भारतीय नौसेना का किलर ड्रोन प्लान, वॉरशिप से 1000 किमी दूर से ही दुश्मन का जहाज होगा तबाह! समझिए कैसे करेगा काम

लाल सागर में हाल के दिनों में हुए ड्रोन हमलों के बाद दुनियाभर की नौसेनाएं अपनी बेड़े की सुरक्षा और हमला करने की क्षमताओं की समीक्षा कर रही हैं। इसी बीच भारतीय नौसेना ने भी अपनी युद्धक क्षमताओं को कई गुना बढ़ाने के लिए एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू कर दिया है। नौसेना अपने युद्धपोतों के लिए 1000 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाले शिप-लॉन्च्ड लॉइटरिंग म्यूनिशंस हासिल करने की योजना बना रही है। इस कदम से नौसेना को नौसैनिक चुनौतियों से निपटने और तटीय इलाकों में दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला करने की जबरदस्त क्षमता हासिल हो जाएगी।

न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक रक्षा मंत्रालय ने इन मध्यम दूरी के ड्रोनों की जरूरतों को हरी झंडी दे दी है। आपको बता दें कि 1000 किलोमीटर की विशाल रेंज से भारतीय नौसेना के सर्फेस फ्लीट की परिचालन पहुंच काफी हद तक बढ़ जाएगी। इसके जरिए भारतीय युद्धपोत हिंद महासागर क्षेत्र के रणनीतिक इलाकों में तैनात रहकर परिचालन कर सकेंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि इस क्षमता की बदौलत भारतीय युद्धपोत दुश्मन की तटीय मिसाइलों की पहुंच से काफी बाहर रहते हुए भी दुश्मन के तटीय और जमीनी ठिकानों पर विनाशकारी हमला कर पाएंगे।

हवा में 9 घंटे की स्टेमिना और 200 नॉट्स से अधिक गोता लगाने की रफ्तार

भारतीय नौसेना ऐसे स्वदेशी लॉइटरिंग म्यूनिशन सिस्टम की तलाश में है जो हवा में 9 घंटे तक लगातार मंडरा सकें। लक्ष्य की पहचान होने पर ये ड्रोन 200 नॉट्स से अधिक की रफ्तार से दुश्मन पर सीधे गोता लगाकर हमला कर सकेंगे। इन किलर ड्रोनों में दिन और रात दोनों समय काम करने वाले इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सीकर लगे होंगे ताकि दिन हो या रात दुश्मन की पहचान कर उसे तबाह किया जा सके। नौसेना की शर्त है कि ये हथियार वन मीटर से कम सर्कुलर एरर प्रोबेबल के साथ अचूक और सटीक हमला करने में सक्षम होने चाहिए।

सबसे खास विशेषता यह है कि ये ड्रोन ऐसे कठिन परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से काम करेंगे जहां सैटेलाइट नेविगेशन सिग्नल को जाम कर दिया गया हो, स्पूफ किया गया हो या उनका सिग्नल पूरी तरह बंद कर दिया गया हो।

ऑपरेटर एक साथ नियंत्रित करेगा 10 ड्रोन

रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रणाली को इस तरह से डिजाइन किया जाना जरूरी है कि जहाज पर मौजूद सिर्फ एक ऑपरेटर एक मॉड्यूलर कंट्रोल कंसोल के जरिए एक साथ 10 ड्रोनों को नियंत्रित कर सके। हवा में उड़ रहे इन ड्रोनों का नियंत्रण एक जहाज से दूसरे जहाज या फिर जमीन पर बने स्टेशन के बीच भी आसानी से स्थानांतरित किया जा सकेगा।

मौसम की मार झेलने की क्षमता और 20 साल तक लाइफ

नौसेना ने इन प्रणालियों के लिए बहुत ही कड़े पर्यावरणीय मानक तय किए हैं। वेंडरों को यह साबित करना होगा कि ये ड्रोन बेहद कठिन मौसमी परिस्थितियों में भी काम कर सकते हैं ताकि 50 नॉट्स की तेज हवाओं और 95% की नमी के स्तर के दौरान भी इन्हें लॉन्च किया जा सके। ड्रोन के क्रिटिकल कंपोनेंट की लाइफ पर भी कम से कम 10 सालों की गारंटी होनी चाहिए, जिसे जरूरत पड़ने पर 20 सालों तक बढ़ाया जा सके।

बाय इंडियन कैटिगरी के तहत होगी खरीद, बढ़ेगी स्वदेशी ताकत

रक्षा मंत्रालय इन प्रणालियों को बाय इंडियन-आईडीडीएम (Buy Indian-IDDM – Indigenously Designed, Developed and Manufactured) कैटिगरी के तहत खरीदने की योजना बना रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य इंडिजिनस इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट और देश के अंदर ही मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है।

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क्या भारत की Agni-6 मिसाइल धरती के किसी भी कोने तक पहुंच सकती है? समझिए ICBM की पूरी साइंस

Agni-6: भारत के अग्नि मिसाइल प्रोग्राम में अग्नि-6 को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। इसे भारत की भविष्य की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) के रूप में देखा जाता है। सबसे ज्यादा चर्चा इसकी संभावित मारक क्षमता को लेकर है। कहा जा रहा है कि इस नई मिसाइल की रेंज बहुत ज्यादा हो सकती है। लेकिन यह हजारों किलोमीटर की दूरी कैसे तय कर सकती है? कई रिपोर्टों में अग्नि-6 की संभावित रेंज 8,000 से 12,000 किलोमीटर तक बताई गई है। हालांकि इसकी फाइनल ऑपरेशनल रेंज को लेकर अभी आधिकारिक और डिटेल्स जानकारी सामने नहीं आई है।

सवाल यह है कि कोई मिसाइल आखिर हजारों किलोमीटर की दूरी कैसे तय कर सकती है? इसके पीछे रॉकेट प्रोपल्शन, मल्टी-स्टेज रॉकेट तकनीक, बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी, गाइडेंस सिस्टम और सबसे मुश्किल चरणों में से एक वायुमंडल में री-एंट्री का महत्वपूर्ण योगदान होता है।

Agni-6 मिसाइल क्या है?

अग्नि-6 को भारत की अगली पीढ़ी की लंबी दूरी की मिसाइल प्रोजेक्ट के तौर पर देखा जाता है। इसे भविष्य की ICBM क्षमता से जोड़ा जाता है। हालांकि, इस प्रोजेक्ट की कई तकनीकी जानकारियां अभी सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट नहीं हैं। कहा जाता है कि Agni-6 एक ICBM (इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल) है जिसे भारत भविष्य में विकसित करेगा। इसमें भारत की Agni मिसाइलों की रिसर्च के दौरान विकसित की गई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा।

भारत ने अग्नि मिसाइल परिवार के अलग-अलग वर्जन के विकास के दौरान रॉकेट, गाइडेंस, नेविगेशन, एयरोडायनामिक्स, कंट्रोल सिस्टम और हाई-टेम्परेचर मटेरियल जैसी टेक्नोलॉजी में लगातार प्रगति की है। इन्हीं क्षेत्रों में हासिल विशेषज्ञता किसी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है।

Agni-6 को कैसे विकसित किया गया?

Agni सीरीज में इस्तेमाल होने वाली टेक्नोलॉजी में DRDO और भारतीय एयरोस्पेस और डिफेंस इंडस्ट्री की कोशिशों से कई दशकों से लगातार सुधार हो रहा है। इसके लिए सॉलिड रॉकेट प्रोपल्शन, गाइडेंस, मटीरियल साइंस, एयरोडायनामिक्स और कंट्रोल सिस्टम में बहुत ज्यादा महारत की जरूरत होती है। इन टेक्नोलॉजीज़ में स्पेस इंजीनियरिंग से काफी समानताएं हैं। हालांकि, इनका इस्तेमाल अलग-अलग तरह से किया जाता है।

हजारों किलोमीटर दूर तक कैसे पहुंचती है बैलिस्टिक मिसाइल?

बैलिस्टिक मिसाइल का काम सामान्य विमान की तरह लगातार इंजन चलाकर पूरी दूरी तय करना नहीं होता। इसका एक बड़ा हिस्सा बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी के आधार पर तय होता है। मिसाइल के शुरुआती चरण में रॉकेट इंजन उसे तेज गति प्रदान करते हैं। ये काफी ऊंचाई तक पहुंचाते हैं। जब उसका पावर्ड फ्लाइट चरण पूरा हो जाता है, तो वाहन गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में एक निर्धारित घुमावदार पथ पर आगे बढ़ता है। यानी शुरुआती चरण में रॉकेट इंजन मुख्य भूमिका निभाते हैं। जबकि उसके बाद गति, गुरुत्वाकर्षण और निर्धारित रूट्स के आधार पर मिसाइल बहुत लंबी दूरी तय कर सकती है।

Agni-6 धरती पर कहीं भी उड़ सकती है?

अग्नि-6 को लेकर कभी-कभी यह दावा किया जाता है कि यह धरती के किसी भी हिस्से तक पहुंचने में सक्षम हो सकती है। इसका अर्थ तकनीकी तौर पर यह नहीं है कि मिसाइल सचमुच पृथ्वी के हर स्थान पर पहुंच सकती है। जब कहा जाता है कि Agni-6 “धरती पर कहीं भी” उड़ सकती है, तो इसका मतलब है कि इसमें बहुत दूर तक उड़ने की क्षमता है।

दरअसल, कोई भी बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च की जगह, ट्रेजेक्टरी और पेलोड के आधार पर इतनी दूर तक नहीं उड़ सकती। इस टेक्नोलॉजी के पीछे की फिजिक्स काफी आसान है। जब बैलिस्टिक व्हीकल अपनी पावर्ड फ्लाइट की ऊंचाई तक पहुंच जाता है, तो वह ग्रेविटी के असर से आर्क ट्रेजेक्टरी (घुमावदार रास्ते) पर उड़ता है।

टेस्ट के लिए कई रॉकेट स्टेज का इस्तेमाल 

मल्टी-स्टेजिंग एक आसान आइडिया पर आधारित है। बिना इस्तेमाल वाले हिस्से को अलग करके व्हीकल का वजन कम करना। हर रॉकेट स्टेज में व्हीकल के फ्यूल टैंक और इंजन होते हैं। जब फ्यूल खत्म हो जाता है, तो उसे अलग किया जा सकता है। बाकी बचा रॉकेट हल्का हो जाएगा और ज्यादा स्पीड पकड़ सकेगा। किसी भी बैलिस्टिक मिसाइल की वास्तविक पहुंच कई कारकों पर निर्भर करती है।

इनमें लॉन्च लोकेशन, प्रक्षेपवक्र, पेलोड और मिसाइल की वास्तविक क्षमता शामिल हैं। इसलिए ‘कहीं भी पहुंचने’ जैसी भाषा आमतौर पर इसकी अत्यधिक लंबी दूरी की क्षमता को दर्शाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। अग्नि-6 की वास्तविक रेंज और ऑपरेशनल क्षमता को लेकर आधिकारिक तौर पर जितनी जानकारी उपलब्ध है, उससे आगे के दावों को सावधानी से देखना जरूरी है।

मल्टी-स्टेज रॉकेट टेक्नोलॉजी क्यों है अहम?

लंबी दूरी के रॉकेट और मिसाइल सिस्टम में मल्टी-स्टेजिंग एक महत्वपूर्ण तकनीक है। इसका मूल सिद्धांत काफी सरल है। इस हिस्से का ईंधन खत्म हो गया है। उसे अलग कर दिया जाए ताकि बाकी वाहन का वजन कम हो सके। जब किसी चरण का ईंधन खत्म हो जाता है, तो उस खाली चरण को अलग किया जा सकता है। इससे आगे बढ़ रहे वाहन का वजन कम होता है। उपलब्ध ऊर्जा का ज्यादा प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि लंबी दूरी की रॉकेट सिस्टम में मल्टी-स्टेज डिजाइन का इस्तेमाल महत्वपूर्ण माना जाता है।

अग्नि परिवार के विकास में DRDO की भूमिका

भारत के अग्नि मिसाइल परिवार का विकास कई दशकों में हुआ है। इसमें DRDO और भारतीय एयरोस्पेस एवं डिफेंस उद्योग से जुड़े वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने गाइडेंस, नियंत्रण, संरचनात्मक डिजाइन और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में काम किया है।

लंबी दूरी की मिसाइल तैयार करने के लिए केवल शक्तिशाली इंजन पर्याप्त नहीं होता। उसे सही दिशा में बेहद सटीक तरीके से नियंत्रित करना, उड़ान के दौरान उसकी स्थिति निर्धारित करना और अलग-अलग परिस्थितियों में उसके ढांचे को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है। इनमें से कई तकनीकी क्षेत्र अंतरिक्ष अभियानों में इस्तेमाल होने वाली इंजीनियरिंग से जुड़े हैं।

धरती पर Agni-6 की री-एंट्री के समय क्या होता है?

तेज रफ्तार वाली उड़ान में ‘री-एंट्री’ (वापसी) को सबसे मुश्किल चरणों में से एक माना जाता है। जैसे ही यान पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, उसे लगातार ज्यादा घनी हवा का सामना करना पड़ता है। रफ्तार बढ़ने के साथ-साथ, हवा के घर्षण और दबाव से बहुत ज्यादा गर्मी पैदा होती है। इसका मतलब है कि पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा एंट्री करने के दौरान होने वाली कठोर स्थितियों को झेलने के लिए यान को खास तरह की सामग्रियों की जरूरत होती है। किसी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल के लिए वायुमंडल में दोबारा प्रवेश यानी री-एंट्री बेहद चुनौतीपूर्ण चरण होता है।

सिर्फ लंबी दूरी ही नहीं, सटीकता भी जरूरी

किसी ICBM की क्षमता का आकलन केवल उसकी रेंज से नहीं किया जाता। लंबी दूरी तय करने के साथ-साथ उसे निर्धारित रूट्स पर बनाए रखना और लक्ष्य क्षेत्र तक आवश्यक सटीकता के साथ पहुंचाना भी महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए गाइडेंस और कंट्रोल सिस्टम अहम भूमिका निभाते हैं। मिसाइल की उड़ान के दौरान उसका रूट कंट्रोल करने और आवश्यक सुधार करने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों की जरूरत होती है।

अग्नि-6 को लेकर बड़ी बातें

अग्नि-6 को भारत की भविष्य की लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता से जोड़ा जाता है। लेकिन इसकी सटीक रेंज, अंतिम डिजाइन, तैनाती और अन्य ऑपरेशनल क्षमताओं को लेकर सार्वजनिक जानकारी सीमित है। 8,000 से 12,000 किलोमीटर जैसी रेंज का उल्लेख विभिन्न रिपोर्टों में मिलता है। लेकिन इसे अग्नि-6 की आधिकारिक रूप से घोषित अंतिम ऑपरेशनल रेंज मानना उचित नहीं होगा।

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कुल मिलाकर, अग्नि-6 जैसी लंबी दूरी की मिसाइल की क्षमता के पीछे केवल एक शक्तिशाली रॉकेट नहीं। बल्कि मल्टी-स्टेज प्रोपल्शन, बैलिस्टिक उड़ान, गाइडेंस एवं कंट्रोल, एयरोडायनामिक्स और हाई-स्पीड री-एंट्री तकनीक जैसी कई जटिल तकनीकों का संयोजन होता है। यही तकनीकें किसी मिसाइल को हजारों किलोमीटर की दूरी तय करने में सक्षम बनाती हैं।

नई Bajaj Pulsar N160 S ₹1.34 लाख में लॉन्च, साथ में आया फीचर्स से भरपूर SS वेरिएंट, जानें अंतर

अगर आप नई बाइक खरीदने की प्लानिंग कर रह हैं, जो बेहतरीन माइलेज दे और दिखने में स्टाइलिश भी हो तो यह खबर आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। दरअसल, Bajaj Auto ने Pulsar N160 S को ₹1.34 लाख में लॉन्च किया है। इसके साथ ही इससे भी अधिक फीचर्स वाली N160 SS को भी 1.43 लाख रुपये में पेश किया है। बता दें कि दोनों ही मॉडल एक बिल्कुल नए 165cc इंजन पर आधारित हैं, जो मौजूदा N160 के एयर-कूल्ड इंजन की जगह लेता है। हालांकि, 160cc सेगमेंट के खरीदारों के लिए यह एक अहम बदलाव है, क्योंकि यह सिर्फ स्पेसिफिकेशन में मामूली सुधार नहीं है।

नया इंजन, राइड मोड्स और ट्रैक्शन कंट्रोल जैसे फीचर्स को उस कीमत पर लाता है जिस पर आमतौर पर ये फीचर्स नहीं मिलते। मौजूदा N160 इन दोनों मॉडलों के साथ उपलब्ध है, इसलिए खरीदारों के पास अब चुनने के लिए तीन अलग-अलग ट्रिम्स हैं। आइए जानते हैं इनमें क्या अंतर है।

इंजन में क्या बदलाव हुए?

नई Pulsar N160 S और N160 SS में सबसे बड़ा बदलाव इसके इंजन में किया गया है। बाइक में अब 4-वॉल्व वाला नया 165cc इंजन दिया गया है, जो 9,500rpm पर 18.24 hp की पावर और 8,000rpm पर 14.4 Nm का टॉर्क जनरेट करता है। जबकि, इसकी तुलना में पुराने N160 में 2-वॉल्व इंजन मिलता था, जो 8,750rpm पर 15.78 hp की पावर और 6,750rpm पर 14.65 Nm का टॉर्क देता था। यानी नया इंजन ज्यादा पावर और हाई-रेव पर बेहतर परफॉर्मेंस देने के लिए तैयार किया गया है, जबकि लो-एंड टॉर्क में थोड़ा बदलाव देखने को मिलता है।

इसके अलावा, इंजन की कूलिंग सिस्टम को भी अपग्रेड किया गया है। पुराने एयर-कूल्ड सिस्टम की जगह अब ऑयल-कूल्ड सिस्टम दिया गया है। वहीं, थ्रॉटल कंट्रोल को मैकेनिकल से बदलकर इलेक्ट्रॉनिक थ्रॉटल-बाय-वायर (ETB) कर दिया गया है। यही नया सिस्टम बाइक में राइडिंग मोड्स, ट्रैक्शन कंट्रोल और क्रॉल फंक्शन जैसे फीचर्स को संभव बनाता है।

कंपनी का दावा है कि नई Pulsar N160 0-60 kmph की रफ्तार 4.5 सेकंड में पकड़ लेता है और बजाज का कहना है कि यह इस सेगमेंट का सबसे तेज और सबसे पावरफुल इंजन है। हालांकि, इस दावे की असली तस्वीर स्वतंत्र रिव्यू और टेस्ट के बाद ही साफ होगी।

S और SS में क्या अंतर है?

दोनों Pulsar मॉडलों में चार राइड मोड मिलते हैं – रेन, स्पोर्ट, रोड और ऑफ-रोड। साथ ही, इनमें क्रॉल टेक्नोलॉजी भी है, जिससे कम स्पीड पर बिना लगातार क्लच या गियर बदले राइडिंग की जा सकती है। हालांकि, ट्रैक्शन कंट्रोल सिर्फ N160 SS में ही उपलब्ध है। SS में 5 इंच का TFT डिस्प्ले मिलता है, जिसमें गूगल मैप्स मिररिंग की सुविधा है, जबकि S में LCD कंसोल और टर्न-बाय-टर्न नेविगेशन दिया गया है।

डिजाइन और आराम के लिहाज से भी दोनों बाइक्स में अंतर है। N160 SS में कलरफुल अलॉय व्हील्स, नया हैंडलबार और बदली हुई सीट हाइट दी गई है, जिससे राइडिंग पोजिशन ज्यादा आरामदायक हो जाती है। ये बदलाव बेस मॉडल N160 S में नहीं मिलते हैं।

बता दें कि दोनों ही मॉडल तीन कलर ऑप्शन Atlantic Blue, Pearl Metallic White और Brooklyn Black में उपलब्ध हैं।

क्या बाकी सब कुछ पहले जैसा ही रहेगा?

चेसिस के डायमेंशन मौजूदा Pulsar N160 जैसे ही रखे गए हैं। इसका व्हीलबेस 1,348mm, ग्राउंड क्लीयरेंस 165mm और कर्ब वेट 151kg ही है। यानी इंजन बदलने के बावजूद बाइक की राइडिंग पोजिशन और हैंडलिंग में बहुत बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलेगा। इसके अलावा, पूरी Pulsar N160 रेंज में 14 लीटर का फ्यूल टैंक पहले की तरह ही दिया गया है।

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2026 Mahindra Scorpio-N: Mahindra & Mahindra ने भारत में 2026 Mahindra Scorpio-N को कई नए फीचर्स के साथ लॉन्च कर दिया है। कंपनी ने इस बार SUV को पहले से ज्यादा प्रीमियम, आरामदायक और टेक्नोलॉजी से लैस बनाने की कोशिश की है। नई Scorpio-N में कई नए कम्फर्ट, कन्वीनियंस और सेफ्टी फीचर्स जोड़े गए हैं। जबकि, इसके पेट्रोल और डीजल इंजन में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

Mahindra Scorpio-N की शुरुआती कीमत पेट्रोल वेरिएंट के लिए ₹13.69 लाख (एक्स-शोरूम) है और टॉप-एंड डीजल ऑटोमैटिक 4WD वर्जन (जिसमें लेवल 2 ADAS है) के लिए यह ₹25.49 लाख (एक्स-शोरूम) तक जाती है।

बता दें कि 2022 में लॉन्च होने के बाद से अब तक Mahindra Scorpio-N की 3.8 लाख से ज्यादा यूनिट्स बिक चुकी हैं। वहीं, कंपनी समय-समय पर नए वेरिएंट और फीचर अपडेट्स के जरिए इस SUV को बेहतर बनाती रही है। ताजा अपडेट के साथ Scorpio-N अपने सेगमेंट में पहले से भी ज्यादा मजबूत दावेदार बनकर सामने आई है।

नई Scorpio-N में पैनोरमिक सनरूफ और 540-डिग्री कैमरा मिलेगा

नई Scorpio-N की सबसे बड़ी खासियतें हैं पैनोरमिक सनरूफ और ब्लाइंड व्यू मॉनिटर के साथ 540-डिग्री सराउंड व्यू सिस्टम। ये फीचर्स इस SUV में पहली बार दिए जा रहे हैं और इनसे केबिन का अनुभव और पार्किंग की सुविधा, दोनों ही बेहतर होने की उम्मीद है।

Mahindra ने नए डिजाइन वाले 18-इंच डायमंड-कट अलॉय व्हील्स भी पेश किए हैं। इसके अलावा, Scorpio-N में वही जानी-पहचानी सीधी (अपराइट) स्टाइलिंग, बोल्ड फ्रंट ग्रिल, LED प्रोजेक्टर हेडलैम्प्स, C-शेप के LED डे-टाइम रनिंग लैम्प्स, सीक्वेंशियल टर्न इंडिकेटर्स और मस्कुलर लुक को बरकरार रखा गया है।

यानी इस बार Mahindra ने Scorpio-N के बाहरी लुक में बदलाव करने के बजाय नई टेक्नोलॉजी, आधुनिक फीचर्स और बेहतर सुविधा देने पर ज्यादा ध्यान दिया है, ताकि ग्राहकों को पहले से अधिक प्रीमियम अनुभव मिल सके।

बड़ी डिस्प्ले और ज्यादा कनेक्टेड टेक्नोलॉजी

केबिन के अंदर, Mahindra Scorpio-N फेसलिफ्ट में एक नए डिजाइन वाला डैशबोर्ड दिया गया है, जिसमें 31.24 cm की फ्लोटिंग HD टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट सिस्टम है और इसमें छह फिजिकल शॉर्टकट बटन भी हैं। SUV में 26.03 cm का नया HD पूरी तरह से डिजिटल इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर भी मिलता है, जिसमें तीन डिस्प्ले मोड और फुल-स्क्रीन नेविगेशन सपोर्ट है।

नई Scorpio-N का इंफोटेनमेंट सिस्टम Qualcomm 6155 चिपसेट पर चलता है और इसमें वायर्ड और वायरलेस Android Auto व Apple CarPlay दोनों का सपोर्ट मिलता है।

इंफोटेनमेंट सिस्टम क्वालकॉम के 6155 चिपसेट पर चलता है और वायर्ड के साथ-साथ वायरलेस Android Auto और Apple CarPlay को भी सपोर्ट करता है।

Mahindra ने इसमें Adventure Statistics नाम का नया फीचर भी जोड़ा है, जो इंजन परफॉर्मेंस, कंपास, रोल और पिच एंगल, G-फोर्स और अल्टीमीटर जैसी गाड़ी की जानकारी देता है।

इस SUV में पहले की तरह Adrenox कनेक्टेड कार टेक्नोलॉजी मिलती है, जिसमें 70 से ज्यादा कनेक्टेड फीचर्स, Alexa का इन-बिल्ट सपोर्ट और रिमोट व्हीकल फंक्शंस शामिल हैं। इसके अलावा, अपडेटेड मॉडल की फ्रंट रो में एक नया 65W USB Type-C फास्ट चार्जिंग पोर्ट भी दिया गया है, जबकि इसके ऊंचे वेरिएंट्स में सेकंड रो के लिए भी यही चार्जिंग सुविधा मिलती है।

कंफर्ट और सेफ्टी फीचर्स हुए पहले से बेहतर

2026 Mahindra Scorpio-N में वेंटिलेटेड फ्रंट सीट्स, एक्टिव कूलिंग के साथ वायरलेस फोन चार्जर, Sony का 12-स्पीकर ऑडियो सिस्टम, ऑटो होल्ड के साथ इलेक्ट्रॉनिक पार्किंग ब्रेक, फ्रेमलेस ऑटो-डिमिंग इनसाइड रियर-व्यू मिरर, डुअल-जोन क्लाइमेट कंट्रोल, पावर्ड ड्राइवर सीट और ऊंचे वेरिएंट्स में लेदरेट अपहोल्स्ट्री जैसे फीचर्स मिलते रहेंगे।

सेफ्टी फीचर्स की बात करें तो, इसमें ऊंचे ट्रिम्स पर छह एयरबैग, फ्रंट पार्किंग सेंसर, टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम, ड्राइवर की नींद का पता लगाने वाला सिस्टम और टॉप-स्पेक Z8L वेरिएंट पर लेवल 2 ADAS शामिल हैं।

कोई मैकेनिकल बदलाव नहीं

2026 Mahindra Scorpio-N में पहले जैसे ही इंजन ऑप्शन मिलते रहेंगे। खरीदार 2.0-लीटर mStallion टर्बो-पेट्रोल इंजन और 2.2-लीटर mHawk डीजल इंजन में से चुन सकते हैं।

टर्बो-पेट्रोल इंजन 149.14 kW (लगभग 203 hp) की पावर और 380 Nm तक का पीक टॉर्क देता है, जबकि डीजल इंजन 128.6 kW (लगभग 175 hp) की पावर और 400 Nm तक का टॉर्क देता है। दोनों इंजन में छह-स्पीड मैनुअल और छह-स्पीड ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन के ऑप्शन मिलते हैं।

इसके अलावा, डीजल वेरिएंट्स में चुनिंदा मॉडल्स के साथ Mahindra का 4XPLOR फोर-व्हील-ड्राइव (4WD) सिस्टम भी मिलता है, जो खराब और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर बेहतर ड्राइविंग में मदद करता है।

SUV में पहले की तरह Zip, Zap और Zoom ड्राइव मोड्स भी दिए गए हैं। इनकी मदद से ड्राइवर सड़क और ड्राइविंग कंडीशन के अनुसार वाहन की परफॉर्मेंस को आसानी से बदल सकता है।

Mahindra Scorpio-N की कीमत और वैरिएंट्स

Mahindra Scorpio-N, Z2, Z4, Z6, Z8S, Z8, Z8T और Z8L वेरिएंट्स में उपलब्ध है। इसकी कीमतें पेट्रोल Z2 मैनुअल के लिए ₹13.69 लाख (एक्स-शोरूम) से शुरू होती हैं और डीजल Z8L 4WD ऑटोमैटिक के लिए ₹25.49 लाख (एक्स-शोरूम) तक जाती हैं।

खरीदार वेरिएंट के आधार पर पेट्रोल और डीजल इंजन, मैनुअल और ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन, और साथ ही रियर-व्हील-ड्राइव और फोर-व्हील-ड्राइव कॉन्फिगरेशन में से चुन सकते हैं।

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पहाड़, जंगल या सुनसान रास्ता… गूगल मैप्स का यह फीचर हर जगह देगा साथ!

आज के समय में घूमने निकलते ही ज्यादातर लोग सबसे पहले गूगल मैप खोलते है। लेकिन कई लोग इसका इस्तेमाल सिर्फ रास्ता देखने के लिए करते हैं। यदि गूगल मैप की कुछ आसान ट्रिक्स पता हों, तो सफर ज्यादा आसान, सेफ और बिना किसी परेशानी के हो सकता है।

ऑफलाइन मैप रखें (Offline Maps)

आपको किसी ऐसी जगह जाना हैं जहां मोबाइल नेटवर्क कमजोर रहता है, तो निकलने से पहले उस एरिया का ऑफलाइन मैप डाउनलोड कर लें। इससे इंटरनेट बंद होने पर भी रास्ता देखने में परेशानी नहीं होगी। पहाड़ी इलाकों, गांवों या विदेश ट्रिप में यह फीचर काफी काम आता है।

ट्रैफिक पहले देखें (Live Traffic)

घर या होटल से निकलने से पहले Google Maps पर ट्रैफिक जरूर चेक करें। इससे आपको पता चल जाएगा कि रास्ते में कहीं जाम, रोड बंद या कोई और परेशानी तो नहीं है। इससे जरूरत पड़ने पर आप दूसरा रास्ता चुन सकेंगे और टाइम भी बच जाएगा।

जरूरी जगह सेव करें (Save Places)

ट्रिप शुरू करने से पहले होटल, रेस्टोरेंट, पेट्रोल पंप, एटीएम, अस्पताल और घूमने वाली जगहों को Google Maps में सेव कर लें। इससे नेटऑन करने या बार-बार सर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी और जरूरत पड़ने पर जल्दी लोकेशन मिल जाएगी।

लाइव लोकेशन शेयर करें (Share Live Location)

अगर आप अकेले ट्रैवल कर रहे हैं या रात हो जाए, तो अपनी लाइव लोकेशन परिवार या दोस्तों के साथ शेयर करें। इससे उन्हें पता रहेगा कि आप कहां हैं और जब भी जरूरत पड़े तो वे आपकी मदद भी कर सकेंगे। यह फीचर सेफ्टी के हिसाब से काफी उपयोगी है।

आसपास की जगह खोजें (Explore Nearby)

किसी नए शहर में पहुंचने के बाद Google Maps का Explore फीचर जरूर इस्तेमाल करें। इससे आसपास के अच्छे रेस्टोरेंट, कैफे, पेट्रोल पंप, मेडिकल स्टोर, एटीएम और घूमने की जगहें जल्दी मिल जाती हैं। इससे वहां पर आपको किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती।

भीड़ का सही समय देखें (Popular Times)

किसी मंदिर, मॉल, म्यूजियम या मशहूर टूरिस्ट डेस्टिनेशन पर जाने से पहले Google Maps में Popular Times जरूर देख लें। इससे आप जान पाएंगे कि वहां किस समय सबसे ज्यादा भीड़ रहती है। फिर सही टाइम देखकर लंबी लाइन और भीड़ से बच सकते हैं।

पहले ही जगह देख लें (Street View)

अगर किसी जगह पर पहली बार जा रहे हैं, तो Street View फीचर की मदद से वहां की सड़क, होटल का एंट्री गेट, पार्किंग और आसपास का एरिया पहले ही देख सकते हैं। इससे वहां पहुंचने के बाद रास्ता ढूंढने में कम परेशानी होती है और आप सही लोकेशन तक पहुंच जाते हैं।