सेलेब्रिटीज के पीछे का सच काला भी!

समाज को चाहिए कि वह अपने आदर्श माने जाने वाली हस्तियों से उच्च नैतिक मानदंडों की अपेक्षा करे। फिर वो चाहे कोई प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हो, आध्यात्मिक गुरु हो, उद्योगपति हो, या कोई अन्य मशहूर हस्ती, जांच एजेंसियों को बिना किसी दबाव के काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और अदालतों को समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करना चाहिए।

आए दिन हमें यह देखने को मिलता है कि उद्योग जगत, मनोरंजन जगत, आध्यात्मिक संस्थाओं और खेल जगत के कुछ नामी-गिरामी हस्तियों के नाम बार-बार ‘मनी लॉन्ड्रिंग’, फर्जी सौदों और संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के मामलों में चर्चा में आते हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी मेहनत, प्रतिभा और लोकप्रियता से करोड़ों प्रशंसकों का दिल जीता है। फिर भी इनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जो अपनी अच्छी छवि को दाव पर लगाकर काले धन के सौदों में उलझ जाते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल उनके व्यक्तिगत पतन का संकेत है, बल्कि पूरे समाज में भ्रष्टाचार की जड़ों को और मजबूत करती है।

गौरतलब है कि इन हस्तियों के पास पहले से ही करोड़ों की अपार संपत्ति, ब्रांड एंडोर्समेंट, फिल्मों या मैचों से की गई कमाई और सामाजिक प्रतिष्ठा होती है। फिर भी वे अवैध गतिविधियों की ओर क्यों आकर्षित होते हैं? एक बड़ा कारण है लोभ। सफलता के बाद भी और अधिक धन और अधिक पावर की भूख कभी नहीं मिटती। कई बार वे सोचते हैं कि उनकी छवि इतनी मजबूत है कि कोई उन पर उंगली नहीं उठाएगा। कुछ लोग अपने व्यवसाय को ‘विविधीकरण’ का नाम देकर रियल एस्टेट, शेल कंपनियों, दान के नाम पर काले धन को सफेद करना या विदेशी खातों के जरिए धन छिपाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में उन्हें अपनी बनाई हुई प्रतिष्ठा एक सुरक्षा कवच लगती है, लेकिन असल में यह उनके गिरने का कारण बन जाती है।

कई मामलों में यह भी देखने को मिलता है कि ये लोग अपने सरकारी संपर्कों और प्रभावशाली लोगों से परिचित होने के कारण अत्यधिक आत्मविश्वास महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि जांच एजेंसियां उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करेंगी या मामला दबा दिया जाएगा। यह आत्मविश्वास अक्सर गलत साबित होता है, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका होता है। लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है, चाहे वह कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो। फिर भी व्यवहार में कई बार प्रभावशाली लोगों के खिलाफ जांच धीमी पड़ जाती है या सबूतों की कमी का हवाला देकर मामले कमजोर हो जाते हैं।

भारत में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), आयकर विभाग और अन्य एजेंसियां जब ऐसे मामलों की जांच करती हैं, तो अक्सर आरोपियों को सजा नहीं दिला पाती। इसके कई कारण हो सकते हैं; जटिल कानूनी प्रक्रियाएं, सबूतों की कमी, गवाहों का दबाव में आना या लंबी अदालती सुनवाई। कभी-कभी राजनीतिक प्रभाव या संसाधनों की कमी भी जांच को प्रभावित करती है। लेकिन ऐसे ‘जाहिर कारणों’ से बरी होना या मामला रुक जाना समाज में गलत संदेश देता है। आम आदमी सोचता है कि कानून सिर्फ कमजोरों के लिए है। यह धारणा लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

इस स्थिति में अदालतें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। स्वतंत्र न्यायपालिका को चाहिए कि वह ऐसे मामलों में तेजी से सुनवाई करे, सबूतों का निष्पक्ष मूल्यांकन करे और दोषियों को उचित सजा दे। विशेष अदालतें या फास्ट-ट्रैक प्रक्रियाएं मनी लॉन्ड्रिंग जैसे आर्थिक अपराधों के लिए बनाई जा सकती हैं। अदालतें एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश दे सकती हैं कि जांच में देरी न की जाए और कोई भी प्रभाव जांच को बाधित न करे। साथ ही, अगर कोई व्यक्ति अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके जांच को प्रभावित करने की कोशिश करे तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। न्याय तभी प्रभावी होगा जब वह बिना भेदभाव के लागू हो।

ज़रूरत है तो इस मुद्दे पर जागरूकता फैलाना की। जनता को समझना चाहिए कि सेलेब्रिटीज की चमकदार जिंदगी के पीछे कई बार काले कारोबार की छाया होती है। मीडिया और जागरूक नागरिकों को ऐसे मामलों की लगातार निगरानी करनी चाहिए। एजेंसियों को चाहिए कि वे शिकायतों को गंभीरता से लें, चाहे आरोपी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो। शिकायत दर्ज होने के बाद प्रारंभिक जांच तुरंत शुरू होनी चाहिए और सबूतों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए। यदि शिकायत में गंभीर आरोप हों और उसके ठोस प्रमाण भी संलग्न हों तो जांच एजेंसियों जिम्मेदारी हो कि शिकायतकर्ता की पहचान को गुप्त रखा जाए।

कानून के जानकार मानते हैं कि शिकायत दर्ज कराने के लिए ठोस सबूत जरूरी होते हैं।

सामान्य दस्तावेजी सबूतों में बैंक स्टेटमेंट, प्रॉपर्टी दस्तावेज, कंपनी रजिस्ट्रेशन पेपर्स, इनकम टैक्स रिटर्न और संदिग्ध लेन-देन के रिकॉर्ड शामिल हो सकते हैं। डिजिटल सबूत आज के समय में सबसे महत्वपूर्ण हैं; ऑडी-वीडियो रिकॉर्डिंग, ईमेल, व्हाट्सएप या अन्य मैसेजिंग ऐप के चैट, सोशल मीडिया पोस्ट, डिजिटल वॉलेट के लेन-देन, क्रिप्टोकरेंसी ट्रांजेक्शन, क्लाउड स्टोरेज में सेव की गई फाइलें और सर्वर लॉग। ये सबूत समय-स्टैम्प के साथ उपलब्ध होने चाहिए और ‘चेन ऑफ कस्टडी’ बनाए रखते हुए पेश किए जाने चाहिए। इसके साथ ही गवाहों के बयान और फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट भी मजबूत आधार प्रदान करते हैं। शिकायतकर्ता को चाहिए कि वह सभी उपलब्ध जानकारी व्यवस्थित रूप से एजेंसी को सौंपे और जांच में सहयोग करे।

समाज को चाहिए कि वह अपने आदर्श माने जाने वाली हस्तियों से उच्च नैतिक मानदंडों की अपेक्षा करे। फिर वो चाहे कोई प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हो, आध्यात्मिक गुरु हो, उद्योगपति हो, या कोई अन्य मशहूर हस्ती, जांच एजेंसियों को बिना किसी दबाव के काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और अदालतों को समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करना चाहिए। तभी हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ सकेंगे जहां प्रतिष्ठा और धन किसी को कानून से ऊपर न रख सकें। काले धन और अवैध सौदों का चक्र तभी टूटेगा जब हर नागरिक, हर संस्था और हर अदालत अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाए।

यूजरनेम में छूटा सिर्फ एक अंडरस्कोर, निर्दोष शख्स ने जेल में काट दिए 18 महीने; वजह कर देगी हैरान

कई बार छोटी-सी गलती किसी इंसान की पूरी जिंदगी बदल सकती है। कनाडा के एक व्यक्ति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, जहां एक मामूली डिजिटल अंतर ने उसे गंभीर कानूनी मुसीबत में डाल दिया। पुलिस ने एक ऑनलाइन यूजरनेम की गलत पहचान के आधार पर उसे आरोपी मान लिया और उसे लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। मामला तब सामने आया जब अपील की प्रक्रिया के दौरान जांच में पता चला कि जिस अकाउंट को पुलिस आरोपी से जोड़ रही थी, वह वास्तव में किसी और का था।

एक अतिरिक्त अंडरस्कोर की वजह से हुई यह गलती इतनी बड़ी बन गई कि एक निर्दोष व्यक्ति को सजा भुगतनी पड़ी। बाद में अदालत ने पूरे मामले की समीक्षा करते हुए उसे बेगुनाह माना। यह घटना डिजिटल जांच में छोटी-सी चूक के गंभीर परिणामों को दिखाती है।

एक छोटे से अंतर ने बना दिया आरोपी

कनाडा के हैलिफैक्स निवासी ब्रैंडन क्लेम को साल 2020 में गिरफ्तार किया गया था। मामला 2018 में अमेरिका के विस्कॉन्सिन से शुरू हुई एक जांच से जुड़ा था। पुलिस ने ऑनलाइन गतिविधियों के आधार पर जिस व्यक्ति की पहचान की थी, उसका यूजरनेम “fus__ro_dah” था। वहीं, क्लेम का यूजरनेम “fus_ro_dah” था। दोनों में अंतर सिर्फ इतना था कि असली आरोपी के नाम में एक अतिरिक्त अंडरस्कोर (_) था। लेकिन यही छोटी-सी गलती क्लेम के लिए बड़ी परेशानी बन गई।

गलत पहचान के आधार पर हुई सजा

पुलिस ने इसी यूजरनेम को आधार बनाकर क्लेम को आरोपी मान लिया। साल 2023 में डार्टमाउथ प्रांतीय अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और 18 महीने की जेल की सजा सुनाई। उन पर नाबालिग को बहलाने, आपत्तिजनक सामग्री साझा करने और चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़े आरोप लगाए गए थे।

अपील के दौरान सामने आई बड़ी गलती

क्लेम की कानूनी टीम जब अपील की तैयारी कर रही थी, तब उन्हें इस गलती का पता चला। वकीलों ने पाया कि पुलिस की ओर से भेजे गए सबपोना में गलत यूजरनेम दर्ज था। वकील जेब ब्राउन ने बताया कि अपील की दलील तैयार करते समय यह सवाल उठा कि डिजिटल सबूत क्लेम से कैसे जुड़े, जबकि वह लगातार अपनी बेगुनाही की बात कह रहे थे।

कोर्ट ने माना- व्यक्ति था पूरी तरह निर्दोष

अपील कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस ने गलत यूजरनेम के आधार पर क्लेम को आरोपी बनाया था। कोर्ट ने साफ कहा कि उन्हें कभी आरोपी बनाया ही नहीं जाना चाहिए था। फैसले में यह भी कहा गया कि क्लेम के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं था जो उन्हें उस लड़की से जोड़ता हो।

18 महीने जेल में बिताने पड़े बेगुनाह शख्स को

क्लेम ने बताया कि पुलिस के एक छोटे से टाइपिंग अंतर ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। उन्होंने कहा कि सबपोना में असली यूजरनेम “fus__ro_dah” की जगह “fus_ro_dah” लिखा गया था, जिससे जांच गलत दिशा में चली गई। यह गलती ट्रायल के दौरान भी सामने नहीं आ सकी।

अब मुआवजे का फैसला बाकी

कोर्ट ने क्लेम को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया और उनके खिलाफ लगाए गए अतिरिक्त कानूनी आदेश भी रद्द कर दिए। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि वह जेल में बिताए गए 18 महीनों के लिए मुआवजे की मांग करेंगे या नहीं।

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NEET प्रदर्शनकारियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत! नाबालिगों की रिहाई का आदेश, छात्रों पर नहीं होगी दंडात्मक कार्रवाई

Supreme Court relief for NEET protesters: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (28 जुलाई) को उन छात्र प्रदर्शनकारियों को रिहा करने का निर्देश दिया, जिनकी उम्र 18 साल से कम है और जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। शीर्ष अदालत ने अधिकारियों से यह भी कहा कि वे नीट पेपर लीक को लेकर हाल में देश भर में हुए आंदोलन से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सबूत संभालकर रखें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “दिल्ली सरकार दर्ज की गई FIR की जांच जारी रख सकती है, लेकिन कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।”

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि छात्रों के खिलाफ पुलिस की ज्यादती के आरोपों की पहली नजर में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की बर्बरता का आरोप लगाने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, शीर्ष अदालत ने कई अंतरिम निर्देश जारी किए।

पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना भी शामिल थे। पीठ ने उन सभी राज्यों को सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी-कैमरा फुटेज, वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड, पीसीआर लॉग और प्रदर्शन से जुड़े दूसरे डिजिटल सबूत संभालकर रखने का निर्देश दिया जहां प्रदर्शन हुए थे।

कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि प्रदर्शनकारियों से संबंधित इकट्ठा किया गया कोई भी डिजिटल डेटा संभालकर रखा जाए। लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया जाए। पीठ ने अधिकारियों को प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ कोई भी बलपूर्वक कार्रवाई करने से रोक दिया। साथ ही कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को सुरक्षा नहीं मिलेगी।

‘बलपूर्वक कोई कार्रवाई न की जाए’

पीठ ने दिल्ली सरकार को दर्ज FIR के मामले में जांच जारी रखने की इजाजत दी। लेकिन कहा कि कार्रवाई लंबित रहने तक प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ बलपूर्वक कोई कार्रवाई न की जाए। अदालत ने याचिकाओं में लगाए गए आरोपों पर दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, केरल, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों से भी जवाब मांगा। चीफ जस्टिस ने कहा, “आरोपों की पहली नजर में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच पर विचार करने की जरूरत है, जिसमें 200 से ज्यादा घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की चिंताओं को भी दूर किया जाना चाहिए।”

पीठ ने कहा कि केंद्र और संबंधित राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा की सभी घटनाओं की निष्पक्ष, पारदर्शी और पूरी जांच सुनिश्चित करने के लिए एक स्वतंत्र समिति या विशेष जांच दल बनाने पर विचार करने से पहले अपने बयान रिकॉर्ड पर रखें। शुरुआत में, अदालत ने पूछा कि पुलिस की ज्यादती के आरोपों की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं होनी चाहिए। पीठ ने कहा, “जिसने भी ज्यादती की, कानून अपने हाथ में लिया, उसे सजा मिलनी चाहिए।”

‘जांच के लिए SIT गठित की जा सकती है’

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान यहा भी कहा कि हालिया छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा की सभी घटनाओं की निष्पक्ष, पारदर्शी और गहन जांच सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि निर्धारित प्रोटोकॉल का उल्लंघन होने पर कानून को अपना काम करना चाहिए।

नीट पेपर लीक होने को लेकर देशभर में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ज्यादतियों के आरोपों वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने हिंसा की कई घटनाओं का जिक्र किया।

सुनवाई के शुरुआत में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की सदस्यता वाली पीठ ने सवाल किया कि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं होनी चाहिए। वकीलों की दलीलों पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने कहा कि विरोध कर रहे नीट छात्रों पर पुलिस की ज्यादतियों से जुड़े सभी आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है।

पीठ ने कहा, “अगर तय प्रोटोकॉल का उल्लंघन होता है, तो कानून को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए।” CJI सूयकांत ने कहा कि पीठ सभी आरोपों की स्वतंत्र, पारदर्शी और गहन जांच कराने पर विचार कर रही है। अदालत ने कहा कि 250 पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों की भी जांच होनी चाहिए और यह पता लगाया जाना चाहिए कि ये हमले छात्रों ने किए थे या कुछ उपद्रवी तत्वों ने।

सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि छात्र पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा में शामिल नहीं होंगे, लेकिन कुछ उपद्रवी इन घटनाओं में संलिप्त हैं। उन्होंने कहा कि हत्या, दुष्कर्म और एनडीपीएस मामलों में वांछित उपद्रवी विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुए और उन्होंने पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा की।

एक और खौफनाक कांड! पत्नी ने लाइव लोकेशन शेयर कर प्रेमी से करवाया पति का कत्ल

Chittoor Husband Murder Case

Chittoor Husband Murder Case: अभी पुणे के बहुचर्चित केतन अग्रवाल हत्याकांड की आंच ठंडी भी नहीं हुई थी, जहां उसकी मंगेतर सिया गोयल ने अपने होने वाले पति को मौत की खाई में धकेल दिया था। ठीक वैसा ही दिल दहला देने वाला एक और मामला आंध्र प्रदेश के चित्तूर से सामने आया है। यहां एक पत्नी ने बेवफाई की सारी हदें पार करते हुए, अपनी मासूम बेटी की आंखों के सामने अपने ही पति की बेरहमी से हत्या करवा दी। इस सनसनीखेज वारदात की साजिश के बारे में जानकर तो पुलिस के भी होश उड़ गए। 

हसिनि का बेहद शातिर प्लान

मृतक की पहचान 23 वर्षीय रमेश के रूप में हुई है, जो एक निजी कंपनी में काम करता था। रमेश की शादी 2 साल पहले 19 वर्षीय हसिनि से हुई थी और दोनों की एक छोटी बेटी भी है। लेकिन हसिनि के दिल में पति के लिए नहीं, बल्कि अपने 20 साल के प्रेमी युगांधर के लिए जगह थी। शादी के बाद भी दोनों का अवैध संबंध जारी रहा और इस प्यार के बीच से रमेश को हटाने के लिए हसिनि ने एक बेहद शातिर प्लान तैयार किया। ALSO READ: केतन से लेकर इंदौर के राजा रघुवंशी तक! भाजपा सांसद ने दोहराई पुरुष आयोग की मांग, कहा- पुरुषों की भी सुनो

'लाइव लोकेशन' शेयर कर करवाया पति का कत्ल

अपनी साजिश को अंजाम देने के लिए हसिनि ने बेहद प्यार से पति रमेश को गुडुपल्ले मंडल के श्री मल्लेश्वर स्वामी मंदिर चलने के लिए मनाया। रमेश अपनी पत्नी और मासूम बेटी को लेकर बाइक से निकल पड़ा। रमेश बेखबर होकर गाड़ी चला रहा था, लेकिन हसिनि रास्ते भर अपने प्रेमी युगांधर के साथ अपनी 'लाइव लोकेशन' शेयर कर रही थी। युगांधर और उसके भाड़े के हत्यारे लगातार उस लोकेशन का पीछा कर रहे थे।

 

मल्लप्पा कोंडा के सुनसान रास्ते पर पहुंचते ही हसिनि ने साजिश के तहत अपना पर्स नीचे गिरा दिया। रमेश ने जैसे ही बाइक रोकी, झाड़ियों में छिपे युगांधर और उसके साथी धारदार हथियारों के साथ बाहर निकल आए। जान बचाने के लिए रमेश अपनी बेटी और पत्नी के सामने ही करीब 100 मीटर तक भागा, लेकिन बेरहम हत्यारों ने उसे घेर लिया और धारदार हथियारों से गोदकर उसकी जीवनलीला समाप्त कर दी। इस खूनी खेल के दौरान मासूम बच्ची वहीं मौजूद थी।

सीसीटीवी फुटेज ने खोला राज

इस अंधे कत्ल का खुलासा तब हुआ जब हसिनि की खुद की मां ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि उसकी बेटी और नातिन लापता हैं। पुलिस ने जब जांच शुरू की और मंदिर के रास्ते के सीसीटीवी (CCTV) फुटेज खंगाले, तो एक चौंकाने वाला सच सामने आया। जाते समय तो रमेश अपनी पत्नी के साथ दिख रहा था, लेकिन लौटते वक्त हसिनि अपने मृत पति की ही मोटरसाइकिल पर दो अनजान मर्दों (प्रेमी और उसके साथी) के साथ बैठकर वापस आ रही थी।

सभी आरोपी गिरफ्तार

पुलिस ने मोबाइल लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड्स (CDR) और सीसीटीवी फुटेज के पुख्ता डिजिटल सबूतों के आधार पर हसिनि, उसके प्रेमी युगांधर और हत्या में शामिल अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस कड़ाई से पूछताछ कर रही है, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर रिश्तों को शर्मसार कर दिया है।

इसी तरह की 5 और घटनाएं

  • इंदौर का सोनम रघुवंशी केस : इंदौर की सोनम रघुवंशी ने मई 2025 में शादी के तुरंत बाद मेघालय हनीमून के दौरान अपने पति राजा रघुवंशी की हत्या की साजिश रची। सोनम का अपने कथित प्रेमी राज कुशवाहा के साथ संबंध था। हनीमून के दौरान उसने कॉन्ट्रैक्ट किलर्स के जरिए अपने पति राजा को मेघालय में एक गहरी खाई में फिंकवा दिया। पुलिस ने तकनीकी जांच और कॉल रिकॉर्ड्स के जरिए इस साजिश का पर्दाफाश किया।
  • सिया गोयल मामला : पुणे की 20 वर्षीय सिया गोयल की सगाई पुणे के एक बिजनेसमैन केतन अग्रवाल से हुई थी। शादी से कुछ दिन पहले जून 2026 में लोहागढ़ किले में ट्रैकिंग के दौरान केतन की 400 फीट गहरी खाई में गिरने से मौत हो गई। जांच में सामने आया कि सिया ने अपने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर केतन को खाई से धक्का देने की साजिश रची थी। 
  • समिता कुमारी : समिता कुमारी, जो बिहार के सुपौल में मोटर वाहन निरीक्षक (MVI) अधिकारी थी, ने अपने पति देव कुमार गुंजन की चलती ट्रेन में हत्या करवा दी। समिता का बिजली विभाग के एक तकनीशियन अजीत कुमार के साथ संबंध था। दोनों ने मिलकर 4 लाख की सुपारी दी। जून 2024 में जब गुंजन ट्रेन से यात्रा कर रहे थे, तब एक शूटर ने उन्हें गोली मार दी।
  • मुस्कान रस्तोगी : मेरठ में मर्चेंट नेवी अधिकारी सौरभ राजपूत की उसकी पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला ने बेरहमी से हत्या कर दी। मार्च 2025 में, मुस्कान ने पहले पति को खाने में नशीली दवा दी। बेहोश होने पर प्रेमी के साथ मिलकर सौरभ की हत्या कर दी, उसके शरीर के करीब 15 टुकड़े किए और एक बड़े प्लास्टिक ड्रम में भरकर उसे सीमेंट के घोल से सील कर दिया।
  • आंचल यादव : मार्च 2026 में सतना जिले से लापता हुए विपिन कुमार यादव की हत्या का खुलासा उसकी पत्नी आंचल के कारण हुआ। आंचल का शादी से पहले से ही सुनील कुशवाहा नाम के युवक से प्रेम संबंध था। दोनों ने मिलकर विपिन की हत्या की और शव को पहले कुएं में फेंका, फिर बाद में खोदकर दूसरी जगह दफना दिया। जुलाई 2026 में पुलिस ने कंकाल बरामद कर आंचल और उसके प्रेमी को गिरफ्तार किया।

Gurugram Murder Case: इंजीनियर ने पीजी में गर्लफ्रेंड की चाकू मारकर की हत्या, फिर खुद ट्रेन के सामने कुदकर दे दी जान

Gurugram Murder Case: गुरुग्राम से एक दिलदहला देने वाली घटना सामने आई है। यहां पर एक 25 वर्षीय AI इंजीनियर ने कथित तौर पर अपने पेइंग गेस्ट (PG) अकोमोडेशन में गर्लफ्रेंड की चाकू मारकर हत्या कर दी और फिर खुद चलती ट्रेन के सामने कूदकर सुसाइड कर लिया। इस घटना की जानकारी पुलिस ने दी।

वहीं, अब पुलिस इस मामले की जांच कर रही है की दोनों के रिश्ते कैसे थे? इसके लिए उनकी डिजिटल बातचीत (चैट और अन्य जानकारी) और दूसरे सबूतों की जांच की जा रही है, ताकि पता लगाया जा सके कि यह घटना क्यों हुई।

बता दें कि मृतकों की पहचान छत्तीसगढ़ के भिलाई के रहने वाले श्रेष्ठ मलिक और उत्तर प्रदेश के सीतापुर की रहने वाली इशरा अयूबी के तौर पर हुई है।

पुलिस के मुताबिक, दोनों गुरुग्राम में एक ही प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। मलिक सेक्टर 55 में एक PG में रह रहा था, जहां कथित तौर पर हत्या हुई।

जांचकर्ताओं ने बताया कि यह मामला तब सामने आया, जब अयुबी के परिवार ने शनिवार को सेक्टर-56 पुलिस स्टेशन में संपर्क किया। परिवार ने बताया कि वे कई बार कोशिश करने के बाद भी अयुबी से बात नहीं कर पा रहे थे।

शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने उसके मोबाइल फोन की मदद से उसका लोकेशन पता करना शुरू किया। फोन की आखिरी लोकेशन सेक्टर-55 में मलिक के PG आवास की मिली। जब पुलिस टीम उस जगह पर पहुंची और आसपास रहने वाले लोगों से पूछताछ की, तो पड़ोसियों ने पुलिस को बताया कि उन्हें किसी भी तरह की आवाज, विवाद या संदिग्ध गतिविधि के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसके बाद पुलिस ने CCTV की जांच की।

वहीं, जब पुलिस कमरे के अंदर गई तो अयूबी खून से लथपथ हालत में मिलीं। कमरे में खून के धब्बे बिखरे हुए थे, जिससे पता चलता है कि उस पर बेरहमी से हमला किया गया था। शुरुआती जांच में सामने आया कि उसकी मौत चाकू से किए गए गंभीर घावों की वजह से हुई।

बाद में, फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की टीम ने घटनास्थल का मुआयना किया और आगे की जांच के लिए सबूत इकट्ठा किए। वहीं, जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, पुलिस को पता चला कि गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (GRP) ने पहले ही गढ़ी रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक से एक व्यक्ति का शव बरामद किया था।

जांचकर्ताओं के अनुसार, उस व्यक्ति को ट्रेन ने टक्कर मारी थी और उसका शरीर दो हिस्सों में कट गया था। हालांकि, घटनास्थल से मोबाइल फोन मिलने के बाद पुलिस ने मृतक की पहचान श्रेष्ठ मलिक के तौर पर की।

इस पहचान से रेलवे ट्रैक पर हुई मौत और गुरुग्राम में दर्ज हत्या के मामले के बीच संबंध का सीधा पता चला।

जांचकर्ताओं को शक है कि अयूबी की कथित तौर पर हत्या करने के बाद मलिक ने आत्महत्या कर ली, हालांकि, घटना का सही क्रम जानने के लिए अभी जांच जारी है।

यह कपल हाल ही में साथ रहने लगा था

शुरुआती जांच में पुलिस को पता चला है कि अयुबी घटना से सिर्फ तीन दिन पहले मलिक के PG में रहने आई थीं।

अब पुलिस फिलहाल यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि दोनों के बीच किस तरह का रिश्ता था, हत्या से पहले क्या हुआ था और क्या पहले से कोई विवाद चल रहा था, जिसकी वजह से यह घटना हुई।

सेक्टर-56 थाना प्रभारी इंस्पेक्टर मनोज कुमार ने समाचार एजेंसी PTI को बताया, “मामले के हर पहलू की जांच की जा रही है। दोनों के रिश्ते की असल स्थिति और घटना के पीछे की वजह जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगी।”

उन्होंने बताया, “पुलिस उनके मोबाइल फोन, कॉल डिटेल, चैट और अन्य तकनीकी सबूतों की भी जांच कर रही है। हत्या की FIR दर्ज कर ली गई है और आगे की जांच जारी है।”

पुलिस ने कहा कि वे मौतों से पहले हुई घटनाओं की कड़ियों को जोड़ने के लिए फोरेंसिक नतीजों के साथ-साथ मोबाइल फोन, कॉल रिकॉर्ड और चैट हिस्ट्री जैसे डिजिटल सबूतों का विश्लेषण कर रहे हैं।

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Delhi: ‘आसानी से कैसे मरें’… मौत से पहले आकृति की गूगल सर्च ने पुलिस को किया हैरान, पति गिरफ्तार

दिल्ली में आकृति की मौत के मामले में नया खुलासा हुआ है। आकृति की गूगल सर्च हिस्ट्री से हैरान कर देने वाली बातों का खुलासा हुआ है। बता दें कि, दिल्ली की 28 वर्षीय आकृति सुतार की शादी के करीब दो महीनों के बाद संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इस मामले में पुलिस ने दहेज प्रताड़ना के आरोप में उनके पति को एक दिन पहले गिरफ्तार कर लिया। आकृति सुतार ने करीब दो साल तक रिश्ते में रहने के बाद 24 अप्रैल को अरास्तु सिक्का से शादी की थी।

आकृति सुतार ने करीब दो साल तक रिश्ते में रहने के बाद 24 अप्रैल को अरास्तु सिक्का से शादी की थी। शादी के कारण कुछ समय की छुट्टी लेने के बाद वह 1 जुलाई को छतरपुर स्थित एक निजी कंपनी में सेल्स एग्जीक्यूटिव के पद पर फिर से काम पर लौट गई थीं। लेकिन नौकरी शुरू करने के सिर्फ चार दिन बाद ही दिल्ली की लोधी कॉलोनी स्थित एनडीएमसी के आवासीय परिसर की तीसरी मंजिल से गिरने से उनकी मौत हो गई।

पुलिस ने पति को  किया गिरफ्तार

पुलिस ने आकृति के पति को दहेज के लिए प्रताड़ित करने और दहेज से जुड़ी मौत के मामले में गिरफ्तार किया है। अधिकारियों का कहना है कि मौत की असली वजह जानने के लिए सीसीटीवी फुटेज, कॉल रिकॉर्ड, मोबाइल फोन का डेटा और दूसरे डिजिटल सबूतों की जांच की जा रही है। साथ ही परिवार के अन्य सदस्यों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।

समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में आकृति के छोटे भाई अमाय सुतार ने बताया कि उनकी बहन का मानना था कि अगर वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहेंगी तो ससुराल वालों की प्रताड़ना का सामना बेहतर तरीके से कर सकेंगी और परिवार पर बोझ भी नहीं बनेंगी। अमाय ने बताया कि शादी के बाद आकृति को घर का जरूरी सामान नहीं लाने को लेकर बार-बार ताने दिए जाते थे। उन्हें उम्मीद थी कि नौकरी करके अपनी कमाई से वह धीरे-धीरे ये सभी सामान खरीद लेंगी, जिससे ससुराल वालों की शिकायतें भी खत्म हो जाएंगी।

इशारों में की जाती थी दहेज की मांग

आकृति के भाई अमाय सुतार ने आरोप लगाया कि ससुराल वाले अक्सर कहते थे कि वह शादी में बिस्तर, सोफा, अलमारी, फ्रिज और एसी जैसी जरूरी चीजें लेकर नहीं आई हैं। उनका कहना है कि इन बातों के जरिए परिवार पर अप्रत्यक्ष रूप से 10 से 20 लाख रुपये की मांग का दबाव बनाया जा रहा था। अमाय ने बताया कि आकृति अपने मायके से पैसे नहीं मांगना चाहती थीं। वह अपनी मेहनत की कमाई से धीरे-धीरे सभी चीजें खरीदकर यह विवाद खत्म करना चाहती थीं।

अमाय ने बहन की बात याद करते हुए कहा, “उसने मुझसे कहा था, ‘तुम अभी-अभी आर्थिक रूप से मजबूत हुए हो। अपने ऊपर बोझ मत लो। मैं नौकरी करती रहूंगी और धीरे-धीरे सब कुछ खुद खरीद लूंगी। शायद उसके बाद वे मुझे ताने देना बंद कर दें।'”

अमाय सुतार ने बताया कि परिवार की आर्थिक परेशानियों का उनकी बहन आकृति के फैसलों पर गहरा असर पड़ा था। साल 2019 में उनके पिता का कैंसर से निधन हो गया था। लंबे समय तक इलाज चलने की वजह से परिवार पर काफी कर्ज भी हो गया था।

अमाय ने कहा, “पिताजी के जाने के बाद मेरी बहन ने हमेशा मेरा साथ दिया। उसका सबसे बड़ा सपना था कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं और जिंदगी में आगे बढ़ूं।” परिवार का कहना है कि शादी से पहले अरास्तु सिक्का का परिवार इस बात पर राजी था कि आकृति शादी के बाद भी नौकरी करती रहेंगी। लेकिन शादी के बाद उन्होंने अपना रुख बदल लिया और कहने लगे कि ऐसी कोई बात कभी तय ही नहीं हुई थी। अमाय ने आरोप लगाया कि उनकी बहन ने ससुराल में होने वाली कई परेशानियां और प्रताड़ना परिवार से छिपाकर रखीं। उन्हें उम्मीद थी कि समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा। शुरुआत में परिवार को भी लगा कि यह पति-पत्नी के बीच होने वाले सामान्य मतभेद हैं।

‘एक बार थप्पड़ मारने की भी शिकायत की थी’

अमाय सुतार ने बताया कि एक बार आकृति ने उन्हें बताया था कि उसके पति ने उसे थप्पड़ मारा है। इसके बाद दोनों परिवारों ने मिलकर मामला सुलझाने की कोशिश की। सभी को उम्मीद थी कि बातचीत के बाद हालात सुधर जाएंगे। अमाय के अनुसार, अपनी मौत से एक दिन पहले यानी 3 जुलाई को आकृति ने शादी के बाद से झेली गई परेशानियों के बारे में खुलकर बताया। उसने कहा था कि उसके साथ मारपीट की गई, धमकियां दी गईं और उसे बार-बार प्रताड़ित किया जाता था।

अमाय ने कहा कि अब पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें लगता है कि कई ऐसे संकेत थे, जिन्हें परिवार उस समय समझ नहीं पाया। उन्होंने बताया, “शादी के बाद आकृति पहले से ज्यादा चुप रहने लगी थी। हमें लगा कि वह नए माहौल में खुद को ढाल रही है और इसलिए शांत रहती है। जब भी हम उससे पूछते थे, वह हमेशा यही कहती थी कि सब ठीक है।”

पति मोबाइल पर भी रखता था पूरी नजर’

अमाय सुतार ने आरोप लगाया कि अरास्तु सिक्का आकृति के मोबाइल फोन पर पूरी नजर रखता था। वह अक्सर उसके कॉल, मैसेज और दूसरी गतिविधियों की जांच करता रहता था। अमाय के अनुसार, “अगर गलती से भी फोन का पासवर्ड बदल जाता, तो वह आकृति पर किसी और से संबंध होने का आरोप लगाता था। इसके बाद उसे गालियां देता और मारपीट भी करता था।” उन्होंने बताया कि अरास्तु को यह भी पसंद नहीं था कि आकृति अपनी मां या भाई से फोन पर बात करे। वह उसके मोबाइल में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों पर भी सवाल उठाता था।

अमाय ने कहा कि उन्हें काफी समय से अपने जीजा के व्यवहार पर शक था। उन्होंने बताया, “अगर मैं कभी उन्हें नमस्ते करना भूल जाता, तो वह मेरी बहन से इसकी शिकायत करते और उसे बड़ा मुद्दा बना देते थे। तभी मुझे लगता था कि जो व्यक्ति इतनी छोटी बात पर नाराज हो सकता है, वह घर के अंदर कैसा व्यवहार करता होगा।”

अमाय ने यह भी आरोप लगाया कि जब आकृति ने अपने परिवार को ससुराल में हो रही प्रताड़ना के बारे में बताया, तो उसके पति ने उसे धमकी दी। उसने कहा कि अगर वह अपने मायके वालों से अपनी शादीशुदा जिंदगी की बातें करती रही, तो वह उसकी पिटाई करवाएगा और उसकी नौकरी भी छुड़वा देगा।

महिला ने गूगल पर सर्च किया था- ‘आसानी से कैसे मरें’

जांच के दौरान पुलिस को आकृति के मोबाइल फोन की सर्च हिस्ट्री में “आसानी से कैसे मरें” लिखा हुआ मिला। अब जांच अधिकारी इस सर्च की भी गहराई से जांच कर रहे हैं और यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि उसने यह सर्च किन परिस्थितियों में किया था। परिजनों के मुताबिक, 4 जुलाई को आकृति रोज की तरह ऑफिस से निकली थीं, लेकिन देर तक घर नहीं पहुंचीं। परिवार ने उन्हें कई बार फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद परिजन उनकी तलाश में जुट गए। उसी रात एक पुलिस अधिकारी ने परिवार को फोन कर बताया कि लोधी कॉलोनी स्थित एनडीएमसी के एक आवासीय परिसर की तीसरी मंजिल से गिरने के बाद आकृति को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

Ketan Murder Case: केतन अग्रवाल मर्डर केस में अब क्या होगा? पंचशील टेस्ट से जमानत तक, जानिए आगे की पूरी कहानी

पूरे देश को हिला देने वाले पुणे के केतन अग्रवाल मर्डर केस की आरोपी सिया गोयल और उसके बॉयफ्रेंड चेतन चौधरी को 16 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। दोनों की 11 दिन की पुलिस रिमांड पूरी होने के बाद अब जांच एजेंसियां उनसे पूछताछ की बजाय मामले से जुड़े सबूतों की जांच और उन्हें मजबूत करने पर ध्यान दे रही हैं।

अब आगे क्या होगा?

इस मामले में अब जांच का सबसे बड़ा फोकस डिजिटल सबूतों पर है। जांच एजेंसियां सिया गोयल के मोबाइल से मिले डेटा और कोड में लिखे गए मैसेज को समझने की कोशिश कर रही हैं। पुणे ग्रामीण पुलिस को हाल ही में स्नैपचैट की एक चैट मिली है। इसमें सिया ने कथित तौर पर अपनी एक दोस्त से आधार कार्ड की जानकारी मांगी थी ताकि टिकट बुक किया जा सके। चैट में उसने यह भी लिखा था कि यह “ऐसी शादी के लिए है जो कभी नहीं होगी।” अब जांचकर्ता दूसरे संदिग्ध कोड वाले मैसेज भी खंगाल रहे हैं। उनका पता लगाना है कि क्या इस कथित साजिश में सिया और चेतन के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति भी शामिल था।

इन सबूतों पर टिकी जांच

इस मामले में लोहगढ़ किले से कथित तौर पर धक्का देने की घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। इसलिए पुलिस पूरे मामले को परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर मजबूत बनाने में जुटी है। कानूनी प्रक्रिया के तहत अभियोजन पक्ष को ऐसे सबूत पेश करने होंगे, जिनसे घटनाओं की पूरी कड़ी साफ तौर पर जुड़ जाए और यह साबित हो सके कि आरोपियों की भूमिका ही अपराध की ओर इशारा करती है।

जांच में पुलिस कई अहम सबूतों को जोड़कर मामला मजबूत करने की कोशिश कर रही है। इसमें घटनास्थल का पंचनामा, घटना का री-क्रिएशन (दोबारा घटनाक्रम तैयार करना) और वह जगह भी शामिल है, जहां आरोपियों ने कथित तौर पर केतन को धक्का देने की प्रैक्टिस की थी। इसके अलावा, घटना के समय पहने गए बताए जा रहे कपड़ों और केतन के जले हुए पासपोर्ट की फोरेंसिक जांच भी की जा रही है।

क्या है पंचशील टेस्ट?

पंचशील टेस्ट सुप्रीम कोर्ट का एक अहम कानूनी सिद्धांत है। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब किसी मामले में सीधे गवाह नहीं होते और फैसला परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर करना होता है। साल 1984 में ‘शरद बिरधीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसके पांच मुख्य सिद्धांत बताए थे।इन पांच सिद्धांतों में यह जरूरी है कि सभी तथ्य पूरी तरह साबित हों, सबूत अपराध से साफ तौर पर जुड़े हों, उनकी विश्वसनीयता मजबूत हो, किसी दूसरी संभावना की गुंजाइश न बचे और सभी सबूत मिलकर ऐसी अटूट कड़ी बनाएं जो सीधे आरोपी की ओर इशारा करे।

शुरुआत में पुलिस दोनों आरोपियों के अलग-अलग बयानों की सच्चाई जानने के लिए उनका पॉलीग्राफ और नार्को टेस्ट कराना चाहती थी। लेकिन कोर्ट में पेशी के दौरान सिया गोयल और चेतन चौधरी, दोनों ने इन टेस्ट के लिए अपनी मंजूरी देने से इनकार कर दिया। भारतीय कानून के अनुसार, किसी आरोपी की सहमति के बिना पॉलीग्राफ या नार्को टेस्ट नहीं किया जा सकता। इसलिए पुलिस को इन टेस्ट की मांग वापस लेनी पड़ी और अब जांच दूसरे सबूतों के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है।

कोर्ट में अब जमानत की लड़ाई शुरू

सिया गोयल और चेतन चौधरी अब पुलिस हिरासत की जगह न्यायिक हिरासत में हैं। ऐसे में दोनों की ओर से जमानत के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। उनके वकीलों का कहना है कि पुलिस जरूरी डिजिटल डिवाइस पहले ही जब्त कर चुकी है, इसलिए अब उन्हें लंबे समय तक जेल में रखने की जरूरत नहीं है। वहीं, सिया गोयल की ओर से अदालत में कौन वकील पेश होगा, इसे लेकर भी नया कानूनी विवाद सामने आया है। इस मामले में एक चर्चित वकील का नाम सामने आया है और 10 करोड़ रुपये के मानहानि नोटिस की भी चर्चा हो रही है।

Ketan Agarwal Murder Case: ‘वो शादी जो होनी नहीं है…’ केतन अग्रवाल मर्डर केस में सिया गोयल और उसकी दोस्त की चैट आई सामने

Ketan Agarwal Murder Case: रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल की कथित हत्या की जांच में एक नया मोड़ आया है। पुलिस ने आरोपी सिया गोयल के मोबाइल फोन से डिलीट किए गए चैट्स को रिकवर किया है, जिन्हें अब जांच में शामिल किया जा रहा है। जांचकर्ताओं के अनुसार, एक चैट में सिया ने अपनी एक दोस्त से उसके आधार कार्ड के दोनों तरफ की फोटो भेजने को कहा था, ताकि शादी के टिकट बुक किए जा सकें।

चैट में लिखा था: “आधार कार्ड का आगे और पीछे का हिस्सा भेज दो। शादी के टिकट के लिए, जो होने वाली नहीं है, फिर भी भेज दो।” बाद में दोस्त जवाब देता है कि दस्तावेज पहले ही व्हाट्सएप पर भेज दिया था।

स्क्रीनशॉट 2026-07-04 130231फिलहाल, पुलिस अब इन चैट्स की जांच कर रही है ताकि बातचीत का संदर्भ समझा जा सके और यह पता लगाया जा सके कि क्या इनसे आरोपी की कथित हत्या से पहले या बाद की योजनाओं के बारे में कोई सुराग मिलता है।

बता दें कि बरामद किए गए चैट्स उन डिलीट किए गए डेटा का हिस्सा हैं, जिन्हें जांचकर्ताओं ने हाल ही में जांच के दौरान जब्त किए गए मोबाइल फोन से रिकवर किया है।

वहीं, पुलिस ने पहले ही अदालत को सूचित किया था कि उन्हें सांकेतिक (कोड) भाषा में हुई बातचीत मिली है और वे यह पता लगाने के लिए उनकी जांच कर रहे हैं कि क्या कथित साजिश में कोई और भी शामिल था।

सिया गोयल और चेतन चौधरी को न्यायिक हिरासत में भेजा गया

दूसरी तरफ, सिया गोयल और उसके साथी चेतन चौधरी को पॉलीग्राफ टेस्ट कराने से इनकार करने के बाद 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। फिलहाल, केतन अग्रवाल की हत्या की जांच चल रही है और पुलिस आरोपियों के डिवाइस से मिले डिजिटल सबूतों की जांच कर रही है।

तीसरे व्यक्ति की भूमिका की जांच

पुणे पुलिस ने अदालत को बताया कि उन्हें आरोपियों के फोन से डिलीट किया गया डेटा मिला है, जिसमें कोड वर्ड्स, निकनेम और इमोजी में लिखी गई कथित चैट शामिल हैं। जांचकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ये बातचीत कथित साजिश में किसी तीसरे व्यक्ति की भूमिका की ओर इशारा करती हैं।

बीड के युवक से पूछताछ

पुलिस ने बीड जिले से एक युवक को हिरासत में लिया है। जांच में सामने आया है कि सिया गोयल और चेतन चौधरी ने कथित तौर पर उसे हत्या की योजना के बारे में बताया था। अब पुलिस यह पता लगा रही है कि क्या इस कथित साजिश में उसकी कोई भूमिका थी। हालांकि, युवक ने पुलिस को बताया कि उसने दोनों को ऐसा कदम न उठाने की सलाह दी थी।

दूसरा मोबाइल फोन बरामद

जांच के दौरान पुलिस ने सिया गोयल का एक दूसरा मोबाइल फोन भी बरामद किया है, जिसे कथित तौर पर छिपाकर रखा गया था। फिलहाल, पुलिस डिजिटल सबूतों की जांच कर रही है और उम्मीद है कि इस फोन का फोरेंसिक विश्लेषण भी किया जाएगा।

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Ketan Agarwal Murder Case: पुणे पुलिस को शक! केतन मर्डर केस में आ सकता है ‘सोनम रघुवंशी जैसा मोड़’

Ketan Agarwal Murder Case: मेघालय हनीमून मर्डर केस में सोनम रघुवंशी को जमानत दिलाने वाली कानूनी खामियों से सबक लेते हुए, पुणे ग्रामीण पुलिस अब पुणे के बिजनेसमैन केतन अग्रवाल की लोणावला (लोहगढ़ किले) में हुई हत्या के मामले में एक “पूरी तरह मजबूत और बिना गलती वाली” चार्जशीट तैयार करने में जुटी है। यह जानकारी महाराष्ट्र पुलिस के शीर्ष सूत्रों ने न्यूज18 को दी है।

जांच अधिकारी केतन की मंगेतर और मुख्य आरोपी सिया गोयल का पॉलीग्राफ (झूठ पकड़ने वाला) टेस्ट कराने पर जोर दे रहे हैं। हालांकि, यह टेस्ट कोर्ट में सीधे सबूत के तौर पर मान्य नहीं होता, लेकिन पुलिस का मानना है कि इससे कुछ अहम सुराग मिल सकते हैं, जिन्हें बाद में डिजिटल या फॉरेंसिक सबूतों से जांचकर पक्का किया जा सकता है।

यह सावधानी हाल ही में हुए सोनम रघुवंशी मामले को देखते हुए बरती जा रही है, जिसमें गिरफ्तारी की प्रक्रिया में हुई तकनीकी खामियों के कारण आरोपी को जमानत मिल गई थी और बाद में हाई कोर्ट ने भी उस जमानत को बरकरार रखा था। पुलिस सूत्रों का कहना है कि वे यह सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं कि सिया के खिलाफ उनके मुकदमे को किसी भी तरह की ऐसी तकनीकी चूक से कमजोर न होने दिया जाए।

पुलिस पॉलीग्राफ टेस्ट क्यों करवाना चाहती है?

भारतीय कानून के तहत, पॉलीग्राफ टेस्ट के नतीजे अदालत में मुख्य सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं होते हैं। हालांकि, जांचकर्ताओं का कहना है कि यह टेस्ट जांच के दौरान नई जानकारियां या सुराग हासिल करने के लिए एक टूल के तौर पर काम आ सकता है।

महाराष्ट्र पुलिस के सूत्रों के अनुसार, अधिकारियों को उम्मीद है कि पूछताछ से ऐसी जानकारी मिल सकती है जो पहले पता नहीं थी। उदाहरण के लिए, अगर सिया अनजाने में यह बता देती है कि उसने लोहागढ़ किले की चट्टान की ऊंचाई के बारे में जानकारी जुटाई थी, या ऐसी किसी डिजिटल गतिविधि का जिक्र करती है जिसके बारे में जांचकर्ताओं को पहले पता नहीं था, तो पुलिस उस डिजिटल सबूत को स्वतंत्र रूप से हासिल कर सकती है।

पुलिस का कहना है कि जांच के दौरान ब्राउजर हिस्ट्री, लोकेशन डेटा या डिलीट की गई सर्च जैसी जानकारी, अगर सही कानूनी प्रक्रियाओं से हासिल की जाए, तो कोर्ट में सबूत के तौर पर मानी जा सकती है, भले ही पॉलीग्राफ टेस्ट के जवाब खुद सबूत के तौर पर मान्य न हों।

पुलिस के एक सीनियर अधिकारी ने कहा, “मकसद पॉलीग्राफ रिपोर्ट को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करना नहीं है। इसका मकसद छिपे हुए तथ्यों का पता लगाना है, जिनकी बाद में कानूनी रूप से मान्य डिजिटल और फोरेंसिक सबूतों से पुष्टि की जा सके।”

प्रत्यक्ष सबूत नहीं, केवल परिस्थिति पर टिका पूरा मामला

जांच करने वाले मानते हैं कि उन्हें सबूत जुटाने में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा कोई चश्मदीद गवाह नहीं है जिसने केतन को चट्टान से धक्का देते हुए देखा हो। न ही इस कथित घटना का कोई CCTV फुटेज मौजूद है।

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, उपलब्ध CCTV फुटेज में सह-आरोपी और सिया के प्रेमी चेतन चौधरी को हुडी पहने हुए घटना वाली जगह के पास ही देखा गया है, लेकिन इससे हत्या साबित नहीं होती।

पुलिस ने डमी का इस्तेमाल करके कथित अपराध वाली जगह का सीन भी दोबारा बनाया है, लेकिन अधिकारी निजी तौर पर मानते हैं कि ऐसे प्रदर्शनों का सबूत के तौर पर बहुत कम महत्व होता है। एक सूत्र ने कहा, “डमी किस तरह गिरती है, यह उसके वजन के बंटवारे, कोण और गति पर निर्भर करता है। इससे वैज्ञानिक रूप से यह साबित नहीं किया जा सकता कि पीड़ित को जान-बूझकर धक्का दिया गया था या वह गलती से फिसल गया था।”

इन्हीं सब वजह से, जांचकर्ता इस मामले को पूरी तरह से परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित मानते हैं, जिसमें अपराध साबित करने के लिए हर सबूत का आपस में सही ढंग से जुड़ना जरूरी है ताकि कोई शक न रहे।

अभियोजन पक्ष मकसद और डिजिटल सबूतों पर भरोसा कर रहा है

जांचकर्ताओं के मुताबिक, प्रॉसिक्यूशन की मुख्य थ्योरी यह है कि सिया और चेतन ने केतन को रास्ते से हटाने की साजिश रची थी, क्योंकि सिया कथित तौर पर उससे शादी नहीं करना चाहती थी।

इसलिए, चार्जशीट दाखिल करने से पहले पुलिस डिजिटल, फोरेंसिक और हालात से जुड़े सबूत इकट्ठा करने पर ध्यान दे रही है, जो इस कथित साजिश को पुख्ता कर सकें।

जांचकर्ता डिजिटल सर्च हिस्ट्री, मोबाइल फोन डेटा और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की भी जांच कर रहे हैं, जिनसे साजिश या पहले से योजना बनाने की बात साबित हो सके। सूत्रों का कहना है कि ऐसे डिजिटल सबूत हासिल करना, जिनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जा सके, जांच की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है।

‘एक कमजोर कड़ी पूरे केस को गिरा सकती है’

पुलिस सूत्रों का मानना ​​है कि केस का नतीजा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या वे घटनाओं की एक अटूट कड़ी बना पाते हैं या नहीं।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “अगर बचाव पक्ष उस कड़ी की एक भी अहम कड़ी को तोड़ने में कामयाब हो जाता है, तो अभियोजन पक्ष का केस काफी कमजोर पड़ सकता है।” उन्होंने ऐसे हाई-प्रोफाइल मामलों का जिक्र किया जिनमें सबूतों की कमी के कारण कोर्ट में मुश्किलें आईं।

यही एक वजह है कि जांच करने वाले अधिकारी फाइनल चार्जशीट दाखिल करने से पहले बहुत सावधानी बरत रहे हैं।

सोनम रघुवंशी का मामला एक सबक क्यों बन गया है?

पुलिस सूत्रों के अनुसार, हाल ही का सोनम रघुवंशी मामला-जिसमें उन पर अपने पति राजा रघुवंशी की हत्या का आरोप है-अब पुलिस के लिए एक चेतावनी बन गया है। यह केस भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत जांच प्रक्रिया के कड़ाई से पालन करने के महत्व को और पुख्ता करता है।

सोनम के मामले में, कोर्ट में प्रक्रिया से जुड़ी कमियां सामने आने के बाद अभियोजन पक्ष को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जमानत के आदेश के मुताबिक, पुलिस आरोपी को हिरासत में लेते समय गिरफ्तारी के असल कारणों के बारे में साफ तौर पर नहीं बता पाई। गिरफ्तारी मेमो और उससे जुड़े दस्तावेजों में BNS की धारा 403(1) का जिक्र किया गया था, जो संपत्ति के बेईमानी से गबन से जुड़ी है, जबकि हत्या के मामले में उसकी जांच धारा 103(1) के तहत हो रही थी।

कोर्ट ने माना कि ऐसी गलतियों की वजह से आरोपी के संवैधानिक अधिकारों पर असर पड़ा, जिससे उसे शुरुआती जांच चरण में अपना बचाव ठीक से करने का मौका नहीं मिला। इसी आधार पर कोर्ट ने उसे जमानत दे दी, जिसे बाद में हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा।

पुलिस सूत्रों का कहना है कि यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि मजबूत जनमत या मीडिया की कड़ी नजर भी अदालत में हुई प्रक्रियात्मक गलतियों की भरपाई नहीं कर सकती। महाराष्ट्र पुलिस के एक वरिष्ठ सूत्र ने News18 को बताया, “अदालतें सबूतों और कानूनी वैधता के आधार पर मामले तय करती हैं। यहां तक ​​कि क्लर्क की कोई छोटी सी गलती या तय कानूनी प्रक्रिया का पालन न करना भी बचाव पक्ष के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है।”

चूंकि कोई चश्मदीद गवाह या सीधा वीडियो सबूत नहीं है, इसलिए पुणे ग्रामीण पुलिस अब इस बात पर ध्यान दे रही है कि प्रक्रिया का हर कदम कानूनी रूप से सही हो। साथ ही, वे डिजिटल और फोरेंसिक सबूतों को भी मजबूत कर रहे हैं, जिनके बारे में उनका मानना ​​है कि ये सिया के खिलाफ उनके मामले का मुख्य आधार बनेंगे।

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पुणे में हुई एक युवक की मौत का मामला हर दिन नए खुलासों के साथ और रहस्यमय होता जा रहा है। शुरुआत में इसे एक सामान्य हादसा माना गया था, लेकिन पुलिस जांच आगे बढ़ने के साथ कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने पूरे मामले को नई दिशा दे दी है। जांच एजेंसियां अब कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल सबूत और आरोपियों की गतिविधियों को जोड़कर घटनाक्रम की कड़ियां तलाश रही हैं। इस केस में सामने आई नई जानकारियों ने लोगों के बीच भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं और मामला लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।

शादी टालने की थी कथित योजना

पुलिस के मुताबिक, जांच में सामने आया है कि इस मामले का मकसद आर्थिक लाभ या पारिवारिक विवाद नहीं था। जांच एजेंसियों का दावा है कि सिया गोयल कथित तौर पर यह शादी नहीं करना चाहती थीं। पुलिस का आरोप है कि उन्हें लगता था कि केतन की मौत के बाद परिवार उन पर दोबारा शादी का दबाव कई साल तक नहीं डालेगा।

पुराने रिश्ते की भी हो रही जांच

जांच में यह भी सामने आया है कि सह-आरोपी चेतन चौधरी और सिया गोयल की जान-पहचान सगाई से पहले की थी। पुलिस के अनुसार, दोनों जनवरी में दोस्तों के साथ उदयपुर घूमने गए थे और करीब पांच दिन साथ रहे। इसके कुछ सप्ताह बाद फरवरी में सिया की केतन से सगाई हुई थी।

भाई के जरिए हुई थी पहचान

पुलिस का कहना है कि चेतन पहले से सिया के परिवार को जानता था। उसकी पहचान सिया के बड़े भाई साहिल गोयल से क्रिकेट के जरिए हुई थी। बाद में सिया और चेतन के बीच फिर से संपर्क बढ़ा।

2,004 फोन कॉल्स ने बढ़ाया शक

जांच अधिकारियों के अनुसार, जनवरी से अब तक सिया और चेतन के बीच 2,004 बार फोन पर बातचीत हुई। दोनों ने कुल 238 घंटे तक एक-दूसरे से बात की। पुलिस इन कॉल रिकॉर्ड्स को कथित साजिश के अहम सबूत के तौर पर जांच रही है।

घटना से एक दिन पहले हुई मुलाकात

पुलिस के मुताबिक, 17 जून को, यानी घटना से एक दिन पहले, दोनों पुणे के लुल्लानगर इलाके के एक कैफे में करीब एक घंटे तक मिले थे। जांचकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इसी मुलाकात में कथित योजना पर चर्चा हुई थी।

डिलीट किए गए चैट और मैसेज खंगाल रही पुलिस

जांच में यह भी सामने आया है कि दोनों आरोपियों ने अपने मोबाइल से कथित तौर पर WhatsApp चैट, Instagram मैसेज और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड डिलीट कर दिए थे। पुलिस अब फॉरेंसिक जांच के जरिए हटाए गए डेटा को रिकवर कर रही है, ताकि घटना से पहले और बाद की पूरी कड़ी स्पष्ट हो सके।

डिजिटल सबूतों पर टिकी जांच

फिलहाल पुलिस की जांच डिजिटल साक्ष्यों, कॉल रिकॉर्ड, लोकेशन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक डेटा पर केंद्रित है। अधिकारियों का मानना है कि इन सबूतों से यह स्पष्ट हो सकेगा कि घटना महज हादसा थी या इसके पीछे पहले से कोई कथित साजिश रची गई थी।

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