PCB के खजाने पर पड़ा पाकिस्तान की हार का असर! टीवी राइट्स में हुआ करोड़ों का नुकसान

क्रिकेट में पाकिस्तान का खराब फॉर्म जारी है। एशियन गेम्स के फाइनल में पाकिस्तान को भारत से करारी शिकस्त मिली है। इससे पहले टी20 वर्ल्ड कप 2026 और एशिया कप 2025 में भी पाकिस्तान को भारत से हार का सामना करना पड़ा है। वहीं पाकिस्तानी टीम की लगातार खराब प्रदर्शन का असर अब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) की कमाई पर भी दिखाई दे रहा है। मैदान पर टीम के उतार-चढ़ाव के बीच पीसीबी को टीवी राइट्स से मिलने वाली रकम में बड़ी गिरावट आई है। 2027 से शुरू होने वाले घरेलू इंटरनेशनल मैचों के लिए बोर्ड को पिछली डील के मुकाबले काफी कम रकम मिली है। आइए जानते हैं इसकी बड़ी वजह

करीब 35 करोड़ में खरीदे टीवी राइट्स

सरकारी चैनल पाकिस्तान टेलीविजन कॉर्पोरेशन (पीटीवी) ने 2027 से शुरू होने वाले पीसीबी के घरेलू पुरुष क्रिकेट मैचों के अगले प्रसारण चक्र के लिए करीब 35 करोड़ पाकिस्तानी रुपये (लगभग 12 करोड़ भारतीय रुपये) में टीवी राइट्स खरीदे हैं। इस करार में कुल 25 मैच शामिल हैं, जिनमें 5 टेस्ट, 14 वनडे और 6 टी20 इंटरनेशनल मुकाबले खेले जाएंगे। द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, पीसीबी ने टीवी राइट्स के लिए करीब 20.7 करोड़ रुपये की शुरुआती बोली तय की थी, लेकिन इस प्रक्रिया में केवल एक ही कंपनी ने रुचि दिखाई।

वहीं, तीन बड़े ब्रॉडकास्टर्स ने डील में हिस्सा नहीं लिया और पीसीबी ने कंसोर्टियम को भी बोली लगाने की अनुमति नहीं दी। नई डील के तहत पाकिस्तान बोर्ड को हर इंटरनेशनल मैच से लगभग 82.8 लाख रुपये की कमाई होने की उम्मीद है।

कितने का था पिछला टीवी राइट्स

अगस्त 2024 से दिसंबर 2026 तक के पिछले प्रसारण अधिकार एआरवाई और टावर स्पोर्ट्स के एक समूह ने करीब 60 करोड़ रुपये में हासिल किए थे। इस समझौते में पाकिस्तान के 61 इंटरनेशनल मैच शामिल थे, जिनमें 11 टेस्ट, 26 वनडे और 24 टी20 मुकाबले थे। खास बात ये थी कि यह कीमत पीसीबी की तय शुरुआती 110.8 करोड़ रुपये की रकम से काफी कम थी। इस डील से बोर्ड को हर मैच के लिए औसतन करीब 1.01 करोड़ रुपये मिले थे। नई टीवी राइट्स डील की रकम पिछले समझौते के मुकाबले करीब 18 फीसदी कम रही है।

फाइनल में मिली हार

नई टीवी राइट्स डील में कमी होना पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के लिए चिंता की बात माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रसारण अधिकारों की बोली प्रक्रिया में कम कंपनियों के आने की एक बड़ी वजह पाकिस्तान क्रिकेट टीम का हालिया खराब प्रदर्शन है। इसके अलावा आयरलैंड और श्रीलंका के खिलाफ खेले गए मैचों को लेकर दर्शकों में भी ज्यादा उत्साह नहीं दिखा, जिसका असर टीवी राइट्स की कीमत पर पड़ा। एशियन गेम्स 2026 में टीम ने फाइनल तक का सफर तय किया और सेमीफाइनल में बांग्लादेश को आसानी से हराया। वहीं खिताबी मुकाबले में उसे भारत के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। पाकिस्तान को सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा।

टेस्ट में भी खराब प्रदर्शन

एशियन गेम्स से पहले पाकिस्तान की टीम टेस्ट क्रिकेट में लगातार संघर्ष करती नजर आई। अगस्त और सितंबर में इंग्लैंड दौरे पर उसे मेजबान टीम के खिलाफ तीन मैचों की टेस्ट सीरीज में एक भी जीत नहीं मिली और पाकिस्तान को 3-0 से सीरीज गंवानी पड़ी। हालांकि, इससे पहले वेस्टइंडीज दौरे पर टीम का प्रदर्शन कुछ बेहतर रहा था। दोनों देशों के बीच खेली गई दो टेस्ट मैचों की सीरीज 1-1 से बराबर रही। पाकिस्तान ने पहला टेस्ट हारने के बाद वापसी करते हुए दूसरे मुकाबले में वेस्टइंडीज को 8 विकेट से हराया था।

2026 Chess Olympiad: 11 साल की भारतीय मूल की ब्रिटिश शतरंज खिलाड़ी बोधना शिवनंदन सबसे कम उम्र की महिला ग्रैंडमास्टर बनीं

2026 Chess Olympiad: 11 साल की उम्र में भारतीय मूल की ब्रिटिश बोधना शिवनंद ने अपने नाम एक ऐसा खिताब कर लिया है, जिसे गिनती के कुछ लोग ही हासिल कर सकते हैं। हाल ही में उजबेकिस्तान के समरकंद में 2026 शतरंज ओलंपियाड आयोजित किया गया था। इसमें उन्होंने अपने खेल का ऐसा हुनर दिखाया कि सबसे कम उम्र की महिला ग्रैंडमास्टर का खिताब हासिल कर लिया। इस प्रतियोगिता में बोधना इंग्लैंड की ओर से उतरी थीं।

यह कोई तुक्का या एक बार का अच्छा प्रदर्शन नहीं था। अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ के अनुसार, बोधना ने ओलंपियाड में रविवार को अपना तीसरा और अंतिम WGM नॉर्म अर्जित किया। इससे पहले डब्लूजीएम का खिताब 12 साल की रूस की कैटेरीना लैग्नो के पास था, जिन्होंने यह खिताब 12 साल की उम्र हासिल किया था। लेकिन बोधन ने यह उपलब्धि सिर्फ 11 साल की उम्र में हासिल की इतिहास रच दिया है।

लॉकडाउन का शौक बोधना बना वर्ल्ड रिकॉर्ड का रास्ता

बोधना का जन्म 2015 में लंदन में तमिलनाडु में रहने वाले एक भारतीय परिवार में हुआ था। एक दिन, लॉकडाउन की अफरा-तफरी और बोरियत के दौरान, भारत वापस जाने से पहले एक फैंमिली फ्रेंड उनके घर आया और उन्हें एक चेस सेट दिया। बोधना ने टाइम पास करने के लिए चेस खेलना शुरू किया था। लेकिन, यह खेल कब उनका पैशन बन गया, किसी को भी नहीं पता चला। जब वह सात साल की हुईं, तो उन्होंने यूरोपियन स्कूल्स चैंपियनशिप के सभी 24 गेम जीत लिए। 2023 में, वह रडार पर आने लगीं, और ग्रैंडमास्टर्स के खिलाफ प्रभावशाली ढंग से अपना प्रदर्शन जारी रखा। 2024 में इंग्लैंड ने उन्हें बुडापेस्ट में चेस ओलंपियाड में अपनी महिला टीम के लिए चुना। तब वह सिर्फ नौ साल की थी। 2026 तक, वह इंग्लैंड की टॉप खिलाड़ी के तौर पर ओलंपियाड में वापस आई।

समरकंद मुकाबले में बोधाना शिवनंदन 

समरकंद में हुए 2026 चेस ओलंपियाड में, बोधाना ने इंग्लैंड के लिए पहले बोर्ड पर सभी 11 राउंड खेले, और आठ पॉइंट्स बनाए। उस रन ने न सिर्फ उसे रिकॉर्ड दिलाया, बल्कि उसका डब्लूजीएम टाइटल भी जिता दिया। इसे चेस की इंटरनेशनल गवर्निंग बॉडी FIDE ने कन्फर्म किया है।

ब्रिटेन की सबसे कम उम्र की महिला चेस चैंपियन

अगस्त 2026 में कोवेंट्री में ब्रिटिश चेस चैंपियनशिप में, उन्होंने प्लेऑफ के बाद आयरलैंड की त्रिशा कन्यामारला को हराकर महिलाओं का टाइटल जीता। वह पहले ही ब्लिट्ज और रैपिड में नेशनल चैंपियनशिप जीत चुकी हैं और रेगुलर तौर पर बड़ी और ज्यादा अनुभवी खिलाड़ियों का सामना करती हैं।

अभी भी प्राइमरी स्कूल में हैं बोधना

बोधना ने मजे के लिए, घर पर, महामारी के दौरान शतरंज खेलना शुरू किया था। अब, वह एक इंटरनेशनल चैंपियन, रिकॉर्ड बनाने वाली और शतरंज के इतिहास में सबसे कम उम्र की महिला ग्रैंडमास्टर है। और यह सब तब हुआ जब वह अब भी प्राइमरी स्कूल में हैं।

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ब्रिटेन में भारतीय छात्रों में 20% कमी की आशंका:वजह- वीजा में सख्ती; ऐसा हुआ तो ब्रिटेन को सालाना ₹10 हजार करोड़ का घाटा

अब ब्रिटेन में भी भारतीयों छात्रों की संख्या में भारी कमी आने की आशंका है। अमेरिका में ट्रम्प राज में भारतीय छात्र मुश्किलें झेल रहे थे, लेकिन अब वैसे ही हालात ब्रिटेन में भी हो रहे हैं। सेंटर फॉर ग्लोबल हायर एजुकेशन (सीजीएचई) यूके की रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। 2027 के मई-जून के दाखिलों (समर इनटेक) में भारतीय छात्रों की संख्या में 20% तक की कमी आ सकती है। इस साल सितंबर तक भारतीय छात्रों को लगभग 83 हजार स्टूडेंट वीजा मिले थे। अगले साल ये घटकर 63 हजार रहने की आशंका है। इसका सबसे बड़ा कारण ब्रिटेन की एंडी बर्नहैम सरकार की सख्त वीजा नीतियां हैं। ब्रिटेन में ग्रेजुएट वर्क वीजा डेढ़ साल किया गया दरअसल, ब्रिटेन में राष्ट्रवादी पार्टियों जैसे रिफॉर्म यूके के तेजी से उभरने के कारण वीजा में सख्ती हो रही है। रिफॉर्म यूके के एजेंडे में स्थानीयों को रोजगार देना प्रमुख है। इसलिए बर्नहैम सरकार अमेरिका की तर्ज पर वीजा जारी करने में बैकग्राउंड चेक में सख्ती बरत रही है। ब्रिटेन में ग्रेजुएट वर्क वीजा को दो साल से घटाकर अब डेढ़ साल कर दिया गया है। इससे स्टूडेंट्स को पढ़ाई के बाद ब्रिटेन में नौकरी और रिसर्च करने के लिए कम समय मिल पाएगा। भारत में ब्रिटेन की 9 यूनिवर्सिटी के कैंपस खुले वीजा में सख्ती के बीच एक राहत भी है। ब्रिटेन की साउथैम्पटन, लिवरपूल, यॉर्क जैसी 9 यूनिवर्सिटी ने भारत में अपने कैंपस खोलने का ऐलान किया है। इनमें से कुछ में पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है। जानकारों का मानना है कि भारतीय छात्र यहां पर दाखिले लेकर ब्रिटेन के स्तर की पढ़ाई कर सकते हैं। आने वाले समय में ब्रिटेन की और यूनिवर्सिटी भी आएंगी। 4 सवाल-जवाब में समझें इसका असर क्या; जर्मनी-फ्रांस-आयरलैंड होंगे नए स्टडी हब भारतीय छात्रों की कमी से क्या असर? भारतीय छात्रों की संख्या में कमी से ब्रिटेन की इकोनॉमी को सालाना लगभग 10 हजार करोड़ रुपए का घाटा झेलना पड़ेगा। लेकिन ब्रिटेन की सरकार सियासी हितों के साधने के फेर में वीजा नियम सख्त कर रही। छात्र अब किन देशों का रुख करेंगे? जर्मनी, आयरलैंड और फ्रांस में भारतीय छात्र रुख करेंगे। इन देशों में स्टूडेंट वीजा की अप्रूवल रेट 90% तक है। जर्मनी की सरकारी यूनिवर्सिटी में फीस माफी है। वीजा मुद्दे का क्या हल हो सकता है? भारत-ब्रिटेन एफटीए (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) में भारत की ओर से स्टूडेंट और प्रोफेशनल वीजा में रियायत का पॉइंट रखा गया था। ब्रिटेन की तत्कालीन ऋषि सुनक और फिर स्टारमर सरकारों ने अड़ियल रुख अपना कर वीजा प्रावधानों को हटा दिया था। डिपेंडेंट वीजा में भी दिक्कतें क्यों? ब्रिटेन में छात्रों और प्रोफेशनल्स को मिलने वाले डिपेंडेंट (आश्रितों) वीजा में भी सख्ती की गई है। यानी अब ब्रिटेन में आने वाले छात्र और प्रोफेशनल्स पत्नी, बच्चों और पैरेंट्स को साथ नहीं ला पाएंगे। इसके लिए 58 लाख रुपए सालाना की न्यूनतम वेतन सीमा रखी गई है। ——————————-

ब्रिटेन में भारतीय छात्रों में 20% कमी की आशंका:वजह- वीजा में सख्ती; ऐसा हुआ तो ब्रिटेन को सालाना ₹10 हजार करोड़ का घाटा

अब ब्रिटेन में भी भारतीयों छात्रों की संख्या में भारी कमी आने की आशंका है। अमेरिका में ट्रम्प राज में भारतीय छात्र मुश्किलें झेल रहे थे, लेकिन अब वैसे ही हालात ब्रिटेन में भी हो रहे हैं। सेंटर फॉर ग्लोबल हायर एजुकेशन (सीजीएचई) यूके की रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। 2027 के मई-जून के दाखिलों (समर इनटेक) में भारतीय छात्रों की संख्या में 20% तक की कमी आ सकती है। इस साल सितंबर तक भारतीय छात्रों को लगभग 83 हजार स्टूडेंट वीजा मिले थे। अगले साल ये घटकर 63 हजार रहने की आशंका है। इसका सबसे बड़ा कारण ब्रिटेन की एंडी बर्नहैम सरकार की सख्त वीजा नीतियां हैं। ब्रिटेन में ग्रेजुएट वर्क वीजा डेढ़ साल किया गया दरअसल, ब्रिटेन में राष्ट्रवादी पार्टियों जैसे रिफॉर्म यूके के तेजी से उभरने के कारण वीजा में सख्ती हो रही है। रिफॉर्म यूके के एजेंडे में स्थानीयों को रोजगार देना प्रमुख है। इसलिए बर्नहैम सरकार अमेरिका की तर्ज पर वीजा जारी करने में बैकग्राउंड चेक में सख्ती बरत रही है। ब्रिटेन में ग्रेजुएट वर्क वीजा को दो साल से घटाकर अब डेढ़ साल कर दिया गया है। इससे स्टूडेंट्स को पढ़ाई के बाद ब्रिटेन में नौकरी और रिसर्च करने के लिए कम समय मिल पाएगा। भारत में ब्रिटेन की 9 यूनिवर्सिटी के कैंपस खुले वीजा में सख्ती के बीच एक राहत भी है। ब्रिटेन की साउथैम्पटन, लिवरपूल, यॉर्क जैसी 9 यूनिवर्सिटी ने भारत में अपने कैंपस खोलने का ऐलान किया है। इनमें से कुछ में पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है। जानकारों का मानना है कि भारतीय छात्र यहां पर दाखिले लेकर ब्रिटेन के स्तर की पढ़ाई कर सकते हैं। आने वाले समय में ब्रिटेन की और यूनिवर्सिटी भी आएंगी। 4 सवाल-जवाब में समझें इसका असर क्या; जर्मनी-फ्रांस-आयरलैंड होंगे नए स्टडी हब भारतीय छात्रों की कमी से क्या असर? भारतीय छात्रों की संख्या में कमी से ब्रिटेन की इकोनॉमी को सालाना लगभग 10 हजार करोड़ रुपए का घाटा झेलना पड़ेगा। लेकिन ब्रिटेन की सरकार सियासी हितों के साधने के फेर में वीजा नियम सख्त कर रही। छात्र अब किन देशों का रुख करेंगे? जर्मनी, आयरलैंड और फ्रांस में भारतीय छात्र रुख करेंगे। इन देशों में स्टूडेंट वीजा की अप्रूवल रेट 90% तक है। जर्मनी की सरकारी यूनिवर्सिटी में फीस माफी है। वीजा मुद्दे का क्या हल हो सकता है? भारत-ब्रिटेन एफटीए (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) में भारत की ओर से स्टूडेंट और प्रोफेशनल वीजा में रियायत का पॉइंट रखा गया था। ब्रिटेन की तत्कालीन ऋषि सुनक और फिर स्टारमर सरकारों ने अड़ियल रुख अपना कर वीजा प्रावधानों को हटा दिया था। डिपेंडेंट वीजा में भी दिक्कतें क्यों? ब्रिटेन में छात्रों और प्रोफेशनल्स को मिलने वाले डिपेंडेंट (आश्रितों) वीजा में भी सख्ती की गई है। यानी अब ब्रिटेन में आने वाले छात्र और प्रोफेशनल्स पत्नी, बच्चों और पैरेंट्स को साथ नहीं ला पाएंगे। इसके लिए 58 लाख रुपए सालाना की न्यूनतम वेतन सीमा रखी गई है। ——————————-

Vaibhav Sooryavanshi: ‘घर में शेर और बाहर बिल्ली…’ वैभव को लेकर इस क्रिकेटर ने कह दी बड़ी बात

भारत और अफगानिस्तान के बीच खेले गए 3 मैचों की टी20 सीरीज को टीम इंडिया ने 3-0 से जीत ली है। वहीं सीरीज जीतने के बाद भारत के पूर्व मुख्य चयनकर्ता और 1983 विश्व कप विजेता टीम के खिलाड़ी ने विदेशों में भारतीय टीम के प्रदर्शन को लेकर सवाल उठाए हैं। वहीं उन्होंने कहा कि भारतीय बल्लेबाजों को सिर्फ घरेलू मैदान पर ही नहीं, बल्कि विदेशी में भी अच्छा प्रदर्शन करना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय टीम का दबदबा सिर्फ अपने देश में नहीं, बल्कि विदेशों में भी नजर आना चाहिए। बता दें हाल ही में विदेशों में भातरीय टीम का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है। भारत पहले आयरलैंड से और फिर इंग्लैंड से टी20 सीरीज हार गई थी।

वैभव को लेकर क्या कहा

भारत ने जून-जुलाई 2026 में व्हाइट-बॉल सीरीज के लिए आयरलैंड और इंग्लैंड का दौरा किया था, लेकिन 10 मैचों में टीम को सिर्फ एक जीत मिली। इस पर संदीप पाटिल ने नई दिल्ली में न्यूज18 इंडिया के ‘जज्बा: जड़ों से शिखर तक’ कार्यक्रम में कहा, “मैं चाहता हूं कि हमारे बल्लेबाज सिर्फ घरेलू मैदान पर ही नहीं, बल्कि जब विदेश जाएं तो वहां भी अच्छा प्रदर्शन करें। हमने देखा कि वैभव सूर्यवंशी ने उन परिस्थितियों में थोड़ा संघर्ष किया, जहां गेंद मूव कर रही थी। इसलिए हमारे चयनकर्ताओं, कोच और खिलाड़ियों को इस बारे में सोचना होगा। सिर्फ घर में दबदबा बनाना सही नहीं है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि घर में शेर और बाहर बिल्ली बन जाएं।”

भारत के लिए अहम होगी टेस्ट सीरीज

भारतीय टीम का विदेशी मैदानों पर हालिया प्रदर्शन चिंताजनक रहा है। अब टीम इस साल के आखिर में सभी फॉर्मेट की सीरीज खेलने के लिए न्यूजीलैंड का दौरा करेगी। इस दौरे पर भारत पांच टी20, पांच वनडे और दो टेस्ट मैच खेलेगा। टेस्ट सीरीज भारत के लिए काफी अहम होगी, क्योंकि इसमें हार या ड्रॉ होने पर 2027 वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने की उसकी उम्मीद खत्म हो सकती है।

अफगानिस्तान सीरीज के बाद एशियन गेम्स में भी नहीं मिलेगा वैभव को मौका? हेड कोच ने दिया बड़ा अपडेट

बैंच पर बैठे रहे गए वैभव सूर्यवंशी, दुखी चेहरे का वीडियो हुआ वायरल

जिम्बाब्वे दौरे पर मैन ऑफ द सीरीज का अवार्ड लेकर लौटे वैभव सूर्यवंशी को पता भी नहीं होगा कि वह अफगानिस्तान सीरीज का एक भी मैच खेलने को तरस जाएंगे। अफगानिस्तान के खिलाफ तीसरे अंतरराष्ट्रीय मैच के दौरान डगआउट में उनकी रुआंसी तस्वीर एक वीडियो के माध्यम से वायरल हो रही थी।

यह उनके शुरुआती करियर में दूसरी बार हुआ है। आयरलैंड दौरे पर भी वह बैंच पर ही बैठे रह गए थे और इंग्लैंड जाकर उनको डेब्यू नसीब हुआ था हालांकि अंतिम टी-20 में भी उनको बाहर बैठा दिया गया था।

इस उभरते हुए बल्लेबाज ने इंग्लैंड में तीन टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में 14, 13 और 15 रन बनाए। इनमें से दो पारियों में सूर्यवंशी जोफ्रा आर्चर की शॉर्ट गेंद पर आउट हुए। इंग्लैंड दौरे पर भारत के लिए अपने डेब्यू में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न कर पाने के बाद, सूर्यवंशी ने ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ टी20 सीरीज़ में प्रभावित किया। वहाँ उन्होंने कई मैचों में जीत दिलाने वाला प्रदर्शन किया और ‘प्लेयर ऑफ़ द सीरीज़’ चुने गए।

इस युवा बल्लेबाज ने 2026 आईपीएल सत्र में 776 रन बनाकर ऑरेंज कैप अपने नाम किया। इस दौरान उन्होंने एक शतक और पांच अर्धशतक जड़े तथा 237.30 के विस्फोटक स्ट्राइक रेट से बल्लेबाजी कर क्रिकेट जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा।इसके अलावा सबसे ज्यादा स्ट्राइक रेट (224) के कारण उन्हें सुपर स्ट्राइकर, टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा छक्के लगाने के कारण उभरते हुए खिलाड़ी का अवार्ड भी दिया गया।

युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी ने आईपीएल सबसे कम गेंदों में 1000 रन पूरे किए। उन्होंने 440 गेंदें खेलीं, जो सबसे तेज हैं।आईपीएल 2026 में सूर्यवंशी ने कुल 135 बाउंड्री लगाईं, जिसमें रिकॉर्ड 72 छक्के शामिल हैं, जो किसी भी टी 20 टूर्नामेंट में किसी भी बल्लेबाज़ द्वारा लगाए गए सबसे ज़्यादा छक्के हैं।

स्कॉटलैंड-वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड ने ब्रिटेन से आजादी मांगी:अलग होने पर पहली बार तीनों नेताओं की मीटिंग, कहा- लंदन हमें नहीं रोक सकता

स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की आजादी की मांग करने वाली पार्टियों के नेता पहली बार एक साथ आए हैं। वेल्स की राजधानी कार्डिफ में हुई बैठक में तीनों ने कहा कि इन देशों के लोगों को अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार है। उन्होंने ब्रिटेन की संसद वेस्टमिंस्टर को संदेश दिया कि वह लोकतांत्रिक तरीके से आजादी की मांग को रोक नहीं सकती। तीनों पार्टियां अपने-अपने क्षेत्रों को ब्रिटेन से ज्यादा अधिकार देने और आगे चलकर अलग देश बनाने की मांग करती हैं। हालांकि, आजादी के लिए जनमत संग्रह कब और कैसे कराया जाए, इस पर तीनों की राय एक जैसी नहीं है। समझौते में कही गईं 8 अहम बातें ब्रिटेन से अलग होना इतना आसान क्यों नहीं? यूनाइटेड किंगडम चार हिस्सों से बना है- इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की अपनी संसद और सरकारें हैं। उन्हें कई मामलों में अपने फैसले लेने की ताकत मिली हुई है। लेकिन रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मुद्दे अभी भी लंदन की सरकार के पास हैं। यह व्यवस्था अमेरिका या जर्मनी जैसी नहीं है, जहां केंद्र और राज्यों के अधिकार संविधान में साफ-साफ बांटे गए हैं। सबसे अहम बात यह है कि इन चारों में से कोई भी हिस्सा अपने दम पर ब्रिटेन से अलग होने का फैसला नहीं कर सकता। स्कॉटलैंड में पहले हो चुका है आजादी पर जनमत संग्रह स्कॉटलैंड में ब्रिटेन से अलग होने को लेकर 2014 में जनमत संग्रह हो चुका है। यह जनमत संग्रह वेस्टमिंस्टर की मंजूरी के बाद कराया गया था। इसमें लोगों से पूछा गया था कि क्या स्कॉटलैंड को ब्रिटेन से अलग होकर स्वतंत्र देश बनना चाहिए। नतीजे में 55% लोगों ने आजादी के खिलाफ और 45% ने इसके पक्ष में वोट दिया था। वेल्स में स्थिति अलग है। वहां की संसद सेनेड अपने दम पर आजादी के लिए जनमत संग्रह नहीं करा सकती। नॉर्दर्न आयरलैंड के लिए नियम कुछ अलग हैं। 1998 के गुड फ्राइडे समझौते के तहत अगर ब्रिटेन के नॉर्दर्न आयरलैंड सचिव को लगता है कि वहां बहुमत लोग आयरलैंड के साथ जुड़ने के पक्ष में वोट कर सकते हैं, तो ब्रिटिश सरकार को जनमत संग्रह कराना होगा। आजादी के समर्थन में कितने लोग हैं? हाल के कुछ सर्वे बताते हैं कि तीनों जगह ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था बदलने की मांग को समर्थन मिल रहा है। हालांकि, तीनों जगह स्थिति अलग-अलग है। लेकिन इन आंकड़ों को तीनों जगह एक जैसा नहीं देखा जा सकता। जैसे वेल्स की प्लेड कमरी पार्टी ने चुनाव में आजादी के मुद्दे पर ज्यादा जोर नहीं दिया था। वहीं, स्कॉटलैंड में आजादी का मुद्दा काफी बड़ा है, जबकि नॉर्दर्न आयरलैंड में इसके पीछे की राजनीतिक स्थिति अलग है। ऐसे में कार्डिफ की बैठक अहम है। पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की आजादी समर्थक पार्टियां एक साथ आई हैं और ब्रिटेन के भविष्य को लेकर अपनी बात रखी है। तीनों पार्टियों का कहना है कि अपने भविष्य का फैसला करने का हक आखिरकार इन देशों के लोगों के पास होना चाहिए। ———————— ब्रिटेन से अलग हो सकते हैं स्कॉटलैंड-वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड:कल नेताओं की मीटिंग, आजादी के फैसले पर जनमत संग्रह संभव
UK के एकजुट रहने पर फिर सवाल उठ रहे हैं। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के नेता सोमवार को वेल्स की राजधानी कार्डिफ में मिलने वाले हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

युवराज सिंह संग चामिंडा वास की एंट्री? IPL 2027 में दिल्ली कैपिटल्स में होने वाला है बड़ा बदलाव!

आईपीएल 2027 से पहले दिल्ली कैपिटल्स (Delhi Capitals) ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। टीम ने दिल्ली के एयरोसिटी में छोटा कैंप और ट्रायल आयोजित किया, जिसमें घरेलू खिलाड़ियों को अलग-अलग मैच परिस्थितियों में परखा गया। इस कैंप की जिम्मेदारी पूर्व भारतीय ऑलराउंडर युवराज सिंह (Yuvraj Singh) और पूर्व लेग स्पिनर अमित मिश्रा (Amit Mishra) ने संभाली। श्रीलंका के दिग्गज तेज गेंदबाज चामिंडा वास (chaminda Vaas) भी कैंप से जुड़े। 

 

गांगुली संभाल सकते हैं मुख्य कोच की जिम्मेदारी

 

दिल्ली कैपिटल्स के कोचिंग सेटअप में सबसे बड़ा बदलाव मुख्य कोच के पद पर देखने को मिल सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली हेमंग बदानी की जगह टीम के हेड कोच बन सकते हैं। गांगुली 2024 से जेएसडब्ल्यू स्पोर्ट्स के डायरेक्टर ऑफ क्रिकेट हैं और दिल्ली की टीम से पहले भी जुड़े रहे हैं। 

 

गांगुली इससे पहले 2019 आईपीएल सीजन में दिल्ली के मेंटर की भूमिका निभा चुके हैं। इसके अलावा 2025 में उन्होंने साउथ अफ्रीका की एसए20 टीम प्रिटोरिया कैपिटल्स के हेड कोच के रूप में भी काम किया था। अब अगर उनकी नियुक्ति होती है, तो दिल्ली को उनके अनुभव से टीम को नई दिशा देने की उम्मीद होगी।

 

 युवराज सिंह की भी होगी एंट्री

 

गांगुली के साथ पूर्व भारतीय ऑलराउंडर युवराज सिंह का नाम भी दिल्ली कैपिटल्स से जुड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, युवराज बैटिंग कोच (Batting Coach) या असिस्टेंट कोच (Assistant Coach) की भूमिका संभाल सकते हैं। अगर वह औपचारिक रूप से टीम के कोचिंग स्टाफ में शामिल होते हैं, तो यह आईपीएल में उनकी पहली आधिकारिक कोचिंग भूमिका होगी। 

yuvraj Singh

 

युवराज का युवा भारतीय बल्लेबाजों के साथ काम करने का अनुभव भी रहा है। शुभमन गिल, अभिषेक शर्मा और प्रभसिमरन सिंह जैसे खिलाड़ियों ने उनके मार्गदर्शन की तारीफ की है। दिल्ली के लिए खास तौर पर युवा बल्लेबाजों और मिडिल ऑर्डर को तैयार करने में उनका अनुभव अहम हो सकता है।

 

चामिंडा वास संभाल सकते हैं पेस अटैक

 

श्रीलंका के पूर्व तेज गेंदबाज चामिंडा वास भी दिल्ली कैपिटल्स के संभावित नए कोचिंग सेटअप का हिस्सा बन सकते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह टीम के तेज गेंदबाजी कोच की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं। हालांकि, फ्रेंचाइजी ने अभी उनकी नियुक्ति की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। वास दिल्ली के तैयारी कैंप और ट्रायल से जुड़ चुके हैं। 

 

वास का अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बेहद शानदार रहा है। उन्होंने श्रीलंका के लिए 111 टेस्ट में 355 विकेट और 322 वनडे में 400 विकेट लिए। वह 1996 विश्व कप जीतने वाली श्रीलंकाई टीम का भी हिस्सा रहे। उनके पास श्रीलंका के अलावा न्यूजीलैंड और आयरलैंड के साथ कोचिंग और तेज गेंदबाजों के साथ काम करने का अनुभव भी है। 

 अमित मिश्रा के पास स्पिन की कमान

 

दिल्ली कैपिटल्स के सपोर्ट स्टाफ में पूर्व भारतीय लेग स्पिनर अमित मिश्रा का नाम भी शामिल हो सकता है। मिश्रा आईपीएल में दिल्ली डेयरडेविल्स, डेक्कन चार्जर्स, सनराइजर्स हैदराबाद और लखनऊ सुपर जायंट्स के लिए खेल चुके हैं। उन्होंने सितंबर 2025 में क्रिकेट से संन्यास लिया था। 

 

मिश्रा ने आईपीएल करियर में 162 मैचों में 174 विकेट लिए और उनकी इकॉनमी रेट 7.37 रही। वह आईपीएल इतिहास में सबसे ज्यादा हैट्रिक लेने वाले गेंदबाज भी हैं, उनके नाम 3 हैट्रिक दर्ज हैं। ऐसे में स्पिन गेंदबाजों को टी20 की परिस्थितियों और बल्लेबाजों को पढ़ने की बारीकियां सिखाने में उनका अनुभव दिल्ली के काम आ सकता है। 

 

दिल्ली ने अभी से शुरू की 2027 की तैयारी

 

दिल्ली कैपिटल्स ने पिछले महीने बेंगलुरु की जस्ट क्रिकेट अकादमी में भी ऑफ-सीजन कैंप और ट्रायल आयोजित किए थे। वहां अच्छा प्रदर्शन करने वाले कुछ खिलाड़ियों को दिल्ली के कैंप में दोबारा मौका दिया गया। फ्रेंचाइजी का फोकस घरेलू प्रतिभाओं की पहचान करने और मिनी ऑक्शन से पहले अपना पूल मजबूत करने पर है। 

 

दिल्ली कैपिटल्स पिछले दो सीजन में प्लेऑफ तक नहीं पहुंच सकी है। 2025 और 2026 में टीम का अभियान निराशाजनक रहा था। अब संभावित नए कोचिंग सेटअप और घरेलू खिलाड़ियों पर फोकस के जरिए फ्रेंचाइजी 2027 में अपनी तस्वीर बदलना चाहती है। 

 

 2027-28 में JSW के हाथों में ऑपरेशन

 

दिल्ली कैपिटल्स के सह-मालिक जेएसडब्ल्यू और जीएमआर के बीच हुए समझौते के तहत टीम का संचालन हर दो साल में बदलता है। आईपीएल 2027 और 2028 के दौरान क्रिकेट ऑपरेशंस की जिम्मेदारी जेएसडब्ल्यू के पास रहेगी। ऐसे में आने वाले सीजन के लिए टीम के ढांचे में बदलाव की चर्चाओं को इसी नए ऑपरेशनल फेज से भी जोड़कर देखा जा रहा है। 

 

गांगुली, युवराज, वास और अमित मिश्रा की बताई गई नई भूमिकाएं अभी रिपोर्ट्स/संभावनाओं पर आधारित हैं; दिल्ली कैपिटल्स की ओर से इन नियुक्तियों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

ब्रिटेन के बंटवारे पर साथ आएंगे स्कॉटलैंड, वेल्स-नॉर्दर्न आयरलैंड:तीनों जगहों के नेताओं की कल मीटिंग, अलग होने के पक्ष में

UK के एकजुट रहने पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर सोमवार को वेल्स की राजधानी कार्डिफ में मिलेंगे। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की सरकार के प्रमुख को फर्स्ट मिनिस्टर कहा जाता है। इनके साथ अलग देश आयरलैंड की पार्टी सिन फेन की अध्यक्ष मैरी लू मैकडोनाल्ड भी रहेंगी। बैठक में नेता हर क्षेत्र को अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार देने की बात पर साझा बयान जारी कर सकते हैं। इसमें जरूरत पड़ने पर आजादी या दूसरे बड़े बदलावों पर जनमत संग्रह कराने की बात भी शामिल है। इस बैठक से UK पर दबाव बढ़ सकता है। UK से अलग होने के पक्ष में तीनों जगहों की पार्टियां ब्रिटेन की केंद्र सरकार देश को एकजुट रखने के पक्ष में है। लेकिन स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ज्यादा अधिकार और बड़े बदलाव की मांग बढ़ रही है। इन तीनों जगहों पर ऐसी पार्टियां प्रभावशाली हैं जो ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव चाहती हैं। स्कॉटलैंड में SNP आजादी का समर्थन करती है। वेल्स में प्लाइड कम्री भी आजादी की मांग करती है। वहीं नॉर्दर्न आयरलैंड में सिन फेन आयरलैंड के साथ जुड़ने का समर्थन करती है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी और वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर रुन एपी इओर्थवर्ट के साथ नॉर्दर्न आयरलैंड का नेतृत्व भी साझा घोषणा का समर्थन कर सकता है। बैठक में आजादी और संवैधानिक बदलाव के अलावा अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, यूरोप और दूसरे देशों से रिश्ते मजबूत करने पर भी चर्चा होगी। स्कॉटलैंड में फिर जनमत संग्रह की चर्चा स्कॉटलैंड की आजादी इस पूरी बहस का सबसे बड़ा मुद्दा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने हाल ही में कहा था कि अगर स्कॉटलैंड और नॉर्दर्न आयरलैंड में आजादी के पक्ष में लोगों के बीच सहमति बनती है, तो एक और जनमत संग्रह पर विचार किया जा सकता है। SNP ने बर्नहम के इस बयान को तुरंत मुद्दा बना लिया। इसके बाद में बर्नहम को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर स्विनी को चिट्ठी लिखकर कहा कि अगले आम चुनाव से पहले आजादी पर जनमत संग्रह नहीं कराया जाएगा। नॉर्दर्न आयरलैंड को लेकर भी उन्होंने कहा कि अभी ब्रिटेन से अलग होने को लेकर ऐसा माहौल नहीं है। बर्नहम ने 2024 के चुनावी घोषणापत्र का हवाला देते हुए कहा कि लेबर पार्टी स्कॉटलैंड की आजादी या एक और जनमत संग्रह का समर्थन नहीं करती। स्विनी – UK पर एकजुट रहने का दबाव बढ़ा स्विनी ने बर्नहम के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ऐसे फर्स्ट मिनिस्टर हैं जो आजादी के पक्ष में हैं। उनके मुताबिक, इससे साफ है कि ब्रिटेन को एकजुट रखने वाली मौजूदा व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। वहीं, वेल्स में भी ज्यादा अधिकार की मांग तेज हो गई है। मई में हुए चुनाव में वहां ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली पार्टियों को मजबूती मिली है।

96 सीट पर हुए चुनाव में अलग देश की समर्थक प्लाइड कम्री को 43 जबकि लेबर पार्टी को सिर्फ 9 सीटें मिलीं। इस चुनाव के बाद प्लाइड कम्री के रुन एपी इओर्थवर्ट वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर बने। नॉर्दर्न आयरलैंड के पास आयरलैंड से जुड़ने का रास्ता नॉर्दर्न आयरलैंड का मामला स्कॉटलैंड और वेल्स से अलग है। 1998 के गुड फ्राइडे समझौते के तहत अगर यह संभावना दिखे कि नॉर्दर्न आयरलैंड के ज्यादातर लोग ब्रिटेन से अलग होकर आयरलैंड के साथ जुड़ना चाहते हैं, तो वहां जनमत संग्रह कराया जा सकता है। यहां की नेता सिन फेन का कहना है कि कार्डिफ की बैठक में भी इसी अधिकार की बात उठाई जाएगी कि हर देश और क्षेत्र को लोकतांत्रिक तरीके से अपना भविष्य तय करने का मौका मिलना चाहिए। ट्रम्प के बयान से आयरलैंड के एकीकरण की चर्चा बढ़ी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी हाल में आयरलैंड के एकीकरण पर बयान दिया है। शनिवार को डबलिन दौरे के दौरान ट्रम्प ने कहा कि वह आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना पसंद करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपतियों का इस मुद्दे पर आमतौर पर सावधानी भरा रुख रहा है। ऐसे में ट्रम्प का बयान इस बहस को और चर्चा में ले आया है। मामला सिर्फ आजादी का नहीं, पैसा और यूरोप भी अहम कार्डिफ की बैठक सिर्फ ब्रिटेन से अलग होने की मांग तक सीमित नहीं है। तीनों जगहों की कई प्रमुख पार्टियां यूरोपीय यूनियन के साथ करीबी रिश्तों की समर्थक हैं। UK 2020 में आधिकारिक तौर पर यूरोपीय यूनियन से आजाद हो गया था। इसके लिए 2016 में वोटिंग हुई थी। अगर स्कॉटलैंड या वेल्स भविष्य में आजाद होते हैं, तो वे EU की सदस्यता के लिए आवेदन कर सकते हैं। वहीं अगर नॉर्दर्न आयरलैंड आयरलैंड में शामिल होता है, तो वह EU का हिस्सा बन जाएगा, क्योंकि आयरलैंड पहले से EU का सदस्य है। अब जानिए कि ये तीनों इलाके ब्रिटेन से कैसे जुड़े और अब अलग होने की मांग क्यों हो रही है… स्कॉटलैंड करीब 300 साल पहले स्कॉटलैंड और इंग्लैंड दो अलग-अलग देश थे। दोनों के अपने राजा, संसद और कानून थे। साल 1603 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम की मौत हो गई। उनका कोई वारिस नहीं था। तब स्कॉटलैंड के राजा जेम्स VI इंग्लैंड के भी राजा बन गए। यानी अब एक ही व्यक्ति दो देशों का राजा था, लेकिन दोनों देश फिर भी अलग-अलग थे। इसके करीब 100 साल बाद बड़ा फैसला हुआ। 1707 में स्कॉटलैंड और इंग्लैंड की संसद ने समझौता किया। दोनों देश मिलकर ग्रेट ब्रिटेन बन गए। इसके बाद दोनों की अलग-अलग संसद नहीं रही और एक साझा संसद बनी। अलग देश बनने की मांग कब तेज हुई 20वीं सदी में स्कॉटलैंड की आजादी की मांग को राजनीतिक ताकत मिलने लगी। 1934 में स्कॉटिश नेशनल पार्टी (NSP) बनी, जिसका मकसद स्कॉटलैंड को अलग देश बनाना था। इसके बाद यह मुद्दा धीरे-धीरे मजबूत होता गया। 1999 में स्कॉटलैंड को अपनी संसद और सरकार वापस मिली। इससे स्कॉटलैंड को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे कई मामलों में खुद फैसले लेने का अधिकार मिला, लेकिन रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मुद्दे अब भी ब्रिटेन की केंद्र सरकार के पास रहे। फिर आया 2014 का जनमत संग्रह। स्कॉटलैंड के लोगों से पूछा गया कि क्या वे UK से अलग होकर स्वतंत्र देश बनना चाहते हैं। करीब 55% लोगों ने अलग होने के खिलाफ और 45% ने समर्थन में वोट दिया। इसलिए स्कॉटलैंड UK का हिस्सा बना रहा। साल 2016 के बाद स्कॉटलैंड में आजादी की मांग फिर तेज होने लगी। दरअसल स्कॉटलैंड के ज्यादातर लोगों ने 2016 में यूरोपीय यूनियन में बने रहने के लिए वोट किया था, जबकि पूरे UK ने EU छोड़ने का फैसला किया। वेल्स 13वीं सदी में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड प्रथम ने वेल्स पर कब्जा कर लिया। इंग्लैंड के साथ जुड़ने के बावजूद वेल्स ने अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान बनाए रखी। 19वीं और 20वीं सदी में इन्हें बचाने के आंदोलन तेज हुए। इसी दौर में 1925 में प्लाइड कम्री पार्टी बनी। शुरुआत में पार्टी का जोर वेल्श भाषा और संस्कृति बचाने पर था। बाद में उसने वेल्स को ज्यादा अधिकार और फिर स्वतंत्र देश बनाने की मांग शुरू की। 1999 में वेल्स को अपनी अलग संसद और सरकार मिली। हालांकि रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मुद्दे अभी भी UK सरकार के पास हैं। वेल्स में आजादी की मांग स्कॉटलैंड के मुकाबले कमजोर है। लेकिन प्लाइड कम्री इसे लगातार राजनीतिक मुद्दा बनाए हुए है। नॉर्दर्न आयरलैंड वेल्स, स्कॉटलैंड और इंग्लैंड ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बन चुके थे। 1801 में आयरलैंड भी इसमें शामिल हो गया। हालांकि शुरुआत से ही आयरलैंड के कई हिस्से में इसका विरोध जारी रहा। लंबे संघर्ष के बाद 1922 में आयरलैंड का ज्यादातर हिस्सा UK से अलग होकर स्वतंत्र देश बन गया। लेकिन आयरलैंड का उत्तरी हिस्सा यानी नॉर्दर्न आयरलैंड UK के साथ ही रहा। नॉर्दर्न आयरलैंड में ब्रिटेन के समर्थकों को यूनियनिस्ट कहा जाता है। ये ईसाई धर्म के प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग थे। दूसरी तरफ आयरिश राष्ट्रवादी और ज्यादातर कैथोलिक समुदाय था, जिसका एक बड़ा हिस्सा आयरलैंड के साथ जुड़ना चाहता था। आज भी नॉर्दर्न आयरलैंड में दो तरह की सोच मौजूद है। कुछ लोग UK के साथ रहना चाहते हैं, जबकि कुछ आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहते हैं।

Grok से भारत के नियम पूछ रहा था आयरिश शख्स, वायरल हुई बातचीत तो Elon Musk ने भी दे दिया जवाब

आयरलैंड से भारत पहुंचे एक शख्स ने देश में बसने को लेकर AI चैटबॉट Grok से ऐसे सवाल पूछ दिए कि सोशल मीडिया पर पूरी चर्चा छिड़ गई। पार्टनर और दो बच्चों के साथ कोलकाता पहुंचे इस व्यक्ति ने मजाकिया अंदाज में कहा कि उसे भारत इतना पसंद आया कि अब वह यहीं रहने का मन बना रहा है।

इसके बाद उसने Grok से भारतीय नागरिकता, सरकारी आर्थिक मदद और भारत में घर खरीदने जैसे सवाल पूछे। देखते ही देखते सवाल-जवाब का यह सिलसिला X पर वायरल हो गया।

‘मुझे भारत इतना पसंद आया कि यहीं रुक रहा हूं’

कोलकाता पहुंचने के बाद शख्स ने X पर अपनी खुशी जाहिर करते हुए लिखा कि वह भारत आ चुका है और उसे यहां इतना अच्छा लग रहा है कि उसने यहीं रहने का फैसला कर लिया है। इसके बाद उसका अगला सवाल सीधा भारतीय नागरिकता को लेकर था। उसने Grok से पूछा कि आखिर उसे भारतीय नागरिक बनने में कितना समय लगेगा।

नागरिकता के लिए कितने साल रहना होगा?

Grok ने उसे बताया कि प्राकृतिककरण के जरिए भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए आम तौर पर लंबे समय तक भारत में कानूनी रूप से रहना जरूरी होता है। AI चैटबॉट के मुताबिक, आवेदन से पहले पिछले 14 वर्षों में 11 साल भारत में निवास और आवेदन से ठीक पहले लगातार एक साल भारत में रहना जैसी शर्तें लागू होती हैं। जवाब का एक और हिस्सा उसके लिए शायद ज्यादा चौंकाने वाला था भारत दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता। यानी भारतीय नागरिकता लेने की स्थिति में उसे अपनी आयरिश नागरिकता छोड़नी पड़ सकती है।

फिर आया सबसे दिलचस्प सवाल

नागरिकता के बाद शख्स ने Grok से पूछा कि जब तक वह और उसका परिवार नौकरी तलाश रहे होंगे, तब तक भारतीय सरकार उन्हें कितनी आर्थिक मदद देगी। Grok का जवाब था कि नए आने वाले विदेशी नागरिकों के लिए भारत में ऐसी कोई सामान्य नकद बेरोजगारी सहायता नहीं है, जिस पर वे सिर्फ देश में पहुंचने के आधार पर दावा कर सकें। यानी परिवार को अपनी आर्थिक जरूरतों का इंतजाम खुद करना होगा।

अब सवाल घर खरीदने का था

इसके बाद बातचीत और दिलचस्प हो गई। शख्स ने पूछा कि अगर उसके पास पैसे हों तो क्या वह भारत में घर खरीद सकता है। उसने एक काल्पनिक स्थिति भी रखी कि अगर उसने कैसीनो में 1 लाख यूरो जीते हों और उसके पास वह रकम हो, तो क्या उससे भारत में प्रॉपर्टी खरीदी जा सकती है।

Grok ने समझाया कि सिर्फ पैसे होना पर्याप्त नहीं है। भारत में विदेशी नागरिक के लिए प्रॉपर्टी खरीदने के नियम उसकी इमिग्रेशन और रेजिडेंसी स्थिति पर निर्भर करते हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों ने खूब लिए मजे

पूरी बातचीत सामने आने के बाद X पर यूजर्स ने तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दीं। किसी को यह सवाल-जवाब बेहद मजेदार लगा, तो कुछ लोगों ने भारतीय नियमों को लेकर अपनी राय साझा की। एक यूजर ने मजाकिया अंदाज में कहा कि भारत में नागरिकता के लिए लंबा इंतजार करना होगा और यहां कल्याणकारी योजनाएं भी नए आने वालों के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।

Elon Musk भी खुद को रोक नहीं पाए

यह वायरल चर्चा तब और दिलचस्प हो गई जब इसे X यूजर Peter St Onge ने शेयर किया। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को मजेदार बताया। पोस्ट पर ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सिर्फ तीन शब्दों में लिखा—“India is realistic.” Musk की इस छोटी-सी प्रतिक्रिया के बाद पोस्ट को और ज्यादा लोगों का ध्यान मिला।

एक मजाकिया सवाल-जवाब ने छेड़ दी बड़ी चर्चा

दरअसल, यह पूरा मामला सिर्फ एक विदेशी परिवार के भारत में बसने की इच्छा तक सीमित नहीं रहा। नागरिकता, सरकारी सहायता और प्रॉपर्टी खरीदने जैसे सवालों ने सोशल मीडिया पर भारत के नियमों को लेकर भी चर्चा शुरू कर दी।

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