BSE Share Price: बीएसई के सीईओ के इस बयान से रॉकेट बना शेयर, जानिए उन्होंने क्या कहा

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई के शेयर 3 सितंबर को रॉकेट बन गए। इसकी वजह एक्सचेंज के एमडी और सीईओ सुंदररमण रामामूर्ति का एक बयान है। उन्होंने कहा कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि उसके प्लेटफॉर्म पर उसके शेयर लिस्ट नहीं होंगे। इस बयान के बाद बीएसई के शेयरों में तेजी आई। 1:15 बजे शेयर 4.26 फीसदी के उछाल के साथ 3,303 रुपये पर चल रहा था। बीते एक साल में यह शेयर करीब 50 फीसदी भागा है।

एनएसई के शेयर की ट्रेडिंग एनएसई के प्लेटफॉर्म पर नहीं होगी

BSE के एमडी और सीईओ सुंदररमण ने सीएनबीसी-टीवी18 से बातचीत में कहा कि एनएसई ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि ऑफर डॉक्युमेंट के साथ सेल्फ-ट्रेडिंग के लिए अडेन्डम (Addendum) इश्यू नहीं होगा। उन्होंने कहा कि 2017 में इजाजत लेने की कोशिशों के बावजूद बीएसई के शेयर को खुद के एक्सचेंज पर ट्रेडिंग की अनुमति नहीं मिली।

एनएसई के शेयर अपने प्लेटफॉर्म पर लिस्ट होते हैं तो बीएसई को नुकसान

पहले आई खबरों में कहा गया था कि बीएसई पर लिस्टिंग के बाद ‘permitted to trade’ कैटेगरी के जरिए एनएसई के शेयर की ट्रेडिंग उसके खुद के प्लेटफॉर्म पर हो सकती है। पीएल कैपिटल ने इस बारे में एक रिपोर्ट में कहा है कि अगर एनएसई के शेयर में उसके खुद के एक्सचेंज पर ट्रेडिंग होती है तो इसका असर FY27 में बीएसई के अर्निंग्स पर पड़ सकता है।

एक्सचेंज के शेयर को अपने प्लेटफॉर्म पर लिस्ट होने की इजाजत नहीं

बीएसई के एमडी ने कहा कि नियम के तहत किसी स्टॉक एक्सचेंज के शेयर को अपने ही प्लेटफॉर्म पर लिस्ट होने की इजाजत नहीं है। क्लोजिंग ऑक्श सेशन के बारे में उन्होंने कहा कि इसकी वजह से इंडेक्स ऑप्शन वॉल्यूम घटा है। उन्होंने कहा कि CAS सिस्टम के लिए लिक्विडिटी बहुत जरूरी है। लिक्विडिटी कम होने से पार्टिसिपेशन घटा है। इंडेक्स वॉल्यूम नीचे आ गया है।

CAS पर डीलर्स की फीडबैक ले रहा है एक्सचेंज

उन्होंने कहा, “हम CAS पर डीलर मीटिंग्स कर रहे हैं। डीलर्स का एक फीडबैक यह था कि F&O एक्सपायरी को CAS से अलग कर दिया जाए। दूसरा फीडबैक यह था कि CAS को धीरे-धीरे लागू किया जाए। एक फीडबैक यह था कि ऑर्डर मॉडिफेशन की इजाजत नहीं होनी चाहिए। हम सभी डीलर्स के फीडबैक पर विचार कर रहे हैं। फिर इसे हम रेगुलेटर्स को सब्मिट करेंगे।”

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3 अगस्त को हुई थी CAS की शुरुआत 

CAS यानी क्लोजिंग ऑक्शन सेशन की शुरुआत 3 अगस्त को हुई थी। इसमें कारोबार के अंत में एक संक्षिप्त ऑक्शन होता है, जिसमें बाय और सेल ऑर्डर्स मैच कराए जाते हैं। फिर, उसके आधार पर शेयर का क्लोजिंग प्राइस तय होता है। यह व्यवस्था कुछ एशियाई देशों में शामिल हैं। इनमें चीन, ताइवान, हांगकांगक और दक्षिण कोरिया शामिल हैं।

हिमालय में 7 मिनट में तबाही, चीन की तैयारी नाकाम:पिछली बार झील फटी थी, इस बार ग्लेशियर ही टूट गया

26 अगस्त को चीन-नेपाल सीमा पर हिमालय की एक घाटी में ऐसी तबाही आई, जिसमें 1200 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। हैरानी की बात ये थी कि चीन इस इलाके में ऐसी आपदा से निपटने की तैयारी पहले ही कर चुका था। 14 महीने पहले इसी इलाके में ग्लेशियर की एक झील फटने से भूस्खलन हुआ था। ट्रक, घर और एक पुल बह गए थे। इसके बाद चीन ने करीब छह महीने तक बॉर्डर पोर्ट बंद रखा और बाढ़ से बचाव का सिस्टम मजबूत किया। पानी के स्तर पर 24 घंटे नजर रखने लगी, तटबंध और बाढ़ रोधी दीवारें बनाई गईं और पानी का रास्ता बदलने के लिए नहरें तैयार की गईं। अधिकारियों और ग्रामीणों की ट्रेनिंग हुई, मॉक ड्रिल कराई गई और जुलाई में तैयारियों की समीक्षा भी हुई। यानी पिछली आपदा से सबक लेने में कोई कमी नहीं छोड़ी गई थी। फिर भी 26 अगस्त को कुछ ऐसा हुआ, जिसके लिए ये पूरा सिस्टम तैयार ही नहीं था। इस बार झील नहीं, ग्लेशियर टूटा इस बार बाढ़ किसी ग्लेशियल झील के फटने से नहीं आई। एक ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे आ गया। इसके साथ बर्फ, बड़े पत्थर और पानी इतनी तेजी से नीचे आए कि कुछ ही देर में ये सब सुनामी जैसी लहर में बदल गया। ग्यिरोंग पोर्ट कॉम्पलेक्स में पहुंचते ही इस लहर ने 27 इमारतों को तबाह कर दिया। इसके बाद ये तबाही नेपाल की ओर बढ़ गई। अधिकारियों के मुताबिक, ग्लेशियर का हिस्सा टूटने और ग्यिरोंग पोर्ट तक पहुंचने के बीच सिर्फ छह-सात मिनट का समय था। इतनी कम अवधि में लोगों को चेतावनी देना और उन्हें सुरक्षित जगह पहुंचाना बेहद मुश्किल था। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ग्लेशियर का यह हिस्सा अचानक क्यों टूटा, इसकी पूरी तस्वीर अभी साफ नहीं है। इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग के कारण पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और चट्टानों के कमजोर होने जैसी वजहें हो सकती हैं। एक ही जगह बार-बार क्यों हो रही तबाही? इस आपदा ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है। ग्यिरोंग पोर्ट जैसी बड़ी सीमा चौकी इतनी जोखिम वाली जगह पर क्यों बनाई गई? यह पोर्ट एक संकरी घाटी में उस जगह बना है, जहां ल्हेंडे खोला और त्रिशूली नदी मिलती हैं। दोनों नदियों में ग्लेशियरों का पानी आता है। इसी छोटी सी समतल जमीन पर पुल, कस्टम यार्ड, ड्राई पोर्ट और ट्रकों की पार्किंग है। यानी ऊपर पहाड़ों से पानी, बर्फ या मलबा नीचे आता है तो सबसे पहले यही इलाका उसकी चपेट में आता है। डिजास्टर मैनेजमेंट एक्सपर्ट सस्वता सन्याल के मुताबिक, 2025 में भी लोग इसी कस्टम यार्ड से बह गए थे और इस साल भी यह इलाका फिर तबाही की चपेट में आ गया। खतरनाक होने के बावजूद व्यापार के लिए जरूरी है ग्यिरोंग बार-बार प्राकृतिक आपदा झेलने के बाद भी चीन के लिए इस जगह को छोड़ना आसान नहीं है। पिछले एक दशक में ग्यिरोंग पोर्ट चीन और नेपाल के बीच मुख्य व्यापारिक रास्ता बन गया है। दोनों देशों के कुल व्यापार का करीब एक-तिहाई हिस्सा इसी रास्ते से होता है। हर साल 1.80 लाख से ज्यादा लोग भी यहां से दोनों देशों के बीच आते-जाते हैं। इससे पहले चीन-नेपाल के बीच झांगमू-कोदारी बॉर्डर रूट मुख्य रास्ता था। लेकिन 2015 के नेपाल भूकंप में यह रास्ता बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इसके बाद ग्यिरोंग का महत्व बढ़ता गया। समस्या यह है कि झांगमू वाला रास्ता भी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित नहीं है। 2016 में इसी इलाके में ग्लेशियल झील फटने से बाढ़ आई थी। यानी हिमालय में एक रास्ते से दूसरे रास्ते पर जाने से आपदा का खतरा खत्म नहीं होता। एक एक्सपर्ट ने इस स्थिति की तुलना ‘व्हैक-ए-मोल’ गेम से की है। यानी एक जगह खतरा पैदा होता है तो उससे बचने के लिए दूसरी जगह जाते हैं, लेकिन वहां कोई नया खतरा सामने आ जाता है। अब सिर्फ बाढ़ पर नजर रखना काफी नहीं इस घटना ने दिखा दिया कि हिमालय में अब किसी एक प्राकृतिक खतरे को देखकर तैयारी करना काफी नहीं है। पहले निगरानी व्यवस्था बाढ़, अचानक आने वाली बाढ़ या हिमस्खलन जैसे खतरों पर अलग-अलग नजर रखती थी। लेकिन इस बार खतरे एक के बाद एक जुड़े। पहले ग्लेशियर का हिस्सा टूटा, फिर बर्फ और चट्टानें नीचे आईं। देखते ही देखते ये मलबे और पानी की तेज धार में बदल गईं और कुछ ही मिनटों में नीचे के इलाकों में तबाही मचा दी। विशेषज्ञ इसे ‘कैस्केड ऑफ हैजर्ड्स’ यानी एक के बाद एक आने वाली आपदाओं की कड़ी कहते हैं। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ऐसे में आपदाओं का यह सिलसिला और जटिल हो सकता है, जिसका पहले से अनुमान लगाना भी मुश्किल होगा। ICIMOD की विशेषज्ञ सस्वता सन्याल के मुताबिक, पहाड़ों में अब सिर्फ एक खतरे को ध्यान में रखकर तैयारी नहीं की जा सकती। यही इस आपदा की सबसे बड़ी विडंबना है। चीन ने पिछली बाढ़ से निपटने के लिए सेंसर और निगरानी व्यवस्था तो तैयार कर ली थी, लेकिन इस बार तबाही बाढ़ से पहले ही शुरू हो गई। ग्लेशियर का हिस्सा टूटा और उसे पकड़ने के लिए वहां कोई सिस्टम नहीं था। यानी चीन ने पिछली आपदा से सबक लिया था, लेकिन अगली आपदा ने खतरे का तरीका ही बदल दिया।

हिमालय में 7 मिनट में तबाही, चीन की तैयारी नाकाम:पिछली बार झील फटी थी, इस बार ग्लेशियर ही टूट गया

26 अगस्त को चीन-नेपाल सीमा पर हिमालय की एक घाटी में ऐसी तबाही आई, जिसमें 1200 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। हैरानी की बात ये थी कि चीन इस इलाके में ऐसी आपदा से निपटने की तैयारी पहले ही कर चुका था। 14 महीने पहले इसी इलाके में ग्लेशियर की एक झील फटने से भूस्खलन हुआ था। ट्रक, घर और एक पुल बह गए थे। इसके बाद चीन ने करीब छह महीने तक बॉर्डर पोर्ट बंद रखा और बाढ़ से बचाव का सिस्टम मजबूत किया। पानी के स्तर पर 24 घंटे नजर रखने लगी, तटबंध और बाढ़ रोधी दीवारें बनाई गईं और पानी का रास्ता बदलने के लिए नहरें तैयार की गईं। अधिकारियों और ग्रामीणों की ट्रेनिंग हुई, मॉक ड्रिल कराई गई और जुलाई में तैयारियों की समीक्षा भी हुई। यानी पिछली आपदा से सबक लेने में कोई कमी नहीं छोड़ी गई थी। फिर भी 26 अगस्त को कुछ ऐसा हुआ, जिसके लिए ये पूरा सिस्टम तैयार ही नहीं था। इस बार झील नहीं, ग्लेशियर टूटा इस बार बाढ़ किसी ग्लेशियल झील के फटने से नहीं आई। एक ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे आ गया। इसके साथ बर्फ, बड़े पत्थर और पानी इतनी तेजी से नीचे आए कि कुछ ही देर में ये सब सुनामी जैसी लहर में बदल गया। ग्यिरोंग पोर्ट कॉम्पलेक्स में पहुंचते ही इस लहर ने 27 इमारतों को तबाह कर दिया। इसके बाद ये तबाही नेपाल की ओर बढ़ गई। अधिकारियों के मुताबिक, ग्लेशियर का हिस्सा टूटने और ग्यिरोंग पोर्ट तक पहुंचने के बीच सिर्फ छह-सात मिनट का समय था। इतनी कम अवधि में लोगों को चेतावनी देना और उन्हें सुरक्षित जगह पहुंचाना बेहद मुश्किल था। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ग्लेशियर का यह हिस्सा अचानक क्यों टूटा, इसकी पूरी तस्वीर अभी साफ नहीं है। इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग के कारण पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और चट्टानों के कमजोर होने जैसी वजहें हो सकती हैं। एक ही जगह बार-बार क्यों हो रही तबाही? इस आपदा ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है। ग्यिरोंग पोर्ट जैसी बड़ी सीमा चौकी इतनी जोखिम वाली जगह पर क्यों बनाई गई? यह पोर्ट एक संकरी घाटी में उस जगह बना है, जहां ल्हेंडे खोला और त्रिशूली नदी मिलती हैं। दोनों नदियों में ग्लेशियरों का पानी आता है। इसी छोटी सी समतल जमीन पर पुल, कस्टम यार्ड, ड्राई पोर्ट और ट्रकों की पार्किंग है। यानी ऊपर पहाड़ों से पानी, बर्फ या मलबा नीचे आता है तो सबसे पहले यही इलाका उसकी चपेट में आता है। डिजास्टर मैनेजमेंट एक्सपर्ट सस्वता सन्याल के मुताबिक, 2025 में भी लोग इसी कस्टम यार्ड से बह गए थे और इस साल भी यह इलाका फिर तबाही की चपेट में आ गया। खतरनाक होने के बावजूद व्यापार के लिए जरूरी है ग्यिरोंग बार-बार प्राकृतिक आपदा झेलने के बाद भी चीन के लिए इस जगह को छोड़ना आसान नहीं है। पिछले एक दशक में ग्यिरोंग पोर्ट चीन और नेपाल के बीच मुख्य व्यापारिक रास्ता बन गया है। दोनों देशों के कुल व्यापार का करीब एक-तिहाई हिस्सा इसी रास्ते से होता है। हर साल 1.80 लाख से ज्यादा लोग भी यहां से दोनों देशों के बीच आते-जाते हैं। इससे पहले चीन-नेपाल के बीच झांगमू-कोदारी बॉर्डर रूट मुख्य रास्ता था। लेकिन 2015 के नेपाल भूकंप में यह रास्ता बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इसके बाद ग्यिरोंग का महत्व बढ़ता गया। समस्या यह है कि झांगमू वाला रास्ता भी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित नहीं है। 2016 में इसी इलाके में ग्लेशियल झील फटने से बाढ़ आई थी। यानी हिमालय में एक रास्ते से दूसरे रास्ते पर जाने से आपदा का खतरा खत्म नहीं होता। एक एक्सपर्ट ने इस स्थिति की तुलना ‘व्हैक-ए-मोल’ गेम से की है। यानी एक जगह खतरा पैदा होता है तो उससे बचने के लिए दूसरी जगह जाते हैं, लेकिन वहां कोई नया खतरा सामने आ जाता है। अब सिर्फ बाढ़ पर नजर रखना काफी नहीं इस घटना ने दिखा दिया कि हिमालय में अब किसी एक प्राकृतिक खतरे को देखकर तैयारी करना काफी नहीं है। पहले निगरानी व्यवस्था बाढ़, अचानक आने वाली बाढ़ या हिमस्खलन जैसे खतरों पर अलग-अलग नजर रखती थी। लेकिन इस बार खतरे एक के बाद एक जुड़े। पहले ग्लेशियर का हिस्सा टूटा, फिर बर्फ और चट्टानें नीचे आईं। देखते ही देखते ये मलबे और पानी की तेज धार में बदल गईं और कुछ ही मिनटों में नीचे के इलाकों में तबाही मचा दी। विशेषज्ञ इसे ‘कैस्केड ऑफ हैजर्ड्स’ यानी एक के बाद एक आने वाली आपदाओं की कड़ी कहते हैं। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ऐसे में आपदाओं का यह सिलसिला और जटिल हो सकता है, जिसका पहले से अनुमान लगाना भी मुश्किल होगा। ICIMOD की विशेषज्ञ सस्वता सन्याल के मुताबिक, पहाड़ों में अब सिर्फ एक खतरे को ध्यान में रखकर तैयारी नहीं की जा सकती। यही इस आपदा की सबसे बड़ी विडंबना है। चीन ने पिछली बाढ़ से निपटने के लिए सेंसर और निगरानी व्यवस्था तो तैयार कर ली थी, लेकिन इस बार तबाही बाढ़ से पहले ही शुरू हो गई। ग्लेशियर का हिस्सा टूटा और उसे पकड़ने के लिए वहां कोई सिस्टम नहीं था। यानी चीन ने पिछली आपदा से सबक लिया था, लेकिन अगली आपदा ने खतरे का तरीका ही बदल दिया। —————————– नेपाल बाढ़, लोगों को 7:30 बजे खतरे का पता चला:अलर्ट डेढ़ घंटे बाद आया; आरोप- चीन ने नहीं चेताया नेपाल में 26 अगस्त की सुबह आई बाढ़ के बाद अलर्ट जारी करने की टाइमिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…

भारत की जगह चीन से महंगी बिजली खरीद रहा बांग्लादेश:दोगुनी कीमत चुका रहा, फैसले के लेकर देश में विरोध

बांग्लादेश भारत से मिलने वाली सस्ती बिजली के बावजूद चीन से महंगी बिजली खरीद रहा है। ढाका के पास अमीनबाजार में लग रहे वेस्ट-टू-एनर्जी प्रोजेक्ट से 42 MW बिजली 25 टका यानी करीब 19.25 रुपए प्रति यूनिट की दर से खरीदी जाएगी। इसके लिए 25 साल का करार हुआ है। भारत से बांग्लादेश को करीब 11 टका यानी 8.50 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली मिल रही है। चीन से मिलने वाली बिजली की कीमत भारत से दोगुने से भी ज्यादा है। 2 सितंबर को बीजिंग में हुए इस समझौते का बांग्लादेश में विरोध हो रहा है। बांग्लादेश ने भारत के 1 पैसे के चार्ज पर आपत्ति जताई थी भारत के केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) ने सीमा-पार बिजली लेनदेन और ग्रिड से जुड़े खर्च के लिए 1 पैसे प्रति यूनिट शुल्क प्रस्तावित किया था। बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (BPDB) ने इसका विरोध किया। इसके बाद भारत ने शुल्क को घटाकर आधा पैसा प्रति यूनिट करने की बात कही। चीन के प्रोजेक्ट से कचरे की समस्या भी होगी कम अमीनबाजार का प्रोजेक्ट सिर्फ बिजली बनाने के लिए नहीं है। इसमें ढाका के कचरे का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा। करीब 2.3 करोड़ आबादी वाले ढाका में रोजाना 8 हजार मीट्रिक टन कचरा निकलता है। वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट से कचरे की समस्या कम करने के साथ बिजली भी पैदा होगी। बांग्लादेश इस समय बिजली की कमी और पावर कट की समस्या से जूझ रहा है। देश के सामने विदेशी मुद्रा का संकट भी है। बांग्लादेश के पावर सेक्टर में चीन का दखल बढ़ रहा चीन बांग्लादेश के पावर इंफ्रास्ट्रक्चर में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। वह तीस्ता नदी पर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट समेत बिजली से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। अमीनबाजार का वेस्ट-टू-एनर्जी प्रोजेक्ट भी इसी बढ़ती भागीदारी का हिस्सा है। चीन की योजना बांग्लादेश के रास्ते म्यांमार तक भी ऊर्जा पहुंच बढ़ाने की है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक ढाका के वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट से म्यांमार को बिजली सप्लाई करने की तैयारी है। इस तरह अमीनबाजार प्रोजेक्ट का इस्तेमाल बांग्लादेश की बिजली जरूरत के साथ क्षेत्रीय ऊर्जा कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए भी किया जाएगा। ———————– ये खबर भी पढ़ें… रूस-यूक्रेन ने ब्लैक सी में 300 जहाजों पर हमले किए:दुनिया में गेहूं-मक्का महंगा होने का खतरा; रूस का अनाज निर्यात 71% घटा रूस-यूक्रेन युद्ध में ब्लैक सी अब जंग का बड़ा मोर्चा बन गया है। पिछले करीब डेढ़ महीने में दोनों देशों ने 300 से ज्यादा जहाजों को निशाना बनाया है। पूरी खबर पढ़ें…

पुरी जगन्नाथ मंदिर के बैंक खाते में जमा है ₹1,912 करोड़, सामने आया कमाई और खर्च का पूरा ब्योरा

Shree Jagannath Temple: अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले दान में गड़बड़ी के आरोपों के बीच, पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) ने बुधवार को मंदिर की बैंक में जमा रकम की जानकारी सार्वजनिक की। प्रशासन के मुताबिक, मंदिर के बैंक खातों में अब तक करीब 1,912 करोड़ रुपये जमा हैं।

TOI के मुताबिक, सरकार द्वारा संचालित SJTA ने एक लिखित बयान में कहा कि मंदिर के आर्थिक मामलों का प्रबंधन पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाता है, जिसमें व्यवस्थित अकाउंटिंग और नियमित ऑडिट की प्रक्रियाएं शामिल हैं। SJTA के मुख्य प्रशासक अरबिंद कुमार पाधी ने कहा कि जवाबदेही और जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए मजबूत व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

SJTA के अनुसार, मंदिर कई स्रोतों से कमाई करता है, जैसे भक्तों का दान और चढ़ावा, मंदिर की अपनी खदानों से होने वाली कमाई, फिक्स्ड डिपॉजिट पर मिलने वाला ब्याज, जमीन के लेन-देन से होने वाली आय और सरकारी ग्रांट।

इसके अलावा, कमाई का एक तय हिस्सा ‘कॉर्पस फंड’ के तौर पर फिक्स्ड डिपॉजिट में रखा जाता है, जबकि एक और हिस्सा ‘फाउंडेशन फंड’ के लिए अलग किया जाता है। बाकी पैसा मंदिर के फंड अकाउंट में रखा जाता है। मंदिर के फंड का इस्तेमाल इस प्राचीन मंदिर की पूजा-पाठ, धार्मिक सेवाओं और प्रशासनिक कामकाज के रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने के लिए किया जाता है। अगर कोई अतिरिक्त पैसा बचता है, तो उसे बाद में फिक्स्ड डिपॉजिट में बदल दिया जाता है ताकि भगवान की संपत्ति को सुरक्षित और मजबूत बनाया जा सके।

बता दें कि 31 अगस्त तक, SJTA ने लगभग 1,912 करोड़ रुपये की बैंक संपत्ति जमा कर ली है। इसमें कॉर्पस, फाउंडेशन और मंदिर की जमा राशि जैसे तीन मुख्य मदों के तहत रखे गए लगभग 1,811 करोड़, 9 लाख और 58 हजार रुपये शामिल हैं। इस आंकड़े में जून 2024 में राज्य सरकार द्वारा कॉर्पस में दिए गए 500 करोड़ रुपये का योगदान भी शामिल है।

अरबिंद कुमार पाढ़ी ने कहा, “मंदिर के पास अभी सेविंग्स, करंट और फ्लेक्सी अकाउंट्स में लगभग 100 करोड़, 70 लाख, 66 हजार और 868 रुपये हैं। लोगों का भरोसा बनाए रखने और पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए, मंदिर की हुंडी से इकट्ठा हुई रकम की गिनती हर दिन की जाती है। इसकी जानकारी तुरंत ऑफिशियल नोटिस बोर्ड और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाती है, ताकि दुनिया भर के भक्त इसे देख सकें।”

उन्होंने यह भी बताया कि इस साल 15 जुलाई को मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी द्वारा डिजिटल हुंडी ‘समर्पण’ प्लेटफॉर्म लॉन्च किए जाने के बाद से, भक्तों ने ऑनलाइन डोनेशन सिस्टम के जरिए 56.7 लाख रुपये का योगदान दिया है।

हालांकि, मंदिर के फंड के गलत इस्तेमाल का कोई आरोप अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन पुलिस सूत्रों का कहना है कि पिछले 25 सालों में मंदिर में कैश, गहनों और मूर्तियों की चोरी की कम से कम सात घटनाएं हुई हैं।

ऐसे ही एक मामले में, मंदिर के क्लर्क प्रदीप कुमार महापात्रा को 7 फरवरी, 2024 को दान की गिनती के दौरान CCTV सर्विलांस के जरिए 31,940 रुपये नकद चुराते हुए पकड़े जाने का आरोप है। इससे पहले, 15 जुलाई, 2023 को मंदिर के चपरासी सुशांत कुमार राउतराय को गिनती की प्रक्रिया के दौरान 800 रुपये चुराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

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द्वाराहाट का मां दूनागिरी मंदिर: 8,000 फीट की ऊंचाई पर विराजमान शक्तिपीठ

द्वाराहाट का मां दूनागिरी मंदिर: 8,000 फीट की ऊंचाई पर विराजमान शक्तिपीठ

Maa Dunagiri Temple

उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित मां दूनागिरी मंदिर आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। करीब 8,000 फीट ऊंचाई पर स्थित इस प्राचीन मंदिर तक 365 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचा जाता है। मुख्‍यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी लोगों से अल्मोड़ा आगमन पर इस दिव्य मंदिर के दर्शन करने की अपील की है। ALSO READ: कीर्तिखाल का भैरवगढ़ी मंदिर: गढ़वाल के रक्षक काल भैरव का धाम, जानें क्या है खास

 

सीएम धामी ने एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, जनपद अल्मोड़ा के द्वाराहाट क्षेत्र में स्थित मां दूनागिरी मंदिर आस्था, अध्यात्म और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। मां आदिशक्ति भगवती को समर्पित यह पावन धाम अनेक श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। नवरात्रि के पावन अवसर पर यहाँ विशेष पूजा-अर्चना एवं धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। जनपद अल्मोड़ा आगमन पर इस दिव्य मंदिर के दर्शन अवश्य करें।

 

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में द्वाराहाट से लगभग 15-25 किलोमीटर दूर द्रोण पर्वत की चोटी पर स्थित एक प्रसिद्ध और प्राचीन शक्तिपीठ है। समुद्र तल से करीब 8,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। ALSO READ: क्यों खास है उत्तरकाशी का काशी विश्वनाथ मंदिर? दक्षिण की ओर झुका है 56 सेमी ऊंचा स्वयंभू शिवलिंग

 

क्या है दूनागिरी का हनुमान जी और द्रोणाचार्य से कनेक्शन

कहा जाता है कि त्रेतायुग में जब लक्ष्मण को मेघनाथ के द्वारा शक्ति लगी थी, तब सुशेन वैद्य ने हनुमान जी से द्रोणाचल नाम के पर्वत से संजीवनी बूटी लाने को कहा था। हनुमान जी उस स्थान से पूरा पर्वत उठा रहे थे तो यहां पर पर्वत का एक छोटा सा टुकड़ा गिरा।


यह भी कहा जाता है कि इस स्थान पर गुरु द्रोणाचार्य ने तपस्या की थी। दूनागिरी में कत्यूरी शासक सुधारदेव ने 1318 ईसवी में मंदिर निर्माण कर दुर्गा मूर्ति स्थापित की। मंदिर में शिव व पार्वती की मूर्तियां विराजमान है।

ट्रम्प ने अमेरिकी नौसेना मजबूत करने के लिए वॉरफाइटर चुना:हंग काओ को दी जिम्मेदारी, पिता के साथ वियतनाम से भागकर अमेरिका आए थे

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने हंग काओ को नेवी सेक्रेटरी बनाने का फैसला किया है। उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया पर लिखा कि ‘सच्चे वॉरियर’ हैं। वह अमेरिकी नौसेना और मरीन कॉर्प्स को दुनिया की सबसे मजबूत सेना बनाए रखने के लिए सही व्यक्ति हैं। काओ को सैन्य अनुभव वाला अधिकारी माना जाता है। वह 31 साल तक अमेरिकी नौसेना में रहे हैं और इराक, अफगानिस्तान और सोमालिया जैसे इलाकों में मिशन का हिस्सा रहे हैं। काओ का जन्म 1971 में दक्षिण वियतनाम के साइगॉन में हुआ था। जब वे 4 साल के थे तब दक्षिण वियतनाम में अमेरिका समर्थक सरकार गिर गई थी। उस पर उत्तर वियतनाम की कम्युनिष्ट सरकार ने कब्जा कर लिया था। इसके बाद काओ का परिवार भागकर अमेरिका पहुंचा था। नौसेना से रिटायर होने के बाद राजनीति में उतरे, दो बार हार मिली काओ ने 1989 में अमेरिकी नौसेना में अपना करियर शुरू किया। उनका काम समुद्र के अंदर खतरनाक मिशन करना और बम या दूसरे विस्फोटकों से जुड़े खतरों से निपटना था। उन्होंने इराक, अफगानिस्तान और सोमालिया में कई सैन्य मिशनों में काम किया। अंडरवॉटर मिशनों की कमान संभाली और स्पेशल ऑपरेशंस से जुड़े काम भी किए। करीब तीन दशक के सैन्य करियर के बाद वह 2021 में कैप्टन के पद से रिटायर हुए। नौसेना से रिटायर होने के बाद काओ ने राजनीति में कदम रखा। उन्होंने 2022 में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और 2024 में सीनेट के लिए वर्जीनिया से चुनाव लड़ा। हालांकि, दोनों चुनावों में उन्हें हार मिली। अक्टूबर 2025 में काओ को अमेरिकी नौसेना का अंडरसेक्रेटरी नियुक्त किया गया। यह नौसना में दूसरा सबसे बड़ा पद था। अप्रैल 2026 में ट्रम्प ने तत्कालीन नेवी सेक्रेटरी जॉन फेलन को पद से हटा दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक फेलन और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के बीच नहीं बन रही थी। इसके बाद काओ को कार्यवाहक सेक्रेटरी की जिम्मेदारी दी गई थी। तब से काओ अमेरिकी नौसेना की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। अब ट्रम्प उन्हें इसी पद पर स्थायी रूप से नियुक्त करना चाहते हैं। हंग काओ स्थायी नेवी सेक्रेटरी कैसे बनेंगे? काओ की नियुक्ति अभी पक्की नहीं हुई है। दरअसल, राष्ट्रपति का काम नेवी सेक्रेटरी के पद के लिए नामित करना है। अंतिम मंजूरी अमेरिकी सीनेट देती है। 1. नामांकन सीनेट के पास जाएगा
ट्रम्प का आधिकारिक नामांकन सीनेट को भेजा जाएगा। इसके बाद काओ के रिकॉर्ड और उनकी योग्यता की जांच की जाएगी। 2. सीनेट की सुनवाई होगी
काओ को सीनेट की समिति के सामने पेश होना पड़ सकता है। वहां उनसे उनकी सोच, नौसेना की नीतियों, जहाज निर्माण, सैन्य तैयारियों और दूसरे मुद्दों पर सवाल पूछे जा सकते हैं। 3. समिति फैसला करेगी
सुनवाई और जांच के बाद समिति उनके नामांकन को आगे बढ़ा सकती है। इसके बाद मामला पूरी सीनेट के सामने जाएगा। 4. वोटिंग होगी
सीनेटर काओ के नाम पर वोट करेंगे। सीनेट में 100 सदस्य होते हैं, अगर उन्हें 51 वोट मिले तो उन्हें यह जिम्मेदारी सौंप दी जाएगी। ईरान युद्ध के बीच काओ के लिए नौसेना संभालना आसान नहीं काओ ऐसे समय में नौसेना की स्थायी जिम्मेदारी संभालने जा रहे हैं, जब अमेरिकी सेना का ईरान के खिलाफ अभियान चल रहा है। इस दौरान अमेरिकी नौसेना की तैनाती और उस पर काम का दबाव बढ़ा है। अमेरिकी विमानवाहक पोत USS अब्राहम लिंकन नौ महीने से ज्यादा समय तक समुद्र में तैनात रहा। इस दौरान उसका एक बड़ा हिस्सा ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान के समर्थन में बीता। इतनी लंबी तैनाती के कारण जहाज पर मौजूद सैनिकों की थकान, मानसिक सेहत और जरूरी सामान की कमी को लेकर सवाल उठे। अमेरिकी सांसदों ने भी पेंटागन से इन हालात पर जवाब मांगा। अगस्त में काओ ने अब्राहम लिंकन की लंबी तैनाती का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि मिशन की जरूरत के कारण जहाज की तैनाती बढ़ाई गई और सैनिकों की सुरक्षा सबसे अहम है। काओ के सामने नौसेना का बेड़ा बढ़ाने, नए युद्धपोत तैयार करने और सैनिकों पर लंबी तैनाती का दबाव कम करने की चुनौती होगी। चीन भी अमेरिकी नौसेना के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

‘श्रीकृष्ण पर्व’ में घर-घर गोकुल, घर-घर गोपाल से गूंजेगा मध्यप्रदेश, जानापाव में परशुराम-श्रीकृष्‍ण लोक का मुख्‍यमंत्री करेंगे भूमि पूजन

‘श्रीकृष्ण पर्व’ में घर-घर गोकुल, घर-घर गोपाल से गूंजेगा मध्यप्रदेश, जानापाव में परशुराम-श्रीकृष्‍ण लोक का मुख्‍यमंत्री करेंगे भूमि पूजन

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को जन-जन का पर्व बनाने के उद्देश्य से संस्‍कृति विभाग के श्रीकृष्‍ण पाथेय न्‍यास द्वारा 4 सितंबर को ‘श्रीकृष्ण पर्व’ का राज्‍य स्‍तरीय व्यापक आयोजन किया जा रहा है। ‘घर-घर गोकुल, घर-घर गोपाल’ की संकल्पना के साथ प्रदेश के सभी 55 जिलों में 111 स्थानों पर विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे।

संस्कृति, पर्यटन और धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व राज्य मंत्री धर्मेंद्र भाव सिंह लोधी ने बताया कि राज्‍य के 7500 से अधिक श्रीकृष्ण मंदिरों में विशेष साज-सज्जा की जाएगी, जबकि भव्य जन्मोत्सव में 1500 से अधिक कलाकार अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत करेंगे। इस प्रदेशव्यापी पर्व का विशेष आयोजन मुख्यमंत्री निवास पर भी होगा। यहाँ श्रीकृष्ण की विविध कलाओं और परंपराओं से जुड़े कार्यक्रम प्रमुख आकर्षण होंगे। जन्‍मोत्सव में मटकी फोड़ कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा, जो श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और ब्रज की उत्सव परंपरा की झलक प्रस्तुत करेगा।

मुख्यमंत्री निवास पर होने वाले आयोजन में 101 से अधिक बच्चे राधा-कृष्ण की वेशभूषा में शामिल होंगे। इस अवसर पर मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा कार्यक्रम में उपस्थित सभी बच्‍चों को माखन मिश्री, लड्डू गोपाल की मूर्ति, श्रीकृष्‍ण की बाल लीलाओं पर केन्द्रित पुस्‍तक भेंट करेंगे। कार्यक्रम उपरांत जानापाव में मुख्‍यमंत्री डॉ. यादव द्वारा परशुराम श्रीकृष्‍ण लोक का भूमि-पूजन किया जायेगा।  

 

राज्य मंत्री लोधी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण आस्था और भक्ति के साथ भारतीय जीवन-दर्शन, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के महान प्रतीक हैं। मध्यप्रदेश की धरती का भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और परंपराओं से गहरा ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंध रहा है। श्रीकृष्ण के जीवन से हमें मित्रता, करुणा, धैर्य, कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। इसी गौरवशाली विरासत को जन-जन तक पहुँचाने और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के उद्देश्य से ‘श्रीकृष्ण पर्व’ का व्यापक आयोजन किया जा रहा है। 

 

राज्य मंत्री लोधी ने बताया कि श्रीकृष्ण पर्व के लिए चयनित 111 स्थलों में अनेक ऐसे पावन और ऐतिहासिक स्थल सम्मिलित हैं, जिनकी परंपराएँ सीधे तौर पर द्वापर युग और भगवान श्रीकृष्ण के जीवन-प्रसंगों से जुड़ी हुई हैं। इनमें सांदीपनी आश्रम-उज्जैन, नारायणा धाम-उज्जैन, अमझेरा-धार, जानापाव-महू एवं जामगढ़-रायसेन जैसे स्थल प्रमुख हैं। इसके साथ ही आयोजन स्थलों में अनेक ऐसे प्राचीन मंदिर और धार्मिक केंद्र भी शामिल हैं, जिनका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्‍व होने के साथ-साथ गौरवशाली ऐतिहासिक अतीत भी है।

 

श्रीकृष्‍ण पाथेय न्‍यास के मुख्‍य कार्यपालक अधिकारी श्रीराम तिवारी ने बताया कि मध्यप्रदेश की धरती भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े अनेक ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक संदर्भों को अपने भीतर समेटे हुए है। भगवान श्रीकृष्‍ण के जीवन के विभिन्‍न पहलुओं एवं लीलाओं के लोकव्‍यापीकरण, सनातन संस्‍कृति के विस्‍तार के साथ ही उनके द्वारा बताए जीवन मूल्‍यों यथा धैर्य, मित्रता, करुणा, दया इत्‍यादि जनमानस तक प्रेषित करने के उद्देश्‍य से माननीय मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मंशानुरूप श्रीकृष्‍ण पर्व के माध्‍यम से सांस्‍कृतिक परिदृश्‍य में दर्शाने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्‍होंने कहा कि इन आयोजनों के माध्यम से न केवल इन स्थलों की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विशिष्टता को व्यापक पहचान मिल रही है, बल्कि नई पीढ़ी भी मध्यप्रदेश की समृद्ध विरासत और गौरवपूर्ण इतिहास से परिचित हो रही है। यह पहल आस्था के उत्सव के साथ-साथ विरासत के संरक्षण, सांस्कृतिक पुनर्स्मरण और प्रदेश की ऐतिहासिक पहचान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन रही है। इस वर्ष श्रीकृष्ण पर्व के आयोजन स्थलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। प्रदेश के विभिन्न अंचलों में होने वाली स्‍थानीय गतिविधियों का विस्‍तार करने के लिए सांस्कृतिक महत्‍व के स्थलों को चिन्हित कर वहाँ आयोजन किए जा रहे हैं। 

 

कृष्णमय होगा मध्यप्रदेश, 1500 से अधिक कलाकार देंगे प्रस्तुतियाँ-‘श्रीकृष्ण पर्व’ के अंतर्गत प्रदेश के विभिन्न जिलों में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन, लीलाओं, गुरु-शिष्य परंपरा, मित्रता, भक्ति और लोक संस्कृति पर केंद्रित विविध सांस्कृतिक आयोजन होंगे। नारायणा धाम, सांदीपनि आश्रम, महिदपुर, पन्ना, अमझेरा और जानापाव सहित प्रदेश के अनेक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों पर नृत्य-नाटिका, रासलीला, भजन, लोकगायन और अन्य प्रस्तुतियां आयोजित की जाएंगी। इन आयोजनों में प्रदेश के 1500 से अधिक स्थानीय कलाकार और विभिन्न सांस्कृतिक दल सहभागिता करेंगे। 

 

नारायणा धाम में पांच दिवसीय आयोजन-उज्जैन के नारायणा धाम मंदिर प्रांगण में 2 से 6 सितंबर तक प्रतिदिन शाम 7 बजे से पांच दिवसीय सांस्कृतिक आयोजन होगा। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की स्मृति से जुड़े इस स्थल पर पहले दिन गुरु सांदीपनि आश्रम से जुड़े प्रसंग पर आधारित नृत्य-नाटिका प्रस्तुत की जाएगी। इसमें श्रीकृष्ण और सुदामा के आश्रम के लिए लकड़ियां चुनने तथा सुदामा द्वारा गुरु माता के दिए चने छिपाकर खाने के प्रसंग को कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। इसके साथ भरतनाट्यम, भजन गायन और ‘रासलीला : श्रीकृष्ण की दान लीला’ का मंचन होगा। दूसरे दिन कथक में ‘कृष्णम’ नाटिका, भजन गायन तथा ‘श्रीकृष्ण की माखन चोरी’ रासलीला होगी। तीसरे दिन ओडिसी शैली में कृष्ण आधारित नृत्य-नाटिका, भजन गायन और ‘श्रीकृष्ण जन्म एवं बाल लीला’ प्रस्तुत की जाएगी। चौथे दिन श्रीकृष्ण-सुदामा मित्रता प्रसंग पर नृत्य-नाट्य और भजन गायन होगा। पांचवें दिन गीता उपदेश पर आधारित नृत्य-नाटिका तथा भजन गायन होगा। सभी पांचों दिनों रासलीला का मंचन भी किया जाएगा। 

 

सांदीपनि आश्रम में गुरु-शिष्य परंपरा की झलक-उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में 2 से 4 सितंबर तक शाम 4 बजे से तीन दिवसीय आयोजन होगा। इसमें ‘कर्षति इति कृष्ण’, भजन गायन और बघेली लोकगायन की प्रस्तुतियां होंगी। तीसरे दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा महर्षि सांदीपनि से शिक्षा प्राप्त करने तथा 64 कलाओं और 14 विद्याओं के ज्ञान अर्जित करने की पौराणिक परंपरा पर आधारित नृत्य-नाटिका प्रस्तुत की जाएगी। 

 

महिदपुर में राधा-कृष्ण प्रेम और लोकसंगीत-महिदपुर के रामलीला चौक में 2 से 4 सितंबर तक शाम 7 बजे से कार्यक्रम होंगे। पहले दिन राधा-कृष्ण प्रेम प्रसंग पर नृत्य प्रस्तुति और भक्ति गायन होगा। दूसरे दिन बुंदेली गायन तथा भक्ति गायन की प्रस्तुतियां होंगी। तीसरे दिन भजन गायन के साथ श्रीकृष्ण पाथेय से जुड़ी महिदपुर की परंपरा पर केंद्रित श्रीकृष्ण जन्म आधारित नृत्य-नाटिका प्रस्तुत की जाएगी। 

 

पन्ना और अमझेरा में साकार होंगे कृष्ण के विविध प्रसंग-पन्ना के श्री बलदेवजी मंदिर परिसर में 2 सितंबर को बलदेव-श्रीकृष्ण प्रसंग पर नृत्य-नाटिका और भजन गायन होगा। श्री जुगल किशोर मंदिर में 3 और 4 सितंबर को दो दिवसीय आयोजन में श्रीकृष्ण नृत्य-नाटिका, भक्ति गायन तथा प्रणामी परंपरा पर केंद्रित भरतनाट्यम प्रस्तुति होगी। धार जिले के अमझेरा में 3 और 4 सितंबर को श्रीकृष्ण लीला तथा रुक्मिणी वरण एवं विवाह प्रसंग पर आधारित नृत्य-नाटिकाएं प्रस्तुत की जाएंगी। साथ ही भजन गायन भी होगा। अमझेरा को श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणी वरण से जुड़े प्राचीन स्थल के रूप में आयोजन की विषयवस्तु में विशेष स्थान दिया गया है। 

 

जानापाव में परशुराम-श्रीकृष्ण प्रसंग-महू के जानापाव में 4 सितंबर को शाम 4 बजे भगवान परशुराम द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र प्रदान किए जाने के प्रसंग पर केंद्रित नृत्य-नाटिका प्रस्तुत की जाएगी। इसके बाद भजन गायन होगा। आयोजन स्थल पर भगवान परशुराम और श्रीकृष्ण से जुड़े प्रसंगों पर विशेष प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी। 

 

प्रदेश के अनेक जिलों में कृष्ण भक्ति का रंग-श्रीकृष्ण पर्व के अंतर्गत पाली (उमरिया), शहडोल, मंडला, दमोह, रीवा और खातेगांव सहित अनेक स्थानों पर एक दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। इनमें मथुरा प्रवेश, कृष्ण-सुदामा प्रसंग, गोवर्धन धारण, सुदामा मिलन और कालियानाग मानमर्दन जैसे प्रसंगों पर आधारित प्रस्तुतियां शामिल हैं। लोकगायन और भजन के साथ विभिन्न शास्त्रीय नृत्य शैलियों के माध्यम से श्रीकृष्ण की लीलाओं को मंच पर साकार किया जाएगा। उज्जैन के गोपाल मंदिर में 4 सितंबर को गीत गोविंद केंद्रित नृत्य-नाटिका और भजन गायन होगा। तराना स्थित श्रीकृष्ण मंदिर में भी लोक एवं भक्ति गायन की प्रस्तुतियां होंगी। आगर-मालवा, रायसेन, गुना, ग्वालियर, छतरपुर, शिवपुरी, झाबुआ, नीमच, मंदसौर, मुरैना, राजगढ़ और इंदौर सहित अनेक जिलों में भी 4 सितंबर को शाम 7 बजे से कृष्ण केंद्रित सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। इनमें नृत्य-नाटिका, भजन और लोकगायन के माध्यम से स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को श्रीकृष्ण भक्ति से जोड़ा जाएगा। 

 

1500 से अधिक स्थानीय कलाकार होंगे सहभागी-‘श्रीकृष्ण पर्व’ की सबसे बड़ी विशेषताओं में प्रदेश के विभिन्न जिलों के स्थानीय कलाकारों की व्यापक भागीदारी है। 1500 से अधिक कलाकार धार्मिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में अपनी प्रस्तुतियां देंगे। खरगौन, बड़वानी, खंडवा, राजगढ़, बैतूल, सीहोर, भोपाल, मंदसौर, रतलाम, उज्जैन, नीमच, रायसेन, सागर, सतना, रीवा, सिंगरौली, सीधी, कटनी, छिंदवाड़ा, झाबुआ, धार, देवास, नरसिंहपुर, उमरिया, बालाघाट, शहडोल, अनूपपुर, मंडला, डिंडोरी, बुरहानपुर, निवाड़ी, टीकमगढ़ सहित प्रदेश के अनेक जिलों के कलाकार मंदिरों और प्रमुख धार्मिक स्थलों पर प्रस्तुतियां देंगे। इस सांस्कृतिक श्रृंखला में लोकगायन, भजन, नृत्य-नाटिका और नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से श्रीकृष्ण के जीवन एवं दर्शन के विविध आयाम सामने आएंगे। प्रदेश के 82 मंदिरों में प्रस्तावित सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ यह आयोजन स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान करने और प्रदेश की विविध लोक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को कृष्ण भक्ति से जोड़ने का व्यापक प्रयास बनकर सामने आएगा।

 

 

iPhone 18 Pro को लेकर बड़ा लीक, 3 नए कलर में आ सकता है फोन; Black की हो सकती है वापसी

iPhone 18 Pro को लेकर बड़ा लीक, 3 नए कलर में आ सकता है फोन; Black की हो सकती है वापसी

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Apple के अपकमिंग फ्लैगशिप स्मार्टफोन iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max को लेकर एक नया लीक सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी इस बार Pro मॉडल को तीन नए कलर ऑप्शन में पेश कर सकती है। इनमें Dark Cherry/Burgundy, Sky Blue और Black शामिल बताए जा रहे हैं।

 

चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Weibo के चर्चित लीकर Fixed Focus Digital के अनुसार, iPhone 18 Pro सीरीज के लिए Apple इन तीन रंगों पर काम कर रही है। अगर यह लीक सही साबित होता है, तो iPhone 18 Pro की कलर लाइनअप पिछले मॉडल से काफी अलग हो सकती है।

 

iPhone 18 Pro में कौन-कौन से कलर मिल सकते हैं?

 

लीक के अनुसार, iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max में Dark Cherry या Burgundy कलर मिल सकता है। माना जा रहा है कि यह iPhone 17 Pro सीरीज में दिए गए Cosmic Orange कलर की जगह ले सकता है। इसके अलावा Sky Blue कलर भी इस साल iPhone 18 Pro सीरीज का हिस्सा बन सकता है। इस कलर को लेकर पहले भी कई रिपोर्ट सामने आ चुकी हैं।

 

Black कलर की हो सकती है वापसी

 

iPhone Pro यूजर्स के लिए सबसे खास खबर Black कलर की वापसी हो सकती है। Apple ने iPhone 17 Pro सीरीज में Black कलर उपलब्ध नहीं कराया था। ऐसे में iPhone 18 Pro में Black की वापसी उन यूजर्स को पसंद आ सकती है, जो फोन में क्लासिक और प्रीमियम लुक चाहते हैं। वहीं, लीक में Silver कलर के शामिल होने की संभावना कम बताई गई है। Fixed Focus Digital का कहना है कि फिलहाल Silver वेरिएंट को लेकर कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आई है।

 

Sky Blue दिख सकता है Silver जैसा

 

Sky Blue नाम सुनकर भले ही यह कलर काफी चमकीला लगे, लेकिन इसका फिनिश वास्तव में काफी हल्का हो सकता है। Apple पहले भी iPhone Air और MacBook Air में इस तरह के हल्के ब्लू शेड का इस्तेमाल कर चुका है।

 

कुछ लाइटिंग कंडीशन में यह रंग लगभग Silver जैसा दिखाई दे सकता है। ऐसे में जिन यूजर्स को बहुत ज्यादा चमकीले रंग पसंद नहीं हैं, उनके लिए Sky Blue एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

 

सितंबर इवेंट में हो सकता है खुलासा

 

Apple के सितंबर इवेंट में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max के लॉन्च के दौरान इनके फाइनल कलर ऑप्शन सामने आने की उम्मीद है। हालांकि, अभी तक Apple की ओर से इन रंगों को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। अगर लीक सही साबित होता है, तो Dark Cherry, Sky Blue और Black iPhone 18 Pro सीरीज के सबसे चर्चित कलर ऑप्शन हो सकते हैं।

भारत के 1 पैसे के चार्ज पर आपत्ति, चीन से 127% महंगी बिजली क्यों खरीद रहा बांग्लादेश?

Bangladesh Story: बांग्लादेश की तारिक रहमान की सरकार एक तरफ जहां भारत के मामूली पावर चार्ज पर आपत्ति जता रही है। वहीं, दूसरी तरफ वह चीनी कंपनी से बेहद महंगी दरों पर बिजली खरीदने की तैयारी कर रही है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब कुछ ही दिनों पहले ढाका ने सीमा पार बिजली लेनदेन के निपटान के लिए भारत द्वारा प्रस्तावित 0.01 रुपये प्रति यूनिट (1 पैसा) के चार्ज पर आपत्ति जताई थी। बांग्लादेश की आपत्ति के बाद भारत ने इस प्रस्तावित चार्ज को घटाकर आधा यानी 0.005 रुपये प्रति यूनिट कर दिया था।

अमीनबाजार में चीन का प्रोजेक्ट: वेस्ट मैनेजमेंट है उद्देश्य

‘इंडिया टुडे’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ढाका के अमीनबाजार लैंडफिल में बनने वाले चीनी प्रोजेक्ट की प्लांड कैपिसिटी 42 मेगावाट होगी। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश की राजधानी में बढ़ते वेस्ट मैनेजमेंट क्राइसिल का हल निकालना है। यह प्रोजेक्ट बिजली निर्माण का काम एक्स्ट्रा फायदे के लिए करेगा। आपको बता दें कि इस 42 मेगावाट के प्रोजेक्ट को भारत द्वारा बांग्लादेश को बड़े पैमाने पर की की जाने वाली इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई का रिप्लेसमेंट नहीं माना जा सकता।

बांग्लादेश इस समय गंभीर बिजली संकट, गैस सप्लाई में रुकावट और लंबे समय तक होने वाले ब्लैकआउट से जूझ रहा है। देश के कई हिस्सों में बिजली कटौती को लेकर विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो चुके हैं। ऐसे संवेदनशील समय में चीनी कंपनी को 25 टका प्रति यूनिट देने का फैसला लिया गया है। यहां जानना जरूरी है कि अभी बांग्लादेश का एक टका भारत के 0.77 रुपये के करीब है।

इंपोर्टे़ बिजली के औसत खर्च से दोगुने से भी अधिक रेट

बांग्लादेश के न्यूज पेपर द डेली स्टार के मुताबित वित्तीय वर्ष 2020-21 और 2024-25 के बीच बांग्लादेश में इंपोर्टेट बिजली की औसत लागत दोगुने से अधिक हो गई है। ये 5.82 टका प्रति यूनिट से बढ़कर 11.72 टका प्रति यूनिट हो गई थी। इस बैकग्राउंड में देखें तो अमीनबाजार वेस्ट-टू-पावर प्रोजेक्ट के लिए प्रस्तावित 25 टका प्रति यूनिट का टैरिफ बांग्लादेश द्वारा वित्तीय वर्ष 2024-25 में इंपोर्ट की गई बिजली के लिए चुकाई गई औसत कीमत से दोगुने से भी अधिक है।

ढाका शहर से निकलने वाले कचरे के पहाड़ों से बिजली और दूसरे जरूरी प्रोडक्ट्स बनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि 25 टका की इस दर ने बांग्लादेश की बिजली रणनीति की कॉस्ट को लेकर नया विवाद खड़ा कर दिया है। वह भी खासकर तब जब बिजली की हर एक अतिरिक्त यूनिट और लागत की जांच की जा रही है।

भारत से बिजली आपूर्ति और 1 पैसे के चार्ज का विवाद समझिए

‘द डेली स्टार’ के आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2024-25 में बांग्लादेश के कुल बिजली खरीद खर्च में भारत से इंपोर्ट बिजली की हिस्सेदारी लगभग 15.8% थी। उस वर्ष बांग्लादेश ने कुल 121420 करोड़ टका के बिजली खरीद बजट में से भारत से इंपोर्ट की गई बिजली के लिए करीब 19225 करोड़ टका का पेमेंट किया था।

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अगर इसकी तुलना करें तो चीन का 42 मेगावाट वाला प्रोजेक्ट बेहद मामूली क्षमता का है। भारत और चीन के बीच यह अंतर तब और अधिक सामने आया है जब बांग्लादेश ने भारत के सेटलमेंट नोडल एजेंसी चार्ज पर आपत्ति उठाई। भारत की केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) द्वारा सीमा पार बिजली व्यापार के लिए एसएनए चार्ज लागू करने के फैसले के बाद 24 अगस्त को भारत ने बांग्लादेश को सप्लाई की जाने वाली बिजली पर 0.005 रुपये (आधा पैसा) प्रति यूनिट का SNA चार्ज प्रस्तावित किया था।