्टेंट के रूप में काम कर चुके हैं।

फिलहाल वो आंदोलन की नीतिगत रणनीति, शिक्षा सुधारों के ड्राफ्ट और केंद्र सरकार के साथ बातचीत में CJP का प्रतिनिधित्व कर रहे है।

कॉर्पोरेट की नौकरी छोड़ आंदोलन का हिस्सा क्यों बने?

जब जून में CJP ने अपने प्रवक्ताओं के पैनल का ऐलान किया, तब आशुतोष रांका के शानदार एकेडमिक और प्रोफेशनल बैकग्राउंड को खास तौर पर हाईलाइट किया गया। IIT कानपुर, LSE और मैकिन्से जैसी ग्लोबल कंपनियों में काम करने के अनुभव के कारण उनके पास नीतियों के विश्लेषण और रणनीतिक समझ का गहरा अनुभव है। नीट परीक्षा में हुई धांधली के बाद उन्होंने अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल छात्रों की मांगों को कानूनी और नीतिगत रूप से मजबूत बनाने के लिए किया।

केंद्र सरकार के साथ बातचीत में अहम भूमिका

NEET आंदोलन के तहत जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के बीच आशुतोष रांका ने सरकार के साथ बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सौरव दास के साथ आशुतोष रांका भी उस दो सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे, जिसने केंद्रीय मंत्री से मुलाकात कर छात्रों की मांगों का ड्राफ्ट सौंपा। वे केवल परीक्षा रद्द करने या जांच तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश की परीक्षा प्रणाली में दीर्घकालिक और पारदर्शी सुधारों की रूपरेखा पर भी काम कर रहे हैं।

जंतर-मंतर पर डटे हैं CJP संस्थापक

जहां आशुतोष रांका और सौरव दास सरकार के साथ टेबल टॉक संभाल रहे हैं, वहीं CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र अभिजीत ने बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच’ से किए जाने वाले एक बयान के विरोध में इस पार्टी की नींव रखी थी।

Samsung ‘इंडिया इनोवेशन कॉन्टेस्ट’ की टॉप चार टीमों को 2 करोड़ रुपये देगी, जानिए कॉन्टेस्ट की जरूरी बातें

सैमसंग अपनी इनोवेशन और एजुकेशन प्रतियोगिता के अगले चरण में भारत में 100 टीमों का चुनाव करेगी। इस प्रतियोगिता का नाम ‘सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो’ है। इस प्रतियोगिता की टॉप 4 टीमों को 2 करोड़ रुपये का इनक्यूबेशन ग्रांट मिलेगा। यह प्रतियोगिता पूरे देश में आयोजित होगी। सैमसंग दक्षिण कोरिया की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी है।

सैमसंग ने 184 डिजाइन थिंकिंग वर्कशॉप आयोजित किए

Samsung ने इस साल 184 डिजाइन थिंकिंग वर्कशॉप आयोजित किए। इसमें जम्मू-कश्मीर से लेकर तमिलनाडु और गुजरात से लेकर त्रिपुरा के स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटीज के हजारों स्टूडेंट्स ने हिस्सा लिए। सैमसंग ने बताया कि डिजाइन थिंकिंग वर्कशॉप्स देश के 135 शहरों में आयोजित किए गए। इससे यह देश के सबसे बड़े ग्रॉसरूट इनोवेशन प्लेटफॉर्म्स में से एक बन गया है।

सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो में 100 टॉप टीमें चुनी जाएंगी

डिजाइन थिंकिंग वर्कशॉप्स अब पूरा हो चुका है। सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो अगले चरण में प्रवेश कर गया है। इसमें पार्टिसिपेंट्स की तरफ से सब्मिट किए गए आइडिया के आधार पर टॉप 100 टीमें चुनी जाएंगी। उसके बाद टीमों को मेन्टॉरशिप, एक्सपर्ट गाइडेंस जैसी सहायता दी जाएगी। यह जानकारी कंपनी ने दी है। टॉप चार टीमों को 2 करोड़ रुपये की इनक्यूबेशन ग्रांट दी जाएगी।

टॉप 4 टीमों को मेन्टॉरशिप और प्रोटोटाइप डेवलपमेंट सपोर्ट भी मिलेगा

इनक्यूबेशन ग्रांट के अलावा टॉप 4 टीमों को मेन्टॉरशिप और प्रोटोटाइप डेवलपमेंट सपोर्ट मिलेगा। यह सपोर्ट FITT-IIT देगा। सैमसंग के साऊथवेस्ट एशिया के कॉर्पोरेट वाइस प्रसिडेंट एस पी चुन ने कहा कि हम सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो के जरिए देशभर के युवाओं के माइंडसेट डेवलप करने में मदद कर रहे हैं।

देश के हर कोने से इनोवेटिव आइडिया के लिए युवाओं को प्रोत्साहन

उन्होंने कहा कि युवाओं के माइंडसेट डेवलप करने के लिए टेक्नोलॉजी के साथ थिंकिंग को प्रोत्साहित किया जाता है। इसके लिए उन्हें अपनी कम्युनिटी से जुड़ी चुनौतियों को हल करना होता है। उन्होंने कहा कि यह इस प्रोग्राम का पांचवां साल है। इसके जरिए देश के हर कोने से इनोवेटिव आइडिया के लिए युवाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें 14 से 22 साल की उम्र के युवा हिस्सा लेते हैं।

GATE 2027: फरवरी 2027 में होगी गेट परीक्षा, आईआईटी मद्रास ने रोबोटिक्स का पेपर किया शुरू

GATE 2027: इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) मद्रास ने ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग (GATE) 2027 के लिए परीक्षा कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। यह राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है, जिसका आयोजन 6, 7, 13, 14, 20 और 21 फरवरी, 2027 को हर दिन सुबह और दोपहर दो शिफ्ट में होगा। आईआईटी मद्रास, नेशनल कोऑर्डिनेशन बोर्ड (GATE), शिक्षा मंत्रालय की ओर से इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) और दूसरे आईआईटी के साथ मिलकर GATE 2027 का आयोजन कर रहा है। पहली बार 1983 में शुरू हुई परीक्षा का इस साल 45वां एडिशन है।

ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया अगस्त 2026 के बीच में आधिकारिक गेट 2027 पोर्टल के जरिए शुरू होने की उम्मीद है। सुरक्षा बढ़ाने और परीक्षा प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए, आईआईटी मद्रास उम्मीदवारों के पंजीकरण को डिजिलॉकर और फेशियल ऑथेंटिकेशन के साथ जोड़ेगा। इससे परीक्षा केंद्र पर वेरिफिकेशन और प्रवेश आसान हो जाएगा। आईआईटी मद्रास ने बदलते एकेडमिक ट्रेंड और इंडस्ट्री की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पांच साल में पहली बार सभी टेस्ट पेपर के लिए गेट सिलेबस में बदलाव किया है।

गेट 2027 परीक्षा की संभावित तारीख ब्रांच शेड्यूलिंग

गेट के पेपर का मूल कार्यक्रम परीक्षा की तारीख करीब आने पर जारी किया जाता है, लेकिन ज्यादा वॉल्यूम वाले पेपर आम तौर पर स्टैंडर्ड शेड्यूलिंग पैटर्न को फॉलो करते हैं। अनुमान है कि इस बार पेपरों का शेड्यूल कुछ इस प्रकार रहेगा

6–7 फरवरी : कंप्यूटर साइंस (CS), मैकेनिकल इंजीनियरिंग (ME), इंस्ट्रूमेंटेशन (IN), और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग (EE) का बंटवारा।

13–14 फरवरी : सिविल इंजीनियरिंग (CE), इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन (EC), केमिकल इंजीनियरिंग (CH), और प्राइमरी साइंसेज स्ट्रीम।

20–21 फरवरी : डेटा साइंस और AI (DA), नए एडिशन, और बचे हुए स्पेशलाइज्ड पेपर।

नया पेपर पेश किया गया

अपडेट के हिस्से के तौर पर, गेट 2027 से एक नया रोबोटिक्स और ऑटोमेशन (RA) पेपर का विकल्प भी छात्रों को मिलेगा। टेक्सटाइल इंजीनियरिंग और फाइबर साइंस (TF) पेपर को भी रीस्ट्रक्चर किया गया है और अब इसे इंजीनियरिंग साइंसेज (XE) के तहत एक सेक्शनल पेपर के तौर पर पेश किया जाएगा। गेट 2027 सिर्फ अंग्रेजी में ही होगा और इसमें 30 टेस्ट पेपर होंगे। परीक्षार्थियों के पास आयोजक संस्थान द्वारा तय कॉम्बिनेशन के आधार पर एक या दो पेपर देने का विकल्प होगा।

एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया

गेट 2027 में शामिल होने के लिए कोई उम्र सीमा निर्धारित नहीं है। जिन परीक्षार्थियों ने इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, आर्किटेक्चर, साइंस, आर्ट्स या कॉमर्स में बैचलर डिग्री पूरी कर ली है, या अभी फाइनल ईयर में हैं, वे आवेदन करने के योग्य हैं। पहले पेश किए गए बदले हुए योग्यता मानदंड के अनुसार, बीटेक कार्यक्रम के तीसरे साल के छात्रों को भी परीक्षा देने की इजाजत है।

गेट 2027 का एडमिट कार्ड जनवरी में जारी होगा

गेट 2027 एडमिट कार्ड जनवरी 2027 में GOAPS (GATE Online Application Processing System) पोर्टल के जरिए जारी होने की उम्मीद है। आवेदन प्रक्रिया को पूरा करने वाले उम्मीदवार अपनी एनरोलमेंट आईडी/ईमेल आईडी और पासवर्ड से लॉग इन करके अपने हॉल टिकट डाउनलोड कर पाएंगे।

गेट 2027 रिजल्ट की तारीख

गेट 2027 रिजल्ट 19 मार्च 2027 (शुक्रवार) को घोषित किया जाएगा। रिजल्ट घोषित होने के बाद कैंडिडेट अपनी एनरोलमेंट आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल करके GOAPS पोर्टल पर अपने स्कोरकार्ड देख पाएँगे।

गेट 2027 एग्जाम पैटर्न और क्वेश्चन पेपर

ऑफिशियल वेबसाइट एग्जाम पैटर्न के बारे में भी जानकारी देती है। कैंडिडेट इनके बारे में जानकारी पा सकते हैं:

  • एग्जाम का समय
  • सवालों का टाइप
  • मार्किंग स्कीम
  • मल्टीपल-चॉइस सवाल (MCQs)
  • मल्टीपल सेलेक्ट सवाल (MSQs)
  • न्यूमेरिकल आंसर टाइप (NAT) सवाल

पिछले सालों के क्वेश्चन पेपर भी उपलब्ध हैं ताकि परीक्षार्थी को परीक्षा फॉर्मेट समझने में मदद मिल सके।

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3500 रुपये के इन्वेस्टमेंट से खड़ा कर लिया 1.5 करोड़ का मिलेट बिजनेस! नासिक के इंजीनियर तुषार ने किया कमाल

Business idea: जीवन में कभी-कभी बड़ी कठिनाइयों के दौरान ही बड़े अवसर क्रिएट करने का मौका मिलता है। ऐसा ही कुछ हुआ नासिक के एक मैकेनिकल इंजीनियरिंग ग्रैजुएट के साथ। भारत समेत पूरी दुनिया जब कोरोना की महामारी से जूझ रही थी तो उसी समय इस इंजीनियर ने एक शानदार बिजनेस की शुरुआत के लिए कदम बढ़ा दिया। ये कहानी है तुषार तलवारे की जिन्होंने कोरोना लॉकडाउन के दौरान महज 3500 रुपये के शुरुआती निवेश से अपने घर से मिलेट (बाजरा/मोटा अनाज) बेचने का एक छोटा सा प्रयोग शुरू किया था।

आज उनका यह स्टार्टअप फूडोनिक नाम के एक बड़े ब्रांड में बदल चुका है। इसका सालाना रेवेन्यू 1.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह कंपनी आज पूरे भारत में मिलेट खाखरा, आटा, पास्ता, नूडल्स और कई तरह के हेल्दी स्नैक्स बेच रही है।

कॉलेज के रूममेट और IIT बॉम्बे के सेमिनार से मिला आइडिया

तुषार की इस एंटरप्रेन्योरशिप जर्नी की शुरुआत बेहद दिलचस्प रही। 30Stades के साथ एक इंटरव्यू में तुषार ने बताया कि जब वह नवी मुंबई में पढ़ाई कर रहे थे तब उनके एक कॉलेज रूममेट ने उन्हें उनकी फिटनेस और वेलनेस के प्रति रुचि को देखते हुए हेल्दी फूड सेक्टर में करियर तलाशने की सलाह दी थी।

तुषार की यह रुचि तब एक ठोस बिजनेस आइडिया में बदल गई जब उन्होंने पवई स्थित IIT बॉम्बे में प्रसिद्ध मिलेट रिसर्चर डॉ खादर वली के एक सेमिनार में हिस्सा लिया। इस सेशन से उन्हें मिलेट्स की न्यूट्रिशनल वैल्यू का पता चला और उन्होंने महसूस किया कि उस समय बाजार में मिलेट-आधारित प्रोडक्ट्स बहुत ही कम उपलब्ध थे।

इस सेक्टर को बेहतर ढंग से समझने के लिए तुषार ने कई दूसरे सेमिनार्स में हिस्सा लिया और मिलेट की खेती, इसके स्वास्थ्य लाभ व सप्लाई चेन को समझने के लिए ऑनलाइन कोर्सेज भी पूरे किए।

₹3500 का पहला ऑर्डर और लॉकडाउन में डिलीवरी की चुनौती

बड़ा निवेश करने के बजाय तुषार ने पहले इस आइडिया को छोटे स्तर पर टेस्ट करने का फैसला किया। साल 2020 में कोरोना लॉकडाउन के दौरान नासिक में अपने घर पर रहते हुए तुषार ने मात्र 3500 रुपये निवेश किए। उन्होंने डॉ खादर वली के नेटवर्क के जरिए तमिलनाडु के एक किसान से 5 अलग-अलग किस्मों के 5-5 किलो मिलेट्स खरीदे।

परिवार, दोस्तों और शुरुआती ग्राहकों से मिले सकारात्मक फीडबैक से उत्साहित होकर उन्होंने अपने अगले ऑर्डर को बढ़ाकर हर किस्म का 20-20 किलो कर दिया। लॉकडाउन के कारण जब लॉजिस्टिक्स सेवाएं पूरी तरह प्रभावित थीं तब तुषार ने ऑर्डर हासिल करने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप्स और लोगों की सिफारिशों का सहारा लिया। उस समय सिर्फ इंडिया पोस्ट की सेवाएं चालू थीं, इसलिए वे घर पर ही अपने हाथों से एक-एक किलो के पाउच पैक करते थे और डाक के जरिए पूरे देश में ग्राहकों को भेजते थे।

किफायती कीमत की वो रणनीति जो कर गई काम

मार्केट रिसर्च के दौरान तुषार ने देखा कि कई विक्रेता 5 किलो मिलेट्स के लिए करीब 1200 रुपये तक चार्ज कर रहे थे। चूंकि उनकी खरीद लागत काफी कम थी, इसलिए उन्होंने अपने प्रोडक्ट्स की कीमत को किफायती रखने का फैसला किया। तुषार बताते हैं कि उतनी ही मात्रा के लिए उनकी खरीद लागत सिर्फ 400 रुपये के आसपास थी।

इसलिए उन्हें अपने पैक्स की कीमत पोस्टल चार्ज और प्रॉफिट मार्जिन मिलाकर 700 रुपये रखी। इससे ग्राहकों को काफी किफायती दाम में हेल्दी फूड मिलने लगा और तुषार को भी एक बेहतर मार्जिन मिला। यह प्राइसिंग स्ट्रेटजी पूरी तरह सफल रही और देश के अलग अलग हिस्सों से ताबड़तोड़ ऑर्डर आने शुरू हो गए।

₹1.5 लाख से ₹1.5 करोड़ तक का सफर

जैसे-जैसे मांग बढ़ी तुषार ने नासिक में ही 2000 रुपये महीने के किराए पर एक कमरा लिया और अपने काम को वहां शिफ्ट कर दिया। रेडी-टू-ईट मिलेट प्रोडक्ट्स की मांग को देखते हुए उन्होंने कांट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स के साथ पार्टनरशिप की और आटा, पास्ता व नूडल्स जैसे प्रोडक्ट तैयार करवाने लगे जबकि उनका खुद का ध्यान ब्रांडिंग, सेल्स और डिस्ट्रीब्यूशन पर रहा।

कंपनी ने भी फिर रफ्तार पकड़ी। साल 2020 में 1.5 लाख का टर्नओवर, साल 2021 में 12 लाख के टर्नओवर में बदल गया। साल 2023 में उन्होंने अपने पोर्टफोलियो में मिलेट चिवड़ा, फ्लेक्स और दूसरे स्नैक्स शामिल किए।

कारोबार के विस्तार के साथ तुषार को केंद्र सरकार की PMFME योजना (PM Formalisation of Micro Food Processing Enterprises Scheme) के तहत 10 लाख रुपये की सब्सिडी मिली। इस मदद से उन्होंने 15 अलग-अलग वैरायटी के मिलेट खाखरा बनाने के लिए अपनी खुद की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित की।

हीरो हैं ये 8 महिलाएं: बिना किसी केमिकल के तैयार होता है खाखरा

फैक्ट्री स्थापित करना तो केवल शुरुआत थी, मिलेट खाखरा को बड़े पैमाने पर बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। शुरुआत में आटा मशीनों से चिपक जाता था और सही खाखरा नहीं बन पाता था। फूड कंसल्टेंट्स ने इसमें बाइंडर्स और एडिटिव्स मिलाने की सलाह दी लेकिन तुषार इसे 100% नेचुरल रखना चाहते थे।

महीनों की कड़ी मेहनत और 2000 किलो से अधिक मिलेट आटा इस्तेमाल करने के बाद उनकी टीम ने परफेक्ट रेसिपी तैयार की। ये खाखरे बिना किसी प्रिजर्वेटिव, एडिटिव्स या सिंथेटिक बाइंडर्स के बनाए जाते हैं और स्वाद को बरकरार रखने के लिए कंपनी अपने खुद के मसालों का मिश्रण तैयार करती है।

वर्तमान में नासिक स्थित Fudonik की इस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को 8 महिलाएं संभाल रही हैं। बाजार में खाखरा लॉन्च करने से पहले कंपनी ने 6 महीने तक ग्राहकों का फीडबैक लिया और लैबोरेटरी टेस्ट भी पूरे किए।

भविष्य की योजनाएं

आज यह कंपनी इन-हाउस खाखरा और चिवड़ा बनाती है जिसके पास 2500 से अधिक रिटेल ग्राहक हैं और यह अपने B2B बिजनेस का भी तेजी से विस्तार कर रही है। अपनी आगे की योजनाओं को लेकर तुषार बताते हैं कि वे अगले साल मिलेट कुकीज भी लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं।

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Disclaimer: यह रिपोर्ट पूरी तरह से थर्ड पार्टी मीडिया आउटलेट्स की रिपोर्ट पर आधारित है। मनीकंट्रोल ने इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है और न ही वह इनका समर्थन करता है।

5 साल तक जीरो सेल्स, अब Ather Energy बनी ₹50000 करोड़ की कंपनी, Tesla से इस सीख ने बदल दी इंडस्ट्री की तस्वीर

करीब 13 साल पहले भारतीय ऑटो इंडस्ट्री को इलेक्ट्रिकल वेईकल्स में कोई भविष्य नहीं दिख रहा था। हर वेंडर से सस्ते से सस्ता पार्ट लेकर असेंबलिंग के बाद एक इलेक्ट्रिक स्कूटर की लागत करीब ₹5 लाख पड़ती। ऑटो इंडस्ट्री के मुताबिक यह मॉडल व्यावहारिक नहीं था। इन सबके बीच तरुण मेहता और स्वप्निल जैन ने इसे अलग नजरिए से देखा और वह भी तब, जब वे अभी भी आईआईटी मद्रास से इंजीनयरिंग करके निकले थे। खास बात ये भी है कि वह टेस्ला (Tesla) की स्टडी तो कर रहे थे लेकिन कारों की नहीं बल्कि इसके फाइनेंशियल्स की। इस स्टडी की नींव पर उन्होंने एथर एनर्जी (Aether Energy) जैसी ऐसी कंपनी खड़ी कर दी जिसने पांच साल तक कोई सेल्स नहीं की और अब यह यह ₹50 हजार करोड़ की कंपनी बन चुकी है।

क्या मिला Tesla के फाइनेंशियल्स से?

तरुण टेस्ला के निवेशकों की रिसर्च रिपोर्ट की स्टडी करते थे। इसमें उन्होंने एक खास बात नोटिस की कि लिथियम-आयन सेल, मोटर और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स की वास्तविक लागत काफी कम थी। तरुण ने पाया कि ये महंगे इसलिए दिखाई देते थे क्योंकि इन्हें बड़े पैमाने पर बनाने और इंटीग्रेशन की प्रक्रिया अभी तैयार नहीं हुई थी।

कैसे पड़ी Aether Energy की नींव

तरुण और स्वप्निल की मुलाकात आईआईटी मद्रास में इंजीनियरिंग डिजाइन की पढ़ाई के दौरान हुई थी। दोनों ने साथ मिलकर कुछ रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर भी काम किया था। ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने नौकरियां की लेकिन फिर इस्तीफा देकर बैट्री पैक पर काम करने लगे। उनके मुताबिक बैट्री पैक भारतीय इलेक्ट्रिक गाड़ियों की सबसे बड़ी कमजोरी थी। 2012 के आखिरी दिनों में उन्होंने प्रोजेक्ट एसोसिएट के रूप में फिर आईआईटी मद्रास में वापसी की। वे हॉस्टल में रहते और लैब में काम करते थे। मात्र छह से सात महीनों में उन्होंने एक स्कूटर और बैट्री पैक का प्रोटोटाइप तैयार कर लिया। वर्ष 2013 में एथर एनर्जी को औपचारिक रूप से IIT-M रिसर्च पार्क में इनक्यूबेट किया गया। अगले साल 2014 में उन्हें टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड और आईआईटी के एक पूर्व छात्र से ₹45 लाख की फंडिंग मिली।

दो फैसलों ने तय कर दी दिशा

एथर की नींव अक्टूबर 2013 में पड़ी थी। उसी साल दो फैसलों ने कंपनी की पूरी दिशा तय कर दी। पहला फैसला था कि कंपनी आम लोगों के लिए स्कूटर बनाएगी। उस समय भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियां धीमे और कम पावर वाले होते थे जिसे मुख्य रूप से बुजुर्गों या बिना लाइसेंस के युवाओं के लिए बनाया जाता था। दूसरा फैसला था, स्कूटर के हैंडलबार पर सात इंच की टचस्क्रीन, सिम कार्ड और एक फुल सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम देना जोकि उस समय दुनिया में किसी भी दोपहिया गाड़ी पर नहीं था। देश की सड़कों, धूल, बारिश और प्रदूषण के बीच टचस्क्रीन को भरोसेमंद बनाना काफी महंगा और रिस्क वाला था। हालांकि यही दो फैसले एथर की नींव बने।

पांच साल तक जीरो सेल्स से ₹50 हजार करोड़ की कंपनी

एथर का पहला प्रोडक्ट 2018 के मध्य में आया यानी कि पहले पांच साल तक इसकी सेल्स जीरो रही। पहले पांच साल कंपनी की टीम में अधिकतर ऐसे नए ग्रेजुएट्स थे जिन्होंने कॉलेज में रेस कारें बनाई थीं। उनके लिए ग्रेजुएशन के बाद ही सैलरी के साथ गाड़ियों को बनाने का काम करना एक सपने के पूरा होने जैसा था। इससे उन्हें लंबे समय तक कंपनी से जोड़े रखना आसान रहा। हालांकि ऐसा नहीं है कि मुश्किलें नहीं आई। एक निवेशक ने तो सलाह दी थी कि कंपनी सिर्फ होंडा एक्टिवा में इलेक्ट्रिक मोटर लगाकर बेचना शुरू करे। कई ने तो अपना प्रोडक्ट या तकनीक नहीं बनाने की सलाह दी क्योंकि उनके मुताबिक भारत में ऐसे प्रोडक्ट को मार्केट नहीं है। हालांकि एथर अपने विजन पर कायम रही।

सेल्स के आंकड़े

कंपनी के बिक्री की बात करें तो साल 2022 में कंपनी ने 54,769 यूनिट्स बेचीं। 2023 में यह बढ़कर 1,11,812 और साल 2024 में 1,36,513 यूनिट्स तक पहुंच गई। अगले ही साल कंपनी की सेल्स 57% बढ़कर 2,14,985 यूनिट्स पर पहुंच गई। इस साल 2026 की पहली छमाही में ही एथर ने 1,69,020 यूनिट्स का रजिस्ट्रेशन किया, जो पिछले साल 2025 की समान अवधि की तुलना में 91% अधिक थी। ओवरऑल बात करें तो जून 2026 तक कंपनी ग्राहकों को 7 लाख से अधिक गाड़ियों की डिलीवरी कर चुकी है, जिसमें से आखिरी 2 लाख यूनिट्स केवल 8 महीनों में बेची गईं। वित्त वर्ष 2026 में कंपनी ने कुल 2,62,942 यूनिट्स बेचीं, जो सालाना आधार पर 69% अधिक थी।

बाजार में दबदबे की बात करें तो वित्त वर्ष 2026 में दोपहिया ईवी सेगमेंट में इसकी हिस्सेदारी बढ़कर 18.6% हो गई। कंपनी के लिए सबसे शानदार महीना अक्टूबर 2025 रहा, जब इसने 26,713 यूनिट्स बेची और 19.6% मार्केट हिस्सेदारी रही। इस दौरान इसने ओला इलेक्ट्रिक को भी पीछे छोड़ दिया था।

कंपनी के लिए सबसे दमदार गाड़ी एथर रिज्टा साबित हुई जो अप्रैल 2024 में लॉन्च हुई थी। सिर्फ 11 महाने में इसने 1 लाख सेल्स का आंकड़ा पार कर लिया। दिसंबर 2025 तक 2 लाख और अप्रैल 2026 तक लॉन्च के सिर्फ 25 महीने में 3 लाख सेल्स का रिकॉर्ड बना लिया। आज एथर की कुल मासिक बिक्री में इसकी हिस्सेदारी 76% है।

₹200 करोड़ का दांव, Ather Energy में इस कारण सरकारी फंड कर रही निवेश

सही जवाब पता थे फिर भी IIT एग्जाम में लिखे गलत उत्तर, वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

भारत में IIT में दाखिला पाना लाखों छात्रों का सपना होता है, लेकिन एक युवक ने इस दौड़ से हटकर ऐसा फैसला लिया जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया। जब बाकी छात्र IIT में पहुंचने के लिए पूरी मेहनत कर रहे थे, तब ऋषभ खनेजा ने जानबूझकर अपनी परीक्षा में गलत जवाब लिखे। हैरानी की बात यह थी कि उन्हें सही उत्तर पता थे। उनका यह कदम असफलता नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी की दिशा खुद चुनने का प्रयास था।

परिवार और समाज की तय उम्मीदों से अलग रास्ता चुनना आसान नहीं था, लेकिन ऋषभ ने वही किया जो उन्हें सही लगा। आज उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि सफलता का मतलब सिर्फ बड़ी डिग्री या नौकरी हासिल करना नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य और खुशी को पहचानना भी है।

IIT की रेस में शामिल था

ऋषभ खनेजा ने Humans of Bombay के साथ अपनी कहानी साझा करते हुए बताया कि उन्होंने जानबूझकर IIT प्रवेश परीक्षा में असफल होने का फैसला किया था। उनका कहना है कि यह कदम किसी डर या कमजोरी की वजह से नहीं था, बल्कि इसलिए था क्योंकि वह ऐसी जिंदगी नहीं जीना चाहते थे जो उन्हें अपनी नहीं लगती थी।

उन्होंने बताया कि परीक्षा हॉल में बैठकर वह जानते थे कि सही जवाब क्या हैं, फिर भी उन्होंने कुछ सवालों के गलत उत्तर चुने।

परिवार ने देखा था एक तय रास्ता

ऋषभ परिवार के बड़े बेटे थे और उनके लिए भविष्य का रास्ता पहले से तय माना जाता था। विज्ञान से पढ़ाई, इंजीनियरिंग, MBA और फिर कॉर्पोरेट नौकरी यह वही सफर था जिसे समाज सफलता की पहचान मानता है।

हर पारिवारिक समारोह में IIT और बड़ी नौकरी पाने वाले लोगों की कहानियां सुनाई जाती थीं। लेकिन ऋषभ के मन में एक सवाल था क्या यही रास्ता वास्तव में उन्हें खुश रखेगा?

दूसरों की सफलता देखकर उठे सवाल

ऋषभ ने महसूस किया कि जिन लोगों ने समाज के हिसाब से बड़ी उपलब्धियां हासिल की थीं, उनमें से कई लोग अंदर से खुश नहीं दिखते थे। इसी बात ने उन्हें अपनी जिंदगी और फैसलों पर सोचने के लिए मजबूर किया।

उन्होंने इंजीनियरिंग की जगह मुंबई के Mithibai College से Arts की पढ़ाई करने का फैसला किया। उस समय कई लोगों को लगा कि उन्होंने अपना करियर खराब कर लिया है।

एक क्लासरूम ने बदल दी सोच

बाद में ऋषभ Teach For India से जुड़े और मुंबई के मानखुर्द इलाके में बच्चों को पढ़ाने लगे। यही अनुभव उनकी जिंदगी का बड़ा मोड़ बना। उन्होंने बताया कि बच्चों के साथ काम करते हुए उन्हें एहसास हुआ कि असली संतुष्टि सिर्फ बड़े पद या ऑफिस की सफलता में नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लाने में भी मिल सकती है।

कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ी, चुना अपना रास्ता

ऋषभ ने कुछ समय कॉर्पोरेट सेक्टर में भी काम किया। अच्छी सैलरी और अच्छे माहौल के बावजूद उन्हें महसूस हुआ कि कुछ कमी रह गई है। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर तीन महीने की बाइक यात्रा की। इस सफर ने उन्हें खुद को बेहतर समझने का मौका दिया।

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आज रचनात्मक दुनिया में बना रहे पहचान

अब ऋषभ हिमाचल प्रदेश के बीड़ में रहते हैं और लेखक, फोटोग्राफर व कलाकार के रूप में काम कर रहे हैं। साथ ही वह लोगों को अपनी रचनात्मकता से दोबारा जुड़ने में मदद करते हैं।

‘सफलता और मंजूरी में से चुनना सबसे मुश्किल‘

ऋषभ का कहना है कि उनके और उनके माता-पिता के सपने अलग नहीं थे। माता-पिता भी सिर्फ उनकी खुशी चाहते थे, लेकिन उन्हें अपनी खुशी तक पहुंचने का रास्ता खुद तलाशना था। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सफलता का मतलब हमेशा वही रास्ता चुनना नहीं होता जिसे दुनिया सही मानती है, बल्कि वह रास्ता चुनना होता है जो व्यक्ति को अंदर से संतुष्ट करे।

कौन हैं एमके दास? जिन्होंने PM मोदी के ‘विकसित भारत 2047’ विजन के लिए झोंक दी अपनी पूरी ताकत

Who is Manoj Kumar Das

Manoj Kumar Das (MK Das) : यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) की परीक्षा पास करने वाला हर सिविल सर्वेंट ऊंचे पदों पर पहुंचकर देश सेवा करने का सपना देखता है। बिहार के दरभंगा के मूल निवासी और 1990 बैच के IAS अधिकारी मनोज कुमार दास (एमके दास) की कहानी भी कुछ ऐसी ही प्रेरणादायी है। दरभंगा में अपनी 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने प्रतिष्ठित IIT खड़गपुर से कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की और इसके बाद वे भारतीय सिविल सेवा में शामिल हो गए।

 

2. गुजरात सरकार के नए 'श्री विश्वसनीय'

नवंबर 2025 में गुजरात के मुख्य सचिव के रूप में कार्यभार संभालने के बाद एमके दास प्रशासनिक गलियारों में सरकार के नए 'श्री विश्वसनीय' (Mr. Dependable) बनकर उभरे हैं। पहले ऐसा माना जा रहा था कि लंबे समय तक आर्थिक और नीतिगत विभाग संभालने वाले दास के लिए सामाजिक क्षेत्र एक बड़ी चुनौती साबित होगा। हालांकि शासन की गहरी समझ और सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं को सही ढंग से पहचानकर उन्होंने प्रशासनिक तंत्र पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली है।

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3. आलोचकों को जवाब और सामाजिक सुधार

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार में मुख्य प्रशासनिक प्रमुख के रूप में सेवा दे रहे एमके दास ने पिछले 9 महीनों में अपने आलोचकों को गलत साबित कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री के दृष्टिकोण (Vision) के अनुरूप वे न केवल नीतिगत ढांचे को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि सामाजिक क्षेत्र के कल्याणकारी कार्यक्रमों को भी नई ऊंचाइयों पर ले गए हैं। विशेष रूप से गुजरात में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों (Dropouts) की दर को कम करने और बाल कुपोषण को जड़ से खत्म करने के लिए उन्होंने एक निर्णायक अभियान शुरू किया है।

 

4. एमके दास का प्रगतिशील '3E' फॉर्मूला

एमके दास का मानना है कि आज के बच्चे वर्ष 2047 के 'विकसित भारत' के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। वे राज्य के श्रमिकों के बच्चों तक भी 'शाला प्रवेशोत्सव' जैसे प्रगतिशील कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं। वे शासन चलाने के लिए खास '3E' फॉर्मूले पर भरोसा करते हैं, जिसका अर्थ है Effective (असरदार), Efficient (कुशल) और Easy (आसान)।

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5. फील्ड ऑफिसर से कलेक्टर तक का सफर

उन्होंने अपने सिविल सर्विस करियर की शुरुआत गुजरात के डभोई में SDM के रूप में की थी। इसके बाद, जब 2 अक्टूबर 1997 को जूनागढ़ से पोरबंदर जिला अलग हुआ, तो वे वहां के पहले जिला कलेक्टर बने। इसके अलावा, उन्होंने बनासकांठा और सूरत जैसे महत्वपूर्ण जिलों में कलेक्टर के रूप में और सूरत व वडोदरा नगर निगम में म्यूनिसिपल कमिश्नर के रूप में यादगार सेवाएं दी हैं। वडोदरा में कमिश्नर के तौर पर उनका 5 साल का कार्यकाल आज भी लोग बड़े आदर के साथ याद करते हैं।

 

6. केंद्रीय प्रतिनियुक्ति और CMO में दोहरी सेवा

राज्य स्तर के अलावा एमके दास ने केंद्र सरकार में भी महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है, जिसमें गृह मंत्रालय के तहत जम्मू-कश्मीर मामलों के निदेशक (Director) के रूप में उनकी भूमिका प्रमुख है। गुजरात में उन्होंने उद्योग, राजस्व, बंदरगाह, परिवहन, पंचायत और गृह जैसे कई संवेदनशील विभागों में अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) के रूप में कार्य किया है।

इसके अलावा, उन्हें दो बार मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) में सेवा करने का अवसर मिला, जहां उन्होंने 2017-2021 और 2024-2025 के दौरान मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।

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7. एमके दास की व्यक्तिगत प्रोफाइल और तकनीक का उपयोग

जन्म तिथि : 20 दिसंबर, 1966

सेवा प्रवेश वर्ष : 20 अगस्त, 1990

मुख्य सचिव के रूप में पदभार ग्रहण : 1 नवंबर, 2025

 

वे प्रशासनिक कार्यों में टेक्नोलॉजी के व्यापक उपयोग के हिमायती हैं। उनके मार्गदर्शन में गुजरात में अधिकांश सरकारी प्रमाणपत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसान बनाकर पूरी तरह से ऑनलाइन कर दिया गया है और आवश्यक दस्तावेजों की संख्या में भी भारी कटौती की गई है।

 

8. पॉलिसी फ्रेमवर्क और भविष्य का प्रशासनिक नेतृत्व

गुजरात को देश का अग्रणी डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हब बनाने के लिए हाल ही में 'विकसित गुजरात डेटा सेंटर नीति 2026-29' घोषित की गई है। इसके अतिरिक्त उनके नेतृत्व में पिछले 9 महीनों में 4 अन्य महत्वपूर्ण नीतियां भी लागू की गई हैं:

 

गुजरात ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर नीति 2025-30

गुजरात एकीकृत नवीकरणीय ऊर्जा नीति 2025

विकसित गुजरात औद्योगिक नीति 2026

गुजरात निर्यात नीति 2025

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सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि एमके दास ने प्रशासन पर इस कदर पकड़ बनाई है कि उन्होंने लंबे समय तक सुपर-ब्यूरोक्रेट रहे के. कैलाशनाथन की कमी महसूस नहीं होने दी। उनका कार्यकाल दिसंबर 2026 के अंत में समाप्त होने जा रहा है और वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2027 से ठीक पहले उनकी सेवानिवृत्ति नजदीक होने के कारण 1991 बैच की वरिष्ठ IAS अधिकारी जयंती एस. रवि को उनका संभावित उत्तराधिकारी माना जा रहा है।


Manoj Kumar Das

IIT की डिग्री और हाई पैकेज के बाद भी क्यों छोड़ी नौकरी? पत्नी संग पहाड़ों में रहने लगा शख्स

कभी बड़े शहरों की भागदौड़ और कॉर्पोरेट करियर का हिस्सा रहे IIT कानपुर के पूर्व छात्र अर्जव मोदी ने अपनी जिंदगी को एक नए नजरिए से देखना शुरू किया। अच्छी नौकरी, बेहतर कमाई और शहर की सुविधाओं के बीच भी उन्हें एक अलग तरह के संतुलन की तलाश थी। इसी तलाश ने उन्हें हिमाचल प्रदेश के छोटे से पहाड़ी कस्बे बीर तक पहुंचाया, जहां उन्होंने अपनी पत्नी सिमरन चौधरी के साथ एक अलग जीवनशैली अपनाई।

यहां की शांत वादियां, धीमी रफ्तार और प्रकृति के करीब रहने का अनुभव उनके लिए किसी बदलाव से कम नहीं रहा। अर्जव और सिमरन की यह कहानी अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है, जहां लोग करियर, खुशी और जिंदगी की प्राथमिकताओं को लेकर नए सिरे से सोच रहे हैं।

कम कमाई लेकिन ज्यादा खुशी का एहसास

शहरों में अच्छी कमाई और सुविधाओं के बावजूद अर्जव को महसूस हुआ कि जीवन में संतुष्टि की कमी है। अब वह फ्रीलांस राइटिंग और कंटेंट का काम करते हैं, जबकि उनकी पत्नी रिमोट जॉब जारी रखे हुए हैं। दोनों की संयुक्त आय पहले से आधी से भी कम हो गई है, लेकिन उनका कहना है कि वे अब ज्यादा खुश और संतुष्ट हैं।

95 किलो से 72 किलो तक, बदली सिर्फ जिंदगी नहीं सोच भी

अर्जव ने लिंक्डइन पर अपने सफर को साझा करते हुए बताया कि 2021 में IIT से निकलने के बाद वह बेंगलुरु में तेज-तर्रार कॉर्पोरेट लाइफ जी रहे थे। उस समय उनका वजन 95 किलो था। 2026 में वह पहाड़ों में सादा जीवन जी रहे हैं, वजन करीब 72 किलो है और कम कमाई के बावजूद खुद को ज्यादा बेहतर महसूस करते हैं।

पहाड़ों ने सिखाया ‘घर’ का असली मतलब

सिमरन ने बताया कि बीर में रहने के बाद उनकी जीवनशैली पूरी तरह बदल गई है। वे ज्यादातर खाना घर पर बनाते हैं, कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटते हैं और प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल लगभग छोड़ चुके हैं। उनके अनुसार, पहाड़ों ने सिखाया कि घर सिर्फ खूबसूरत जगह या महंगे सामान से नहीं बनता, बल्कि उस जगह से जुड़ने और उसमें योगदान देने से बनता है।

शहर की दौड़ बनाम पहाड़ों की शांति

अर्जव ने अपनी पोस्ट में दो तरह की जिंदगी की तुलना की। एक तरफ महानगर में रहने वाला युवा प्रोफेशनल है, जिसकी कमाई ज्यादा है, लेकिन लगातार दूसरों से तुलना, करियर का दबाव और अकेलेपन का सामना करना पड़ता है।

दूसरी तरफ पहाड़ी इलाके में रहने वाला व्यक्ति है, जिसकी आय कम हो सकती है, लेकिन वह प्रकृति, रिश्तों और रोजमर्रा के छोटे-छोटे पलों का आनंद लेता है।

‘पहाड़ों में चले जाओ’ नहीं, सोच बदलने की बात

अर्जव ने साफ किया कि उनका मकसद सभी को शहर छोड़कर पहाड़ों में बसने की सलाह देना नहीं है। उनका संदेश सिर्फ इतना है कि जिंदगी की खुशी केवल ज्यादा कमाई या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि अपनी प्राथमिकताओं को समझने और संतुलन बनाने में भी है।

हर ऑटो ड्राइवर एक जैसा नहीं! बेंगलुरु के इस शख्स का अंदाज देख मुस्कुरा उठेंगे आप

Siddharth Saxena: कौन हैं सिद्धार्थ सक्सेना? जिन्होंने 26 साल की उम्र में एक दिन में कमाए 76.99 करोड़ रुपये!

Who is Siddharth Saxena: इंटरनेट और सोशल मीडिया पर इन दिनों एक भारतीय टेक एंटरप्रेन्योर की कहानी तेजी से वायरल हो रही है। इस शख्स का नाम है सिद्धार्थ सक्सेना। इन्होंने हाल ही में खुलासा किया है कि उन्होंने महज 26 साल की उम्र में एक ही दिन में 8 मिलियन डॉलर (करीब 76.99 करोड़ रुपये) की कमाई की थी। कंटेंट क्रिएटर विराज अला के साथ हुए एक स्ट्रीट इंटरव्यू में सिद्धार्थ ने भारत के एक छोटे से शहर से अमेरिका में मल्टी-मिलियन डॉलर की कंपनियां खड़ी करने तक के अपने इस शानदार सफर के बारे में खुलकर बात की है। आइए जानते हैं कि कौन हैं सिद्धार्थ सक्सेना और उन्होंने यह मुकाम कैसे हासिल किया।

IIT कानपुर से की पढ़ाई, बोले- हार्वर्ड से 20 गुना मुश्किल है एडमिशन

विराज अला को दिए इंटरव्यू में सिद्धार्थ सक्सेना ने अपनी पढ़ाई और करियर के बारे में कई दिलचस्प बातें साझा कीं। सिद्धार्थ ने देश के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी कानपुर से कंप्यूटर साइंस में बी. टेक की डिग्री हासिल की है। वह साल 2019 में आईआईटी कानपुर से ग्रेजुएट हुए थे। इंटरव्यू के दौरान सिद्धार्थ ने दावा किया कि आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर साइंस प्रोग्राम में दाखिला पाना अमेरिका की प्रसिद्ध हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिलने से 20 गुना ज्यादा कठिन है।

एक दिन में ₹76.99 करोड़ की कमाई का सच

जब इंटरव्यूअर विराज अला ने सिद्धार्थ से पूछा कि उन्होंने एक साल में अधिकतम कितनी कमाई की है, तो सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि उन्होंने एक ही दिन में 8 मिलियन डॉलर (लगभग 76.99 करोड़ रुपये) कमाए हैं। इस पर जब उनसे पूछा गया कि क्या इसका मतलब यह है कि वह रातों-रात करोड़पति बन गए, तो उन्होंने कहा कि हां, कुछ ऐसा ही कह सकते हैं। उन्होंने महज 26 साल की उम्र में यह मुकाम हासिल कर लिया था। सिद्धार्थ ने बताया कि जब वह 16 साल के थे तब उन्होंने अपने भविष्य में इस तरह की सफलता की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं की थी।

कैसा रहा है सिद्धार्थ का करियर और बिजनेस?

आईआईटी कानपुर से 2019 में पास आउट होने के बाद सिद्धार्थ ने मशीन लर्निंग इंजीनियर के रूप में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ काम किया। उनके करियर के सफर में Envestnet, Yodlee, Wadhwani AI जैसी कंपनियों और एल्टो यूनिवर्सिटी, जूमियो कॉर्पोरेशन जैसे संस्थान रहे।

Merlin और Thine के को-फाउंडर

नौकरी के बाद सिद्धार्थ ने एंटरप्रेन्योरशिप की राह चुनी। साल 2022 में सिद्धार्थ ने अपने आईआईटी कानपुर के बैचमेट्स प्रत्यूष राय और शीर्षेंदु सरकार के साथ मिलकर Merlin नाम की एक एआई-पावर्ड क्रोम एक्सटेंशन कंपनी की सह-स्थापना की। रिपोर्ट्स के मुताबिक आज इस कंपनी की वैल्यूएशन लगभग 50 मिलियन डॉलर (करीब 418 करोड़ रुपये से अधिक) है। इसके अलावा सिद्धार्थ एक दूसरे स्टार्टअप Thine के भी को-फाउंडर हैं।

स्टार्टअप्स को लेकर क्या है उनकी सोच?

स्टार्टअप और बिजनेस को लेकर सिद्धार्थ का मानना है कि भारत में सीमित संसाधनों की वजह से बहुत से लोग स्कार्सिटी माइंडसेट (कमी की सोच/सुरक्षित चलने की मानसिकता) के साथ बड़े होते हैं। उनका कहना है कि सफल उद्यमी बनने के लिए इस मानसिकता को बदलकर अबंडेंस माइंडसेट (प्रचुरता की सोच) अपनाना बेहद जरूरी है, जहां लोग खुलकर जोखिम लेने और नए अवसरों की तलाश करने के लिए तैयार रहें।

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सिद्धार्थ ने दोनों देशों के वर्क-कल्चर की तुलना करते हुए कहा कि अमेरिका में लोग अक्सर काम को इसलिए चुनते हैं क्योंकि वे उसे पसंद करते हैं जबकि भारत में कई बार लोग मजबूरी या जरूरत की वजह से काम करते हैं।

E20 Petrol: एथेनॉल वाले पेट्रोल से इंजन खराब होता है या नहीं? IIT कानपुर की रिसर्च ने दिया बड़ा जवाब

E20 Petrol Row: देश भर में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल (E20) के रोलआउट को लेकर वाहन मालिकों के मन में कई तरह की चिंताएं और सवाल हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एथेनॉल वाले पेट्रोल से गाड़ी का इंजन खराब हो जाता है? इस मामले पर चल रही तमाम बहसों और आशंकाओं के बीच देश के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी कानपुर के रिसर्चर ने एक बड़ा और राहत देने वाला दावा किया है।

संस्थान के शोधकर्ताओं का कहना है कि उनकी स्टडी में E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से वाहनों के माइलेज में कोई खास गिरावट नहीं पाई गई है। इस बात के भी कोई सबूत नहीं मिले हैं कि E20 फ्यूल मौजूदा या पुरानी गाड़ियों के इंजन को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाता है।

माइलेज पर क्या होता है असर? IIT कानपुर की रिसर्च

आपको बता दें कि हाल ही में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि E20 फ्यूल के इस्तेमाल से कुछ वाहनों में माइलेज 5 प्रतिशत तक कम हो सकता है। हालांकि इसके फायदे इस मामूली नुकसान से कहीं अधिक हैं। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक इस पर आईआईटी कानपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के इंजन रिसर्च लेबोरेटरी के प्रोजेक्ट साइंटिस्ट ध्रुव राज कराना ने बताया है कि आईआईटी कानपुर में की गई रिसर्च के मुताबित E20 फ्यूल के इस्तेमाल से माइलेज में होने वाली कमी वास्तव में 5 प्रतिशत से भी कम है।

ध्रुव राज कराना ने स्पष्ट किया कि माइलेज में आने वाली 5 प्रतिशत तक की यह कमी फ्यूल के अलावा दूसरी वजहों से भी हो सकती है। अगर सामान्य या शुद्ध पेट्रोल के साथ भी लगातार दो बार बैक टू बैक टेस्ट किए जाएं तब भी इस तरह के परिणाम आ सकते हैं।

माइलेज कम होने की असली वजह: IIT की स्टडी के मुताबिक माइलेज में होने वाला कोई भी बदलाव फ्यूल से ज्यादा ड्राइवर की ड्राइविंग के तरीके, सड़क की स्थिति और गाड़ी के मेंटनेंस पर निर्भर करता है।

क्या सच में खराब होता है इंजन?

प्रोजेक्ट साइंटिस्ट ध्रुव राज कराना ने बताया कि काफी डिटेल्ड और एक्सटेंसिव टेस्टिंग से यह साबित हुआ है कि E20 फ्यूल के इस्तेमाल से इंजन को कोई नुकसान, जंग या अन्य तकनीकी समस्याएं नहीं होती हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर चल रही उन खबरों को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिनमें दावा किया जा रहा है कि E20 पेट्रोल से गाड़ियां खराब हो रही हैं।

कराना ने इन दावों को वैज्ञानिक रूप से निराधार बताया और गाड़ी चलाने वालों को सलाह दी कि वे इंटरनेट पर बिना किसी वेरिफिकेशन के साझा की जाने वाली पोस्ट पर भरोसा करने के बजाय अपनी गाड़ी के मैनुफैक्चरर के मैनुअल और पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के दिशानिर्देशों का पालन करें।

E85 फ्यूल का भी हो चुका है सफल परीक्षण

आईआईटी कानपुर की यह रिसर्च प्रोफेसर अविनाश कुमार अग्रवाल के नेतृत्व में चल रही है। वो इस इंजन रिसर्च लेबोरेटरी के प्रमुख हैं। उनकी टीम लंबे समय से एथेनॉल-ब्लेंडेड फ्यूल पर व्यापक शोध कर रही है। टीम ने E85 फ्यूल (जिसमें 85 प्रतिशत एथेनॉल होता है) का भी सफलतापूर्वक परीक्षण किया है। हालांकि ध्रुव राज कराना ने यह भी स्पष्ट किया कि इतने उच्च स्तर के मिश्रण के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए इंजनों और उनके अनुकूल ईंधन प्रणालियों की जरूरत होती है।

मंत्रालय ने कहा- ‘यह अधिक स्वच्छ और बेहतर फ्यूल है’

एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम को लेकर हो रही आलोचनाओं का जवाब देने के लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने हाल ही में एक विस्तृत Q&A डॉक्युमेंट जारी किया था। मंत्रालय के मुताबिक E20 पेट्रोल, E10 या शुद्ध पेट्रोल की तुलना में अधिक स्वच्छ, उच्च गुणवत्ता वाला और अधिक कुशल ईंधन है। सरकार ने इसे देश में लागू करने से पहले वर्षों तक वैज्ञानिक परीक्षण किए हैं, वाहन निर्माताओं के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया है और देश के भीतर एथेनॉल के उत्पादन को बढ़ाया है। इससे कार्बन उत्सर्जन काफी कम होता है, जो पर्यावरण के लिए बेहद फायदेमंद है।

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