भारतीय नौसेना का किलर ड्रोन प्लान, वॉरशिप से 1000 किमी दूर से ही दुश्मन का जहाज होगा तबाह! समझिए कैसे करेगा काम

लाल सागर में हाल के दिनों में हुए ड्रोन हमलों के बाद दुनियाभर की नौसेनाएं अपनी बेड़े की सुरक्षा और हमला करने की क्षमताओं की समीक्षा कर रही हैं। इसी बीच भारतीय नौसेना ने भी अपनी युद्धक क्षमताओं को कई गुना बढ़ाने के लिए एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू कर दिया है। नौसेना अपने युद्धपोतों के लिए 1000 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाले शिप-लॉन्च्ड लॉइटरिंग म्यूनिशंस हासिल करने की योजना बना रही है। इस कदम से नौसेना को नौसैनिक चुनौतियों से निपटने और तटीय इलाकों में दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला करने की जबरदस्त क्षमता हासिल हो जाएगी।

न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक रक्षा मंत्रालय ने इन मध्यम दूरी के ड्रोनों की जरूरतों को हरी झंडी दे दी है। आपको बता दें कि 1000 किलोमीटर की विशाल रेंज से भारतीय नौसेना के सर्फेस फ्लीट की परिचालन पहुंच काफी हद तक बढ़ जाएगी। इसके जरिए भारतीय युद्धपोत हिंद महासागर क्षेत्र के रणनीतिक इलाकों में तैनात रहकर परिचालन कर सकेंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि इस क्षमता की बदौलत भारतीय युद्धपोत दुश्मन की तटीय मिसाइलों की पहुंच से काफी बाहर रहते हुए भी दुश्मन के तटीय और जमीनी ठिकानों पर विनाशकारी हमला कर पाएंगे।

हवा में 9 घंटे की स्टेमिना और 200 नॉट्स से अधिक गोता लगाने की रफ्तार

भारतीय नौसेना ऐसे स्वदेशी लॉइटरिंग म्यूनिशन सिस्टम की तलाश में है जो हवा में 9 घंटे तक लगातार मंडरा सकें। लक्ष्य की पहचान होने पर ये ड्रोन 200 नॉट्स से अधिक की रफ्तार से दुश्मन पर सीधे गोता लगाकर हमला कर सकेंगे। इन किलर ड्रोनों में दिन और रात दोनों समय काम करने वाले इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सीकर लगे होंगे ताकि दिन हो या रात दुश्मन की पहचान कर उसे तबाह किया जा सके। नौसेना की शर्त है कि ये हथियार वन मीटर से कम सर्कुलर एरर प्रोबेबल के साथ अचूक और सटीक हमला करने में सक्षम होने चाहिए।

सबसे खास विशेषता यह है कि ये ड्रोन ऐसे कठिन परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से काम करेंगे जहां सैटेलाइट नेविगेशन सिग्नल को जाम कर दिया गया हो, स्पूफ किया गया हो या उनका सिग्नल पूरी तरह बंद कर दिया गया हो।

ऑपरेटर एक साथ नियंत्रित करेगा 10 ड्रोन

रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रणाली को इस तरह से डिजाइन किया जाना जरूरी है कि जहाज पर मौजूद सिर्फ एक ऑपरेटर एक मॉड्यूलर कंट्रोल कंसोल के जरिए एक साथ 10 ड्रोनों को नियंत्रित कर सके। हवा में उड़ रहे इन ड्रोनों का नियंत्रण एक जहाज से दूसरे जहाज या फिर जमीन पर बने स्टेशन के बीच भी आसानी से स्थानांतरित किया जा सकेगा।

मौसम की मार झेलने की क्षमता और 20 साल तक लाइफ

नौसेना ने इन प्रणालियों के लिए बहुत ही कड़े पर्यावरणीय मानक तय किए हैं। वेंडरों को यह साबित करना होगा कि ये ड्रोन बेहद कठिन मौसमी परिस्थितियों में भी काम कर सकते हैं ताकि 50 नॉट्स की तेज हवाओं और 95% की नमी के स्तर के दौरान भी इन्हें लॉन्च किया जा सके। ड्रोन के क्रिटिकल कंपोनेंट की लाइफ पर भी कम से कम 10 सालों की गारंटी होनी चाहिए, जिसे जरूरत पड़ने पर 20 सालों तक बढ़ाया जा सके।

बाय इंडियन कैटिगरी के तहत होगी खरीद, बढ़ेगी स्वदेशी ताकत

रक्षा मंत्रालय इन प्रणालियों को बाय इंडियन-आईडीडीएम (Buy Indian-IDDM – Indigenously Designed, Developed and Manufactured) कैटिगरी के तहत खरीदने की योजना बना रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य इंडिजिनस इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट और देश के अंदर ही मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है।

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गल्फ संकट के दौरान भारत ने होर्मुज से कैसे निकाले अपने 60 जहाज? संसद में सरकार ने बताया पूरा प्लान

संसद में सरकार ने हाल ही में खाड़ी क्षेत्र (गल्फ) में पैदा हुए तनाव के दौरान उठाए गए कदमों की जानकारी दी। सरकार के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते खतरे के बावजूद भारत ने अपने महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार और जरूरी सामान की आवाजाही को जारी रखा। इसके लिए संबंधित एजेंसियों ने लगातार निगरानी रखी और समय पर आवश्यक कदम उठाए, जिससे देश की आपूर्ति व्यवस्था पर बड़ा असर नहीं पड़ा। संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि, खाड़ी क्षेत्र में तनाव के बावजूद भारत का सामान लेकर जा रहे 60 मालवाहक जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) से पूरी तरह सुरक्षित गुजरने में सफल रहे। सरकार ने ये भी बताया कि, खाड़ी क्षेत्र से 3,972 भारतीय नाविकों को सुरक्षित वापस लाया गया।

इसके अलावा 24 घंटे एक्टिव रहे संकट प्रबंधन सिस्टम ने इस दौरान हजारों फोन कॉल और ईमेल का जवाब देकर लोगों की मदद की। सरकार की ओर से शेयर किए गए ये आंकड़े बताते हैं कि खाड़ी क्षेत्र में पैदा हुए संकट के दौरान भारत ने किस तरह हालात से निपटने के लिए बड़े स्तर पर काम किया।

भारत में ज्यादातार तेल खाड़ी देशों से आता है

खाड़ी क्षेत्र में पैदा हुए संकट के दौरान वैश्विक तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही थी। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में शामिल है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से होकर दूसरे देशों तक पहुंचता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, जिसमें इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे खाड़ी देश प्रमुख हैं। ऐसे में अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक कोई रुकावट आती है, तो इसका असर तेल की सप्लाई, माल ढुलाई की लागत और बीमा खर्च पर पड़ सकता है। इससे देश में ईंधन की कीमतों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।

60 मालवाहक जहाज आए वापस

सरकार ने बताया कि तनावपूर्ण हालात के बावजूद भारत की ओर आने वाले 60 मालवाहक जहाज सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचे। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान लोगों की सुरक्षा और सहायता को भी प्राथमिकता दी गई। सरकार ने जानकारी दी कि, खाड़ी क्षेत्र से 3,972 भारतीय नाविकों को सुरक्षित वापस लाया गया। अधिकारियों के अनुसार, संकट के दौरान समुद्री जहाजों पर काम कर रहे भारतीयों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। साथ ही उनके परिवारों से लगातार संपर्क बनाए रखा गया और जरूरत पड़ने पर सहायता व परामर्श की व्यवस्था भी की गई। संकट के दौरान उनकी सुरक्षा के लिए आपातकालीन सहायता व्यवस्था पूरी तरह एक्टिव रखी गई थी।

24 घंटे किया गया काम

सरकार ने बताया कि, पूरे संकट के दौरान 24 घंटे कंट्रोल रूम और डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग का संचार केंद्र लगातार एक्टिव रहा। आपात स्थिति में जहाजों को निर्देश दिए गए थे कि वे तुरंत नजदीकी भारतीय नौसेना या सहयोगी देशों के युद्धपोत से संपर्क करें। साथ ही घटना की जानकारी डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग, इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) और यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) को भी तुरंत दें, ताकि समय रहते जरूरी मदद पहुंचाई जा सके।

सरकार के अनुसार, संकट के दौरान शुरू की गई सहायता व्यवस्था का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। कंट्रोल रूम शुरू होने के बाद वहां नाविकों, उनके परिवारों और समुद्री क्षेत्र से जुड़े अन्य लोगों की बड़ी संख्या में मदद की गई। इस दौरान 15,771 फोन कॉल और 36,499 ईमेल का जवाब दिया गया, जिससे साफ है कि हालात को लेकर लोगों में चिंता थी और लगातार संपर्क बनाए रखना जरूरी था।