Trump Tariffs: अमेरिका और कनाडा के बीच नहीं हो सकी डील, अब कनाडाई सामान पर लगेगा 50% टैरिफ

अमेरिका और कनाडा के बीच नए टैरिफ (आयात शुल्क) को टालने के लिए हो रही बातचीत आखिरी समय में टूट गई। इसका मतलब है कि अमेरिका का डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन अब कनाडा से आने वाले अरबों डॉलर के सामान पर 50 प्रतिशत आयात शुल्क लगाएगा। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शनिवार को रात 12:01 बजे से अमेरिका द्वारा कनाडा से खरीदी जाने वाली सैकड़ों चीजों, जैसे प्लाईवुड, शराब, बिजली के उपकरण और हॉकी के सामान पर नए टैरिफ लागू हो जाएंगे।

टैरिफ टालने के मुद्दे पर समझौता न हो पाने से इन दो पुराने सहयोगियों के बीच तनाव बढ़ गया है। अमेरिका और कनाडा ने पिछले साल लगभग 900 अरब डॉलर का व्यापार (सामान और सेवाओं का) किया था। टैरिफ के अलावा, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कनाडा को अमेरिका का एक राज्य बनाने की बात कही है। उन्होंने वहां के प्रधानमंत्रियों को गवर्नर कहा है और दावा किया है कि कनाडा, अमेरिका के बिना नहीं टिक सकता।

हफ्तों से चल रही थी बातचीत

अमेरिका और कनाडा के अधिकारी टैरिफ के मसले पर हफ्तों से बातचीत कर रहे थे और एक ड्राफ्ट डील पर सहमत हुए थे। इसमें अमेरिका की ओर से कनाडा के कुछ स्टील और एल्युमीनियम पर टैरिफ घटाकर 25 प्रतिशत करना और कनाडा की गाड़ियों पर ड्यूटी घटाकर 15 प्रतिशत करना शामिल था। इसके बदले में, कनाडा को उन जवाबी कदमों को हटाना था, जो ट्रंप द्वारा ट्रेड वॉर शुरू करने के बाद पिछले साल लागू किए गए थे। व्हाइट हाउस कई रियायतें चाहता था, जिसमें अमेरिकी गाड़ियों पर कनाडा के जवाबी टैरिफ को खत्म करना और ज्यादातर प्रांतों में अमेरिकी शराब की खुदरा बिक्री पर लगी रोक को हटाना शामिल था।

लेकिन दोनों पक्ष डील को अंतिम रूप नहीं दे पाए। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर का कहना है कि कनाडा ने डील को अंतिम रूप देने से इनकार कर दिया। एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, आगे की बातचीत के लिए कोई समय तय नहीं किया गया है।

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Sugar Price : चीनी के दाम क्यों बढ़ रहे हैं? 15 दिन में ₹20 महंगी हुई, सरकार ने उठाया बड़ा कदम, जानें आपके लिए क्या बदलेगा

Sugar Price : चीनी के दाम क्यों बढ़ रहे हैं? 15 दिन में ₹20 महंगी हुई, सरकार ने उठाया बड़ा कदम, जानें आपके लिए क्या बदलेगा

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अगर आपको पिछले कुछ दिनों में चीनी पहले से महंगी लग रही है, तो इसकी वजह समझना आपके घरेलू बजट के लिए जरूरी है। त्योहारों से पहले चीनी की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, महज 15 दिनों में चीनी के दाम करीब 20 रुपये तक बढ़ गए हैं। ऐसे में मिठाई, चाय और घर की रोजमर्रा की जरूरतों पर इसका असर पड़ सकता है।

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बढ़ती कीमतों और घरेलू बाजार में चीनी के स्टॉक को लेकर सरकार ने अब बड़ा फैसला लिया है। केंद्र सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन रॉ-शुगर के ड्यूटी-फ्री आयात को मंजूरी दी है। यानी तय सीमा के भीतर विदेश से आने वाली कच्ची चीनी पर आयात शुल्क नहीं लगेगा।

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सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?

घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों पर दबाव कम करने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है। DGFT (विदेश व्यापार महानिदेशालय) ने गुरुवार को इस संबंध में नोटिफिकेशन जारी किया है। सरकार का मानना है कि शुल्क-मुक्त आयात से घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलेगी और बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने में राहत मिल सकती है।

 

31 अक्टूबर तक मिलेगी ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की सुविधा

DGFT के नोटिफिकेशन के अनुसार, टैरिफ रेट कोटा (TRQ) के तहत 10 लाख मीट्रिक टन रॉ-शुगर का आयात किया जा सकेगा। यह सुविधा 31 अक्टूबर 2026 तक लागू रहेगी। नोटिफिकेशन के मुताबिक, रॉ-शुगर का आयात सामान्य तौर पर 'फ्री' रहेगा, लेकिन 10 लाख मीट्रिक टन की शुल्क-मुक्त सीमा और निर्धारित शर्तें लागू होंगी।

सरकार ने तय की स्टॉक सीमा

भारत सरकार ने 10 मीट्रिक टन से अधिक मासिक चीनी इस्तेमाल करने वाले डीलरों के लिए स्टॉक सीमा तय की है। सरकारी अधिसूचना के अनुसार ऐसे डीलर 15 दिनों से ज्यादा का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। यह आदेश 1 सितंबर से 30 नवंबर तक लागू रहेगा। अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के कारण चीनी की मांग बढ़ती है। इस दौरान बिस्कुट और कन्फेक्शनरी कंपनियां पहले से स्टॉक बढ़ाती हैं। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार सीमित मात्रा में ड्यूटी-फ्री चीनी आयात की अनुमति देने पर विचार कर रही है। करीब एक दशक बाद भारत में चीनी आयात का रास्ता खुल सकता है।

आयातित चीनी को विदेश नहीं भेज सकेंगे

सरकार ने इस योजना के तहत एक अहम शर्त भी रखी है। आयात की गई रॉ-शुगर से तैयार की गई रिफाइंड चीनी को 31 अक्टूबर 2026 तक घरेलू बाजार में ही बेचना होगा।  इसका मतलब है कि इस ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट के तहत लाई गई चीनी को दोबारा निर्यात नहीं किया जा सकेगा। इससे सरकार का फोकस घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाने पर है।

 

चीनी महंगी होने की क्या वजह है?

चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं। इनमें घरेलू उत्पादन, उपलब्ध स्टॉक और बाजार में मांग जैसे कारक महत्वपूर्ण हैं। त्योहारों से पहले मिठाई और अन्य खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ने से भी चीनी की खपत बढ़ सकती है। चीनी का स्टॉक घट रहा है। मौजूदा सीजन के अंत में घरेलू चीनी स्टॉक काफी कम रहने की आशंका है। कम उत्पादन और पिछले सीजन में हुए निर्यात ने उपलब्धता पर दबाव बढ़ाया है।  महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी और अनियमित मानसून से अगले सीजन के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी है।

 

इसके अलावा, गन्ने से एथेनॉल उत्पादन को लेकर भी राजनीतिक बहस जारी है। कांग्रेस ने एथेनॉल नीति को चीनी की उपलब्धता और कीमतों से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं। हालांकि, चीनी के दाम बढ़ने की पूरी तस्वीर समझने के लिए उत्पादन, स्टॉक, मांग और एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल—सभी पहलुओं को देखना जरूरी है।

आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

सरकार के इस फैसले का सीधा उद्देश्य बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों पर दबाव कम करना है। अगर आयातित रॉ-शुगर की सप्लाई समय पर बाजार में आती है, तो इससे चीनी की कीमतों में तेजी को रोकने में मदद मिल सकती है। आम उपभोक्ताओं के लिए इसका असर खास तौर पर त्योहारों के दौरान महत्वपूर्ण होगा, जब घरों में चीनी की खपत के साथ-साथ मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग भी बढ़ जाती है। 

क्या और बढ़ेंगे दाम ?

दावा किया जा रहा है कि बाजार में मांग की तुलना में करीब आधी ही चीनी की आपूर्ति हो पा रही है। आने वाले दिनों में रक्षाबंधन, गणेशोत्सव, जन्माष्टमी और दिवाली जैसे त्योहारों से मांग और बढ़ेगी। इससे चीनी के दाम में और तेजी आने की आशंका है।

मानसून का इस बार खेती पर कैसा असर! खरीफ फसलों की बुआई का गैप घटकर 2% पहुंचा पर धान दे रहा टेंशन, समझिए इसके मायने

देश में इस साल मानसूनी बारिश की शुरुआती सुस्ती के बाद अब खेती-किसानी के मोर्चे पर राहत भरी खबर सामने आ रही है। जून के महीने में बीते 12 सालों की सबसे कम बारिश (40 फीसदी घाटा) दर्ज की गई थी, लेकिन जुलाई में हुई सामान्य बारिश ने खरीफ फसलों की बुआई की रफ्तार को दोबारा पटरी पर ला दिया है। Bloomberg की एक रिपोर्ट के मुताबिक मानसूनी फसलों के रकबे में जून के मुकाबले बड़ा सुधार देखने को मिला है। अगर आने वाले दिनों में बारिश का यह सिलसिला यूं ही जारी रहता है तो इससे देश में खाद्यान्न की महंगाई को कंट्रोल करने में बड़ी मदद मिल सकती है।

बुआई का अंतर घटकर 2% पर आया, 101.7 मिलियन हेक्टेयर में हुई बुआई

कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 14 अगस्त तक देशभर के किसानों ने 101.7 मिलियन हेक्टेयर (लगभग 251 मिलियन एकड़) में मानसूनी फसलों की बुआई पूरी कर ली है। यह आंकड़ा पिछले साल की समान अवधि में हुई बुआई के मुकाबले महज 2 फीसदी कम है। जून के महीने में अल नीनो के असर की वजह से यह अंतर काफी ज्यादा था।

ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में कृषि सचिव आतिश चंद्रा ने बताया कि जून के बाद से बुआई की गति में काफी सुधार देखने को मिला है। दलहन, तिलहन और कपास जैसी प्रमुख फसलों की बुआई संतोषजनक दिख रही है। हालांकि कुछ फसलों का रकबा पिछले साल से थोड़ा कम है तो कुछ दूसरी फसलों के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी भी देखी गई है।

अगस्त और सितंबर की बारिश होगी बेहद अहम

भारत की कुल वार्षिक बारिश का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून से ही मिलता है। यह मानसून न सिर्फ फसलों की सिंचाई के लिए बल्कि भूजल स्तर को रिचार्ज करने के लिए भी बहुत जरूरी है। जून से सितंबर तक चलने वाले इस सीजन में उगाई जाने वाली फसलें देश के कुल वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा होती हैं।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक 17 अगस्त तक देश में क्यूमेलेटिव बारिश सामान्य से 13 प्रतिशत कम रही है। कृषि सचिव ने स्पष्ट किया कि फसलों की पैदावार और अंतिम उत्पादन के लिए अगस्त और सितंबर महीनों की बारिश बेहद निर्णायक साबित होगी। इसके लिए कृषि मंत्रालय लगातार राज्य सरकारों के साथ मिलकर स्थिति की निगरानी कर रहा है। आतिश चंद्रा ने कहा कि हम राज्यों से आग्रह कर रहे हैं कि वे किसानों को इस सीजन में उपलब्ध सभी भूमि पर खेती करने के लिए प्रोत्साहित करें, भले ही बुआई में थोड़ी देरी ही क्यों न हो रही हो।

धान की बुआई पिछड़ी, लेकिन अभी भी उम्मीद बरकरार

खरीफ सीजन की सबसे प्रमुख फसल यानी धान का रकबा अभी भी पिछले आंकड़ों से पीछे चल रहा है। ये चिंता का विषय बना हुआ है। वैसे कृषि सचिव का कहना है कि किसानों के पास अगस्त के अंत तक और कुछ राज्यों/क्षेत्रों में सितंबर के महीने तक भी धान की रोपाई करने का समय उपलब्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि अभी फसलों के अंतिम उत्पादन का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी क्योंकि राज्यों के साथ समय-समय पर समीक्षा बैठकें आयोजित की जा रही हैं।

इसका सप्लाई और महंगाई पर क्या पड़ेगा असर?

अगर मानसूनी बारिश और फसलों की बुआई में यह रिकवरी नहीं होती तो देश में खाद्यान्न की सप्लाई प्रभावित हो सकती थी। सप्लाई घटने से खाने के सामान की कीमतें बढ़तीं और महंगाई पर काबू पाने की सरकारी को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता था। कृषि और खाद्य बाजार पर दबाव के संकेत पहले से ही दिखने लगे हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो भारत लगभग एक दशक में पहली बार चीनी के आयात शुल्क में कटौती करने पर विचार कर रहा है ताकि घरेलू स्तर पर कीमतों और आपूर्ति को संतुलित रखा जा सके।

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Gold Rate Today: सावन के तीसरे सोमवार को सोना आया और नीचे, मुंबई में ₹142190 में बिक रहा 22 कैरेट

सोमवार, 17 अगस्त को देश में सोने की कीमत और कम हो गई है। राजधानी दिल्ली में सुबह के वक्त 24 कैरेट गोल्ड की कीमत घटकर 155270 रुपये प्रति 10 ग्राम रह गई। मुंबई में भाव 155120 रुपये प्रति 10 ग्राम है। अन्य शहरों में भी ​सोना फिसला है। पिछले सप्ताह अलग-अलग शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 3490 रुपये तक ​बढ़ी। वहीं 22 कैरेट गोल्ड 3200 रुपये तक महंगा हुआ। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 4,379.9 डॉलर प्रति औंस पर है। बीते सप्ताह सोने की वैश्विक कीमत लगभग 0.9 प्रतिशत बढ़ी।

देश के कुछ बड़े शहरों में गोल्ड रेट

दिल्ली में सोने की कीमत: दिल्ली में 24 कैरेट सोने की कीमत 155270 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 142340 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

मुंबई और कोलकाता: मुंबई और कोलकाता में 22 कैरेट सोने की कीमत 142190 रुपये प्रति 10 ग्राम, जबकि 24 कैरेट सोने की कीमत 155120 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

चेन्नई में सोने की कीमत: 24 कैरेट सोने की कीमत 155120 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 142190 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

पुणे और बेंगलुरु में कीमत: इन दोनों शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 155120 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट गोल्ड की कीमत 142190 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

शहर22 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)24 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)
दिल्ली142340155270
मुंबई142190155120
अहमदाबाद142240155170
चेन्नई142190155120
कोलकाता142190155120
हैदराबाद142190155120
जयपुर142340155270
भोपाल142240155170
लखनऊ142340155270
चंडीगढ़142340155270

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चांदी की कीमत

दूसरी कीमती धातु चांदी की कीमत में भी गिरावट का रुख है। 17 अगस्त की सुबह कीमत गिरकर 249900 रुपये प्रति किलोग्राम रह गई। पिछले सप्ताह भाव 5000 रुपये ​बढ़ा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर चांदी यानि कि स्पॉट सिल्वर की कीमत 64.88 डॉलर प्रति औंस पर है।

जुलाई में सोने का आयात मामूली बढ़ा, चांदी का घटा

कीमती धातुओं पर सीमा शुल्क में वृद्धि के बाद जुलाई में भारत के सोने और चांदी के आयात में नरमी आई। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में सोने का आयात केवल 4.77 प्रतिशत बढ़ा और 4.16 अरब डॉलर रहा। चांदी का आयात 66.1 प्रतिशत घटकर 17.16 करोड़ डॉलर रह गया। सरकार ने 13 मई से कीमती धातुओं पर आयात शुल्क को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया था।

Gold Price Today: सोना एक हफ्ते में ₹3490 तक महंगा, वैश्विक कीमत 0.9% बढ़ी

देश में सोने की कीमत में वीकली बेसिस पर अच्छी मजबूती दिख रही है। अलग-अलग शहरों में एक सप्ताह में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 3490 रुपये तक ​बढ़ी है। वहीं 22 कैरेट गोल्ड 3200 रुपये तक महंगा हुआ है। आज 16 अगस्त को राजधानी दिल्ली में सुबह के वक्त 24 कैरेट गोल्ड 155280 रुपये प्रति 10 ग्राम पर है। मुंबई में कीमत 155130 रुपये प्रति 10 ग्राम है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 4,379.9 डॉलर प्रति औंस पर है। एक सप्ताह में सोने की वैश्विक कीमत लगभग 0.9 प्रतिशत बढ़ी है।

देश के कुछ बड़े शहरों में गोल्ड रेट

दिल्ली में सोने की कीमत: दिल्ली में 24 कैरेट सोने की कीमत 155280 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 142350 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

मुंबई और कोलकाता: मुंबई और कोलकाता में 22 कैरेट सोने की कीमत 142200 रुपये प्रति 10 ग्राम, जबकि 24 कैरेट सोने की कीमत 155130 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

चेन्नई में सोने की कीमत: 24 कैरेट सोने की कीमत 155130 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 142200 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

पुणे और बेंगलुरु में कीमत: इन दोनों शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 155130 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट गोल्ड की कीमत 142200 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

शहर22 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)24 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)
दिल्ली142350155280
मुंबई142200155130
अहमदाबाद142250155180
चेन्नई142200155130
कोलकाता142200155130
हैदराबाद142200155130
जयपुर142350155280
भोपाल142250155180
लखनऊ142350155280
चंडीगढ़142350155280

इस म्यूचुअल फंड ने ₹10 लाख के निवेश को सिर्फ 13 साल में ₹1.25 करोड़ बना दिया

चांदी की कीमत

सोने की तरह चांदी भी वीकली बेसिस पर महंगी हुई है। एक सप्ताह में भाव 5000 रुपये ​बढ़ा है। 16 अगस्त की सुबह चांदी की कीमत 250000 रुपये प्रति किलोग्राम है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर चांदी यानि कि स्पॉट सिल्वर की कीमत 64.88 डॉलर प्रति औंस पर है।

जुलाई में सोने का आयात मामूली बढ़ा, चांदी का घटा

कीमती धातुओं पर सीमा शुल्क में वृद्धि के बाद जुलाई में भारत के सोने और चांदी के आयात में नरमी आई। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में सोने का आयात केवल 4.77 प्रतिशत बढ़ा और 4.16 अरब डॉलर रहा। इससे पहले, अप्रैल में सोने के आयात में 81.69 प्रतिशत, मई में 34 प्रतिशत और जून में 7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। चांदी का आयात 66.1 प्रतिशत घटकर 17.16 करोड़ डॉलर रह गया। सरकार ने 13 मई से कीमती धातुओं पर आयात शुल्क को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया था। अप्रैल-जुलाई 2026 अवधि में सोने का कुल आयात 32.41 प्रतिशत बढ़कर 15.17 अरब डॉलर हो गया। चांदी का आयात 50.81 प्रतिशत घटकर 71.84 करोड़ डॉलर रहा।

देश में सुस्त पड़ी गोल्ड की डिमांड लेकिन, खर्च ₹1.98 लाख करोड़ के रिकॉर्ड हाई पर

Gold Report: गोल्ड की बढ़ती चमक ने इसकी मांग सुस्त की लेकिन बिक्री वैल्यू रिकॉर्ड हाई लेवल पर पहुंच गई। इसका खुलासा वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों से हुआ है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council- WGC) की भारत पर बनी ताजा रिपोर्ट के अनुसार इस साल 2026 की दूसरी तिमाही अप्रैल-जून 2026 में भारतीयों ने वॉल्यूम के हिसाब से कम सोना खरीदा लेकिन रिकॉर्ड ऊंची कीमतों के कारण सोने पर अब तक का सबसे अधिक खर्च किया। जून 2026 तिमाही में देश में गोल्ड की मांग सालाना आधार पर 6% घटकर 131 टन रह गई, जो हालिया वर्षों में साल की सबसे कमजोर जून तिमाही में से एक रही।। हालांकि जितनी भी डिमांड रही, उसकी वैल्यू 50% बढ़कर रिकॉर्ड ₹1.98 लाख करोड़ पर पहुंच गई, क्योंकि घरेलू बाजार में गोल्ड के भाव इस दौरान करीब 59% मजबूत हुए।

इस कारण कमजोर हुई गोल्ड की मांग

गोल्ड के सेल्स वॉल्यूम में गिरावट की मुख्य वजह इसके भाव में दो साल में ताबड़तोड़ तेजी रही। इसके अलावा मई के मध्य में आयात शुल्क में बढ़ोतरी, रुपये की कमजोरी और खरीदारी के लिए शुभ नहीं समझे जाने वाले महीने ने भी दबाव बनाया। इंटरनेशनल मार्केट में इसकी कीमतें कुछ नरम हुईं लेकिन आयात शुल्क और रुपये की कमजोरी के कारण भारत में इसके भाव ऊंचे बने रहे। हालांकि मार्च तिमाही की तुलना में जून तिमाही में अक्षय तृतीया और शादी-ब्याह के मौसम की खरीदारी के चलते ज्वेलरी की मांग 14% बढ़कर 75 टन हो गई लेकिन फिर भी सालाना आधार पर यह 15% कम रही और साल 2000 के बाद दूसरी सबसे कमजोर जून तिमाही रही।

बदला खरीदारी का तरीका

ऊंची कीमतों के बावजूद लोगों ने सोना खरीदना बंद नहीं किया, बल्कि अपनी खरीदारी का तरीका बदल दिया। ज्वेलर्स के मुताबिक हल्के वजन, कम कैरेट और स्टडेड (रत्न जड़ी) ज्वेलरी की मांग बढ़ी। पुराने गहने बदलकर नए खरीदने का चलन भी तेज हुआ और कुछ ज्वेलर्स के मुताबिक उनकी कुल बिक्री का 70% तक हिस्सा इसी के जरिए आया और जून तिमाही में इसमें 10–20% की तेजी आई। जून तिमाही में ज्वेलरी की खरीदारी वॉल्यूम के हिसाब से भले ही कम हुई लेकिन वैल्यू 34% बढ़कर ₹1.13 लाख करोड़ हो गई। इस दौरान भारत दुनिया का सबसे बड़ा ज्वेलरी मार्केट बना रहा और ग्लोबल ज्वेलरी डिमांड में उसकी हिस्सेदारी 27% रही।

बार, कॉइन्स और गोल्ड ईटीएफ मिलाकर इंवेस्टमेंट डिमांड तीन धमाकेदार तिमाही के बाद जून तिमाही में कमजोर हुई। निवेश की मांग घटकर 54 टन रह गई जबकि इससे पहले की तीन तिमाहियों में औसतन मांग 100 टन की थी। हालांकि जून तिमाही में मांग घटने के बावजूद यह लॉन्ग टर्म एवरेज से ऊपर बनी रही।

बार और सिक्कों की खरीदारी मार्च तिमाही की तुलना में 19% घटकर जून तिमाही में 50 टन रह गई, क्योंकि कीमतों में तेज उछाल के बाद निवेशकों ने कुछ समय के लिए इंतजार करना उचित समझा। फिर भी सालाना आधार पर यह 9% अधिक रहा और इस साल की पहली छमाही में बार और सिक्कों की खरीद 13 साल के रिकॉर्ड हाई लेवल पर पहुंच गई।

गोल्ड ईटीएफ की बात करें तो मार्च तिमाही में रिकॉर्ड निवेश के बाद जून तिमाही में इसकी मांग घटकर लगभग 4 टन रह गई। इसके बावजूद भारत उन देशों में शुमार रहा, जहां गोल्ड ईटीएफ में निवेश आया, जबकि अमेरिका और चीन जैसे देशों में निवेशकों ने पैसे निकाले। जून के अंत तक भारत में गोल्ड ईटीएफ की कुल होल्डिंग 119 टन और AUM (एसेट अंडर मैनेजमेंट) ₹1.7 लाख करोड़ तक पहुंच गईं।

सप्लाई की बात करें तो देश में गोल्ड की उपलब्धता घटकर 120 टन रह गई, जो पिछले छह साल का रिकॉर्ड निचला स्तर है। इसकी मुख्य वजह आयात शुल्क बढ़ने के बाद सोने के आयात में भारी गिरावट रही। तिमाही आधार पर इसमें 53% और सालाना आधार पर 22% की गिरावट आई। हालांकि वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया गया है कि घरेलू बाजार में गोल्ड की कोई कमी नहीं थी। पहले से मौजूद स्टॉक और रिसाइकल्ड गोल्ड मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक ऊंची कीमतों के बावजूद लोगों ने पुराने गहने बेचने की बजाय उन्हें गिरवी रखकर कर्ज लेना अधिक पसंद किया। बैंकों में बकाया गोल्ड लोन सालाना आधार पर दोगुना होकर ₹5.1 लाख करोड़ पहुंच गया, जबकि एनबीएफसी कंपनियों का गोल्ड लोन पोर्टफोलियो 70% बढ़कर यह ₹3.3 लाख करोड़ तक पहुंच गया।

EPF Account: रिटायरमेंट के तुरंत बाद PF का पूरा पैसा निकालना बड़ी भूल!

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

US New Tariffs Row: भारत समेत 60 देशों पर नए टैरिफ को लेकर डोनाल्ड ट्रंप का भारी विरोध, 25 अमेरिकी राज्यों ने ठोका मुकदमा

US New Tariffs Row: डेमोक्रेटिक पार्टी शासित 25 अमेरिकी राज्यों के एक समूह ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस फैसले को अदालत में चुनौती दी है, जिसके तहत अमेरिका के कुल आयात में 99.4 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली 60 अर्थव्यवस्थाओं पर नए आयात शुल्क (टैरिफ) लगाए गए हैं। अमेरिका ने बंधुआ मजदूरी पर पर्याप्त कार्रवाई न होने का हवाला देते हुए पिछले महीने इन 60 देशों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक के नए आयात शुल्क लगाए थे।

ये शुल्क 24 जुलाई को समाप्त हो चुके 10 प्रतिशत के ग्लोबल इंपोर्ट ड्यूटी के स्थान पर लागू किए गए हैं। राज्यों का तर्क है कि व्हाइट हाउस जबरन मजदूरीसे जुड़ी चिंताओं का गलत इस्तेमाल करके एक बड़े टैरिफ सिस्टम को फिर से लागू करने की कोशिश कर रहा है। जबकि इस साल की शुरुआत में उसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हार का सामना करना पड़ा था।

इन 25 राज्यों ने कई देशों पर फिर से शुल्क लागू करने के ट्रंप प्रशासन के फैसले के खिलाफ सोमवार 3 अगस्त को अमेरिकी इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट का रुख किया। राज्यों का तर्क है कि इस कदम से पूरे देश में उपभोक्ताओं और कारोबारियों पर लागत का बोझ बढ़ेगा। न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटीटिया जेम्स, गर्वनर कैथी होचुल और डेमोक्रेटिक राज्यों के इस समूह ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय से इन शुल्कों को अवैध घोषित करने का अनुरोध किया है।

जेम्स ने एक बयान में कहा, “सुप्रीम कोर्ट में हार के बाद भी प्रशासन (ट्रंप) एक बार फिर नए शुल्कों के जरिए परिवारों और कारोबारों पर अवैध रूप से अतिरिक्त कर का बोझ डालने की कोशिश कर रहा है।” भारत उन 17 देशों में शामिल है, जिन पर अमेरिका ने 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया है। इससे पहले भारत पर 12.5 प्रतिशत शुल्क निर्धारित करने का प्रस्ताव था। भारत को यह राहत 14 जून को अपनी विदेश व्यापार नीति में संशोधन कर बंधुआ मजदूरी से बने सामान के आयात पर प्रतिबंध लगाने के बाद मिली।

बयान में कहा गया कि प्रशासन दावा कर रहा है कि वह वैश्विक व्यापार में बंधुआ मजदूरी पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत कार्रवाई कर रहा है। याचिका में दलील दी गई कि यह वास्तव में उन व्यापक आयात शुल्कों को दोबारा लागू करने का एक बहाना भर है, जिन्हें लागू करने के प्रशासन के पूर्व प्रयास विफल हो चुके हैं।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि ट्रंप प्रशासन ने धारा 301 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल ने कहा, “प्रशासन इसे किसी भी तरह उचित ठहराने की कोशिश करे। लेकिन कानून और हमारा संविधान स्पष्ट करता है कि राष्ट्रपति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी देश पर व्यापक शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है।”

25 राज्यों में से 23 में डेमोक्रेटिक गवर्नर

न्यूज एजेंसी AFP की रिपोर्ट के अनुसार, मुकदमे में शामिल 25 राज्यों में से 23 में डेमोक्रेटिक गवर्नर हैं। जबकि नेवादा और वरमोंट में रिपब्लिकन गवर्नर हैं। कोर्ट में हार के बाद प्रशासन ने सेक्शन 301 का रास्ता अपनाया ट्रंप ने पहले ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ के तहत बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाए थे। उनका तर्क था कि अमेरिका का लगातार बना हुआ व्यापार घाटा एक राष्ट्रीय आपातकाल के बराबर है।

हालांकि, फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यह कानून राष्ट्रपति को ऐसे टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता है। इसके चलते प्रशासन को उस व्यवस्था के तहत वसूले गए शुल्क (ड्यूटी) वापस करने पड़े। इसके बाद व्हाइट हाउस ने कुछ समय के लिए 10% का ग्लोबल टैरिफ लगाया, जो 24 जुलाई को खत्म हो गया।

इसके बाद ‘ट्रेड एक्ट 1974’ के सेक्शन 301 के तहत मौजूदा शुल्क लागू किए गए। ट्रंप प्रशासन ने इन नए शुल्कों को सही ठहराने के लिए इसी प्रावधान का इस्तेमाल किया। उनका तर्क था कि प्रभावित देश जबरन मजदूरी (forced labour) से बने सामान के आयात को रोकने में नाकाम रहे हैं।

व्हाइट हाउस ने टैरिफ का बचाव किया

ट्रंप प्रशासन ने इस मुकदमे को खारिज कर दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा है कि ये टैरिफ कानूनी रूप से पूरी तरह सही हैं। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने कहा, “अमेरिका अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल उन अनुचित कार्यों, नीतियों और प्रथाओं को खत्म करने के लिए कर रहा है जो अमेरिकी व्यापार पर बोझ डालते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “किसी विदेशी देश का जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर रोक न लगाना और उसे प्रभावी ढंग से लागू न कर पाना अनुचित है। इससे अमेरिकी व्यापार और अमेरिकी श्रमिकों पर बोझ पड़ता है। इस समस्या का समाधान किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति के पहले कार्यकाल से ही सेक्शन 301 के तहत लगाए गए टैरिफ कानूनी रूप से मजबूत हथियार साबित हुए हैं और अभी भी हैं।”

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ट्रंप ने ऊंचे टैरिफ का बचाव करते हुए इसे अपने आर्थिक एजेंडे का एक अहम हिस्सा बताया है। उनका तर्क है कि इससे अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को फिर से बढ़ावा मिलेगा, घरेलू श्रमिकों की सुरक्षा होगी और व्यापार वार्ता में वाशिंगटन को बेहतर स्थिति मिलेगी।