पेट्रोल निर्यात पर टैक्स बढ़ा, डीजल पर भारी कटौती!

सरकार ने पेट्रोल के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स दो रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिया है जबकि डीजल पर शुल्क में 7.50 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई है।

इस संबंध में जारी केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) की अधिसूचना में कहा गया है कि निर्यात वाले पेट्रोल पर आज से 2.50 प्रति लीटर का उत्पाद शुल्क लगेगा जो पूरी तरह विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (एसएईडी) के रूप में होगा। पहले यह 50 पैसे प्रति लीटर था। इस प्रकार इसमें दो रुपये की बढ़ोतरी की गई है।

निर्यात वाले डीजल पर उत्पाद शुल्क 16 रुपये से घटाकर 8.50 रुपये प्रति लीटर किया गया है। यह भी पूरी तरह से एसएईडी के रूप में है। इस प्रकार इसमें 7.50 रुपये की कमी हुई है। वहीं निर्यात वाले विमान ईंधन पर शुल्क 10.50 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर रखा गया है।

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निर्यात वाले पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन पर लगने वाले उत्पाद शुल्क को विंडफॉल टैक्स के नाम से भी जाना जाता है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतों में अचानक आई उछाल में मुनाफाखोरी के लोभ में निर्यात में असामान्य वृद्धि को रोकना है, ताकि घरेलू खपत के लिए पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार, आज से पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन पर विंडफॉल टैक्स की समीक्षा हर पखवाड़े की जाएगी। पहले इनकी नियमित समीक्षा हर महीने होती थी।

सरकार ने पश्चिम एशिया संकट के दौरान 27 मार्च 2026 से विंडफॉल टैक्स दोबारा लगाना शुरू किया था जो अबतक जारी है। उससे पहले दो साल से ज्यादा समय तक तीनों जीवाश्म ईंधनों पर कोई विंडफॉल टैक्स नहीं था।

Pic Credit : UNI

सुप्रीम कोर्ट से CJP को बड़ी राहत, कनॉट प्लेस तिरंगा मार्च पर तुरंत रोक लगाने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट से CJP को बड़ी राहत, कनॉट प्लेस तिरंगा मार्च पर तुरंत रोक लगाने से किया इनकार

supreme court on cjp tiranga march

Supreme Court on CJP Tiranga March:  दिल्ली के कनॉट प्लेस में आयोजित होने वाले ‘तिरंगा मार्च’ और इसके चलते कारोबारियों को होने वाली परेशानियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुनवाई की है। शीर्ष अदालत ने विरोध-प्रदर्शन के खिलाफ तत्काल रोक या कोई कड़ा निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया है, लेकिन साथ ही सीजेपी (CJP) और प्रदर्शनकारियों को नसीहत दी है कि वे समझदारी से काम लें ताकि आम दुकानदारों की आजीविका और व्यापार पर असर न पड़े। ALSO READ: भारत में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास: भाषा आंदोलन से ‘राम मंदिर, किसान और युवा प्रदर्शनों’ तक, जानें कैसे बदला देश का सियासी नक्शा

 

कनॉट प्लेस में सीजेपी की ओर से घोषित ‘लहरा दो तिरंगा मार्च’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। वकील जय अनंत देहादराय ने कारोबारियों को होने वाले नुकसान को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि सीजेपी प्रोटेस्ट के चलते उनके कारोबार को नुकसान हो रहा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सीजेपी को नसीहत देते हुए उम्मीद जताई कि समझदारी से काम लिया जाएगा और लोगों को कोई परेशानी नहीं होगी। उन्होंने कोई निर्देश जारी करने से मना कर दिया।

 

सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने बताया कि इसी तरह का एक मामला दिल्ली हाईकोर्ट में भी विचाराधीन है। उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि सभी लोग समझदारी दिखाएंगे… छोटे दुकानदार इन्हीं दिनों में अपनी आजीविका कमाते हैं। हम समझते हैं कि इससे पूरे परिवारों को कितनी कठिनाई और परेशानी का सामना करना पड़ेगा।

 

बेंच में शामिल जस्टिस बागची ने कहा कि कोई विरोध करना चाहता है, कोई मूंगफली बेचना चाहता है, और कोई कानून-व्यवस्था बनाए रखना चाहता है। ये सभी चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं। अगर कारोबार का नुकसान होता है, तो हम संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करेंगे। जब ऐसी स्थिति आएगी, तब उस पर विचार किया जाएगा। ALSO READ: बांग्लादेश की तर्ज पर ‘सत्ता परिवर्तन’ चाहते हैं विरोधी दल, दिल्ली के हालातों पर भड़के रक्षा मंत्री राजनाथ

 

इस बीच वकील जय अनंत देहादराय ने कहा कि एनडीएमसी ने कल देर रात सेंट्रल पार्क को बंद कर दिया, जिसका मतलब है कि वहां कोई व्यापार नहीं हो पाएगा। इस पर जस्टिस बागची ने कहा, ‘अगर हमें लगता है कि यह कदम अनुचित है, तो इस अदालत के पास पब्लिक लॉ और मुआवजे के कानून के तहत पर्याप्त अधिकार क्षेत्र है। मामले में अगली सुनवाई 26 अक्टूबर को होगी।

 

दिव्यांग युवाओं के लिए CM धामी का बड़ा तोहफा, अब घर बैठे कर सकेंगे सिविल सेवा की फ्री तैयारी

दिव्यांग युवाओं के लिए CM धामी का बड़ा तोहफा, अब घर बैठे कर सकेंगे सिविल सेवा की फ्री तैयारी

uttarakhand CM pushar singh dhami

उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने राज्य के दिव्यांग छात्र-छात्राओं के सशक्तिकरण और उनके भविष्य को संवारने के लिए एक ऐतिहासिक पहल की है। सीएम धामी ने राज्य में दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए मुफ्त सिविल सेवा कोचिंग शुरू करने का ऐलान किया है, जिससे अब घर बैठे ही मेधावी छात्र सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर सकेंगे।

 

सीएम धामी ने एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, हमारी सरकार दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाने और उनके सपनों को नई उड़ान देने के लिए निरंतर प्रयासरत है। इसी दिशा में दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए निःशुल्क सिविल सेवा कोचिंग की शुरुआत एक महत्वपूर्ण पहल है, जो उन्हें समान अवसर प्रदान कर उनके उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त करेगी।

 

मुख्यमंत्री ने पोस्ट के साथ ही एक पोस्टर भी शेयर किया है, जिस पर लिखा है हर वर्ग का उत्थान हमारी पहचान। दिव्यांगजनों के लिए निःशुल्क सिविल सेवा कोचिंग की शुरुआत। पोस्टर में सीएम के साथ ही दिव्यागं छात्र छात्राएं भी दिखाई दे रहे हैं।

योजना के तहत शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले तीन तरह के दिव्यांग छात्र-छात्राओं को घर बैठे सिविल सेवा की तैयारी का प्रशिक्षण दिया जाएगा। छात्र-छात्राओं को किस तरह घर बैठे नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाए, इसके लिए समाज कल्याण विभाग को नोडल बनाया गया है।

नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले की हत्या पर भड़के अमित शाह, बोले- गृह मंत्रालय मांगेगा पंजाब सरकार से जवाब

नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले की हत्या पर भड़के अमित शाह, बोले- गृह मंत्रालय मांगेगा पंजाब सरकार से जवाब

amit shah attacks Punjab government

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पंजाब की कानून-व्यवस्था और आप सरकार की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया है। सोशल मीडिया पर एक तीखे पोस्ट में शाह ने पंजाब में बढ़ते नशे के कारोबार, गैंगस्टरवाद और हाल ही में हुई हत्याओं का जिक्र करते हुए भगवंत मान सरकार को घेरा है। उन्होंने दिरबा और मानसा की घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि पंजाब में जनता की सुरक्षा खतरे में है और गृह मंत्रालय इस मामले पर पंजाब सरकार से जवाब तलब करेगा। ALSO READ: बांग्लादेश की तर्ज पर ‘सत्ता परिवर्तन’ चाहते हैं विरोधी दल, दिल्ली के हालातों पर भड़के रक्षा मंत्री राजनाथ

 

गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, पंजाब आज नशे, गैंगस्टरवाद व संगठित अपराध के बढ़ते खतरे से जूझ रहा है। भगवंत मान सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर पंजाब की जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?

 

उन्होंने कहा कि दिरबा में एक पिता का दबाव में जहर खा लेना और मानसा में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले परविंदर सिंह झोटा की दिनदहाड़े हत्या ने पंजाब की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परविंदर के पिता ने AAP सरकार और उनके विधायक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। गृह मंत्रालय भी इन दोनों घटनाओं पर पंजाब सरकार से जवाब मांगेगा।

 

जनता को प्रचार नहीं, जवाब चाहिए

शाह ने कहा कि पंजाब में नशे का कारोबार फल-फूल रहा है, संगठित अपराध का खतरा बढ़ रहा है और नशे के खिलाफ आवाज उठाने वालों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। भगवंत मान जी, पंजाब की जनता को प्रचार नहीं, जवाब, घोषणाएँ नहीं, परिणाम, नशे के नेटवर्क पर निर्णायक प्रहार और अपराधियों को मिलने वाले किसी भी राजनीतिक संरक्षण की निष्पक्ष जांच चाहिए। ALSO READ: भारत में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास: भाषा आंदोलन से ‘राम मंदिर, किसान और युवा प्रदर्शनों’ तक, जानें कैसे बदला देश का सियासी नक्शा

 

उन्होंने कहा कि मैं आज पंजाब की जनता के सामने अपना संकल्प दोहराता हूं कि पंजाब में हमारी सरकार बनने पर हम नशामुक्त, गैंगस्टरमुक्त और सुरक्षित पंजाब बनाने के लिए पूरी ताकत से काम करेंगे। हमारा लक्ष्य स्पष्ट है – नशे के कारोबार पर प्रहार, युवाओं के भविष्य की रक्षा, अपराधियों पर कठोर कार्रवाई और कानून का ऐसा राज, जिसमें कोई भी नागरिक भय के साये में जीने को मजबूर न हो।

पेट्रोल-डीजल के निर्यात पर सरकार का बड़ा एक्शन, विंडफॉल टैक्स में हुआ बदलाव; चेक करें नई दरें

पेट्रोल-डीजल के निर्यात पर सरकार का बड़ा एक्शन, विंडफॉल टैक्स में हुआ बदलाव; चेक करें नई दरें

windfall tax petrol Diesel

केंद्र सरकार ने पेट्रोल डीजल के निर्यात पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स में बड़ा बदलाव किया है। पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाले पर विंडफॉल कर बढ़ा दिया है। वहीं, डीजल के निर्यात पर लगने वाले कर में कटौती की गई है। एटीएफ के निर्यात पर लगने वाला शुल्क 10.5 रुपये प्रति लीटर पर बरकरार रखा गया है। नई दरें शुक्रवार, 16 अक्तूबर से प्रभावी हो गई हैं।

 

वित्त मंत्रालय ने एक अधिसूचना के माध्यम से इन दरों में बदलाव की जानकारी दी है। डीजल निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) को रोड और इंफ्रास्ट्रक्चर सेस के साथ घटाया गया है। यह अब 16 रुपये प्रति लीटर से कम होकर 8.5 रुपये प्रति लीटर हो गया है। दूसरी ओर, पेट्रोल निर्यात पर शुल्क 0.5 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 2.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।

 

यह टैक्स केवल निर्यात पर लागू है। देश के भीतर बिकने वाले पेट्रोल-डीजल के टैक्स में कोई बदलाव नहीं किया गया है, इसलिए आम जनता की जेब पर इसका सीधा असर नहीं पड़ेगा।

 

क्यों लगाया जाता है विंडफॉल टैक्स?

एनर्जी कंपनियों के सामान्य से अधिक मुनाफे पर विंडफॉल टैक्स लगाया जाता है। पश्चिमी एशिया में चल रहे युद्ध के चलते घरेलू मार्केट में तेल की उपलब्धता बनाए रखने के लिए अप्रैल 2026 सरकार ने डीजल पर 55.5 रुपए और एटीएफ पर 42 रुपए प्रति लीटर विंडफाल टैक्स लगाया था।

यह टैक्स इसलिए लगाया गया था ताकि डीजल और एटीएफ का निर्यात करने वाली कंपनियां घरेलू और विदेशी बाजारों में कीमतों में फर्क से अनुचित फायदा न उठा सके। पेट्रोल डीजल की उपलब्धता और सप्लाय की स्थिति को देखते हुए इसमें बदलाव किया जाता है।

बांग्लादेश की तर्ज पर ‘सत्ता परिवर्तन’ चाहते हैं विरोधी दल, दिल्ली के हालातों पर भड़के रक्षा मंत्री राजनाथ

बांग्लादेश की तर्ज पर 'सत्ता परिवर्तन' चाहते हैं विरोधी दल, दिल्ली के हालातों पर भड़के रक्षा मंत्री राजनाथ

rajnath singh

दिल्ली में हाल ही में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों और विरोध प्रदर्शनों को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष, खासकर कांग्रेस पार्टी पर तीखा हमला बोला है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल देश के युवाओं को रचनात्मक कार्यों में लगाने के बजाय उन्हें अराजकता और राजनीतिक टकराव का मोहरा बना रहे हैं। ALSO READ: भारत में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास: भाषा आंदोलन से ‘राम मंदिर, किसान और युवा प्रदर्शनों’ तक, जानें कैसे बदला देश का सियासी नक्शा

रक्षा मंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि बांग्लादेश की तर्ज पर ‘सत्ता परिवर्तन’ की बात करना यह साबित करता है कि इनका एकमात्र एजेंडा देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करना और आग लगाना है।

 

उन्होंने कहा कि दिल्ली में जो पिछले दिनों जो घटनाक्रम हुए हैं, वो सारे घटनाक्रम कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस और उनके राजनीतिक सहयोगी प्रत्यक्ष रूप से और अपने समर्थक संगठनों के माध्यम से युवाओं की ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों और राष्ट्र निर्माण के विचारों में लगाने  की बजाय राजनीतिक टकराव और अराजकता फैलाने के साधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 

 

राजनाथ ने कहा कि देश के नौजवानों को अराजकता की राजनीति का मोहरा बनाने की कोशिश की जा रही है। ये लोग बांग्लादेश की तर्ज पर ‘सत्ता परिवर्तन’ कराना चाहते हैं और प्रेस कांफ्रेंस में खुलकर कहते हैं कि उसने ‘सत्ता परिवर्तन’ के लिए बांग्लादेश से प्रेरणा ली है और दूसरा डंके की चोट पर सरकार को गिराने की बात करता है। यह स्पष्ट करता है कि इनका एकमात्र एजेंडा लोकतांत्रिक संस्थाओं को ध्वस्त करना और देश में आग लगाना है।

 

उन्होंने कहा कि ‘सत्ता परिवर्तन’ जैसे शब्दों के प्रयोग से स्पष्ट हो जाता है कि उनकी लड़ाई चुनाव सुधार के लिए नहीं, SIR के लिए नहीं, ज्ञानेश कुमार के लिए नहीं है, देश के नौजवानों के उज्जवल भविष्य के लिए नहीं है। बल्कि देश में Anarchy पैदा करके सत्ता हासिल करने की उनकी यह साजिश है। ALSO READ: दिल्ली में CJP के तिरंगा मार्च से पहले बड़ा फैसला, 16-17 अक्टूबर को बंद रहेगा कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क

 

राजनाथ ने कहा कि कांग्रेस के इतिहास के पन्नों को पलटकर देखिए, कई काले अध्याय आपको मिलेंगे। चुनाव आयोग और इस देश की चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाले राहुल गांधी की कांग्रेस ने चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया को अपनी कठपुतली बनाकर रखा था।

जीएसआरटीसी कर्मचारियों के लिए खुशखबरी, CM भूपेंद्र पटेल ने महंगाई भत्ते में किया 2% का इजाफा

जीएसआरटीसी कर्मचारियों के लिए खुशखबरी, CM भूपेंद्र पटेल ने महंगाई भत्ते में किया 2% का इजाफा

Bhupendra Patel

GSRTC Employees DA Hike: गुजरात राज्य सड़क परिवहन निगम (GSRTC) के कर्मचारियों के लिए राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल द्वारा निगम के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) में 2 प्रतिशत की वृद्धि को मंजूरी दी गई है। इस नई बढ़ोतरी के बाद अब कर्मचारियों को 58 प्रतिशत के बजाय 60 प्रतिशत की दर से महंगाई भत्ता दिया जाएगा।

एरियर के भुगतान से कर्मचारियों को मिलेगा वित्तीय लाभ

राज्य सरकार के इस फैसले से गुजरात एसटी निगम के हजारों कर्मचारियों को बड़ी आर्थिक राहत मिलेगी। इससे पहले जून 2026 में महंगाई भत्ता 3 प्रतिशत बढ़ाकर 58 प्रतिशत किया गया था, और अब इसमें 2 प्रतिशत की और बढ़ोतरी की गई है। नियमित महंगाई भत्ते के अलावा कर्मचारियों को बकाए एरियर (Arrears) का भुगतान भी किया जाएगा, जिससे उन्हें अतिरिक्त वित्तीय लाभ मिलेगा।

नियम और पात्रता से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी

गौरतलब है कि महंगाई भत्ते की गणना हमेशा कर्मचारी के मूल वेतन (Basic Pay) पर ही की जाती है, इसमें मकान किराया भत्ता या अन्य भत्ते शामिल नहीं होते हैं। एसटी निगम में शुरुआत में फिक्स वेतन पर जुड़ने वाले कर्मचारियों को इस महंगाई भत्ते का लाभ नहीं मिलता है। यह विशेष लाभ केवल नियमित पे-स्केल (Regular Pay-scale) प्राप्त करने वाले कर्मचारियों के लिए ही मान्य है।

 

भारत में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास: भाषा आंदोलन से ‘राम मंदिर, किसान और युवा प्रदर्शनों’ तक, जानें कैसे बदला देश का सियासी नक्शा

भारत में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास: भाषा आंदोलन से 'राम मंदिर, किसान और युवा प्रदर्शनों' तक, जानें कैसे बदला देश का सियासी नक्शा

History of protests in India

History of protests in India: हाल के दिनों में चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग को लेकर दिल्ली के मध्य भागों (जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस) में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे युवा प्रदर्शनकारियों, छात्र संगठनों और विपक्षी दलों ने जब सड़कों का रुख किया, तो देश को एक बार फिर भारत के समृद्ध और संघर्षशील लोकतांत्रिक आंदोलनों के इतिहास की याद आ गई।

प्रशासन और सत्ता द्वारा अक्सर ऐसे आंदोलनों को “कानून-व्यवस्था का संकट” या “राष्ट्रविरोधी” करार देने की कोशिशें की जाती रही हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि औपनिवेशिक काल से लेकर आज तक जन-आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का ‘लाइफब्लड’ (प्राणतत्व) रहे हैं।

आइए एक नज़र डालते हैं भारत के उन ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शनों पर, जिन्होंने न केवल नीतियां बदलीं, बल्कि सत्ता के समीकरण भी पलट दिए:

दक्षिण भारत का ‘हिंदी विरोधी आंदोलन’ (1965): भाषा और अस्मिता की लड़ाई

संविधान के तहत 26 जनवरी 1965 से केंद्र सरकार के कामकाज में हिंदी को प्राथमिक आधिकारिक भाषा बनाने की योजना थी। तमिलनाडु के लोगों को आशंका थी कि इससे उनके रोजगार और प्रशासनिक अवसरों पर बुरा असर पड़ेगा।

  • नेतृत्व और असर : द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के शीर्ष नेताओं—सी.एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि—के नेतृत्व में तमिलनाडु में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।
  • क्या बदला? तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आश्वासन दिया कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहेंगे, तब तक अंग्रेजी का इस्तेमाल जारी रहेगा। इसका राजनीतिक नतीजा यह हुआ कि 1967 के चुनाव में DMK ने कांग्रेस को तमिलनाडु की सत्ता से उखाड़ फेंका और राज्य की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई।

History of protests in India


जेपी आंदोलन (1970 का दशक): ‘संपूर्ण क्रांति’ और पहली गैर-कांग्रेसी सरकार

1973-74 में गुजरात और बिहार से शुरू हुआ छात्र आंदोलन जब वयोवृद्ध गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण (JP) के हाथों में आया, तो यह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ एक राष्ट्रीय जनाक्रोश बन गया।

  • ऐतिहासिक प्रभाव : जेपी के ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान के जवाब में 25 जून 1975 को देश में आपातकाल (Emergency) लागू कर दिया गया।
  • क्या बदला? 1977 में आपातकाल हटने के बाद पूरा विपक्ष एकजुट हुआ और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई। भारत के इतिहास में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार (जनता पार्टी) बनी।

मंडल आयोग का विरोध और उदारीकरण के खिलाफ आंदोलन (1990 का दशक)

1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (V.P. Singh) ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की।

  • मंडल बनाम कमंडल : इसके विरोध में जहां देश भर में सवर्ण छात्रों ने तीखे विरोध प्रदर्शन किए, वहीं सामाजिक न्याय के समर्थक इसके पक्ष में खड़े हुए। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर रखते हुए आरक्षण को वैध ठहराया, जिसने भारतीय राजनीति में ‘जातिगत समीकरणों’ को केंद्र में ला दिया।
  • आर्थिक सुधारों के खिलाफ हड़ताल (1991) : तत्कालीन पीएम पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा लाए गए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) का ट्रेड यूनियनों और वामपंथियों ने कड़ा विरोध किया। हालांकि, यह आंदोलन नीतिगत सुधारों को रोक नहीं सका और भारत आधुनिक अर्थव्यवस्था की राह पर बढ़ गया।

राम मंदिर आंदोलन (1990 ) आडवाणी की राम रथयात्रा

लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जनसमर्थन जुटाना था। यह यात्रा 10 हजार किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या पहुंचने वाली थी, लेकिन 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया।

  • इस यात्रा से क्या बदला? : इस यात्रा के बाद राम मंदिर आंदोलन ने और तेजी पकड़ी साथ ही आडवाणी की इस यात्रा का भाजपा को चुनावी फायदा मिला। भाजपा के सत्ता में पहुंचने की बड़ी वजह आडवाणी की इस रथयात्रा को भी माना जाता है। हालांकि राम मंदिर आंदोलन का इतिहास काफी पुराना है। 1853 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद परिसर के आसपास पहली बार धार्मिक हिंसा दर्ज की गई थी, जिसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने परिसर के बाहर हिंदुओं को पूजा के लिए चबूतरा (राम चबूतरा) बनाने की अनुमति दी थी।

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अन्ना हजारे का ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन’ (2011): इंडिया अगेंस्ट करप्शन

UPA सरकार के कार्यकाल में बड़े भ्रष्टाचार विवादों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की।

  • जन-आक्रोश और नतीजा : इस आंदोलन से अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण जैसे चेहरे उभरे। दिसंबर 2013 में संसद ने जन लोकपाल कानून पारित किया। बाद में केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी (AAP) का गठन किया और दिल्ली की सत्ता हासिल की।

‘निर्भया’ आंदोलन (2012): महिलाओं की सुरक्षा और सख्त कानूनी सुधार

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए भीषण सामूहिक दुष्कर्म और हत्या कांड के बाद पूरा देश उबल पड़ा। इंडिया गेट से लेकर देश के हर कोने में युवाओं और महिलाओं ने स्वप्रेरित होकर विरोध जताया।

  • क्या बदला? जनता के भारी दबाव में सरकार ने जस्टिस वर्मा समिति का गठन किया। संसद ने क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट 2013 पारित किया, जिसके तहत यौन अपराधों की कानूनी परिभाषाओं को विस्तृत किया गया और कड़ी सजा का प्रावधान किया गया।

CAA, NRC और NPR विरोधी आंदोलन (2019-20)

दिसंबर 2019 में पारित नागरिकता संशोधन कानून (CAA) ने पड़ोसी देशों से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए नागरिकता का रास्ता आसान किया, जिससे इसके संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर देशव्यापी बहस शुरू हुई। NRC और NPR को लेकर भी आंदोलन हुआ।

  • प्रतीक और असर : दिल्ली के शाहीन बाग में हुआ आंदोलन नागरिकता संशोधन कानून (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) का विरोध करने के लिए आयोजित किया गया था।इस दौरान ‘शाहीन बाग’ महिलाओं के नेतृत्व वाले धरने का प्रमुख प्रतीक बना। हालांकि, आंदोलन कानून को निरस्त नहीं करा सका, लेकिन इसके क्रियान्वयन में देरी हुई और सरकार ने मार्च 2024 में इसके नियम अधिसूचित किए।

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किसान आंदोलन (2020-21) : कृषि सुधारों के खिलाफ ऐतिहासिक घेराबंदी

केंद्र सरकार ने 2020 में कृषि बाजारों को उदार बनाने के उद्देश्य से तीन कृषि कानून पारित किए। किसानों को आशंका थी कि इससे सरकारी मंडियों (APMC) और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था कमजोर हो जाएगी।

  • ऐतिहासिक वापसी : संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं (सिंघू, टिकरी, गाजीपुर) पर महीनों तक कड़े मौसम के बावजूद डटे रहे।
  • क्या बदला? लगभग एक वर्ष तक चले इस आंदोलन के बाद नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में जन-दबाव द्वारा सरकार से बड़ी नीतिगत रियायत हासिल करने का सबसे प्रमुख उदाहरण बना।

‘कॉकरोच’ और युवा आंदोलन (2026): परीक्षा धांधली से प्रशासनिक जवाबदेही तक

हालिया दौर में छात्रों और युवाओं का असंतोष एक नए स्वरूप में सामने आया है। बेरोजगारी पर प्रशासनिक बयानों और राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा (NEET/मेडिकल परीक्षाओं) में हुई कथित अनियमितताओं के विरोध में युवाओं ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम का दबाव समूह बनाया।

  • क्या बदला? जुलाई 2026 में व्यापक छात्र प्रदर्शनों के चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ना पड़ा। वर्तमान में यही युवा और विपक्षी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे को लेकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।

भारत का इतिहास गवाह है कि सत्ता किसी भी दल की रही हो, जब-जब नीतियों में आम जनता की उपेक्षा हुई है या लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं, तब-तब सड़कों पर उठे असंतोष के सुरों ने देश की राजनीति को नई दिशा दी है। ये प्रदर्शन साबित करते हैं कि भारतीय लोकतंत्र केवल हर पांच साल में वोट देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जन-विरोध इसका एक जीवित और सशक्त स्तंभ है।

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History of protests in India

History of protests in India: हाल के दिनों में चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग को लेकर दिल्ली के मध्य भागों (जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस) में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे युवा प्रदर्शनकारियों, छात्र संगठनों और विपक्षी दलों ने जब सड़कों का रुख किया, तो देश को एक बार फिर भारत के समृद्ध और संघर्षशील लोकतांत्रिक आंदोलनों के इतिहास की याद आ गई।

प्रशासन और सत्ता द्वारा अक्सर ऐसे आंदोलनों को “कानून-व्यवस्था का संकट” या “राष्ट्रविरोधी” करार देने की कोशिशें की जाती रही हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि औपनिवेशिक काल से लेकर आज तक जन-आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का ‘लाइफब्लड’ (प्राणतत्व) रहे हैं।

आइए एक नज़र डालते हैं भारत के उन ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शनों पर, जिन्होंने न केवल नीतियां बदलीं, बल्कि सत्ता के समीकरण भी पलट दिए:

दक्षिण भारत का ‘हिंदी विरोधी आंदोलन’ (1965): भाषा और अस्मिता की लड़ाई

संविधान के तहत 26 जनवरी 1965 से केंद्र सरकार के कामकाज में हिंदी को प्राथमिक आधिकारिक भाषा बनाने की योजना थी। तमिलनाडु के लोगों को आशंका थी कि इससे उनके रोजगार और प्रशासनिक अवसरों पर बुरा असर पड़ेगा।

  • नेतृत्व और असर : द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के शीर्ष नेताओं—सी.एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि—के नेतृत्व में तमिलनाडु में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।
  • क्या बदला? तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आश्वासन दिया कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहेंगे, तब तक अंग्रेजी का इस्तेमाल जारी रहेगा। इसका राजनीतिक नतीजा यह हुआ कि 1967 के चुनाव में DMK ने कांग्रेस को तमिलनाडु की सत्ता से उखाड़ फेंका और राज्य की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई।

History of protests in India


जेपी आंदोलन (1970 का दशक): ‘संपूर्ण क्रांति’ और पहली गैर-कांग्रेसी सरकार

1973-74 में गुजरात और बिहार से शुरू हुआ छात्र आंदोलन जब वयोवृद्ध गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण (JP) के हाथों में आया, तो यह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ एक राष्ट्रीय जनाक्रोश बन गया।

  • ऐतिहासिक प्रभाव : जेपी के ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान के जवाब में 25 जून 1975 को देश में आपातकाल (Emergency) लागू कर दिया गया।
  • क्या बदला? 1977 में आपातकाल हटने के बाद पूरा विपक्ष एकजुट हुआ और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई। भारत के इतिहास में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार (जनता पार्टी) बनी।

मंडल आयोग का विरोध और उदारीकरण के खिलाफ आंदोलन (1990 का दशक)

1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (V.P. Singh) ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की।

  • मंडल बनाम कमंडल : इसके विरोध में जहां देश भर में सवर्ण छात्रों ने तीखे विरोध प्रदर्शन किए, वहीं सामाजिक न्याय के समर्थक इसके पक्ष में खड़े हुए। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर रखते हुए आरक्षण को वैध ठहराया, जिसने भारतीय राजनीति में ‘जातिगत समीकरणों’ को केंद्र में ला दिया।
  • आर्थिक सुधारों के खिलाफ हड़ताल (1991) : तत्कालीन पीएम पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा लाए गए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) का ट्रेड यूनियनों और वामपंथियों ने कड़ा विरोध किया। हालांकि, यह आंदोलन नीतिगत सुधारों को रोक नहीं सका और भारत आधुनिक अर्थव्यवस्था की राह पर बढ़ गया।

राम मंदिर आंदोलन (1990 ) आडवाणी की राम रथयात्रा

लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जनसमर्थन जुटाना था। यह यात्रा 10 हजार किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या पहुंचने वाली थी, लेकिन 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया।

  • इस यात्रा से क्या बदला? : इस यात्रा के बाद राम मंदिर आंदोलन ने और तेजी पकड़ी साथ ही आडवाणी की इस यात्रा का भाजपा को चुनावी फायदा मिला। भाजपा के सत्ता में पहुंचने की बड़ी वजह आडवाणी की इस रथयात्रा को भी माना जाता है। हालांकि राम मंदिर आंदोलन का इतिहास काफी पुराना है। 1853 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद परिसर के आसपास पहली बार धार्मिक हिंसा दर्ज की गई थी, जिसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने परिसर के बाहर हिंदुओं को पूजा के लिए चबूतरा (राम चबूतरा) बनाने की अनुमति दी थी।

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अन्ना हजारे का ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन’ (2011): इंडिया अगेंस्ट करप्शन

UPA सरकार के कार्यकाल में बड़े भ्रष्टाचार विवादों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की।

  • जन-आक्रोश और नतीजा : इस आंदोलन से अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण जैसे चेहरे उभरे। दिसंबर 2013 में संसद ने जन लोकपाल कानून पारित किया। बाद में केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी (AAP) का गठन किया और दिल्ली की सत्ता हासिल की।

‘निर्भया’ आंदोलन (2012): महिलाओं की सुरक्षा और सख्त कानूनी सुधार

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए भीषण सामूहिक दुष्कर्म और हत्या कांड के बाद पूरा देश उबल पड़ा। इंडिया गेट से लेकर देश के हर कोने में युवाओं और महिलाओं ने स्वप्रेरित होकर विरोध जताया।

  • क्या बदला? जनता के भारी दबाव में सरकार ने जस्टिस वर्मा समिति का गठन किया। संसद ने क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट 2013 पारित किया, जिसके तहत यौन अपराधों की कानूनी परिभाषाओं को विस्तृत किया गया और कड़ी सजा का प्रावधान किया गया।

CAA, NRC और NPR विरोधी आंदोलन (2019-20)

दिसंबर 2019 में पारित नागरिकता संशोधन कानून (CAA) ने पड़ोसी देशों से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए नागरिकता का रास्ता आसान किया, जिससे इसके संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर देशव्यापी बहस शुरू हुई। NRC और NPR को लेकर भी आंदोलन हुआ।

  • प्रतीक और असर : दिल्ली के शाहीन बाग में हुआ आंदोलन नागरिकता संशोधन कानून (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) का विरोध करने के लिए आयोजित किया गया था।इस दौरान ‘शाहीन बाग’ महिलाओं के नेतृत्व वाले धरने का प्रमुख प्रतीक बना। हालांकि, आंदोलन कानून को निरस्त नहीं करा सका, लेकिन इसके क्रियान्वयन में देरी हुई और सरकार ने मार्च 2024 में इसके नियम अधिसूचित किए।

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किसान आंदोलन (2020-21) : कृषि सुधारों के खिलाफ ऐतिहासिक घेराबंदी

केंद्र सरकार ने 2020 में कृषि बाजारों को उदार बनाने के उद्देश्य से तीन कृषि कानून पारित किए। किसानों को आशंका थी कि इससे सरकारी मंडियों (APMC) और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था कमजोर हो जाएगी।

  • ऐतिहासिक वापसी : संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं (सिंघू, टिकरी, गाजीपुर) पर महीनों तक कड़े मौसम के बावजूद डटे रहे।
  • क्या बदला? लगभग एक वर्ष तक चले इस आंदोलन के बाद नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में जन-दबाव द्वारा सरकार से बड़ी नीतिगत रियायत हासिल करने का सबसे प्रमुख उदाहरण बना।

‘कॉकरोच’ और युवा आंदोलन (2026): परीक्षा धांधली से प्रशासनिक जवाबदेही तक

हालिया दौर में छात्रों और युवाओं का असंतोष एक नए स्वरूप में सामने आया है। बेरोजगारी पर प्रशासनिक बयानों और राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा (NEET/मेडिकल परीक्षाओं) में हुई कथित अनियमितताओं के विरोध में युवाओं ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम का दबाव समूह बनाया।

  • क्या बदला? जुलाई 2026 में व्यापक छात्र प्रदर्शनों के चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ना पड़ा। वर्तमान में यही युवा और विपक्षी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे को लेकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।

भारत का इतिहास गवाह है कि सत्ता किसी भी दल की रही हो, जब-जब नीतियों में आम जनता की उपेक्षा हुई है या लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं, तब-तब सड़कों पर उठे असंतोष के सुरों ने देश की राजनीति को नई दिशा दी है। ये प्रदर्शन साबित करते हैं कि भारतीय लोकतंत्र केवल हर पांच साल में वोट देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जन-विरोध इसका एक जीवित और सशक्त स्तंभ है।

सचाई झुठलाने की सरकारी कोशिश

क्या दिल्ली में 10 अक्टूबर को मेट्रो की सेवा नहीं बंद थी? क्या मेडिकल में दाखिले के लिए होने वाली नीट की परीक्षा के पेपर लीक नहीं हुए थे? क्या नेशनल टेस्टिंग एजेंसी जिन परीक्षाओं का आयोजन कराती है उनमें से पिछले नौ साल में किसी परीक्षा के पेपर लीक नहीं हुए हैं? राजधानी दिल्ली में या दूसरे भी किसी शहर में किसी भी नागरिक से ये सवाल पूछेंगे तो उसका जवाब यही होगा कि मेट्रो बंद थी और पेपर लीक हुए हैं। दिल्ली और एनसीआर में रहने वाला हर व्यक्ति निजी अनुभव से जानता है कि मेट्रो की सेवा बंद थी। जहां तक इंटरनेट सेवा की बात है तो उस पर तो एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट गुरुवार, 15 अक्टूबर को ही छपी है, जिसके मुताबिक पूरी दुनिया में इंटरनेट बंद होने के मामले में भारत दूसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर सैनिक तानाशाही वाला देश म्यांमार है। सो, मेट्रो बंद थी और इंटरनेट भी बंद थे।

परंतु दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा है कि मेट्रो सेवा बंद नहीं थी। उसने कहा है कि सिर्फ 45 मेट्रो स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बंद किया गया था। यानी मेट्रो की सेवा सीमित की गई थी। सोचें, कितना आसान है सरकार के लिए यह कह देना! 45 मेट्रो स्टेशनों पर लोग अंदर नहीं जा सकते थे और न बाहर निकल सकते थे। फिर यह सेवा सीमित करना कैसे हुआ? जिन लोगों को इन 45 मेट्रो स्टेशनों पर ट्रेन पकड़नी थी या इन स्टेशनों पर उतरना था उनके लिए तो मेट्रो बंद ही हुई न! सो, लाखों लोगों के लिए मेट्रो की सेवा बंद थी। सरकार एक तकनीकी टर्म का इस्तेमाल करके अदालत को बता रही है कि उसने अदालत की अवमानना नहीं की है। वास्तव में 10 और 11 अक्टूबर को कई इलाकों में मेट्रो बंद थी और ऐसा नहीं था कि मेट्रो ने स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बंद की तो यात्रियों के लिए कोई और बंदोबस्त किया। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुंचाने के लिए कोई फीडर बस सेवा नहीं चलाई गई थी। इसलिए यह कहना सरासर गलत है कि मेट्रो सेवा बंद नहीं थी। यह हलफनामा देकर झूठ बोलना है।

ऐसे ही एक रिपोर्ट आई है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए ने शिक्षा मामलों की संसदीय समिति के सामने कहा है कि 2017 में एनटीए के गठन के बाद से आज तक कोई पेपर लीक नहीं हुआ है। यह झूठ नहीं, बल्कि सफेद झूठ है। कांग्रेस सांसद मुकुल वासनिक की अध्यक्षता वाली कमेटी के सामने एनटीए ने कहा कि कुछ अनियमितता का शिकायत हुई है लेकिन पेपर लीक नहीं हुआ है। सवाल है कि तीन मई 2026 को हुई नीट की परीक्षा को क्यों रद्द किया गया? सात मई को पेपर लीक होने की खबर आई और 12 मई को एनटीए ने परीक्षा रद्द दी, जिसका आयोजन 21 जून को किया गया। एनटीए और शिक्षा मंत्रालय दोनों की ओर से कई बार कहा गया कि पेपर लीक होने के कारण परीक्षा रद्द हुई है। इस बार तो किसी और धांधली या अनियमितता की खबर भी नहीं थी। इसी तरह 2024 के नीट की परीक्षा पेपर लीक और धांधली दोनों कारणों से प्रभावित हुई थी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कई जगह परीक्षा रद्द की गई। उसके बाद पेपर लीक रोकने का एक कानून बना। जिस रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार ने कानून बनाया उसमें अनियमितता को ‘पेपर लीक केस’ के तौर पर दर्ज किया गया। सोचें, नीट परीक्षा को लेकर 356 केस दर्ज हैं, जेईई मेन्स के 31, यूजीसी नेट के 26 और सीयूईटी यूजी के 14 केस दर्ज हैं। पर एनटीए कह रहा है कि सब कुछ ठीक है!