राष्ट्र निर्माता शिक्षक का सम्मान एक ही दिन क्यों?

राष्ट्र निर्माता शिक्षक का सम्मान एक ही दिन क्यों?

Why honor the nation-building teacher on just one day

शिक्षक दिवस राष्ट्र निर्माता शिक्षकों के नमन का दिन है जो ज्ञान की रोशनी से विद्यार्थियों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। जो अपने विद्यार्थियों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए निस्वार्थ भाव से अपना वर्तमान समर्पित कर देते हैं। वे जो वर्तमान पीढ़ी के व्यक्तित्व को परिष्कृत कर राष्ट्र के भविष्य को स्वर्णिम बनाते हैं।

वे शिक्षक जो जीवन संग्राम मैॅ आने वाली चुनौतियों का सामना करने की सामर्थ्य अपने विद्यार्थियों में सृजित करते हैं। इन्हीं शिक्षकों की गरिमा और यश  को गौरान्वित करने का दिवस है शिक्षक दिवस।

शिक्षकों के श्रेष्ठतम कार्यों का मूल्यांकन कर उन्हें सार्वजनिक रूप से  अलंकृत करने का संकल्प दिवस है शिक्षक दिवस। निसंदेह किसी भी राष्ट्र के विकास की नींव राष्ट्र निर्माता शिक्षक ही होते हैं। इसीलिए भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षकों को परमेश्वर से भी पहले सम्मान दिया गया है क्योंकि शिक्षक अपने विद्यार्थियों के हृदय में शुभ संस्कारों के सर्जक के नाते ब्रह्मा हैं। उनके रक्षण वर्धन के नाते विष्णु और अशुभ संस्कारों,  अन्तरविकारों को नष्ट करने के कारण शिव है अर्थात ब्रह्मा विष्णु और महेश के समन्वित स्वरूप का दूसरा नाम ही गुरु है। जिस प्रकार कुम्हार बाहर से घड़े को ठोकता पीटता है तथा भीतर से हाथ का सहारा देकर खोट निकालकर लोकोपयोगी घट का निर्माण करता है। उसी प्रकार आदर्श शिक्षक भीतर से अपनी सहानुभूति का सहारा देता हुआ ऊपर से  आवश्यकतानुसार चोट मारकर गढ गढ कर  अपने शिष्य का शुभ निर्माण करता है।

कबीरदासजी कहते हैं “गुरु कुम्हार सिख कुंभ है, गढि गढ़ि काढै खोट। अंतर हाथ सहारे दै, बाहर- बाहर चोट।” ऐसे सुनिर्मित विद्यार्थी ही राष्ट्र के भावी कर्णधार और होते हैं। यदि शिक्षक अपने छात्रों का निर्माण ठीक से न करें तो उसकी गलती राष्ट्र के भविष्य में झलकती है। महर्षि अरविंद कहते हैं कि अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुरमाली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्हें सींच सींच कर महाप्राण शक्तियां बनाते हैं। इसलिए विद्यार्थियों को भी यह समझ लेना चाहिए की “यह तन विष की बैलरी गुरु अमरित की खान, सीस दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान।

   
डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन महान दार्शनिक, शिक्षक और भारत के द्वितीय राष्ट्रपति थे। इन्होंने कबीरदास की भांति शिक्षकों की महिमा को मंडित करने के लिए अपने प्रशंसकों द्वारा उनका जन्मदिवस  सार्वजनिक रूप से मनाने के आग्रह पर अपना जन्मदिवस शिक्षकों के नाम समर्पित कर दिया और 1962 से प्रति वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाने लगा। 

       
किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण  विकास में शिक्षकों की भूमिका  अप्रतिम होती है जैसा कि चाणक्य कहते हैं कि ' शिक्षक कभी साधारण नहीं होता प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं।' डॉ. राधाकृष्णन का मत है कि शिक्षक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को बौद्धिक परंपराएं और तकनीकी कौशल पहुंचाने का केंद्र है। हेनरी ब्रुक्स एडम्स कहते हैं कि 'एक शिक्षक अनंत काल को प्रभावित करता है,वह कभी नहीं बता सकता कि उसका प्रभाव कहां रुकता है।'

डॉ.भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव, अधिकार प्राप्ति और मुक्ति का सबसे शक्तिशाली साधन माना। उनकी दृष्टि में शिक्षक राष्ट्र रूपी रथ का सारथी है नौकरी करने वाला मास्टर नहीं। शिक्षा केवल किताबों से ही नहीं मिलती, वह शिक्षक के आचरण और व्यवहार से भी मिलती है। इसलिए शिक्षक में करुणा, समता और बंधुता का भाव होना चाहिए। वह प्रज्ञावान शीलवान और लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाला योग्य शिक्षक होना चाहिए। 

             
जिस धरा पर कबीर ने गुरु की महिमा को गोविंद से  पहले ये कह कर मंडित किया कि 'हरि रूठै गुरु ठौर है, गुरु रूठै नहीं ठौर, उसी धरा पर क्या शिक्षकों की गरिमा का सम्मान सिर्फ एक दिन होना चाहिए? क्या ये संभव नहीं है कि शिक्षक जो न केवल राष्ट्र निर्माता चरित्र निर्माता हैं उसकी महिमा का सम्मान निरंतर करें क्योंकि राष्ट्र का निर्माण सिर्फ एक दिन में नहीं होता है, वरन उसके लिए अनवरत साधना होती है और शिक्षक भी किसी एक दिन में ही अपने विद्यार्थियों को संपूर्ण नहीं बना देते, वरन वे प्रतिदिन इस दिशा में समर्पण भाव से क्रियाशील रहते हैं। अतः ऐसे आदर्श शिक्षक ही वर्ष में सिर्फ एक दिन नहीं वरन प्रतिदिन प्रतिपल प्रतिक्षण  सम्मान के पात्र होते हैं।

 

भारत की सांस्कृतिक चेतना में शिक्षा और समाज का शाश्वत संबंध रहा है। सभ्यता के प्रारंभ से ही वैविध्यपूर्ण भारतीय समाज में वेदों उपनिषदों पुराणों के जीवन दर्शन और धर्म की शिक्षा पर स्पष्ट छाप रही है । नालंदा,तक्षशिला, विक्रमशिला  भारतीय शिक्षा पद्धति के गौरवशाली बौद्धिक स्मारक हैं। गुरु और शिष्य का आदर्शात्मक संबंध अलौकिक था।नगर के कोलाहल से दूर गुरुकुल व्यवस्था में संघर्षों से मुक्त बौद्धिक शक्ति, चरित्र बल और आध्यात्मिक चेतना से संपन्न हो कर सांसारिक जीवन में उनका प्रवेश अर्थ धर्म काम और मोक्ष के पुरुषार्थ की सिद्धि में सहायक होकर पूर्ण मनुष्य का निर्माण करने वाली थी।

किन्तु मध्यकालीन भारतीय समाज में शिक्षा प्रदान करने के प्रमुख माध्यम मकतबा और मदरसे बने रहे जिसके कारण शिक्षा का क्षेत्र बहुत सीमित हो गया। इसके पश्चात आए अंग्रेजों ने  शिक्षा के रहे सहे अस्तित्व को भी विकृत कर दिया। अंग्रेज भारतीयों को वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा देने के पक्ष में नहीं थे। सन 1835 में मैकाले ने कहा कि हमें एक ऐसा वर्ग पैदा करना चाहिए जो हमारे और करोड़ों लोगों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिये का काम कर सके। ऐसे व्यक्तियों का वर्ग जो रंग और रक्त से भारतीय हो किन्तु  रुचियों, विचारों, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज हों।  

             
आज़ादी के बाद देश में शिक्षा के बहु आयामी विकास के लिए अनेक स्तरों पर पहल की गई, किंतु मुख्य प्राथमिकता गुणात्मक शिक्षा के स्थान पर परिमाणात्मक विकास पर केंद्रित होने से शिक्षा का चरित्र उपनिवेशवादी  बना रहा।

आधुनिक राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत की आत्मा और भारतीयता की उद्घोषणा है। यह ऐसी प्रथम शिक्षा नीति है जो भारतीय व्यक्तियों के विचारों के अनुकूल है। हमारे होनहार बच्चों में ज्ञान विज्ञान के मूल स्रोत को जागृत करना इस नीति का मुख्य ध्येय है।यह अंग्रेजों की उस साजिश को भी समाप्त करने का कार्य करती है जिसमें उन्होने भाषा के आधार पर भारतीयों में हीन भावना पैदा करने का प्रयास किया था। यह नागरिक आकांक्षाओं का प्रतिबिंब और भविष्य के भारत की नींव है।

       
शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहने भर से राष्ट्र का निर्माण नहीं होता जब तक कि शिक्षक को अपने दायित्व निर्वहन में पूरी आज़ादी न दी जाए। शिक्षकों के सामाजिक आर्थिक  शैक्षणिक उत्थान के बिना राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। शिक्षक यदि तनाव से मुक्त आनन्द से युक्त और व्यर्थ की गुलामी से मुक्त है , राजनीति के विषैले वातावरण से ग्रस्त नहीं है,प्रशासन के अनावश्यक हस्तक्षेप से मुक्त है, विद्यालय में प्रवेश के लिए संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता है, कोचिंग संस्थानों पर प्रतिबंध है, प्रेरणा और प्रोत्साहन का वातावरण है तभी वह शिक्षा को सही अर्थों में घटित कर सकता है। अन्यथा वह अपने शिक्षकीय दायित्व के साथ न्याय नहीं कर सकेगा।यह कटु सत्य है कि शिक्षक यदि भूखा है तो समझिए ज्ञान का सागर भी सूखा है।

           
मेरी दृष्टि में शिक्षकीय दायित्व बहुत पवित्र किन्तु कठिन है। गगन को चूमती हुई अट्टालिकाओं को निर्मित करना सरल है। उफनती नदी के वेग को नियंत्रित कर नहरें निर्मित करना भी  सरल है। चट्टानों के सीने चीर कर सड़कें बनाना भी सरल है, किंतु राष्ट्र के लिए एक आदर्श और उपयोगी पीढ़ी को निर्मित करना बहुत कठिन है।यह कठिन दायित्व हमारे प्रथम गुरु पूज्य माता और पिता के बाद शिक्षक निभा रहे हैं।


हमारे हाथों की उंगलियां एक जैसी नहीं होती। किसी तालाब में कुछ गंदी मछलियाँ हों तो वह पूरा तालाब गंदा नहीं हो जाता। शिक्षकीय समुदाय संख्या की दृष्टि से बहुत विशाल है। हो सकता है कि कुछ शिक्षक अपने निजी स्वार्थ के लिए राजनीति के विषैले माहौल में रहते हों। कुछ शिक्षक निष्ठा से अपने दायित्व का निर्वहन भी नहीं करते। समय पर विद्यालय नहीं आते। कुछ साधारण शिक्षक हैं जो पढ़ाते हैं। कुछ श्रेष्ठ शिक्षक हैं जो व्याख्या करते हैं और कुछ उत्कृष्ट शिक्षक भी हैं जो छात्रों के मन में सीखने की जिज्ञासा पैदा करते हैं ।अतः हम समग्र शिक्षक समुदाय को लांछित नहीं कर सकते। वे शिक्षक जो अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन हैं उनके विरुद्ध कार्रवाई के प्रावधानों से ठीक किया जा सकता है।

सोशल मीडिया, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के चमत्कारी  दौर में भी शिक्षक अनेक चुनौतियों और विषमताओं के बावजूद ज्ञान की रश्मियों से अपने विद्यार्थियों को आलोकित कर रहे हैं ।उनमें जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने का जीवट सृजित कर रहे हैं। उनके चिंतन के क्षितिज का विस्तार कर उनके विचारों के वैभव को निखार रहे हैं। तभी तो यह देश आगे बढ़ रहा है प्रगति कर रहा है। आज हमारे देश में विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर उपलब्धियों के जो नित नए आयाम स्थापित हो रहे हैं  उसकी बुनियाद में कहीं न कहीं हमारे शिक्षकों का समर्पण भी है। तो ऐसी स्थिति में शिक्षकों का सम्मान सिर्फ एक दिन ही क्यों। वर्ष के बाकी 364 दिन क्यों नहीं होना चाहिए।


हमारे देश में ऐसे आदर्श शिक्षकों की कमी नहीं है जिनका जीवन प्रेरणा और प्रोत्साहन का प्रकाश स्तम्भ है। 

एक विद्यालय तीन विद्यार्थी विलंब से पहुंचे, तब तक प्रार्थना समाप्त हो चुकी थी। स्कूल के प्राचार्य ने इन चारों को  स्कूल के मैदान में तीन चक्कर लगाने की सजा दी। तीनों विद्यार्थी प्राचार्य के आदेश के पालन में मैदान के चक्कर लगाना शुरू कर दिए। दो चक्कर लगाने के बाद उन्होंने देखा कि उनके पीछे पीछे प्राचार्य जिनकी उम्र लगभग पचपन वर्ष की रही होगीभी हांफते हुए दौड़ रहे हैं। छात्रों ने रुककर प्राचार्य से पूछा सर आप किस लिए दौड़ रहे हैं? तब प्राचार्य ने जो उत्तर दिया वह उनके आदर्श चरित्र की पराकाष्ठा है।

प्राचार्य ने कहा कि मेरी तमाम कोशिशों के बाद भी यदि मैं छात्रों को अनुशासन और समय की महत्ता नहीं समझा सका तो इसका अर्थ है कि मेरे प्रयासों में ही कहीं त्रुटि है। इसलिए जितनी गलती आपकी है उससे ज्यादा मेरी गलती है। चूंकि मुझे कोई सजा नहीं दे सकता इसलिए मैंने अपनी सजा खुद ही तय कर दी है और जब तक मैं इस स्कूल के विद्यार्थियों को समय का अनुशासन नहीं समझा पाऊंगा तब तक मैं भी उनके साथ मैदान के चक्कर लगाऊंगा। क्या ऐसे आदर्श शिक्षक के सम्मान में हमें श्रद्धावनत नहीं होना चाहिए।

Taapsee Pannu: हम और पैसे कैसे कमाएंगे? फिल्मों में महिलाओं को ‘ऑब्जेक्ट’ की तरह दिखाए जाने पर बोलीं तापसी पन्नू

Taapsee Pannu: तापसी पन्नू ने भारतीय सिनेमा में महिलाओं के किरदारों को लेकर हो रही चर्चा पर अपनी राय रखी है। हाल ही में राम चरण की ‘पेड्डी’ और यश की ‘टॉक्सिक’ जैसी दो बड़े बजट की फिल्मों में महिला किरदारों को दिखाए जाने के तरीके की ऑनलाइन काफी आलोचना हुई। इस विवाद पर बात करते हुए तापसी ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री अक्सर यह कहकर आलोचना से बचती है कि ऐसा कंटेंट सिर्फ दर्शकों की मांग पर बनाया जाता है।

जूम टीवी के साथ बातचीत में तापसी ने बताया कि इंडस्ट्री अक्सर ऐसे किरदारों के लिए दर्शकों को जिम्मेदार ठहराती है और इसे एक ऐसी लड़ाई बताया जिसे एक्टर्स दर्शकों के सपोर्ट के बिना नहीं जीत सकते। “आप चाहे कितना भी शोर मचा लें, आपको सोशल मीडिया पर उतने ही लोग मिल जाएंगे जो वही तस्वीर इस्तेमाल कर रहे होंगे, उसे जूम कर रहे होंगे, अजीब एंगल से अलग-अलग तरह के वीडियो और तस्वीरें बना रहे होंगे और उसे वायरल कर रहे होंगे। तो सोशल मीडिया पर इसके लिए दर्शक मौजूद हैं।”

इस पूरी प्रक्रिया को “मांग और आपूर्ति” (demand and supply) बताते हुए तापसी ने कहा, “लोगों को लगता है कि जनता मांग रही है तो हमें देना चाहिए, वरना हम पैसे कैसे कमाएंगे? इसलिए कला पीछे छूट जाती है, हुनर ​​पीछे छूट जाता है। कोविड से पहले हमने काफी तरक्की की थी और हम बेहतरीन फिल्मों के स्तर तक पहुंच रहे थे। लेकिन अब हम फिर से पीछे छूट रहे हैं। सभी मेकर्स दर्शकों पर दोष मढ़ देंगे और यहीं पर हम सभी एक्टर्स कोई ठोस जवाब नहीं दे पाते। यह एक ऐसी लड़ाई है जिसे हम हार जाएंगे, और सिर्फ दर्शक ही हमें इसे जीतने में मदद कर सकते हैं।”

तापसी की ये बातें ‘पेड्डी’ और ‘टॉक्सिक’ दोनों फिल्मों को लेकर सोशल मीडिया पर हो रही आलोचना के बीच सामने आईं। फिल्म में जाह्नवी कपूर के किरदार के बहुत ज़्यादा hypersexualised चित्रण की आलोचना हुई। सोशल मीडिया यूज़र्स ने कैमरा वर्क, रोमांटिक सीन और जाह्नवी के किरदार की असलियत के बजाय उसके शारीरिक दिखावे पर ज़्यादा ज़ोर देने को लेकर सवाल उठाए। बाद में डायरेक्टर ने फ़िल्म से ये सीन हटा दिए और माफ़ी भी मांगी।

दूसरी ओर, ‘टॉक्सिक ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ में महिलाओं के चित्रण को लेकर फ़िल्म के रिलीज़ होने से पहले ही बहस शुरू हो गई थी। रिलीज़ के बाद आलोचना और बढ़ गई। कुछ दर्शकों ने मेकर्स पर महिला किरदारों को सिर्फ़ एक ‘वस्तु’ (object) की तरह दिखाने और उन्हें सिर्फ़ ग्लैमर, कामुकता और मुख्य पुरुष किरदार के साथ उनके रिश्तों के ज़रिए पेश करने का आरोप लगाया।

तापसी पन्नू हाल ही में नेटफ़्लिक्स फ़िल्म ‘गांधारी’ में नज़र आईं। देवाशीष मखीजा की डायरेक्ट की गई इस एक्शन थ्रिलर फ़िल्म में इशवाक सिंह, छाया कदम, स्वस्तिका मुखर्जी और मीता वशिष्ठ भी अहम भूमिकाओं में हैं। यह फ़िल्म अभी नेटफ़्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है।

Janmashtami 2026: ‘बड़ा नटखट है रे कृष्ण कन्हैया का करें यशोदा मैया…’, इन हिंदी गानों के साथ मनाए जन्माष्टमी

Janmashtami 2026: पूरे देश में जन्माष्टमी धूम धाम से मनाई जा रही है। इस खास मौके पर देशभर के मंदिरों को और घरों को झाकी के साथ सजाया जाता है। दही हांडी आयोजित होती है। इस दौरान बॉलीवुड के कई मशहूर सुनने को मिलते हैं। ऐसे में हम आपके लिए बॉलीवुड गानों की लिस्ट लाए हैं, जो भगवान कृष्ण के इस त्योहार का मजा बढ़ा देंगे।

बड़ा नटखट है रे कृष्ण कन्हैया…

फिल्म ‘अमर प्रेम’ का गाना ‘बड़ा नटखट है रे कृष्ण कन्हैया..’ दिल को छूता है। इस गाने को लता मंगेशकर ने गाया है, आनंद बक्शी से इसके बोल लिखे हैं। जबकि आर.डी. बर्मन का संगीत है। जन्माष्टमी के खास मौके पर सोशल मीडिया पर भी ये खूब ट्रेंड होता है।

गो गो गोविंदा

जबरदस्त बीट्स और जोश भरी कोरियोग्राफ़ी वाला यह सुपरहिट गाना, जिसमें प्रभु देवा और सोनाक्षी सिन्हा हैं, पारंपरिक दही-हंडी सेलिब्रेशन के कॉम्पिटिशन वाले जोश, खुशी और असली उत्साह को बखूबी दिखाता है।

राधा कैसे न जले

ए.आर. रहमान का ये गाना यह सदाबहार गाना राधा और भगवान कृष्ण के बीच की चंचल, रोमांटिक नोक-झोंक और हल्की-फुल्की जलन को बहुत खूबसूरती से दिखाता है, जो इसे किसी भी त्योहार की शाम के लिए एक ज़रूरी और शानदार गाना बनाता है।

‘वो किसना है’

बांसुरी की दिल को छू लेने वाली धुन और सुखविंदर सिंह की दमदार आवाज़ से सजी यह शानदार गाना भगवान कृष्ण के बारे में बताता है। यह आपकी प्लेलिस्ट में एक गहरा और उत्साह बढ़ाने वाला आध्यात्मिक एहसास जोड़ता है।

राधे-राधे

तेज लोक संगीत की धुनों और जोश भरे आधुनिक रिदम वाला यह एनर्जेटिक गाना मथुरा और गोकुल की जीवंत गलियों से प्रेरित है। यह गाना घर पर होने वाले जश्न में हर किसी को थिरकने पर मजबूर कर देगा।

मच गया शोर

अमिताभ बच्चन अभिनीत यह सदाबहार रेट्रो गाना, त्योहारों के दौरान होने वाले मेल-जोल, खुशी-खुशी गाए जाने वाले गीतों और सड़कों पर होने वाले उत्सव के उस जादुई माहौल को दर्शाता है, जिसने पीढ़ियों से भारतीय त्योहारों की पहचान बनाई है।

मैया यशोदा

यह प्यारा ग्रुप डांस गाना मैया यशोदा से नटखट शिकायतों के ज़रिए छोटे कान्हा की शरारतों भरी बचपन की हरकतों को खूबसूरती से दिखाता है। यह आपके त्योहार के माहौल में अपनापन, परिवार का जुड़ाव और भारतीय संस्कृति की क्लासिक खूबसूरती लाता है।

चांदी की दाल पर

90 के दशक के जोशीले डांस म्यूज़िक वाले इस मज़ेदार और चंचल गाने से प्लेलिस्ट में एक हल्की-फुल्की और शरारती रौनक आ जाती है। यह गाना कृष्ण के मशहूर शरारती अंदाज़ को बॉलीवुड के मज़ेदार और एंटरटेनिंग रूप में पेश करता है।

कान्हा सो जा ज़रा

ज़बरदस्त एनर्जी वाले डांस गानों के बीच एक सुकून देने वाला बदलाव पेश करने वाला यह शानदार और बेहतरीन ढंग से रचा गया लोरी-नुमा गीत, एक शांत और सुकून भरा माहौल बनाता है। यह देर रात मंदिर की प्रार्थनाओं और आधी रात की दिव्य आरती की रस्मों के लिए एकदम सही है।

बिना किसी बड़े स्टार और PR के नीम करोली बाबा पर मूवी बना 60 करोड़ पार! जानिए कौन हैं हनुमान अंश के डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी

राइटर-डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी की फ़िल्म ‘हनुमान अंश’ 2026 की सबसे बड़ी बॉक्स ऑफ़िस सरप्राइज़ फ़िल्मों में से एक बनकर उभरी है। 7 अगस्त को सिर्फ़ 10 लाख रुपये की ओपनिंग के बावजूद, यह स्पिरिचुअल ड्रामा फ़िल्म – जिसे लगभग 2 करोड़ रुपये के बजट में बनाया गया था – भारत में 50 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कमाई करने में सफल रही।

इस फ़िल्म ने 41,245 शो में कुल मिलाकर 72.97 करोड़ रुपये और नेट कलेक्शन के तौर पर 61.88 करोड़ रुपये कमाए हैं। अपने 26वें दिन, ‘हनुमान अंश’ ने 8.50 करोड़ रुपये (नेट) कमाए, जिससे इसने यश की फ़िल्म ‘टॉक्सिक’ की 8.20 करोड़ रुपये की कमाई का रिकॉर्ड तोड़ दिया।

फ़िल्म की लगातार अच्छी रफ़्तार को देखते हुए अब यह सवाल तेज़ी से उठ रहा है कि क्या ‘हनुमान अंश’ 100 करोड़ रुपये के आंकड़े तक पहुंच पाएगी। इस बड़ी हिट के बाद, फ़ैंस यह जानना चाहते हैं कि विशाल चतुर्वेदी कौन हैं। उनके लिंक्डइन प्रोफ़ाइल के अनुसार, विशाल चतुर्वेदी एक फ़िल्ममेकर और ‘स्वंभू मीडिया नेटवर्क’ के फ़ाउंडर हैं।

उन्हें कंटेंट प्रोडक्शन, फ़िल्ममेकिंग और पाक कला (culinary arts) में 14 साल से ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने ‘सेतु’ (2023) और ‘रब करे तू भी’ (2021) में राइटर के तौर पर काम किया है। ‘हनुमान अंश’ की कहानी नीम करौली बाबा के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर आधारित है, जिसे चतुर्वेदी ने लिखा और डायरेक्ट किया है।

लोगों के बीच फ़िल्म की तारीफ़ (word-of-mouth) ने 10 लाख रुपये की ओपनिंग वाली इस फ़िल्म की किस्मत बदल दी और आख़िरी हफ़्तों में इसकी कमाई में ज़बरदस्त उछाल आया। यह फ़िल्म इस साल की सबसे चौंकाने वाली थिएटर सक्सेस स्टोरीज़ में से एक है और चौथे हफ़्ते में इसका प्रदर्शन चर्चा का विषय बन गया है। ताज़ा जानकारी के मुताबिक, अब ‘हनुमान अंश’ को ‘होम्बले फ़िल्म्स’ द्वारा दुनिया भर में रिलीज़ किया जा रहा है। यह फ़िल्म अब 11 सितंबर को दुनिया भर में रिलीज़ होगी।

Taapsee Pannu: ‘ऐसी फिल्में करने से पहले रिटायर हो जाऊंगी’, तापसी पन्नू ने कसा कियारा आडवाणी की ‘टॉक्सिक’ पर तंज?

Taapsee Pannu: हाल ही में एक इंटरव्यू में तापसी पन्नू ने यश और कियारा आडवाणी की बड़ी फिल्म ‘टॉक्सिक’ पर इशारों-इशारों में तंज कसा। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में रिलीज हुई “ऐसी फिल्में” करने के बजाय वह रिटायर होना पसंद करेंगी। हालांकि तापसी ने किसी फ़िल्म या एक्टर का नाम नहीं लिया, लेकिन यूजर्स का मानना ​​है कि उनकी बात ‘टॉक्सिक’ के बारे में थी।

सुचिन मेहरोत्रा ​​के साथ बातचीत में तापसी ने कहा कि वह खुद को “खुशनसीब” मानती हैं कि उन्होंने अपना करियर एक दशक पहले शुरू किया था, जब हिंदी की मेनस्ट्रीम फ़िल्में अलग तरह की होती थीं और “एक ही तरह” की नहीं होती थीं। उन्होंने कहा, “अगर आज के समय में सिर्फ़ इसी तरह की फ़िल्में बन रही होतीं, तो मुझ जैसे इंसान का करियर शायद बन ही नहीं पाता।”

‘गंधारी’ फ़िल्म की एक्ट्रेस ने बताया कि हाल ही में अपने परिवार के साथ पिछले कुछ महीनों में रिलीज़ हुई कुछ फ़िल्में देखते हुए उन्होंने इस बारे में बात की थी। तापसी ने साफ़ किया कि एक एक्टर के तौर पर वह आजकल बन रही इस तरह की फ़िल्मों का हिस्सा नहीं बनना चाहतीं।

एक्ट्रेस ने कहा, “मैंने सोचा कि क्या अब मेरे रिटायर होने का समय आ गया है।”तापसी ने साफ़ किया कि वह समझती हैं कि ऐसी फ़िल्मों के लिए दर्शक होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह खुद ऐसी फ़िल्में करना चाहेंगी। मुझे अपना काम पसंद है, लेकिन इतना भी नहीं कि मैं आंख बंद करके कुछ भी करूं। मैं अपने काम से इतना अंधा प्यार नहीं करती कि वैसी फ़िल्में करती रहूं।”

अपने फ़िल्मी सफ़र पर बात करते हुए तापसी ने कहा कि वह ऐसी फ़िल्मों की लिस्ट बनाना चाहती हैं जो समय की कसौटी पर खरी उतरें। पन्नू ने कहा, “और मेरा पक्का मानना ​​है कि एक फ़िल्मोग्राफ़ी होती है, है ना? समय बदलेगा, लेकिन फ़िल्मोग्राफ़ी नहीं बदलेगी।” तापसी ने आगे कहा कि वह चाहती हैं कि सालों बाद जब वह अपने काम को देखें, तो उन्हें अपने फैसलों पर शर्मिंदगी महसूस न हो। उन्होंने कहा, “आज से 10 साल बाद, शायद जॉनर बदल जाए, जैसा कि मैंने कहा, लेकिन मेरी फ़िल्मोग्राफ़ी वैसी ही रहेगी।”

इंटरनेट का रिएक्शन

जैसे ही यह क्लिप वायरल हुई, इंटरनेट पर लोगों ने कमेंट करना शुरू कर दिया। लोगों का कहना था कि तापसी ने कियारा आडवाणी की फिल्म ‘Toxic’ पर तंज कसा है। एक यूज़र ने कहा, “असल में तापसी पन्नू ने अपने करियर की शुरुआत में ही वे सभी फिल्में कर ली थीं। इसलिए अब उनके पास देने के लिए कुछ खास नहीं बचा है। अब रोना बंद करो @taapsee, कियारा आडवाणी का करियर बहुत शानदार है।”

एक और कमेंट में लिखा था, “कियारा ने तो कम से कम फिल्म में काम किया… आपकी तो OTT पर ‘हसीन दिलरुबा’ आई थी… जो दिखाना था, आपने दिखा दिया।” एक और कमेंट में कहा गया, “तो उनसे कहिए कि रिटायर हो जाएं और अगर वह ‘अपनी ज़िंदगी, अपने नियम’ वाली बात करती हैं, तो यही बात दूसरी अभिनेत्रियों पर भी लागू होती है।”

‘Toxic: A Fairy Tale for Grown-ups’ को KVN प्रोडक्शंस और मॉन्स्टर माइंड क्रिएशन्स के तहत वेंकट के. नारायण और यश ने प्रोड्यूस किया है। कन्नड़ और अंग्रेज़ी में लिखी और शूट की गई इस फिल्म के हिंदी, तेलुगु, तमिल और मलयालम डब वर्जन भी रिलीज हुए हैं। गीतू मोहनदास की डायरेक्ट की गई इस फिल्म में नयनतारा, हुमा कुरैशी, कियारा आडवाणी, तारा सुतारिया और रुक्मिणी वसंत जैसे शानदार कलाकार हैं। फिल्म को मिले-जुले रिव्यू मिले। फिल्म ने अब तक उतनी कमाई नहीं की है जितनी उम्मीद की जा रही थी।

₹2 करोड़ में बनी हनुमान अंश की बॉक्स ऑफिस कमाई 62 करोड़ पार! जानिए नीम करोली बाबा पर बनी इस फिल्म ने कैसे टॉक्सिक का निकाला दम

बॉक्स ऑफिस पर फिल्मों की किस्मत हमेशा बड़ी स्टारकास्ट या भारी-भरकम बजट से तय नहीं होती। कभी-कभी कम बजट की कोई फिल्म दर्शकों के बीच ऐसी जगह बना लेती है कि उसका पूरा बॉक्स ऑफिस सफर ही बदल जाता है। हनुमान अंश के साथ भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला है। करीब ₹1.8 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने शुरुआत बेहद धीमी की, लेकिन अब इसकी कमाई ने इंडस्ट्री को चौंका दिया है।

शुरुआत ऐसी कि फिल्म पर मंडराने लगा था संकट

हनुमान अंश को करीब 250 स्क्रीन पर रिलीज किया गया था। इसके बावजूद पहले सप्ताह में फिल्म सिर्फ ₹90 लाख ही जुटा सकी। दूसरे सप्ताह तक हालात और मुश्किल हो गए और इसके शो घटकर लगभग 40 स्क्रीन रह गए। उस दौरान फिल्म ने करीब ₹46 लाख की कमाई की। लेकिन कम स्क्रीन मिलने के बावजूद फिल्म के प्रदर्शन में एक दिलचस्प बदलाव आया। प्रति स्क्रीन कमाई तेजी से बढ़ने लगी। यही संकेत था कि फिल्म को देखने वाले दर्शकों की संख्या उम्मीद से कहीं ज्यादा मजबूत हो रही है।

दर्शकों की जुबान बनी सबसे बड़ा प्रमोशन

फिल्म की कहानी यहीं से बदलनी शुरू हुई। जिन लोगों ने हनुमान अंश देखी, उन्होंने इसे दूसरे दर्शकों तक पहुंचाना शुरू किया। सोशल मीडिया और आपसी सिफारिशों के जरिए फिल्म को लेकर चर्चा बढ़ती गई। धीरे-धीरे यह चर्चा नए दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने लगी। फिल्म को बड़े प्रचार अभियान की बजाय वर्ड ऑफ माउथ का फायदा मिला और इसका असर सीधे बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर दिखाई दिया।

तीसरे हफ्ते में बदली पूरी तस्वीर

तीसरे सप्ताह में फिल्म की कमाई करीब ₹10.5 करोड़ तक पहुंच गई। इसके बाद चौथे सप्ताह में इसकी रफ्तार और तेज हुई और फिल्म ने ₹50 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिस फिल्म को रिलीज के कुछ ही दिनों बाद सीमित स्क्रीन पर समेट दिया गया था, वही अब देशभर में 2,000 से ज्यादा स्क्रीन तक पहुंच चुकी है।

26वें दिन भी शानदार कमाई

हनुमान अंश की पकड़ का अंदाजा उसके 26वें दिन के कलेक्शन से लगाया जा सकता है। फिल्म ने इस दिन ₹8.07 करोड़ की कमाई की। खास बात यह रही कि यह आंकड़ा यश की फिल्म Toxic: A Fairy Tale for Grown-ups की सातवें दिन की सभी भाषाओं की ₹6.90 करोड़ की कमाई से भी ज्यादा रहा। किसी फिल्म का रिलीज के चौथे सप्ताह में इतना मजबूत प्रदर्शन करना सामान्य बॉक्स ऑफिस ट्रेंड से बिल्कुल अलग माना जाता है।

Toxic के कमजोर पड़ने का भी मिला फायदा

Roongta Cinemas के CEO संजय बरजाट्या के मुताबिक, जब Toxic का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा और उसके शो कम किए गए, तब हनुमान अंश को अतिरिक्त शो मिलने लगे। इस तरह जो फिल्म शुरुआत में सिनेमाघरों के लिए छोटी रिलीज थी, वही बाद में खाली हो रहे स्लॉट भरने का विकल्प बन गई। डिस्ट्रीब्यूटर Cinepolis India ने भी फिल्म की बढ़ती मांग को देखते हुए कई बाजारों में इसकी स्क्रीनिंग दोबारा बढ़ाई। जहां एडवांस बुकिंग मजबूत रही, वहां अतिरिक्त शो जोड़े गए और कुछ जगहों पर फिल्म को फिर से सिनेमाघरों में लाया गया।

धार्मिक कंटेंट से शुरू हुई, आम दर्शकों तक पहुंची

फिल्म की शुरुआती पकड़ धार्मिक और आध्यात्मिक कंटेंट पसंद करने वाले दर्शकों के बीच बनी। खासकर गुजरात जैसे बाजारों में इसे अच्छी प्रतिक्रिया मिली। लेकिन बाद में सकारात्मक चर्चा का दायरा बढ़ता गया और दूसरे वर्ग के दर्शक भी फिल्म देखने पहुंचने लगे। यही बदलाव हनुमान अंश की सबसे बड़ी ताकत बना। फिल्म की कमाई सिर्फ शुरुआती दर्शक वर्ग तक सीमित नहीं रही।

अब ₹100 करोड़ पर नजर

करीब ₹1.8 करोड़ के बजट वाली फिल्म का ₹50 करोड़ से ज्यादा कमाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। खासकर तब, जब इसकी शुरुआत ₹1 करोड़ से भी कम के कलेक्शन से हुई थी। अब फिल्म के सामने अगला बड़ा लक्ष्य ₹100 करोड़ का आंकड़ा है। हनुमान अंश की कहानी यह भी दिखाती है कि बॉक्स ऑफिस पर शुरुआती आंकड़े हमेशा पूरी तस्वीर नहीं बताते। कभी-कभी दर्शकों का भरोसा किसी फिल्म को कई हफ्तों बाद वह रफ्तार दे देता है, जिसकी शुरुआत में किसी ने उम्मीद तक नहीं की होती।

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श्रीकृष्‍ण जन्माष्टमी विशेष: जब जीवन हारने लगे, तब श्री कृष्ण का जीवन पढ़िए

श्रीकृष्‍ण जन्माष्टमी विशेष: जब जीवन हारने लगे, तब श्री कृष्ण का जीवन पढ़िए

Shri Krishna Janmashtami Traditions

आज मनुष्य के पास पहले से अधिक साधन हैं, लेकिन शायद पहले से कम धैर्य है। उसके पास संवाद के लिए अनेक माध्यम हैं, फिर भी भीतर का अकेलापन बढ़ता जा रहा है। छोटी-सी असफलता उसे भीतर तक हिला देती है, संबंधों में आया मामूली तनाव निराश कर देता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों के लिए 'डिप्रेशन' जैसे शब्द सहजता से बातचीत का हिस्सा बन गए हैं।

 

ऐसे समय में प्रश्न यह नहीं है कि कठिनाइयां क्यों आती हैं; प्रश्न यह है कि कठिनाइयों के बीच मनुष्य स्वयं को कैसे संभाले? इस प्रश्न का उत्तर हजारों वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण के जीवन में छिपा है। यदि कृष्ण को केवल मंदिर में विराजमान भगवान के रूप में देखा जाए, तो हम उनके व्यक्तित्व का एक अत्यंत सीमित भाग ही देख पाएंगे। कृष्ण को समझने के लिए उनके जीवन को देखना होगा—एक ऐसा जीवन जिसमें जन्म से लेकर अंतिम समय तक परिस्थितियां कभी अनुकूल नहीं थीं, लेकिन उन्होंने कभी परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।

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1. संघर्षों से घिरा जन्म और बाल्यकाल का आनंद

कारागार में जन्म: उनका जन्म किसी उत्सव के बीच नहीं, बल्कि कारागार में हुआ। माता-पिता के जीवित रहते हुए भी जन्म लेते ही उनसे दूर होना पड़ा। आधी रात को पिता वसुदेव उन्हें लेकर यमुना पार कर गोकुल पहुंचाते हैं। जिस उम्र में बालक को माता-पिता का आश्रय चाहिए, उस उम्र में कृष्ण का जीवन सुरक्षा और संघर्ष की कहानी बन चुका था।

 

संकटों के बीच मुस्कान: गोकुल में उन्हें यशोदा का वात्सल्य, नंदबाबा का स्नेह और मित्रों का साथ मिला। किंतु वहां भी पूतना से लेकर कालिया नाग तक अनेक संकट सामने आए। बाल-कान्हा हर संकट के बाद मुस्कुराते दिखाई देते हैं। यह मुस्कान सिखाती है कि जीवन में संकट का आना हमारे नियंत्रण में नहीं है, लेकिन संकट के समक्ष हमारी प्रतिक्रिया हमारे हाथ में है।

 

दायित्वों के बीच जीवन का रस: श्रीकृष्ण के बाल्यकाल को प्रायः माखन, बांसुरी, गोपियों और रास की कथाओं तक सीमित कर दिया जाता है। वास्तव में ये प्रसंग सिखाते हैं कि गंभीर जिम्मेदारियों के बीच भी जीवन से आनंद और सहजता समाप्त नहीं होनी चाहिए।

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2. त्याग, विरक्ति और नए दायित्वों की ओर कदम

संसार को पीछे छोड़ना: एक दिन कृष्ण गोकुल छोड़ देते हैं। जिस भूमि ने बचपन दिया, जिन मित्रों के साथ खेले, जिससे उनका भावनात्मक संसार बसा था—सब पीछे छूट गया।

 

समय की मांग स्वीकारना: आज हम नौकरी या शिक्षा के लिए शहर छोड़ते हैं तो विचलित हो जाते हैं। कृष्ण ने तो अपने बचपन का संपूर्ण संसार ही छोड़ दिया, लेकिन वे पीछे मुड़कर रुके नहीं। वे आगे बढ़े क्योंकि समय उनसे नई भूमिका की मांग कर रहा था। मथुरा में कंस का अंत किया और आगे चलकर द्वारका की स्थापना की। राज्य, समाज, राजनीति और सुरक्षा के अनेक उत्तरदायित्व उनके सामने आए।

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3. कुरुक्षेत्र का संदेश: कर्म की गरिमा और आत्मनिर्भरता

अर्जुन का संशय और भगवद्गीता का सार: कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट आज के मनुष्य के संकट जैसा ही था। उसके सामने निर्णय लेने की चुनौती थी, लेकिन भावनाएं और संबंध आड़े आ रहे थे। जब अर्जुन का गांडीव छूट गया, तब श्रीकृष्ण ने उसे जीवन को देखने की नई दृष्टि दी—मनुष्य का अधिकार केवल अपने कर्म पर है, उसके परिणाम पर नहीं। यदि परिणाम की चिंता में कर्म ही छूट जाए, तो जीवन का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।

 

कर्म की गरिमा: स्वयं राजा होते हुए भी कृष्ण शस्त्र उठाने के बजाय अर्जुन के सारथी बने। आज के समाज में जहां पद के आधार पर काम को छोटा-बड़ा समझा जाता है, कृष्ण बताते हैं कि काम की गरिमा पद में नहीं, उसके उद्देश्य और निष्ठा में होती है।

 

सक्षम बनाने का दर्शन: कृष्ण चाहते तो अपनी शक्ति से युद्ध का परिणाम क्षण भर में बदल सकते थे, लेकिन उन्होंने मनुष्य को उसकी जिम्मेदारी स्वयं निभाने दी। वे मनुष्य को आश्रित नहीं, बल्कि सक्षम बनाते हैं।

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4. विपाद के बीच संतुलन और आधुनिक युग की प्रासंगिकता

जीवन के प्रति संतुलन: कृष्ण के जीवन में केवल विजय नहीं थी। उन्होंने वियोग, मृत्यु, युद्ध, प्रियजनों को खोना और अंततः अपने ही वंश का विनाश देखा। इसके बावजूद उन्होंने जीवन का संतुलन कभी नहीं खोया।

युवाओं के लिए प्रेरणा: आज का युवा असफलता, नौकरी न मिलने या संबंध टूटने पर बिखर जाता है। ऐसे समय में कृष्ण का जीवन कहता है:

 

  • तुम्हारी एक असफलता तुम्हारा पूरा जीवन नहीं है।
  • एक परिस्थिति तुम्हारी संपूर्ण पहचान नहीं है।
  • दुःख आएगा, लेकिन दुःख ही अंतिम सत्य नहीं है।
  • वियोग होगा, लेकिन जीवन वहीं समाप्त नहीं होता।

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5. जीवन को साधने की कला

श्रीकृष्ण जीवन से पलायन का दर्शन नहीं देते; वे जीवन के बीच खड़े होकर जीवन को साधने की कला सिखाते हैं। जब मन भ्रमित हो, विकल्प बहुत हों और निर्णय कठिन हो—तब श्रीकृष्ण के विचारों को पढ़िए। जब परिणाम की चिंता कर्म से बड़ी हो जाए या असफलता आत्मविश्वास कम करने लगे—तब कृष्ण के जीवन को देखिए।

 

वे केवल गोकुल के नटखट कान्हा, द्वारका के राजा या कुरुक्षेत्र के सारथी नहीं हैं; वे योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं। वे आज भी संदेश देते हैं कि परिस्थिति चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हो, अपने कर्म, विवेक और धर्म का मार्ग कभी मत छोड़ो। जीवन की सबसे बड़ी विजय कठिनाइयों का समाप्त हो जाना नहीं, बल्कि कठिनाइयों के बीच स्वयं को संभाले रखना है।

 

जय श्री कृष्ण!

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ईरान में शादी वाले घर पर अमेरिकी मिसाइल का कहर! बच्चे समेत 5 की मौत; तेहरान का जॉर्डन, कुवैत और बहरीन में US ठिकानों पर जवाबी हमला

US-Iran War Update: ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान एक दर्दनाक घटना सामने आई है। दक्षिणी ईरान में एक ऐसे रिहायशी मकान को मिसाइल हमले से नुकसान पहुंचा, जहां शादी का समारोह चल रहा था। अमेरिकी सेना के हमले में एक बच्चे समेत कम से कम 5 लोगों की मौत हो गई। जबकि 50 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। वहीं, तेहरान ने जॉर्डन, कुवैत और बहरीन में मौजूद US ठिकानों पर जवाबी हमला किया है।

ईरानी रेड क्रिसेंट के मुताबिक, यह हमला होर्मोजगान प्रांत के सिरिक काउंटी के कुहेस्तक शहर में हुआ। जिस घर को हमले के दौरान नुकसान पहुंचा, वहां शादी का जश्न मनाया जा रहा था। रेड क्रिसेंट ने बताया कि अमेरिकी मिसाइल हमले के बाद मिसाइल के छर्रे रिहायशी मकान तक पहुंचे, जिससे वहां मौजूद लोग इसकी चपेट में आ गए।

रेड क्रिसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए कहा कि हमले में बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं। शुरुआती जानकारी में एक छोटे बच्चे समेत चार लोगों की मौत की बात कही गई थी। जबकि बाद की रिपोर्टों में मृतकों की संख्या बढ़कर 5 बताई गई। घायलों की संख्या 50 से ज्यादा है।

मलबे में तब्दील हुआ घर, चीख-पुकार का वीडियो सामने आया

ईरानी सरकारी मीडिया ने हमले के बाद का कथित वीडियो भी जारी किया है। फुटेज में घटनास्थल पर भारी मलबा और मकान को हुआ नुकसान दिखाई देता है। वीडियो में आसपास मौजूद लोगों की चीख-पुकार भी सुनाई देती है। हालांकि, वीडियो और मृतकों तथा घायलों से जुड़े आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।

ईरान का पलटवार, जॉर्डन, कुवैत और बहरीन में अमेरिका के ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले

इस बीच, ईरान ने अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई तेज कर दी है। ईरान ने बुधवार तड़के जॉर्डन, कुवैत और बहरीन में अमेरिकी सैन्य हितों से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले किए। ये हमले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस चेतावनी के कुछ ही समय बाद हुए, जिसमें उन्होंने ईरान को अमेरिका के खिलाफ किसी भी हमले की स्थिति में और ज्यादा कड़ा जवाब देने की चेतावनी दी थी।

ईरानी हमले ऐसे समय हुए जब अमेरिकी सेना ने दक्षिणी ईरान में हमलों की एक नई लहर शुरू की थी। अमेरिका का कहना है कि इन हमलों में ईरानी सेना इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया। वॉशिंगटन के मुताबिक, यह कार्रवाई हाल में होर्मुज जलडमरूमध्य में कमर्शियल जहाजों और अमेरिकी सैनिकों के खिलाफ कथित हमले के प्रयासों के जवाब में की गई।

जॉर्डन में 10 मिसाइलों को मार गिराने का दावा

जॉर्डन में ईरानी IRGC ने एक अमेरिकी मरीन कॉर्प्स बेस पर बड़े पैमाने पर बैलिस्टिक मिसाइल हमला करने का दावा किया। ईरानी मीडिया ने इस सैन्य ठिकाने की पहचान कैंप टिटिन के तौर पर की है, जो अकाबा की खाड़ी के पास स्थित बताया गया है। ईरानी न्यूज एजेंसी ‘तस्नीम’ ने दावा किया कि हमले में अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाया गया। जवाबी हमले में बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने की बात कही। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। दूसरी ओर, जॉर्डन की ओर से 10 ईरानी मिसाइलों को इंटरसेप्ट किए जाने की जानकारी सामने आई है।

हमले से बढ़ता तनाव, खाड़ी क्षेत्र पर मंडरा रहा खतरा

अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ते सैन्य टकराव ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। एक तरफ अमेरिकी सेना ईरान के सैन्य और IRGC से जुड़े ठिकानों पर हमले कर रही है। वहींं ईरान जवाब में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी वाले देशों और ठिकानों को निशाना बना रहा है। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यहां सैन्य तनाव बढ़ने का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

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Daayra Trailer: कॉप ड्रामा ‘दायरा’ का ट्रेलर रिलीज, करीना कपूर- पृथ्वीराज सुकुमारन का दिखा दमदार अंदाज

Daayra Trailer: ‘दायरा’ का ट्रेलर रिलीज हो गया है। यह आने वाली क्राइम थ्रिलर फिल्म करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन को पहली बार एक साथ स्क्रीन पर लाएगी, जिसमें दोनों कलाकार पुलिस अधिकारियों की भूमिका निभा रहे हैं जो एक ही केस में आमने-सामने हैं।

मेघना गुलज़ार की डायरेक्ट की गई यह फिल्म पिछले हफ़्ते से कई प्रोमोशनल खुलासों के ज़रिए काफ़ी चर्चा में रही है। करीना ने DCP अजूनी कोहली और पृथ्वीराज ने DCP रमन कुमार का किरदार निभाया है। उनके दमदार ‘फ़र्स्ट लुक’ से ही इस प्रोजेक्ट की गंभीरता का अंदाज़ा लग गया था, और अब ट्रेलर से फ़िल्म की दुनिया की और बेहतर झलक मिलती है।

ट्रेलर को YouTube पर इस जानकारी के साथ रिलीज़ किया गया- “सच्ची घटनाओं पर आधारित, ‘दायरा’ एक ज़बरदस्त क्राइम थ्रिलर है जो DCP रमन कुमार और DCP अजूनी कोहली की कहानी दिखाती है, जब एक केस उन्हें एक ही सिस्टम में आमने-सामने खड़ा कर देता है।” जैसा कि ट्रेलर में दिखाया गया है, ‘दायरा’ एक ऐसी जांच के इर्द-गिर्द घूमती है जो रमन और अजूनी को एक ही सिस्टम के अंदर मुश्किल हालात में डाल देती है। कहानी की यह झलक न्याय और उसे देने के तरीके पर सवाल खड़े करती है, जबकि केस की डिटेल्स को अभी भी राज़ ही रखा गया है।

‘दायरा’ फिल्म के साथ मेघना गुलज़ार ‘तलवार’ और ‘राज़ी’ जैसी अपनी मशहूर फिल्मों के बाद ‘जंगली पिक्चर्स’ में वापसी कर रही हैं। ‘तलवार’ में दिवंगत एक्टर इरफान खान और तब्बू थे, जबकि ‘राज़ी’ में आलिया भट्ट और विक्की कौशल मुख्य भूमिकाओं में थे। आने वाली यह फिल्म एक इन्वेस्टिगेटिव ड्रामा है, जिसे मेघना गुलज़ार, सीमा अग्रवाल और यश केसवानी ने लिखा है। सौरभ गोस्वामी ने सिनेमैटोग्राफर के तौर पर काम किया है, जबकि चारू श्री रॉय इसकी एडिटर हैं।

मेघना के साथ काम करने के अपने अनुभव के बारे में बात करते हुए पृथ्वीराज ने पहले एक ऑफिशियल बयान में कहा था, “मेघना के साथ काम करने में मुझे बहुत मज़ा आया – मुझे नहीं लगता कि मैंने किसी फिल्ममेकर के साथ इतनी बहस की है। वह एक कमाल की फिल्ममेकर हैं। वह बहुत अच्छी इंसान और बेहतरीन फिल्ममेकर हैं। और मैं बहुत शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने सोचा कि मुझे यह फिल्म करनी चाहिए।”

एक्टर ने ‘दायरा’ पर फिल्ममेकर के काम की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि यह फिल्म दर्शकों को सीधे जवाब दिए बिना कई मुश्किल सवाल उठाती है। उन्होंने आगे कहा, “यह एक ऐसी फिल्म है जिसमें हमारे सिस्टम में न्याय और न्याय मिलने की प्रक्रिया पर बहुत निष्पक्ष नज़रिए की ज़रूरत है।”‘दायरा’ को जंगली पिक्चर्स और पेन स्टूडियोज़ का सपोर्ट मिला है। यह फिल्म करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन की मेघना गुलज़ार के साथ पहली बार साथ काम करने वाली फिल्म भी है।

Toxic box office collection day 5: यश स्टारर ने 214 करोड़ का आंकड़ा पार किया, ‘जन नायकन’ से निकली आगे

Toxic box office collection day 5: गीतू मोहनदास और यश की फ़िल्म ‘Toxic: A Fairy Tale for Grown-Ups’ बुधवार को बड़ी उम्मीदों के साथ सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। रिलीज़ के पहले दिन, यश की इस फ़िल्म ने भारत में बॉक्स ऑफ़िस पर ₹101 करोड़ से ज़्यादा की कमाई की और ‘धुरंधर: द रिवेंज’ की ओपनिंग का रिकॉर्ड तोड़ दिया। इतनी ज़बरदस्त शुरुआत को देखते हुए उम्मीद थी कि यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कई रिकॉर्ड तोड़ेगी। हालांकि, दूसरे दिन ‘Toxic’ की कमाई में भारी गिरावट आई और तब से इसकी रोज़ाना की कमाई लगातार घटती जा रही है।

Toxic का 5वें दिन का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन

ट्रेड ट्रैकर Sacnilk के अनुसार, Toxic ने रविवार को भारत में ₹23 करोड़ का नेट कलेक्शन किया। इससे फिल्म का भारत में कुल नेट कलेक्शन अब तक ₹214.10 करोड़ हो गया है। रविवार को फिल्म की कुल थिएटर ऑक्यूपेंसी 25.3% रही और इसे 16,241 शो में दिखाया गया। शनिवार के ₹25.15 करोड़ के मुकाबले रविवार के कलेक्शन में लगभग 8.5% की मामूली गिरावट देखी गई। हालांकि फिल्म ने भारत में नेट कलेक्शन के मामले में ₹200 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है, लेकिन रिकॉर्ड ओपनिंग के बाद से इसके रोज़ाना के कलेक्शन में लगातार गिरावट आ रही है।

Toxic का 5वें दिन भाषा के हिसाब से कलेक्शन

भाषा के हिसाब से देखें तो, Toxic के सबसे ज़्यादा शो हिंदी में थे, जिनकी संख्या 11,734 थी। हिंदी वर्शन ने ₹14.50 करोड़ कमाए और 24% ऑक्यूपेंसी दर्ज की। वहीं, कन्नड़ वर्शन ने सिर्फ़ 1,297 शो से ₹6.40 करोड़ का नेट कलेक्शन किया और शानदार 50% ऑक्यूपेंसी हासिल की। ​​तेलुगु भाषा में रिलीज़ हुई फिल्म ने 1,541 शो से ₹1.40 करोड़ का नेट कलेक्शन किया और 23% ऑक्यूपेंसी रही, जबकि तमिल भाषा के शो से ₹0.60 करोड़ का नेट कलेक्शन हुआ (1,416 शो से)। मलयालम वर्शन ने 253 शो से ₹0.10 करोड़ का नेट कलेक्शन किया।

Toxic का अब तक का प्रदर्शन

Toxic ने पहले दिन भारत में ₹101.10 करोड़ के ज़बरदस्त नेट कलेक्शन के साथ अपनी थिएटर यात्रा शुरू की। हालांकि, गुरुवार को फिल्म के कलेक्शन में भारी गिरावट आई और इसने ₹37.65 करोड़ कमाए, जो पहले दिन के आंकड़े से 62.8% कम था।

शुक्रवार को भी गिरावट का यह सिलसिला जारी रहा और फिल्म ने ₹27.20 करोड़ का कलेक्शन किया। शनिवार को Toxic के कलेक्शन में और गिरावट आई और इसने भारत में ₹25.15 करोड़ का नेट कलेक्शन किया।

Toxic ने ‘जना नायकन’ और ‘करुप्पु’ के लाइफटाइम इंडिया नेट कलेक्शन को पीछे छोड़ा

Toxic ने यश की पिछली ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘KGF चैप्टर 2’ के मुकाबले भारत में रिलीज़ के शुरुआती पांच दिनों में हुई कमाई का आधे से भी कम कलेक्शन किया है। KGF चैप्टर 2 ने रिलीज़ के पांच दिनों के अंदर भारत में ₹430.15 करोड़ का नेट कलेक्शन किया था।

वहीं, ‘टॉक्सिक’ ने सूर्या की ‘करुप्पु’ (जिसने ₹198.18 करोड़ कमाए थे) और विजय की ‘जाना नायकन’ (जिसने ₹198.22 करोड़ कमाए थे) के भारत में लाइफटाइम नेट कलेक्शन के आंकड़े को पीछे छोड़ दिया है।

‘टॉक्सिक’ के बारे में

गीतू मोहनदास की डायरेक्ट की गई फ़िल्म ‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ में यश मुख्य भूमिका में हैं। उनके साथ कियारा आडवाणी, नयनतारा, तारा सुतारिया, रुक्मिणी वसंत, हुमा कुरैशी और अक्षय ओबेरॉय भी हैं।