DK Shivakumar-Adani meeting: कर्नाटक में अदाणी-शिवकुमार की मुलाकात को लेकर सियासी घमासान! BJP ने कांग्रेस पर दोहरे मापदंड को लेकर साधा निशाना

DK Shivakumar-Adani meeting: दिग्गज उद्योगपति गौतम अदाणी ने रविवार 24 अगस्त को कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से मुलाकात की। दोनों के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई। मुख्यमंत्री शिवकुमार ने इस मुलाकात को एक शिष्टाचार भेंट बताया। अदाणी समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी के साथ मुलाकात को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रदेश इकाई ने सत्तारूढ़ कांग्रेस पर ‘दोहरा मापदंड’ अपनाने का आरोप लगाते हुए निशाना साधा।

सूत्रों के अनुसार, अदाणी ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ गए थे। एयरपोर्ट लौटते समय सदाशिवनगर स्थित मुख्यमंत्री आवास पर शिवकुमार से मिले। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) ने भी इसे एक शिष्टाचार भेंट बताया। यह मुलाकात हेब्बाल से सिल्क बोर्ड तक प्रस्तावित सुरंग सड़क परियोजना के बीच हुई है। सूत्रों के मुताबिक, इस परियोजना के लिए अदाणी एंटरप्राइजेज सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी के रूप में उभरी है। हालांकि, टेंडर को अभी आधिकारिक रूप से अंतिम रूप नहीं दिया गया है।

यह तत्काल पता नहीं चल सका कि शिवकुमार और अदाणी के बीच बातचीत में सुरंग सड़क परियोजना का मुद्दा उठा या मुलाकात केवल औपचारिक शिष्टाचार तक सीमित रही। शिवकुमार ने बेंगलुरु में पत्रकारों से बातचीत में कहा, “मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहली बार था जब वह (अदाणी) यहां मुझसे मिलने आना चाहते थे। वे यहां कई कारोबार कर रहे हैं। वह शिष्टाचारवश मुझसे मिलने आए थे।”

BJP हुई हमलावर

इस बीच, BJP के वरिष्ठ नेता आर अशोक ने इस मुलाकात की आलोचना करते हुए सवाल किया कि क्या कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शिवकुमार को अदाणी से मिलने की अनुमति दी थी। कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अशोक ने कहा, “कांग्रेस दिल्ली में अदाणी का विरोध करती है, जबकि कर्नाटक में उसके पक्ष में है। क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है?” उन्होंने कहा कि कर्नाटक सरकार ने अदाणी के लिए ‘लाल कालीन बिछा दी’ है।

अशोक ने शिवकुमार से राहुल गांधी को यह बताने को कहा कि अदाणी एक कारोबारी हैं। वह केवल कारोबार कर रहे हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर तंज कसते हुए अशोक ने उनसे बेंगलुरु आने और लालबाग या सैंकी टैंक में किसी पेड़ को गले लगाने को कहा जो प्रस्तावित सुरंग सड़क परियोजना से प्रभावित होंगे। BJP सुरंग सड़क परियोजना का विरोध कर रही है। भगवा पार्टी के युवा सांसद तेजस्वी सूर्या ने भी इस मुद्दे को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट का रुख किया है।

प्रियांक खड़गे की आई सफाई

कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने सीएम डीके शिवकुमार की गौतम अदाणी के साथ हुई मीटिंग का बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह उद्योगपति राज्य सरकार के लिए सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्टर है। टेंडर प्रोसेस पर कोई असर नहीं डाला गया है। खड़गे ने पत्रकारों से कहा, “हमारे लिए अदाणी एक कॉन्ट्रैक्टर हैं। वे कुछ प्रोजेक्ट्स में सबसे कम बोली लगाने वाले हैं। ये कर्नाटक सरकार के लिए अहम प्रोजेक्ट्स हैं। हमने टेंडर प्रोसेस को प्रभावित नहीं किया है। कोई भी L1 बन सकता है।”

BJP से पूछा सवाल

उन्होंने कहा कि अदाणी ग्रुप पर कांग्रेस का राजनीतिक रुख नहीं बदला है। लेकिन साथ ही कहा कि राजनीतिक मतभेदों से यह तय नहीं हो सकता कि सरकारी टेंडर की प्रक्रिया कैसे होगी। खड़गे ने कहा, “अगर अदाणी कानूनी तरीके से टेंडर हासिल करते हैं, तो ठीक है।” उन्होंने टनल रोड प्रोजेक्ट पर बीजेपी के रुख पर भी सवाल उठाया। साथ ही पूछा कि क्या विपक्ष अब भी इसका विरोध करेगा, जब अदाणी ग्रुप की एक कंपनी सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी बनकर उभरी है।

राज्य सरकार द्वारा बताई गई बोली की जानकारी के अनुसार, अदाणी एंटरप्राइजेज ने 16.75 किलोमीटर लंबे टनल रोड प्रोजेक्ट के लिए 22,267 करोड़ रुपये की बोली लगाई। यह बोली सरकार की शुरुआती अनुमानित प्रोजेक्ट लागत 17,698 करोड़ रुपये से ज्यादा है।

वहीं, शिवकुमार की अदाणी से मुलाकात पर कांग्रेस सांसद और प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, “हमने साफ तौर पर कहा है कि हम एकाधिकार के खिलाफ हैं। हम किसी उद्योगपति के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन हम हमेशा कहते हैं कि अगर किसी एक उद्योगपति का एकाधिकार हो जाए, तो यह देश के लिए अच्छा नहीं है।”

आंदोलित युवा और संवाद की आवश्यकता

आंदोलित युवा और संवाद की आवश्यकता

jharkhand student protest

युवा किसी भी राष्ट्र का वर्तमान और भविष्य होते हैं। किसी देश का युवा उसके भविष्य का निर्माता होता है। विश्व का इतिहास बताता है कि हर दौर में युवा वर्ग ने समाज को दिशा देने और व्यवस्था को चुनौती देने में केंद्रीय भूमिका निभाई है। जब कहीं भी सामाजिक बदलाव की कोई हवा चलती है उसमें युवा वर्ग हमेशा ही आगे रहता है। वह सत्ता के एकाधिकार, सामाजिक विषमता और नीतिगत जड़ता के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिरोध दर्ज करता है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज में असमानता, अन्याय या दिशाहीनता बढ़ती है, तब-तब युवाओं की ऊर्जा ने नए आंदोलनों की नींव रखी है। युवा आंदोलनों ने समाज को एक नई दिशा देने का काम भी किया है।

 

किसी भी देश की तरुणाई जिस ओर चलती है, जमाना उसी तरफ मुड़ जाता है। इस वर्ग में वह शक्ति होती है कि वह हवा का रूख मोड़ सकता है। ऐसे में इस वर्ग के साथ सतत सकारात्मक संवाद बहुत आवश्यक हो जाता है। युवा वर्ग के सवालों, उनकी समस्याओं और विचारों पर मंथन बहुत आवश्यक है। अगर उसके मन में कोई बात है तो उसे सुनना बहुत जरूरी हो जाता है। कहते भी हैं कि किसी भी समूह के भीतर अगर किसी बात को लेकर कोई सवाल या दबाव है तो उसे तुरंत राहत देना जरूरी है। उसके भीतर के तनाव या दबाव को समाप्त करना जरूरी होता है। व्यवस्था और नेतृत्व उससे संवाद कर उसे सामान्य कर सकते हैं।

 

किसी भी समूह के साथ अगर सकारात्मक संवाद किया जाए तो परिस्थितियों को परिवर्तित किया जा सकता है। दुनियाभर में अलग-अलग ट्रेंडस पर नजर रखने वाली कंपनी स्टैटिस्टा के आंकड़े बताते हैं कि बीते दो बरसों में दुनियाभर के लगभग 10 देशों में युवाओं के प्रदर्शन हुए हैं। कुछ सालों पहले सोशल मीडिया के प्रभाव से ही अरब जगत के कई देशों में अनेकों आंदोलन हुए। वहां तख्तापलट भी हुए। युवाओं के इन आंदोलनों के कारण अलग-अलग जगहों पर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, लेकिन उनमें कुछ बातें, कुछ मांगें अपने मूलस्वभाव में लगभग एक जैसी लगती हैं। और वो हैं, रोजगार के अवसर, बेहतर शिक्षा, भ्रष्टाचारमुक्त शासन व्यवस्था। जब उन्हें लगता है कि उनकी आवाज सुनी ही नहीं जा रही है तो वे सड़कों पर आंदोलित होकर उतर रहे हैं।

 

हाल ही में जेनजी प्रोटेस्ट के बाद आरएसएस प्रमुख ने एक संवाद कार्यक्रम में बातचीत के दौरान कहा कि जेन-जी की जो भी शिकायतें थीं, वो जायज थीं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन भी सहमति बनाने का एक माध्यम है और संवाद से एक सहमति का निर्माण होता है। सीजेपी के नेतृत्व वाला वह आंदोलन दिल्ली में तो खत्म हो गया। दूसरी ओर, रांची का प्रदर्शन भी सरकार के आश्वासन के बाद फिलहाल समाप्त हो गया। दरअसल, छात्र अपनी मांगों पर ठोस निर्णय चाहते हैं। 

 

भारत में दुनिया की बहुत बड़ी युवा आबादी है। देश में युवाओं के आंदोलनों का इतिहास भी अत्यंत समृद्ध रहा है। आजादी के आंदोलन के दौरान भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नायकों ने जनमानस को भी बड़े पैमाने पर आंदोलित किया। उनके विचार युवा चेतना की प्रमुख प्रेरणा बने। आजाद भारत में भी युवाओं ने समाज में अपने आंदोलनो से सुधार की मांगे रखीं। 70 के दशक में गुजरात का नवनिर्माण वाला छात्र आंदोलन हो या फिर 1974 में हुआ जेपी आंदोलन, सभी में नेतृत्व करने वाला आम छात्र अपने आंदोलन से  सत्ता में सुधार, उसमें परिवर्तन और व्यवस्था को बेहतर बनाने की मांग करता दिखता है।

 

पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम ने कहा था कि युवा ही वह शक्ति है जो दुनिया को बदल सकती है। आज युवा दुनियाभर में व्यवस्थाओं को बदलने की बात पर सड़कों पर उतर रहा है। आज के युवाओं की बेहतर बात यह है कि उनके पास ग्लोबल इन्फरमेशन का नेटवर्क है। वे हर क्षण सूचनाओं से अपडेट होते रहते हैं। मौजूदा वक्त सूचना क्रांति का है। आज का युवा हर तरह के स्मार्ट गैजेट्स और डिजिटल प्लेटफामर्स से जुड़ा हुआ है। पल-पल की जानकारी उसे स्क्रीन पर मिलती रहती है। समाज में भी व्यापक स्तर पर इस तकनीक के चलते बदलाव आए हैं।

 

आमजन अपनी राय इन डिजिटल माध्यमों में खुलकर रखते हैं। ऐसे  में युवा भी सत्ता से सवाल हो या उसके किसी काम की तारीफ करनी हो, वे खुलकर डिजिटल प्लेटफार्म पर अपनी अभिव्यक्ति देते हैं। अगर किसी तरह उनकी आवाज को दबाने का प्रयास हो या युवाओं को लगता है कि उनका दमन हो रहा है तो वे डरने के बजाय सोशल मीडिया पर धूम मचा देते हैं। रील्स, मीम्स, व्यंग्य चित्रों और गीतों के माध्यम से वे जनता और सरकार के बीच अपनी बात रखते हैं। डिजिटल सूचना के माध्यम से त्वरित प्रसार बिना किसी औपचारिक केंद्रीय नेता के भी आंदोलन बहुत तेजी से बड़े आकार में सामने आ रहे हैं। शिक्षा, रोजगार या पर्यावरण जैसे स्थानीय मुद्दे तुरंत वैश्विक संवाद का हिस्सा बन रहे हैं। 

 

अब जहां आधुनिक युवा आंदोलन लचीले और तात्कालिक प्रभाव वाले दिख रहे हैं, वहीं उनके सामने कुछ गंभीर चुनौतियां भी स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती हैं। इस दौर में साफ दिखता है कि कई आंदोलन सोशल मीडिया पर जितनी तेजी से उभार ले रहे हैं,  उतनी ही तेजी से वे बिखर भी जाते हैं। जानकार मानते हैं कि आभासी मीडिया पर विमर्श से उठ खड़े होने वाले आंदोलनों में ठोस नीतिगत बदलाव के लिए जिस तरह की निरंतरता और वैचारिक गहराई की आवश्यक होती है, उसकी अक्सर इनमें कमी पाई जाती है।

यदि युवा आंदोलनों की ऊर्जा को सकारात्मकता के साथ जोड़ा जा सके, उसमें गंभीरता, ठहराव और वैचारिक परिपक्वता, संवैधानिक मूल्यों की समझ के दायरे में रहकर अभिव्यक्ति करने जैसी बातें जुड़ सकें तो युवाओं की आवाज सत्ता को जवाबदेह बना सकती। युवा अपनी सकारात्मकता के साथ राष्ट्र के समावेशी और न्यायपूर्ण भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। इसके लिए उनसे सतत प्रभावी संवाद आवश्यक है।

ईरान होर्मुज में जहाजों से टोल वसूलेगा, संसद की मंजूरी:रियाल और पसंद की करेंसी में पेमेंट लेगा; बदले में सुरक्षा और इंश्योरेंस देगा

ईरान की संसद ने होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से टोल यानी फीस लेने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी के मुताबिक, जिन देशों के जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति होगी, उनसे समुद्री सेवाओं के बदले शुल्क लिया जाएगा। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के प्रवक्ता हसन काशकवी के मुताबिक, फीस के बदले समुद्री सेवाएं, सुरक्षा और इंश्योरेंस जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। इसके अलावा पर्यावरण संबंधी सेवाएं और खास परिस्थितियों में ईंधन भी दिया जाएगा भुगतान ईरानी रियाल या ईरान की पसंद की किसी दूसरी करेंसी में किया जा सकेगा। खबर अपडेट हो रही है…

ईरान होर्मुज में जहाजों से टोल वसूलेगा, संसद की मंजूरी:रियाल और पसंद की करेंसी में पेमेंट लेगा; बदले में सुरक्षा और इंश्योरेंस देगा

ईरान की संसद ने होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से टोल यानी फीस लेने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी के मुताबिक, जिन देशों के जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति होगी, उनसे समुद्री सेवाओं के बदले शुल्क लिया जाएगा। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के प्रवक्ता हसन काशकवी के मुताबिक, फीस के बदले समुद्री सेवाएं, सुरक्षा और इंश्योरेंस जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। इसके अलावा पर्यावरण संबंधी सेवाएं और खास परिस्थितियों में ईंधन भी दिया जाएगा भुगतान ईरानी रियाल या ईरान की पसंद की किसी दूसरी करेंसी में किया जा सकेगा। अमेरिकी वित्त मंत्री बोले- ईरान के खिलाफ आर्थिक जंग शुरू अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन अब ईरान के खिलाफ आर्थिक जंग के आखिरी दौर में पहुंच गया है। बेसेंट के मुताबिक अमेरिका का मकसद ईरान की कमाई के बड़े रास्ते बंद करना है। बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए अपनी सभी सरकारी एजेंसियों और अधिकारों का इस्तेमाल करेगा। उन्होंने इस अभियान को ‘इकोनॉमिक डी-डे’ बताया। इससे पहले ट्रम्प ने इसे किसी विरोधी देश के खिलाफ सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई बताया था और दूसरे देशों से ईरान को अलग-थलग करने में साथ देने की अपील की थी। ईरान की खाड़ी देशों को चेतावनी- अमेरिका का साथ दिया तो दुश्मन मानेंगे ईरान ने अमेरिका की आर्थिक कार्रवाई में साथ देने वाले खाड़ी देशों को चेतावनी दी है। ईरान के नए राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख मोहसिन रेजाई ने कहा कि जो देश ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने में अमेरिका का साथ देगा, उसे दुश्मन माना जाएगा।। होर्मुज को अमेरिका का इलाका बता चुके हैं ट्रम्प अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प होर्मुज स्ट्रेट को ‘न्यू यूएस टेरिटरी’ यानी नया अमेरिकी इलाका बता चुके हैं। 18 अगस्त को उन्होंने पहली बार होर्मुज पर अमेरिकी नियंत्रण की बात कही थी। इसके बाद उन्होंने रविवार को दोबारा ऐसी तस्वीर शेयर की, जिसमें होर्मुज को अमेरिकी इलाके के तौर पर दिखाया गया। जंग के बाद दो रास्तों में बंटा होर्मुज जंग शुरू होने से पहले होर्मुज को एक ही समुद्री रास्ता माना जाता था। जहाज तय रास्ते से गुजरते थे। उनका रास्ता बंदरगाह, जहाज के समझौते और सुरक्षा को देखकर तय होता था। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के बाद यहां दो अलग रास्तों की बात होने लगी। ईरानी रास्ता: यह होर्मुज के उत्तरी हिस्से में ईरान के तट के पास है। यह लारक और किश्म द्वीपों के करीब से गुजरता है और ईरान के बंदरगाहों और तेल टर्मिनलों तक जाता है। ओमानी रास्ता: यह होर्मुज के दक्षिणी हिस्से में ओमान के करीब है और ईरान के तट से दूर है। अमेरिका इसी रास्ते से जहाजों को गुजरने पर जोर देता है। अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा में चलने वाले कई कॉमर्शियल जहाज भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। ————————– ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले- होर्मुज पर जल्द अमेरिका का फुल कंट्रोल होगा:ईरान की नेवी और एयरफोर्स खत्म, उसके पास सिर्फ कुछ मिसाइल और ड्रोन बचे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अमेरिका जल्द ही होर्मुज स्ट्रेट पर पूरी तरह कंट्रोल कर लेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी हमलों में ईरान की नेवी, एयरफोर्स और मिलिट्री लीडरशिप को बहुत नुकसान हुआ है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

यमुना के बाढ़ क्षेत्र को पर्यावरणीय क्षति पहुंचाने के सभी आरोपों से आर्ट ऑफ लिविंग मुक्त, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

यमुना के बाढ़ क्षेत्र को पर्यावरणीय क्षति पहुंचाने के सभी आरोपों से आर्ट ऑफ लिविंग मुक्त, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

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नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्त्वपूर्ण एवं निर्णायक निर्णय के साथ आर्ट ऑफ लिविंग के प्रतिष्ठित 2016 वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल को लेकर लगभग एक दशक से चले आ रहे मीडिया ट्रायल और निराधार आरोपों का पटाक्षेप हो गया है। न्यायालय ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के पूर्व निर्णय को निरस्त करते हुए उससे संबंधित सभी परिणामी अंतरिम कार्रवाइयों को भी समाप्त कर दिया है।

निर्णय का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल से यमुना के बाढ़ क्षेत्र को किसी प्रकार की पर्यावरणीय क्षति नहीं हुई थी।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा जमा की गई 5 करोड़ की राशि उसे पूर्णतः वापस की जानी चाहिए। इस राशि को अनुचित रूप से ‘जुर्माना’ के रूप में प्रचारित किया गया था, जिसका उद्देश्य संस्था की प्रतिष्ठा को धूमिल करना था।

2016 का वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल एक ऐतिहासिक वैश्विक आयोजन था, जिसमें 155 से अधिक देशों की सहभागिता रही और लगभग 35 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से इसमें सम्मिलित हुए। इस विराट आयोजन की अध्यक्षता भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. सी. लाहोटी ने की थी। संयुक्त राष्ट्र के छठे महासचिव दिवंगत डॉ. बुतरस बुतरस-घाली भी इस आयोजन के सह-अध्यक्ष बनने वाले थे, किंतु दुर्भाग्यवश आयोजन से एक माह पूर्व ही उनका निधन हो गया।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पश्चात आर्ट ऑफ लिविंग के आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा: “निहित स्वार्थों से प्रेरित कुछ लोगों द्वारा उस संस्था पर निराधार आरोप लगाने का यह दुर्भाग्यपूर्ण और हास्यास्पद प्रयास अब पूरी तरह उजागर हो गया है, जो स्वयं लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के संवर्धन के लिए समर्पित भाव से कार्य करती आ रही है।”

यमुना इवेंट केस में ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ को बड़ी राहत, SC ने NGT का फैसला पलटा; ₹5 करोड़ लौटाने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के 2017 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ को दिल्ली में 2016 में हुए ‘वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल’ के दौरान यमुना के बाढ़ वाले इलाके (फ्लडप्लेन) को हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। साथ ही, कोर्ट ने दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) को निर्देश दिया कि वह संगठन द्वारा जमा किए गए 5 करोड़ रुपये के पर्यावरण मुआवजे की रकम वापस करे।

सुनवाई के दौरान जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने ‘व्यक्ति विकास केंद्र इंडिया’ की अपील को मंजूरी दे दी। यह ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ से जुड़ा एक रजिस्टर्ड पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सीधा सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल और यमुना के बाढ़ क्षेत्र को हुए नुकसान के बीच सीधा संबंध था। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था को पर्यावरण को हुए नुकसान के लिए पूरी तरह जिम्मेदार तभी ठहराया जा सकता है, जब उसके कथित काम और पर्यावरण को हुए नुकसान के बीच सीधा और स्पष्ट संबंध साबित हो।

कोर्ट ने यह भी पाया कि NGT ने अपील करने वाले को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं दिया था और जरूरी जानकारी को नजरअंदाज किया था। कोर्ट ने ध्यान दिया कि कार्यक्रम स्थल पहले से ही जर्जर हालत में था।

सुप्रीम कोर्ट ने DDA की आलोचना की

‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ को राहत देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने यमुना के सक्रिय बाढ़-मैदान (फ्लडप्लेन) पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति देने के लिए DDA की आलोचना की।

कोर्ट ने कहा, “जिस तरह से DDA ने यमुना के सक्रिय बाढ़-मैदान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी, वह गलत था।”

कोर्ट ने पाया कि DDA बाढ़-मैदान की सुरक्षा की अपनी कानूनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा और उस इलाके के लिए जिम्मेदार अथॉरिटी के तौर पर उस पर किए गए भरोसे का उल्लंघन किया।

हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि अपील में DDA द्वारा दी गई अनुमति की वैधता कोई मुद्दा नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने DDA को NGT के निर्देशों के अनुसार यमुना बाढ़-मैदान के पुनर्वास का काम जारी रखने का निर्देश दिया। कोर्ट ने देखा कि पुनर्वास का काम पहले ही शुरू हो चुका था और इसे जारी रखने का आदेश दिया।

5 करोड़ रुपये का मुआवजा कैसे तय हुआ

NGT ने दिसंबर 2017 में ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ पर 5 करोड़ रुपये का पर्यावरण मुआवजा लगाया था। यह मुआवजा 11 से 13 मार्च, 2016 तक हुए ‘वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल’ की तैयारियों के दौरान फ्लडप्लेन (नदी के किनारे की जमीन) को हुए नुकसान के लिए लगाया गया था।

फेस्टिवल के पहले दिन, यानी 11 मार्च को, आयोजकों ने NGT से पूरी रकम जमा करने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा। ट्रिब्यूनल ने उस दिन शुरुआती तौर पर 25 लाख रुपये जमा करने की इजाजत दी और बाकी बचे 4.75 करोड़ रुपये जमा करने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया।

संगठन ने 25 लाख रुपये जमा कर दिए। इसके बाद उसने NGT से अनुरोध किया कि बाकी 4.75 करोड़ रुपये को भुगतान के बजाय बैंक गारंटी के रूप में स्वीकार किया जाए। संगठन ने यह भी प्रस्ताव दिया कि इस रकम का इस्तेमाल इलाके में बायोडायवर्सिटी पार्क बनाने के लिए किया जाए।

बाद में पूरी 5 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि जमा कर दी गई। इसके बाद व्यक्ति विकास केंद्र ने NGT के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

कर्नाटक जमीन अतिक्रमण मामला

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने के कुछ हफ्ते बाद आया है, जिसमें ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’, उससे जुड़ी संस्थाओं और अन्य लोगों पर बड़े पैमाने पर जमीन पर कब्जा करने के आरोपों की जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाने का सरकारी आदेश दिया गया था।

3 अगस्त को जस्टिस ई.एस. इंदिरेश ने ‘वेद विज्ञान महा विद्या पीठ ट्रस्ट’ (जो ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ से जुड़ी संस्था है) की याचिका पर एक अंतरिम आदेश पारित किया। इस ट्रस्ट ने SIT बनाने के 17 जुलाई, 2026 के सरकारी आदेश को चुनौती दी थी।

SIT को कग्गलिपुरा गांव के सर्वे नंबर 46 और आस-पास के इलाकों में कथित कब्जे की जांच का काम सौंपा गया था। इसमें कई अधिकारी शामिल थे, जिनमें बेंगलुरु डिवीजन के रीजनल कमिश्नर और रेवेन्यू डिपार्टमेंट के कानूनी सलाहकार के तौर पर काम कर रहे एक रिटायर्ड जिला जज शामिल थे।

SIT के खिलाफ तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट श्रीरंगा एस. ने तर्क दिया कि ट्रस्ट और ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ ने अपनी जमीन की ‘पोडी’ और ‘हुदबस्त’ (यानी सीमा तय करने और सर्वे) के लिए कई बार रेवेन्यू अधिकारियों से संपर्क किया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

याचिकाकर्ता ने कहा कि बिना जमीन की सीमाएं तय किए और कानून के मुताबिक संयुक्त सर्वे कराए सरकार यह नहीं कह सकती कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हुआ है।

एडवोकेट सुमना नागानंद के जरिए दायर याचिका में SIT बनाने के कानूनी आधार को चुनौती दी गई। इसमें तर्क दिया गया कि कर्नाटक लैंड रेवेन्यू एक्ट, 1964 की धारा 195 सरकारी अधिकारियों को अपनी शक्तियां दूसरों को सौंपने की इजाजत तो देती है, लेकिन SIT बनाने का अधिकार नहीं देती।

याचिका में ‘कर्नाटक लैंड ग्रैबिंग प्रोहिबिशन एक्ट, 2011’ की धारा 8 का भी हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि यह कानून को लागू करने और उसका कामकाज देखने के लिए तहसीलदार के पद से नीचे के अधिकारी की नियुक्ति की इजाजत तो देता है, लेकिन सरकार को कोई जांच एजेंसी बनाने का अधिकार नहीं देता।

याचिकाकर्ता ने SIT में ‘शिरास्तेदारों’ (Shirastedars) को शामिल करने पर भी आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि कानून तहसीलदार के पद से नीचे के अधिकारियों की नियुक्ति की इजाजत नहीं देता। साथ ही, एक रिटायर्ड जिला जज को “लिटिगेशन मैनेजमेंट कंसल्टेंट” के तौर पर नियुक्त करने पर भी सवाल उठाए गए।

उचित प्रक्रिया पर सवाल

याचिका में दलील दी गई कि कर्नाटक लैंड ग्रैबिंग प्रोहिबिशन एक्ट के तहत बनाई गई विशेष अदालत के पास जमीन अतिक्रमण के मामलों पर सुनवाई शुरू करने का अधिकार है। इसके बावजूद सरकार ने उस अदालत में कार्रवाई शुरू किए बिना ही SIT का गठन कर दिया।

याचिका में रीजनल कमिश्नर अमलान आदित्य बिस्वास को SIT का प्रमुख बनाए जाने पर भी सवाल उठाया गया। सरकार के आदेश में बिस्वास की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया था। उन्होंने 7 जुलाई को सरकार को पत्र लिखकर कहा था कि ट्रस्ट और अन्य लोगों ने प्रथम दृष्टया सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किया है।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जिस अधिकारी ने पहले ही अतिक्रमण की बात कही है, उसी को SIT का प्रमुख बनाना पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण है।

सरकार के आदेश में सितंबर 2025 में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के एक आदेश का भी हवाला दिया गया था। इस आदेश में अधिकारियों को कथित अतिक्रमण के मामले में कानून के मुताबिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इसके बाद की कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया का ठीक से पालन नहीं किया गया।

कर्नाटक हाई कोर्ट को यह भी बताया गया कि कथित जमीन अतिक्रमण के मामले में ट्रस्ट के एक पदाधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला पहले से अदालत में लंबित है।

कर्नाटक का यह मामला SIT के गठन की वैधता और जमीन से जुड़े आरोपों की जांच में राज्य सरकार की ओर से अपनाई गई प्रक्रिया से जुड़ा है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील का मामला 2016 के वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल के दौरान यमुना के बाढ़ क्षेत्र को कथित नुकसान के लिए आर्ट ऑफ लिविंग की जिम्मेदारी से जुड़ा था।

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इंदौर में आयोजित होगा राज्य स्तरीय- लक्ष्य मंथन योगासन प्रतियोगिता

इंदौर में आयोजित होगा राज्य स्तरीय- लक्ष्य मंथन योगासन प्रतियोगिता

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इंदौर। योग, स्वास्थ्य संवर्धन एवं सामाजिक चेतना के प्रसार के उद्देश्य से मध्य प्रदेश शासन के 'योग आयोग' के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में राज्य स्तरीय “लक्ष्य ‘मंथन’ योगासन प्रतियोगिता” का आयोजन किया जा रहा है।

 

आयोजन की विस्तृत कार्य योजना साझा करते हुए 'लक्ष्य पर्यावरण एवं वाटर सॉल्यूशन वेलफेयर सोसायटी' के अध्यक्ष डॉ. प्रमोद नन्दवाल ने बताया कि संस्था पर्यावरण संरक्षण, जल संवर्धन और सामाजिक जागरूकता के साथ-साथ स्वस्थ व तनावमुक्त जीवनशैली के निर्माण के लिए सतत प्रयासरत है। इसी श्रृंखला में प्रदेश की उभरती युवा प्रतिभाओं को एक सशक्त मंच प्रदान करने तथा योगासन को खेल के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने के संकल्प के साथ इस व्यापक प्रतियोगिता की रूपरेखा तैयार की गई है।

 

आयोजन के तीन चरण

डॉ. नन्दवाल ने बताया कि प्रतियोगिता को तीन चरणों में आयोजित किया जाएगा:

प्रारंभिक (क्वालिफाइंग) चरण: प्रथम एवं द्वितीय क्वालिफाइंग चरण 30 अगस्त तथा 06 सितंबर को सेंट अर्नोल्ड हायर सेकेंडरी स्कूल (स्कीम नं. 74, विजय नगर, इंदौर) में आयोजित होंगे।

फाइनल राउंड: दोनों क्वालिफाइंग चरणों से चयनित श्रेष्ठ प्रतिभागी 12 सितंबर को बास्केटबॉल कॉम्प्लेक्स, इंदौर में आयोजित होने वाले फाइनल राउंड में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे।

सहभागिता: प्रतियोगिता का स्वरूप समावेशी रखा गया है। इसमें मध्य प्रदेश के विभिन्न विद्यालयों, योग महाविद्यालयों, मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण केंद्रों, योग संस्थानों के साथ-साथ स्वतंत्र योग साधक भी सहभागिता कर सकेंगे।

yoga poster

 

आयु वर्ग एवं प्रतियोगिता की श्रेणियां

प्रतियोगिता को आयु और दक्षता के आधार पर दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है:

आयु वर्ग: 8 से 14 वर्ष तथा 14 से 20 वर्ष (बालक एवं बालिका वर्ग पृथक-पृथक)। इसके अतिरिक्त 20 वर्ष से अधिक आयु के साधकों के लिए भी 2 विशेष प्रतियोगिताओं का आयोजन रखा गया है।

व्यक्तिगत योग प्रतियोगिता: इसके अंतर्गत प्रतिभागियों को निर्धारित योग प्रोटोकॉल और पाठ्यक्रम में से चयनित कठिन आसनों का प्रदर्शन करना अनिवार्य होगा।

युगल (पेयर) योगासन प्रतियोगिता: इसमें दो प्रतिभागियों को तय नियमों, संगीत की धुन और सामूहिक तालमेल के साथ अपनी प्रस्तुति देनी होगी। यह प्रारूप प्रतिभागियों में व्यक्तिगत अनुशासन के साथ-साथ टीम भावना को भी प्रोत्साहित करेगा।

 

मूल्यांकन एवं निष्पक्षता

आयोजन की निष्पक्षता और उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए विशेष ध्यान दिया गया है:

निर्णायक मंडल: निर्णायक मंडल में राष्ट्रीय स्तर की योग निर्णायक परीक्षा उत्तीर्ण एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्णयन का अनुभव रखने वाले विशेषज्ञों को शामिल किया गया है।

वैज्ञानिक मानक: मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी तरह वैज्ञानिक एवं तकनीकी मानकों पर आधारित होगी, जिसमें आसनों की शुद्धता, शारीरिक संतुलन, लचीलापन, तकनीक, प्रस्तुति शैली एवं निर्धारित योग नियमों की सटीकता को परखा जाएगा।

सुरक्षा एवं नियम: पूरा आयोजन खेल नियमों, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए संपन्न कराया जाएगा।

yaga teacher yogasan pratiyogita

आयोजन समिति का आह्वान

आयोजन समिति के वरिष्ठ सदस्यों—डॉ. हेमंत शर्मा, श्री अनिल अग्रवाल, सुश्री रौनक सोनी, श्री प्रेम दुआ, श्री मनोज वर्मा एवं श्री चंद्रशेखर तिवारी—ने प्रतियोगिता के सफल आयोजन के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है। उन्होंने प्रदेश के विभिन्न विद्यालयों, योग संस्थानों एवं योगप्रेमियों से इसमें अधिक से अधिक संख्या में सहभागिता करने का आह्वान किया है।

 

लाइसेंस राज की छुट्टी! सरकार बदलने जा रही है कारोबार के लाइसेंस का पूरा सिस्टम, 15 साल तक बढ़ा सकती है वैलिडिटी

सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक केंद्र सरकार इस फाइनेंशियल ईयर में लाइसेंस से जुड़ी शर्तों में बड़े बदलाव करने की योजना पर काम कर रही है। इसके तहत,कई तरह के परमिट की वैलिडिटी को 15 साल तक बढ़ाया जा सकता है। कारोबारियों पर नियमों का पालन करने का बोझ कम हो सकेगा। बताते चलें कि अभी हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के किसी बिजनेस को प्रोजेक्ट के पूरे समय में केंद्र,राज्य और स्थानीय निकायों से कम से कम 60 लाइसेंस की जरूरत होती है। इनमें केंद्र-स्तर की कई मंज़ूरियां भी शामिल हैं,जैसे पर्यावरण से जुड़ी मंज़री और फ़ूड सेफ्टी लाइसेंस। इन्हें समय-समय पर रिन्यू भी करवाना पड़ता है।

नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार फ़ूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (FSSAI) के लाइसेंस को अभी हर 1 से 5 साल में रिन्यू करवाने की जरूरत होती है। सुधार की इस प्रक्रिया में पर्यावरण,ड्रग रेग्युलेशन,विस्फोटक और ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) जैसे इंडस्ट्री पर असर डालने वाले कई क्षेत्र शामिल हैं।

वार्षिक लाइसेंस शुल्क का भुगतान

इस सुधार को नॉन-फाइनेंशियल रेगुलेटरी रिफॉर्म्स पर बनी एक हाई-लेवल कमिटी आगे बढ़ा रही है। इसके हेड नीति आयोग के सदस्य और पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी राजीव गौबा हैं। इस कमिटी का गठन अगस्त 2025 में किया गया था। इसका मसद नियमों का पालन करने के बोझ को कम करने के लिए केंद्र सरकार के रेगुलेशन, सर्टिफिकेशन,लाइसेंस और परमिशन की समीक्षा करना था।

इन सुधारों के तहत अब लाइसेंस की वैधता और फीस के भुगतान के नियम अलग-अलग होंगे। सूत्रों के मुताबिक कारोबारियों को तय फीस हर साल देनी होगी,लेकिन जब लाइसेंस 10 या 15 साल के लिए मान्य होगा तो उन्हें रिन्यूअल के लिए बार-बार आवेदन नहीं करना पड़ेगा। इसका मतलब है कि कारोबारियों को सालाना फीस तो देनी होगी लेकिन उन्हें रिन्यूअल से जुड़े बार-बार होने वाले कागजी काम और प्रक्रियाओं से छुटकारा मिल जाएगा।

अभी अलग-अलग इंडस्ट्री को उनकी जरूरतों के मुताबिक अलग-अलग लाइसेंस लेने होते हैं। इस पर सरकारी सूत्रों का कहना है कि अलग-अलग लाइसेंस को एक ही लाइसेंस में मिलाने पर विचार नहीं किया जा रहा है। कारोबारियों को अभी भी अलग-अलग लाइसेंस जरूरी लाइसेंस लेने होंगे। इस कवायद का मकसद सिर्फ नियमों को आसान बनाना और अनुपालन का बोझ कम करना है।

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस पर फोकस

यह कोशिश भारत में ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस(कारोबार करने में आसानी)को बेहतर बनाने की दिशा में हो रहे प्रयासों का ही एक हिस्सा है। वर्ल्ड बैंक के ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस इंडेक्स में भारत की रैंकिंग 2014 में 142वीं थी जो 2020 में सुधरकर 63वीं हो गई। डेटा की विश्वसनीयता को लेकर चिंताओं के कारण इस इंडेक्स को बंद करने से पहले यह इसका आखिरी एडिशन था। अब भारत इस साल के आखिर में वर्ल्ड बैंक के नए बिज़नेस रेडी(B-READY) असेसमेंट में शामिल होगा।

 

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PM Surya Ghar: अब 60 सेकंड में पता चलेगा सोलर लगाने का पूरा खर्च और सब्सिडी! सरकार ने लॉन्च किया नया डिजिटल टूल

PM Surya Ghar Muft Bijli Yojana: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ को बढ़ावा देने सरकार एक बड़ा प्लान लेकर आई है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने इसके लिए एक खास डिजिटल टूल ‘Get Solar in 60 Secs’ लॉन्च किया है। इस इंटरेक्टिव प्लेटफॉर्म की मदद से देश के नागरिक अब सिर्फ 1 मिनट के भीतर अपने घर की छत पर सोलर प्लांट लगाने का पूरा गणित समझ सकते हैं।

इस योजना की शुरुआत से लेकर अब तक 50 लाख से ज्यादा घर अपनी बिजली खुद बनाने में सक्षम हो चुके हैं। इस नए डिजिटल टूल से सोलर सिस्टम लगवाने की प्रक्रिया और भी आसान हो जाएगी।

कैसे काम करता है ‘Get Solar in 60 Secs’ टूल?

इस टूल का इस्तेमाल करना बेहद आसान है। यूजर को बस कुछ बेसिक जानकारियां दर्ज करनी होंगी:

स्टेप 1: अपना नाम, फोन नंबर, राज्य और जिले का नाम चुनें।

स्टेप 2: स्लाइडर की मदद से अपने पिछले महीने का बिजली बिल और स्वीकृत लोड डालें।

स्टेप 3: इसके बाद यह टूल तुरंत आपके घर के हिसाब से सही सोलर प्लांट क्षमता (kW), लगने वाली कुल लागत, सरकार से मिलने वाली सब्सिडी और मिलने वाले बैंक लोन व उसकी ब्याज दर का पूरा हिसाब दे देगा।

यह टूल आपको जीवनभर में होने वाली अनुमानित बचत का आंकड़ा भी दिखाएगा।

व्हाट्सएप पर वेंडर्स से सीधा संपर्क और AI चैटबॉट ‘SUNtosh’

यह प्लेटफॉर्म पीएम सूर्य घर योजना के तहत रजिस्टर्ड सर्टिफाइड वेंडर्स की लिस्ट भी दिखाता है। यूजर सीधे व्हाट्सएप या कॉल के जरिए वेंडर से संपर्क करके सोलर पैनल लगवाने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।

इसके अलावा, सरकार ने हाल ही में 4 जून 2026 को ‘SUNtosh’ नाम का एक व्हाट्सएप-बेस्ड AI चैटबॉट भी लॉन्च किया है। यह चैटबॉट यूजर्स को सब्सिडी, एप्लीकेशन प्रोसेस और आम समस्याओं के हल की रियल-टाइम जानकारी सीधे व्हाट्सएप पर उपलब्ध कराता है।

पैसों की बचत के साथ पर्यावरण के लिए भी बेहद खास है यह स्कीम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 फरवरी 2024 को इस योजना की शुरुआत की थी। इसका लक्ष्य 1 करोड़ घरों की छतों पर सोलर सिस्टम लगाना और उन्हें हर महीने 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली देना। वित्त वर्ष 2026-27 तक 30 GW रूफटॉप सोलर क्षमता हासिल करना। अपने लाइफटाइम में यह योजना 1,000 अरब यूनिट क्लीन पावर पैदा करेगी और 72 करोड़ टन CO2 उत्सर्जन को कम करेगी।

दिल्ली में चलेंगी 200 नई इलेक्ट्रिक बसें, इनमें 56 लेडीज स्पेशल! DU के इन कॉलेजों तक मिलेगी सीधी कनेक्टिविटी

Delhi Public Transport: दिल्ली सरकार पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर और राजधानी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। अधिकारियों ने जानकारी दी कि दिल्ली सरकार जल्द ही 200 नई इलेक्ट्रिक बसों की शुरुआत करने जा रही है। इनमें से 56 बसें लेडीज स्पेशल होंगी। ये स्पेशल बसें बिजी रूट वाले यूनिर्सिटी इलाकों को ध्यान में रखकर चलाई जाएंगी। बुधवार को होने वाले इस नए लॉन्च के साथ ही दिल्ली में 6800 बसों की फ्लीट हो जाएगी। इसमें 4938 इलेक्ट्रिक बसें और 1750 सीएनजी बसें होंगी।

दिल्ली के परिवहन मंत्री पंकज सिंह ने इसकी जानकारी देते हुए बताया कि दिल्ली के पब्लिक ट्रांसपोर्ट इंफ्रा को मजबूत करने के साथ पर्यावरण और सस्टेनेबल मोबिलिटी के लक्ष्यों को देखते हुए ये कदम उठाया जा रहा है।

56 लेडीज स्पेशल बसें: कामकाजी महिलाओं और छात्रों के लिए खास सुविधा

परिवहन विभाग की योजना के मुताबिक दिल्ली परिवहन निगम (DTC) अधिक डिमांड वाले 15 रूटों पर 30 लेडीज स्पेशल ट्रिप्स शुरू करेगा। इसके अलावा 13 रूटों पर 26 यूनिवर्सिटी लेडीज स्पेशल (U-SPL) ट्रिप्स चलाई जाएंगी। मंत्री पंकज सिंह ने बताया कि वर्किंग वूमने और छात्राओं की रोजाना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इसे डिजाइन किया गया है। ये खास बसें पीक आवर्स के दौरान सर्विस देंगी और आवासीय क्षेत्रों को नेहरू प्लेस, एम्स (AIIMS), साउथ एक्सटेंशन, आरके पुरम, कनॉट प्लेस, आईटीओ, दिल्ली सचिवालय, करोल बाग, कश्मीरी गेट और शिवाजी स्टेडियम जैसे प्रमुख रोजगार और सरकारी केंद्रों से जोड़ेंगी।

आधुनिक सुविधाओं से लैस होंगी नई लो-फ्लोर एसी बसें

परिवहन मंत्री के मुताबिक ये सभी बसें लो-फ्लोर और एसी वाली होंगी। यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के लिए इनमें आधुनिक सुविधाएं दी गई हैं। इनमें सीसीटीवी कैमरे, पैनिक्स बटन, रियल-टाइम ट्रैकिंग और दिव्यांग यात्रियों के लिए एक्सेसिबिलिटी से जुड़े फीचर्स शामिल हैं। नए बेड़े के तहत 12-मीटर की 88 इलेक्ट्रिक बसें और DEVI 9-मीटर की 112 इलेक्ट्रिक बसें सड़कों पर उतारी जा रही हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के इन प्रमुख कॉलेजों तक मिलेगी सीधी कनेक्टिविटी

अधिकारियों के मुताबिक यूनिवर्सिटी लेडीज स्पेशल सेवाएं छात्राओं के लिए यूनिवर्सिटी आने-जाने की टेंशन को खत्म करेंगी। यह सेवा दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य प्रमुख संस्थानों को जोड़ेगी। इनमें हिंदू कॉलेज, रामजस कॉलेज, दौलत राम कॉलेज, श्रीराम कॉलेज, एलएसआर / लेडी श्री राम कॉलेज, गार्गी कॉलेज, हंसराज कॉलेज, एसपीएम कॉलेज और देशबंधु कॉलेज जैसे महत्वपूर्ण संस्थान शामिल हैं।

दिल्ली-करनाल ऐतिहासिक रूट पर भी दौड़ेंगी 5 ई-बसें

परिवहन मंत्री पंकज सिंह ने यह भी बताया कि डीटीसी ऐतिहासिक दिल्ली-करनाल रूट पर भी 5 पूरी तरह से इलेक्ट्रिक, वातानुकूलित बसें शुरू करेगा। लगभग 133 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर पर यह सेवा दोनों ओर रोजाना 10 ट्रिप्स देगी।