CBSE’s three-language policy: सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई की 3 भाषा नीति पर जताई चिंता, तमिलनाडु में जेएनवी मामले में सुनवाई के दौरान की टिप्पणी

CBSE’s three-language policy: सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान सीबीएसई बोर्ड के स्कूलों में 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा लागू करने के फैसले पर चिंता जताई है। जस्टिस नागरत्ना ने तीसरी भाषा शुरू करने के समय पर कई बातें कहीं। उन्होंने कहा कि इससे बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों पर बेवजह का तनाव पड़ता है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने यह बात तमिलनाडु सरकार अपील पर सुनवाई करते हुए कही है। तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के उस निर्देश के खिलाफ अपील की थी, जिसमें राज्य के हर जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) के निर्माण को आसान बनाने को कहा गया था। तमिलनाडु ने इन स्कूलों की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर चिंताओं का हवाला देते हुए लगातार जेएनवी बनाने का विरोध किया है। यह मामला सीधी तौर पर सीबीएसई बोर्ड की तीन भाषा नीति से जुड़ा हुआ नहीं है। लेकिन जस्टिस नागरत्ना ने तीसरी भाषा शुरू करने के समय पर कई बातें कहीं।

सीबीएसई बोर्ड की की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को अभी चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच के सामने अलग-अलग जनहित याचिकाओं में चुनौती दी गई है। बेंच ने पॉलिसी को लागू करने पर रोक लगाने से मना कर दिया है और मामले की सुनवाई अगले हफ्ते के लिए लिस्ट कर दी है।

तमिलनाडु में जेएनवी बनाने पर रोक की अपील पर सुनवाई के दौरान, तमिलनाडु सरकार के वकील ने कहा कि राज्य का एतराज मुख्य रूप से तीन-भाषा पॉलिसी से जुड़ा है। जस्टिस नागरत्ना ने साफ किया कि पॉलिसी में हिंदी को तीसरी भाषा के तौर पर जरूरी नहीं बनाया गया है। उन्होंने कहा, “राज्य की भाषा पढ़ाई जानी चाहिए, इंग्लिश पढ़ाई जानी चाहिए, और कोई भी तीसरी भाषा। इसमें हिंदी नहीं लिखा है।”

रेस्पोंडेंट (हाई कोर्ट में NGO पिटीशनर) की तरफ से पेश वकील जी. प्रियदर्शिनी ने बताया कि एनईपी में साफ तौर पर कहा गया है कि किसी भी राज्य पर कोई भी भाषा नहीं थोपी जानी चाहिए। जवाब में, जस्टिस नागरत्ना ने राज्य से पूछा, “आप हिंदी नहीं चाहते, लेकिन अगर यह संस्कृत है, तो क्या दिक्कत है?” तमिलनाडु के वकील ने जवाब दिया कि तीसरी भाषा सिर्फ कक्षा 9 से जरूरी हो जाती है।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “नहीं, यह बहुत बुरा है। 9वीं कक्षा काफी तनाव वाली होती है। आप 9वीं में एक नई भाषा क्यों शुरू करते हैं? आप इसे छठी कक्षा में शुरू करें।”

अपनी स्कूलिंग के अनुभव बताते हुए, जज ने याद किया कि उनके स्कूल के छात्रों ने मिडिल स्कूल के दौरान तीसरी भाषा सीखना शुरू कर दिया था क्योंकि एसएसएलसी परीक्षा के लिए यह जरूरी था। “यह उन लोगों के लिए कन्नड़ थी जिनकी दूसरी भाषा हिंदी थी और इसका उल्टा भी। संस्कृत भी थी, इसलिए आपके पास तीसरी भाषा हो सकती थी। जितना पहले हो, उतना अच्छा।” केंद्र सरकार को संबोधित करते हुए, जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा, “भारत सरकार, कृपया 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा न रखें। सीबीएसई, आईसीएसई और स्टेट बोर्ड में 10वीं कक्षा एक बोर्ड परीक्षा है। 8वीं कक्षा के आखिर से, प्रेशर शुरू हो जाता है।”

जस्टिस नागरत्ना ने तमिलनाडु सरकार को यह भी सलाह दी कि वह सिर्फ इसलिए सेंट्रल स्कीम्स को रिजेक्ट न करे क्योंकि वे यूनियन गवर्नमेंट से आती हैं। उन्होंने राज्य से कहा, “आपका अपना एजुकेशन सिस्टम हो सकता है, लेकिन केंद्र सरकार के स्कूलों को न रोकें,” बाद में उन्होंने कहा, “यह रवैया न रखें कि यह केंद्र सरकार है, तो हम इसे क्यों मानें।” बेंच में जस्टिस आर महादेवन भी थे। बेंच ने कहा कि जवाहर नवोदय विद्यालय बनाने पर केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार के बीच बातचीत अभी भी चल रही है।

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बंगाल की खाड़ी में दो नावें डूबीं,500 मौतों की आशंका:ज्यादातर रोहिंग्या सवार थे, खराब मौसम की वजह से हादसा

म्यांमार में हिंसा से बचकर भाग रहे 500 से ज्यादा लोगों के समुद्र में लापता होने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र की दो एजेंसियों के मुताबिक, म्यांमार के तट के पास खराब मौसम में दो नावें गायब हो गईं। इनमें सवार ज्यादातर लोग रोहिंग्या समुदाय के थे। अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने संयुक्त बयान में बताया कि दोनों नावें जून के आखिर में म्यांमार के पश्चिमी रखाइन राज्य से रवाना हुई थीं। पहली नाव में करीब 250 लोग सवार थे। रवाना होने के कुछ ही समय बाद उससे संपर्क टूट गया। दूसरी नाव में करीब 280 यात्री सवार थे और माना जा रहा है कि वह 8 जुलाई को म्यांमार के अयेयारवाडी तट के पास डूब गई। रोहिंग्या लोगों के पास किसी देश की नागरिकता नहीं रोहिंग्या म्यांमार के रखाइन राज्य का एक मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय है। दशकों से यह समुदाय सरकारी उत्पीड़न, हिंसा और भेदभाव का सामना कर रहा है। म्यांमार की बौद्ध बहुसंख्यक सरकार और वहां के स्थानीय लोग रोहिंग्याओं को म्यांमार का मूल निवासी नहीं मानते। उनका दावा है कि ये लोग ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बांग्लादेश (तत्कालीन बंगाल) से आए अवैध अप्रवासी हैं। उन्हें आधिकारिक तौर पर ‘बंगाली’ कहकर पुकारा जाता है। रोहिंग्या समुदाय का कहना है कि वे रखाइन क्षेत्र में आठवीं सदी या उससे भी पहले से रह रहे हैं और वे वहीं के मूल निवासी हैं। साल 1982 में रोहिंग्याओं को नागरिकता देने से इनकार कर दिया गया। इसके कारण वे बिना किसी देश के नागरिक बन गए। उन्हें बुनियादी अधिकार जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, यात्रा और शादी करने तक की आजादी नहीं है। करीब 12 लाख रोहिंग्या फिलहाल बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। ये लोग म्यांमार की सेना की हिंसा से बचकर वहां पहुंचे थे। हाल के वर्षों में अमेरिका और अन्य देशों की विदेशी सहायता में कटौती के कारण इन शिविरों में खाद्य राशन भी कम कर दिया गया है। रोहिंग्या शरणार्थियों के पास सुरक्षित तरीके से म्यांमार लौटने का कोई रास्ता नहीं है। 2017 में म्यांमार की सेना पर रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा करने के आरोप लगे थे, जिसे कई देशों ने नरसंहार (जेनोसाइड) माना है। जो रोहिंग्या अब भी म्यांमार में रह रहे हैं, उन्हें कड़ी पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें से कई लोग नजरबंदी शिविरों में रहने को मजबूर हैं। मलेशिया पहुंचने के लिए उठा रहे जानलेवा जोखिम आमतौर पर रोहिंग्या इस मौसम में समुद्र के रास्ते यात्रा करने से बचते हैं, क्योंकि मानसून के दौरान समुद्र बेहद खतरनाक हो जाता है। हालांकि म्यांमार में हिंसा और बांग्लादेश के भीड़भाड़ वाले शरणार्थी शिविरों में खराब हालात के कारण रोहिंग्या समुदाय के लोग वर्षों से जर्जर लकड़ी की नावों में बैठकर मलेशिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों तक पहुंचने की कोशिश करते रहे हैं। खराब परिस्थितियों के कारण बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग जर्जर नावों के जरिए मलेशिया पहुंचने की कोशिश करते हैं। इस दौरान हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें नवजात बच्चे, बच्चे और गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि कई बार स्थानीय समुद्री एजेंसियां संकट में फंसी नावों की मदद भी नहीं करतीं। दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री रास्तों में एक संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2025 में अंडमान सागर और बंगाल की खाड़ी में करीब 900 रोहिंग्या शरणार्थी मारे गए या लापता हो गए थे। यह दुनिया में शरणार्थियों और प्रवासियों के लिए सबसे खतरनाक समुद्री मार्ग माना जाता है। IOM और UNHCR ने कहा कि यह संभावित हादसा दिखाता है कि रोहिंग्या संकट का अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों की मदद बढ़ाने की अपील की। एजेंसियों ने कहा कि दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री मार्गों में से एक पर और लोगों की जान जाने से रोकने के लिए खोज एवं बचाव अभियान मजबूत करना, शरण देने की व्यवस्था बेहतर करना और मानव तस्करी के नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है। UNHCR के अनुसार, 2025 में 6,500 से ज्यादा रोहिंग्या समुद्र के रास्ते भागने की कोशिश कर रहे थे। इनमें से करीब 900 लोग मारे गए या लापता हो गए। यह रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए अब तक का सबसे घातक साल था और दुनिया के किसी भी प्रमुख शरणार्थी समुद्री मार्ग पर सबसे अधिक मृत्यु दर दर्ज की गई। भारत में कितने रोहिंग्या हैं? नोट: रोहिंग्याओं की संख्या को लेकर भारत सरकार और UNHCR के आंकड़े अलग-अलग हैं। UNHCR केवल अपने यहां पंजीकृत शरणार्थियों और शरण मांगने वालों की संख्या बताता है, जबकि भारत सरकार का अनुमान देश में मौजूद कुल रोहिंग्या आबादी पर आधारित है।

₹1200 करोड़ जुटाने का प्लान, इस कारण Ather Energy में सरकार भी करेगी निवेश

दिग्गज ईवी कंपनी एथर एनर्जी (Ather Energy) ने नई पूंजी जुटाने का ऐलान किया है। इसमें एक निवेशक इंडिया-जापान फंड (IJF) का भी नाम सामने आया। यह भारत सरकार और JBIC (जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन) का एक इंवेस्टमेंट वेईकल है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि एक लिस्टेड दोपहिया बनाने वाली कंपनी में सरकार क्यों पैसे लगा रही है। इसका जवाब कंपनी को बचाने की कोशिश या मार्केट के बड़े खिलाड़ी को चुनना नहीं है बल्कि सरकार की व्यापक इंडस्ट्रियल स्ट्रैटेजी है। सरकार का लक्ष्य वैश्विक कंपनियों के टक्कर की ईवी बनाने वाली कंपनी तैयार करना, तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और देश को क्लीन मोबिलिटी मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर स्थापित करना है।

सरकार का सीधे निवेश नहीं

एथर एनर्जी में निवेश को लेकर एक और अहम बात ये है कि इसमें सरकार प्रत्यक्ष रूप से पैसे नहीं लगा रही है। यह निवेश इंडिया-जापान फंड के जरिए हो रहा है। $60 करोड़ का यह फंड साल 2023 में NIIF (नेशनल इंवेस्टमेंट एंड इंफ्रा फंड) और जेबीआईसी ने शुरू किया था। NIIF के जरिए भारत सरकार की इसमें 49% हिस्सेदारी है और बाकी 51% जेबीआईसी की। यह फंड क्लीन एनर्जी, सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और कम-कार्बन वाली टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने वाले बिजनेस में निवेश करने के लिए बनाया गया है। आईजेएफ आम सरकारी निवेश इकाई की बजाय एक लॉन-टर्म इंस्टीट्यूशनल इंवेस्टर के तौर पर काम करता है।

Ather Energy कैसे सरकार के क्राइटेरिया में फिट

आईजेएफ के निवेश के लिए एथर एनर्जी इसलिए फिट है क्योंकि विदेशों से तकनीक मंगाकर यहां असेंबलिंग करने वाली कई दूसरी कंपनियों की बजाय एथर एनर्जी ने अपनी अधिकतर तकनीक को यहीं डेवलप किया है। इसने बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम, सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म, कनेक्टेड वेईकल इकोसिस्टम, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और वाहन इलेक्ट्रॉनिक्स को खुद तैयार किया है। सरकार के लिए स्वदेशी तकनीकी क्षमता वाली कंपनियों को सपोर्ट करना ईवी को बढ़ावा जितना ही अहम होता जा रहा है। ईवी, बैट्री और उनसे जुड़ी टेक्नोलॉजी की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने से सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ मुहिम को सपोर्ट मिलता है और अधिक वैल्यू वाली मैन्युफैक्चरिंग नौकरियां भी तैयार होती हैं।

सिर्फ एक ही कंपनी में ही नहीं लग रहा पैसा

एथर एनर्जी में आईजेएफ के जरिए सरकार निवेश काफी अहम है। इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है क्योंकि इससे पता चलता है कि कंपनी ऐसे सेक्टर में काम कर रही है जिसे लंबे समय तक पॉलिसी सपोर्ट मिलता रहेगा। ऐसा नहीं है कि फंड सिर्फ एथर एनर्जी में ही पैसे लगा रही है बल्कि महिंद्रा लास्ट माइल मोबिलिटी और इलेक्ट्रिक कमर्शियल गाड़ी बनाने वाली कंपनी EKA मोबिलिटी में भी इसका निवेश है। इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के अलग-अलग सेगमेंट- जैसे तिपहिया और कमर्शियल गाड़ियों से लेकर प्रीमियम इलेक्ट्रिक स्कूटर तक की कंपनियों को सपोर्ट करके यह फंड किसी एक कंपनी पर दांव लगाने की बजाय एक बड़ा ईवी इकोसिस्टम बनाने में मदद कर रही है।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

WhatsApp और Telegram के Username Feature पर सरकार सख्त, 20 दिनों में आ सकता है बड़ा फैसला

whatsapp users name

केंद्र सरकार WhatsApp और Telegram के यूजरनेम-आधारित मैसेजिंग फीचर को लेकर मिली प्रतिक्रियाओं की समीक्षा कर रही है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में अगले करीब 20 दिनों के भीतर कोई अधिसूचना या अगला फैसला सामने आ सकता है। सूत्रों के अनुसार, WhatsApp, Telegram और Zoho Bharat Eye ने सरकार द्वारा जारी नोटिस के जवाब मंत्रालय को सौंप दिए हैं।

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कानूनी जांच जारी

मंत्रालय की कानूनी टीम इन जवाबों का विस्तृत परीक्षण कर रही है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं संबंधित फीचर किसी नियम या कानून का उल्लंघन तो नहीं करता। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि यदि आवश्यक हुआ तो नियामकीय कार्रवाई या अन्य कानूनी प्रावधान लागू किए जा सकते हैं या नहीं।

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WhatsApp के जवाब की हो रही समीक्षा

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को सप्ताहांत में WhatsApp का जवाब मिला, जिसकी फिलहाल समीक्षा की जा रही है। मंत्रालय का कहना है कि सभी जवाबों का कानूनी परीक्षण पूरा होने के बाद ही आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा। सरकार की यह प्रक्रिया ऐसे समय में चल रही है जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर यूजरनेम-आधारित मैसेजिंग और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चर्चा तेज है। फिलहाल मंत्रालय ने अंतिम निर्णय की घोषणा नहीं की है।

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WhatsApp का 'Username' फीचर क्या है?

WhatsApp एक नया फीचर लाने की तैयारी कर रहा है, जिसके जरिए लोग अपना मोबाइल नंबर साझा किए बिना एक-दूसरे से जुड़ सकेंगे। यह फीचर Telegram और Signal की तरह काम करेगा। इस फीचर में यूजर अपने लिए एक यूनिक यूजरनेम (Username) चुन सकेंगे और मोबाइल नंबर की जगह उसी यूजरनेम को दूसरे लोगों के साथ साझा करेंगे।

 

Meta का दावा है कि इससे यूजर्स की निजता (Privacy) बेहतर होगी, क्योंकि उन्हें अपनी व्यक्तिगत जानकारी पर अधिक नियंत्रण मिलेगा। हालांकि, भारत सरकार इस फीचर को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। सरकार का मानना है कि यदि मोबाइल नंबर छिप जाएंगे तो ऑनलाइन ठगों और साइबर अपराधियों की पहचान करना और उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो सकता है।

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सरकार को किस बात की चिंता है?

सरकार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि साइबर अपराधी यूजरनेम फीचर का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं। आशंका जताई जा रही है कि इस फीचर का उपयोग करके अपराधी- 

 

  • फिशिंग (Phishing) हमले,
  • फर्जी पहचान (Impersonation) बनाकर ठगी,
  • डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest) जैसे साइबर फ्रॉड,
  • और अन्य ऑनलाइन अपराधों को अंजाम दे सकते हैं।

 

इसी वजह से 1 जुलाई को केंद्र सरकार ने Meta से कहा था कि जब तक वह इस फीचर के दुरुपयोग को रोकने की ठोस व्यवस्था नहीं बताता, तब तक इसका रोलआउट आगे न बढ़ाया जाए।

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Meta ने क्या कहा?

Meta ने सरकार को बताया है कि WhatsApp के Username फीचर में सुरक्षा से जुड़े कई उपाय शामिल किए जाएंगे। हालांकि मामला सिर्फ WhatsApp की लोकप्रियता का नहीं है। भारत के आईटी अधिनियम (IT Act) और आईटी नियमों (IT Rules) के तहत एक बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म होने के कारण WhatsApp पर यूजर्स की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कानूनी जिम्मेदारी भी है। सरकार यह भी जांच रही है कि यदि भविष्य में इस फीचर के कारण साइबर अपराध बढ़ते हैं, तो क्या ऐसी स्थिति में Meta की जवाबदेही तय की जा सकती है।

 

Semiconductor Mission 2.0: ₹1.27 लाख करोड़ के मिशन को मंजूरी, भारत को चिप हब बनाने की तैयारी

India Semiconductor Mission (ISM 2.0): केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को India Semiconductor Mission (ISM 2.0) को मंजूरी दे दी। इस मिशन के लिए ₹1.27 लाख करोड़ का बजट तय किया गया है। यह पहले चरण के ₹76,000 करोड़ से करीब 68% ज्यादा है। सरकार का लक्ष्य सिर्फ चिप बनाना नहीं है। अब पूरी सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन भारत में तैयार करने पर जोर रहेगा, ताकि देश आयात पर कम निर्भर हो और दुनिया का बड़ा चिप हब बन सके।

आखिर ISM 2.0 में नया क्या है?

पहले चरण यानी ISM 1.0 का फोकस चिप मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लाने पर था। अब ISM 2.0 का दायरा और बड़ा कर दिया गया है। सरकार अब चिप डिजाइन से लेकर मशीनें, केमिकल, गैस, कच्चा माल, एडवांस पैकेजिंग और रिसर्च तक पूरा इकोसिस्टम देश में तैयार करना चाहती है।

6 बड़े पिलर पर तैयार हुआ मिशन

सरकार ने ISM 2.0 को छह बड़े हिस्सों में बांटा है।

  • सबसे पहले भारत को चिप डिजाइन के क्षेत्र में मजबूत बनाया जाएगा। सरकार स्टार्टअप और डिजाइन कंपनियों को मदद देगी, ताकि वे दुनिया के लिए चिप डिजाइन कर सकें।
  • दूसरा फोकस सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन पर रहेगा। चिप बनाने वाली मशीनें, स्पेशलिटी केमिकल, गैस और जरूरी कच्चा माल देश में ही तैयार करने की कोशिश होगी।
  • तीसरे चरण में नई सिलिकॉन फैब, कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब, डिस्प्ले फैब और दूसरी निर्माण इकाइयों में निवेश बढ़ाया जाएगा।
  • चौथा लक्ष्य ATMP और OSAT यानी चिप की एडवांस पैकेजिंग और टेस्टिंग क्षमता को मजबूत करना है।
  • पांचवें हिस्से में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर जोर रहेगा। सरकार चाहती है कि भारत सिर्फ मौजूदा तकनीक तक सीमित न रहे, बल्कि अगली पीढ़ी की चिप टेक्नोलॉजी भी विकसित करे।
  • छठा फोकस स्किल डेवलपमेंट पर होगा। इस सेक्टर के लिए बड़ी संख्या में इंजीनियर और एक्सपर्ट तैयार किए जाएंगे।

105 स्टार्टअप पहले से कर रहे हैं काम

सरकार के मुताबिक, देश में 105 स्टार्टअप पहले से सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन पर काम कर रहे हैं। नई योजना के तहत इन्हें तकनीकी और वित्तीय मदद दी जाएगी। सरकार चाहती है कि भारत चिप डिजाइन के क्षेत्र में भी दुनिया के बड़े देशों में शामिल हो।

2028 तक शुरू हो सकती है पहली चिप फैक्ट्री

सरकार ने कहा है कि भारत की पहली सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन (Fab) यूनिट 2028 तक शुरू होने की उम्मीद है। इससे देश में चिप निर्माण को नई रफ्तार मिलेगी।

पहले चरण में क्या हासिल हुआ?

सरकार के मुताबिक, India Semiconductor Mission (ISM) 1.0 के तहत अब तक 12 मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें एक सिलिकॉन फैब, एक सिलिकॉन कार्बाइड फैब, एक गैलियम नाइट्राइड माइक्रो LED डिस्प्ले फैब और 9 पैकेजिंग यूनिट शामिल हैं। इन परियोजनाओं में ₹1.64 लाख करोड़ से ज्यादा के निवेश को मंजूरी मिली है।

Micron, Kaynes और CG Semi में कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू हो चुका है। एक और यूनिट इस साल के अंत तक प्रोडक्शन शुरू कर सकती है।

68 हजार छात्रों को मिली ट्रेनिंग

सरकार सेमीकंडक्टर सेक्टर के लिए कुशल ह्यूमन रिसोर्स भी तैयार कर रही है। अभी 315 विश्वविद्यालयों में आधुनिक Electronic Design Automation (EDA) टूल्स के जरिए पढ़ाई हो रही है। अब तक 68,000 से ज्यादा छात्रों को ट्रेनिंग दी जा चुकी है।

बड़ी कंपनियों की भी दिलचस्पी

भारत के सेमीकंडक्टर सेक्टर में विदेशी कंपनियों का भरोसा भी बढ़ रहा है। AMD और Applied Materials ने 40-40 करोड़ डॉलर, Microchip Technology ने 30 करोड़ डॉलर, Lam Research ने 110 करोड़ डॉलर और KLA ने 40 करोड़ डॉलर के निवेश का ऐलान किया है।

वहीं ASML, Merck और IBL Electron ने टाटा ग्रुप के साथ समझौते किए हैं। इनका मकसद भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करना है।

सरकार का बड़ा लक्ष्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही कह चुके हैं कि भारत सिर्फ चिप आयात करने वाला देश नहीं बनना चाहता। सरकार का लक्ष्य पूरी वैल्यू चेन भारत में तैयार करना है। आने वाले वर्षों में भारत की सेमीकंडक्टर मांग 50 अरब डॉलर से बढ़कर 100 अरब डॉलर से ज्यादा होने का अनुमान है। सरकार चाहती है कि इस बढ़ती मांग का बड़ा हिस्सा देश में ही पूरा हो।मजबूत बनाना है।

Market Outlook : हल्की बढ़त के साथ बंद हुआ बाजार, जानिए 16 जुलाई को कैसी रह सकती है इसकी चाल

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।