क्या आज बदल जाएगा पूरी दुनिया का नक्शा? UN में 450 साल पुरानी व्यवस्था पर बड़ी वोटिंग, जानिए मर्केटर मैप का पूरा विवाद

UN Map Voting Controversy: क्या आपने कभी सोचा है कि जिस दुनिया के नक्शे को हम बचपन से स्कूलों, किताबों और गूगल मैप्स पर देखते आ रहे हैं, वह असल में सही है ही नहीं? संयुक्त राष्ट्र महासभा में आज एक ऐसे मसौदे पर ऐतिहासिक वोटिंग होने जा रही है, जो 450 साल पुरानी नक्शा प्रणाली को बदलकर पूरी दुनिया का भूगोल देखने का जरिया ही बदल सकती है।

अफ्रीकी देश टोगो की अगुवाई में और 55 देशों वाले अफ्रीकी संघ के समर्थन से यह प्रस्ताव लाया गया है। मांग यह है कि 1569 से चले आ रहे पारंपरिक मर्केटर मैप को हटाकर वास्तविक आकार दर्शाने वाले ‘इक्वल अर्थ मैप’ को वैश्विक रूप से अपनाया जाए।

आइए आसान भाषा में समझते हैं कि सदियों पुराना नक्शा गलत क्यों माना जा रहा है और इसको लेकर UN में इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा हुआ है।

क्या है 450 साल पुराना मर्केटर मैप और विवाद की असली वजह?

सन 1569 में फ्लेमिश मानचित्रकार गेरार्डस मर्केटर ने एक नक्शा तैयार किया था। उस समय इसका मुख्य मकसद समुद्री नाविकों को सीधी रेखा में दिशा दिखाना था। लेकिन इस गोल पृथ्वी को चपटे कागज पर ढालने के चक्कर में एक बड़ी गड़बड़ी हो गई।

भूमध्य रेखा के पास के देश छोटे दिखने लगे: अफ्रीका, भारत और दक्षिण अमेरिका जैसे भूमध्य रेखा के पास स्थित क्षेत्रों का आकार नक्शे में उनकी असली सीमा से काफी छोटा हो गया।

ध्रुवों के पास के देश बड़े दिखने लगे: यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड जैसे ध्रुवों के पास वाले देश अपनी असली सीमा से कई गुना ज्यादा विशाल दिखाई देने लगे।

ग्रीनलैंड बनाम अफ्रीका: असली सच चौंका देने वाला है

नक्शे की इस गड़बड़ी का सबसे हैरान करने वाला उदाहरण ग्रीनलैंड और अफ्रीका का मुकाबला है। मर्केटर मैप पर ग्रीनलैंड और पूरा अफ्रीका महाद्वीप लगभग एक ही साइज के दिखाई देते हैं। जबकि कड़वी सच्चाई ये है कि अफ्रीका महाद्वीप असल में ग्रीनलैंड से 14 गुना ज्यादा बड़ा है।

अफ्रीका का क्षेत्रफल (3.03 करोड़ वर्ग किमी) इतना बड़ा है कि इसके भीतर अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मैक्सिको और लगभग पूरा यूरोप एक साथ समा सकते हैं। इसी गैर-बराबरी को लेकर अफ्रीकी संघ ने #CorrectTheMap अभियान शुरू किया है। टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने कहा, ‘अफ्रीका कोई विशेषाधिकार या दया की भीख नहीं मांग रहा। हम बस दुनिया के भूगोल में अपनी असली जगह और सही आकार मांग रहे हैं।’

‘कार्टोग्राफिक उपनिवेशवाद’ और ‘इक्वल अर्थ मैप’ का विकल्प

आलोचकों और भूगोलवेत्ताओं का कहना है कि मर्केटर मैप का यह गलत फैलाव पश्चिमी देशों को ज्यादा शक्तिशाली और समृद्ध दिखाने का एक जरिया बना, जिसे ‘कार्टोग्राफिक कोलोनियलिज्म’ कहा जाता है। इससे दुनिया की सोच में ग्लोबल साउथ का दबदबा कम आंका गया।

क्या है ‘Equal Earth’ मैप?

संयुक्त राष्ट्र में जिस नए नक्शे को अपनाने की बात हो रही है, उसे 2018 में कार्टोग्राफर्स की टीम ने विकसित किया था। इसे ‘इक्वल अर्थ मैप’ कहा जाता है। यह नक्शा बिना किसी देश की आकृति को ज्यादा बिगाड़े, हर महाद्वीप और देश को उसके वास्तविक अनुपातिक आकार में दिखाता है।

अगर UN में प्रस्ताव पास हो गया तो क्या-क्या बदलेगा?

संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी तो नहीं होगा, लेकिन यदि यह पास हो जाता है तो:

स्कूल और किताबें: दुनिया भर के स्कूलों, प्रकाशकों और शैक्षणिक संस्थानों में नए और सही आकार वाले नक्शे पढ़ाए जाने लगेंगे।

टेक कंपनियां: गूगल मैप्स और अन्य डिजिटल नेविगेशन कंपनियां अपनी वैश्विक मैपिंग में ‘इक्वल अर्थ’ प्रोजेक्शन को प्राथमिकता दे सकती हैं।

वैश्विक नजरिया: अफ्रीका और एशिया जैसे बड़े महाद्वीपों के असली आकार को देखकर दुनिया का उनके प्रति भौगोलिक और रणनीतिक दृष्टिकोण बदलेगा।

iQOO 16 जल्द ही नए Samsung डिस्प्ले के साथ होगा लॉन्च, जिसमें मिलेगी iPhone Ultra जैसी टेक्नोलॉजी

iQOO 16 को इस महीने के आखिर में कंपनी के नए फ्लैगशिप फोन के तौर पर लॉन्च किया जा सकता है। यह फोन iQOO 15 का अपग्रेड वर्जन होगा। हाल ही में iQOO 16 को एक बेंचमार्किंग प्लेटफॉर्म पर देखा गया था, जहां इसके कई अहम स्पेसिफिकेशंस और फीचर्स सामने आए। इसके अलावा, यह हैंडसेट पहले लीक हुई तस्वीरों में भी देखा गया है, जिससे संकेत मिलता है कि इसमें नए डिजाइन वाला रियर कैमरा मॉड्यूल हो सकता है। अब, iQOO 16 के बारे में एक नई लीक से पता चलता है कि टेक कंपनी इस हैंडसेट में इंडस्ट्री का पहला OLED पैनल लगाने की योजना बना रही है। खबर है कि कंपनी Samsung के साथ मिलकर iQOO 16 में वही डिस्प्ले टेक्नोलॉजी लाने पर काम कर रही है जो Apple के आने वाले बुक-स्टाइल फोल्डेबल फोन में होगी।

iQOO 16 के स्पेसिफिकेशन्स और फीचर्स (अनुमानित)

वीबो (Weibo) पर एक पोस्ट में, टिपस्टर ‘डिजिटल चैट स्टेशन’ (चीनी भाषा से अनुवादित) ने आने वाले iQOO 16 के बारे में अहम जानकारी शेयर की है। कहा जा रहा है कि यह पहला ऐसा Android स्मार्टफोन होगा जिसमें M16 ल्यूमिनसेंट मटीरियल वाला लेटेस्ट सैमसंग OLED डिस्प्ले और नेक्स्ट-जेनरेशन LEAD [लो पावर, इको-फ्रेंडली, ऑगमेंटेड ब्राइटनेस और स्लिम व लाइट डिज़ाइन] डिस्प्ले टेक्नोलॉजी होगी।

इसके अलावा, लीक करने वाले का दावा है कि iQOO 16 पहला ऐसा Android फोन होगा जिसमें Samsung की LEAD डिस्प्ले टेक्नोलॉजी होगी। उम्मीद है कि यह टेक्नोलॉजी Apple के पहले बुक-स्टाइल फोल्डेबल स्मार्टफोन, iPhone Ultra में भी देखने को मिलेगी। खबर है कि Vivo का सब-ब्रांड, फ्लैगशिप iQOO 16 में डिस्प्ले से जुड़े और भी फीचर्स लाने के लिए Samsung के साथ मिलकर काम कर रहा है। हालांकि, इनमें से किसी भी टेक कंपनी ने इन जानकारियों की पुष्टि नहीं की है।

हाल ही में, iQOO 16 के कथित रेंडर ऑनलाइन सामने आए हैं, जिनसे फोन के डिजाइन का पता चलता है। तस्वीर में आने वाले स्मार्टफोन का री-डिजाइन किया गया रियर कैमरा मॉड्यूल दिख रहा है, जिसमें ट्रिपल कैमरा सिस्टम है। फोन के फ्लैट रियर पैनल को भी मेटल जैसा नया पैटर्न देकर री-डिजाइन किया जा सकता है। पैनल के निचले हिस्से में बीच में iQOO की ब्रांडिंग दिख रही है। वहीं, iQOO 16 के दाईं ओर पावर बटन और वॉल्यूम कंट्रोल हो सकते हैं।

इसके अलावा, iQOO 16 को हाल ही में Geekbench बेंचमार्किंग प्लेटफॉर्म पर मॉडल नंबर V2606A के साथ देखा गया था। खबरों के मुताबिक, इस हैंडसेट को Qualcomm के अभी तक रिलीज नहीं हुए ऑक्टा-कोर Snapdragon 8 Elite Gen 6 Pro चिपसेट के साथ लिस्ट किया गया था, जो 5.01GHz की पीक क्लॉक स्पीड देता है। Geekbench पर iQOO 16 को Android 17 पर चलते हुए भी देखा गया है। फोन से जुड़ी और भी कई जानकारियां आने वाले हफ्तों में सामने आने की उम्मीद है।

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Oppo Find X10 भारत में मचाएगा तहलका! BIS सर्टिफिकेशन पर दिखा फोन, फीचर्स भी हुए लीक

Oppo अपनी लेटेस्ट फ्लैगशिप, Oppo Find X10 सीरीज को ग्लोबल मार्केट में लाने के लिए पूरी तरह तैयार है। खास बात यह है कि Oppo Find X10 पहले ही BIS सर्टिफिकेशन वेबसाइट पर दिख चुका है, जिसका मतलब है कि यह डिवाइस भारत में लॉन्च होने के लिए तैयार हो रहा है। इसके अलावा, Oppo Find X10 Pro Max भी थाईलैंड के NBTC डेटाबेस पर सामने आया है और इसे TUV मंजूरी भी मिल गई है।

इस सीरीज के भारत-स्पेसिफिक वेरिएंट की बात करें, तो Oppo Find X10 का मॉडल नंबर CPH2911 है। सीरीज के Pro वेरिएंट के बारे में अफवाहें हैं कि कंपनी इसे सिर्फ चीन तक ही सीमित रखेगी। हालांकि, अभी तक Oppo Find X10 Pro Max के भारत में उपलब्ध होने की भी पुष्टि नहीं हुई है। तो चलिए अब, लीक, अफवाहों और अनुमानों के आधार पर इस फोन के बारे में जो भी जानकारी मिली है वह यहां हम आपको बताते हैं।

Oppo Find X10 सीरीज के अनुमानित स्पेसिफिकेशन्स

Oppo Find X10 में 6.59-इंच का 1.5K डिस्प्ले और बहुत पतले बेजेल्स होने की उम्मीद है। इसके अलावा, इस डिवाइस में MediaTek Dimensity 9600 सीरीज या Dimensity 9500 Plus चिपसेट हो सकता है, साथ ही 12GB RAM और 256GB इंटरनल स्टोरेज भी मिल सकती है। इसके कई RAM और स्टोरेज वेरिएंट्स भी आ सकते हैं। ऐसी भी खबरें हैं कि इस फोन में 8000mAh की बैटरी होगी और यह 80W वायर्ड और 50W वायरलेस चार्जिंग को सपोर्ट करेगा। यह Android 17 ऑपरेटिंग सिस्टम पर आधारित होगा और इसमें ColorOS स्किन होगी।

कैमरे की बात करें तो, Oppo Find X10 में ट्रिपल रियर कैमरा सेटअप होगा, जिसमें 200MP का पेरिस्कोप सेंसर, 200MP का प्राइमरी सेंसर और 50MP का अल्ट्रा-वाइड-एंगल सेंसर शामिल होगा। सेल्फी और वीडियो कॉल के लिए, इस डिवाइस में 50MP का फ्रंट कैमरा भी हो सकता है। अभी तक डिवाइस की कीमत के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है। उम्मीद है कि Oppo की ओर से आधिकारिक घोषणा होने पर ही इस बारे में और जानकारी मिल पाएगी।

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Teacher day essay : शिक्षक दिवस पर बच्चो के लिए निबंध

Teacher day essay : शिक्षक दिवस पर बच्चो के लिए निबंध

teacher day essay in hindi

 

प्रस्तावना:

प्रतिवर्ष 5 सितंबर का दिन भारत में 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाता है। यह दिन पूरी तरह से गुरु-शिष्य की पवित्र परंपरा और शिक्षकों के समर्पण को याद करने के लिए है। भारत की संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव से बहुत ऊँचा और पवित्र रहा है। मानव जीवन में शिक्षकों के सही योगदान और महत्व को समझाने के लिए ही इस विशेष दिन को मनाया जाता है।

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माता-पिता और गुरु का स्थान

हमारे जीवन में माता-पिता का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि वे हमें इस दुनिया में लाते हैं और हमारा पालन-पोषण करते हैं। इसीलिए कहा भी जाता है कि बच्चे के जीवन के पहले गुरु उसके माता-पिता ही होते हैं। लेकिन इस दुनिया में जीने का सही तरीका और ज्ञान हमें शिक्षक ही प्रदान करते हैं। शिक्षक ही हमें सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं और जीवन में सफलता की ऊंचाइयों तक पहुँचाते हैं।

 

शिक्षक दिवस: कब और क्यों?

शिक्षक दिवस भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान दार्शनिक और शिक्षाविद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म-दिवस (5 सितंबर 1888) के अवसर पर मनाया जाता है। डॉ. राधाकृष्णन का शिक्षा और अध्यापन के प्रति गहरा लगाव था। जब उनके शिष्यों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जताई, तो उन्होंने कहा कि “यदि मेरे जन्मदिन को शिक्षकों के सम्मान के रूप में मनाया जाए, तो मुझे सबसे अधिक गर्व होगा।”

 

वे एक कुशल राजनयिक, महान विचारक और आदर्श शिक्षक थे। इस दिन पूरे देश में भारत सरकार द्वारा उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को सम्मानित और पुरस्कृत भी किया जाता है।

 

शिक्षक दिवस पर तैयारियाँ और आयोजन

शिक्षक दिवस पर देश के सभी स्कूल-कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में उत्सव जैसा माहौल रहता है:

सांस्कृतिक कार्यक्रम: छात्र अपने शिक्षकों के सम्मान में नाटक, गीत, नृत्य और भाषण प्रस्तुत करते हैं।

शिक्षकों की भूमिका में छात्र: कई स्कूलों में वरिष्ठ छात्र पूरे दिन शिक्षक बनकर कक्षाएं चलाते हैं और अध्यापन का अनुभव प्राप्त करते हैं।

सम्मान समारोह: छात्र अपने शिक्षकों को धन्यवाद कार्ड, फूल और उपहार देकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

संकल्प दिवस: शिक्षक भी इस दिन गुरु-शिष्य परंपरा को बनाए रखने और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का संकल्प लेते हैं।

 

गुरु-शिष्य संबंध का महत्व

गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति का एक स्वर्णिम हिस्सा है। शिक्षक उस माली के समान होता है जो अलग-अलग प्रकार के पौधों को सींचकर एक सुंदर बगीचा तैयार करता है। वह छात्रों को जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ने की सीख देता है। एक आदर्श गुरु ही शिष्य में नैतिकता और अच्छे चरित्र का निर्माण करता है।

 

वर्तमान परिप्रेक्ष्य और चुनौतियाँ

  • आज के आधुनिक दौर में गुरु-शिष्य परंपरा में कुछ कमियाँ भी देखने को मिल रही हैं:
  • शिक्षा का व्यवसायीकरण होने से गुरु और शिष्य के संबंध में आत्मीयता की कमी आई है।
  • आए दिन मीडिया में शिक्षकों और विद्यार्थियों के एक-दूसरे के प्रति दुर्व्यवहार की खबरें देखने को मिलती हैं, जो हमारी प्राचीन संस्कृति पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
  • डिजिटल युग में मोबाइल और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से छात्रों का ध्यान पढ़ाई और संस्कारों से भटक रहा है।

 

उपसंहार

शिक्षक दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि गुरुओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने और अपनी जिम्मेदारियों को समझने का दिन है।

विद्यार्थियों का यह कर्तव्य है कि वे अपने शिक्षकों का सदैव सम्मान करें और उनके द्वारा दिए गए संस्कारों को जीवन में अपनाएं। वहीं शिक्षकों को भी चाहिए कि वे अपने पद की गरिमा बनाए रखें और विद्यार्थियों को सही दिशा दिखाकर एक सशक्त समाज और देश के निर्माण में अपना योगदान दें।

 

सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

नेपाल की आपदा ने नए सिरे से बढ़ाई भारत की चिंता

नेपाल की आपदा ने नए सिरे से बढ़ाई भारत की चिंता

threat after nepal disaster in india

प्रभाकर मणि तिवारी

भारत में खासकर पूर्वी हिमालय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बनने वाली पनबिजली परियोजनाएं, इनके तहत बनने वाले बांध और सुरंगों से पैदा होने वाले खतरे अक्सर सुर्खियां बटोरते रहे हैं। लेकिन अब नेपाल के भयावह हादसे में बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। उनको आशंका है कि जम्मू-कश्मीर के अलावा उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में कभी भी नेपाल जैसे हादसे का खतरा मंडरा रहा है। ALSO READ: जलवायु न्याय की मांग कर रहा है आपदा प्रभावित नेपाल

 

हाल के वर्षों में इन राज्यों में भूस्खलन और सुरंग धंसने की अलग-अलग घटनाओं में कई लोग मारे जा चुके हैं। लेकिन इसके बावजूद पहाड़ों की कटाई करके ऐसी परियोजनाएं बनाने का काम जारी है। इनमें खासकर सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की स्थिति सबसे चिंताजनक है।

 

अरुणाचल का संकट

चीन सरकार अरुणाचल प्रदेश से सटे इलाके में एक विशालकाय बांध बना रही है। बीते साल इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ था। करीब डेढ़ सौ अरब अमेरिकी डॉलर की लागत वाली इस परियोजना के वर्ष 2033 तक पूरा होने का लक्ष्य है। विशेषज्ञ इसे वाटर बम बताते हैं। लेकिन भूवैज्ञानिकों की असली चिंता इस परियोजना का आकार नहीं बल्कि इसकी लोकेशन है। यह मेडॉग परियोजना उस फॉल्ट जोन के पास स्थित है, जहां भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटें मिलती हैं। इसकी वजह से यह इलाका भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील है। बीते साल भी तिब्बत के शिगात्से इलाके में रिक्टर स्केल पर 7.1 की तीव्रता वाले एक भूकंप के कारण वहां 120  से ज्यादा लोगों की मौत के अलावा कुछ बांधों को नुकसान पहुंचने की खबरें आई थी।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी परियोजना के तहत बनने वाले बांध को भूकंपरोधी तकनीक से बनाने के बावजूद किसी बड़े भूकंप की स्थिति में जमीन धंसने और चट्टानों के टूटने का खतरा पैदा हो सकता है। इससे बांध पर तो खास असर नहीं होगा। लेकिन नदी के निचले हिस्से में स्थित भारतीय इलाकों को नेपाल जैसी आपदा झेलनी पड़ सकती है। इससे नदी का बहाव बदल सकता है। इससे पहले भी ऐसी कुछ घटनाएं हो चुकी हैं। वर्ष 2000 में तिब्बत में एक बांध टूटने से पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में बाढ़ आ गई थी। इससे पहले वर्ष 2017 में अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी का पानी अचानक काला पड़ गया था। तब इसके लिए तिब्बत में खनन गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया गया था। यही सियांग नदी असम में प्रवेश करने के बाद ब्रह्मपुत्र कहलाती है।

 

विशेषज्ञों ने चेताया है कि चीनी परियोजना के तहत बनने वाला विशालकाय बांध पूर्वोत्तर भारत में बड़े पैमाने पर तबाही ला सकता है। ALSO READ: मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों पर जलवायु के गंभीर खतरे का डर

 

भारत की जवाबी रणनीति

इसके असर की काट के लिए भारत सरकार ने भी राज्य के अपर सियांग में 11 हजार मेगावाट क्षमता वाली एक बहुउद्देशीय परियोजना बनाने का फैसला किया है। लेकिन स्थानीय लोग और संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों के सामने विस्थापन का खतरा पैदा हो जाएगा। अरुणाचल प्रदेश में आधा दर्जन पनबिजली परियोजनाएं चल रही हैं जबकि करीब तीन दर्जन छोटी-बड़ी परियोजनाओं का काम चल रहा है। इनमें दिबांग, अपर सियांग, लोअर सुबनसिरी और इटालीन जैसी बड़ी परियोजनाएं शामिल हैं। राज्य सरकार ने 2025-35 को 'पनबिजली का दशक' घोषित किया है।

 

भूवैज्ञानिकों का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश में हिमालय की संरचना भी उस नेपाल-तिब्बत सीमा जैसी है जो हाल में प्राकृतिक हादसे का शिकार हुआ है। खासकर इटालीन परियोजना तो भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील इलाके में है। वहां ग्लेशियल झीलों के फटने का खतरा भी बना हुआ है।

 

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने देश भर में ऐसे 195 ग्लेशियल झीलों की पहचान की है जिनके फटने से बाढ़ आने का खतरा है। किसी ग्लेशियर के पिघलने से बनी झील को रोकने वाली बर्फ, चट्टान या मलबे जैसी प्राकृतिक दीवार के अचानक टूटने के बाद आने वाली बाढ़ को 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' या 'ग्लोफ' कहा जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें से 32 झीलें अकेले अरुणाचल में ही हैं।

 

क्या है विशेषज्ञों का आकलन?

पूर्वोत्तर के मशहूर भूवैज्ञानिक डा. प्रमोद चंद्र सरमा डीडब्ल्यू से कहते हैं, “हिमालय प्राकृतिक रूप से एक नाजुक पर्वतीय प्रणाली है।इसका पूर्वी क्षेत्र अभी युवा है। इस इलाके में हमेशा भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बना रहता है। जलवायु परिवर्तन इस खतरे को और बढ़ा रहा है। इसके साथ ही पनबिजली परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर बनने वाले बांधों ने इस जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है।”

 

पर्यावरणविद डीके अपांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, “राज्य में प्रस्तावित तमाम बड़ी परियोजनाएं भूकंप के लिहाज बेहद संवेदनशील इलाकों में स्थित हैं। चीनी बांध परियोजना ने प्राकृतिक विपदा के खतरे को काफी बढ़ा दिया है।”

 

सियांग बहुउद्देशीय परियोजना का लंबे समय से विरोध कर रहे सियांग इंडीजीनस फार्म्स फोरम (एसआईएफएफ)  के प्रमुख जेजांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, “अपर सियांग इलाका चीनी सीमा से सटा है। इसका निर्माण पूरा होने पर यहां भी नेपाल जैसा हादसा होने का खतरा बढ़ जाएगा।” ALSO READ: हिमालय क्षेत्र में भविष्य में भी ग्लेशियर फ्लड आने का गंभीर खतरा

 

क्या हैं बचाव के उपाय?

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अर्ली-वार्निंग सिस्टम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि ऐसे हादसे के बारे में समय रहते जानकारी मिल सके। इसके साथ ही इलाके में मौसम और हिमालय की ऊंचाई पर बने ग्लेशियरों और झीलों की स्थिति पर चौबीसों घंटे निगरानी का तंत्र विकसित करना होगा।

 

केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, “सरकार अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम कर रही है। पहले चरण में 46 बेहद संवेदनशील बांधों में से 40 में यह प्रणाली लागू की जा चुकी है। चरणबद्ध तरीके से दूसरी परियोजनाओं में भी इसे लागू किया जाएगा।

 

संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 में कहा था कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बीते करीब तीन दशकों के दौरान कार्बन का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले दो देशों, भारत और चीन के बीच स्थित नेपाल के ग्लेशियरों में जमा बर्फ की मात्रा एक-तिहाई कम हो गई है।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि इसे ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है कि भौगोलिक रूप से अस्थिर हिमालयी क्षेत्र में सियांग और उसके जैसे बड़े बांधों का निर्माण उचित है या नहीं?

बिहार डूबेगा या बचेगा?:नेपाल में दूसरा ग्लेशियर फटने वाला है; 8 दिनों में ऐसा क्या हुआ कि सरकार बोली- हालात गंभीर हैं

बिहार डूबेगा कि बचेगा…नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के 8 दिन बाद अब हर कोई जानना चाहता है। राज्य की 8 नदियां- गंगा, सोन, पुनपुन, कोसी, गंडक, बुढ़ी गंडक, बागमती और घाघरा खतरे के निशान से ऊपर हैं। दूसरी तरफ नेपाल में दूसरे ग्लेशियर के फटने का अलर्ट जारी कर दिया गया है। ऐसा क्यों कहा जा रहा कि अबकी ग्लेशियर फटा तो पटना सहित 10 शहर डूब जाएंगे, हिमालय की चोटी पर क्या चल रहा है, समझेंगे; बूझे की नाही में…। बिहार की चिंता बढ़ाने वाले 3 बड़े फैक्टर 1. नेपाल में फटने वाला है दूसरा ग्लेशियर चीन के जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल में एक नया ग्लेशियल लेक फटने वाला है। कब फटेगा, इसका सटीक अंदाजा लगाना कठिन है। नया ग्लेशियल लेक लांगटांग लिरुंग हिमालय के पश्चिमी ढलान पर, रसुवा में तेनजिंग के ठीक सामने है। दरअसल… नेपाल से निकलने वाली 7 से 9 बड़ी नदियां बहकर बिहार-UP के मैदानी इलाकों में आती हैं। जब नेपाल के पहाड़ों में भारी बारिश होती है, तो इन्हीं नदियों के जरिए बिहार में बाढ़ का पानी आता है। इसे ऐसे समझिए… केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, कोसी, गंडक, बागमती और घाघरा ही वे नदियां हैं, जो बिहार में बाढ़ लाती हैं। इसलिए अगर अबकी बार ग्लेशियर फटा तो फिर भारी मात्रा में पानी बिहार पहुंचेगा। 2. 8 नदियां उफान पर, दबाव बढ़ा तो टूट जाएंगे बाढ़ ताजा हालात है कि बिहार की आठ नदियां गंगा, सोन, पुनपुन, कोसी, गंडक, बुढ़ी गंडक, बागमती और घघरा खतरे के निशान से ऊपर हैं। 3 सितंबर तक बिहार जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक… वहीं, नेपाल में आई तबाही के दिन 26 अगस्त से 3 सितंबर की सुबह 8 बजे तक बिहार में 3 बैराज से 1.98 करोड़ क्यूसेक पानी छोड़ा गया है। एक क्यूसेक पानी यानी 28.3 लीटर/प्रति सेकंड। मतलब 56,119.4 करोड़ लीटर/प्रति सेकंड पानी बिहार में 9 दिन के अंदर आ चुका है। मतलब अगर नेपाल में दूसरा ग्लेशियर टूटा तो बिहार में हालात खराब हो जाएंगे। क्योंकि अभी ही नदियों में पानी काफी बढ़ गया है। आगे पानी आने पर तबाही ही मचेगी। 3. नेपाल में बारिश का अलर्ट, नदियों में बढ़ेगा पानी बिहार की सबसे बड़ी चिंता नेपाल में भारी बारिश का अलर्ट है। नेपाल के बाढ़ पूर्वानुमान विभाग के मुताबिक, भोटेकोशी और त्रिशूली नदी फिलहाल चेतावनी स्तर से नीचे बह रही हैं, फिर भी रसुवा और नुवाकोट में अचानक बाढ़ आने की ज्यादा संभावना है। दोनों जिलों में भोटेकोशी, त्रिशूली और छोटी नदियों का जलस्तर काफी बढ़ सकता है, जिससे अचानक बाढ़ आने का भारी खतरा है। वहीं, नेपाल के मौसम विभाग ने अगले तीन दिनों यानी 6 सितंबर तक भारी बारिश की चेतावनी दी है। नेपाल के जल संसाधन विभाग ने कहा कि कोशी बेसिन की सप्तकोशी, तमोर, अरुण, दूधकोशी, तामाकोशी और सुनकोशी तथा नारायणी बेसिन की नारायणी, त्रिशूली, बूढ़ी गंडकी, मर्स्यांगदी, सेती और काली गंडकी जैसी प्रमुख नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। विभाग ने नेपाल की छोटी नदियों में पानी बढ़ने की भी बातें कही है। इधर… पटना मौसम विज्ञान केंद्र के मुताबिक, 5 सितंबर तक पूरे बिहार में बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, गोपालगंज और सीवान जिलों में भारी बारिश की चेतावनी दी गई है। जबकि, पटना, नालंदा, जहानाबाद, नवादा, गया, लखीसराय, शेखपुरा और बेगूसराय में बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। …तो क्या बड़े शहर भी डूब सकते हैं? बिल्कुल। राज्य की नदियों में बढ़ते पानी से 13 जिले दरभंगा, मधुबनी, पश्चिम चंपारण, कटिहार, मधेपुरा, पूर्णिया, सहरसा, खगड़िया, वैशाली, बेगूसराय, भागलपुर, समस्तीपुर, मुंगेर प्रभावित हैं। बिहार के आपदा प्रबंधन विभाग ने 3 सितंबर की शाम अलर्ट जारी करते हुए कहा कि पटना में गंगा नदी हाई फ्लड लेबल को क्रास करने वाली है। इसलिए सभी पदाधिकारी और लोग अलर्ट रहें। निचले इलाकों को बचाने के लिए तुरंत तैयारी में जुट जाएं। विभाग ने कहा है कि दक्षिण बिहार की सोन, पुनपुन, दरधा में बढ़ते पानी को देखते हुए नालंदा, भोजपुर, वैशाली, सारण, बेगूसराय, लखीसराय और जहानाबाद में लोगों की परेशानी बढ़ सकती है। मतलब साफ है कि अगर नेपाल से और पानी आया तो बिहार के कम से कम 10 से ज्यादा शहर डूब सकते हैं। जिसमें राजधानी पटना भी शामिल हो सकता है। ऐसा पहले भी हो चुका है…

नेपाल की तबाही में भारत बना सबसे बड़ा सहारा:5 खेप में 74 टन राहत भेजी; डॉक्टर, रेस्क्यू एक्सपर्ट और फोरेंसिक टीम भी पहुंचाई

नेपाल में ग्लेशियर टूटने के बाद आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में इस आपदा से 1200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। शहरों, सड़कों, पुलों और कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को भारी नुकसान पहुंचा है। बाढ़ के कुछ घंटों के भीतर ही भारत ने राहत सामग्री भेजनी शुरू कर दी थी। 3 सितंबर तक भारत पांच खेप में कुल 74 टन राहत सामग्री भेज चुका है, जिसमें करीब 5 टन जरूरी दवाइयां शामिल हैं। भारत की मदद सिर्फ राहत सामग्री तक सीमित नहीं रही। डॉक्टर, पैरामेडिक्स, बचाव दल, सुरंग विशेषज्ञ, बेली ब्रिज और फोरेंसिक एक्सपर्ट भी नेपाल भेजे गए हैं। यानी सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश से लेकर शवों की DNA जांच और पुनर्निर्माण तक भारत कई मोर्चों पर नेपाल की मदद कर रहा है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भी संसद में भारत की सहायता के लिए धन्यवाद दिया है। भारत की मदद से बना अस्पताल बाढ़ पीड़ितों के लिए बना सहारा नेपाल के नुवाकोट में नेपाल-भारत मैत्री भवन बाढ़ के बाद लोगों के लिए बड़ी राहत बनकर सामने आया है। इस इमारत में आयुर्वेद और वैकल्पिक अस्पताल भी है। भारत सरकार ने 2015 के भूकंप के बाद इस अस्पताल का पुनर्निर्माण कराया था। ऊंचाई पर स्थित होने की वजह से भोटेकोशी बाढ़ में घर छोड़ने को मजबूर सैकड़ों लोगों ने यहां शरण ली है। अस्पताल में 11 डॉक्टर बाढ़ प्रभावित लोगों का इलाज कर रहे हैं। यहां से जिले के अलग-अलग राहत केंद्रों में पहुंचाए गए लोगों को भी मेडिकल मदद दी जा रही है। जहां पुल बह गए, वहां बेली ब्रिज से फिर जुड़ेंगे रास्ते बाढ़ में कई सड़कें और पुल बहने से दूरदराज के इलाकों का संपर्क टूट गया है। इसे बहाल करने के लिए भारत नेपाल को बेली ब्रिज भेज रहा है। बेली ब्रिज लोहे के हिस्सों से तैयार होने वाला अस्थायी पुल होता है। इसके हिस्सों को प्रभावित इलाके तक ले जाकर मौके पर जोड़ा जा सकता है। इससे स्थायी पुल बनने का इंतजार किए बिना सड़क संपर्क जल्दी बहाल किया जा सकता है। भारतीय दूतावास के मुताबिक, 230 फीट लंबे सिंगल-लेन मॉड्यूलर स्टील ब्रिज के उपकरण लेकर 16 ट्रक नेपाल पहुंच चुके हैं। सात और बेली ब्रिज लगाने के लिए उपकरण भी जल्द भेजे जाएंगे। इन्हें लगाने के लिए तकनीकी टीमें भी नेपाल पहुंचेंगी। हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश में भारतीय एक्सपर्ट बाढ़ के बाद नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे मजदूरों को ढूंढना है। नेपाल सरकार के मुताबिक कई सुरंगों में करीब 900 से ज्यादा कर्मचारियों के फंसे होने की आशंका है। 30 अगस्त को भारतीय सुरंग बचाव विशेषज्ञों की टीम नेपाल पहुंची। टीम नेपाली सेना के साथ मिलकर चिलिमे और लांगटांग के बाढ़ प्रभावित इलाकों में हाइड्रोपावर सुरंगों में कर्मचारियों की तलाश कर रही है। दिल्ली-एनसीआर के ‘रैट माइनर्स’ की टीम ने भी नेपाल के बचाव अभियान में शामिल होने की पेशकश की है। इसी टीम ने 2023 में उत्तराखंड की सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 मजदूरों को बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाई थी। शवों के पहचान के लिए DNA जांच में भारत की मदद बाढ़ का पानी घटने के बाद अब नेपाल के सामने एक और बड़ी चुनौती बरामद शवों और लापता लोगों की पहचान करना है। इसके लिए भारत ने 19 सदस्यीय फोरेंसिक टीम नेपाल भेजी है। भारतीय विशेषज्ञ नेपाली टीम के साथ मिलकर DNA सैंपल की जांच कर रहे हैं। काठमांडू घाटी की दो लैब में यह काम किया जा रहा है। इनमें नेपाल पुलिस सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी और खुमलटार की नेशनल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी शामिल हैं। नेपाल पुलिस के मुताबिक मंगलवार शाम तक 1,068 शव बरामद किए जा चुके थे। इनमें करीब 400 मामलों में सिर्फ शरीर के कुछ हिस्से मिले हैं। ऐसे मामलों में DNA जांच के जरिए मृतकों की पहचान करना बेहद जरूरी हो गया है। बाढ़ में तबाह स्कूल को भी दोबारा बनाएगा भारत भारत की मदद राहत और बचाव अभियान तक सीमित नहीं है। भारत ने नुवाकोट के बिदुर में बाढ़ से क्षतिग्रस्त त्रिभुवन त्रिशूली सेकेंडरी स्कूल को दोबारा बनाने का फैसला भी किया है। यह स्कूल भारत-नेपाल सहयोग के लिहाज से भी अहम है। इसके पुराने भवन का संबंध भारत की विकास सहायता से रहा है। अब नई इमारत भी भारत के हाई इम्पैक्ट कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत बनाई जाएगी। आपदा के समय पड़ोसी देशों के साथ खड़ा रहा है भारत नेपाल में मौजूदा राहत अभियान आपदा के समय दूसरे देशों की मदद करने की भारत की नीति की एक और मिसाल है। नेपाल में इस बार भी भारत की भूमिका सिर्फ शुरुआती राहत तक सीमित नहीं है। इलाज से लेकर बचाव, सुरंगों में तलाश, टूटे रास्तों को जोड़ने, शवों की पहचान और पुनर्निर्माण तक भारत नेपाल की मदद में हर स्तर पर जुटा है। —————— नेपाल बाढ़ से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… नेपाल बाढ़ में कैसे बचा 40 साल पुराना ‘हरा घर’: मालिक बोला- नींव मजबूत बनाई, नदी किनारे घर था इसलिए ज्यादा ध्यान दिया था नेपाल में 26 अगस्त को त्रिशूली नदी की बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। तेज बहाव में गाड़ियां, इमारतें और लोगों के सामान बह गए, लेकिन नुवाकोट जिले में नदी किनारे बना 40 साल पुराना हरा घर लगभग सुरक्षित बच गया। पूरी खबर पढ़ें…

हिमालय के ग्लेशियर सिर्फ बढ़ते तापमान से नहीं जूझ रहे:बर्फ पर जमी कालिख सूरज की गर्मी सोख रही, नेपाल जैसी तबाही का खतरा बढ़ा

हिमालय के ग्लेशियरों पर अब सिर्फ बढ़ते तापमान का खतरा नहीं है। हवा में मौजूद कालिख और धूल भी बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ा रही है। गाड़ियों, कोयला बिजलीघरों, फैक्ट्रियों, ईंट भट्ठों, घरों के चूल्हों और जंगलों व खेतों में लगने वाली आग से निकलने वाले कण हवा के साथ ऊंचे पहाड़ों तक पहुंचते हैं और ग्लेशियरों की सफेद सतह पर जम जाते हैं। बर्फ पर जमी कालिख सूरज की गर्मी ज्यादा सोखती है। इससे बर्फ जल्दी पिघलने लगती है। इससे ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों की चिंता इसलिए बढ़ रही है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के साथ प्रदूषण का यह असर ग्लेशियरों को कमजोर और अस्थिर कर सकता है। नेपाल इसका चिंताजनक उदाहरण है। यहां हाल में ग्लेशियर टूटने के बाद अचानक बाढ़ आई और भारी नुकसान हुआ। इस घटना की सटीक वजह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता तापमान और ग्लेशियरों पर जमा प्रदूषण ऐसे हादसों का जोखिम बढ़ा सकते हैं। सफेद बर्फ पर कालिख पड़ते ही पिघलना क्यों बढ़ जाता है? साफ बर्फ सूरज की करीब 90% रोशनी वापस अंतरिक्ष में भेज देती है। इसलिए वह सूरज की गर्मी का बड़ा हिस्सा सोखने से बच जाती है। जब बर्फ पर कालिख यानी ब्लैक कार्बन जमती है तो उसकी सफेदी कम हो जाती है। सतह सूरज की ज्यादा ऊर्जा सोखने लगती है और तेजी से गर्म होती है। इससे बर्फ के पिघलने की रफ्तार भी बढ़ जाती है। एक मॉडलिंग स्टडी के मुताबिक, 2007 से 2016 के बीच हिमालय में ग्लेशियरों के कुल बर्फ नुकसान में दक्षिण एशिया से आया ब्लैक कार्बन एक-तिहाई तक जिम्मेदार हो सकता है। यानी ग्लेशियरों पर असर सिर्फ बढ़ते तापमान का नहीं है। बर्फ पर जम रही कालिख भी उसके गर्म होने और पिघलने में भूमिका निभा रही है। पाकिस्तान से उठी कालिख भी हिमालय तक पहुंच रही सैटेलाइट डेटा के अध्ययन से पता चला है कि पाकिस्तान के औद्योगिक मैदानी इलाकों से निकलने वाला ब्लैक कार्बन और खनिज धूल हवा के साथ ऊंचे हिमालयी ग्लेशियरों तक पहुंच सकता है। ये महीन कण ग्लेशियर की सतह पर जमते हैं और बर्फ को गहरा कर देते हैं। इससे सूरज की ज्यादा ऊर्जा सोखी जाती है और पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। तेजी से पिघलने वाला पानी ग्लेशियर की दरारों के रास्ते अंदर भी जा सकता है। इससे बर्फ के भीतर पानी के रास्ते बन सकते हैं और ग्लेशियर की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। अगर कमजोर ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे आता है तो फ्लैश फ्लड यानी अचानक तेज बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। प्रदूषण सिर्फ बर्फ को काला नहीं करता ब्लैक कार्बन का असर ग्लेशियर की सतह तक सीमित नहीं है। हवा में मौजूद कालिख सूरज की गर्मी सोखकर पहाड़ों के ऊपर के वातावरण को गर्म कर सकती है और बादलों के बनने के तरीके को भी प्रभावित कर सकती है। इससे कुछ इलाकों में बर्फबारी कम होने की स्थिति बन सकती है। ऐसे में ग्लेशियर पर दोहरा दबाव पड़ता है। एक तरफ पुरानी बर्फ तेजी से पिघलती है और दूसरी तरफ उसकी भरपाई के लिए नई बर्फ कम मिल सकती है। कालिख के बड़े स्रोत कौन से हैं? दक्षिण एशिया में ब्लैक कार्बन के प्रमुख स्रोतों में पेट्रोल-डीजल वाहन, कोयला आधारित बिजलीघर और उद्योग, ईंट भट्ठे, लकड़ी और ठोस ईंधन से चलने वाले पारंपरिक चूल्हे, जंगलों की आग और फसल जलाना शामिल हैं। इनसे निकले महीन कण हवाओं के साथ लंबी दूरी तय कर सकते हैं। यानी ग्लेशियर से हजारों किलोमीटर दूर पैदा हुआ प्रदूषण भी हिमालय की बर्फ तक पहुंच सकता है। अच्छी खबर: कालिख कम करने का असर जल्दी दिखता है ब्लैक कार्बन के मामले में राहत की एक वजह भी है। कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले यह वातावरण में बहुत कम समय तक रहता है। आमतौर पर कुछ दिनों से कुछ हफ्तों तक। इसलिए इसके उत्सर्जन में कमी लाने पर असर जल्दी दिखाई दे सकता है। इसका एक उदाहरण 2020 का कोविड लॉकडाउन है। 2023 में प्रकाशित एक स्टडी में वैज्ञानिकों ने उस दौरान हुए प्रदूषण में कमी का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि प्रदूषण घटने से हिमालय की बर्फ ज्यादा चमकीली हुई और उसके पिघलने की दर 40% तक कम हो गई। इससे पता चलता है कि वाहनों, उद्योगों और दूसरे स्रोतों से निकलने वाली कालिख को कम करके ग्लेशियरों पर पड़ने वाला दबाव कुछ हद तक जल्दी घटाया जा सकता है। हिमालय का संकट सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं हिमालय के ग्लेशियर भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के लिए बेहद अहम हैं। इनसे निकलने वाला पानी कई बड़ी नदियों के प्रवाह में योगदान देता है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से कुछ समय के लिए नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन लंबे समय तक यही रफ्तार बनी रही तो ग्लेशियरों में जमा बर्फ घटती जाएगी। इससे भविष्य में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा ग्लेशियरों के पास बनी झीलों के फटने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसी बाढ़ कुछ ही समय में निचले इलाकों में भारी तबाही ला सकती है। —————— यह खबर भी पढ़ें… हिमालय में 7 मिनट में तबाही, चीन की तैयारी नाकाम:पिछली बार झील फटी थी, इस बार ग्लेशियर ही टूट गया 26 अगस्त को चीन-नेपाल सीमा पर हिमालय की एक घाटी में ऐसी तबाही आई, जिसमें 1200 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। हैरानी की बात ये थी कि चीन इस इलाके में ऐसी आपदा से निपटने की तैयारी पहले ही कर चुका था। पूरी खबर पढ़ें…

US ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे भारतीय को राहत:फैमिली कैटेगरी की तारीखें बढ़ीं; 1 अक्टूबर से नए वीजा नंबर मिलेंगे

अमेरिका में स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे भारतीय परिवारों के लिए सितंबर का वीजा बुलेटिन राहत लेकर आया है। परिवार-आधारित कई श्रेणियों में ग्रीन कार्ड मिलने की तारीखें काफी आगे बढ़ी हैं। हालांकि, EB-1 श्रेणी में खास बदलाव नहीं हुआ है। EB-1 श्रेणी में असाधारण प्रतिभा वाले लोग, बेहतरीन प्रोफेसर-रिसर्चर और एमएनसी के कुछ वरिष्ठ अधिकारी शामिल होते हैं। भारत के लिए सितंबर में इसकी फाइनल एक्शन डेट 15 अक्टूबर 2022 है। सितंबर का वीजा बुलेटिन मौजूदा वित्त वर्ष का आखिरी बुलेटिन है। अमेरिका का वित्त वर्ष 1 अक्टूबर से 30 सितंबर तक चलता है। नए वार्षिक वीजा नंबर 1 अक्टूबर से उपलब्ध होंगे। F-1 में 13 महीने की बढ़त सितंबर वीजा बुलेटिन में भारत और चीन के लिए F-1 श्रेणी की फाइनल एक्शन डेट 15 दिसंबर 2018 से बढ़कर 22 जनवरी 2020 हो गई है। यह श्रेणी अमेरिकी नागरिकों के अविवाहित वयस्क बेटे-बेटियों के लिए है। F-2B में करीब 20 महीने की राहत ग्रीन कार्ड धारकों के अविवाहित वयस्क बेटे-बेटियों के लिए F-2B की तारीख 1 जनवरी 2018 से बढ़कर 22 अगस्त 2019 हो गई है। यानी एक महीने में करीब 20 महीने की बढ़त मिली है। F-3 में करीब 29 महीने की बढ़त अमेरिकी नागरिकों के विवाहित बेटे-बेटियों के लिए F-3 की फाइनल एक्शन डेट 15 मई 2012 से बढ़कर 22 अक्टूबर 2014 हो गई है। इसमें करीब 29 महीने की बढ़त हुई है। F-2A में एक महीने की बढ़त ग्रीन कार्ड धारकों के पति-पत्नी और नाबालिग बच्चों के लिए F-2A की तारीख 22 जुलाई 2026 से बढ़कर 22 अगस्त 2026 हो गई है। वित्त वर्ष 2026 में परिवार आधारित इमिग्रेशन की कुल सीमा 2.26 लाख और रोजगार आधारित इमिग्रेशन की सीमा 1,86,317 है। प्रति देश 7% यानी 28,862 वीजा की सीमा है। कुल मिलाकर इस महीने परिवार आधारित ग्रीन कार्ड की कई श्रेणियों में अच्छी प्रगति हुई है, जबकि EB-1 में कोई बदलाव नहीं हुआ। अमेरिका में इमिग्रेशन को लेकर नया बिल पेश इससे पहले अमेरिकी सीनेट में एक ऐसा विधेयक पेश किया गया थआ, जिसमें पिछले 7 साल से लगातार अमेरिका में रह रहे लोगों को ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने की अनुमति देने का प्रस्ताव है। ग्रीन कार्ड अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और काम करने की अनुमति देने वाला आधिकारिक दस्तावेज है। इसे आधिकारिक तौर पर परमानेंट रेजिडेंट कार्ड कहा जाता है। भारतीय H-1B वीजाधारकों के लिए यह प्रस्ताव क्यों अहम है? यह प्रस्ताव भारतीयों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका में H-1B वीजा पर काम करने वाले लोगों में सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की है। फिलहाल रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड पर हर देश के लिए एक तय सीमा (पर-कंट्री कैप) लागू है। इसी वजह से हजारों भारतीयों को ग्रीन कार्ड मिलने में कई-कई साल लग जाते हैं। अगर यह विधेयक कानून बन जाता है, तो पिछले 7 साल से लगातार अमेरिका में रह रहे पात्र H-1B वीजाधारकों को ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने का एक नया विकल्प मिल जाएगा।

चीन- PhD छोड़, रिसर्च पेपर की गड़बड़ियां खोजने लगा शख्स:40 वैज्ञानिकों का फर्जीवाड़ा पकड़ा गया, जिनपिंग सरकार ने फंडिंग-पुरस्कार छीने

चीन में एक पूर्व PhD छात्र गेंग होंगवेई के रिसर्च पेपर में गड़बड़ियां पकड़ने के बाद 40 से ज्यादा रिसर्चर्स पर कार्रवाई हुई है। चीन की प्रमुख रिसर्च फंडिंग संस्था नेशनल नेचुरल साइंस फाउंडेशन ऑफ चाइना (NSFC) ने 31 मामलों में कार्रवाई की है। इसे संस्था की अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है। कार्रवाई की जद में कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के वरिष्ठ प्रोफेसर भी हैं। इनमें 4 ऐसे वैज्ञानिक हैं, जिनके पेपर पर पूर्व PhD छात्र गेंग होंगवेई ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाए थे। गेंग को ‘स्टूडेंट गेंग’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने 2025 में बायोसाइंस की PhD छोड़ दी थी। इसके बाद वह रिसर्च पेपर में डेटा, तस्वीरों और ग्राफ की गड़बड़ियां खोजकर सोशल मीडिया पर सामने लाने लगे। उनके सवालों के बाद संबंधित संस्थानों ने जांच शुरू की और अब मामला NSFC की कार्रवाई तक पहुंच गया है। PhD ड्रॉपआउट ने क्या पकड़ा? 1. आंकड़ों में अजीब पैटर्न
एक पेपर में एक कॉलम के लगभग सभी आंकड़ों का आखिरी अंक 5 था। दूसरे कॉलम में भी आंकड़े एक तय पैटर्न में थे। एक कॉलम के आंकड़े दूसरे से लगभग हर जगह 0.3 के अंतर पर थे। गेंग ने इसे डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाली बात बताया। 2. 196 चूहों के वजन में सटीकता
एक रिसर्च में 196 लैब चूहों का वजन दो दशमलव तक दर्ज किया गया था। गेंग ने सवाल उठाया कि चलते-फिरते चूहों का वजन इतनी सटीकता से कैसे दर्ज किया गया। इससे डेटा के साथ छेड़छाड़ की आशंका पैदा हुई। 3. एक ही तस्वीर, अलग-अलग प्रयोग
कुछ पेपर में एक जैसी तस्वीरों को अलग-अलग प्रयोगों के नतीजे के तौर पर इस्तेमाल किए जाने पर सवाल उठे। कुछ डेटा सेट भी असामान्य रूप से एक-दूसरे से मिलते थे। नेचर ने भी बताया था कि गेंग ने कई पेपर के आंकड़ों में असामान्यताएं पकड़ी थीं। चार बड़े वैज्ञानिक भी कार्रवाई की जद में गेंग ने अप्रैल में चीन के चार प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़े वैज्ञानिकों के रिसर्च पर सवाल उठाए थे। इनमें टोंगजी यूनिवर्सिटी के वांग पिंग, नानकाई यूनिवर्सिटी के चेन चुआन, शंघाई यूनिवर्सिटी के सु जियाचन और सन यात-सेन यूनिवर्सिटी के कुआंग डोंगमिंग शामिल हैं। इन चारों को चीन का प्रतिष्ठित नेशनल साइंस फंड फॉर डिस्टिंग्विश्ड यंग स्कॉलर्स मिल चुका था। यह चीन में युवा वैज्ञानिकों को दिया जाने वाला प्रमुख सम्मान है। इनमें से तीन अपने संस्थानों में डीन या एसोसिएट डीन जैसे प्रशासनिक पदों पर रह चुके हैं। इन वैज्ञानिकों के खिलाफ उनके विश्वविद्यालयों ने भी कार्रवाई की। कुछ को प्रशासनिक पदों से हटाया गया। इसके बाद NSFC ने भी इन मामलों में कार्रवाई की। संस्था ने संबंधित रिसर्च फंडिंग और सम्मान वापस ले लिए। उन्हें पहले मिली 1 करोड़ युआन से ज्यादा यानी करीब 15 लाख डॉलर की रिसर्च ग्रांट लौटाने का आदेश दिया गया। साथ ही तीन से सात साल तक NSFC की फंडिंग के लिए दोबारा आवेदन करने पर रोक लगा दी गई। अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स के पेपर भी जांच के घेरे में गेंग के सवालों में नेचर, नेचर कैंसर और सेल बायोलॉजी जैसे प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित रिसर्च पेपर भी शामिल थे। मई में साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने रिपोर्ट किया था कि चीनी सोशल मीडिया पर इन जर्नल्स में प्रकाशित कुछ रिसर्च पेपर को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसके बाद स्प्रिंगर नेचर ने कहा था कि उसे पांच पेपर को लेकर चिंताएं मिली हैं और उनकी जांच की जा रही है। जुलाई में नेचर और नेचर कैंसर ने चीन के वैज्ञानिकों के दो रिसर्च पेपर वापस ले लिए।