Independence Day 2026: भारतीय आजादी, साहस और कर्तव्य पर बेस्ड ये 5 किताबें जरूर पढ़नी चाहिए

Independence Day 2026: हर साल अगस्त में भारत स्वतंत्रता दिवस के लिए सज-धज कर तैयार होता है। बालकनियों पर झंडे दिखाई देते हैं, स्कूलों की सभाओं में देशभक्ति के गीत गूंजते हैं और टीवी चैनलों पर भाषणों को दोबारा दिखाया जाता है। लेकिन, आजादी सिर्फ एक सुबह के समारोह से कहीं ज़्यादा की हकदार है।

अगर आप सच में समझना चाहते हैं कि आज़ादी का क्या मतलब है, तो कभी-कभी स्क्रीन बंद कर दें, फ़ोन रख दें और कोई किताब खोलें। सही किताब इतिहास को निजी अनुभव जैसा बना सकती है। इसलिए, इस आज़ादी के दिन, कुछ “ज़रूरी” पढ़ने के दबाव को भूल जाएं। कुछ ऐसा पढ़ें जो आपको थोड़ा बेचैन करे, आपमें गर्व की भावना जगाए और फिर आपको सोचने पर मजबूर करें।

यहां 5 ऐसी किताबें हैं जो आपको चुनौती देती हैं, उकसाती हैं और कभी-कभी ऐसे सवाल आपके सामने रखती हैं, जिनसे आप शायद बचना चाहेंगे।

जवाहरलाल नेहरू की ‘द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’

नेहरू की जेल की सज़ा के दौरान लिखी गई यह व्यापक किताब इतिहास, संस्कृति, राजनीति और दर्शन के नज़रिए से भारत को देखती है। यह आज़ादी का कोई मैनुअल नहीं, बल्कि खुद देश के साथ एक बातचीत है।

महात्मा गांधी की ‘द स्टोरी ऑफ़ माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ’

गांधी खुद को एक बेदाग़ हीरो के तौर पर पेश नहीं करते। इसके बजाय, वे अपनी नाकामियों, शक, प्रयोगों और मान्यताओं की पड़ताल करते हैं, जिससे साहस कम वीरतापूर्ण और कहीं ज़्यादा मानवीय लगता है।

बिपन चंद्र की ‘इंडियाज़ स्ट्रगल फ़ॉर इंडिपेंडेंस’

जो लोग सोचते हैं कि आज़ादी सिर्फ़ इसलिए मिली क्योंकि गांधी ने मार्च का नेतृत्व किया, उनके लिए यह किताब एक ज़रूरी सुधार है। यह 1857 से 1947 तक के आंदोलन को लोगों, राजनीति और प्रतिरोध के ज़रिए दिखाती है।

बी.आर. अंबेडकर की ‘एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’

अंबेडकर हमें एक असहज सच का सामना करने पर मजबूर करते हैं- जब सामाजिक असमानता बनी रहती है, तो राजनीतिक आज़ादी का कोई खास मतलब नहीं रह जाता। समानता के लिए उनकी ज़बरदस्त दलील इस किताब को आज भी उतना ही प्रासंगिक बनाती है।

रामचंद्र गुहा की ‘इंडिया आफ्टर गांधी’

1947 में आज़ादी मिलने से भारत की समस्याएं जादुई रूप से हल नहीं हो गईं। यह किताब उसके बाद के मुश्किल दशकों का ब्यौरा देती है और हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र के लिए धैर्य, असहमति, ज़िम्मेदारी और कोशिश करते रहने के साहस की ज़रूरत होती है।

रामचंद्र गुहा की ‘इंडिया आफ्टर गांधी’

1947 में आज़ादी मिलने से भारत की समस्याएं जादुई रूप से हल नहीं हो गईं। यह किताब उसके बाद के मुश्किल दशकों का ब्यौरा देती है और हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र के लिए धैर्य, असहमति, ज़िम्मेदारी और कोशिश करते रहने के साहस की ज़रूरत होती है।

रांची के मोरहाबादी मैदान में स्वतंत्रता दिवस समारोह की रिहर्सल, सीएम हेमंत सोरेन करेंगे ध्वजारोहण

रांची के मोरहाबादी मैदान में स्वतंत्रता दिवस समारोह की रिहर्सल, सीएम हेमंत सोरेन करेंगे ध्वजारोहण

Ranchi Independence Day 2026 Rehearsal: रांची के ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में स्वतंत्रता दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित होने वाले राजकीय समारोह को लेकर बुधवार को फुल ड्रेस रिहर्सल संपन्न हुआ। जिला दंडाधिकारी-सह-उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक राकेश रंजन की देखरेख में आयोजित इस रिहर्सल में स्वतंत्रता दिवस के दिन होने वाली सभी औपचारिक गतिविधियों का सटीक अनुकरण किया गया। इस राजकीय समारोह में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मुख्य अतिथि के रूप में ध्वजारोहण करेंगे।

 

रिहर्सल के दौरान भारत सरकार द्वारा राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान से संबंधित जारी निर्देशों का पूर्ण अनुपालन किया गया। डीसी मंजूनाथ भजंत्री और एसएसपी राकेश रंजन ने परेड की सलामी ली तथा विभिन्न प्लाटूनों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। इस वर्ष परेड में फर्स्ट इन कमांड की जिम्मेदारी 2022 बैच के आईपीएस अधिकारी राघवेन्द्र शर्मा संभाल रहे हैं, जबकि सेकेण्ड इन कमांड परिचारी प्रवर द्वितीय अनिश मोमिन कुजूर होंगे।

14 प्लाटून और 3 बैंड पार्टियां होंगी शामिल

मोरहाबादी मैदान में होने वाले मुख्य समारोह में कुल 14 प्लाटून और 3 बैंड पार्टियां हिस्सा लेंगी। इनमें सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एसएसबी, सीआईएसएफ, ओडिशा पुलिस, झारखंड जगुआर, जैप (1, 2 और 10), रांची जिला पुलिस (महिला व पुरुष), झारखंड गृहरक्षा वाहिनी और एनसीसी (बॉयज व गर्ल्स) के प्लाटून शामिल हैं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम, निजी ड्रोन पर पूर्ण प्रतिबंध

समारोह को सुरक्षित और सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए डीसी, एसएसपी, ट्रैफिक एसपी राकेश सिंह और एडीएम (विधि-व्यवस्था) धनंजय ने अधिकारियों की संयुक्त ब्रीफिंग की। सभी अधिकारियों को समय पर अपने प्रतिनियुक्ति स्थल पर पहुंचने और जिम्मेदारियों का पालन करने के निर्देश दिए गए।

 

एसएसपी राकेश रंजन ने सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करते हुए निर्देश दिए कि सभी आगंतुकों की सघन जांच की जाए ताकि कोई अवांछित व्यक्ति या सामग्री प्रवेश न कर सके। सुरक्षा के मद्देनजर मोरहाबादी मैदान में निजी ड्रोन से फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है, केवल अधिकृत विभाग ही ड्रोन का उपयोग कर सकेंगे।

बलूचिस्तान में आजादी के जश्न से नाराज पाकिस्तान ने आधी रात को कर दी एयरस्ट्राइक, 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत: Balochistan Independence Day

बलूचिस्तान में आजादी के जश्न से नाराज पाकिस्तान ने आधी रात को कर दी एयरस्ट्राइक,  9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत: Balochistan Independence Day

बलूचिस्तान के सुराब इलाके के गोंधान गांव में पाकिस्तानी सेना की कथित एयरस्ट्राइक से हड़कंप। आजादी के जश्न के बीच आधी रात हुए इस कायराना हमले में 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत की खबर। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

बलूचिस्तान से एक बेहद दर्दनाक और आक्रोश पैदा करने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पाकिस्तानी सेना और बलोच जनता के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव को एक बार फिर चरम पर पहुंचा दिया है। दावा किया जा रहा है कि बलूचिस्तान में आजादी का जश्न मना रहे आम नागरिकों पर पाकिस्तानी सेना ने आधी रात को एयरस्ट्राइक कर दी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बलूचिस्तान के सुराब इलाके में स्थित गोंधान गांव (Gondhan Village) को निशाना बनाकर यह कायराना हवाई हमला किया गया।

रात के अंधेरे में तबाही: 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 की मौत का दावा
स्थानीय सूत्रों और बलोच कार्यकर्ताओं के दावों के मुताबिक, आधी रात को जब ग्रामीण अपने घरों में मौजूद थे, तब पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने गोंधान गांव पर बमबारी शुरू कर दी। अचानक हुए इस हमले से इलाके में अफरा-तफरी मच गई और कई मकान जमींदोज हो गए।

कुल मौतें: शुरुआती दावों में 28 लोगों की जान जाने की बात कही जा रही है।

मासूम शिकार: मृतकों में 9 मासूम बच्चे और 7 महिलाएं शामिल हैं।

घायल: इस भीषण हमले में 17 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं।

यदि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो यह पाकिस्तान सरकार और उसकी सेना द्वारा आम नागरिकों के खिलाफ किए गए सबसे भीषण मानवाधिकार उल्लंघनों में से एक माना जाएगा। हालांकि, संघर्ष प्रभावित और दूरदराज के क्षेत्रों में मीडिया की सीमित पहुंच के कारण हताहतों की सटीक संख्या की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार है।

आम गांव को क्यों बनाया निशाना?
इस सैन्य कार्रवाई के बाद गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं:
क्या पाकिस्तानी सेना ने केवल स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहे निहत्थे नागरिकों को अपनी बौखलाहट का शिकार बनाया?
क्या किसी प्रतिबंधित संगठन के खिलाफ सैन्य अभियान के नाम पर आम बलोच नागरिकों को निशाना बनाया गया?
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का बहाना बनाकर अक्सर बलोच आम जनता को प्रताड़ित किया जाता रहा है।

बलूचिस्तान में असंतोष की जड़ें: आखिर क्यों जल रहा है बलूचिस्तान?
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो प्राकृतिक संसाधनों (गैस, खनिज और तेल) से समृद्ध होने के बावजूद आर्थिक रूप से सबसे पिछड़ा हुआ है। दशकों से बलोच जनता पाकिस्तान के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रही है। असंतोष की मुख्य वजहें निम्न हैं:

संसाधनों का दोहन: बलोच राष्ट्रवादियों का आरोप है कि पंजाब केंद्रित पाकिस्तान सरकार उनके प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करती है, लेकिन स्थानीय लोगों को इसका लाभ नहीं मिलता।

सुरक्षा बलों का अत्याचार: 'मिसिंग पर्सन्स' (जबरन गायब किए गए लोग) बलूचिस्तान की एक विकराल समस्या है। मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि हजारों बलोच युवाओं को सेना उठाकर ले गई है, जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिला।

राजनीतिक अधिकारों का हनन: बलोच समुदाय लगातार स्वायत्तता, रोजगार और बुनियादी विकास की मांग करता रहा है, जिसे इस्लामाबाद हमेशा बलप्रयोग से दबाता आया है।

जनरल आसिम मुनीर और पाक सेना की भूमिका पर सवाल
बलूचिस्तान में बिगड़ते हालात के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि बलोच विद्रोह और असंतोष को बातचीत के जरिए सुलझाने के बजाय सैन्य बल के कठोर इस्तेमाल से कुचला जा रहा है, जिससे स्थिति सुधरने की जगह और अधिक विस्फोटक होती जा रही है।

सुराब के गोंधान गांव में हुई यह घटना पाकिस्तान के लिए एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक संकट बन सकती है। विश्व समुदाय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों से मांग की जा रही है कि वे इस कथित एयरस्ट्राइक की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराएं, ताकि बेकसूर बच्चों और महिलाओं की मौत का सच दुनिया के सामने आ सके।

80 साल बाद भी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां जापान में क्यों हैं? सुप्रीम कोर्ट में नेताजी की अस्थियों को लेकर दायर की गई याचिका

भारत 15 अगस्त को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है, ऐसे में देश के सबसे मशहूर स्वतंत्रता सेनानियों में से एक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस चर्चा में आ गए हैं। दरअसल, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से बोस की बेटी अनीता बी. फाफ की उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें टोक्यो के रेनकोजी मंदिर से उनकी “अस्थियां” वापस लाने के लिए निर्देश देने की मांग की गई है।

हालांकि अगस्त 1945 में नेताजी के गायब होने को लेकर कई तरह की बातें कही जाती रही हैं, लेकिन कुछ रिपोर्टों में यह संकेत दिया गया है कि उनके अवशेष जापान के टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर में सुरक्षित रखे गए हैं। लेकिन, बोस की अस्थियां जापान में क्यों रखी गई हैं? आइए, हम आपको बताते हैं।

नेताजी की अस्थियां कहां हैं?

आम तौर पर यह माना जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत ताइवान में एक विमान दुर्घटना में हुई थी। 2017 में जारी एक RTI के जवाब में बताया गया था कि शाह नवाज कमेटी, जस्टिस जीडी खोसला कमीशन और जस्टिस मुखर्जी जांच आयोग की रिपोर्टों पर विचार करने के बाद, सरकार इस नतीजे पर पहुंची थी कि नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में हुई थी।

आधिकारिक बयानों के अनुसार, यह माना जाता है कि बोस की मौत 18 अगस्त 1945 को हुई थी। बयानों में यह भी बताया गया है कि दुर्घटना के बाद बोस बुरी तरह जल गए थे और दो दिन बाद उनकी मौत हो गई। ताइवान में उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया गया और उनकी अस्थियां जापान लाई गईं, जहां टोक्यो इंडियन इंडिपेंडेंस लीग को उनकी अस्थियों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई। आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, एक श्रद्धांजलि सभा के बाद 14 सितंबर 1945 को उन्हें रेनकोजी मंदिर में रखा गया था।

अवशेषों वाला कलश मंदिर के पुजारी रेवरेंड क्योई मोचिज़ुकी को सौंपा गया था, जिन्होंने उन्हें तब तक सुरक्षित रखने का वादा किया था जब तक कि उन्हें वापस भारत न ले जाया जा सके। दशकों बाद भी, वह वादा नेताजी से जुड़े रहस्य का अहम हिस्सा बना हुआ है।

हर साल नेताजी की पुण्यतिथि पर, रेनकोजी मंदिर में उनके सम्मान में एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है। इस समारोह में भारतीय दूतावास के अधिकारियों सहित कई प्रमुख जापानी और भारतीय नागरिक शामिल होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत मंदिर में नेताजी के अवशेषों की देखभाल का खर्च भी उठाता रहा है?

सरकार द्वारा 2016 में जारी की गई नेताजी से जुड़ी सार्वजनिक की गई फाइलों के अनुसार, भारत ने 1967 और 2005 के बीच उनकी देखभाल के लिए मंदिर को 52,66,278 रुपये का भुगतान किया था।

नेताजी के परिवार का क्या कहना है?

पिछले कुछ वर्षों में, नेताजी के परिवार के कई सदस्यों – जिनमें उनके भाई, बेटी और अन्य शामिल हैं – ने भारत सरकार से अनुरोध किया है कि वह नेताजी की अस्थियों को जापान से वापस लाए। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, बोस के छोटे भाई ने 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर उनकी अस्थियों को वापस लाने का आदेश देने का अनुरोध किया था।

इसी तरह, मई 1990 में बोस के भतीजों – अशोक नाथ बोस, अमिया नाथ बोस और सुब्रत बोस – ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह को पत्र लिखा था। 2007 में, नेताजी की बेटी फाफ ने डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर पूछा था कि भारतीय सरकार उनके पिता के अवशेषों को वापस लाने की प्रक्रिया में किस तरह शामिल होने का इरादा रखती है।

बोस के प्रपौत्र और लेखक आशीष रे ने 2018 में पीटीआई को बताया, “नेहरू सरकार से लेकर मोदी सरकार तक, भारत की हर सरकार सच्चाई से वाकिफ रही है, लेकिन उसने अवशेषों को भारत लाने की बात कही है।” गौरतलब है कि बोस के परिवार ने लगातार सरकारों से उनकी अस्थियों को भारत वापस लाने का आग्रह किया है। कई दशकों के दौरान, विभिन्न सरकारों ने भी उनके अवशेषों को वापस लाने के प्रयास किए हैं।

Independence Day 2026: 15 अगस्त को प्रधानमंत्री लाल किले पर क्यों फहराते हैं तिरंगा? इस साल देश मनाएगा 80वां स्वतंत्रता दिवस

Independence Day 2026: हर साल 15 अगस्त को, भारत के प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा फहराते हैं। यह पल अंग्रेजों से लंबे संघर्ष के बाद मिली आजादी को याद दिलाता है और देश को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए एक करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ही क्यों झंडा फहराते हैं, जबकि राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस पर इसे फहराते हैं? दोनों समारोह एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन ये आजाद भारत के इतिहास में दो अलग-अलग मील के पत्थर हैं।

स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त को, प्रधानमंत्री लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी को, राष्ट्रपति कर्तव्य पथ पर तिरंगा फहराते हैं। अंतर इस बात में है कि दोनों दिन क्या दर्शाते हैं: 1947 में भारत की स्वतंत्रता और 1950 में संविधान को अपनाना।

स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री झंडा क्यों फहराते हैं?

15 अगस्त वह दिन है जब भारत 1947 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र हुआ था। लाल किले पर झंडा फहराने का समारोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ लंबे संघर्ष के बाद भारत की स्वतंत्रता को दर्शाता है। आजाद भारत में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में लाल किले के लाहौरी गेट के ऊपर राष्ट्रीय झंडा फहराया था। तब से, प्रधानमंत्री पारंपरिक रूप से स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं। प्रधानमंत्री झंडे के खंभे के नीचे से झंडा फहराते हैं, जिसके बाद राष्ट्रगान होता है। यह समारोह स्वतंत्रता दिवस की मुख्य परंपराओं में से एक है और पूरे देश में इसे देखा जाता है।

गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति फहराते हैं तिरंगा

गणतंत्र दिवस आजाद भारत के इतिहास में एक अलग महत्वपूर्ण पल का प्रतीक है। 26 जनवरी, 1950 को, भारत का संविधान लागू हुआ, जिसने भारत सरकार अधिनियम, 1935 की जगह ली, और भारत एक गणतंत्र बन गया। यह दिन संविधान को अपनाने की याद में मनाया जाता है और हर साल भारत के राष्ट्रीय कार्यक्रमों में से एक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर, राष्ट्रपति कर्तव्य पथ पर राष्ट्रीय झंडा फहराते हैं। झंडा पहले से ही झंडे के खंभे के ऊपर बंधा होता है और समारोह के दौरान इसे फहराया जाता है। इस आयोजन के बाद रिपब्लिक डे परेड होती है, जिसमें भारत की संस्कृतिक विविधता, सैन्य ताकत और नेशनल अचीवमेंट्स को दिखाया जाता है।

दोनों आयोजनों में मूल अंतर

15 अगस्त और 26 जनवरी दोनों ही राष्ट्रीय दिवस हैं, जिनका भारत के इतिहास में अहम स्थान है। हर साल 15 अगस्त को मनाया जाने वाला स्वतंत्रता दिवस 1947 में ब्रिटिश राज से भारत की आजादी का प्रतीक है। वहीं, 26 जनवरी को मनाया जाने वाला गणतंत्र दिवस देश में एक संविधान लागू होने की घटना का प्रतीक है।

15 अगस्त को प्रधानमंत्री का झंडा फहराने का समारोह देश की आजादी और उसके लिए हुए संघर्ष से जुड़ा है। 26 जनवरी को राष्ट्रपति का झंडा फहराने का समारोह भारत की संवैधानिक और गणतंत्र पहचान से जुड़ा है।

Independence Day 2026: स्वतंत्रता दिवस पर सबसे पहले किसने लाल किले पर फहराया था तिरंगा? जानें इतिहास में दर्ज इस घटना के बारे में

Independence Day 2026: स्वतंत्रता दिवस पर सबसे पहले किसने लाल किले पर फहराया था तिरंगा? जानें इतिहास में दर्ज इस घटना के बारे में

Independence Day 2026: हमारा देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ था। लंबे संघर्ष के बाद मिली आजादी से सभी उत्साहित थे। यह उत्साह आजादी के 79 साल पूरे होने के बाद आज भी कायम है। इस साल 15 अगस्त 2026 को भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराकर आजादी के जश्न की शुरुआत करेंगे। नई दिल्ली स्थित लाल किले पर झंडा फहराना एक ऐसी परंपरा है, जो 1947 के पहले से चली आ रही है। आइए आज जानें कि लाल किले पर पहली पर किसने 15 अगस्त को तिरंगा फहराया था।

इतिहास के पन्नों से

आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को पहली बार लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। तब से लाल किले पर तिरंगा फहराना भारतीय स्वतंत्रता और हमारे गौरव का प्रतीक बन गया है। भारत को 15 अगस्त, 1947 को आधी रात को आजादी मिली थी, लेकिन लाल किले पर झंडा 16 अगस्त, 1947 को सुबह 8:30 बजे फहराया गया था। 15 अगस्त, 1947 को आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस पर, मुख्य झंडा फहराने की रस्म आधी रात को कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली (बाद में संसद भवन) में हुई थी। इसके बाद शाम को इंडिया गेट के पास एक और रस्म हुई। लाहौरी गेट की प्राचीर से नेहरू के भाषण ने भारत के सालाना स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए एक मिसाल कायम की, जहां प्रधानमंत्री हर 15 अगस्त को राष्ट्रीय झंडा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं।

सबसे ज्यादा बार पंडित नेहरू ने फहराया तिरंगा

पंडित नेहरू ने 1947 से 17 बार लाल किले पर झंडा फहराया है, जो हमारी स्वतंत्रता के 79 सालों में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा सबसे ज्यादा बार फहराया गया है। इस मामले में उनकी बेटी इंदिरा गांधी दूसरे नंबर पर हैं, जिन्होंने 16 बार तिरंगा फहराया है। इसके बाद, श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छह बार लाल किले पर झंडा फहराया है, उनके बाद राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव – पांच-पांच बार, लाल बहादुर शास्त्री ने 1964 और ’65 में, मोरारजी देसाई ने 1977 और ’78 में, चरण सिंह ने 1979 में, श्री वीपी सिंह – 1990 में, श्री एचडी देवेगौड़ा – 1996 में और श्री इंद्र कुमार गुजराल – 1997 में।

चंद्रशेखर ने कभी नहीं फहराया लाला किले पर झंडा

दिलचस्प बात यह है कि गुलजारी लाल नंदा ने, अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर अपने दो छोटे कार्यकाल में, चंद्रशेखर के अलावा कभी झंडा नहीं फहराया। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह 15 अगस्त, 2007 को 10 बार लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इसके बाद वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अब तक 12 बार तिरंगा फहरा चुके हैं। इस साल देश के स्वाधीनता दिवस की 80वीं वर्षगांठ पर वह 13वीं बार ध्वजारोहण करेंगे।

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Balochistan: 11 अगस्त को आजादी मनाने के बाद अब ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ का पासपोर्ट-करेंसी वाला दांव! क्या ये है अगला कदम

Balochistan News: बलूच अलगाववादी आंदोलन एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। 11 अगस्त को ‘बलूचिस्तान स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाने के बाद बलूच नेतृत्व ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की मांग तेज कर दी है। बलूच अलगाववादी नेता मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बयान जारी कर वैश्विक बिरादरी, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और देशों से अपील की है कि वे बलूचिस्तान को पाकिस्तान का प्रांत कहना, लिखना और मानना तुरंत बंद करें। इसे एक संप्रभु राष्ट्र का दर्जा दें।

अंतरराष्ट्रीय मान्यता की मांग और वैश्विक मंचों से अपील

मीर यार बलूच ने अपने बयान में कहा कि बलूचिस्तान का स्वतंत्रता आंदोलन अब केवल ऐतिहासिक दिवस मनाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह राजनयिक और राजनीतिक मान्यता हासिल करने के एक नए चरण में पहुंच चुका है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र, आसियान, अफ्रीकी संघ, इस्लामिक सहयोग संगठन और यूरोपीय देशों के सदस्य राष्ट्रों से इस मुहिम का समर्थन करने की अपील की है।

बयान में कहा गया है कि बलूच जनता के प्रति नैतिक समर्थन जारी रहना चाहिए ताकि बलूचिस्तान की धरती से पाकिस्तान जैसे संकट को पूरी तरह खत्म किया जा सके। इसके साथ ही बलूच राजनीतिक नेतृत्व के अलग-अलग धड़ों को एकजुट करने के प्रयास भी तेजी से किए जा रहे हैं।

भारतीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का आभार

बलूच अलगाववादी नेता ने बलूचिस्तान के मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों खासकर भारतीय मीडिया, शोधकर्ताओं और थिंक टैंकों का दिल से आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थाओं ने बलूचिस्तान की आवाज को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने और बलूच जनता का पक्ष उजागर करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पासपोर्ट, करेंसी और संप्रभु संस्थानों के गठन का रोडमैप

बलूच नेतृत्व द्वारा साझा की गई योजना के मुताबिक भविष्य का स्वतंत्र बलूचिस्तान एक पूर्ण संप्रभु राष्ट्र के रूप में जाना जाएगा। आने वाले समय में रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान अपना खुद का पासपोर्ट जारी करेगा और अपनी राष्ट्रीय करेंसी लॉन्च करेगा। प्रस्तावित गणराज्य अपने खुद के मीडिया संगठन, व्यापार और वाणिज्य संस्थान और विभिन्न देशों में राजनयिक मिशन स्थापित करेगा। नया बलूच राष्ट्र अपनी विदेश नीति, रक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और संपूर्ण कूटनीति की जिम्मेदारी स्वयं संभालेगा।

11 अगस्त की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके महत्व को भी जानिए

11 अगस्त का दिन बलूच राष्ट्रवादियों के लिए काफी ऐतिहासिक माना जाता है। मीर यार बलूच के मुताबिक ब्रिटिश भारत के विभाजन से ठीक पहले 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान (कलात रियासत) ने खुद को एक स्वतंत्र और संप्रभु देश घोषित किया था। बलूच अलगाववादी समूह इसी तारीख को अपने मूल स्वतंत्रता दिवस के रूप में मानते आए हैं और अब उनका मुख्य ध्यान इसी आधार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक मान्यता हासिल करने पर केंद्रित है।

पाकिस्तानी सेना की पाबंदियां और ब्लैकआउट के दावे

बलूच नेता ने आरोप लगाया कि 11 अगस्त के स्वतंत्रता समारोहों को रोकने के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों और सैन्य बलों ने कड़े प्रतिबंध लगाए थे। बयान में दावा किया गया कि कलात, क्वेटा और खुजदार सहित राज्य के कई हिस्सों में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह निलंबित कर दी गईं।

सैन्य छावनियों और पुलिस स्टेशनों के आसपास गहरी खाइयां खोदी गईं और पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर व ड्रोन लगातार निगरानी करते रहे। अलगाववादी समूह ने दावा किया कि इन तमाम पाबंदियों और इंटरनेट ब्लैकआउट के बावजूद बलूचिस्तान के विभिन्न हिस्सों में समर्थकों ने स्वतंत्रता दिवस मनाया। हालांकि इंटरनेट सेवा बंद होने की वजह से तस्वीरों, वीडियो और रिपोर्टों के सामने आने में देरी हुई। वैसे बलूच नेता के इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी है।

आपको बता दें कि बलूच नेतृत्व ने बलूचिस्तान को संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र बताते हुए कहा कि प्रस्तावित गणराज्य वैश्विक स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय पहलों में बड़ा योगदान देने में सक्षम है। उनका कहना है कि स्वतंत्र बलूचिस्तान अंतरराष्ट्रीय निवेश को आकर्षित करेगा और अपने राजनीतिक, आर्थिक व कूटनीतिक संस्थानों का तेजी से विकास करेगा।

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बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। यहां दशकों से अलगाववादी आंदोलन चल रहा है। इस क्षेत्र में जबरन गुमशुदगी, मानवाधिकार उल्लंघन और सैन्य कार्रवाई के आरोप लगातार लगते रहे हैं। दूसरी ओर पाकिस्तानी अधिकारी अलगाववादी मांगों को खारिज करते हुए बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अभिन्न अंग मानते हैं और वहां सक्रिय सशस्त्र समूहों को सुरक्षा के लिए खतरा करार देते हैं।

Balochistan Independence Day: 11 अगस्त को ही आजादी सेलिब्रेट करने वाला था बलूचिस्तान, जानिए आज ही के दिन वहां क्या क्या हुआ

Balochistan Independence Day: पाकिस्तान के बलूचिस्तान में आज यानी 11 अगस्त को ‘आजादी दिवस’ मनाए जाने को लेकर एक बार फिर अलग देश की मांग तेज हो गई है। बलूचिस्तान में आज यानी 11 अगस्त को ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाया जा रहा है। इस मौके पर ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग की है कि बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र देश के तौर पर कानूनी, राजनीतिक और कूटनीतिक मान्यता दी जाए।

बलोच नेता मीर यार बलोच ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी जाए। इस मौके पर बलूच नेता ने पाकिस्तान पर दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप भी लगाए हैं।

X पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा, “बलूचिस्तान के छह करोड़ लोग हर साल 11 अगस्त को अपना राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। आज हम उस मुकाम पर पहंच गए हैं जहां हम सिर्फ अपनी आजादी का जश्न ही नहीं मनाते। बल्कि दुनिया से यह मांग भी करते हैं कि बलूचिस्तान की आजादी को कानूनी, राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक रूप से मान्यता दी जाए। आजादी के इस पवित्र अवसर पर बलूचिस्तान में रहने वाले बलोच, पश्तून, हिंदू, सिख, ईसाई और सभी धर्मों के भाइयों और बहनों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।”

भारत का किया जिक्र

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान गणराज्य दुनिया के और खासकर भारत के बहादुर मुख्यधारा के मीडिया, थिंक टैंक, शोधकर्ताओं, कवियों, लेखकों, छात्रों, वकीलों, नागरिक समाज, व्यापारिक समुदाय, धार्मिक नेताओं, सांसदों और उन सभी भाइयों और बहनों का दिल से आभार व्यक्त करता है जिन्होंने बलोचिस्तान की आवाज को वैश्विक स्तर पर पहुंचाया और हमारे लोगों की आवाज बने। बलूचिस्तान के लोगों को नैतिक समर्थन मिलना जारी रहना चाहिए ताकि हम अपनी जमीन, बलूचिस्तान से पाकिस्तान रूपी कैंसर को हटा सकें।”

50 हजार बलोच पाकिस्तान में कैद

बलूचिस्तान में आजादी को दबाने के पाकिस्तान के प्रयासों की कड़ी निंदा करते हुए मीर यार बलोच ने दावा किया कि 50 हजार से ज्यादा बलोच अभी भी पाकिस्तान की यातना कोठरियों में अमानवीय अत्याचार सह रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम उन्हें कभी नहीं भूलेंगे। आज की आजादी की सफलता हमारे महान शहीदों, हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं और कैदियों के अमर बलिदानों की वजह से मिली है।”

बलूचिस्तान में कुर्बानियों के मजबूत इतिहास को याद करते हुए उन्होंने कहा, “बलूचिस्तान के लोगों ने हमेशा विदेशी हमलावरों को रोका है। उन्हें बलूचिस्तान से पीछे हटने पर मजबूर किया है। पाकिस्तान के पास भले ही हजारों टैंक, सैकड़ों लड़ाकू विमान, तोपखाने और एक बड़ी सेना हो, फिर भी शारीरिक, मानसिक और लड़ने की क्षमता के मामले में बलूचिस्तान की सेना पाकिस्तान की सेना से 10 गुना ज्यादा ताकतवर और सफल है।

बलूचिस्तान की सेना एक मजबूत फोर्स है जो हर स्थिति का सामना करने में सक्षम है। दुनिया की पेशेवर सेनाओं से मुकाबला करने के लिए तैयार है। बलूचिस्तान के इलाके को देखते हुए एक बड़ी सेना की जरूरत है। इसलिए बलूचिस्तान गणराज्य ने पांच लाख सैनिकों की सेना तैयार की है।”

11 अगस्त को ही क्यों चुना अपनी ‘आजादी’ का दिन?

जब बलूचिस्तान ने 11 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित किया, तो ‘वर्ल्ड पीस यूनाइटेड’ के एम्बेसडर डॉ. परविंदर सिंह ने कहा, “1947 में जब अंग्रेज भारत से गए, तो पाकिस्तान और बांग्लादेश अपने मौजूदा रूप में मौजूद नहीं थे। लेकिन बलूचिस्तान मौजूद था। उसने 11 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से अपनी आजादी का ऐलान किया था। अगर बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी का जश्न मनाना चाहते हैं, तो उन्हें इसकी इजाजत मिलनी चाहिए। इसे विश्व शांति की दिशा में एक कदम के तौर पर देखा जाना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान की ज़मीन खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों, जैसे सोना और कीमती पत्थरों से बहुत समृद्ध है। अगर बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो जाता है, तो पाकिस्तान को अपने आर्थिक आधार का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा गंवाना पड़ सकता है, क्योंकि यह इलाका चीन और दूसरे देशों को खनिजों के निर्यात का मुख्य स्रोत है।”

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान का हाथ से निकलना पाकिस्तान के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगा। यही वजह है कि पाकिस्तान उस पर से अपना नियंत्रण नहीं छोड़ना चाहता। आज 56 से ज्यादा देश बलूचिस्तान की आजादी का समर्थन करते हैं। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। एक ऐसा दौर जिसमें टकराव और जबरदस्ती से अब कोई नतीजा नहीं निकलता।”

दुनिया भर में मनाया गया आजादी का जश्न

मंगलवार को बलूचिस्तान ने अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस मनाया। यह एक वार्षिक परंपरा का हिस्सा है, जिसे कई बलूच मानवाधिकार संगठन पाकिस्तान की ओर से क्षेत्र के ‘अवैध कब्जे’ के विरोध के रूप में देखते हैं। बलूच स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक जड़ें 1947 तक जाती हैं, जब ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद कलात रियासत ने कुछ समय के लिए खुद को स्वतंत्र घोषित किया था। हालांकि, 1948 में पाकिस्तान ने इस क्षेत्र का विलय कर लिया, जिसका बलूच राष्ट्रवादी समूह लगातार विरोध करते रहे हैं।

सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म X पर मीर यार बलूच ने आरोप लगाया कि ‘कब्जा करने वाली’ पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान में व्यापक प्रतिबंध लगाए हैं। उनके अनुसार, राष्ट्रीय आयोजनों को रोकने के लिए 7 अगस्त से 30 अगस्त तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखने का फैसला किया है। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती, सैन्य संसाधनों या हवाई शक्ति के इस्तेमाल के बावजूद पाकिस्तान बलूचिस्तान में अपनी मौजूदगी को अनिश्चित समय तक बनाए नहीं रख सकता, क्योंकि बलूच जनता का संकल्प मजबूत है।

मीर ने कहा, “बलूचिस्तान गणराज्य बलूच लोगों को उग्रवादी या अलगाववादी बताने की कोशिशों को खारिज करता है। बलूच स्वतंत्रता सेनानी बलूचिस्तान की रक्षा, सुरक्षा और सैन्य ताकत का हिस्सा हैं और उन्हें छह करोड़ बलूच लोगों का समर्थन प्राप्त है। लोग उन पर भरोसा करते हैं क्योंकि वे इसी मिट्टी के बेटे-बेटियां हैं और अपने राष्ट्र के हित में काम करते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “ये बल किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं लड़ रहे हैं और न ही अशांति या हिंसा फैलाने के लिए काम कर रहे हैं। वे अपना राष्ट्रीय कर्तव्य निभा रहे हैं, जिसमें शांति और सुरक्षा बनाए रखना, लोगों की रक्षा करना और एक शांतिपूर्ण, समृद्ध तथा विकसित बलूचिस्तान की नींव रखना शामिल है।”

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मीर ने दावा किया कि बलूच सशस्त्र समूहों की कार्रवाइयों का उद्देश्य उन नेटवर्कों को खत्म करना और बाहर निकालना है, जिन्हें वे पाकिस्तान से जुड़ा मानते हैं और जो उनके अनुसार बलूचिस्तान में अस्थिरता, असुरक्षा और हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं।

15 अगस्त पर लाल किले में दिखेगा नया इतिहास! जश्न में पहली बार दो ऐतिहासिक पल

15 अगस्त से पहले दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस समारोह की तैयारियां तेज हो गई हैं। लाल किले के पास दंगल पार्क में भारतीय सेना के जवानों ने पारंपरिक 21 तोपों की सलामी रिहर्सल की जा रही है। इस बार समारोह में ‘युवा शक्ति’, ‘विकसित भारत 2047’ और ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने को खास जगह दी जाएगी।

युवा शक्ति और Gen-Z

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इस बार लाल किले पर होने वाला स्वतंत्रता दिवस समारोह देश की युवा शक्ति और Gen-Z पर फोकस रहेगा। इसमें युवाओं की अचीवमेंट, उनकी नई सोच और देश के डेवलपमेंट में उनके योगदान को सामने रखा जाएगा। साथ ही 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के लक्ष्य में युवाओं की भूमिका को भी खास तरीके से दिखाया जाएगा। सेरेमनी में युवा अचीवर्स को स्पेशल गेस्ट के तौर पर बुलाया गया है।

स्वतंत्रता दिवस समारोह

इस साल ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे हो रहे हैं, इसलिए स्वतंत्रता दिवस समारोह में इसे खास जगह दी जाएगी। पहली बार लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से तिरंगा फहराएंगे और देश को संबोधित करेंगे।

टेक्नोलॉजी और साइंस

स्वतंत्रता दिवस समारोह में भारत की तकनीकी और वैज्ञानिक अचीवमेंट को भी दिखाया जाएगा। न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी, स्पेस और मॉडर्न टेक्निक सेक्टर में देश ने जो प्रगति की है, उसकी झलक विजुअल्स के जरिए दिखाई जाएगी। इन्विटेशन कार्ड में ‘सेवा तीर्थ’ को प्रायोरिटी दी गई है, जो पब्लिक सर्विस और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को दिखाती है।

इंटर्नशिप और डेवलपमेंट स्कीम

इस बार समारोह में देश के युवा प्रतिभाओं को खास सम्मान दिया जाएगा। इंटरनेशनल फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और मैथमैटिक्स ओलंपियाड 2026 में मेडल जीतने वाले 19 स्टूडेंट्स को सम्मानित किया जाएगा। इसके अलावा युवा इनोवेटर्स, स्टार्टअप फाउंडर्स, प्रधानमंत्री इंटर्नशिप स्कीम के इंटर्न, स्किल डेवलपमेंट स्कीम का लाभ लेने वाले और MY भारत के वॉलंटियर्स जैसे युवा अचीवर्स भी समारोह में शामिल होंगे।

जल संरक्षण

इस साल स्वतंत्रता दिवस समारोह में बैठने की जगहों के नाम भारत की प्रमुख झीलों के नाम पर रखे जाएंगे। इसका मकसद लोगों का ध्यान जल संरक्षण और पानी बचाने की जरूरत की ओर अट्रैक्ट करना है।

इस बार का स्वतंत्रता दिवस समारोह देश की परंपरा, युवाओं की ताकत और भारत की तरक्की की झलक एक साथ दिखाएगा। ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने से यह मौका और खास बन गया है। युवा प्रतिभाओं के सम्मान और देश की वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ समारोह में विकसित भारत 2047 का संदेश भी मिलेगा।