रांची के मोरहाबादी मैदान में स्वतंत्रता दिवस समारोह की रिहर्सल, सीएम हेमंत सोरेन करेंगे ध्वजारोहण

रांची के मोरहाबादी मैदान में स्वतंत्रता दिवस समारोह की रिहर्सल, सीएम हेमंत सोरेन करेंगे ध्वजारोहण

Ranchi Independence Day 2026 Rehearsal: रांची के ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में स्वतंत्रता दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित होने वाले राजकीय समारोह को लेकर बुधवार को फुल ड्रेस रिहर्सल संपन्न हुआ। जिला दंडाधिकारी-सह-उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक राकेश रंजन की देखरेख में आयोजित इस रिहर्सल में स्वतंत्रता दिवस के दिन होने वाली सभी औपचारिक गतिविधियों का सटीक अनुकरण किया गया। इस राजकीय समारोह में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मुख्य अतिथि के रूप में ध्वजारोहण करेंगे।

 

रिहर्सल के दौरान भारत सरकार द्वारा राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान से संबंधित जारी निर्देशों का पूर्ण अनुपालन किया गया। डीसी मंजूनाथ भजंत्री और एसएसपी राकेश रंजन ने परेड की सलामी ली तथा विभिन्न प्लाटूनों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। इस वर्ष परेड में फर्स्ट इन कमांड की जिम्मेदारी 2022 बैच के आईपीएस अधिकारी राघवेन्द्र शर्मा संभाल रहे हैं, जबकि सेकेण्ड इन कमांड परिचारी प्रवर द्वितीय अनिश मोमिन कुजूर होंगे।

14 प्लाटून और 3 बैंड पार्टियां होंगी शामिल

मोरहाबादी मैदान में होने वाले मुख्य समारोह में कुल 14 प्लाटून और 3 बैंड पार्टियां हिस्सा लेंगी। इनमें सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एसएसबी, सीआईएसएफ, ओडिशा पुलिस, झारखंड जगुआर, जैप (1, 2 और 10), रांची जिला पुलिस (महिला व पुरुष), झारखंड गृहरक्षा वाहिनी और एनसीसी (बॉयज व गर्ल्स) के प्लाटून शामिल हैं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम, निजी ड्रोन पर पूर्ण प्रतिबंध

समारोह को सुरक्षित और सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए डीसी, एसएसपी, ट्रैफिक एसपी राकेश सिंह और एडीएम (विधि-व्यवस्था) धनंजय ने अधिकारियों की संयुक्त ब्रीफिंग की। सभी अधिकारियों को समय पर अपने प्रतिनियुक्ति स्थल पर पहुंचने और जिम्मेदारियों का पालन करने के निर्देश दिए गए।

 

एसएसपी राकेश रंजन ने सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करते हुए निर्देश दिए कि सभी आगंतुकों की सघन जांच की जाए ताकि कोई अवांछित व्यक्ति या सामग्री प्रवेश न कर सके। सुरक्षा के मद्देनजर मोरहाबादी मैदान में निजी ड्रोन से फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है, केवल अधिकृत विभाग ही ड्रोन का उपयोग कर सकेंगे।

Mumbai Local Train update: मुंबईकरों के लिए खुशखबरी! अब दौड़ेगी वंदे मेट्रो AC लोकल ट्रेन, जानें कब तक तैयार हो जाएगी ये पूरी फ्लीट

Mumbai Local Train update: मुंबई की लाइफलाइन मानी जाने वाली लोकल ट्रेन में सफर करने वाले लोगों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। मुंबई को जल्द ही 238 नई वंदे मेट्रो एसी लोकल ट्रेनें (2856 कोच) मिलने जा रही हैं। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई रेलवे विकास कॉर्पोरेशन ने ऐलान किया है कि इन नई एसी लोकल ट्रेनों को भारतीय रेलवे की ही तीन अलग-अलग प्रोडक्शन यूनिट में तैयार किया जाएगा।

रिपोर्ट के मुताबिक एमआरवीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक विलास वाडेकर ने बताया है कि रेलवे की तीन मैन्युफैक्चरिंग सर्विस में बनने वाली पहली 12-कोच वाली एसी लोकल ट्रेन 2027 में मिल जाएगी जबकि 238 ट्रेनों की पूरी फ्लीट 2030 तक उपलब्ध करा दी जाएगी।

19,293 करोड़ रुपये की लागत आएगी

एमआरवीसी के मुताबिक मुंबई अर्बन ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (MUTP) 3 के तहत खरीदी जा रही इन 238 वंदे मेट्रो उपनगरीय ट्रेनों (2,856 कोच) के रोलिंग-स्टॉक की अनुमानित लागत 19293 करोड़ रुपये है। इन 12-कोच वाली एसी लोकल ट्रेनों का निर्माण रेलवे की तीन प्रमुख इकाइयों इंटीग्रल कोच फैक्ट्री चेन्नई, रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला और मॉडर्न कोच फैक्ट्री रायबरेली में किया जाएगा।

पहले इन ट्रेनों को निजी या विदेशी कंपनियों के माध्यम से खरीदने और उनके जीवनकाल के रखरखाव के लिए इंटरनेशनल टेंडर मंगाए गए। इसे लेकर मन लायक रिस्पॉन्स नहीं मिलने की वजह से सरकार ने इसे अपने कारखानों में बनाने का फैसला लिया है।

अंतरराष्ट्रीय टेंडर में आ रही थीं दिक्कतें, रेल मंत्री ने बताया नया प्लान

प्रक्रिया में हुए बदलाव को लेकर बुधवार शाम जारी एक वीडियो संदेश में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि पुरानी खरीद प्रक्रिया में कई समस्याएं थीं। इसी वजह से केंद्र सरकार ने अब इन ट्रेनों का निर्माण अपनी खुद की तीन उत्पादन इकाइयों में करने का निर्णय लिया है। रेल मंत्री ने कहा कि पुरानी योजना के तहत पूरी खरीद 2030 में जाकर पूरी होने वाली थी, जो हमें कतई स्वीकार्य नहीं थी। इसीलिए आज यह नया फैसला लिया गया है कि इनका उत्पादन भारत सरकार की तीन उत्पादन इकाइयों ICF, RCF और MCF में किया जाएगा, ताकि पहली लोकल ट्रेन 2027 तक हर हाल में पटरी पर आ जाए।

एमआरवीसी द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, पुरानी खरीद प्रक्रिया के तहत अगर काम होता तो सीरीज प्रोडक्शन शुरू होने में ही करीब तीन साल लग जाते। इस वजह से पहली ट्रेन 2030 में मिलती और पूरी फ्लीट 2034 तक जाकर तैयार हो पाती। जून 2023 में एमआरवीसी ने 238 एसी लोकल ट्रेनों की खरीद और उनके 35 वर्षों के रखरखाव के लिए अंतरराष्ट्रीय बोलियां आमंत्रित की थीं। मई 2023 में रेलवे बोर्ड की मंजूरी के बाद जारी इस टेंडर में दो साल का समय प्रोटोटाइप ट्रेन बनाने के लिए और उसके बाद औसतन 50 ट्रेनें प्रति वर्ष की दर से पांच साल में निर्माण पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था।

सफल बोलीदाता को पालघर जिले के वणगांव और रायगढ़ जिले के भिवपुरी में नए रखरखाव डिपो स्थापित करने, मौजूदा सुविधाओं को अपग्रेड करने और 35 वर्षों के लिए रखरखाव की जिम्मेदारी संभालने की शर्त रखी गई थी।

इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार पर 22000 करोड़ का निवेश, सफर होगा आरामदायक

एमआरवीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि नए संशोधित विनिर्माण कार्यक्रम से इन एसी ट्रेनों को मुंबई रेल नेटवर्क के नए कॉरिडोर और क्षमता विस्तार कार्यों के शुरू होने के साथ ही पटरी पर उतारा जा सकेगा। क्षमता विस्तार कार्यों में लगभग ₹22,000 करोड़ का भारी निवेश किया जा रहा है। इसमें नए कॉरिडोर बनाना, अतिरिक्त रेलवे लाइनें बिछाना, 15-कोच वाली ट्रेनों को चलाने के लिए प्लेटफॉर्मों की लंबाई बढ़ाना, यार्डों का पुनर्गठन करना और नेटवर्क को मजबूत करने वाले कई काम शामिल हैं।

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80 साल बाद भी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां जापान में क्यों हैं? सुप्रीम कोर्ट में नेताजी की अस्थियों को लेकर दायर की गई याचिका

भारत 15 अगस्त को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है, ऐसे में देश के सबसे मशहूर स्वतंत्रता सेनानियों में से एक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस चर्चा में आ गए हैं। दरअसल, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से बोस की बेटी अनीता बी. फाफ की उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें टोक्यो के रेनकोजी मंदिर से उनकी “अस्थियां” वापस लाने के लिए निर्देश देने की मांग की गई है।

हालांकि अगस्त 1945 में नेताजी के गायब होने को लेकर कई तरह की बातें कही जाती रही हैं, लेकिन कुछ रिपोर्टों में यह संकेत दिया गया है कि उनके अवशेष जापान के टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर में सुरक्षित रखे गए हैं। लेकिन, बोस की अस्थियां जापान में क्यों रखी गई हैं? आइए, हम आपको बताते हैं।

नेताजी की अस्थियां कहां हैं?

आम तौर पर यह माना जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत ताइवान में एक विमान दुर्घटना में हुई थी। 2017 में जारी एक RTI के जवाब में बताया गया था कि शाह नवाज कमेटी, जस्टिस जीडी खोसला कमीशन और जस्टिस मुखर्जी जांच आयोग की रिपोर्टों पर विचार करने के बाद, सरकार इस नतीजे पर पहुंची थी कि नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में हुई थी।

आधिकारिक बयानों के अनुसार, यह माना जाता है कि बोस की मौत 18 अगस्त 1945 को हुई थी। बयानों में यह भी बताया गया है कि दुर्घटना के बाद बोस बुरी तरह जल गए थे और दो दिन बाद उनकी मौत हो गई। ताइवान में उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया गया और उनकी अस्थियां जापान लाई गईं, जहां टोक्यो इंडियन इंडिपेंडेंस लीग को उनकी अस्थियों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई। आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, एक श्रद्धांजलि सभा के बाद 14 सितंबर 1945 को उन्हें रेनकोजी मंदिर में रखा गया था।

अवशेषों वाला कलश मंदिर के पुजारी रेवरेंड क्योई मोचिज़ुकी को सौंपा गया था, जिन्होंने उन्हें तब तक सुरक्षित रखने का वादा किया था जब तक कि उन्हें वापस भारत न ले जाया जा सके। दशकों बाद भी, वह वादा नेताजी से जुड़े रहस्य का अहम हिस्सा बना हुआ है।

हर साल नेताजी की पुण्यतिथि पर, रेनकोजी मंदिर में उनके सम्मान में एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है। इस समारोह में भारतीय दूतावास के अधिकारियों सहित कई प्रमुख जापानी और भारतीय नागरिक शामिल होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत मंदिर में नेताजी के अवशेषों की देखभाल का खर्च भी उठाता रहा है?

सरकार द्वारा 2016 में जारी की गई नेताजी से जुड़ी सार्वजनिक की गई फाइलों के अनुसार, भारत ने 1967 और 2005 के बीच उनकी देखभाल के लिए मंदिर को 52,66,278 रुपये का भुगतान किया था।

नेताजी के परिवार का क्या कहना है?

पिछले कुछ वर्षों में, नेताजी के परिवार के कई सदस्यों – जिनमें उनके भाई, बेटी और अन्य शामिल हैं – ने भारत सरकार से अनुरोध किया है कि वह नेताजी की अस्थियों को जापान से वापस लाए। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, बोस के छोटे भाई ने 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर उनकी अस्थियों को वापस लाने का आदेश देने का अनुरोध किया था।

इसी तरह, मई 1990 में बोस के भतीजों – अशोक नाथ बोस, अमिया नाथ बोस और सुब्रत बोस – ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह को पत्र लिखा था। 2007 में, नेताजी की बेटी फाफ ने डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर पूछा था कि भारतीय सरकार उनके पिता के अवशेषों को वापस लाने की प्रक्रिया में किस तरह शामिल होने का इरादा रखती है।

बोस के प्रपौत्र और लेखक आशीष रे ने 2018 में पीटीआई को बताया, “नेहरू सरकार से लेकर मोदी सरकार तक, भारत की हर सरकार सच्चाई से वाकिफ रही है, लेकिन उसने अवशेषों को भारत लाने की बात कही है।” गौरतलब है कि बोस के परिवार ने लगातार सरकारों से उनकी अस्थियों को भारत वापस लाने का आग्रह किया है। कई दशकों के दौरान, विभिन्न सरकारों ने भी उनके अवशेषों को वापस लाने के प्रयास किए हैं।

Independence Day 2026: 15 अगस्त को प्रधानमंत्री लाल किले पर क्यों फहराते हैं तिरंगा? इस साल देश मनाएगा 80वां स्वतंत्रता दिवस

Independence Day 2026: हर साल 15 अगस्त को, भारत के प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा फहराते हैं। यह पल अंग्रेजों से लंबे संघर्ष के बाद मिली आजादी को याद दिलाता है और देश को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए एक करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ही क्यों झंडा फहराते हैं, जबकि राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस पर इसे फहराते हैं? दोनों समारोह एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन ये आजाद भारत के इतिहास में दो अलग-अलग मील के पत्थर हैं।

स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त को, प्रधानमंत्री लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी को, राष्ट्रपति कर्तव्य पथ पर तिरंगा फहराते हैं। अंतर इस बात में है कि दोनों दिन क्या दर्शाते हैं: 1947 में भारत की स्वतंत्रता और 1950 में संविधान को अपनाना।

स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री झंडा क्यों फहराते हैं?

15 अगस्त वह दिन है जब भारत 1947 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र हुआ था। लाल किले पर झंडा फहराने का समारोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ लंबे संघर्ष के बाद भारत की स्वतंत्रता को दर्शाता है। आजाद भारत में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में लाल किले के लाहौरी गेट के ऊपर राष्ट्रीय झंडा फहराया था। तब से, प्रधानमंत्री पारंपरिक रूप से स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं। प्रधानमंत्री झंडे के खंभे के नीचे से झंडा फहराते हैं, जिसके बाद राष्ट्रगान होता है। यह समारोह स्वतंत्रता दिवस की मुख्य परंपराओं में से एक है और पूरे देश में इसे देखा जाता है।

गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति फहराते हैं तिरंगा

गणतंत्र दिवस आजाद भारत के इतिहास में एक अलग महत्वपूर्ण पल का प्रतीक है। 26 जनवरी, 1950 को, भारत का संविधान लागू हुआ, जिसने भारत सरकार अधिनियम, 1935 की जगह ली, और भारत एक गणतंत्र बन गया। यह दिन संविधान को अपनाने की याद में मनाया जाता है और हर साल भारत के राष्ट्रीय कार्यक्रमों में से एक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर, राष्ट्रपति कर्तव्य पथ पर राष्ट्रीय झंडा फहराते हैं। झंडा पहले से ही झंडे के खंभे के ऊपर बंधा होता है और समारोह के दौरान इसे फहराया जाता है। इस आयोजन के बाद रिपब्लिक डे परेड होती है, जिसमें भारत की संस्कृतिक विविधता, सैन्य ताकत और नेशनल अचीवमेंट्स को दिखाया जाता है।

दोनों आयोजनों में मूल अंतर

15 अगस्त और 26 जनवरी दोनों ही राष्ट्रीय दिवस हैं, जिनका भारत के इतिहास में अहम स्थान है। हर साल 15 अगस्त को मनाया जाने वाला स्वतंत्रता दिवस 1947 में ब्रिटिश राज से भारत की आजादी का प्रतीक है। वहीं, 26 जनवरी को मनाया जाने वाला गणतंत्र दिवस देश में एक संविधान लागू होने की घटना का प्रतीक है।

15 अगस्त को प्रधानमंत्री का झंडा फहराने का समारोह देश की आजादी और उसके लिए हुए संघर्ष से जुड़ा है। 26 जनवरी को राष्ट्रपति का झंडा फहराने का समारोह भारत की संवैधानिक और गणतंत्र पहचान से जुड़ा है।

Independence Day 2026: स्वतंत्रता दिवस पर सबसे पहले किसने लाल किले पर फहराया था तिरंगा? जानें इतिहास में दर्ज इस घटना के बारे में

नीति आयोग की एबीपी रैंकिंग में गोरखपुर का बजा डंका, बांसगांव ब्लॉक नंबर वन

नीति आयोग की एबीपी रैंकिंग में गोरखपुर का बजा डंका, बांसगांव ब्लॉक नंबर वन

NITI Aayog ABP Ranking : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने गोरखपुर जिले के विकास को लेकर नया इतिहास रच दिया है। भारत सरकार के नीति आयोग की एबीपी (आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम या एस्पिरेशनल ब्लॉक प्रोग्राम) रैंकिंग में गोरखपुर जिले का बांसगांव विकास खंड, ‘नंबर वन’ चुना गया है। नंबर वन ब्लॉक बनने पर डेढ़ करोड़ रुपए का पुरस्कार भी मिला है। बांसगांव ब्लॉक की इस उपलब्धि ने गोरखपुर के साथ ही समूचे उत्तर प्रदेश का गौरव पूरे देश में बढ़ाया है। गोरखपुर के जिलाधिकारी दीपक मीणा और मुख्य विकास अधिकारी शाश्वत त्रिपुरारी ने इस उत्कृष्ट उपलब्धि का श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में हो रहे समावेशी विकास के कार्यों को दिया है।   

 

नीति आयोग की तरफ से देशभर में कराई गई जनवरी–मार्च 2026 तिमाही की आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम, डेल्टा रैंकिंग में गोरखपुर जनपद का बांसगांव ब्लॉक, उत्तरी भारत (जोन-2) में प्रथम स्थान प्राप्त करने में सफल रहा है। यह जानकारी नीति आयोग की मुख्य कार्यकारी अधिकारी निधि छिब्बर की तरफ से यूपी के मुख्य सचिव को भेजे एक पत्र में दी गई है। इस उत्कृष्ट उपलब्धि के एवज में गोरखपुर को डेढ़ करोड़ रुपए की पुरस्कार राशि भी मिली है।

जिलाधिकारी दीपक मीणा बताते हैं कि नीति आयोग के आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम का जोर समावेशी विकास के जरिए नागरिकों के जीवन में सुगमता और गुणवत्ता की वृद्धि तथा समग्र रूप में जीवन स्तर के सुधार पर होता है। इसके अंतर्गत पांच थीम स्वास्थ्य एवं पोषण, शिक्षा, कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र, आधारभूत ढांचा और सामाजिक विकास के कुल 39 केपीआई (की परफॉर्मेंस इंडिकेटर्स या मुख्य निष्पादन संकेतक) पर संबंधित आकांक्षी ब्लॉकों का मूल्यांकन किया जाता है।

 

डीएम ने बताया कि मुख्यमंत्री जी के मार्गदर्शन में गोरखपुर बांसगांव ब्लॉक ने जनवरी-मार्च 2026 की तिमाही में सभी पांच थीम के 39 केपीआई में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए शत प्रतिशत वेटेज प्राप्त किया है। यह उपलब्धि इस तथ्य को भी प्रतिष्ठित करती है कि मुख्यमंत्री जी के मार्गदर्शन में गोरखपुर समावेशी विकास के मोर्चे पर देश में नए मानक स्थापित कर रहा है। 

संपूर्ण प्रदेश के लिए बांसगांव बना 'मॉडल ब्लॉक'

बांसगांव क्षेत्र, जिसे कभी विकास की दौड़ में चुनौतियों का सामना करना पड़ता था, आज अपनी प्रशासनिक कार्यकुशलता और नवाचारों के बल पर पूरे देश में 'मॉडल विकास खंड' के रूप में उभरा है। इस सफलता से न केवल गोरखपुर जिले का मान बढ़ा है, बल्कि उत्तर प्रदेश के अन्य आकांक्षी ब्लॉकों के लिए भी यह एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है।

 

गोरखपुर के मुख्य विकास अधिकारी शाश्वत त्रिपुरारी का कहना है कि डेल्टा रैंकिंग में मिली नंबर वन की उत्कृष्ट उपलब्धि केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि बांसगांव ब्लॉक की जनता के जीवन में आए सकारात्मक बदलाव का प्रमाण पत्र है। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा है कि इस पुरस्कार राशि का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, कृषि, आधारभूत ढांचे और आजीविका से जुड़े विकास कार्यों में किया जाएगा।

रूस की तरफ से मध्यस्थ बनेंगे पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़:यूक्रेन के सरकारी बैंक से चल रहा विवाद; रूस पर संपत्ति छीनने का आरोप

रूस ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ को यूक्रेन के सरकारी बैंक ओश्चादबैंक से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद में अपना मध्यस्थ बनाया है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला यूक्रेन और रूस के बीच 1998 में हुए द्विपक्षीय निवेश समझौते के तहत चल रहा है। ओश्चादबैंक का कहना है कि 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले की वजह से उसे दोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिज्जिया क्षेत्रों में अपनी संपत्तियां और कारोबार गंवाना पड़ा। इन इलाकों में ओश्चादबैंक की बैंक शाखाएं, ATM, दफ्तर, जमीन, और दूसरे कारोबारी संसाधन थे। रूस के कब्जे के बाद बैंक इन संपत्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सका। कई शाखाएं बंद हो गईं और बैंक का कारोबार ठप पड़ गया। बैंक के मुताबिक, इससे उसे भारी नुकसान हुआ। इस ही वजह से बैंक ने कई सौ मिलियन डॉलर का दावा किया है। तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल करेगा सुनवाई बैंक ने जुलाई 2025 में रूस को विवाद का नोटिस भेजा था। रूस की ओर से जवाब नहीं मिलने पर उसने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू कर दी। इस मामले की सुनवाई तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल करेगा। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ से पहले भी भारत के सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई पूर्व जज अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता और ट्रिब्यूनल में अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। पहले रूस के दो प्रस्तावों को ठुकरा चुके थे चंद्रचूड़ रूस इससे पहले भी डीवाई चंद्रचूड़ को दो बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों में अपनी ओर से मध्यस्थ बनाना चाहता था। रिपोर्ट के मुताबिक, पहला मामला जर्मनी की ऊर्जा कंपनी विंटरशाल डीया से जुड़ा था। इस कंपनी ने रूस पर आरोप लगाया था कि यूक्रेन युद्ध के बाद उसकी रूस में मौजूद गैस और तेल प्रोजेक्ट्स पर कब्जा कर लिया गया, जिससे उसे भारी आर्थिक नुकसान हुआ। दूसरा मामला यूक्रेन की सरकारी बिजली ट्रांसमिशन कंपनी उक्रएनरगो का था। कंपनी का आरोप है कि रूस के कब्जे वाले इलाकों में उसकी बिजली से जुड़ी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया या उन पर कब्जा कर लिया गया। इन दोनों मामलों में रूस ने डीवाई चंद्रचूड़ से अपनी ओर से मध्यस्थ बनने का अनुरोध किया था। हालांकि, उन्होंने यह जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की थी। अब तक दोनों मामलों का अंतिम नतीजा नहीं आया है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता क्या है? जब दो देशों की कंपनियों या किसी देश और विदेशी कंपनी के बीच कारोबार या निवेश को लेकर बड़ा विवाद हो जाता है, तो वे हर बार अदालत नहीं जाते। कई बार दोनों पक्ष मिलकर कुछ विशेषज्ञ चुनते हैं। यही विशेषज्ञ दोनों पक्षों की बात सुनते हैं और फैसला देते हैं। इसे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता कहा जाता है। इसे आसान उदाहरण से समझिए मान लीजिए दो कंपनियों के बीच करोड़ों रुपये का विवाद हो गया। अगर वे कोर्ट जाएंगी, तो फैसला आने में कई साल लग सकते हैं। इसलिए दोनों मिलकर कुछ निष्पक्ष विशेषज्ञ चुन लेती हैं। ये विशेषज्ञ दोनों पक्षों की बात सुनते हैं और तय करते हैं कि किसका दावा सही है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में क्या होता है? 1. दोनों पक्ष अपने-अपने विशेषज्ञ चुनते हैं: आमतौर पर दोनों पक्ष एक-एक मध्यस्थ चुनते हैं। इसके बाद दोनों मिलकर तीसरे मध्यस्थ का चयन करते हैं। ये तीनों मिलकर एक ट्रिब्यूनल बनाते हैं। 2. दोनों पक्ष अपनी बात रखते हैं: दोनों पक्ष अपने दस्तावेज, सबूत और दलीलें ट्रिब्यूनल के सामने पेश करते हैं। 3. ट्रिब्यूनल फैसला सुनाता है: सभी पक्षों की बात सुनने के बाद ट्रिब्यूनल अपना फैसला देता है। इसे ‘अवार्ड’ कहा जाता है। 4. फैसले का पालन करना होता है: ज्यादातर मामलों में ट्रिब्यूनल का फैसला दोनों पक्षों के लिए मानना जरूरी होता है। यह अदालत से कैसे अलग है? भारत से जुड़े दो चर्चित ट्रिब्यूनल मामले 1. केयर्न एनर्जी बनाम भारत क्या मामला था? ब्रिटेन की कंपनी केयर्न एनर्जी ने 2006 में भारत में अपने कारोबार में कुछ बदलाव किए थे। उस समय सरकार ने इस पर कोई टैक्स नहीं लगाया। लेकिन 2012 में भारत सरकार ने नया टैक्स कानून बनाया और कहा कि यह कानून पुराने सौदों पर भी लागू होगा। इसके बाद सरकार ने केयर्न से हजारों करोड़ रुपये का टैक्स मांगा और उसकी कुछ संपत्तियां भी अपने कब्जे में ले लीं। फैसला क्या आया? कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल में शिकायत की। 2020 में ट्रिब्यूनल ने कहा कि भारत की टैक्स वसूली सही नहीं थी। उसने भारत को कंपनी को करीब 1.2 अरब डॉलर (करीब 9 हजार करोड़ रुपए) लौटाने का आदेश दिया। फिर क्या हुआ? 2021 में भारत सरकार ने यह पुराना टैक्स कानून वापस ले लिया। इसके बाद दोनों पक्षों में समझौता हो गया और मामला खत्म हो गया 2. वोडाफोन बनाम भारत क्या मामला था? 2007 में वोडाफोन ने भारत की एक मोबाइल कंपनी खरीदी थी। उस समय इस सौदे पर कोई टैक्स नहीं लगा। लेकिन 2012 में सरकार ने नया कानून बनाकर कहा कि पुराने सौदों पर भी टैक्स लगेगा। इसके बाद वोडाफोन से करीब 2.2 अरब डॉलर (करीब 16 हजार करोड़ रुपए) टैक्स मांगा गया। फैसला क्या आया? वोडाफोन भी अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल पहुंची। 2020 में ट्रिब्यूनल ने कहा कि भारत सरकार को इतने साल बाद पुराने सौदे पर टैक्स नहीं लगाना चाहिए था। इसलिए फैसला वोडाफोन के पक्ष में आया। फिर क्या हुआ? 2021 में भारत सरकार ने यह कानून वापस ले लिया। इसके बाद वोडाफोन और भारत के बीच विवाद भी खत्म हो गया। —————–

दावा- अरुणाचल में चीनी घुसपैठ की बात झूठी:पड़ोसी देश की हरकतों पर भारतीय सेना की नजर; विदेश मंत्रालय बोला- अरुणाचल हमारा अटूट हिस्सा

अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना के सूत्रों ने दावा किया कि चीनी घुसपैठ की बातें झूठी हैं। ANI की रिपोर्ट के मुताबिक सेना ने मंगलवार को कहा कि सेना और भारत तिब्बत सीमा पुलिस लगातार चीन की हरकतों पर नजर रखे हुए है और सोशल मीडिया पर किए जा रहे घुसपैठ के दावे गलत हैं। विदेश मंत्रालय (MEA) ने भी कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अटूट हिस्सा है। MEA ने यह बात चीन की ओर से अरुणाचल प्रदेश के स्थानों को चीनी नाम देने की कोशिशों के बीच कही है। चीन के LAC पार कर घुसपैठ का दावा किया गया था मीडिया रिपोर्ट्स में स्थानीय लोगों दावा किया थीं कि चीन के सैनिक अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले में घुस आए थे। बताया गया था कि चीनी सैनिकों ने LAC पार कर पुकार ला और ओल्लो इलाके में प्रवेश किया। इस पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि 6 अगस्त को भारत-चीन सीमा मामलों पर सलाह और तालमेल के लिए बनी डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक हुई थी। इस बैठक में दोनों देशों ने खुलकर बातचीत की। LAC पर मौजूदा हालात की भी समीक्षा की गई। भारत ने कहा कि सीमा इलाकों में शांति और सुकून बना रहना जरूरी है। यही दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए भी जरूरी है। चीन अरुणाचल को ‘साउथ तिब्बत’ बताता रहा है ANI के मुताबिक, चीन अरुणाचल प्रदेश पर ‘साउथ तिब्बत’ के नाम से दावा करता रहा है। 1960 की सीमा वार्ता में चीन ने अरुणाचल प्रदेश की करीब 69,000 वर्ग किमी जमीन पर दावा किया था। भारत ने चीन के इस दावे को कई बार खारिज किया है। भारत सरकार ने शुक्रवार को अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और उनकी भौगोलिक विशेषताओं को आधिकारिक नक्शे पर दर्ज किया था। इस पर चीन ने कहा कि भारत का अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों को अपने मैप पर दिखाना गलत है। यह अमान्य’ है। चीन अरुणाचल की जगहों के नाम जारी करता रहा है चीन ने कई बार अरुणाचल प्रदेश की जगहों के चीनी नामों की सूची जारी करता रहा है। वह अरुणाचल प्रदेश को जांगनान कहता है भारत ने चीन की इन कोशिशों को लगातार खारिज किया है। भारत का कहना है कि इनका भारत की राज्य पर संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ता।

Hindustan Copper Q1 Results: सरकारी कंपनी का मुनाफा 163% बढ़ा, रेवेन्यू में 81% का उछाल

Hindustan Copper Q1 Results: सरकारी माइनिंग कंपनी Hindustan Copper के शेयर सोमवार, 10 अगस्त को जून तिमाही के नतीजों का ऐलान किया। कंपनी का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 163.4% बढ़कर 353 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल की समान तिमाही में यह 134 करोड़ रुपये था।

कंपनी का रेवेन्यू 81.4% बढ़कर 936.5 करोड़ रुपये रहा। एक साल पहले यह 516.4 करोड़ रुपये थी।

ऑपरेटिंग प्रदर्शन भी मजबूत

हिंदुस्तान कॉपर का EBITDA 507.5 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल की समान तिमाही में यह 212.3 करोड़ रुपये था। यानी ऑपरेटिंग मुनाफा भी दोगुना से ज्यादा बढ़ा।

वहीं, EBITDA मार्जिन 41% से बढ़कर 54% पर पहुंच गया। इससे कंपनी की ऑपरेटिंग एफिशिएंसी में सुधार दिखा।

कॉपर की कीमतों का भी मिला सहारा

वैश्विक बाजार में कॉपर की कीमतें पिछले छह हफ्तों से लगातार बढ़ रही थीं। इसकी वजह सप्लाई का कम होना और अमेरिका में ब्याज दरों को लेकर चिंता कम होना रहा।

पिछले हफ्ते कॉपर की कीमत 14,000 डॉलर प्रति टन के पार पहुंच गई थी। यह जनवरी के आखिर के बाद का सबसे ऊंचा इंट्राडे स्तर था। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में भी कॉपर की कीमतें मजबूत रह सकती हैं।

हिंदुस्तान कॉपर के शेयरों का हाल

नतीजों के बाद Hindustan Copper के शेयरों में 1% से ज्यादा तेजी देखने को मिली। हालांकि, फिर मुनाफावसूली के के चलते यह लाल निशान में चला गया। दोपहर 2.20 बजे तक स्टॉक 0.48% की गिरावट के साथ 533.50 रुपये पर बंद हुआ।

पिछले 6 महीने में स्टॉक 10.72% गिरा है। वहीं, 1 साल में इसने करीब 125% का रिटर्न दिया है। इस सरकारी कंपनी का मार्केट कैप 51.63 हजार करोड़ रुपये है।

हिंदुस्तान कॉपर का बिजनेस क्या है

Hindustan Copper Ltd भारत सरकार के मालिकाना हक वाली खनन कंपनी है। इसका मुख्य कारोबार कॉपर (तांबा) की खोज, खनन, उत्पादन और बिक्री है।

कंपनी कॉपर ओर (अयस्क) निकालने से लेकर उसे प्रोसेस कर कॉन्संट्रेट, कॉपर कैथोड, वायर रॉड और दूसरे कॉपर उत्पाद बनाती है। इसके ग्राहक बिजली, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रेलवे और रक्षा जैसे कई बड़े उद्योग हैं।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

सरकारी स्टील कंपनी मार्केट से जुटाएगी बड़ा फंड! FY27 में 5% का FPO लाने की प्लानिंग, सरकार से मांगी मंजूरी

Steel Authority of India FPO: सरकारी क्षेत्र की सबसे बड़ी स्टील निर्माता कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) बाजार से फंड जुटाने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक, महारत्न कंपनी ‘सेल’ ने चालू वित्त वर्ष (FY27) में 5 फीसदी का फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (FPO) लाने के लिए वित्त मंत्रालय के निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) से संपर्क किया है।

इसके पीछे का उद्देश्य अपनी विस्तार योजनाओं के लिए पैसे जुटाना है। कंपनी की योजना नए शेयर जारी कर मिलने वाले फंड का सीधा इस्तेमाल अपने प्लांटों के आधुनिकीकरण और कैपेक्स जरूरतों को पूरा करने में करने की है।

OFS से अलग कैसे है FPO का रास्ता?

आमतौर पर सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने के लिए सरकार ऑफर फॉर सेल (OFS) का रास्ता चुनती है, लेकिन SAIL इस बार FPO के जरिए फंड जुटाना चाहती है। OFS के जरिए जब सरकार शेयर बेचती है, तो उससे मिलने वाला सारा पैसा भारत सरकार के खजाने में जाता है। वहीं FPO के तहत कंपनी नए इक्विटी शेयर जनता के लिए जारी करती है। इससे जुटाई गई राशि सीधे कंपनी के बैलेंस शीट में जाती है, जिसका इस्तेमाल बिजनेस विस्तार में होता है।

वर्तमान में SAIL में भारत सरकार की हिस्सेदारी 65 फीसदी है। फ्रेश इक्विटी जारी होने से सरकार की शेयरहोल्डिंग में थोड़ी गिरावट तो आएगी, लेकिन इससे सरकार को सीधे तौर पर कोई रेवेन्यू नहीं मिलेगा, बल्कि पूरी रकम कंपनी के खाते में जाएगी।

कैपेक्स और क्षमता विस्तार के लिए फंड की जरूरत

इस्पात मंत्रालय के तहत आने वाली महारत्न कंपनी SAIL हाल के वर्षों में अपने उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए लगातार पूंजीगत व्यय बढ़ा रही है। कंपनी देश भर में भिलाई, बोकारो, राउरकेला, दुर्गापुर और बर्नपुर में 5 इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट और 3 स्पेशल स्टील प्लांट संचालित करती है। फ्रेश शेयर बिक्री से मिलने वाला फंड कंपनी को कर्ज या सिर्फ आंतरिक लाभ पर निर्भर रहने के बजाय पूंजी जुटाने का एक मजबूत विकल्प प्रदान करेगा।

Q1 में मुनाफा दोगुना से ज्यादा बढ़ा

यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब कंपनी के पहली तिमाही (Q1 FY27) के नतीजे काफी मजबूत रहे हैं। जून तिमाही में कंपनी का समेकित शुद्ध लाभ दो गुने से अधिक बढ़कर ₹1,644.05 करोड़ रहा, जिसमें खर्चों में आई कमी का बड़ा योगदान रहा। जून तिमाही के दौरान क्रूड स्टील का उत्पादन 4.76 मिलियन टन रहा, जबकि बिक्री 4.16 MT रही।

SAIL के चेयरमैन अशोक कुमार पांडा ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद घरेलू इस्पात खपत में लगातार सुधार देखने को मिला है और भारतीय स्टील उद्योग ने मजबूत जुझारूपन दिखाया है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

KCC: किसान क्रेडिट कार्ड में किसानों को कैसे मिलता है सस्ता लोन? कौन कर सकता है अप्लाई, जानें पूरा प्रोसेस

भारत में खेती और उससे जुड़ी एक्टिविटीज को आर्थिक मजबूती देने के लिए बैंक और फाइनेंशियल इंस्टिट्यूतम तमाम स्कीम चलाते हैं। इनमें सबसे अहम और और पॉपुलर स्कीम है किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना। अगस्त 1998 में पब्लिक सेक्टर्स के बैंकों द्वारा शुरू की गई यह योजना किसानों को खेती-किसानी की जरूरतों के लिए समय पर और कम दरों पर क्रेडिट यानी कि लोन उपलब्ध कराती है। शुरुआत में इसका मुख्य उद्देश्य सिर्फ मौसमी फसलों के खर्चों को पूरा करना था, लेकिन समय के साथ इसका दायरा बढ़ाकर डेयरी, पोल्ट्री, मत्स्य पालन, पशुपालन और मधुमक्खी पालन जैसी एक्टिविटीज तक इसका विस्तार किया गया।

किसान क्रेडिट कार्ड से कैसे मिलता है बेहद सस्ता लोन?

किसान क्रेडिट कार्ड की सबसे बड़ी खासियत इस पर मिलने वाली बेहद कम ब्याज दरें और सरकारी छूट हैं। भारत सरकार की संशोधित ब्याज सब्सिडी योजना के तहत बैंकों को KCC पर अधिकतम 3.00 लाख रुपये तक के कुल लोन पर 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से लोन उपलब्ध कराने के लिए सहायता दी जाती है। जो किसान अपने लोन का भुगतान समय पर करते हैं, उन्हें केंद्र सरकार की ओर से 3 प्रतिशत की अतिरिक्त ब्याज छूट दी जाती है। इस तरह देखें तो समय पर लोन चुकाने वाले किसानों को 4 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से सस्ता लोन मिल जाता है। इस ब्याज छूट का कैलकुलेशन लोन मिलने या पैसे विड्रॉल करने की तारीख से से लेकर लोन चुकाने की असल तारीख या बैंक द्वारा तय की गई तारीख (जो भी पहले हो) तक अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए की जाती है।

कौन-कौन कर सकता है अप्लाई?

किसान क्रेडिट कार्ड योजना का लाभ समाज के हर वर्ग के किसान और पशुपालक उठा सकते हैं। योजना के तहत पात्र आवेदकों की श्रेणियां नीचे दी गई हैं-

व्यक्तिगत/संयुक्त भू-स्वामी: ऐसे किसान जो स्वयं की भूमि पर खेती करते हैं।

पट्टेदार व बटाईदार: पट्टेदार किसान , मौखिक पट्टेदार और साझा कृषक या बटाईदार।

समूह और संस्थाएं: किसानों, पट्टेदारों या बटाईदारों के स्वयं सहायता समूह (SHG) या संयुक्त देयता समूह (JLG)।

दूसरी गतिविधियों से जुड़े किसान: पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, रेशम कीट पालन, मशरूम खेती और अन्य गतिविधियों में लगे व्यक्ति।

सरकार के नियमों के अनुसार, KCC योजना के तहत संशोधित ब्याज सबवेंशन का लाभ उठाने के लिए बैंक खातों को आधार से लिंक करना अनिवार्य है।

KCC लोन की सीमा और उपलब्ध फंड की राशि

KCC के तहत लोन की सीमा किसान की भूमि, फसल के प्रकार और गतिविधियों के आधार पर तय की जाती है। योजना में फंड की सीमा को भी तय किया गया है। फसलों की खेती और कटाई के बाद के खर्चों के लिए अधिकतम 3 लाख रुपये तक की क्रेडिट सीमा तय की गई है। पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, रेशम पालन, मधुमक्खी पालन आदि के लिए वर्किंग कैपिटल के रूप में अधिकतम 2 लाख रुपये तक की सीमा मिलती है। 1 हेक्टेयर तक की जोत वाले सीमांत किसानों के लिए 10000 रुपये से लेकर 50000 रुपये तक की फ्लेक्सी केसीसी दी जाती है। इसमें जमीन के मूल्य से जोड़े बिना खेती के खर्च, घरेलू जरूरतों और छोटे उपकरणों की खरीद के लिए 5 साल की अवधि के लिए लिमिट तय की जाती है।

क्रेडिट लिमिट और लोन की राशि का आकलन कैसे होता है?

KCC लोन की सीमा 5 वर्षों की अवधि के लिए तय की जाती है और यह एक रिवॉल्विंग क्रेडिट लिमिट के रूप में काम करती है। पहले वर्ष की लोन सीमा का निर्धारण इस फॉर्मूले से होता है:

पहले वर्ष की सीमा = (जिला स्तरीय तकनीकी समिति द्वारा तय फसल का पैमाना × खेती का क्षेत्रफल) + (कटाई बाद/घरेलू जरूरतों के लिए सीमा का 10%) + (फार्म परिसंपत्तियों की मरम्मत और रखरखाव के लिए सीमा का 20%) + फसल/दुर्घटना बीमा प्रीमियम।

दूसरे से पांचवें साल की सीमा: अगले प्रत्येक वर्ष (2nd, 3rd, 4th और 5th ईयर) के लिए लागत वृद्धि के रूप में सीमा में 10% की बढ़ोतरी की जाती है।

टर्म लोन: भूमि विकास, सिंचाई, कृषि उपकरण खरीदने आदि के लिए 5 साल के समय के लिए टर्म लोन घटक भी इसमें जोड़ा जाता है। 5वें वर्ष की तय अल्पकालिक सीमा और टर्म लोन की कुल राशि मिलाकर कार्ड की मैक्सिमम पर्मिसेबल लिमिट तय होती है।

KCC क्रेडिट की प्रमुख विशेषताएं और इस्तेमाल

किसान क्रेडिट कार्ड योजना सिंगल के तहत किसानों की तमाम जरूरतों को पूरा करती है। अल्पकालिक फसल जरूरतों के तहत इसका फायदा मौसमी फसलों, सब्जियों, फल-फूलों, वृक्षारोपण, मसालों और औषधीय पौधों की खेती के लिए उठाया जा सकता है। उपज की कटाई के बाद के खर्चों और e-NWR (इलेक्ट्रॉनिक नेगोशिएबल वेयरहाउस रसीद) के एवज में लोन लेने के लिए। प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित किसानों के लिए फसल ऋण के पुनर्गठन पर पहले वर्ष के लिए ब्याज सबवेंशन की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।

इसके अलावा केसीसी में छोटे और सीमांत किसानों को फसल कटाई के तुरंत बाद मजबूरी में कम कीमत पर उपज बेचने से रोकने के लिए वेयरहाउसिंग अथॉरिटी से पंजीकृत गोदामों में रखी उपज की रसीद पर 6 महीने तक ब्याज सबवेंशन मिलता है।

कहां से मिलेगा KCC और आवेदन की प्रक्रिया

किसान क्रेडिट कार्ड प्राप्त करने के लिए किसान अलग अलग फाइनेंशियल इंस्टिट्यूशन में आवेदन कर सकते हैं। KCC जारी करने के लिए अधिकृत संस्थानों की बात करें तो इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, निजी क्षेत्र के अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, ग्रामीण सहकारी बैंक, लघु वित्त बैंक, कंप्यूटरीकृत प्राथमिक कृषि ऋण समितियां शामिल हैं।

केसीसी के लिए आवेदन की प्रक्रिया

किसान अपने नजदीकी बैंक शाखा में जाकर या बैंक की आधिकारिक वेबसाइट/पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन फॉर्म जमा कर सकते हैं। आवेदन के साथ पहचान पत्र, निवास प्रमाण पत्र, भूमि के दस्तावेज (या पट्टेदारी का प्रमाण) और आधार कार्ड लगाना होता है। बैंक द्वारा एलिजिबिलिटी और डॉक्यूमेंट्स की जांच के बाद KCC जारी कर दिया जाता है।

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