Kawasaki Z650 S, Z900, and Z900 SE get new colours for 2027

Kawasaki Z650 S, Z900, and Z900 SE get new colours for 2027
Studio render showing one new colour each on the Kawasaki Z900 SE, Z900, and Z650 S

Thinking of Kawasaki immediately brings their signature lime green coloured motorcycles to mind and that’s intentional. After all, it’s the colourway we most associate with the brand, but the truth is that the bikes are available in other colourways too, as we’ve just seen with the 2027 versions recently introduced in Europe.

  1. In Europe, the only available Z650 is the Z650 S that looks similar to Z900
  2. India gets the Z650 and Z900 but not the Z900 SE

What’s new on the Z line-up for 2027?

New colour options but mechanically unchanged

Kawasaki Europe had revealed the Z650 S in late 2025 destined for Europe. The model brought the Z650 platform closer in styling to the Z900, and also introduced revised ergonomics with a wider handlebar and repositioned footpegs. In most European markets, the Z650 and Z650 S coexist, whereas in markets like India and the USA, the standard Z650 continues to be the sole offering. For 2027, the Z650 S gets three new colours in Europe: Black, Red, and White with green highlights. For reference, in India, the regular Z650 is offered in a single Black colour.

Kawasaki Z650 S in Black colour
India does not get the Z650 S; so far unclear if it’s headed here
Kawasaki Z650 S in Red colour
Kawasaki Z650 S in White colour with green highlights

Indian Kawasaki fans do have access to the updated Z900 that debuted here in 2025, but in a Black with gold highlights and the signature Green. For 2027, the Europe version of the Z900 has now gained three new colours: Black (sans gold highlights), Red, and White with green highlights. The Z900 SE gets a new Gray colour with a green frame and green wheels, and upgrades the brakes to Brembo and suspensions to Öhlins from the standard Z900.

Kawasaki Z900 in Black colour
Indian Z900 gets a similar colour, with a gold frame
Kawasaki Z900 in Red colour
Kawasaki Z900 in White colour with green highlights
Kawasaki Z900 SE in Gray colour with a green frame and green wheels
Exclusive colour to the Z900 SE; also exclusive are the Brembo brakes and Öhlins front and rear suspensions

Beyond the new suite of colours, both motorcycles remain identical to the 2026 counterparts which was also the case for the Ninja 500 and 500 SE. At the time of writing, Kawasaki hasn’t revealed anything about these colours coming to the Indian version of the Z900, or when the Z650 S will show up here, if at all.

अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट में गोविंद देव गिरि के प्रमोशन पर उठे सवाल

​ram mandir trust govind dev giri: अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की अहम बैठक में प्रशासनिक और संगठनात्मक स्तर पर कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए हैं। चढ़ावा विवाद के चलते चंपत राय की जिम्मेदारी अब गोविंद देव गिरि को सौंपी गई है। दिल्ली के महेश भागचंदका को ट्रस्ट का कोषाध्यक्ष बनाया गया है। गिरि को महासचिव बनाए जाने के फैसले पर सवाल उठने लगे हैं। उनके बारे में कहा जा रहा है उनके कोषाध्यक्ष रहते हुए ही चढ़ावा में चोरी की घटना हुई थी। कोष के लिए कोषाध्यक्ष ही सीधे जिम्मेदार माना जाता है। ऐसे में महासचिव के रूप में गोविंद गिरि का नाम लोगों के गले नहीं उतर रहा है। 

क्या कहा गोविंद देव गिरि ने?

​ट्रस्ट के नवनियुक्त महासचिव स्वामी गोविंद देव गिरि ने स्पष्ट किया कि नई टीम का मुख्य लक्ष्य अयोध्या को दुनिया की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में विकसित करना और मंदिर निर्माण के साथ-साथ ट्रस्ट के प्रशासनिक व वित्तीय कामकाज को पूरी पारदर्शिता से आगे बढ़ाना है।

 

​बैठक में वित्तीय व्यवस्था में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने, चढ़ावे की गिनती में मानवीय हस्तक्षेप कम करने और SIT जांच से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ट्रस्ट का रुख स्पष्ट किया गया। आने वाले दिनों में जरूरत पड़ने पर ज्वाइंट या डिप्टी CEO की नियुक्ति के लिए जल्द ही SOP और दिशा-निर्देश तैयार किए जाएंगे।

चंपतराय का दबदबा बरकरार

महासचिव पद से इस्तीफा दे चुके चंपत राय का सीधे-सीधे तो नहीं, लेकिन परोक्ष रूप से ट्रस्ट में उनका दबदबा बरकरार है। दरअसल, नए कोषाध्यक्ष महेश भागचंदका अशोक सिंघल फाउंडेशन के संस्थापक ट्रस्टी हैं। चंपत राय इस ट्रस्ट के आजीवन ट्रस्टी हैं। ट्रस्ट के नए सदस्य महेश पांडेय को भी चंपत राय का करीबी माना जाता है। हालांकि अध्यक्ष और महासचिव के पद अब संत समाज के पास हैं।  

 

उल्लेखनीय है कि ट्रस्ट के प्रशासनिक संचालन को सुदृढ़ करने के लिए पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को राम मंदिर का पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) चुना गया है। इस पद के लिए 16 अभ्यर्थियों में से तीन नाम—एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा, मेजर जनरल संजय प्रताप सिंह और श्रुति भारद्वाज—शॉर्टलिस्ट किए गए थे, जिसमें से जितेंद्र मिश्रा के नाम पर अंतिम सहमति बनी।

 

​इनके अलावा अयोध्या निवासी ​वरिष्ठ अधिवक्ता मदन मोहन पांडेय, जिन्होंने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में रामलला की ओर से प्रभावी कानूनी पैरवी की थी। शिक्षाविद डॉ. निर्मला यादव को भी ट्रस्ट का सदस्य बनाया गया। 

सत्येंद्र जैन को मिली जमानत, DJB STP टेंडर घोटाले में कोर्ट का बड़ा फैसला

सत्येंद्र जैन को मिली जमानत, DJB STP टेंडर घोटाले में कोर्ट का बड़ा फैसला

satyendra jain

दिल्ली के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन को गुरुवार को राउज एवेन्यू कोर्ट ने जमानत दे दी। उन्हें 2 लाख रुपये के जमानती बॉन्ड और उतनी ही राशि के 2 जमानती बॉन्ड पर जमानत दी गई है। सत्येंद्र जैन समेत 6 लोगों को एंटी-करप्शन ब्रांच ने DJB STP टेंडर घोटाले के मामले में गिरफ्तार किया था। ALSO READ: पंजाब SIR में राघव चड्ढा का नाम वोटर लिस्ट से कटा! AAP सरकार पर भड़के BJP सांसद

 

विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) दिग्विजय सिंह ने जैन की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सत्येंद्र जैन जमानत दे दी। AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने सत्येंद्र जैन की जमानत पर खुशी जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा, सत्येंद्र जैन को जमानत मिली। भाजपा का ऑपरेशन पंजाब फेल। 'सत्यमेव जयते'।

एसीबी ने जमानत का विरोध करते हुए अदालत के समक्ष दावा किया कि सत्येंद्र जैन आदतन अपराधी हैं।  जमानत याचिका पर फैसला करते समय इस पहलू को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

 

एसीबी के प्रमुख सयुंक्त पुलिस आयुक्त विक्रमजीत सिंह ने बताया था कि मामला एसटीपी के उन्नयन और क्षमता बढ़ाने के लिए जारी टेंडरों में बड़े पैमाने पर अनियमितता, टेंडर शर्तों में हेरफेर और आपराधिक साजिश से जुड़ा था।

 

जांच में सामने आया था कि टेंडर में ऐसी तकनीकी शर्तें शामिल की गईं, जिनसे एक खास तकनीक और उसके प्रदाता यूरोटेक को फायदा हुआ। इससे प्रतिस्पर्धा सीमित हुई और सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ पड़ा।

 

एसीबी ने इस मामले में 11 मई 2024 को एफआईआर दर्ज की थी। इसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के साथ धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और आपराधिक साजिश की धाराएं लगाई गई हैं। एजेंसी का दावा है कि मामले में पैसों के पूरे लेन-देन और अपराध से अर्जित रकम की जांच जारी है।

अलर्ट हो जाओ इंदौर… बड़ी होटलों- डेयरियों में दूध के प्रोडक्‍ट्स असुरक्षित, जांच के बाद आई रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे

अलर्ट हो जाओ इंदौर... बड़ी होटलों- डेयरियों में दूध के प्रोडक्‍ट्स असुरक्षित, जांच के बाद आई रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे

food sample

इंदौर अब हर लिहाज से असुरक्षित हो गया है। अपने खाने-पीने और स्‍वाद के लिए जाना जाने वाले इंदौर में अब बड़ी होटलों- डेयरियों में भी असुरक्षित खाद्य सामग्री मिल रही है। हाल ही में हुई जांच में शहर की नामी और बड़ी होटलों- डेयरियों में दूध के प्रोडक्‍ट्स असुरक्षित पाए गए हैं।

बता दें कि इंदौर में खाद्य सुरक्षा प्रशासन की जांच में सयाजी होटल के 5 खाद्य नमूने फेल पाए गए हैं। इसके अलावा कई डेयरियों से लिए गए दूध, दही और घी के नमूने भी असुरक्षित व अवमानक निकले हैं।

खाद्य सुरक्षा प्रशासन द्वारा इंदौर सयाजी होटल और अन्य प्रतिष्ठानों पर की गई जांच में बड़े पैमाने पर खाद्य नमूनों की गुणवत्ता में गड़बड़ी उजागर हुई है। विभाग द्वारा लिए गए नमूनों की प्रयोगशाला रिपोर्ट आने के बाद मिलावटी खाद्य पदार्थों की श्रेणी स्पष्ट हुई है।

5 नमूने खरे नहीं उतरे: सयाजी होटल के खाद्य नमूनों में मिली भारी अनियमिताएं प्रशासन द्वारा सयाजी होटल से कुल 8 खाद्य पदार्थों के नमूने लिए गए थे। जांच रिपोर्ट के अनुसार इनमें से 5 नमूने मानक कसौटी पर खरे नहीं उतरे। पिस्ता कतरन और मूंगफली दाना के दो नमूनों को असुरक्षित घोषित किया गया है। वहीं पनीर, सान्या मीडियम फैट पनीर और खोपरा बूरा के 3 नमूने अवमानक श्रेणी में पाए गए हैं। रोस्टेड चना दाल, बारीक सौंफ और अजवाइन कुकीज के 3 नमूने मानक स्तर के पाए गए।

किचन सील किया था : 20 अगस्त को एफएसएसएआई ने होटल के किचन में चूहे, दूषित भोजन और अनलेबल नॉनवेज मिलने के बाद खाद्य लाइसेंस निलंबित कर किचन को सील कर दिया था। हालांकि, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से स्टे मिलने के कारण वर्तमान में होटल का संचालन जारी है। बुधवार को जारी हुई जांच रिपोर्ट से खाद्य पदार्थों की वास्तविक स्थिति सामने आई है।

घी के नमूने असुरक्षित : खाद्य सुरक्षा प्रशासन की अन्य कार्रवाइयों में तलावली चंदा स्थित डुग्गू इंटरप्राइजेज से लिए गए घी के नौ नमूने और लसूडिया मोरी स्थित कृष इंटरप्राइजेज से लिए गए वास्तु घी के 7 नमूने असुरक्षित पाए गए हैं। जांच रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद संबंधित खाद्य कारोबारियों के विरुद्ध वैधानिक कानूनी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।

विजयनगर स्थित शिव शक्ति मिल्क एंड स्वीट्स सेंटर से दूध और दही के नमूने मानक पाए गए, लेकिन पनीर और घी के नमूने अवमानक निकले। स्कीम नंबर 78 स्थित श्री कृष्णा दूध दही भंडार में दूध का नमूना अवमानक पाया गया। राऊ के रंगवासा स्थित पाटीदार दूध डेयरी से पनीर का नमूना अवमानक दर्ज किया गया। इसके अतिरिक्त सुदामा नगर स्थित मां अम्बे दूध दही एवं किराना दुकान से लिए गए दूध और दही के नमूने भी अवमानक पाए गए हैं। यारी अड्डा बार में निरीक्षण के दौरान किचन में स्वच्छता मानकों का अभाव पाया गया। यहां से सोयाबीन तेल, पनीर, आटा और तैयार ग्रेवी के नमूने लेकर जांच के लिए राज्य खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला भोपाल भेजे जा रहे हैं। वहीं बॉम्बे अस्पताल चौराहा, स्कीम नंबर 94 स्थित जैन रेस्टोरेंट से तैयार कचौरी, समोसा, कचौरी मसाला, समोसा मसाला और तैयार पोहा के नमूने जांच के लिए संग्रहित किए गए हैं।

जौहर पर सवाल : क्या हम 800 साल पुराने फैसले को आज की नजर से देख सकते हैं?

जौहर पर सवाल : क्या हम 800 साल पुराने फैसले को आज की नजर से देख सकते हैं?

jauhar in mewar

हाल ही में अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने फिल्म पद्मावत के जौहर के प्रसंग पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर कोई महिला बलात्कार की शिकार होती, तो ऐसे दृश्य उसे यह सोचने पर मजबूर कर सकते हैं कि मैंने अपनी इज्जत बचाने के लिए अपनी जान क्यों नहीं ली?”

यही सवाल जौहर की बहस को सिर्फ इतिहास का विषय नहीं रहने देता। क्या जौहर को आज की नैतिकता से देखा जाए, या उस दौर की युद्ध-व्यवस्था, भय और सामाजिक मानसिकता के भीतर जाकर समझा जाए?
शायद असली बहस यही है—जौहर सही था या गलत, यह तय करने से पहले क्या हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि उन स्त्रियों के सामने उस समय विकल्प क्या थे?

जौहर क्यों हुआसवाल बिल्कुल जायज़ है। 

लेकिन इसका जवाब पाने से पहले हमें कुछ और सवाल पूछने होंगे—जिस समय जौहर हुआ, उस समय युद्ध क्या था? हार का अर्थ क्या था? बर्बर आक्रांताओं के हाथों पराजित समाज की स्त्रियों की नियति क्या हो सकती थी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या उस समय स्त्रियों के पास आज जैसे विकल्प मौजूद थे?

आज हम कहते हैं—जान बचाना ही सबसे बड़ा साहस है।
निश्चित रूप से है। 

बलात्कार किसी स्त्री की गरिमा समाप्त नहीं करता। अपराधी का अपराध पीड़िता का कलंक नहीं है। किसी स्त्री को अपनी “इज्जत” साबित करने के लिए जान देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

लेकिन इतिहास का सवाल आज के नैतिक फैसले से थोड़ा अलग है— उन स्त्रियों ने ऐसा क्यों किया?

जौहर को सामान्य आत्महत्या समझना इतिहास को छोटा करना है

जौहर कोई रोजमर्रा की सामाजिक प्रथा नहीं थी। यह युद्ध की चरम परिस्थिति से जुड़ा था—जब कोई दुर्ग लंबे समय की घेराबंदी के बाद लगभग निश्चित पराजय की स्थिति में पहुंच जाता था और पुरुष योद्धा 'विजय या ‍वीरगति' के लिए निकलते थे। इस अंतिम युद्ध को राजपूत परंपरा में साका कहा गया।

अर्थात— दुर्ग की घेराबंदी अंतिम युद्ध पुरुषों का साका स्त्रियों का जौहर दुर्ग का पतन।

इसलिए जौहर और सती को एक मानना ऐतिहासिक भूल है। दोनों की सामाजिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग थी। जौहर का संबंध विशेष रूप से युद्ध, पराजय और उसके बाद बंदी बनाए जाने, दासता तथा संभावित यौन हिंसा के भय से जुड़ा था।

लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी भी है। क्या हर जौहर में हर स्त्री की व्यक्तिगत इच्छा हम आज जान सकते हैं? नहीं। क्या सामूहिक निर्णय में सामाजिक दबाव की भूमिका रही होगी? संभव है।

इसलिए जौहर को केवल स्त्रियों की स्वतंत्र पसंद कहना भी उतना ही अधूरा है, जितना उसे केवल पुरुषों द्वारा महिलाओं को आग में झोंक देना कहना। इतिहास इससे कहीं अधिक जटिल है।

युद्ध में स्त्री पर हिंसा कोई काल्पनिक आशंका नहीं थी

आज जौहर पर सवाल उठाते हुए कहा जाता है कि यौन हिंसा के डर से मृत्यु चुनना स्त्री-विरोधी सोच है। आज के संदर्भ में किसी स्त्री को ऐसा करने के लिए कहना निश्चित रूप से गलत है।

लेकिन मध्यकालीन युद्ध को आज की कानून-व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के चश्मे से देखना भी अधूरा होगा।
युद्ध में स्त्रियों को बंदी बनाना, दास बनाना और यौन हिंसा का शिकार बनाना किसी एक सभ्यता तक सीमित नहीं रहा। 2014 में आईएसआईएस द्वारा यज़ीदी महिलाओं और लड़कियों को बंदी बनाने, बेचने और यौन दासता में धकेलने के प्रमाण संयुक्त राष्ट्र ने दर्ज किए।

यह तुलना किसी मध्यकालीन शासक या समुदाय को आधुनिक आतंकवादी संगठन के बराबर रखने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य सिर्फ इतना याद दिलाना है कि पराजित स्त्री के सामने यौन हिंसा का भय इतिहास में कोई काल्पनिक आशंका नहीं रहा है।

लेकिन नैतिक कसौटी सबके लिए एक होनी चाहिए

यहां एक और सवाल उठता है। किसी एक हिंसा को दूसरी हिंसा के हवाले से सही नहीं ठहराया जा सकता। नादिर शाह की हिंसा जौहर को सही नहीं बना देती। लेकिन जौहर पर बात करते समय आक्रांताओं की हिंसा को पूरी तरह भुला देना भी इतिहास को अधूरा कर देता है।

1739 में नादिर शाह के दिल्ली प्रवेश के बाद हुए नरसंहार में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और शहर में व्यापक लूटपाट हुई। ऐतिहासिक अध्ययनों में इस हिंसा को दिल्ली के इतिहास की बड़ी त्रासदियों में गिना गया है। अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों में भी दिल्ली, आगरा और मथुरा जैसे क्षेत्रों में लूट और हिंसा के प्रसंग मिलते हैं।
सवाल यह नहीं कि नादिर शाह कौन था, अब्दाली कौन था या उनका धर्म क्या था।

सवाल यह है कि विजेता के हाथों पराजित समाज की नियति क्या थी?
और उससे भी बड़ा सवाल— क्या हम इतिहास के हर विजेता की हिंसा को उसी बेचैनी से देखते हैं, जिस बेचैनी से हम जौहर को देखते हैं? यही समान नैतिक कसौटी इतिहास के लिए जरूरी है।

तो क्या जौहर सही था?

आज? नहीं। किसी स्त्री से यह कहना कि बलात्कार से बचने के लिए मर जाना चाहिए—गलत है।
लेकिन जौहर की आलोचना करते समय उस हिंसक व्यवस्था को अदृश्य कर देना भी न्याय नहीं है, जिसके सामने वह निर्णय पैदा हुआ।

अगर सवाल है—स्त्रियों को मरना क्यों पड़ा?” तो अगला सवाल भी होना चाहिए— ऐसी परिस्थिति पैदा कैसे हुई, जिसमें मृत्यु भी उन्हें एक विकल्प दिखाई देने लगी?”

यही इतिहास और नैतिक निर्णय के बीच का अंतर है।

राजपूत परंपरा में सवाल केवल जीनेका नहीं था

आज हमारे लिए जीवन सर्वोच्च मूल्य है। लेकिन उस समय की राजपूत परंपरा में एक दूसरा सवाल भी था— किस शर्त पर जीना है?”

पराजय का अर्थ केवल सत्ता खोना नहीं था। वह स्वतंत्रता खोना, राज्य खोना और विजेता की अधीनता स्वीकार करना भी हो सकता था।

 “Death before Dishonor” यह भावना केवल राजपूतों तक सीमित नहीं रही। दुनिया की अनेक युद्ध-संस्कृतियों में पराजय, दासता या अपमान की अपेक्षा मृत्यु को स्वीकार करने के उदाहरण मिलते हैं। लेकिन राजपूत परंपरा में इसका एक विशिष्ट रूप दिखाई देता है— पुरुषों का साका और स्त्रियों का जौहर।

इसलिए जौहर को केवल धार्मिक घटना या किसी एक शासक के अत्याचार की कहानी बनाना भी गलत है। यह मध्यकालीन युद्ध, दुर्ग-सभ्यता, सामुदायिक सम्मान, स्त्री की सामाजिक स्थिति और पराजय के भय—इन सबके बीच पैदा हुई एक असाधारण परिस्थिति थी।

क्योंकि उनके लिए जीवन का मूल्य केवल सांस लेने में नहीं था; जीवन किस अवस्था में जिया जा रहा है, यह भी महत्वपूर्ण था। इसीलिए साका की परंपरा को समझना जरूरी है। जब जीत की संभावना समाप्त हो जाती थी, योद्धा अंतिम युद्ध के लिए निकलते थे—अक्सर यह जानते हुए कि लौटकर आना संभव नहीं।

आज इसे अव्यावहारिक कहा जा सकता है। लेकिन उस समय उनका प्रश्न रणनीति से आगे था  “अगर जीवन ही पराधीनता, अपमान में बीते तो उस जीवन का अर्थ क्या है?” यही वह दर्शन है जिसे समझे बिना जौहर को समझना कठिन है। 
जीवन और स्वतंत्र जीवनदोनों को एक नहीं माना जाता था।

अगर जीवन ही सर्वोच्च था, तो महाराणा प्रताप क्यों नहीं झुके?

यही सवाल राजपूत इतिहास की मूल चेतना को समझने में मदद करता है। यदि जीवन बचाना ही अंतिम लक्ष्य था, तो उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार क्यों नहीं की? हल्दीघाटी के बाद संघर्ष जारी क्यों रखा? कठिन जीवन और अभाव क्यों स्वीकार किए?

क्योंकि उनके लिए जीवन का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं था। स्वतंत्रता के बिना जीवन अधूरा था।
यह दर्शन आज हमें स्वीकार करना जरूरी नहीं। लेकिन उस युग के निर्णयों को समझने के लिए इसे समझना जरूरी है। प्रतिरोध की उस परंपरा को समझे बिना जौहर की मानसिकता को समझना भी कठिन है।

जौहर का सबसे कठिन सवाल

जौहर को महिमामंडित करना गलत है। उसका उपहास करना भी गलत है। प्रचंड अग्नि में समाती स्त्रियों का दृश्य गौरव का नहीं, एक भयावह त्रासदी का दृश्य है।

लेकिन उस त्रासदी को केवल कायरता कह देना भी इतिहास के साथ अन्याय है।

वे स्त्रियां अपने समय की सामाजिक व्यवस्था, युद्ध की वास्तविकताओं और पराजय के भय के बीच निर्णय ले रही थीं। हर स्त्री की इच्छा क्या थी, हम निश्चित रूप से नहीं जान सकते। लेकिन उनके निर्णय को समझने की कोशिश किए बिना उन्हें आज के नैतिक पैमाने पर खड़ा कर देना भी आसान रास्ता है।

इतिहास से सहमत होना जरूरी नहीं। इतिहास को समझना जरूरी है। जौहर का सबसे बड़ा सवाल शायद जौहर नहीं है। वह सवाल है— जीवन बड़ा है या स्वाभिमान?

आज हमारा उत्तर अलग हो सकता है। और होना भी चाहिए। लेकिन सदियों पहले उस सवाल के सामने खड़ी स्त्री का उत्तर समझने के लिए हमें अपने समय से थोड़ा बाहर निकलना होगा।

जौहर की असली कहानी आग में नहीं थी। वह उस भय, उस युद्ध और उस मानसिकता में थी, जिसने किसी समाज को यह सोचने पर मजबूर किया कि पराजय के बाद उसके पास बचेगा क्याजीवन, स्वतंत्रता, सम्मान या केवल अस्तित्व।

और शायद इसी कारण सदियों बाद भी जौहर हमें असहज करता है।  क्योंकि वह अतीत से निकलकर आज भी हमसे एक कठिन सवाल पूछता है—  आपके लिए स्वतंत्रता और स्वाभिमान की कीमत क्या है?” इस सवाल का उत्तर शायद हर युग अपने समय के अनुसार देगा। लेकिन इतिहास का काम उत्तर देना नहीं है।

इतिहास का काम हमें इतना ईमानदार बनाना है कि हम उस स्त्री की आंखों से भी दुनिया देखने की कोशिश करें, जो जौहर की ज्वाला के सामने खड़ी थी…

बिना किसी बड़े स्टार और PR के नीम करोली बाबा पर मूवी बना 60 करोड़ पार! जानिए कौन हैं हनुमान अंश के डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी

राइटर-डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी की फ़िल्म ‘हनुमान अंश’ 2026 की सबसे बड़ी बॉक्स ऑफ़िस सरप्राइज़ फ़िल्मों में से एक बनकर उभरी है। 7 अगस्त को सिर्फ़ 10 लाख रुपये की ओपनिंग के बावजूद, यह स्पिरिचुअल ड्रामा फ़िल्म – जिसे लगभग 2 करोड़ रुपये के बजट में बनाया गया था – भारत में 50 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कमाई करने में सफल रही।

इस फ़िल्म ने 41,245 शो में कुल मिलाकर 72.97 करोड़ रुपये और नेट कलेक्शन के तौर पर 61.88 करोड़ रुपये कमाए हैं। अपने 26वें दिन, ‘हनुमान अंश’ ने 8.50 करोड़ रुपये (नेट) कमाए, जिससे इसने यश की फ़िल्म ‘टॉक्सिक’ की 8.20 करोड़ रुपये की कमाई का रिकॉर्ड तोड़ दिया।

फ़िल्म की लगातार अच्छी रफ़्तार को देखते हुए अब यह सवाल तेज़ी से उठ रहा है कि क्या ‘हनुमान अंश’ 100 करोड़ रुपये के आंकड़े तक पहुंच पाएगी। इस बड़ी हिट के बाद, फ़ैंस यह जानना चाहते हैं कि विशाल चतुर्वेदी कौन हैं। उनके लिंक्डइन प्रोफ़ाइल के अनुसार, विशाल चतुर्वेदी एक फ़िल्ममेकर और ‘स्वंभू मीडिया नेटवर्क’ के फ़ाउंडर हैं।

उन्हें कंटेंट प्रोडक्शन, फ़िल्ममेकिंग और पाक कला (culinary arts) में 14 साल से ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने ‘सेतु’ (2023) और ‘रब करे तू भी’ (2021) में राइटर के तौर पर काम किया है। ‘हनुमान अंश’ की कहानी नीम करौली बाबा के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर आधारित है, जिसे चतुर्वेदी ने लिखा और डायरेक्ट किया है।

लोगों के बीच फ़िल्म की तारीफ़ (word-of-mouth) ने 10 लाख रुपये की ओपनिंग वाली इस फ़िल्म की किस्मत बदल दी और आख़िरी हफ़्तों में इसकी कमाई में ज़बरदस्त उछाल आया। यह फ़िल्म इस साल की सबसे चौंकाने वाली थिएटर सक्सेस स्टोरीज़ में से एक है और चौथे हफ़्ते में इसका प्रदर्शन चर्चा का विषय बन गया है। ताज़ा जानकारी के मुताबिक, अब ‘हनुमान अंश’ को ‘होम्बले फ़िल्म्स’ द्वारा दुनिया भर में रिलीज़ किया जा रहा है। यह फ़िल्म अब 11 सितंबर को दुनिया भर में रिलीज़ होगी।

बेंगलुरु में कैब चलाकर Uber Black ड्राइवर ने एक हफ्ते में कमाए ₹46000, कमाई देखकर सोशल मीडिया यूजर्स हुए हैरान

बेंगलुरु जैसे व्यस्त शहर में कैब चलाना किसी के लिए सिर्फ रोजगार हो सकता है, लेकिन एक Uber Black ड्राइवर ने अपनी कमाई और रोजमर्रा की जिंदगी की झलक दिखाकर सोशल मीडिया पर लोगों को चौंका दिया। Instagram पर वायरल हुए एक वीडियो में Hamtor Debbarma ने बताया कि वह किस तरह अपने दिन की शुरुआत करते हैं, शहर में यात्रियों को छोड़ते हैं और इसी काम के जरिए एक सप्ताह में ₹46,000 से ज्यादा कमा लेते हैं।

सुबह की शुरुआत से सड़क तक का सफर

वीडियो की शुरुआत Hamtor की सुबह की दिनचर्या से होती है। वह उठकर ब्रश करते हैं, नहाते हैं, नाश्ता तैयार करते हैं और काम पर जाने से पहले अपने कपड़े प्रेस करते हैं। इसके बाद वह घर पर अपने काम की तैयारी करते हैं और Uber ड्राइवर की पहचान वाली सफेद शर्ट और काली पैंट पहनकर निकलते हैं।

काम शुरू करने से पहले वह अपनी कार की सफाई भी करवाते हैं। इसके बाद बेंगलुरु की सड़कों पर उनका सफर शुरू होता है, जहां वीडियो में उनकी कुछ राइड्स की छोटी-छोटी झलकियां दिखाई गई हैं।

कैब ड्राइविंग है साइड हसल

Hamtor ने बताया कि Uber Black के लिए ड्राइविंग करना उनका मुख्य काम नहीं, बल्कि एक साइड हसल है। उनके प्रोफाइल के मुताबिक उन्होंने B.Com की पढ़ाई Yenepoya University से की है और वह क्रिप्टो तथा फॉरेक्स ट्रेडिंग में भी रुचि रखते हैं।

वीडियो में वह दिनभर की व्यस्तता के बीच एक परिचित के साथ लंच करते हुए भी नजर आते हैं। यानी उनका दिन सिर्फ ड्राइविंग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन की भी झलक देता है।

एक हफ्ते की कमाई ने चौंकाया

वीडियो का सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला हिस्सा उनकी साप्ताहिक कमाई थी। उनके फोन की स्क्रीन पर एक सप्ताह की कमाई ₹46,022.30 दिखाई दी। इस आंकड़े को देखकर कई सोशल मीडिया यूजर्स हैरान रह गए। वीडियो के अंत में Hamtor ने अपने फॉलोअर्स के लिए एक संदेश भी साझा किया उन्होंने लोगों को विनम्र और जमीन से जुड़े रहने की सलाह दी और याद दिलाया कि कोई भी पद या स्थिति हमेशा के लिए नहीं रहती।

सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?

वीडियो वायरल होने के बाद लोगों ने अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया दी। कई यूजर्स ने उनकी मेहनत और काम के प्रति रवैये की तारीफ की। कुछ लोगों ने मजाकिया अंदाज में कहा कि उनकी जिंदगी कॉरपोरेट नौकरी करने वालों से ज्यादा शानदार नजर आ रही है। एक यूजर ने लिखा कि उनकी जिंदगी अपनी जिंदगी से ज्यादा फैंसी लग रही है। वहीं एक अन्य ने कहा कि यह कमाई कॉरपोरेट नौकरी से कहीं बेहतर है।

कुछ लोगों ने इसे IT और कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने वालों के लिए उम्मीद से जोड़कर देखा। एक कमेंट में कहा गया कि ऐसी कहानी IT प्रोफेशनल्स को भी नई संभावनाओं के बारे में सोचने की प्रेरणा देती है।

‘काम कोई छोटा नहीं होता’

इस पोस्ट पर एक यूजर ने अपने बेटे का उदाहरण देते हुए Hamtor और ऐसे काम करने वाले लोगों की तारीफ की। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र में पढ़े-लिखे और मेहनती लोगों की जरूरत है और अपने सपनों तक पहुंचने तक अपने काम का आनंद लेना चाहिए।

इस पूरी कहानी ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि सफलता को सिर्फ पारंपरिक 9-5 नौकरी के पैमाने से क्यों देखा जाए। Hamtor की कहानी सोशल मीडिया पर इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने अपने काम को छिपाने के बजाय उसे खुले तौर पर दिखाया और अपनी मेहनत से जुड़ी कमाई भी लोगों के साथ साझा की।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

करियर में तेजी से आगे बढ़ना है? रिक्रूटर ने बताए 9 ‘चालाक’ तरीके, बॉस से लेकर सैलरी तक आएंगे काम

सब्जी बेचने से लेकर भारत के लिए 4 गोल्ड मेडल जीतने तक, झारखंड के एथलीट अमरदीप कुमार की कहानी वायरल, हेमंत सोरेन ने किया रिएक्ट

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें झारखंड के रांची में अरगोरा चौक पर एक आदमी सब्ज़ियां बेचता हुआ दिख रहा है। जल्द ही लोगों को पता चला कि यह कोई और नहीं, बल्कि राज्य के थ्रोबॉल खिलाड़ी और गोल्ड मेडलिस्ट अमरदीप कुमार हैं। इंटरनेशनल टूर्नामेंट में भारत के लिए चार गोल्ड मेडल जीतने के बावजूद, 29 साल के यह एथलीट अब गुज़ारा करने और अपने परिवार की मदद के लिए सब्ज़ियां बेच रहे हैं और कैब चला रहे हैं।

ऑनलाइन लोगों का ध्यान खींचने वाले इस वीडियो क्लिप में अमरदीप अपनी दुकान पर बैठे हुए और आस-पास कई तरह की सब्ज़ियां रखे हुए दिखाई दिए। उन्हें ग्राहक को सब्ज़ियां देने से पहले तराज़ू पर उन्हें तौलते हुए देखा गया। चर्चा की खास बात यह थी कि उन्होंने अपनी कामचलाऊ दुकान की दीवार पर अपने गोल्ड मेडल लटका रखे थे।

झारखंड के रहने वाले अमरदीप ने कई इंटरनेशनल थ्रो-बॉल इवेंट्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया है और चार गोल्ड मेडल जीते हैं। हालांकि, इतनी उपलब्धियों के बावजूद, उन्हें सरकारी नौकरी पाने या राज्य से कोई आर्थिक मदद मिलने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।

जब से सोशल मीडिया पर यह क्लिप सामने आया है, लोगों ने इस स्थिति पर निराशा जताई है। कुछ लोगों ने इसे “दिल तोड़ने वाला” बताया है, तो कुछ ने सरकार से अपील की है कि वे हर संभव तरीके से उनकी मदद करें। एक यूजर ने पूछा- “दीवार पर गोल्ड मेडल और सड़क किनारे सब्ज़ियां—यह सिर्फ़ दिल तोड़ने वाली तस्वीर नहीं है, यह सिस्टम के लिए एक असहज करने वाला सवाल है। जिस खिलाड़ी ने भारत का प्रतिनिधित्व किया और गोल्ड मेडल जीता, उसे अपनी बुनियादी ज़िंदगी गुज़ारने के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए। जब ​​खिलाड़ी जीतते हैं तो हम जश्न मनाते हैं, लेकिन कैमरे हटने के बाद उनका क्या होता है?”

एक और व्यक्ति ने कहा, “इसीलिए हमें ओलंपिक में ज़्यादा मेडल नहीं मिलते। दुखद स्थिति है।” एक ने कहा कि दुख की बात यह नहीं है कि वह सब्ज़ियां बेच रहे हैं। ईमानदारी से किए गए काम में कुछ भी गलत नहीं है… चिंता की बात यह है कि उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया और गोल्ड मेडल जीते, लेकिन शायद खेल में या अपनी उपलब्धियों के आधार पर करियर बनाने के लिए उनके पास कोई भविष्य का रास्ता नहीं था। समस्या संस्थागत समर्थन की कमी है, न कि नौकरी की,”।

एक अन्य ने कहा कि “सरकार को उनके जैसे लोगों को, जिन्होंने देश के लिए कुछ किया है, कम से कम मासिक सहायता राशि देनी चाहिए, न कि किसी विधायक को निजी कारणों से विधायक बनने के लिए जीवन भर पेंशन देनी चाहिए,।

कौन हैं अमरदीप कुमार?

अमरदीप ने 2015 में मलेशिया में हुई एशियन जूनियर थ्रो-बॉल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर इंटरनेशनल लेवल पर अपनी पहचान बनाई। इसके बाद 2017 में काठमांडू में हुई इंडो-नेपाल थ्रो-बॉल चैंपियनशिप में उन्होंने एक और गोल्ड मेडल जीता। 2019 में, वह उस भारतीय टीम का हिस्सा थे जिसने बेंगलुरु में साउथ एशियन थ्रो-बॉल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता था। उनका चौथा इंटरनेशनल गोल्ड मेडल 2026 में रांची में आयोजित साउथ एशियन थ्रो-बॉल चैंपियनशिप के दूसरे एडिशन में मिला।

आज, अमरदीप गुज़ारा करने के लिए सब्ज़ियाँ बेचते हैं और कैब भी चलाते हैं, क्योंकि उनका परिवार कमाई के कई ज़रिया पर निर्भर है। मुश्किलों के बावजूद, वह थ्रो-बॉल खेलना जारी रखे हुए हैं, क्योंकि अक्टूबर 2026 के आखिर में उनके श्रीलंका का प्रतिनिधित्व करने की उम्मीद है।

हालांकि अमरदीप ने 2016 में किसी इनाम या प्रोत्साहन के लिए झारखंड सरकार से संपर्क किया था, लेकिन कैश इनाम और सरकारी नौकरी के लिए उनकी अर्ज़ियाँ अभी भी पेंडिंग हैं। छत्तीसगढ़, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों के उनके कई साथियों को सरकारी नौकरी मिल चुकी है।

CM हेमंत सोरेन ने लिया संज्ञान

अमरदीप की कहानी ऑनलाइन वायरल होने के बाद, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने X पर इस मामले के बारे में पोस्ट किया और खेल विभाग को निर्देश दिया कि वे तुरंत इस मामले का संज्ञान लें और कार्रवाई शुरू करें।

Raghav Chadha SIR Row: ‘दिल्ली वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने की कोशिश’; राघव चड्ढा के पंजाब ड्राफ्ट लिस्ट विवाद में नया मोड़, AAP का बड़ा आरोप

Raghav Chadha SIR Row: पंजाब की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में अपना नाम ‘शिफ्टेड’ (दूसरी जगह चले गए) बताए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा और आम आदमी पार्टी (AAP) के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है। चड्ढा ने आरोप लगाया है कि पंजाब की AAP सरकार ने राजनीतिक बदले की भावना से उनका नाम वोटर लिस्ट से हटाया है। वहीं, AAP ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया है कि राघव चड्ढा दिल्ली में अपना नाम वोटर लिस्ट में रजिस्ट्रेशन कराने की कोशिश कर रहे थे।

आम आदमी पार्टी ने अपने पूर्व सहयोगी पर आरोप लगाया कि इसके लिए चड्ढा ने कथित तौर पर बैकडेटेड प्रोसेस” (पुरानी तारीख वाली प्रक्रिया) का सहारा लिया गया। पार्टी का कहना है कि अब चड्ढा अपनी ही स्थिति का ठीकरा AAP और पंजाब सरकार पर फोड़ रहे हैं।

हालांकि, चुनाव आयोग के एक सीनियर अधिकारी ने दिल्ली की वोटर लिस्ट में चड्ढा का नाम शामिल करने के लिए पर्दे के पीछे की किसी भी कोशिश के दावों को खारिज करते हुए पीटीआई से कहा, “ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया और न ही उठाया जा रहा है।” आपको बता दें कि चड्ढा ने अप्रैल में AAP छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) जॉइन की थी।

क्या है पूरा विवाद?

पंजाब में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रोसेस के बाद तैयार की गई वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट में राघव चड्ढा के नाम के आगे “शिफ्टेड” स्टेटस दर्ज किया गया है। पंजाब से राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने गुरुवार को कहा कि वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट में उनके नाम के आगे शिफ्टेड (यानी कहीं और चले गए) लिखा गया है। जबकि उनका वोटर ID मोहाली में रजिस्टर्ड है। उन्होंने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार राजनीतिक बदले की भावना से चुनावी मशीनरी का इस्तेमाल कर रही है।

X पर एक पोस्ट में चड्ढा ने कहा, “पंजाब में AAP सरकार अब बदले की राजनीति को वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट तक ले आई है। मैं पंजाब से राज्यसभा सांसद हूं और मेरा वोटर ID पंजाब के मोहाली में रजिस्टर्ड है। इसके बावजूद वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट में मेरे नाम के आगे ‘शिफ्टेड’ लिखा गया है।” उन्होंने आरोप लगाया, “यह सिर्फ क्लर्क की गलती नहीं लगती। यह साफ तौर पर राजनीतिक बदले की भावना का मामला है।” चड्ढा ने कहा कि वह SIR गाइडलाइंस के तहत उपलब्ध उपायों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

‘शिफ्टेड किसने मार्क किया’?

चड्ढा ने आगे कहा, “अच्छी बात यह है कि यह सिर्फ एक ड्राफ्ट लिस्ट है, फाइनल वोटर लिस्ट नहीं। ‘दावे और आपत्तियों’ (claims and objections) की प्रक्रिया के दौरान सुधार किए जा सकते हैं, जो अभी चल रही है। फाइनल वोटर लिस्ट अक्टूबर में जारी की जाएगी। मैं पहले से ही SIR गाइडलाइंस के तहत उपलब्ध उपायों का इस्तेमाल करने की प्रक्रिया में हूं।” उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि उन्हें “शिफ्टेड” किसने मार्क किया? इस क्लासिफिकेशन को किसने वेरिफाई किया और ऊंचे लेवल पर इसे किसने मंजूरी दी?

पंजाब अधिकारियों पर लगाया आरोप

उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में पंजाब सरकार के अधिकारी शामिल थे। चड्ढा ने आरोप लगाया, “मुझे ‘शिफ्टेड’ के तौर पर किसने मार्क किया? AAP सरकार के एक अधिकारी ने? उस क्लासिफिकेशन को किसने वेरिफाई किया? फिर से AAP सरकार के ही एक अधिकारी ने…। ऊंचे स्तर पर यह प्रक्रिया किसने पूरी की? एक बार फिर उसी AAP सरकार के एक अधिकारी ने।” उन्होंने दावा किया कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से लेकर राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी तक, पंजाब सरकार के अधिकारी SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) प्रक्रिया के हर चरण में तैनात होते हैं।

उन्होंने कहा, “BLO आमतौर पर पंजाब सरकार का एक जूनियर कर्मचारी होता है। बीच के अधिकारी असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (AERO), इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) और डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर (DEO भी पंजाब सरकार के अधिकारी होते हैं। सबसे ऊपर पंजाब कैडर का IAS अधिकारी होता है जो मुख्य चुनाव अधिकारी के तौर पर काम करता है।” उन्होंने दावा किया कि ऐसे अधिकारी राजनीतिक दबाव में आ सकते हैं क्योंकि उनके ट्रांसफर, पोस्टिंग और करियर राज्य सरकार के कंट्रोल में होते हैं।

राज्यसभा सांसद ने आरोप लगाया, “इन अधिकारियों को पता है कि चुनाव ड्यूटी खत्म होने के बाद AAP सरकार ही उनके ट्रांसफर, पोस्टिंग और करियर को नियंत्रित करती है। वे जानते हैं कि कौन उनका ट्रांसफर कर सकता है और कौन उनकी जिंदगी मुश्किल बना सकता है। इस तरह, AAP सरकार राजनीतिक बदला लेने के लिए राज्य के अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव डालती है।” उन्होंने यह भी कहा कि जब से उन्होंने “भ्रष्ट” पार्टी छोड़ी है, तब से आम आदमी पार्टी का नेतृत्व उनसे नाराज है।

चुनाव आयोग की नियमों का किया जिक्र

उन्होंने कहा, “AAP ने उन लोगों के खिलाफ पंजाब पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल किया है जिन्होंने चुप रहने से इनकार कर दिया। पंजाब सरकार ने उन अन्य सांसदों को भी निशाना बनाया है जिन्होंने AAP छोड़कर BJP का दामन थामा। यह गलत क्लासिफिकेशन उसी राजनीतिक बदले की भावना का ताजा उदाहरण है।” चड्ढा ने चुनाव आयोग की विस्तृत SIR गाइडलाइंस के पैरा 4(d) का भी जिक्र किया, जिसमें जन-प्रतिनिधियों की एक “प्रोटेक्टेड लिस्ट” (सुरक्षित सूची) का प्रावधान है।

AAP का पलटवार

चड्ढा की बातों पर प्रतिक्रिया देते हुए AAP की पंजाब यूनिट के प्रवक्ता ने कहा कि स्पेशल समरी रिविजन (SSR) चुनाव आयोग करता है, न कि राज्य सरकार। उन्होंने कहा, “वोटर लिस्ट में किसका नाम शामिल करना है या किसका नाम हटाना है, इसमें पंजाब सरकार की कोई भूमिका नहीं होती।” प्रवक्ता ने आगे कहा, “यह बात सभी जानते हैं कि राघव चड्ढा दिल्ली में रहते हैं, पंजाब में नहीं। अगर वह अब पंजाब में नहीं रहते हैं, तो यह उनकी अपनी जिम्मेदारी थी कि वह या तो वहां अपना वोटर रजिस्ट्रेशन बनाए रखते या उसे कहीं और ट्रांसफर करवाते। वोटर लिस्ट से अपना नाम हटने के लिए वह अब AAP या पंजाब सरकार को दोष नहीं दे सकते।”

ये भी पढ़ें- 3 सितंबर को मूसलाधार आफत! यूपी, विदर्भ और बंगाल में बहुत भारी बारिश, इन राज्यों में आंधी-बिजली का अलर्ट

उन्होंने यह भी दावा किया कि AAP को चुनाव आयोग के सूत्रों से जानकारी मिली है कि चड्ढा “बैक-डेटेड प्रोसेस” का इस्तेमाल करके दिल्ली के राजिंदर नगर में वोटर के तौर पर रजिस्टर होने की कोशिश कर रहे थे। AAP प्रवक्ता ने कहा, “अगर बैक डेटेड प्रोसेस या ऐसी कोई गैर-कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई थी, तो इसकी जांच होनी चाहिए और पूरी सच्चाई जनता के सामने आनी चाहिए। अगर BJP या किसी और ने बैक-डेटेड प्रोसेस के जरिए नाम दर्ज कराने में मदद की है, तो हम इस मामले को तार्किक अंजाम तक पहुंचाएंगे और सच्चाई सामने लाएंगे।”

क्या होती है टेस्टोस्टेरोन जांच? अमेरिका में सैनिकों के लिए इसे क्यों किया गया अनिवार्य

क्या होती है टेस्टोस्टेरोन जांच? अमेरिका में सैनिकों के लिए इसे क्यों किया गया अनिवार्य

US Army Testosterone Test

Testosterone screening in US: अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने 30 वर्ष या उससे अधिक आयु के सभी सक्रिय और रिजर्व सैन्य कर्मियों के लिए टेस्टोस्टेरोन की कमी की अनिवार्य जांच से संबंधित नए और विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की घोषणा के बाद तत्काल प्रभाव से लागू किए गए इस नियम का उद्देश्य सैनिकों की शारीरिक क्षमता, ऊर्जा और सैन्य तैयारी को बेहतर बनाना है।

 

पेंटागन के अनुसार, इन नए मानकों का मुख्य उद्देश्य पुरुषों और महिलाओं दोनों में हार्मोनल असंतुलन और ऊर्जा की कमी से जुड़ी समस्याओं की पहचान कर उनका समय पर उपचार करना है, जिससे अमेरिकी सेना की समग्र युद्ध तत्परता को मजबूती मिल सके। ALSO READ: होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका का लगभग पूरा कंट्रोल? ट्रंप के दावे से मचा हड़कंप ; तेल के दाम चढ़े

पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग नियम

पेंटागन के दिशा-निर्देशों के अनुसार 30 वर्ष या उससे अधिक के पुरुषों के लिए रक्त में टेस्टोस्टेरोन स्तर की नियमित और अनिवार्य जांच की जाएगी। रायटर की रिपोर्ट के अनुसार, 30 वर्ष से कम आयु के पुरुष युवा सैनिकों की जांच केवल उनकी व्यक्तिगत मांग पर या डॉक्टर द्वारा किसी चेतावनी संकेत की पहचान करने पर ही होगी। ALSO READ: अमेरिका के हाथ लगा दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार! ट्रंप ने वेनेजुएला के साथ किया ऐतिहासिक समझौता

 

वहीं महिला सैनिकों के लिए नियमित ब्लड टेस्ट अनिवार्य नहीं किया गया है। हालांकि, उनमें अत्यधिक थकान और अनियमित मासिक धर्म चक्र की जांच की जाएगी। यह लक्षण हार्मोनल गड़बड़ी और 'रिलेटिव एनर्जी डेफिशिएंसी इन स्पोर्ट्स' (RED-S) से जुड़े हो सकते हैं।

 

इसके अलावा, दस्तावेज़ में मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) के बाद की उन महिला सैनिकों के लिए भी ऑफ-लेबल टेस्टोस्टेरोन देने के स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए गए हैं, जो कामेच्छा में अत्यधिक कमी का सामना कर रही हैं।

विशेषज्ञों की चिंता और एफडीए की बैठक

रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ लंबे समय से टेस्टोस्टेरोन के उपयोग का समर्थन करते रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस व्यापक जांच नीति के वैज्ञानिक आधार पर सवाल उठाए हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बड़े पैमाने पर होने वाली अनिवार्य जांच से अनावश्यक या संभावित रूप से हानिकारक उपचार की स्थिति पैदा हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बात के पुख्ता प्रमाण नहीं हैं कि सभी सैन्य कर्मियों की टेस्टोस्टेरोन जांच करने से देश की युद्ध क्षमता में कोई बड़ा सुधार होगा।

 

इस विषय पर बढ़ती चर्चाओं के बीच, अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) ने सितंबर के मध्य में विशेषज्ञों की एक बैठक बुलाई है, जिसमें टेस्टोस्टेरोन के चिकित्सा उपयोग और इसके प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।

क्या होती है टेस्टोस्टेरोन जांच?  

टेस्टोस्टेरोन जांच (Testosterone Test) एक सामान्य ब्लड टेस्ट है, जिससे आपके खून में मौजूद टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की मात्रा का पता लगाया जाता है। टेस्टोस्टेरोन को मुख्य रूप से पुरुष सेक्स हार्मोन कहा जाता है, जो पुरुषों के अंडकोष में बनता है, लेकिन यह महिलाओं के अंडाशय (Ovaries) और दोनों के एड्रिनल ग्लैंड में भी कम मात्रा में बनता है। यह हार्मोन मांसपेशियों की ताकत, हड्डियों का घनत्व, दाढ़ी-मूंछ के बाल, शुक्राणु के निर्माण और सेक्स ड्राइव को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाता है। यह रक्त में मौजूद सभी प्रकार के टेस्टोस्टेरोन (प्रोटीन से बंधे और फ्री दोनों) की कुल मात्रा को मापता है।