ये मोदी की पुलिस है!

जी हां, ये मोदी और अमित शाह की पुलिस है, जो प्रदर्शनकारियों पर लाठी चलाती है और उसके बाद खुद को विक्टिम बताती है, रोते-कलपते वीडियो बनाती है, अपने परिजनों से अपील करवाती है और अगर उसके ऊपर महिलाओं से बदसलूकी का आरोप लगे तो आरोप लगाने वालों पर एससी, एसटी एक्ट में केस कर देती है। इससे पहले कभी और कहीं की पुलिस ने ऐसा काम नहीं किया होगा। दिल्ली के एक एसीपी स्तर के वरिष्ठ अधिकारी विवेक भगत ने तीन पत्रकारों के ऊपर एससी, एसटी एक्ट में केस दर्ज करा दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों ने उनके लिए जातिसूचक शब्द कहे और उनको अपमानित किया है। गौरतलब है कि डीसीपी विवेक भगत तीन अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के दौरान एक दूसरे विवाद में फंसे थे। एक महिला पत्रकार ने उनके ऊपर आरोप लगाया था कि भगत ने उनके ऊपर यौन हमला किया। महिला पत्रकार ने आरोप लगाया कि भगत ने उनके सीने पर हाथ मारा। इस विवाद के बाद विवेक भगत ने डीसीपी का अतिरिक्त चार्ज लेने से मना कर दिया था।

अब उस घटना के 11 दिन के बाद विवेक भगत ने तीन महिला पत्रकारों के ऊपर एससी, एसटी कानून के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया है। यानी जिन महिला पत्रकारों ने अपने ऊपर यौन हमले का आरोप लगाया उनके ऊपर दिल्ली पुलिस के एसीपी ने एससी, एसटी एक्ट में केस कर दिया है। इस तरह के मामले पहले भारत के दूरदराज के गांवों से आते थे। जहां महिलाओं के यौन उत्पीड़न या एससी, एसटी एक्ट के तहत लोगों को फंसाने या इन कानूनों के दुरुपयोग के मुकदमे होते थे। अब दिल्ली में पुलिस के बड़े अधिकारी पत्रकारों के खिलाफ एससी, एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज करा रहे हैं!

मामला इतना भर नहीं है। जंतर मंतर के प्रोटेस्ट के बाद दिल्ली पुलिस की महिला अधिकारियों का वीडियो बनवाया गया और एक बेहद मार्किक गीत लगा कर उसे जारी किया गया, जिसमें दिल्ली पुलिस को पीड़ित दिखाया जा रहा है। 20 जुलाई के प्रोटेस्ट के बाद भी पुलिस वालों के परिजनों से प्रेस कॉन्फ्रेंस करा कर पुलिस को पीड़ित दिखाया गया था। हालांकि इसकी एक व्याख्या यह भी है कि पुलिस की बर्बरता को जस्टिफाई करने के लिए यह सब हो रहा है।

दिल्ली में ट्रेड फेयर अब 13 से ही शुरू होगा

दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले का आयोजन 1980 से हो रहा है। दिल्ली के प्रगति मैदान में हर साल 14 नवंबर को मेला शुरू होता है और 27 नवंबर तक चलता है। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों के लिए यह सालाना आयोजन एक बड़े आकर्षण वाला आयोजन होता है। युवा बड़ी संख्या में इसमें जाते हैं। पिछले कुछ समय से यह एक बड़े व्यापारिक आयोजन में बदल गया है। देश भर के व्यापारी अपने उत्पादों के प्रचार के लिए इस मेले में पहुंचते हैं। राज्यों के पैवेलियन अलग होते हैं, जहां राज्यों की संस्कृति, धर्म, कला, व्यापार आदि की जानकारी दी जाती है।

इस साल भी मेले का आय़ोजन होगा लेकिन इस साल यह मेला 13 नवंबर से ही शुरू होगा। आयोजन शुरू होने के 46 साल के बाद और केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के 12 साल बाद तारीख बदली गई है। ध्यान रहे 14 नवंबर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन है। हालांकि इस बात का बहुत प्रचार नहीं किया जाता है कि नेहरू के जन्मदिन के मौके पर व्यापार मेला शुरू होता है। फिर भी इसकी तारीख बदल दी गई। नेहरू मेमोरियल एंड म्यूजियम सहित कई चीजों के नाम पहले बदले जा चुके हैं। केंद्र सरकार ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन की तीन योजनाओं से इंदिरा गांधी का नाम हटाया है।

गोवा फॉरवर्ड पार्टी का मोहभंग हो गया!

गोवा में गठबंधन की नई तस्वीर बन रही है। पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने गोवा की राजनीति में हलचल मचा दी थी। उन्होंने गोवा फॉरवर्ड पार्टी के साथ अलायंस बना कर इसका ऐलान कर दिया था। एक बड़े कार्यक्रम में गोवा फॉरवर्ड पार्टी के नेता विजय सरदेसाई केसाथ केजरीवाल ने मीडिया से बात की और ‘गोवा फर्स्ट’ अलांयस का ऐलान किया। गौरतलब है कि पहले गोवा फॉरवर्ड पार्टी यानी जीएफपी कांग्रेस के साथ थी। इस गठबंधन को कांग्रेस के लिए झटका माना गया। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि विजय सरदेसाई का मोहभंग हो रहा है या उनको गोवा की राजनीति की वास्तविकता का अंदाजा हो रहा है।

विजय सरदेसाई ने अब ‘गोवा फर्स्ट’ की बजाय ग्रैंड अलायंस की बात शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि वे चाहते हैं कि इस गठबंधन में कांग्रेस को भी रखा जाए। हालांकि कांग्रेस किसी हाल में आम आदमी पार्टी के साथ तालमेल नहीं करेगी। इसका कारण पंजाब का चुनाव है। अगर कांग्रेस और आप ने तालमेल किया तो पंजाब में कांग्रेस की उम्मीदें पंक्चर होंगी। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल चाहेंगे कि ग्रैंड अलायंस बन जाए। उनको इसका गोवा में तो लाभ होगा ही पंजाब में ज्यादा फायदा हो जाएगा। 2021 में कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में लेफ्ट से तालमेल किया था, जिसका बड़ा नुकसान उसको केरल में उठाना पड़ा था। वैसे ही अगर इस बार कांग्रेस ने गोवा में आप से तालमेल किया तो पंजाब में नुकसान होगा। तभी कांग्रेस नेता विजय सरदेसाई के प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। यह संभव है कि वे केजरीवाल से तालमेल तोड़ें तब कांग्रेस से उनका गठबंधन हो सकता है।

केटीआर ने राहुल की पोल खोली

एक तरफ राहुल गांधी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को अलोकतांत्रिक और मनमानी करने वाला बता रहे हैं तो दूसरी ओर कुछ प्रादेशिक पार्टियां कांग्रेस की सरकारों पर ठीक इसी तरह के आरोप लगा रही हैं। कर्नाटक में भाजपा और जेडीएस ने राज्य सरकार के मनमाने तरीके से काम करने और तानाशाही के आरोप लगाए हैं तो तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति ने भी इसी तरह के आरोप लगाए हैं। इनमें से सबसे बड़ा मामला तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के बेटे केटी रामाराव का है। केटी रामाराव ने तेलंगाना सरकार के ऊपर गंभीर आरोप लगाए हैं और राहुल गांधी पर भी निशाना साधा है। इसे लेकर दो बातें कही जा रही हैं। पहली बात तो यह है कि केटीआर प्रदेश की राजनीति में अपनी पार्टी को मुख्य विपक्ष बनाए रखना चाहते हैं। उनको भाजपा की चिंता है। दूसरी बात यह है कि वे राष्ट्रीय मुद्दों पर राहुल को कठघरे में खड़ा करके भाजपा से नजदीकी बना रहे हैं।

बहरहाल, केटीआर ने राहुल के ऊपर दोहरा रवैया अपनाने के आरोप लगाए हैं। केटीआर ने अपनी एक सोशल मीडिया पोस्ट में राहुल को ‘कावर्ड, बुली एंड अनडेमोक्रेटिक’ कहा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि ‘राहुल की कठपुतली रेवंत एनार्की’ कर रहा है। केसीआर के बेटे केटीआर का कहना है कि राहुल गांधी वोट चोरी के आरोप लगा कर प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन उन्होंने ‘वोट फॉर नोट पेडलर’ को तेलंगाना का मुख्यमंत्री बना कर रखा हुआ है। उनका निशाना रेवंत रेड्डी पर था। केटीआर ने एक घटना का हवाला देते हुए कहा कि उनकी पार्टी के नेता कृशंक माने ने कांग्रेस के अनुमुल्ला परिवार के भ्रष्टाचार पर सवाल किया तो उनको गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि राहुल किसी पर कोई भी आरोप लगाते हैं। केटीआर ने यह भी कहा कि राहुल भारतीय संविधान का मजाक बना रहे हैं।

Top News 16 October : दिल्ली में CJP का तिरंगा मार्च, धारा 163 लागू, चुनाव आयोग का 17 राज्यों के लिए बड़ा आदेश

Top News 16 October : दिल्ली में CJP का तिरंगा मार्च, धारा 163 लागू, चुनाव आयोग का 17 राज्यों के लिए बड़ा आदेश

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Top News 16 October: दिल्ली के कनॉट पैलेस में आज सीजेपी का तिरंगा मार्च, दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने जारी की एडवाइजरी। 17 राज्यों में वोटर लिस्ट का रिवीजन करेगा चुनाव आयोग। यूपी से पंजाब तक बारिश, पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी। अमेरिका के प्राइमरी स्कूल में गोलीबारी। 16 अक्टूबर की बड़ी खबरें : 

 

सेंट्रल पार्क में सीजेपी का तिरंगा मार्च

दिल्ली के कनॉट पैलेस में आज सीजेपी का तिरंगा मार्च। अभिजीत दिपके ने शाम 5 बजे सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज के साथ जुटने की अपील की है। दिल्ली पुलिस ने नहीं दी प्रदर्शन की इजाजत। कनॉट पैलेस में सुरक्षा सख्त। बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए धारा 163 लगाई। ALSO READ: दिल्ली में CJP के तिरंगा मार्च से पहले बड़ा फैसला, 16-17 अक्टूबर को बंद रहेगा कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क

 

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस की एडवाइजरी 

कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में प्रस्तावित CJP प्रदर्शन को लेकर दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने ट्रैफिक एडवाइजरी जारी की है। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे अपनी यात्रा की योजना पहले से बना लें और सफर के लिए अतिरिक्त समय लेकर चलें। इसके अलावा पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है।

 

17 राज्यों में वोटर लिस्ट का रिवीजन करेगा चुनाव आयोग

वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच चुनाव आयोग ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण का आदेश दिया है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने, छूटे हुए नाम शामिल करने और सूची को अपडेट करने का काम किया जाएगा।

 

यूपी से पंजाब तक बारिश, पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी

यूपी, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा समेत उत्तर-पश्चिम भारत के कई राज्यों में बारिश और ओलावृष्‍टि से फसलों को भारी नुकसान पहुंचा। मंडियों में खुले में रखी धान, बाजरा व मक्के की पैदावार भीगी। धान, कपास व गन्ने की फसलों को भी नुकसान। जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी।

 

अमेरिका के स्कूल में गोलीबारी

अमेरिका के ओरेगन में सिल्वर रेल एलीमेंट्री स्कूल में गोलीबारी से हड़कंप मच गया। इस घटना में 3 बच्चों समेत 4 लोगों की मौत हो गई। हमलावर भी मारा गया। स्कूल में लॉकडाउन लागू कर दिया गया है।

एसआईआर घुसपैठियों के लिए नहीं है

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता यहां तक कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन जैसे नेता यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का उद्देश्य घुसपैठियों को देश से बाहर निकालना है। इसी आधार पर उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी का एसआईआर विरोधी प्रदर्शन घुसपैठियों को बचाने के लिए हो रहा है। उनको लग रहा है कि जैसे ही घुसपैठिया शब्द कहेंगे वैसे ही मामला हिंदू और मुस्लिम का हो जाएगा और हिंदू मतदाता राहुल के खिलाफ हमलावर हो जाएंगे। ध्यान रहे घुसपैठियों का मामला भाजपा का पुराना चुनावी एजेंडा रहा है। बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्यों के साथ साथ राजधानी दिल्ली से लेकर हरियाणा और महाराष्ट्र तक भाजपा घुसपैठियों के मुद्दे पर वोट मांगती रही है। हाल में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल के चुनाव में घुसपैठियों का मुद्दा बहुत बड़ा था। लेकिन क्या भाजपा एसआईआर को घुसपैठियों से जोड़ कर राहुल गांधी और विपक्ष के आंदोलन की साख खराब कर पाएगी?

यह मुश्किल लग रहा है क्योंकि एसआईआर की प्रक्रिया को घुसपैठियों की पहचान करने वाला अभियान साबित करना ही मुश्किल होगा। अगर एसआईआर का मकसद घुसपैठियों की पहचान करके उनको निकालने का है तो सरकार और चुनाव आयोग क्यों नहीं बता रहे हैं कि अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई एसआईआऱ में कितने घुसपैठियों की पहचान हुई है, कितने पकड़े गए हैं और कितने लोगों को बाहर निकाला गया है? पिछले साल जून में जब बिहार से एसआईआर का अभियान शुरू हुआ तभी इससे जुड़े कई मामले सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे थे और सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया था कि नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। ऐसे ही घुसपैठियों की पहचान करना और उन्हें बाहर निकालने का न तो अधिकार चुनाव आयोग के पास है और न उसके पास इसके लिए जरूरी साधन हैं।

तभी यह सवाल उठा था कि अगर चुनाव आयोग को एसआईआर के दौरान किसी मतदाता की नागरिकता पर संदेह होता है तो वह क्या करेगा? उस समय अदालत ने कहा था कि चुनाव आयोग ऐसे मामले केंद्रीय गृह मंत्रालय के संज्ञान में ले लाएगा। क्या चुनाव आयोग बता सकता है कि उसने 13 करोड़ से ज्यादा जो नाम काटे हैं उनमें से कितने लोगों की नागरिकता पर संदेह हुआ और उसने कितने मामले गृह मंत्रालय को कार्रवाई के लिए भेजे? अगर गोपनीय तरीके से कुछ मामले गृह मंत्रालय की संज्ञान में लाए गए हों तो अलग मामला है। लेकिन सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी मामले की खबर नहीं है। इसका मतलब है कि ज्यादातर राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया का कम से कम एक चरण पूरा हो चुका है अभी तक घुसपैठियों का कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है।

हालांकि सोशल मीडिया में राइटविंग के कुछ अपढ़ और कुपढ़ लोग एक अनुमान लगा रहे हैं कि 13 करोड़ जो नाम कटे हैं उनमें करीब तीन करोड़ ऐसे लोगों के हैं, जो सत्यापन के दौरान अपने पते पर नहीं मिले। गौरतलब है कि 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 2.80 करोड़ लोगों का नाम मृत श्रेणी में कटा है और 6.30 करोड़ के करीब लोगों के लिए कहा गया है कि वे स्थायी रूप से शिफ्ट कर गए हैं। इसके अलावा एक करोड़ से कुछ ज्यादा लोग डुप्लीकेट वोट वाले बताए गए हैं। इस आधार पर कहा जा रहा है कि जो तीन करोड़ लोग सत्यापन के दौरान पते पर नहीं मिले वे ही घुसपैठिया हैं। सोचें, अगर इनके अनुमान को मान लिया जाए तो देश में तीन करोड़ यानी कुल आबादी की दो फीसदी से ज्यादा आबादी घुसपैठियों की है! क्या यह संभव है? अगर ऐसा है तो 12 साल से सरकार चला रहे नरेंद्र मोदी और सात साल से ज्यादा समय से देश का गृह मंत्रालय संभाल रहे अमित शाह क्या जवाब देंगे? वे क्या बताएंगे कि इतने घुसपैठिए कहां से आए? अगर पहले से थे तो 12 साल में उनको निकालने के लिए क्या किया गया? 12 साल में कितने लोग निकाले गए? और अगर सचमुच आज इतने घुसपैठिए हैं तो उनको निकालने के लिए क्या हो रहा है?

असल में यह मामला घुसपैठियों का है ही नहीं। सरकार को यह पता है और सरकार व भाजपा के लोग भी पहले यह दावा नहीं करते थे कि घुसपैठियों को पहचानने या हटाने के लिए एसआईआर हो रही है। पहले यही कहा जाता था कि मतदाता सूची की शुद्धता के लिए ऐसा किया जा रहा है। भाजपा के प्रवक्ता मीडिया में सवाल पूछते थे कि क्या मर चुके लोगों का नाम मतदाता सूची में होना चाहिए या क्या एक व्यक्ति का नाम दो जगह मतदाता सूची में होना चाहिए? अब ये सवाल बदल गए हैं। जब से राहुल गांधी और विपक्ष की पार्टियों ने एसआईआर के खिलाफ आंदोलन तेज किया है और कॉकरोच जनता पार्टी ने पेपर लीक सहित दूसरे अन्य मामलों में जनता खास कर युवाओं की नाराजगी को वोट चोरी के मामले से जोड़ा है तब से भाजपा ने घुसपैठियों की पहचान का दावा शुरू कर दिया है। भाजपा को लग रहा है कि किसी भावनात्मक या सांप्रदायिक मुद्दे से ही राहुल गांधी के अभियान की साख बिगाड़ी जा सकती है।

याद करें कैसे नोटबंदी के समय इसी तरह से गोलपोस्ट बदला जाता था। जो अभियान काला धन और जाली नोट खत्म करने के नाम पर शुरू हुआ था उसके लिए बाद में कहा गया कि यह आतंकवादियों, नक्सलियों की कमर तोड़ने और देश में डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए हुई थी। वैसे ही मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के अभियान को घुसपैठियों की पहचान के अभियान में बदल दिया गया है। इसका एकमात्र मकसद राहुल गांधी के विरोध प्रदर्शन की साख बिगाड़ना है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन एसआईआर का जो मकसद बता रहे हैं वही मकसद सरकार सुप्रीम कोर्ट में बताती है या नहीं और अगर बताती है तो घुसपैठियों की कोई संख्या बताती है या नहीं?

आंदोलन की जीत के बाद नागरिक हार क्यों जाता है?

उस छात्र की स्थिति सोचिए जिसकी परीक्षा रद्द हुई। उसका भविष्य अधर में है। वह अगली परीक्षा की तैयारी करे या अदालत के फैसले का इंतजार? उसके परिवार ने कोचिंग पर जो पैसा खर्च किया, उसका क्या होगा? एक वर्ष की पढ़ाई, मेहनत और अवसर का हिसाब कौन देगा? कानून कहता है कि दोषी को पांच से दस वर्ष की सजा होगी। मगर दोषी कब पकड़ा जाएगा? मुकदमा कब पूरा होगा? और तब तक छात्र को क्या राहत मिलेगी?

भारत में परीक्षा सुधार का कानून इसी विरोधाभास का एक उदाहरण है। सरकार कानून बनाती है। सजा बढ़ाती है। समयसीमा तय करती है। घोषणा होती है कि अब परीक्षा में धांधली करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। मगर जिस नौजवान की परीक्षा रद्द हुई है, उसके जीवन का एक वर्ष कौन लौटाएगा?

2024 में सार्वजनिक परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बना। यह 21 जून 2024 से लागू हुआ। इसमें दोषियों के लिए तीन से पांच वर्ष तक की कैद का प्रावधान था। मगर मई 2026 में नीट परीक्षा कथित प्रश्नपत्र लीक के बाद रद्द करनी पड़ी। परीक्षा दोबारा आयोजित हुई।

इसके बाद कानून में संशोधन किया गया। 31 जुलाई को मंजूरी मिले संशोधनों में सजा बढ़ाकर पांच से दस वर्ष कर दी गई। जांच पूरी करने के लिए दो महीने की समयसीमा भी तय हुई। मगर पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने एक महत्वपूर्ण कमी बताई। यदि दो महीने में जांच पूरी नहीं होती तो क्या होगा, इसका कानून में कोई अतिरिक्त प्रावधान नहीं है।

यानी समयसीमा है, मगर उसे तोड़ने का परिणाम तय नहीं है।

अब उस छात्र की स्थिति सोचिए जिसकी परीक्षा रद्द हुई। उसका भविष्य अधर में है। वह अगली परीक्षा की तैयारी करे या अदालत के फैसले का इंतजार? उसके परिवार ने कोचिंग पर जो पैसा खर्च किया, उसका क्या होगा? एक वर्ष की पढ़ाई, मेहनत और अवसर का हिसाब कौन देगा?

कानून कहता है कि दोषी को पांच से दस वर्ष की सजा होगी। मगर दोषी कब पकड़ा जाएगा? मुकदमा कब पूरा होगा? और तब तक छात्र को क्या राहत मिलेगी?

इन प्रश्नों का उत्तर सजा बढ़ाने से नहीं मिलता। 28 जुलाई को केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि राधाकृष्णन समिति की 46 प्रमुख सिफारिशों में से 35 लागू की जा चुकी हैं। विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित की जा रही हैं। नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक मामले के लिए एक विशेष अदालत पहले ही निर्धारित हो चुकी थी। मगर 27 जुलाई को उसकी पहली सुनवाई स्थगित करनी पड़ी।

क्यों?

क्योंकि सीबीआई की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। एक तरफ सरकार की घोषणा कि 46 में से 35 सिफारिशें लागू हो चुकी हैं। दूसरी तरफ विशेष अदालत की पहली सुनवाई में ही जांच एजेंसी अनुपस्थित।

यही घोषणा और क्रियान्वयन के बीच का अंतर है।

सरकार कानून बनाकर बता सकती है कि उसने क्या किया। मगर नागरिक जानना चाहता है कि उस कानून से उसके जीवन में क्या बदला। सजा बढ़ाना सरकार का फैसला है। समय पर न्याय दिलाना सरकार की जिम्मेदारी। दोनों को एक समझ लेना ही लोकतांत्रिक जवाबदेही की सबसे बड़ी भूलों में एक है। इस पूरे मामले में समय और सार्वजनिक ध्यान की अपनी राजनीति है।

इस्तीफा एक घटना है। नया कानून एक घटना है। सजा बढ़ाना एक घटना है। ये सब तत्काल दिखाई देते हैं। इनकी तारीख होती है, घोषणा होती है और खबर बनती है।

मगर कानून का लागू होना एक प्रक्रिया है। वह अलग-अलग दफ्तरों, अदालतों, जांच एजेंसियों और अधिकारियों के बीच महीनों तक चलती है।

घटना का श्रेय किसी एक मंत्री या सरकार को मिल सकता है। प्रक्रिया की जिम्मेदारी अनेक अधिकारियों में बंट जाती है। मीडिया के लिए भी घटना आसान है। मंत्री ने इस्तीफा दिया, खबर बन गई। सरकार ने मांग स्वीकार की, खबर बन गई। अदालत ने आदेश दिया, खबर बन गई।

उसके बाद मीडिया दूसरे मुद्दे की ओर बढ़ जाता है। पाठक और दर्शक भी मान लेते हैं कि मामला समाप्त हो गया। जबकि नागरिक के लिए असली काम तब शुरू होता है।

मुआवजे का आदेश हुआ, मगर पैसा कब मिला? मुकदमा दर्ज हुआ, मगर जांच कब पूरी हुई? परीक्षा सुधार की घोषणा हुई, मगर अगली परीक्षा में क्या बदला? मतदाता सूची में सुधार का आश्वासन मिला, मगर मतदान से पहले कितने नाम वापस जुड़े?

इन प्रश्नों पर लगातार निगरानी रखने वाला कौन है? हर नई विफलता को एक नया घोटाला या नया विवाद मान लिया जाता है। उसे पहले किए गए वादे की अधूरी जिम्मेदारी से नहीं जोड़ा जाता। इस तरह सरकार बार-बार जवाब देने का दावा कर सकती है, जबकि उसके पुराने जवाबों का परिणाम सामने नहीं आया होता।

जॉर्ज ऑरवेल ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘पॉलिटिक्स एंड द इंग्लिश लैंग्वेज’ में राजनीतिक भाषा की इसी प्रवृत्ति की आलोचना की थी। उनके अनुसार राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल अक्सर ऐसी चीजों को ठोस और वास्तविक दिखाने के लिए होता है जिनमें वास्तविकता बहुत कम होती है।

ऑरवेल की यह कसौटी आज भी उपयोगी है।

सरकारी घोषणाएं हमेशा झूठी नहीं होतीं। मंत्री और अधिकारी अपने आश्वासनों के प्रति ईमानदार भी हो सकते हैं। मगर ईमानदार आश्वासन भी तब तक नागरिक के लिए उपयोगी नहीं है जब तक उसे जांचा और लागू न कराया जा सके। सीजेपी की मुआवजे की मांग स्वीकार करते समय संबंधित मंत्री ने परिवारों को लागू नियमों के अंतर्गत अधिकतम संभव सहायता देने का वादा किया था। शब्दों पर गौर कीजिए।

अधिकतम। संभव। लागू नियमों के अंतर्गत।

हर शब्द उचित लग सकता है। मगर इन्हें जोड़ने पर भी यह पता नहीं चलता कि किस परिवार को कितनी रकम मिलेगी, किस तारीख तक मिलेगी और किस अधिकारी की जिम्मेदारी होगी। इसी तरह सरकारी भाषा में कुछ शब्द बार-बार आते हैं। प्रक्रिया शुरू हो गई है। योजना लागू है। मामला विचाराधीन है। सिफारिशें स्वीकार कर ली गई हैं। कार्यान्वयन जारी है।

इनका वास्तविक अर्थ क्या है?

नागरिक किस दफ्तर में जाकर जांच कर सकता है कि काम हुआ या नहीं? किस रजिस्टर में जिम्मेदार अधिकारी का नाम दर्ज है? किस समयसीमा को पार करने पर कार्रवाई होगी?

अदालत बना देना पर्याप्त नहीं है। उसमें न्यायाधीश भी होना चाहिए। सुनवाई होनी चाहिए। फैसला होना चाहिए।

कानून में समयसीमा लिख देना पर्याप्त नहीं है। उसे तोड़ने पर परिणाम भी होना चाहिए।

और अधिकार घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। नागरिक को उसका इस्तेमाल करने का व्यावहारिक रास्ता भी मिलना चाहिए।

इसी बिंदु पर फिर जंतर मंतर और कॉकरोच जनता पार्टी की कहानी सामने आती है।

इस पार्टी की शुरुआत एक मजाक से हुई थी। 15 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं की तुलना कॉकरोच से की थी। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी फर्जी डिग्रियों वाले लोगों के संदर्भ में थी।

मगर टिप्पणी ने बेरोजगार युवाओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया पैदा की। अगले दिन पूर्व राजनीतिक रणनीतिकार अभिजीत दीपके ने इसी अपमानजनक शब्द को अपनाकर कॉकरोच जनता पार्टी बना दी।

कुछ ही दिनों में संगठन ने लाखों लोगों के जुड़ने का दावा किया। जिस शब्द से अपमान का बोध हुआ था, वही विरोध की पहचान बन गया। ऑरवेल ने अपने एक अन्य निबंध ‘फनी, बट नॉट वल्गर’ में लिखा था कि हर मजाक एक छोटी क्रांति होता है।

इस अर्थ में कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत दिलचस्प थी। सत्ता और प्रतिष्ठान की भाषा में जो शब्द तिरस्कार का प्रतीक था, युवाओं ने उसी को अपने संगठन का नाम बना लिया।

यह सत्ता के प्रति सम्मान दिखाने की अनिवार्यता को अस्वीकार करने का तरीका था।

ऐसा व्यंग्य लोगों को तेजी से जोड़ सकता है। वह अपमान को सामूहिक प्रतिरोध में बदल सकता है। मगर मजाक और आंदोलन की सीमाएं अलग हैं।

मजाक माचिस की तीली है। वह एक क्षण में अंधेरा दूर कर सकती है। मगर तीली बुझ जाने के बाद रोशनी बनाए रखने के लिए स्थायी व्यवस्था चाहिए।

सीजेपी के सामने भी यही चुनौती है। संगठन ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनाई है। अगस्त से उसकी राष्ट्रीय टीम भी काम कर रही है। अभिजीत दीपके राष्ट्रीय संयोजक हैं।अब तक संगठन की कार्यशैली में कुछ महत्वपूर्ण बातें दिखाई देती हैं।

वह सरकार के वादों की निगरानी करता है। समयसीमा तय करता है। जरूरत पड़ने पर फिर आंदोलन की चेतावनी देता है। सर्वोच्च न्यायालय में मामले उठाता है। 12 अगस्त को संगठन की संरचना और आगे की कार्ययोजना पर विचार करने के लिए स्वयंसेवकों की बैठक बुलाई गई थी। मगर दो स्थानों से बैठक हटानी पड़ी। दीपके ने आरोप लगाया कि इसके पीछे सत्तारूढ़ पार्टी का दबाव था।

यह घटनाक्रम बताता है कि सड़क पर भीड़ जुटा लेना और उस भीड़ को स्थायी संगठन में बदलना अलग-अलग काम हैं। किसी आंदोलन के सामने सफलता के बाद कई रास्ते होते हैं।

वह राजनीतिक पार्टी बनकर चुनाव लड़ सकता है, जैसा नेपाल में आंदोलन की ऊर्जा चुनावी राजनीति में पहुंची।

वह सूचना अधिकार आंदोलन की तरह स्थायी नागरिक अभियान बना सकता है। वह अदालतों, जनसुनवाई और सरकारी फैसलों की लगातार निगरानी करने वाला संगठन बन सकता है। या फिर कुछ दिनों की सुर्खियों और भीड़ के बाद समाप्त हो सकता है।

आखिरी रास्ता सत्ता के लिए सबसे सुविधाजनक है।

समय बीतने के साथ आंदोलनकारी अपने जीवन में लौट जाते हैं। छात्र पढ़ाई में लग जाते हैं। मजदूर काम पर लौट जाते हैं। परिवार अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाते हैं।

सरकार वहीं रहती है। दफ्तर वहीं रहते हैं। फाइलें चलती रहती हैं। और आंदोलन का दबाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

सीजेपी ने अब तक दबाव, निगरानी और न्यायालय का रास्ता चुना है। मगर वह अभी ऐसी स्थायी प्रक्रिया नहीं बना सकी है जिसका उपयोग उससे असंबद्ध कोई भी नागरिक अपने अधिकार के लिए कर सके। सूचना अधिकार आंदोलन की सबसे बड़ी सीख यही है।

केवल समर्थक जुटाना पर्याप्त नहीं है। सबूत संभालने होंगे। मांगों को स्पष्ट करना होगा। कानून के प्रस्तावित प्रावधानों की जांच करनी होगी। सरकारी निर्णयों का लगातार पीछा करना होगा।

और एक प्रश्न का उत्तर भी देना होगा। आंदोलन की ओर से फैसला कौन करेगा? 25 जुलाई को सीजेपी का समझौता उसके संस्थापक और दो प्रवक्ताओं ने किया था। संगठन से लाखों लोगों के जुड़ने का दावा था। मगर उन लाखों लोगों ने अपने प्रतिनिधियों को औपचारिक रूप से नहीं चुना था।

समझौता हुआ और उसी दोपहर आंदोलन समाप्त कर दिया गया। यह अपने आप में कोई आरोप नहीं है। हर आंदोलन में किसी को बातचीत करनी होती है। किसी को सरकार का प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करना होता है। किसी को समझौते पर सहमति देनी होती है।

मगर प्रश्न यह है कि उसे यह अधिकार किसने दिया और उसकी सीमा क्या है?

अगली बार जब सरकार कोई समझौता पेश करेगी तो संगठन की ओर से कौन निर्णय करेगा? किन मांगों पर समझौता किया जा सकता है? किन मांगों पर नहीं? और यदि आंदोलनकारी अपने प्रतिनिधियों के फैसले से असहमत हों तो क्या व्यवस्था होगी?

सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर होना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का प्रमाण नहीं है।

सड़क पर हजारों लोगों का मौजूद होना भी अपने आप में संगठन के नेतृत्व को हर निर्णय का अधिकार नहीं देता।

किसी भीड़ को राजनीतिक समुदाय बनने के लिए असहमति व्यक्त करने का अधिकार और उसका व्यावहारिक तरीका चाहिए।

यही संगठन और भीड़ का अंतर है। इसका एक दूसरा पहलू भी है। आंदोलन में लंबे समय तक कौन रह सकता है? अखिल भारतीय छात्र संघ की अध्यक्ष नेहा बोरा ने जंतर मंतर पर 23 दिन का अनशन किया।

मगर हर छात्र ऐसा नहीं कर सकता।

किसी को परीक्षा देनी है। किसी को नौकरी तलाशनी है। किसी को परिवार चलाना है। किसी की रोज की कमाई बंद हो जाएगी। किसी के घर में उसकी देखभाल पर निर्भर लोग हैं।

इसलिए आंदोलन में लंबे समय तक उपस्थित रहने की क्षमता भी सबकी बराबर नहीं होती।

जो लगातार धरने पर रह सकते हैं, संगठन के निर्णयों में उनका प्रभाव बढ़ सकता है। मगर जो घर लौटने के लिए मजबूर हैं, उनकी जरूरतें और राय भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

लोकतांत्रिक आंदोलन को यह असमानता समझनी होगी।

आंदोलन की असली परीक्षा उसके समझौते से लाभ पाने वाले नागरिक के जीवन में होती है।

मान लीजिए किसी छात्र की परीक्षा रद्द हुई है। उसे यह जानने से क्या राहत मिलेगी कि प्रश्नपत्र लीक करने वालों के खिलाफ मुकदमा चल रहा है और पांच वर्ष बाद उन्हें सजा हो सकती है?

उसकी जरूरत तत्काल है। उसे अगली परीक्षा की तारीख चाहिए। दोबारा परीक्षा देने की फीस और खर्च के बारे में स्पष्ट निर्णय चाहिए। विवादित परिणाम के खिलाफ अपील का अधिकार चाहिए। और ऐसा प्रशासनिक तंत्र चाहिए जो उसके आवेदन पर समय रहते फैसला कर सके।

परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था को ये व्यवस्थाएं सार्वजनिक करनी चाहिए।

मंत्रालय को इनके लिए धन उपलब्ध कराना चाहिए।

परीक्षा रद्द होने की पूरी कीमत छात्र और उसके परिवार पर नहीं डाली जा सकती। इसी तरह प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए केवल महंगी तकनीक खरीद लेना पर्याप्त नहीं है। पहले यह पता चलना चाहिए कि प्रश्नपत्र तक अनधिकृत पहुंच कहां से मिली। निगरानी कहां विफल हुई। किस अधिकारी या ठेकेदार की जिम्मेदारी थी।

प्रश्नपत्रों के हस्तांतरण का रिकॉर्ड होना चाहिए। संवेदनशील सामग्री तक किसकी पहुंच थी, इसका हिसाब होना चाहिए। अनुबंधों में जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। और जांच करने वाली संस्था को संबंधित सबूतों तक पहुंच मिलनी चाहिए।

यह तकनीक से अधिक प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है। संसाधन कहां खर्च किए जाएं, किसे अधिकार मिले और गलती होने पर किसे जवाब देना पड़े, यही असली फैसले हैं।

अब मतदाता का उदाहरण लीजिए। जिस नागरिक का नाम मतदाता सूची से कट गया है, उसके लिए समयसीमा मतदान का दिन है। यदि चुनाव हो जाने के बाद उसका नाम वापस जुड़ता है तो वह अधिकार किस काम का?

उसे यह जानने का अधिकार चाहिए कि नाम क्यों काटा गया। किस आधार पर काटा गया। किस अधिकारी ने निर्णय लिया। उसे व्यक्तिगत रूप से सहायता मिलनी चाहिए। आपत्ति दर्ज कराने की सुलभ व्यवस्था होनी चाहिए। और विवादित मामलों के निपटारे के लिए पर्याप्त कर्मचारी होने चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि फैसला मतदान से पहले हो। मौजूदा अपील व्यवस्था को इसी कसौटी पर परखना चाहिए। क्या वह चुनाव से पहले गलती सुधार सकती है?

यदि नहीं, तो किसी अतिरिक्त समीक्षा व्यवस्था के लिए कानूनी अधिकार, पर्याप्त धन और फैसलों को लागू कराने की क्षमता सुनिश्चित करनी होगी। क्योंकि मतदान के बाद मिला अनुकूल फैसला नागरिक को उसका खोया हुआ वोट वापस नहीं दिला सकता।

यहां फिर तोकविल की बात याद आती है। उनके अनुसार स्वतंत्र समाज की रक्षा केवल संविधान के शब्द नहीं करते। नागरिकों की आदतें करती हैं। बैठक का विवरण रखना। सरकारी रिकॉर्ड पढ़ना। फैसलों का हिसाब मांगना। एक ही दफ्तर में दूसरी और तीसरी बार जाना। अपने अधिकार के लिए दूसरों के साथ संगठित रहना।

ये काम आकर्षक नहीं हैं। इनमें आंदोलन की उत्तेजना नहीं है। नारे नहीं हैं। मंच नहीं हैं। तत्काल प्रसिद्धि नहीं है। मगर लोकतंत्र की वास्तविक जवाबदेही इन्हीं कामों से बनती है।

भारत जैसे विशाल युवा आबादी वाले लोकतंत्र में खतरा केवल दमन का नहीं है।

एक दूसरा, कहीं अधिक सूक्ष्म खतरा भी है। युवाओं की आवाज बहुत जोर से सुनी जाए, मगर उनके सवालों का जवाब बहुत धीरे दिया जाए। वे यह मान बैठें कि सरकार ने उनकी बात सुन ली, इसलिए उनकी मांग पूरी हो गई।

जबकि सुन लेना और समाधान करना एक ही बात नहीं है। सड़क पर आंदोलन खतरे की घंटी बजा सकता है। मगर जवाबदेही की स्थायी व्यवस्था सड़क पर लगातार भीड़ जुटाकर नहीं चलाई जा सकती। उसके लिए संस्थाओं के भीतर ऐसे नियम और प्रक्रियाएं चाहिए जो बिना आंदोलन के भी काम करें।

राजस्थान की जनसुनवाइयों में मजदूर सरकारी कागज पर दर्ज मजदूरी का हिसाब अपने वास्तविक काम से मिलाते थे। कागज कहता था कि भुगतान हो गया। मजदूर कहता था कि पैसा नहीं मिला।

इस टकराव से एक सिद्धांत निकला था। सरकारी रिकॉर्ड नागरिक की पहुंच में होना चाहिए ताकि वह सरकार के दावे को चुनौती दे सके। आज वही सिद्धांत परीक्षा और मतदाता सूची के मामलों में लागू होना चाहिए।

छात्र परीक्षा का फैसला चुनौती दे सके। उसे कारण बताया जाए। अपील का रास्ता मिले। और फैसला उस समय आए जब उसका भविष्य बचाया जा सकता हो। मतदाता अपना नाम कटने का कारण जान सके। आपत्ति दर्ज करा सके। और चुनाव से पहले गलती सुधरवा सके।

लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है।

नागरिक को केवल अधिकार दिया गया है या उस अधिकार को समय रहते इस्तेमाल करने की शक्ति भी दी गई है? क्योंकि अधिकार का अर्थ केवल सरकार की स्वीकृति नहीं है। अधिकार का अर्थ है कि नागरिक सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए बाध्य कर सके।

और वह भी तब, जब उस जिम्मेदारी का निर्वाह उसके लिए उपयोगी हो। राजस्थान के मजदूरों ने यही रास्ता खोला था। आज के छात्रों और मतदाताओं के सामने भी मूल प्रश्न वही है। क्या वे सरकारी फैसले का कारण जान सकते हैं? क्या वे उस फैसले को चुनौती दे सकते हैं? क्या वे सरकार को उसकी कानूनी जिम्मेदारी याद दिलाकर समय पर राहत हासिल कर सकते हैं?

यदि इसका उत्तर सुनिश्चित नहीं है तो आंदोलन समाप्त हो जाने से कुछ साबित नहीं होता।

जंतर मंतर खाली हो सकता है। प्रदर्शनकारी घर लौट सकते हैं। सरकार घोषणा कर सकती है कि मांगें मान ली गई हैं।

मगर जिस नागरिक की परीक्षा रद्द हुई, जिसकी मजदूरी रुकी है या जिसका वोट कट गया है, उसके लिए आंदोलन की सफलता का फैसला अभी बाकी है। सड़क खाली हो जाने का अर्थ यह नहीं कि काम पूरा हो गया। (समाप्त)

LIVE: दिल्ली में आज CJP का तिरंगा मार्च, पुलिस ने जारी की एडवाइजरी

LIVE: दिल्ली में आज CJP का तिरंगा मार्च, पुलिस ने जारी की एडवाइजरी

abhijit dipke cjp protest

Latest News Today Live Updates in Hindi : दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के तिरंगा मार्च को देखते हुए पुलिस ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी। कनॉट पैलेस में धारा 163 लगाई। पल पल की जानकारी…

-CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर को शाम 5 बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज के साथ जुटने की अपील की है।
-दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी। कनॉट पैलेस में धारा 163 लगाई। पुलिस ने किए सुरक्षा के कड़े इंतजाम। ALSO READ: दिल्ली में CJP के तिरंगा मार्च से पहले बड़ा फैसला, 16-17 अक्टूबर को बंद रहेगा कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क

कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में प्रस्तावित CJP प्रदर्शन को लेकर दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने ट्रैफिक एडवाइजरी जारी की है। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे अपनी यात्रा की योजना पहले से बना लें और सफर के लिए अतिरिक्त समय लेकर चलें। इसके अलावा पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। हालांकि यह डायवर्जन दोपहर 3 बजे से लागू होगा।

आईडीबीआईः नायाब नमूना

आईडीबीआई की कहानी कहीं अधिक गंभीर समस्या का उदाहरण है। आईसीआईसीआई और आईडीबीआई को दीर्घकालिक औद्योगिक एवं ढांचागत विकास के लिए पूंजी उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया था। अब ऐसा कोई बैंक मौजूद नहीं है।

भारत में औद्योगिक विकास के सामने मौजूद पूंजी की समस्या को समझना हो, तो आईडीबीआई बैंक खास उदाहरण बन सकता है। अब इसे कनाडा की फैयरफैक्स कंपनी को बेचा जा रहा है। भारत सरकार ने इसकी 60.7 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडाई कंपनी को देने का फैसला किया है। बेशक इस बिक्री से सरकार को बड़ी रकम हासिल होगी, जिससे वर्तमान वित्तीय संकट का सामना करने में मदद मिलेगी। मगर गौरतलब है कि एक अन्य भारतीय बैंक- सीबीएस में फेयरफैक्स की 40 फीसदी हिस्सेदारी है। भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के मुताबिक एक ही समूह दो बैंकों में इतना बड़ा हिस्सा नहीं रख सकता। लेकिन इसका रास्ता शायद निकाल लिया जाएगा।

खबरों के मुताबिक रिजर्व बैंक फेयरफैक्स को सीबीएस का विलय करने या उसमें अपना हिस्सा बेचने के लिए दो साल का समय दे सकता है। कुछ हलकों से बैंकों के विदेशी स्वामित्व पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसे देश के रणनीतिक हितों के खिलाफ बताया गया है। बिक्री की इजाजत में कुछ प्रक्रियागत खामियों की तरफ भी इशारा किया गया है। ये सभी वाजिब एतराज हैं, लेकिन आईडीबीआई की कहानी उससे भी कहीं अधिक गंभीर समस्या का उदाहरण है। आईसीआईसीआई और आईडीबीआई बैंकों को दीर्घकालिक औद्योगिक एवं ढांचागत विकास के लिए पूंजी उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया था। ऐसी फाइनेंशिंग में जोखिम भी ज्यादा रहता है। इसलिए आम बैंक इससे बचते हैं। इसीलिए “डेवलपमेंट बैंकिंग” सिस्टम का होना जरूरी समझा जाता है। लेकिन उदारीकरण के दौर में आत्म-निर्भर विकास को पिछड़ी धारणा माना जाने लगा।

नतीजतन, 2002 और 2004 में इन दोनों को कॉमर्शियल बैंक बना दिया गया। उसके बाद भारत में कोई डेवलपमेंट बैंक नहीं है। नतीजतन लघु एवं मझौले कारोबारियों के लिए वित्त का टोटा है। ये वो कारोबार हैं, जो शेयर बाजार से पूंजी नहीं उठा सकते। नतीजतन, नए निजी निगमों के उदय का रास्ता बंद है। अब आईडीबीआई का स्वामित्व विदेशी हाथ में दिया जा रहा है। यानी उसे पुराने रूप लाना असंभव हो जाएगा। जिस समय दुनिया में रुझान भूमंडलीकरण से निकल कर आत्म-निर्भरता की ओर लौटने का है, ये फैसला भारत की उलटी दिशा का नायाब नमूना है।

राहुल के मार्च से सुप्रीम कोर्ट नाराज

नई दिल्ली। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करके अदालत को नाराज कर दिया है। अदालत ने राहुल सहित सभी नेताओं को नोटिस जारी किया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी भी की है। विपक्ष के नेताओं की ओर से 12 अक्टूबर को दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए गुरुवार को चीफ जस्टिस ने कहा कि कोई भी कोर्ट को डरा धमकाकर दबाव में नहीं ला सकता। ऐसी कोशिशें बेकार हैं। इन पर कोई ध्यान नहीं देता।

चीफ जस्टिस इतने पर नहीं रूके। उन्होंने आगे कहा, ‘हमें पता कि कोर्ट के बाहर क्या कहा जा रहा है और कोर्ट के अंदर क्या कहा जा रहा है। हम किसी काल्पनिक दुनिया में नहीं जी रहे हैं। हमें हर बात की जानकारी है’। चीफ जस्टिस ने किसी नेता का नाम नहीं लिया लेकिन जब उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक के आचरण पर सवाल करेंगे और उसे सफाई देनी होगी तो उनका इशारा राहुल गांधी की ओर ही था।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर को अदालत परिसर में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के जुटने से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य 14 नेताओं को नोटिस जारी किया है। वहीं, SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ इन नेताओं की याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा। 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के जुटने से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य 14 नेताओं को नोटिस जारी किया है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले विपक्ष के प्रति सद्भाव दिखाया था। जब विपक्ष की ओर से उनसे मिलने का समय मांगा गया तो उन्होंने कई कारण बताते हुए मिलने से इनकार कर दिया था। लेकिन यह कहा था कि अगर विपक्षी नेता याचिका दायर करते हैं तो उस पर जल्दी सुनवाई की जाएगी। लेकिन उस समय उनको आइडिया नहीं था कि उनके इनकार के बाद विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करेंगे और खुद परिसर में आकर याचिका दायर करेंगे। उनके इनकार के बाद विपक्षी नेता कनॉट प्लेस से मार्च करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे और वहां याचिका दायर की थी। हालांकि याचिका में कई कमियां थीं, जिन्हें बाद में दुरुस्त किया गया और उस पर गुरुवार को सुनवाई हुई।