श्रेयस अय्यर ने VVS लक्ष्मण की तारीफ कर उड़ा दिया गौतम गंभीर का मजाक

जिम्बाब्वे के खिलाफ बतौर कप्तान अपनी पहली टी-20 अंतरराष्ट्रीय सीरीज जीतकर श्रेयस अय्यर ने दौरे पर गए कोच VVS लक्ष्मण के लिए तारीफ के पुल बांध दिए। इसे कई क्रिकेट फैंस इस नजरिए से देख रहे हैं कि श्रेयस अय्यर यह साबित करना चाहते हैं कि गौतम गंभीर की कोचिंग के कारण टीम को आयरलैंड और फिर इंग्लैंड के खिलाफ 0-2 और 0-4 की शर्मनाक हार झेलनी पड़ी थी।

गौरतलब है कि VVS लक्ष्मण का कोचिंग करियर खासा अच्छा गया है। साल 2022 से टीम के साथ कभी कभार कोचिंग की जिम्मेदारी संभालने वाले वीवीएस लक्ष्मण अब तक बतौर कोच एक भी सीरीज नहीं हारे हैं। भारत के टी20 कप्तान श्रेयस अय्यर और अंतरिम मुख्य कोच वीवीएस लक्ष्मण ने जिम्बाब्वे के खिलाफ 3-0 से मिली जीत में एक-दूसरे की भूमिका की सराहना की।

अय्यर ने लक्ष्मण का आभार व्यक्त किया जिन्हें मुख्य कोच गौतम गंभीर को विश्राम दिए जाने के बाद इस दौरे के लिए अंतरिम कोच नियुक्त किया गया था।अय्यर ने कहा, ‘‘इस श्रृंखला में कुछ कैच छोड़ने के अलावा हमारा प्रदर्शन बेदाग रहा। सहयोगी स्टाफ सहित टीम के हर सदस्य ने अपना योगदान दिया।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमें प्रेरित करने और हमारा हौसला बढ़ाने के लिए वीवीएस सर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। हर दिन जब हम मैदान पर कदम रखते थे, तो मुझे लगता था कि आपने जो कुछ भी कहा वह बिल्कुल सही था और हम उससे जुड़ाव महसूस कर सकते थे। इसलिए आपका बहुत-बहुत आभार।’’

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लक्ष्मण ने कहा, ‘‘मैं श्रेयस को विशेष रूप से बधाई देना चाहता हूं क्योंकि उनके कप्तानी करियर की शुरुआत थोड़ी मुश्किल रही, लेकिन जिस तरह से उन्होंने वापसी की, वह शानदार था। वह पहले मैच से एक दिन पहले जब हमसे जुड़े और तभी से जीत के लिए आश्वस्त थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इस टीम में कई नए खिलाड़ी शामिल थे। हम जानते हैं कि इंग्लैंड में खेलने वाले खिलाड़ियों में से केवल चार या पांच ही इस दौरे पर हमारे साथ शामिल थे। लेकिन वह आत्मविश्वास से भरे हुए थे। जिस तरह से कप्तान ने आप सभी को प्रेरित किया उसे देखते हुए इस जीत का बहुत सारा श्रेय कप्तान को जाता है।’’

बैंक में 100 करोड़ रुपये, सिलिकॉन वैली में करोड़ों की कंपनी… फिर भी गांव में क्यों रह रहा है ये करोड़पति

सफलता को अक्सर पैसा, बड़ा बिजनेस और शानदार जीवनशैली से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन कई बार जिंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं, जहां आर्थिक मजबूती भी परेशानियों को कम नहीं कर पाती। एक उद्यमी द्वारा साझा की गई कहानी ने इसी सोच को सामने रखा है। इसमें एक ऐसे व्यक्ति का जिक्र है, जिसने अपनी मेहनत से विदेश में बड़ी कामयाबी हासिल की, करोड़ों की संपत्ति बनाई और खुद को सफल साबित किया। हालांकि, निजी जिंदगी की चुनौतियों ने उसकी राह बदल दी।

परिवार से जुड़े विवाद, मानसिक तनाव और बदलते हालातों के बीच उसने अपनी जिंदगी को एक नई दिशा देने का फैसला किया। यह कहानी सिर्फ सफलता और असफलता की नहीं, बल्कि मानसिक शांति, रिश्तों और जीवन में संतुलन की अहमियत को भी उजागर करती है।

सिलिकॉन वैली में बनाई अपनी पहचान

विनीथ के अनुसार, उनके कॉलेज साथी ने अपनी मेहनत के दम पर अमेरिका में एक सफल कंपनी बनाई और खुद को डॉलर मिलियनेयर बनाया। करियर में सफलता, आर्थिक मजबूती और एक शानदार भविष्य उसके साथ था। लेकिन कुछ समय बाद जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।

परिवारिक विवादों ने बदली पूरी जिंदगी

विनीथ ने बताया कि उनके साथी को पत्नी, ससुराल पक्ष और परिवार से जुड़े विवादों का सामना करना पड़ा। इसके बाद कानूनी मामलों और मानसिक तनाव ने उनकी जिंदगी को काफी प्रभावित किया। उन्होंने दावा किया कि इन परिस्थितियों के बीच वह डिप्रेशन से भी गुजरे और अपने बच्चे से दूरी ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं। आखिरकार उन्होंने अमेरिका छोड़कर भारत लौटने का फैसला किया।

₹100 करोड़ से ज्यादा संपत्ति, लेकिन जिंदगी गांव में

विनीथ के मुताबिक, आज उनके पूर्व साथी के पास बैंक में ₹100 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है, लेकिन वह अब शहरों की चमक-दमक से दूर एक छोटे गांव में रहते हैं। वह अपना समय आध्यात्मिक गतिविधियों में बिताते हैं और मानसिक शांति, उपचार और जीवन के अनुभवों से जुड़े वीडियो साझा करते हैं।

पैसे से ज्यादा जरूरी है मन की शांति

विनीथ ने इस कहानी के जरिए मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे कई मामले देखे हैं जहां आर्थिक सफलता के बावजूद लोग मानसिक परेशानियों से जूझते हैं। उनका संदेश था कि जिस तरह लोग अपनी संपत्ति की सुरक्षा करते हैं, उसी तरह अपने मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए।

सोशल मीडिया पर लोगों ने साझा किए अपने अनुभव

विनीथ की पोस्ट पर कई यूजर्स ने प्रतिक्रिया दी और माना कि जिंदगी में मानसिक शांति और अच्छे रिश्तों की अहमियत को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। एक यूजर ने लिखा कि अच्छी नींद और मन की शांति को लोग कम आंकते हैं। वहीं, कुछ लोगों ने कहा कि कई बार हालात इंसान के नियंत्रण में नहीं होते और मुश्किल समय का सामना करना ही एकमात्र रास्ता रह जाता है।

दौलत बड़ी है, लेकिन सुकून उससे भी ज्यादा जरूरी

इस कहानी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि असली सफलता सिर्फ पैसा कमाने में है या फिर एक संतुलित और शांत जीवन जीने में। करोड़ों की संपत्ति होने के बावजूद अगर मन अशांत हो, तो जिंदगी की खुशियां अधूरी रह सकती हैं।

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1.25 लाख की डॉक्टर वाली नौकरी छोड़ी, 45 दिनों में कमाए 2 लाख रुपये, डॉ. चारुल सिंह की कहानी हैरान कर देगी

डॉक्टर बनना कई युवाओं का सपना होता है, लेकिन कुछ लोग सफलता की एक तय राह छोड़कर अपनी जिंदगी में नया रास्ता चुनने का साहस दिखाते हैं। डॉ. चारुल सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मेडिकल क्षेत्र में अच्छी पहचान बनाने के बाद उन्होंने अपने करियर को एक अलग दिशा देने का फैसला किया। एक समय अस्पतालों में सेवाएं देने वाली चारुल ने बदलती परिस्थितियों के बीच डिजिटल दुनिया में कदम रखा और यहां भी सफलता हासिल की। उनका सफर सिर्फ करियर बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि चुनौतियों से सीख लेकर आगे बढ़ने, नए अवसर तलाशने और अपने लिए बेहतर संतुलन बनाने की प्रेरणा देता है। पढ़ाई, नौकरी, परिवार और जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने जिस तरह अपने फैसले लिए, वह कई लोगों के लिए सीख बन गया है।

45 दिनों में कमाए पहले ₹2 लाख

डॉ. चारुल ने अपनी डिजिटल यात्रा शुरू करने के सिर्फ 45 दिनों के अंदर ₹2 लाख की कमाई कर ली। हालांकि, उनका यह फैसला सिर्फ पैसे के लिए नहीं था। इसके पीछे कई सालों की पढ़ाई, अस्पताल की लंबी ड्यूटी, मां बनने की जिम्मेदारियां, कानूनी लड़ाई और आर्मी अधिकारी पति के साथ बदलती परिस्थितियों का अनुभव था।

BDS के बाद शुरू हुआ असली संघर्ष

चारुल ने प्राइवेट कॉलेज से बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी (BDS) की पढ़ाई पूरी की थी। उन्हें उम्मीद थी कि मेडिकल क्षेत्र में कदम रखते ही आर्थिक स्थिरता मिल जाएगी, लेकिन नौकरी की शुरुआत में उन्हें हकीकत का सामना करना पड़ा।

उन्होंने बताया कि इतने सालों की पढ़ाई और परिवार के खर्च के मुकाबले शुरुआती नौकरी में मिलने वाली सैलरी काफी कम थी। यही वह समय था जब उन्होंने अपने करियर को लेकर नए सिरे से सोचना शुरू किया।

परिवार और समाज की उम्मीदों के बीच बनाई अपनी राह

परंपरागत परिवार से आने वाली चारुल पर बड़ी बेटी होने की जिम्मेदारियां भी थीं। उम्र बढ़ने के साथ परिवार में करियर से ज्यादा शादी की बातें होने लगी थीं। लेकिन उन्होंने अपने सपनों को पीछे नहीं छोड़ा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जारी रखी।

दिल्ली के बड़े अस्पतालों में हासिल किया अनुभव

चारुल ने दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल और वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज में नॉन-PG जूनियर रेजिडेंट के तौर पर काम किया। इसके बाद उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सेवाएं दीं। कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने NEET-PG परीक्षा पास की और लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से पीडियाट्रिक डेंटिस्ट्री में मास्टर्स किया।

मेहनत का मिला फल, सैलरी पहुंची ₹1.25 लाख तक

अपने मेडिकल करियर में चारुल ने लंबा सफर तय किया। जूनियर रेजिडेंट के तौर पर उनकी शुरुआती सैलरी करीब ₹92 हजार प्रति माह थी। मास्टर्स के दौरान यह लगभग ₹1 लाख तक पहुंच गई और सीनियर रेजिडेंट बनने के बाद उनकी कमाई करीब ₹1.25 लाख प्रति माह हो गई।

शादी, मां बनने और नौकरी के बीच बड़ी चुनौती

मेडिकल करियर आगे बढ़ रहा था, तभी निजी जिंदगी में नई जिम्मेदारियां आईं। चारुल ने एक भारतीय सेना अधिकारी से शादी की। पति की अलग-अलग जगहों पर पोस्टिंग के कारण दोनों को कई शहरों में रहना पड़ा।

मां बनने के दौरान भी उन्होंने अस्पताल की लंबी शिफ्ट पूरी की और नवजात बच्चे की देखभाल के साथ अपनी मेडिकल जिम्मेदारियां निभाईं।

मातृत्व अवकाश के लिए लड़ी कानूनी लड़ाई

सीनियर रेजिडेंसी के दौरान चारुल को बॉन्डेड डॉक्टरों के लिए मैटरनिटी लीव से जुड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस मुद्दे को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कानूनी लड़ाई जीत हासिल की।

इस अनुभव ने उनकी सोच बदल दी। उन्हें एहसास हुआ कि खुद का कुछ बनाना और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना कितना जरूरी है।

मेडिकल करियर से डिजिटल बिजनेस तक का सफर

पति की लगातार आर्मी पोस्टिंग और दूर-दराज इलाकों में रहने की वजह से चारुल के लिए नियमित क्लिनिकल प्रैक्टिस जारी रखना मुश्किल हो गया। इसके बाद उन्होंने करीब छह महीने तक डिजिटल मार्केटिंग और ऑनलाइन बिजनेस को समझा।

जून 2025 में उन्होंने अपना डिजिटल वेंचर शुरू किया, जिसकी शुरुआत पर्सनल ब्रांडिंग और स्टोरीटेलिंग से हुई।

अब डॉक्टर से बनीं डिजिटल मेंटर

धीरे-धीरे क्लाइंट मिलने लगे और उनका ऑनलाइन काम बढ़ता गया। चारुल ने बताया कि डिजिटल बिजनेस से उनकी कमाई अब उनकी पुरानी डॉक्टर वाली सैलरी से भी आगे निकल चुकी है।

आज वह Charul’s Inner Circle के जरिए लोगों, खासकर महिलाओं और शुरुआती स्तर के लोगों को डिजिटल स्किल्स और पर्सनल ब्रांडिंग सिखा रही हैं।

महिलाओं को दिया खास संदेश

डॉ. चारुल का मानना है कि मां बनने के बाद महिलाओं के सपने खत्म नहीं होते, बल्कि उनकी सोच और लक्ष्य बदल सकते हैं। उनका कहना है कि अवसरों का इंतजार करने के बजाय खुद के लिए नए रास्ते बनाने चाहिए। उनकी कहानी दिखाती है कि सही समय पर लिया गया बदलाव जिंदगी की नई शुरुआत बन सकता है।

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CWG 2026: कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में मीराबाई चानू ने रचा इतिहास, जीता गोल्ड मेडल

Mirabai Chanu Commonwealth Games: ग्लासगो कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स 2026 में भारत को पहला गोल्ड मेडल मिल गया है। भारतीय स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने महिलाओं की 48 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन किया। उनके इस दमदार प्रदर्शन की बदौलत भारत को गोल्ड मेडल मिला। मीराबाई चानू ने 48 किलोग्राम वर्ग में कुल 190 किलोग्राम वजन उठाकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसी के साथ उन्होंने भारत को इस सीजन का पहला गोल्ड मेडल भी दिलाया। शुरुआती स्नैच प्रयास में असफल रहने के बाद मीराबाई ने शानदार वापसी की और लगातार दो सफल लिफ्ट लगाते हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के नए रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिए।

मीराबाई चानू ने जीत गोल्ड मेडल

क्लीन एंड जर्क में मीराबाई चानू ने पहली कोशिश में 105 किलोग्राम वजन नहीं उठा सकीं, लेकिन दूसरी कोशिश में उन्होंने सफलतापूर्वक यह वजन उठाया। इस लिफ्ट के साथ उन्होंने एक और कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड बनाया और अपना गोल्ड मेडल भी पक्का कर लिया। मीराबाई चानू ने स्नैच में 85 किलोग्राम और क्लीन एंड जर्क में 105 किलोग्राम वजन उठाकर कुल 190 किलोग्राम के साथ पहला स्थान हासिल किया। उनके शानदार प्रदर्शन से भारत को 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स का पहला स्वर्ण पदक मिला। इस जीत के साथ मीराबाई ने अपने करियर में एक और कॉमनवेल्थ गोल्ड मेडल जोड़ लिया। मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में सोना जीता।

जब मन कहे कुछ गलत है तो रुककर जरूर सोचिए… Zomato के फाउंडर दीपिंदर गोयल ने बताया सफलता का ये मंत्र

दीपिंदर गोयल ज़ोमैटो के फाउंडर हैं। वे रिस्क लेने की क्षमता, एंटरप्रेन्योर वाली सोच और अपनी महत्वाकांक्षा के लिए जाने जाते हैं। उनकी सफलता का सफ़र बहुत दिलचस्प है। गोयल का जन्म पंजाब में हुआ था। मैनेजमेंट कंसल्टेंट के तौर पर काम करने से पहले उन्होंने IIT दिल्ली से कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। वे अपनी कॉर्पोरेट नौकरी कर रहे थे, तभी उन्हें ज़ोमैटो बनाने का आइडिया आया। आखिरकार, ज़ोमैटो बनाने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। उनकी लीडरशिप क्वालिटी और ‘फ़र्स्ट मूवर एडवांटेज’ (सबसे पहले शुरुआत करने का फ़ायदा) का सही इस्तेमाल करने की क्षमता ने ही उन्हें आज एक ऐसा एंटरप्रेन्योर बनाया है जिसे हम आदर्श मानते हैं।

गोयल ने अक्सर लीडरशिप, फैसला लेने और इंस्टिंक्ट (अंतर्ज्ञान) के बारे में प्रैक्टिकल बातें शेयर की हैं। एक बार उन्होंने कहा था, “अपने इंस्टिंक्ट (अंदर की आवाज़) की अहमियत समझें—जब आपको लगे कि कुछ गड़बड़ है, तो उस पर गहराई से सोचें और फ़ैसला लेने में सिर्फ़ डेटा को ही हावी न होने दें।” यह वाकई एक दमदार बात है, आइए समझते हैं कि इसका असल मतलब क्या है।

इस कोट का क्या मतलब है?

आज की कॉर्पोरेट और प्रोफेशनल दुनिया में, हमें सिर्फ़ नंबर, चार्ट और ठोस सबूतों पर भरोसा करना सिखाया जाता है। हम यह भूल जाते हैं कि इंट्यूशन—यानी ‘गट फ़ीलिंग’ (अंदर की आवाज़)—असल में बरसों के सबकॉन्शियस ऑब्ज़र्वेशन (अवचेतन रूप से देखी-परखी बातें), पैटर्न पहचानने और असल ज़िंदगी के अनुभवों का नतीजा होती है। यह कोट हमें याद दिलाता है कि डेटा भले ही काम का हो, लेकिन उसे आपकी अंदर की आवाज़ को पूरी तरह दबाने नहीं देना चाहिए।

इसलिए, अगली बार जब आपको करियर के किसी फ़ैसले, बिज़नेस पार्टनरशिप या ज़िंदगी के किसी बड़े फ़ैसले को लेकर ज़बरदस्त हिचकिचाहट महसूस हो, तो उसे सिर्फ़ इसलिए नज़रअंदाज़ न करें क्योंकि वह कागज़ पर अच्छा लग रहा है। रुकें और सोचें कि आपका इंस्टिंक्ट क्यों चेतावनी दे रहा है। ठोस तथ्यों और इंट्यूशन के बीच तालमेल बिठाने से आप ज़्यादा समझदारी भरे और सही फ़ैसले ले पाते हैं।

आज के समय में यह कितना प्रासंगिक है?

हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जो मेट्रिक्स और एनालिटिक्स से चलती है, जहां लोग अक्सर इंसानी समझ और असल ज़िंदगी की बारीकियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

प्रोफ़ेशनल्स अक्सर “एनालिसिस पैरालिसिस” (बहुत ज़्यादा विश्लेषण के कारण काम न कर पाना) का सामना करते हैं और ज़रूरी फ़ैसले लेने में देरी करते हैं क्योंकि वे और डेटा का इंतज़ार कर रहे होते हैं।

एल्गोरिदम और नंबर इंसानी व्यवहार, टीम कल्चर या अंदरूनी भरोसे को नहीं समझ पाते।

तेज़ी से बदलते करियर और बिज़नेस में, 100% डेटा की पक्की जानकारी का इंतज़ार करने का मतलब हो सकता है कि आप ज़रूरी मौके गँवा दें या छिपे हुए जोखिमों को नज़रअंदाज़ कर दें।

लोग अक्सर खराब नौकरियों, बुरे रिश्तों या नाकाम हो रहे प्रोजेक्ट्स में बने रहते हैं क्योंकि स्प्रेडशीट कहती है कि सब ठीक है, जबकि उनका मन कुछ और ही कहता है।

इस कोट (कथन) से मिलने वाली सीख

अंतर्ज्ञान कोई जादू नहीं है। यह आपके अवचेतन मन द्वारा पुराने अनुभवों को असल समय में प्रोसेस करने की प्रक्रिया है।

डेटा आपको तथ्य देता है, लेकिन अंतर्ज्ञान आपको संदर्भ और भविष्य की समझ देता है।

मेट्रिक्स पर बहुत ज़्यादा निर्भरता आपको उन बारीक जोखिमों के प्रति अंधा बना सकती है जिन्हें आंकड़े नहीं पकड़ पाते।

महान नेता अनिश्चित या अनजान स्थितियों का सामना करते समय अपनी सहज समझ (instincts) पर भरोसा करते हैं।

अपनी मज़बूत अंदरूनी भावना (gut feeling) के खिलाफ़ लिया गया फ़ैसला अक्सर बाद में पछतावे का कारण बनता है।

इस बात को मानने के लिए कुछ टिप्स

जब कोई बड़ा फ़ैसला लेना हो, तो डेटा क्या कहता है उसे लिखें, और फिर आपका मन (अंतर्मन) क्या कह रहा है, उसे भी लिखें।

अगर किसी प्रोजेक्ट या डील के आंकड़े अच्छे होने के बावजूद आपको कुछ गड़बड़ लगे, तो कोई भी पक्का फ़ैसला लेने से पहले रुकें और गहराई से जाँच-पड़ताल करें।

खुद पर भरोसा बढ़ाने के लिए रोज़मर्रा के छोटे-मोटे फ़ैसलों में भी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनने की आदत डालें।

सोचने के लिए कुछ शांत पल निकालकर घबराहट या डर को अपनी असली अंतर्दृष्टि (intuition) से अलग करें।

साफ़ चेतावनी के संकेतों या नैतिक शंकाओं को नज़रअंदाज़ करने के लिए डेटा का बहाना न बनाएँ।

औपचारिक रिपोर्ट और मेट्रिक्स के साथ-साथ अपने निजी अनुभव और व्यावहारिक समझ (street smarts) को भी महत्व दें।

रतन टाटा की ये फेवरेट 5 फेमस किताबें, आपके करियर और कैरेक्टर को बिल्ड करने में कर सकती हैं मदद

लोग रतन टाटा की तारीफ़ उन कंपनियों के लिए करते हैं जिन्हें बनाने में उन्होंने मदद की, लेकिन कहानी बस इतनी ही नहीं है। कई बिज़नेस लीडर्स ने अरबों डॉलर की कंपनियां बनाई हैं। बहुत कम लोगों को ऐसा भरोसा मिला है कि लोग उनके बारे में सच्चे सम्मान के साथ बात करें। ऐसा तिमाही मुनाफ़े की वजह से नहीं होता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोगों को भरोसा होता है कि जब सुर्खियां आपके पक्ष में न हों, तब भी आपके मूल्य अडिग रहते हैं।

अक्सर लोग लीडरशिप को आत्मविश्वास, करिश्मा या मुश्किल फ़ैसले तेज़ी से लेने की क्षमता समझ लेते हैं। ये बातें मायने तो रखती हैं, लेकिन ये पूरी नहीं हैं। जो लीडर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं, वे आमतौर पर काम करने से ज़्यादा समय सीखने में बिताते हैं। वे खूब पढ़ते हैं, अपनी मान्यताओं पर सवाल उठाते हैं और सफल होने के बाद भी नई चीज़ें जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। यह बात बहुत अच्छी लगती है क्योंकि इससे पता चलता है कि लीडरशिप कोई जन्मजात गुण नहीं है, बल्कि एक आदत है।

The Tata Story by Harish Bhat

अगर आप यह समझना चाहते हैं कि रतन टाटा की लीडरशिप आज भी लोगों के दिलों में क्यों बसी हुई है, तो आपको यहीं से शुरुआत करनी चाहिए। हरीश भट सिर्फ़ टाटा ग्रुप की अहम उपलब्धियों के बारे में ही नहीं बताते, बल्कि उन सिद्धांतों का भी ज़िक्र करते हैं जिन्होंने उन्हें आकार दिया। इस किताब से मिलने वाली सबसे बड़ी सीख कोई बिज़नेस एम्पायर खड़ा करने के बारे में नहीं है, बल्कि ऐसी साख बनाने के बारे में है जो तिमाही नतीजों से कहीं ज़्यादा समय तक कायम रहती है। किताब का कहना है कि मूल्य सफलता के साथ जुड़ी कोई अतिरिक्त चीज़ नहीं हैं; बल्कि अक्सर यही वे कारण होते हैं जिनकी वजह से सफलता लंबे समय तक बनी रहती है।

Good to Great by Jim Collins

जिम कॉलिन्स एक ऐसा सवाल पूछते हैं जो सुनने में तो बहुत आसान लगता है, लेकिन असल में गहरा है: कुछ कंपनियां ‘अच्छी’ से ‘बेहतरीन’ कैसे बन जाती हैं, जबकि दूसरी कंपनियां एक ही स्तर पर अटकी रह जाती हैं? इसका जवाब करिश्मा या बड़े जोखिम उठाना नहीं है। इसका जवाब है – अनुशासित सोच, धैर्यपूर्ण नेतृत्व और लंबी अवधि की सोच के साथ काम करने की इच्छा। हालाँकि कुछ उदाहरण अब पुराने हो चुके हैं, लेकिन उनका मुख्य विचार – कि दिखावे या शोर-शराबे से कहीं ज़्यादा असरदार निरंतरता होती है – आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है।

The Psychology of Money by Morgan Housel

लीडरशिप और पैसा, दोनों ही समझदारी की परीक्षा लेते हैं और मॉर्गन हाउसेल ने इस बात को बहुत शानदार ढंग से समझाया है। इन्वेस्टमेंट की रणनीतियाँ सिखाने के बजाय, वे इस बात पर चर्चा करते हैं कि समझदार लोग भी अक्सर पैसे के मामले में गलत फ़ैसले क्यों लेते हैं और सब्र को अक्सर कम अहमियत क्यों दी जाती है। यह किताब आपको एक आसान लेकिन ज़बरदस्त बात सिखाती है: जब दांव बड़ा हो, तो समझदारी से ज़्यादा आपके व्यवहार का महत्व होता है।

Start With Why by Simon Sinek

साइमन सिनेक की मुख्य बात का इतना ज़्यादा ज़िक्र किया जाता है कि यह भूलना आसान है कि असल में यह कितनी असरदार है। उनका मानना ​​सीधा-सा है: लोग सबसे पहले प्रोडक्ट नहीं खरीदते, वे मकसद से जुड़ते हैं। चाहे आप किसी कंपनी को चला रहे हों, कोई ब्रांड बना रहे हों या किसी छोटी टीम को मैनेज कर रहे हों, यह किताब आपको इस बात से आगे सोचने के लिए प्रेरित करती है कि आप क्या करते हैं, और इस बात पर ध्यान देने को कहती है कि वह काम क्यों ज़रूरी है।

Leaders Eat Last by Simon Sinek

साइमन सिनेक की किताबों में से यह किताब सबसे ज़्यादा ज़मीनी हकीकत से जुड़ी हुई लगती है। यह किताब अधिकार या पद का गुणगान करने के बजाय, लीडरशिप को एक ज़िम्मेदारी के तौर पर पेश करती है। सिनेक का कहना है कि बेहतरीन लीडर ऐसा माहौल बनाकर लोगों का भरोसा जीतते हैं जहाँ वे सुरक्षित और अहम महसूस करें, और अपना सबसे अच्छा काम करने के लिए प्रेरित हों। यह किताब हमें सही समय पर याद दिलाती है कि सबसे मज़बूत टीमें डर या ऊँच-नीच से नहीं, बल्कि देखभाल और जवाबदेही से बनती हैं।

संडे प्रोफाइल : जो मैनचिन:अमेरिकी राजनीति में तीसरे विकल्प की खोज में जुटे डेमोक्रेटिक पार्टी के पूर्व सांसद

डेमोक्रेटिक पार्टी के पूर्व सांसद जो मैनचिन उन राजनेताओं में हैं, जिनका अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने में ज्यादा यकीन है। वे अमेरिका की दो ध्रुवीय राजनीति को अलग रास्ते पर ले जाने की नई पहल से सुर्खियों में हैं। राजनीति में कुछ हस्तियां हमेशा मुख्य धारा से अलग हटकर चलने की कोशिश करती हैं। दो बार सांसद रह चुके जो मैनचिन ऐसे ही हैं। वे अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए कुछ नया करते रहते हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी में रहते हुए उन्होंने कई बार पार्टी लाइन का विरोध किया था। उन्होंने मतभेदों के कारण 2024 में पार्टी छोड़ दी। अब वे नए रास्ते पर निकल पड़े हैं। उन्होंने स्वतंत्र लीडरशिप काउंसिल लॉन्च की है। 78 साल के मैनचिन अमेरिकी संसद के एक सदन-कांग्रेस के लिए चुनाव लड़ने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन करेंगे। 23 जुलाई को जब उन्होंंने एक समारोह में काउंसिल के गठन का ऐलान किया तो कैलिफोर्निया के सांसद केविन किली सहित कई उम्मीदवार मौजूद थे। मैनचिन का कहना है, हम एक अन्य पार्टी नहीं बना रहे हैं। हम उन लोगों का साथ देंगे जो किसी पार्टी के नहीं हैं, स्वतंत्र हैं। अमेरिका की दो दलीय राजनीति में तीसरी राजनीतिक ताकत बनाने के प्रयास बहुत कम हुए हैं। इसलिए उनकी पहल अहम है। अपने राजनीतिक करियर में मैनचिन मध्यमार्गी रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ने से पहले उन्होंने 2020-2024 के बीच जलवायु परिवर्तन और अमीरों पर टैक्स सहित कई मुद्दों पर संसद में पार्टी लाइन का विरोध किया था। जो मैनचिन का सफर वेस्ट वर्जीनिया के कोयला खदान क्षेत्र फार्मिंगटन से शुरू हुआ। उनके पिता शहर के मेयर थे। किराना दुकान संचालक उनके दादा जरूरतमंदों की मदद करते थे। उनसे प्रेरित होकर मैनचिन ने भी लोगों का हाल जानना और उनकी सहायता करना शुरू किया। इससे स्थानीय प्रभाव बढ़ता गया। वेस्ट वर्जीनिया यूनिवर्सिटी में छात्रों की एक पार्टी के दौरान उनकी मुलाकात गेल कोनेली से हुई, जो बाद में उनकी पत्नी बनीं। राजनीति में उनकी शुरुआत राज्य विधानसभा से हुई। 2004 में वे वेस्ट वर्जीनिया के गवर्नर बने और 2010 में पहली बार अमेरिकी सीनेट पहुंचे। वे कोयला उद्योग के समर्थक रहे हैं। 2021-22 में सीनेट में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकंस के 50-50 सदस्य होने से जो मैनचिन का वोट निर्णायक बन गया। उनके दबाव में राष्ट्रपति जो बाइडेन को कई विधेयकों में बदलाव करने पड़े। मैनचिन का कहना है कि डेमोक्रेटिक पार्टी में अब उनके जैसे अनुदारवादी नेताओं के लिए जगह नहीं है। वे राजनीतिक ध्रुवीकरण के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। गैलप के अनुसार अधिकांश अमेरिकी दोनों प्रमुख दलों के प्रति अनुकूल राय नहीं रखते, जबकि एक सर्वे में 45% लोगों ने खुद को निर्दलीय बताया। रिपब्लिकन प्रभाव वाले वेस्ट वर्जीनिया से उनका दो बार सीनेट जीतना उल्लेखनीय रहा, हालांकि 2024 में वे चुनाव हार गए थे।

Govinda: गोविंदा की को-स्टार रहीं शगुफ्ता अली ने एक्टर की तारीफ की, बोलीं- आमिर खान से भी ज्यादा ‘परफेक्शनिस्ट’ हैं वो

Govinda: बॉलीवुड एक्टर आमिर खान को इंडस्ट्री का ‘मिस्टर परफेक्शनिस्ट’ माना जाता है। हालांकि, सीनियर एक्ट्रेस शगुफ्ता अली का मानना ​​है कि गोविंदा उनसे भी बड़े परफेक्शनिस्ट हैं। ‘हीरो नंबर 1’ के सेट पर साथ बिताए समय को याद करते हुए उन्होंने बताया कि गोविंदा अक्सर किसी सीन की 25 बार तक रिहर्सल करते थे और तब तक कई रीटेक की ज़िद करते थे जब तक वे शॉट से पूरी तरह संतुष्ट न हो जाएं, भले ही इससे उनके को-स्टार्स थक जाते थे।

सिद्धार्थ कन्नन के साथ बातचीत में शगुफ्ता ने याद किया कि कैसे ‘हीरो नंबर 1’ की शूटिंग एक पेड हॉलिडे जैसी थी। उन्होंने कहा, “चाहे गोविंदा या करिश्मा सेट पर हों या न हों, हम बहुत मज़ा करते थे। यह एक पेड पिकनिक जैसा था। ऊटी में आउटडोर शूट बहुत बढ़िया रहा। हम मिथुन दा के होटल में रुके थे। जब उन्हें पता चला, तो वे हमसे मिलने आए और खुद अपने हाथों से पकाकर हमें सीफ़ूड खिलाया।”

उन्होंने आगे कहा, “गोविंदा यहाँ भी सेट पर देर से आते थे। अगर शिफ्ट सुबह 9 बजे की होती, तो वे दोपहर 1 या 2 बजे आते थे, उससे पहले कभी नहीं। गोविंदा के साथ बस यही एक दिक्कत थी; वरना वे बहुत अच्छे इंसान हैं। मैंने उनके साथ 3-4 फ़िल्में की हैं। वे बहुत अच्छे और मज़ाकिया इंसान हैं। वे 25 बार रिहर्सल करते हैं। गोविंदा आमिर खान से भी ज़्यादा परफेक्शनिस्ट हैं। डेविड सर टेक को ओके कर देते थे, लेकिन फिर भी वे ज़िद करते थे और दूसरों से माफ़ी भी मांगते थे। परफेक्शन के लिए उनकी नज़र इतनी तेज़ थी कि उन्हें इस बात की परवाह नहीं होती थी कि उनके सामने वाला व्यक्ति थका हुआ है या नहीं।”

शगुफ़्ता ने यह भी बताया कि जब भी गोविंदा सेट पर देर से आते थे, तो मशहूर कॉमेडियन कादर खान को गुस्सा आ जाता था। उन्होंने कहा कि बाकी को-स्टार्स भी चिढ़ जाते थे, लेकिन उनके पास हर दिन गोविंदा के आने का घंटों इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा नहीं होता था।

1990 के दशक में गोविंदा का बॉलीवुड पर राज था और वे अपनी ज़बरदस्त कॉमिक टाइमिंग, एनर्जेटिक डांस मूव्स और शानदार एक्टिंग के लिए जाने जाते थे। ‘राजा बाबू’, ‘कुली नंबर 1’, ‘हीरो नंबर 1’, ‘साजन चले ससुराल’, ‘दूल्हे राजा’, ‘बड़े मियां छोटे मियां’, ‘हसीना मान जाएगी’ और ‘पार्टनर’ जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्मों से वे सुपरस्टार बन गए। डायरेक्टर डेविड धवन और करिश्मा कपूर, रवीना टंडन और कादर खान जैसे एक्टर्स के साथ उनका काम बहुत पॉपुलर हुआ।

हालांकि, 2000 के दशक की शुरुआत में उनके करियर में गिरावट आई। भले ही ‘पार्टनर’ (2007) से उन्होंने सफल वापसी की, लेकिन गोविंदा उस रफ़्तार को बनाए नहीं रख पाए। उन्हें आखिरी बार ‘रंगीला राजा’ में देखा गया था, जिसमें उन्होंने डबल रोल निभाया था। हालांकि, यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर फ़्लॉप रही और तब से वे बड़े पर्दे से दूर हैं।

15 महीने में मिलीं 3 प्रमोशन! युवा कर्मचारी ने बताए ऑफिस में सम्मान पाने के 3 सीक्रेट

ऑफिस में पहचान और सम्मान हासिल करना हर कर्मचारी का सपना होता है, लेकिन इसके लिए सिर्फ लंबा अनुभव या बड़ा पद जरूरी नहीं होता। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में कंटेंट क्रिएटर मारीज ने ऐसी ही कुछ छोटी-छोटी आदतों के बारे में बताया है, जो किसी भी प्रोफेशनल की छवि को बेहतर बना सकती हैं। मारीज के अनुसार, सही तरीके से बातचीत करना, जिम्मेदारी को समझना और अपने काम में भरोसा दिखाना ही असली अंतर पैदा करता है।

उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे कुछ व्यवहारिक बदलावों ने उन्हें कम समय में आगे बढ़ने में मदद की। उनका वीडियो युवाओं के बीच तेजी से पसंद किया जा रहा है, क्योंकि इसमें करियर ग्रोथ और ऑफिस में सम्मान पाने से जुड़े आसान लेकिन असरदार टिप्स बताए गए हैं।

मैनेजर के सवाल का जवाब देने से पहले करें ये छोटा सा काम

मारीज के मुताबिक, जब कोई मैनेजर सवाल पूछे तो तुरंत जवाब देने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि जवाब देने से पहले सिर्फ दो सेकंड का छोटा ब्रेक लें। उनके अनुसार, यह छोटा सा ठहराव व्यक्ति को ज्यादा आत्मविश्वासी, शांत और समझदार दिखाता है। बिना सोचे तुरंत बोलने से गलतियां होने की संभावना बढ़ सकती है।

काम मिलने पर तुरंत हांकहने से बचें

उनकी दूसरी सलाह है कि कोई नया काम मिलने पर तुरंत “हां” बोलने के बजाय पहले उसे दोहराकर समझ लें। जैसे- काम क्या है, उसकी डेडलाइन क्या है और आखिर में किस तरह का रिजल्ट चाहिए। इससे मैनेजर को भरोसा होता है कि कर्मचारी ने जिम्मेदारी को सही तरीके से समझ लिया है।

काम पूरा करके गायब न हों, अपनी वैल्यू दिखाएं

मारीज का तीसरा और सबसे अहम सुझाव है कि काम खत्म करने के बाद सिर्फ रिपोर्ट जमा करके चुप न हो जाएं। उन्होंने कहा कि कर्मचारी को यह भी बताना चाहिए कि इस काम से उसने क्या सीखा, कौन-सी नई स्किल हासिल की या आगे इसे और बेहतर कैसे किया जा सकता है। इससे मैनेजर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

सम्मान पद से नहीं, भरोसे से मिलता है

मारीज ने वीडियो के अंत में कहा कि ऑफिस में असली सम्मान उस व्यक्ति को मिलता है जिस पर लोग भरोसा कर सकें। उनका मानना है कि रोजमर्रा के छोटे-छोटे व्यवहार ही किसी कर्मचारी की पहचान बनाते हैं। सोशल मीडिया यूजर्स भी उनकी इन बातों को पसंद कर रहे हैं और कई लोग इन्हें नए कर्मचारियों के लिए उपयोगी सलाह बता रहे हैं।

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Hina Khan-Rubina Dilaik: हमारे समाज में अच्छा नहीं…, आमिर खान की तीसरी शादी पर रुबीना दिलैक-हिना खान ने की बात

Hina Khan-Rubina Dilaik: सुपरस्टार आमिर खान हाल के हफ़्तों में अपनी गर्लफ्रेंड गौरी स्प्रैट के साथ शादी को लेकर चर्चा में रहे हैं। एक्टर की पर्सनल लाइफ़ ‘द पॉइंट ऑफ़ व्यू’ पर रुबीना दिलैक और हिना खान के बीच ज़बरदस्त बहस का विषय बन गई, जहां दोनों एक्ट्रेस ने उनकी तीसरी शादी पर अलग-अलग राय रखी।

जहां हिना का कहना था कि समाज में कई लोग आज भी एक से ज़्यादा शादियों को अच्छी नज़र से नहीं देखते, वहीं रुबीना का मानना ​​था कि किसी सुपरस्टार की पर्सनल लाइफ़ कभी-कभी लोगों की सोच और कई बार उनके प्रोफ़ेशनल सफ़र पर भी असर डालती है।

रुबीना के टॉक शो ‘द पॉइंट ऑफ़ व्यू’ के हालिया एपिसोड में हिना और रुबीना ने आमिर की पर्सनल लाइफ़ पर बात की। अपने-अपने पतियों, रॉकी जायसवाल और अभिनव शुक्ला के साथ मिलकर, इस बात पर चर्चा की कि क्या किसी सुपरस्टार की पर्सनल लाइफ़ का उनकी प्रोफ़ेशनल सफलता पर कोई असर पड़ता है।

चर्चा के दौरान, रॉकी ने आमिर की तीसरी शादी को लेकर हो रही आलोचना का ज़िक्र किया और उनकी राय पूछी। जहां रुबीना का कहना था कि सुपरस्टार की पर्सनल लाइफ़ उनकी फ़िल्मों और करियर पर असर डाल सकती है, वहीं हिना का मानना ​​था कि किसी एक्टर की पर्सनल पसंद का उनकी प्रोफ़ेशनल सफलता पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।

हिना ने सवाल किया, “उस हिसाब से तो आमिर खान की कोई फिल्म ही नहीं चलनी चाहिए थी।”इस पर रुबीना ने तर्क दिया कि आमिर का जीवन कभी किसी बड़े विवाद से घिरा नहीं रहा। इस पर हिना असहमत हुईं और बोलीं, “ये क्या कोई कम विवाद है?” उनका इशारा गौरी स्प्रैट से उनकी तीसरी शादी की ओर था।

अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए हिना ने कहा, “आम आदमी तो यही सोचेगा ना कि क्या यार फिर से शादी कर रहा है? इसे भी छोड़ दिया?”रुबीना ने बीच में टोकते हुए कहा, “हम क्यों फैसला सुना रहे हैं?”

हिना ने बताया कि आमिर खान ने कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दी हैं, इसके बावजूद सार्वजनिक चर्चाएं अक्सर उनकी फिल्मी उपलब्धियों के बजाय उनकी शादियों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। उन्होंने और रॉकी ने यह भी स्पष्ट किया कि वे अभिनेता के निजी जीवन या उनके द्वारा लिए गए फैसलों पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं।

हालांकि, हिना ने समझाया, “मैं उनकी दोबारा शादी करने पर कोई आपत्ति नहीं जता रही… लेकिन हमारे समाज में ये बहुत अच्छा नहीं माना जाता है रुबीना, शादी पर शादी पर शादी।” इस पर रॉकी ने कहा, “शादी छोड़ो, तलाक ही अच्छा नहीं माना जाता है।”हिना ने आमिर की उनकी पूर्व पत्नियों रीना दत्ता और किरण राव के साथ दोस्ती की भी सराहना की।

हिना ने माना कि हालांकि समाज समय के साथ बदल गया है, फिर भी कई समुदाय तलाक और कई शादियों को गलत नजर से देखते हैं। अपने अलग-अलग विचारों के बावजूद, हिना और रुबीना इस निष्कर्ष पर पहुंचीं कि आमिर एक “अच्छे इंसान” हैं और इस बात से सहमत थीं कि तीसरी बार शादी करने के बावजूद लोग उन्हें प्यार और सम्मान देते हैं।

आमिर खान और उनकी पार्टनर गौरी स्प्रैट ने 5 जुलाई को मुंबई में एक निजी समारोह में शादी की। इस जोड़े ने अपने परिवार और करीबी दोस्तों की मौजूदगी में शादी की कसमें खाईं। इस निजी समारोह में लगभग 150 मेहमान शामिल हुए। आमिर के बच्चे, जुनैद खान और इरा खान, और इरा के पति नूपुर शिखरे भी इस समारोह में शामिल हुए।

आमिर और गौरी की कहानी लगभग 25 साल पुरानी है। दोनों पहली बार बेंगलुरु में मिले थे, लेकिन बाद में वे अलग हो गए और उनका संपर्क टूट गया। सालों बाद, 2023 में, आमिर की कज़िन नुज़हत खान ने शहर की एक और यात्रा के दौरान उन्हें फिर से मिलाने में मदद की, जिससे उनकी दोस्ती को एक और मौका मिला। शादी करने से पहले वे दो साल से ज़्यादा समय तक एक-दूसरे को डेट करते रहे।

गौरी स्प्रैट मूल रूप से बेंगलुरु की रहने वाली हैं और उनकी पिछली शादी से एक बेटा है। उन्होंने पहले हेयरकेयर इंडस्ट्री में काम किया है और अब वे मुंबई में आमिर खान प्रोडक्शंस से जुड़ी हुई हैं।