2027 Kawasaki KLX300SM revealed

2027 Kawasaki KLX300SM revealed
2027 Kawasaki KLX230 SM front right quarter.

If you saw the picture and thought the KLX230 got a new variant, you’re neither alone nor correct. What we have here is the KLX300SM, Kawasaki’s supermotard for the overseas markets, and the Japanese manufacturer has just given it a minor engineering and feature refresh for 2027.

  1. 2027 KLX300SM continues with a 292cc engine but with revised internals
  2. Not expected in India for the foreseeable future

2027 Kawasaki KLX300SM: What’s different from 2026?

The road-biased KLX230 upgrade that’s not in India (yet)

Discussing the changes is a very short affair in the KLX300SM’s case since there are only a few. First, the connecting rod big-end bearing has been changed from a needle bearing to a plain bearing, contributing to improved performance and slightly higher peak power and torque over the previous model. The single-cylinder liquid-cooled mill now makes 26.8hp and 24.9Nm compared to 25hp and 23.9Nm earlier.

Second, unlike in India, ABS is not mandatory in the US, so Kawasaki is adding single-channel ABS to the front 300mm disc for next year; the rear 240mm continues to be lockable by riders, but those who ride the KLX300SM are unlikely to complain about it. To accommodate the new ABS hardware, Kawasaki has switched from the dual radiators to a single, left-mounted radiator. However, Kawasaki says there shouldn’t be a difference in the overall cooling performance. Keeping in line with the times, Kawasaki has also updated the instrumentation and added smartphone connectivity. Through the Kawasaki Rideology app, users can connect their phone to the KLX300 for call/SMS alerts and navigation support.

Rider performing a left leaning turn on the 2027 Kawasaki KLX300 SM.

Supermotards typically offer long travel suspension and a slender build with road-biased tyres, usually 17-inch, at both ends. In the KLX300’s case, it has a USD fork with 230mm travel, adjustable for compression. The monoshock with 206mm travel can be adjusted for preload and rebound. This and the road-biased wheel and tyre setup are what make supermotards a fun package. For context, the KLX230 S – Kawasaki India’s road-focused dual-sport – has 160mm travel at the front and 163mm travel at the rear.

In the US, Kawasaki has priced the KLX300SM at USD 6,399 (Rs 6.08 lakh) for its single variant, and it will be available from early December. As for India, we’re only now starting to warm up to niche categories like off-roaders, thanks to the Hero Xpulse series and KLX230 (and the Honda XR series on the horizon), so Kawasaki is unlikely to bring the KLX300SM here anytime soon. That said, it would be nice to have the KLX300SM and its refreshed dual-sport siblings in India, and more variety for the KLX230 series (there’s also a KLX230 SM!).

2027 Kawasaki KLX300 SM right profile.

सऊदी के महंगे हथियारों पर हूतियों के सस्ते ड्रोन भारी:15 लाख का ड्रोन रोकने में 30 करोड़ खर्च; यमन में जीत का रास्ता मुश्किल

सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा पर दशकों से अरबों डॉलर खर्च किए हैं। उसके पास आधुनिक फाइटर जेट हैं। मिसाइलों को हवा में नष्ट करने वाले महंगे सिस्टम भी हैं। सैन्य खर्च के मामले में वह दुनिया के शीर्ष 10 देशों में शामिल है। हूतियों के पास सऊदी अरब जैसी बड़ी सेना और आधुनिक हथियार नहीं हैं। लेकिन उन्होंने सस्ते ड्रोन और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों को अपनी ताकत बना लिया है। इन हथियारों का पता लगाना और उन्हें हवा में ही नष्ट करना मुश्किल होता है। सऊदी अरब के लिए हूतियों के सस्ते ड्रोन रोकना महंगा सौदा साबित हो रहा है। करीब 15 लाख रुपए के एक ड्रोन को नष्ट करने के लिए 25 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं। हूती विद्रोही इसका फायदा उठाकर सऊदी अरब की महंगी सुरक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती खड़ी कर रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि सऊदी अरब के पास इतने आधुनिक हथियार होने के बावजूद हूती उसके अहम ठिकानों तक पहुंच कैसे जा रहे हैं? महंगे हथियारों के सामने सस्ते ड्रोन की चुनौती सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका और यूरोपीय देशों से आधुनिक और महंगे हथियार खरीदता रहा है। इनमें अत्याधुनिक फाइटर जेट, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। लेकिन हूतियों के हमले के आगे ये सब बेअसर हैं। वे कम कीमत वाले ड्रोन और क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं। ये हथियार कई बार जमीन के काफी करीब उड़ते हैं। ऐसे में रडार के लिए उनका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। सऊदी अरब को इन हमलों को रोकने के लिए कई बार बेहद महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ता है। एक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत करीब 30 करोड़ होती है। इसके मुकाबले एक ड्रोन की कीमत महज 15 लाख होती है। इसका नुकसान सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं है। महंगी मिसाइलों का भंडार भी सीमित होता है। यूक्रेन और ईरान जंग से इंटरसेप्टर मिसाइल की मांग बढ़ी यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्धों के कारण दुनियाभर में मिसाइल इंटरसेप्टर की मांग बढ़ी है। ऐसे में सऊदी अरब के लिए लंबे समय तक इसी तरह हमलों को रोकते रहना मुश्किल हो सकता है। हूतियों की ताकत भी पहले जैसी नहीं रही। उन्होंने अपने हथियारों के भंडार को बढ़ाया है। अब वे कुछ हथियार खुद भी बनाने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक रिपोर्ट में इसका जिक्र भी किया गया है कि अब हूती ईरान के भरोसे नहीं रहे। सऊदी की सुरक्षा का फोकस गलत दिशा में रहा सऊदी अरब की एक बड़ी कमजोरी उसका रडार सिस्टम है। देश ने अपनी सुरक्षा के लिए पूर्वी और उत्तर-पूर्वी इलाकों पर ज्यादा ध्यान दिया। इन दिशाओं से ईरान और इराक की तरफ से खतरा माना जाता रहा है। लेकिन यमन दक्षिण-पश्चिम में है। इस तरफ से होने वाले हमलों को पकड़ने और रोकने की व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है। हवाई हमलों को रोकने के लिए सबसे जरूरी है कि दुश्मन के ड्रोन या मिसाइल का समय रहते पता चल जाए। अगर हमले का पता देर से चलता है, तो जवाबी कार्रवाई के लिए कम समय बचता है। ऐसे में महंगी और आधुनिक मिसाइलें होने के बावजूद हमले को रोकना मुश्किल हो जाता है। सेना की बनावट भी बन रही है परेशानी सऊदी अरब की मुश्किल सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं है। उसकी सेना का ढांचा और काम करने का तरीका भी चुनौती पैदा करते हैं। सऊदी अरब की नियमित सेना में करीब 2.5 लाख सैनिक हैं। वहीं, नेशनल गार्ड में करीब 1.25 लाख सैनिक हैं। नेशनल गार्ड सेना से अलग है। इसमें ऐसे कबीलों के लोगों की भर्ती की जाती रही है, जिन्हें सऊदी राजपरिवार का वफादार माना जाता है। सेना में सुधार के लिए मोहम्मद बिन सलमान ने 2018 में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को हटाया। रियाद में संयुक्त सैन्य कमान बनाने की दिशा में भी कदम उठाए गए, ताकि सेना की अलग-अलग इकाइयों के बीच तालमेल बेहतर हो सके। हालांकि, सेना की कार्यशैली बदलना आसान नहीं है। आधुनिक हथियारों के साथ उन्हें चलाने का प्रशिक्षण, तेजी से फैसले लेने की क्षमता और बेहतर तालमेल भी जरूरी है। 2015 में यमन युद्ध शुरू किया, लेकिन जीत आसान नहीं रही सऊदी अरब की मौजूदा परेशानी को समझने के लिए यमन युद्ध का इतिहास देखना जरूरी है। 2015 में मोहम्मद बिन सलमान ने रक्षा मंत्री के रूप में यमन में सैन्य अभियान शुरू किया था। उस समय उम्मीद थी कि हूतियों को कुछ ही हफ्तों में कमजोर कर दिया जाएगा। लेकिन युद्ध लंबा खिंचता गया।हूतियों ने यमन के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। उन्होंने सऊदी अरब पर भी बार-बार हमले किए। इस युद्ध में सऊदी अरब को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को भी धक्का लगा। 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ। इससे लड़ाई कुछ समय के लिए थमी, लेकिन संघर्ष का स्थायी समाधान नहीं निकल सका। अब अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बीच क्षेत्र में तनाव फिर बढ़ गया है। हूती भी इस संघर्ष में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। सऊदी अरब के सामने अब समस्या यह है कि वह केवल हवाई हमलों के जरिए हूतियों को हरा पाएगा या नहीं, इस पर गंभीर संदेह है। यमन में हूतियों के विरोधी गुट भी बंटे हुए हैं। उनके बीच एकजुटता की कमी है। ऐसे में सऊदी अरब के लिए जमीन पर किसी मजबूत सहयोगी के सहारे हूतियों को पीछे धकेलना भी आसान नहीं है। ईरान को कैसे मिल रहा है फायदा? हूती ईरान के सबसे प्रभावशाली सहयोगियों में गिने जाते हैं। वे सऊदी अरब और अमेरिका के लिए संघर्ष की लागत बढ़ा सकते हैं। इससे ईरान को क्षेत्र में दबाव बनाने का मौका मिलता है। अमेरिका ने 2025 में हूतियों के खिलाफ करीब चार महीने तक सैन्य अभियान चलाया था। इसके बावजूद वह उन्हें पूरी तरह झुका नहीं सका। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी दोबारा बड़े सैन्य अभियान में उतरने को लेकर हिचक दिखा चुके हैं। अगर हूती अपनी शर्तों पर समझौता कराने में सफल होते हैं या सऊदी अरब को पीछे हटने के लिए मजबूर करते हैं, तो यह ईरान और उसके सहयोगी गुटों के लिए बड़ी रणनीतिक उपलब्धि होगी। यमन मामलों की विशेषज्ञ फारिया अल-मुस्लिमी के मुताबिक, हूती अपनी समस्याओं का हल बातचीत के बजाय युद्ध के जरिए निकालने की कोशिश करते हैं। वहीं, सऊदी अरब को लगता था कि ज्यादा पैसा खर्च करके और आधुनिक हथियार खरीदकर वह अपने दुश्मनों को काबू में कर सकता है। लेकिन हूतियों के लगातार हमलों ने दिखा दिया कि सिर्फ पैसा और हथियार होने से दुश्मन को हराना आसान नहीं है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों ने यमन के राष्ट्रपति भवन पर हमला किया:5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, 4 की मौत; प्रधानमंत्री मौजूद थे, बाल-बाल बचे यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, सभी सुरक्षित हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

यूरोप में युवाओं पर बुजुर्ग भारी पड़ रहे:पेंशन पर सरकारी खजाना खर्च; Gen Z नौकरी-घर और अच्छी शिक्षा मांग रहे

पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

यूरोप में युवाओं पर बुजुर्ग भारी पड़ रहे:पेंशन पर सरकारी खजाना खर्च; Gen Z नौकरी-घर और अच्छी शिक्षा मांग रहे

पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

दिल्ली में CJP के तिरंगा मार्च से पहले बड़ा फैसला, 16-17 अक्टूबर को बंद रहेगा कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क

दिल्ली में CJP के तिरंगा मार्च से पहले बड़ा फैसला, 16-17 अक्टूबर को बंद रहेगा कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क

delhi police

दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित तिरंगा मार्च से पहले नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) ने कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क को दो दिनों के लिए आम लोगों के लिए बंद करने का फैसला किया है। NDMC की ओर से 15 अक्टूबर को जारी सार्वजनिक नोटिस के अनुसार, पार्क 16 और 17 अक्टूबर को प्रशासनिक कारणों से बंद रहेगा। हालांकि, अधिकारियों ने पार्क बंद करने के पीछे के विशिष्ट कारणों पर टिप्पणी करने से इनकार किया है। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर को शाम 5 बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज के साथ जुटने की अपील की है। ऐसे में पार्क बंद करने के फैसले को प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले की तैयारियों के संदर्भ में देखा जा रहा है, हालांकि NDMC ने आधिकारिक तौर पर इसकी वजह स्पष्ट नहीं की है।

ALSO READ: CJP की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हंगामा, अभिजीत दीपके बोले- 50-100 रुपए देकर बाहर कीजिए, लहरा दो तिरंगा को लेकर बताया प्लान

सेंट्रल पार्क के पांचों गेट रहेंगे बंद

कनॉट प्लेस के बीचोंबीच स्थित सेंट्रल पार्क राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के ऊपर बना है। करीब 41,500 वर्ग मीटर में फैले इस पार्क में चार जलाशय, 350 लोगों की क्षमता वाला एम्फीथिएटर और 207 फुट ऊंचे स्तंभ पर लगा विशाल राष्ट्रीय ध्वज है। NDMC के एक अधिकारी के मुताबिक, वरिष्ठ अधिकारियों से पार्क बंद रखने के निर्देश मिले हैं। इसके तहत पार्क के सभी पांच प्रवेश द्वार बंद किए जाएंगे। NDMC का उद्यान विभाग इस पार्क की देखरेख करता है। अधिकारी ने बताया कि पार्क का एम्फीथिएटर सरकारी कार्यक्रमों के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। सप्ताहांत में यहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।

ALSO READ: मुस्कान कैदी नंबर 396, साहिल 395… जेल में बदली पहचान, जानिए जेल में दोनों को क्या काम मिलेगा?

राष्ट्रीय ध्वज के पास लोगों को रोकना हो सकता है चुनौतीपूर्ण

अधिकारी के अनुसार, पार्क की चारदीवारी की रेलिंग लगभग तीन से चार फुट ऊंची है। ऐसे में लोगों को पार्क में प्रवेश करने से रोकना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। पार्क के एक कोने में लगा विशाल राष्ट्रीय ध्वज भी अंदरूनी सड़क से कुछ ही दूरी पर स्थित है। अधिकारी ने कहा कि ध्वज के पास लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है और ऐसी स्थिति में कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी पुलिस की होगी।

 

दिल्ली हाईकोर्ट ने मार्च पर रोक लगाने से किया इनकार

 

सेंट्रल पार्क बंद करने का फैसला ऐसे समय आया है, जब दिल्ली हाईकोर्ट ने CJP और अभिजीत दिपके के प्रस्तावित मार्च पर रोक लगाने का आदेश देने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने दिल्ली पुलिस के इस आश्वासन को दर्ज किया कि वह कानून के अनुसार भीड़ को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगी। अदालत में याचिका पालिका बाजार के एक रेहड़ी-पटरी विक्रेता ने दायर की थी। याचिकाकर्ता ने आशंका जताई थी कि प्रदर्शन से कनॉट प्लेस में कारोबार प्रभावित हो सकता है और त्योहारों के मौसम में व्यापारियों तथा छोटे विक्रेताओं की आजीविका पर असर पड़ सकता है। इस मामले में अगली सुनवाई 3 नवंबर को निर्धारित की गई है।

ALSO READ: Toyota Glanza Facelift : टोयोटा की सस्ती कार लॉन्च, त्योहारों पर मचाएगी धमाका, जानिए क्या हैं फीचर्स

क्यों निकाला जा रहा है ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च?

 

CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने पार्टी के कार्यकर्ताओं सौरव दास और आशुतोष रंका की गिरफ्तारी के विरोध में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का आह्वान किया है। दोनों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किए जाने के बाद पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया और तिहाड़ जेल में रखा गया। पुलिस के आरोपों के अनुसार, दोनों कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर पर कथित तौर पर अनधिकृत प्रवेश किया और तिरंगा लहराया। CJP के कुछ सदस्यों पर बैरिकेड पार करने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए नारे लगाने का भी आरोप है। पुलिस ने गिरफ्तारियों के संबंध में निषेधाज्ञा के कथित उल्लंघन का हवाला दिया है। दिपके का कहना है कि राष्ट्रीय ध्वज लहराना अपराध नहीं है। उन्होंने समर्थकों से दूसरे शहरों में भी इसी तरह के मार्च आयोजित करने की अपील की है।

 

यह घटनाक्रम मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं को लेकर विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शनों के बीच सामने आया है। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य सत्तारूढ़ भाजपा को फायदा पहुंचाना है।

cjp press confrance

जंतर-मंतर के बाद प्रदर्शन के लिए तीन वैकल्पिक स्थल

 

दिल्ली पुलिस ने हाल ही में जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के बाद तीन वैकल्पिक स्थानों की पहचान की है। इनमें मध्य दिल्ली का रामलीला मैदान, उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का CBD मैदान शामिल हैं। यह कदम सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के उस आदेश के बाद उठाया गया, जिसमें सार्वजनिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लोगों के विरोध प्रदर्शन के अधिकार के लिए उपयुक्त वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। दिल्ली पुलिस ने 12 अक्टूबर को हाईकोर्ट को जंतर-मंतर से संबंधित फैसले की जानकारी दी थी।

 

कनॉट प्लेस में ट्रैफिक और सुरक्षा व्यवस्था पर नजर

 

प्रस्तावित मार्च को देखते हुए दिल्ली पुलिस के अधिकारी सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा कर रहे हैं। इसमें कनॉट प्लेस और मध्य दिल्ली के अन्य हिस्सों में संभावित ट्रैफिक प्रतिबंधों और रूट डायवर्जन पर भी विचार किया जा रहा है। प्रशासन के सामने प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ आम यात्रियों, दुकानदारों और बाजार आने वाले लोगों की आवाजाही सामान्य रखने की चुनौती होगी। ऐसे में कनॉट प्लेस जाने वाले लोगों को निकलने से पहले यातायात और सुरक्षा संबंधी आधिकारिक अपडेट देख लेने चाहिए।

दिल्ली की रामलीला में 30 फुट के ‘कॉकरोच’ का होगा दहन, रावण-कुंभकर्ण और मेघनाद के साथ जलेगा पुतला

दिल्ली की रामलीला में 30 फुट के 'कॉकरोच' का होगा दहन, रावण-कुंभकर्ण और मेघनाद के साथ जलेगा पुतला

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इस साल रामलीला के दौरान रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के साथ 30 फुट ऊंचे ‘कॉकरोच’ यानी तिलचट्टे के पुतले का भी दहन किया जाएगा। आयोजकों के मुताबिक इस पहल का उद्देश्य गंदगी के खिलाफ संदेश देना और स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करना है।

ALSO READ: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मीडिया रिपोर्ट के आधार पर नहीं ले रहे संज्ञान, CJP प्रदर्शन मामले में केंद्र ने दी माफी पर सफाई

पीतमपुरा में रामलीला का आयोजन करने कमेटी के मुताबिक, तिलचट्टे का पुतला गंदगी और कूड़े-कचरे का प्रतीक है। इसके दहन की पहल को केंद्र सरकार के ‘स्वच्छ भारत’ अभियान और दिल्ली में स्वच्छता से जुड़े प्रयासों से जोड़कर देखा जा रहा है।

ALSO READ: मुस्कान कैदी नंबर 396, साहिल 395… जेल में बदली पहचान, जानिए जेल में दोनों को क्या काम मिलेगा?

कमेटी के मुताबिक इसका मकसद बुराई पर अच्छाई की जीत के संदेश के साथ स्वच्छता का महत्व भी लोगों तक पहुंचाना है। कमेटी का कहना है कि तिलचट्टे को रावण की सेना में शामिल असुरों में से एक के रूप में भी दिखाया जाएगा। इस तरह रामलीला में पारंपरिक रूप से रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के दहन के साथ एक नया प्रतीक भी जोड़ा जाएगा।

MLC चुनाव से पहले सपा को झटका, BJP ने जीती नगर पंचायत अध्यक्ष की सीट, बैलेट पेपर से हुआ था इलेक्शन

यूपी में एमएलसी चुनाव की रस्साकसी के बीच भाजपा ने सपा को झटका देते हुए कानपुर की बिठूर नगर पंचायत अध्यक्ष की सीट जीती ली है। खास यह है कि यहां भी चुनाव बैलेट पेपर से ही हुआ था।

SEBI के नए CAS नियम! शेयरों की क्लोजिंग प्राइस और एक्सपायरी डे ट्रेडिंग में क्या बदलेगा? जानिए पूरी डिटेल

SEBI New CAS Rules: मार्केट रेगुलेटर भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने गुरुवार को क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) का अंतिम फ्रेमवर्क जारी कर दिया। इसमें कैश मार्केट में CAS के समय और काम करने के तरीके में बदलाव किए गए हैं। हालांकि, इंडेक्स और स्टॉक डेरिवेटिव्स के एक्सपायरी वाले दिन सेटलमेंट प्राइस तय करने के लिए 30 मिनट के VWAP तरीके को बरकरार रखा गया है।

7 दिसंबर से लागू होंगे नए नियम

नए फ्रेमवर्क के तहत सभी कारोबारी दिनों में CAS दोपहर 3:30 बजे से 3:40 बजे तक चलेगा। ज्यादातर बदलाव 7 दिसंबर 2026 से लागू होंगे। हालांकि, लगातार ट्रेडिंग सेशन के बचे हुए लिमिट और आइसबर्ग ऑर्डर को CAS में ले जाने से जुड़े नियम 8 फरवरी 2027 से लागू होंगे।

कैसे चलेगा Closing Auction Session?

CAS की शुरुआत दोपहर 3:30 बजे से 3:31 बजे तक होगी। इस एक मिनट में रेफरेंस प्राइस की गणना और सेशन में बदलाव की प्रक्रिया पूरी होगी।

इसके बाद 3:31 बजे से 3:36 बजे तक निवेशक लिमिट और मार्केट, दोनों तरह के ऑर्डर दे सकेंगे। 3:36 बजे के बाद केवल लिमिट ऑर्डर की अनुमति होगी। इस दौरान मार्केट ऑर्डर में बदलाव या उन्हें रद्द नहीं किया जा सकेगा।

सेशन 3:38 बजे से 3:40 बजे के बीच किसी भी समय रैंडम तरीके से बंद होगा। इसके बाद ऑर्डर मैच किए जाएंगे।

क्लोजिंग प्राइस कैसे तय होगा?

CAS का रेफरेंस प्राइस लगातार ट्रेडिंग सेशन के आखिरी 15 मिनट के कारोबार के VWAP के आधार पर तय होगा। VWAP यानी वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस। इसमें शेयर की कीमत के साथ कारोबार की मात्रा को भी ध्यान में रखा जाता है।

अगर इन 15 मिनट में कोई ट्रेड नहीं होता, तो उस दिन का आखिरी ट्रेडेड प्राइस इस्तेमाल किया जाएगा। वहीं, अगर पूरे दिन शेयर में कारोबार नहीं हुआ, तो पिछले कारोबारी दिन का क्लोजिंग प्राइस लागू होगा। जरूरत पड़ने पर इसमें कॉरपोरेट एक्शन के हिसाब से बदलाव भी किया जाएगा।

डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग का समय

सामान्य कारोबारी दिनों में इंडेक्स डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग दोपहर 3:45 बजे तक जारी रहेगी। लेकिन एक्सपायरी वाले दिन इंडेक्स डेरिवेटिव्स के कॉन्ट्रैक्ट में ट्रेडिंग 3:30 बजे बंद हो जाएगी।

स्टॉक डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग एक्सपायरी वाले दिन भी दोपहर 3:45 बजे तक जारी रहेगी। वहीं, कैश मार्केट का पोस्ट-क्लोज सेशन 3:50 बजे से 4 बजे तक चलेगा। इस दौरान ट्रेड क्लोजिंग प्राइस पर होंगे।

एक्सपायरी सेटलमेंट के लिए 30 मिनट का VWAP

इंडेक्स डेरिवेटिव्स के एक्सपायरी सेटलमेंट के लिए संबंधित इंडेक्स की वैल्यू कैश मार्केट के लगातार ट्रेडिंग सेशन के आखिरी 30 मिनट में उसके घटक शेयरों के VWAP के आधार पर निकाली जाएगी।

स्टॉक डेरिवेटिव्स के मामले में संबंधित शेयर का VWAP इसी 30 मिनट की अवधि के दौरान सभी एक्सचेंजों पर हुए कारोबार के आधार पर तय होगा। एक्सचेंज इन संकेतक वैल्यू को रियल टाइम में जारी करेंगे।

लिमिट और आइसबर्ग ऑर्डर के नियम

लगातार ट्रेडिंग सेशन के बाद बचे हुए पात्र लिमिट ऑर्डर आम तौर पर CAS में आगे बढ़ा दिए जाएंगे। हालांकि, स्टॉप-लॉस ऑर्डर और लागू प्राइस बैंड से बाहर के ऑर्डर इसमें शामिल नहीं होंगे।

आइसबर्ग ऑर्डर को भी कुछ शर्तों के साथ CAS में ले जाया जाएगा। ऐसे ऑर्डर आम तौर पर पूरी मात्रा दिखाने वाले लिमिट ऑर्डर में बदल जाएंगे। हालांकि, निवेशक ऑर्डर देते समय इस प्रक्रिया से बाहर रहने का विकल्प चुन सकेंगे।

पहले से आगे बढ़ाए गए पात्र लिमिट ऑर्डर को CAS में नए लिमिट ऑर्डर के मुकाबले प्राथमिकता मिलेगी। बदले गए आइसबर्ग ऑर्डर की प्राथमिकता पहले से आगे बढ़ाए गए दूसरे लिमिट ऑर्डर से नीचे रहेगी।

CAS के दौरान नए आइसबर्ग और स्टॉप-लॉस ऑर्डर नहीं दिए जा सकेंगे। आम तौर पर ऑर्डर पर लागू मार्जिन नियम भी लागू होंगे। हालांकि, लगातार ट्रेडिंग सेशन से आगे बढ़ाए गए पात्र ऑर्डर को छूट मिलेगी। CAS के दौरान ऐसे ऑर्डर में बदलाव करने पर मार्जिन की शर्त लागू होगी।

स्टॉक फ्यूचर्स के प्राइस बैंड में भी बदलाव

दोपहर 3:30 बजे से 3:45 बजे तक स्टॉक फ्यूचर्स के प्राइस बैंड CAS के प्राइस बैंड के मुताबिक रहेंगे। इस अवधि में डायनेमिक प्राइस बैंड में बदलाव नहीं किया जाएगा।

सेबी ने एक्सचेंजों और क्लियरिंग कॉरपोरेशन को निर्देश दिया है कि वे इस सर्कुलर के सात दिनों के भीतर रेगुलेटर से सलाह लेकर अपनी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) में जरूरी बदलाव करें।

Angel One Q2 Results: मुनाफा 58% बढ़कर ₹335 करोड़ हुआ, डिविडेंड का भी ऐलान

Mahindra XUV 3XO CNG लॉन्च, मिलेंगे 6 एयरबैग और 360-डिग्री कैमरा, जानें कीमत और माइलेज

अगर आप CNG SUV खरीदने की सोच रहे हैं, लेकिन पावर और फीचर्स से समझौता नहीं करना चाहते, तो Mahindra की नई पेशकश आपके लिए दिलचस्प हो सकती है। कंपनी ने XUV 3XO का CNG वर्जन लॉन्च कर दिया है। इसकी एक्स-शोरूम कीमत ₹9.99 लाख से शुरू होती है। इसमें बूट स्पेस के अंदर दो CNG सिलेंडर दिए गए हैं और कंपनी का दावा है कि यह 1 किलोग्राम CNG में 24.70 किलोमीटर तक चल सकती है।

खास बात यह है कि Mahindra की SUV रेंज में अब तक CNG का विकल्प नहीं मिलता था। ऐसे में XUV 3XO CNG के आने से ग्राहकों को एक नया ऑप्शन मिल गया है। इसका मुकाबला Tata Nexon CNG और Maruti Suzuki Brezza CNG से होगा। CNG मॉडल में भी 110 bhp का टर्बो-पेट्रोल इंजन, छह एयरबैग और 360-डिग्री कैमरा जैसे फीचर्स दिए गए हैं।

Mahindra XUV 3XO CNG चार वेरिएंट में उपलब्ध है। इनकी एक्स-शोरूम कीमत ₹9.99 लाख से ₹12.27 लाख तक है। अगर आप इसे खरीदने का प्लान बना रहे हैं, तो जान लीजिए कि किस वेरिएंट की कीमत कितनी है, उसमें क्या-क्या फीचर्स मिलते हैं और खरीदने से पहले बूट स्पेस, माइलेज और CNG से होने वाली बचत से जुड़ी किन बातों पर ध्यान देना चाहिए।

Mahindra XUV 3XO CNG: वेरिएंट के हिसाब से कीमतें

यहां XUV 3XO CNG की वेरिएंट-वार एक्स-शोरूम कीमतें दी गई हैं।

Mahindra XUV 3XO CNG: वेरिएंट के हिसाब से कीमतें

वेरिएंटएक्स-शोरूम कीमतबेस वेरिएंट से कितनी ज्यादा कीमत
MX Edge₹9.99 लाखलागू नहीं
RevX Edge (O)₹10.79 लाख₹80,000
AX5₹11.19 लाख₹1.20 लाख
RevX A₹12.27 लाख₹2.28 लाख

Mahindra XUV 3XO CNG: इसमें क्या-क्या मिलता है

इसका डिजeइन पेट्रोल 3XO जैसा ही है, बस टेलगेट पर ‘CNG’ का बैज लगा है। इसके फीचर्स में तीन स्टीयरिंग मोड (नॉर्मल, कम्फर्ट और स्पोर्ट्स), स्टार्ट-स्टॉप बटन, 10.25-इंच की टचस्क्रीन और 10.25-इंच का डिजिटल क्लस्टर शामिल हैं। इसके अलावा, इसमें पैनोरमिक सनरूफ, 360-डिग्री कैमरा, टायर प्रेशर मॉनिटर, डॉल्बी एटमॉस साउंड, लेदरेट सीटें, रियर वाइपर, कनेक्टेड LED टेललैंप और आगे व पीछे के आर्मरेस्ट भी दिए गए हैं।

सेफ्टी के लिए इसमें 6 एयरबैग, 4 डिस्क ब्रेक, सभी यात्रियों के लिए 3-पॉइंट सीटबेल्ट, EBD के साथ ABS, रियर पार्किंग सेंसर, सीटबेल्ट रिमाइंडर और स्पीड अलर्ट जैसे फीचर्स मिलते हैं।  हालांकि, कंपनी ने अभी यह साफ नहीं किया है कि कौन-सा फीचर किस वेरिएंट में मिलेगा। इसलिए बुकिंग करने से पहले डीलर से संबंधित वेरिएंट की फीचर लिस्ट जरूर मांग लें।

Mahindra XUV 3XO CNG: हार्डवेयर

इसमें दो सिलेंडर बूट (डिग्गी) में लगे हैं, इसलिए यह जरूर पता करें कि कितना इस्तेमाल करने लायक स्पेस बचता है और क्या इसमें एक फुल-साइज सूटकेस आ सकता है। इसमें 1.2-लीटर TCMPFi टर्बो-पेट्रोल इंजन है, जो 110 bhp की पावर और 200 Nm का टॉर्क जनरेट करता है। कंपनी का दावा है कि यह 0-100 km/h की रफ्तार 11.8 सेकंड में पकड़ लेती है। 24.70 km/kg का माइलेज सिर्फ एक दावा है, असल इस्तेमाल में यह आंकड़ा इससे कम होगा। लॉन्च की जानकारी में गियरबॉक्स के विकल्पों और CNG किट की वारंटी के बारे में नहीं बताया गया है, इसलिए इन दोनों बातों को जरूर कंफर्म कर लें।

महिंद्रा XUV 3XO CNG: क्या यह एक्स्ट्रा कीमत वसूल है?

पेट्रोल RevX Edge (O) की कीमत पहले 9.89 लाख रुपये थी, इसलिए CNG वर्जन लगभग 90,000 रुपये महंगा है। यह जानने के लिए कि आपकी एक्स्ट्रा कीमत कब वसूल होगी, इस एक्स्ट्रा रकम को प्रति किलोमीटर होने वाली बचत (पेट्रोल की प्रति किमी लागत – CNG की प्रति किमी लागत) से भाग दें और इसकी तुलना हर साल आप जितनी दूरी तय करते हैं, उससे करें। जो लोग ज्यादा गाड़ी चलाते हैं, उनकी लागत जल्दी वसूल हो जाएगी, जबकि कम इस्तेमाल करने वालों की लागत शायद कभी वसूल न हो।

गाड़ी बुक करने से पहले देख लें कि आपके घर और रास्ते के आस-पास CNG स्टेशन आसानी से उपलब्ध हैं या नहीं। यह भी पता करें कि किन वेरिएंट्स में पैनोरमिक सनरूफ और 360-डिग्री कैमरा मिलता है। साथ ही, यह भी पूछ लें कि क्या सिलेंडरों की समय-समय पर होने वाली जांच और CNG किट, महिंद्रा की वारंटी और सर्विसिंग में शामिल हैं या नहीं।

यह भी पढ़ें: Toyota Glanza Facelift लॉन्च, इंजन से लेकर फीचर्स तक में हुए ये बड़े बदलाव, कीमत ₹6.99 लाख से शुरू

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मीडिया रिपोर्ट के आधार पर नहीं ले रहे संज्ञान, CJP प्रदर्शन मामले में केंद्र ने दी माफी पर सफाई

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मीडिया रिपोर्ट के आधार पर नहीं ले रहे संज्ञान, CJP प्रदर्शन मामले में केंद्र ने दी माफी पर सफाई

दिल्ली में 10 अक्टूबर को SIR के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान मेट्रो और ट्रेन सेवाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के कथित उल्लंघन के मामले में केंद्र सरकार ने अदालत में अपनी स्थिति स्पष्ट की है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह अवमानना मामले में बिना शर्त माफी मांगने से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों के आधार पर संज्ञान नहीं ले रहा है। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि अधिकारियों ने अपने हलफनामों में कार्रवाई का बचाव भी किया है और उसके कारण स्पष्ट किए हैं।

ALSO READ: Voter List Update: 17 राज्यों में वोटर लिस्ट का रिवीजन करेगा चुनाव आयोग, 2027 में 18 साल के होने वाले युवा भी कर सकेंगे आवेदन

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। तुषार मेहता ने कहा कि मीडिया और सोशल मीडिया में हलफनामों के शुरुआती पैराग्राफ के आधार पर यह संदेश दिया जा रहा है कि सरकार ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है, जबकि अधिकारियों ने अपने कदमों के समर्थन में विस्तृत स्पष्टीकरण भी दिया है।

ALSO READ: मुस्कान कैदी नंबर 396, साहिल 395… जेल में बदली पहचान, जानिए जेल में दोनों को क्या काम मिलेगा?

केंद्र ने कहा- हलफनामे में माफी का उल्लेख कानूनी प्रक्रिया के तहत

 

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अवमानना नोटिस के जवाब में हलफनामा दाखिल करते समय पहले बिना शर्त माफी मांगने का उल्लेख किया जाता है। इसके बाद संबंधित पक्ष यह बताता है कि उसके अनुसार अदालत की अवमानना क्यों नहीं हुई।

 

उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह सचिव, दिल्ली पुलिस और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) की ओर से दाखिल हलफनामों में भी इसी प्रक्रिया का पालन किया गया है। मेहता के मुताबिक, सरकार ने अपनी कार्रवाई का बचाव किया है और मीडिया में दिखाई जा रही तस्वीर पूरी स्थिति को नहीं दर्शाती। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि मीडिया क्या प्रकाशित करता है, यह अदालत की कार्यवाही के लिए प्रासंगिक नहीं है। अदालत मीडिया के लिए कार्यवाही नहीं कर रही है।

 

न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी कहा कि अदालत सॉलिसिटर जनरल द्वारा संदर्भित माफी को अलग से आधार बनाकर संज्ञान नहीं ले रही है। मेहता ने स्पष्ट किया कि माफी बिना शर्त है और उसके बाद हलफनामों में कार्रवाई से जुड़े तथ्य और कारण दिए गए हैं।

 

9 अक्टूबर के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से जुड़ा है मामला

 

यह अवमानना मामला 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से बुलाए गए प्रदर्शन से संबंधित है। आरोप था कि प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली में मेट्रो और ट्रेन सेवाओं पर ऐसी पाबंदियां लगाई गईं, जो सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के निर्देशों का उल्लंघन कर सकती थीं।

 

अदालत ने अपने निर्देशों में कहा था कि प्रदर्शन के मद्देनजर मेट्रो और ट्रेन सेवाओं पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए। इसके बाद केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और DMRC की ओर से संबंधित कार्रवाई के बारे में हलफनामे दाखिल किए गए।

 

गृह सचिव ने इंटरनेट बंद करने के फैसले का किया बचाव

 

केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने अपने हलफनामे में कहा कि दिल्ली पुलिस की ओर से 10 अक्टूबर को रात 10 बजे तक एक दिन के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित करने का अनुरोध मिला था। उनके अनुसार, इस अनुरोध पर कानून के तहत विचार किया गया और तत्कालीन परिस्थितियों तथा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत को देखते हुए इसे उचित माना गया।

 

हलफनामे के मुताबिक, रायसीना हिल के चार किलोमीटर के दायरे में 9 अक्टूबर की रात 10 बजे से 10 अक्टूबर की रात 10 बजे तक मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित की गई थीं।

 

गृह सचिव ने स्पष्ट किया कि यह प्रतिबंध केवल मोबाइल नेटवर्क के जरिए मिलने वाली इंटरनेट सेवाओं पर था। वाई-फाई, ब्रॉडबैंड और अन्य गैर-मोबाइल इंटरनेट सेवाएं इसके दायरे में नहीं थीं।

 

दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा और खुफिया इनपुट का दिया हवाला

 

दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने अपने हलफनामे में कहा कि 10 अक्टूबर को उठाए गए एहतियाती कदम खुफिया सूचनाओं और मौके पर बदलती परिस्थितियों के आकलन पर आधारित थे। उनके अनुसार, मेट्रो सेवाओं को नियंत्रित करने सहित अन्य कदमों का उद्देश्य शांति बनाए रखना और सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने से रोकना था।

 

पुलिस आयुक्त ने राष्ट्रीय राजधानी की संवेदनशीलता का हवाला देते हुए भीड़ की हिंसा, सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचने तथा 6, 7 और 8 अक्टूबर की घटनाओं से जुड़े कथित नुकसान और चोटों का उल्लेख किया। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस की कार्रवाई को लेकर गलत नैरेटिव फैलाया जा रहा है।

 

DMRC का दावा- 303 में से 258 मेट्रो स्टेशन सामान्य रूप से चलते रहे

 

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने अपने हलफनामे में कहा कि प्रदर्शन के कारण मेट्रो सेवाएं न तो बंद की गई थीं और न ही रद्द की गई थीं। हालांकि, कुछ चुनिंदा स्टेशनों पर यात्रियों के प्रवेश और निकास को सीमित किया गया था।

 

DMRC के मुताबिक, 303 में से 45 स्टेशनों पर 9 अक्टूबर की रात 9 बजे से 10 अक्टूबर तक पाबंदियां लागू थीं। यह मेट्रो नेटवर्क के करीब 15 प्रतिशत स्टेशनों के बराबर है। शेष 258 स्टेशनों पर यात्रियों के लिए सामान्य पहुंच जारी रही। DMRC ने बताया कि 10 अक्टूबर को करीब 32 लाख यात्रियों ने मेट्रो से सफर किया, जबकि सामान्य दूसरे शनिवार को यह संख्या लगभग 58 लाख रहती है। निगम ने कम यात्रियों की संख्या को प्रदर्शन के कारण आम यात्रियों को हुई परेशानी के प्रभाव के रूप में पेश किया।

 

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट में अवमानना कार्यवाही के दौरान केंद्र और संबंधित एजेंसियों ने अपनी कार्रवाई के पक्ष में दलीलें दी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि वह मीडिया रिपोर्टों के आधार पर नहीं, बल्कि मामले में दाखिल जवाब और संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ेगी।