‘आप हमारा समय बर्बाद न करें…’; CJP प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार

CJP Protest in Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में निकाले गए मार्च के दौरान छात्रों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से बुधवार (22 जुलाई) को इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता वकील ने CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले का जिक्र करते हुए जल्द सुनवाई की मांग की। इस पर सीजेआई ने कहा कि हमारा समय बर्बाद मत कीजिए। हम कोई वीडियो नहीं देखना चाहते।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा, “पुलिस की बर्बरता से जुड़े वीडियो भी मेरे पास हैं… यदि इस मामले को कल (गुरुवार 23 जुलाई) सूचीबद्ध किया जा सके…।” उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों के साथ पुलिस ने कथित तौर पर बर्बरता की और याचिका में तीन अनुरोध किए गए हैं। चीफ जस्टिस ने तत्काल सुनवाई का अनुरोध ठुकराते हुए स्पष्ट किया कि पीठ इस स्तर पर वीडियो देखने की इच्छुक नहीं है।

उन्होंने कहा, “हमें वीडियो में कोई दिलचस्पी नहीं है। हमारे पास उन्हें देखने का समय नहीं है… हम वीडियो नहीं देखना चाहते।” वकील के दोबारा छात्रों की पिटाई की बात कहने और वीडियो का हवाला देने पर CJP ने कहा, “हमारा समय बर्बाद मत कीजिए। हम कोई वीडियो नहीं देखना चाहते।”

यह याचिका सोमवार को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई से संबंधित है। उस दिन हजारों छात्र और युवा प्रदर्शनकारी कथित परीक्षा अनियमितताओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए मध्य दिल्ली में एकत्र हुए थे।

प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों तथा सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प हुई थी। संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े थे।

सरकार नीट पर चर्चा के लिए तैयार

मानसून सत्र शुरू होने के बाद नीट पेपर लीक मामले में छात्रों के आंदोलन को लेकर विपक्ष के हंगामे के कारण संसद में गतिरोध जारी है। सरकार ने बुधवार को लोकसभा में कहा कि वह नीट पेपर लीक मामले में सदन में चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है। लोकसभा की कार्यवाही सुबह स्थगित होने के बाद दोबारा 12 बजे शुरू हुई तो लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सरकार की ओर से बयान देने के लिए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू का नाम पुकारा।

ये भी पढ़ें- Delhi Metro Stations closed: दिल्ली मेट्रो के 16 स्टेशन अगले आदेश तक बंद, यहां देखें पूरी लिस्ट और जानिए कहां मिलेगी इंटरचेंज सुविधा

इसी बीच कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराई और इस मुद्दे पर विपक्ष के कार्यस्थगन प्रस्ताव पर चर्चा कराने की मांग भी की। रीजीजू ने कहा, “सरकार नीट पेपर लीक पर चर्चा के लिए पूरी तरह से तैयार है। हमने पहले दिन से यह बात कही है। लेकिन चर्चा नियम के तहत होती है। चर्चा कब होनी है, कितनी लंबी होनी है और किस नियम के तहत होनी है, इसका निर्णय स्पीकर (बिरला) सभी दलों के नेताओं से बात कर लेंगे।”

पति के ऑफिस में शिकायत करना पड़ सकता है भारी! सुप्रीम कोर्ट ने पत्नियों को दी बड़ी नसीहत

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पत्नियों द्वारा अपने पतियों के एम्प्लॉयर (कंपनियों/संस्थानों) को पत्र लिखने के बढ़ते चलन पर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा है कि ऐसी शिकायतों से नौकरी खतरे में पड़ सकती है और आखिरकार गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) के दावों पर भी असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने पिछले हफ्ते ये टिप्पणियां कीं। वे एक महिला द्वारा दायर ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें मानहानि के मुकदमे को असम से गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) ट्रांसफर करने की मांग की गई थी।

यह याचिका पति के एक दोस्त द्वारा दायर मानहानि के मामले से जुड़ी थी। महिला ने ट्रांसफर की मांग इसलिए की थी क्योंकि वह गाजियाबाद में अपने पति के साथ पहले से ही कई कानूनी मामलों में उलझी हुई थी।

सुनवाई के दौरान, बेंच ने मामले को सुप्रीम कोर्ट मेडिएशन सेंटर (मध्यस्थता केंद्र) भेज दिया ताकि समझौते की संभावना तलाशी जा सके। जस्टिस नागरत्ना ने महिला के वकील से यह भी कहा कि वे उसे सभी विवाद सुलझाने और आरोप वापस लेने की सलाह दें।

बता दें कि यह मानहानि का मामला उस शिकायत से शुरू हुआ, जो महिला ने दिल्ली में एयर फोर्स अधिकारियों से की थी। उसने आरोप लगाया था कि उसके पति, जो एयर फोर्स में अफसर हैं, सर्विस के नियमों का उल्लंघन करके अपना अलग बिजनेस चला रहे हैं।

महिला के वकील ने दलील दी कि यह शिकायत तब की गई थी जब पति ने महिला और उसके भाई पर एयर फोर्स का हेलमेट चुराने का झूठा आरोप लगाया था।

वकील के अनुसार, इस शिकायत का मकसद उस सामान (हेलमेट) का पता लगाना था, जो उसके पति को मिला था। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि मानहानि की शिकायत पति ने खुद नहीं, बल्कि उनके दोस्त ने की थी।

सुनवाई के दौरान, जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कई पत्नियां वैवाहिक विवाद चलने के दौरान अपने पतियों के एम्प्लॉयर को पत्र लिखने का रास्ता अपनाती हैं।

उन्होंने कहा कि तलाक मांगना एक अलग बात है, लेकिन जीवनसाथी की आजीविका (रोजगार) छिनवाना उससे भी बुरा है।

जज ने आगे कहा कि वैवाहिक विवादों के दौरान जीवनसाथी के नियोक्ता (employer) को पत्र लिखना उन “सबसे बुरी चीजों” में से एक है जो एक पत्नी कर सकती है, क्योंकि इससे पति की नौकरी जा सकती है और भविष्य में गुजारा-भत्ता (maintenance) के दावे का आधार भी कमजोर हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह कोई नई बात नहीं है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बताया कि पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं।

हालांकि, ऐसी शिकायतों की कोई सटीक संख्या नहीं है, लेकिन पहले भी महिलाएं व्यभिचार या दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए नियोक्ताओं के पास गई हैं और कुछ मामलों में अपने पतियों की नौकरी खत्म करने की मांग भी की हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि नौकरी जाने से बाद में गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) देने में मुश्किल हो सकती है।

पहले भी कोर्ट ने ऐसे कानूनी मुद्दों पर की है सुनवाई

कोर्ट ने कहा, अदालतों ने पहले भी ऐसी शिकायतों के कानूनी प्रभावों पर विचार किया है। ऐसे मामलों में सबसे पुराने मामलों में से एक दिल्ली हाई कोर्ट के सामने आया था। यह मामला 1972 का है, जब एक वैवाहिक विवाद के दौरान अलग रह रही पत्नी ने लोकसभा को पत्र लिखा था। उसने अपने पति, जो वहां काम करते थे, पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था और दावा किया था कि पति ने उसके माता-पिता से पैसों और अन्य चीजों की मांग की थी।

बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि अगर पत्नी भरण-पोषण की मांग करना चाहती थी, तो उसे केवल यह बताने की जरूरत थी कि उसे मेंटेनेंस नहीं मिल रहा है। इसके लिए उसे ऐसे आरोप लगाने की जरूरत नहीं थी।

1980 के अपने आदेश में कोर्ट ने कहा था, “इस तरह की झूठी शिकायत अगर किसी कर्मचारी के नियोक्ता से की जाती है, तो यह निश्चित रूप से मानसिक क्रूरता (मेंटल क्रुएल्टी) के बराबर होगी। इससे कर्मचारी की छवि उसके नियोक्ता की नजरों में खराब होगी और उसके करियर व प्रमोशन के अवसरों पर भी असर पड़ सकता है। यह स्थिति उसके मानसिक शांति को प्रभावित कर सकती है।” पत्नी के पूरे व्यवहार पर विचार करने के बाद कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर शादी खत्म करने के फैसले को सही ठहराया था।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बाद में अदालतों ने भी इसी तरह का नजरिया अपनाया है। इसमें मद्रास हाई कोर्ट का जून का एक फैसला भी शामिल है, जिसमें कहा गया था कि “”बिना किसी ठोस सबूत के लगाए गए ऐसे आरोप, जो पति या पत्नी की प्रतिष्ठा और सम्मान को नुकसान पहुंचाते हैं, खासकर नियोक्ता या वरिष्ठ अधिकारियों के सामने लगाए गए आरोप, वैवाहिक रिश्ते को पूरी तरह नुकसान पहुंचा सकते हैं और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता माने जा सकते हैं।”

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एम्प्लॉयर, खासकर प्राइवेट कंपनियां, सिर्फ आरोपों के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकाल सकते और उन्हें कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के अनुसार जांच करनी पड़ सकती है, जबकि सरकारी कर्मचारियों के मामले में अलग सर्विस नियम लागू होते हैं।

इसमें यह भी कहा गया है कि प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले मामलों में ‘भारतीय न्याय संहिता’ की धारा 356 के तहत आपराधिक मानहानि की कार्रवाई भी शुरू की जा सकती है।

यह भी पढ़ें: पुलिस हिरासत के समय राहुल गांधी की नाक से बहता दिखा खून, पीएम आवास के बाहर प्रदर्शन के दौरान हुए चोटिल

CBSE’s three-language policy: सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई की 3 भाषा नीति पर जताई चिंता, तमिलनाडु में जेएनवी मामले में सुनवाई के दौरान की टिप्पणी

CBSE’s three-language policy: सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान सीबीएसई बोर्ड के स्कूलों में 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा लागू करने के फैसले पर चिंता जताई है। जस्टिस नागरत्ना ने तीसरी भाषा शुरू करने के समय पर कई बातें कहीं। उन्होंने कहा कि इससे बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों पर बेवजह का तनाव पड़ता है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने यह बात तमिलनाडु सरकार अपील पर सुनवाई करते हुए कही है। तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के उस निर्देश के खिलाफ अपील की थी, जिसमें राज्य के हर जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) के निर्माण को आसान बनाने को कहा गया था। तमिलनाडु ने इन स्कूलों की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर चिंताओं का हवाला देते हुए लगातार जेएनवी बनाने का विरोध किया है। यह मामला सीधी तौर पर सीबीएसई बोर्ड की तीन भाषा नीति से जुड़ा हुआ नहीं है। लेकिन जस्टिस नागरत्ना ने तीसरी भाषा शुरू करने के समय पर कई बातें कहीं।

सीबीएसई बोर्ड की की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को अभी चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच के सामने अलग-अलग जनहित याचिकाओं में चुनौती दी गई है। बेंच ने पॉलिसी को लागू करने पर रोक लगाने से मना कर दिया है और मामले की सुनवाई अगले हफ्ते के लिए लिस्ट कर दी है।

तमिलनाडु में जेएनवी बनाने पर रोक की अपील पर सुनवाई के दौरान, तमिलनाडु सरकार के वकील ने कहा कि राज्य का एतराज मुख्य रूप से तीन-भाषा पॉलिसी से जुड़ा है। जस्टिस नागरत्ना ने साफ किया कि पॉलिसी में हिंदी को तीसरी भाषा के तौर पर जरूरी नहीं बनाया गया है। उन्होंने कहा, “राज्य की भाषा पढ़ाई जानी चाहिए, इंग्लिश पढ़ाई जानी चाहिए, और कोई भी तीसरी भाषा। इसमें हिंदी नहीं लिखा है।”

रेस्पोंडेंट (हाई कोर्ट में NGO पिटीशनर) की तरफ से पेश वकील जी. प्रियदर्शिनी ने बताया कि एनईपी में साफ तौर पर कहा गया है कि किसी भी राज्य पर कोई भी भाषा नहीं थोपी जानी चाहिए। जवाब में, जस्टिस नागरत्ना ने राज्य से पूछा, “आप हिंदी नहीं चाहते, लेकिन अगर यह संस्कृत है, तो क्या दिक्कत है?” तमिलनाडु के वकील ने जवाब दिया कि तीसरी भाषा सिर्फ कक्षा 9 से जरूरी हो जाती है।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “नहीं, यह बहुत बुरा है। 9वीं कक्षा काफी तनाव वाली होती है। आप 9वीं में एक नई भाषा क्यों शुरू करते हैं? आप इसे छठी कक्षा में शुरू करें।”

अपनी स्कूलिंग के अनुभव बताते हुए, जज ने याद किया कि उनके स्कूल के छात्रों ने मिडिल स्कूल के दौरान तीसरी भाषा सीखना शुरू कर दिया था क्योंकि एसएसएलसी परीक्षा के लिए यह जरूरी था। “यह उन लोगों के लिए कन्नड़ थी जिनकी दूसरी भाषा हिंदी थी और इसका उल्टा भी। संस्कृत भी थी, इसलिए आपके पास तीसरी भाषा हो सकती थी। जितना पहले हो, उतना अच्छा।” केंद्र सरकार को संबोधित करते हुए, जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा, “भारत सरकार, कृपया 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा न रखें। सीबीएसई, आईसीएसई और स्टेट बोर्ड में 10वीं कक्षा एक बोर्ड परीक्षा है। 8वीं कक्षा के आखिर से, प्रेशर शुरू हो जाता है।”

जस्टिस नागरत्ना ने तमिलनाडु सरकार को यह भी सलाह दी कि वह सिर्फ इसलिए सेंट्रल स्कीम्स को रिजेक्ट न करे क्योंकि वे यूनियन गवर्नमेंट से आती हैं। उन्होंने राज्य से कहा, “आपका अपना एजुकेशन सिस्टम हो सकता है, लेकिन केंद्र सरकार के स्कूलों को न रोकें,” बाद में उन्होंने कहा, “यह रवैया न रखें कि यह केंद्र सरकार है, तो हम इसे क्यों मानें।” बेंच में जस्टिस आर महादेवन भी थे। बेंच ने कहा कि जवाहर नवोदय विद्यालय बनाने पर केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार के बीच बातचीत अभी भी चल रही है।

NEET UG 2026 refund: नीट यूजी फीस रिफंड के लिए अब तक सिर्फ 52% ने किया अप्लाई, एनटीए ने आखिरी बार बैंक डिटेल देने की डेट बढ़ाकर 31 जुलाई की

WhatsApp और Telegram के Username Feature पर सरकार सख्त, 20 दिनों में आ सकता है बड़ा फैसला

whatsapp users name

केंद्र सरकार WhatsApp और Telegram के यूजरनेम-आधारित मैसेजिंग फीचर को लेकर मिली प्रतिक्रियाओं की समीक्षा कर रही है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में अगले करीब 20 दिनों के भीतर कोई अधिसूचना या अगला फैसला सामने आ सकता है। सूत्रों के अनुसार, WhatsApp, Telegram और Zoho Bharat Eye ने सरकार द्वारा जारी नोटिस के जवाब मंत्रालय को सौंप दिए हैं।

ALSO READ: Electric Vehicle से कैसे होगी 50000 से 1 लाख रुपए तक की कमाई, कौनसे हैं बिजनेस आइडियाज, क्या-क्या काम किया जा सकता है

कानूनी जांच जारी

मंत्रालय की कानूनी टीम इन जवाबों का विस्तृत परीक्षण कर रही है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं संबंधित फीचर किसी नियम या कानून का उल्लंघन तो नहीं करता। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि यदि आवश्यक हुआ तो नियामकीय कार्रवाई या अन्य कानूनी प्रावधान लागू किए जा सकते हैं या नहीं।

ALSO READ: Bajaj Chetak और TVS iQube को मिलेगी कड़ी टक्कर, Ather 29 अगस्त को लॉन्च करेगा सबसे सस्ता इलेक्ट्रिक स्कूटर

WhatsApp के जवाब की हो रही समीक्षा

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को सप्ताहांत में WhatsApp का जवाब मिला, जिसकी फिलहाल समीक्षा की जा रही है। मंत्रालय का कहना है कि सभी जवाबों का कानूनी परीक्षण पूरा होने के बाद ही आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा। सरकार की यह प्रक्रिया ऐसे समय में चल रही है जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर यूजरनेम-आधारित मैसेजिंग और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चर्चा तेज है। फिलहाल मंत्रालय ने अंतिम निर्णय की घोषणा नहीं की है।

ALSO READ: One Nation, One Election : एक देश-एक चुनाव पर बड़ा अपडेट, 2029 में साथ हो सकते हैं लोकसभा और विधानसभा चुनाव

WhatsApp का 'Username' फीचर क्या है?

WhatsApp एक नया फीचर लाने की तैयारी कर रहा है, जिसके जरिए लोग अपना मोबाइल नंबर साझा किए बिना एक-दूसरे से जुड़ सकेंगे। यह फीचर Telegram और Signal की तरह काम करेगा। इस फीचर में यूजर अपने लिए एक यूनिक यूजरनेम (Username) चुन सकेंगे और मोबाइल नंबर की जगह उसी यूजरनेम को दूसरे लोगों के साथ साझा करेंगे।

 

Meta का दावा है कि इससे यूजर्स की निजता (Privacy) बेहतर होगी, क्योंकि उन्हें अपनी व्यक्तिगत जानकारी पर अधिक नियंत्रण मिलेगा। हालांकि, भारत सरकार इस फीचर को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। सरकार का मानना है कि यदि मोबाइल नंबर छिप जाएंगे तो ऑनलाइन ठगों और साइबर अपराधियों की पहचान करना और उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो सकता है।

ALSO READ: US-Iran Conflict: अमेरिकी हमलों में 30 से ज्यादा लोगों की मौत, ईरान ने लगाए बड़े आरोप, खाड़ी देशों पर मिसाइल हमले जारी

 

सरकार को किस बात की चिंता है?

सरकार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि साइबर अपराधी यूजरनेम फीचर का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं। आशंका जताई जा रही है कि इस फीचर का उपयोग करके अपराधी- 

 

  • फिशिंग (Phishing) हमले,
  • फर्जी पहचान (Impersonation) बनाकर ठगी,
  • डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest) जैसे साइबर फ्रॉड,
  • और अन्य ऑनलाइन अपराधों को अंजाम दे सकते हैं।

 

इसी वजह से 1 जुलाई को केंद्र सरकार ने Meta से कहा था कि जब तक वह इस फीचर के दुरुपयोग को रोकने की ठोस व्यवस्था नहीं बताता, तब तक इसका रोलआउट आगे न बढ़ाया जाए।

ALSO READ: तीसरा बच्चा होने पर चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य, नियम पर Supreme Court ने क्या कहा, क्यों बताया गैर जरूरी

Meta ने क्या कहा?

Meta ने सरकार को बताया है कि WhatsApp के Username फीचर में सुरक्षा से जुड़े कई उपाय शामिल किए जाएंगे। हालांकि मामला सिर्फ WhatsApp की लोकप्रियता का नहीं है। भारत के आईटी अधिनियम (IT Act) और आईटी नियमों (IT Rules) के तहत एक बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म होने के कारण WhatsApp पर यूजर्स की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कानूनी जिम्मेदारी भी है। सरकार यह भी जांच रही है कि यदि भविष्य में इस फीचर के कारण साइबर अपराध बढ़ते हैं, तो क्या ऐसी स्थिति में Meta की जवाबदेही तय की जा सकती है।

 

‘सलवार उतारना, सीने को दबाना ‘रेप अटेम्प्ट’ नहीं’, पटना HC के इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट नाराज

Supreme Court: पटना हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में माना था कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती दबाकर छेड़छाड़ करना ‘रेप की कोशिश’ (attempt to rape) नहीं माना जाएगा। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अब हाई कोर्ट के इस हालिया फैसले पर गंभीर चिंता जताई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई की और संकेत दिया कि अदालत पटना हाई कोर्ट के आदेश पर समीक्षा करके एक विस्तृत आदेश जारी करेगी।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट को मंगलवार को सुनवाई के दौरान एक वकील ने पटना हाईकोर्ट के इस फैसले की जानकारी दी। यह सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को लेकर शुरू किए गए स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) मामले में हो रही थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना, उसके पजामे का नाड़ा खोलना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना ‘रेप की कोशिश’ के अपराध के दायरे में नहीं आता है।

सुनवाई के दौरान, बेंच ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की एक्सपर्ट कमिटी की उस रिपोर्ट को मंजूरी दी, जिसमें यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता से जुड़ी गाइडलाइंस दी गई थीं।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी अदालतों को भी निर्देश दिया कि वे उसके द्वारा मंज़ूर की गई हैंडबुक/गाइडलाइंस में इस्तेमाल की गई बातों का सख्ती से पालन करें।

जानकारी के मुताबिक, इस साल की शुरुआत में, सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी को निर्देश दिया था कि वह यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक कार्यवाही के दौरान संवेदनशीलता और सहानुभूति लाने के लिए व्यापक गाइडलाइंस का ड्राफ्ट तैयार करे।

कोर्ट ने कहा था कि ऐसे नियम भारत के सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए, न कि विदेशी कानूनों से लिए गए हों।

यह भी पढ़ें: कल का मौसम 16 जुलाई: 5 एक्टिव चक्रवाती सिस्टम और लो प्रेशर एरिया लाएंगे भारी बारिश, आंधी-तूफान! IMD ने बंगाल से बिहार तक ये अलर्ट दिया

तीसरा बच्चा होने पर चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य, नियम पर Supreme Court ने क्या कहा, क्यों बताया गैर जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत और अन्य स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए लागू 'दो बच्चों की शर्त' (Two-Child Norm) की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि जिस नीति को कभी बढ़ती आबादी पर नियंत्रण के लिए बनाया गया था, वह आज के बदले जनसांख्यिकीय हालात में शायद अपना उद्देश्य पूरा कर चुकी है। ऐसे में इस नियम को जारी रखने का औचित्य दोबारा परखा जाना चाहिए।

ALSO READ: Bajaj Chetak और TVS iQube को मिलेगी कड़ी टक्कर, Ather 29 अगस्त को लॉन्च करेगा सबसे सस्ता इलेक्ट्रिक स्कूटर

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इंगले को तीसरा बच्चा होने के आधार पर महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

 

'देश बदल गया है, नीति पर फिर से विचार जरूरी'

सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने वर्ष 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में इस नीति पर पुनर्विचार की जरूरत है। उन्होंने टिप्पणी की कि देश की जनसंख्या और प्रजनन दर (Fertility Rate) में बड़ा बदलाव आ चुका है, इसलिए पुराने आधार पर बनी नीति को अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता। पीठ ने इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे को एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) के रूप में सहायता देने के लिए कहा है।

घटती फर्टिलिटी रेट का दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत का कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) अब करीब 1.7 रह गया है। वहीं, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह दर कई स्कैंडिनेवियाई देशों से भी कम है। अदालत ने कहा कि जब कई राज्य अब घटती जन्म दर की चुनौती का सामना कर रहे हैं, तब केवल आबादी नियंत्रण के नाम पर दो-बच्चे की शर्त लागू रखना तर्कसंगत नहीं दिखता।

'विरोधी इसे हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं'

सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में तीन बच्चों वाला परिवार असामान्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि इस नियम का इस्तेमाल कई बार चुनावी प्रतिद्वंद्वी विरोधियों को अयोग्य ठहराने के हथियार के रूप में करते हैं। जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि इस नीति का प्रभाव अब समाप्त हो चुका है और इसे वापस लेने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले की काकोडा ग्राम पंचायत की सरपंच चुनी गईं मंगला भीमराव इंगले के खिलाफ शिकायत की गई थी कि उनका तीसरा बच्चा है। इसके आधार पर अतिरिक्त कलेक्टर ने अक्टूबर 2024 में उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया।
 

बाद में अतिरिक्त आयुक्त ने उनकी अपील खारिज कर दी और अगस्त 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने माना कि जन्म प्रमाण पत्र एक सार्वजनिक दस्तावेज है और याचिकाकर्ता उसे गलत साबित नहीं कर सकीं। अब सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि बदलते सामाजिक और जनसांख्यिकीय हालात में दो-बच्चे की शर्त को जारी रखना संवैधानिक रूप से उचित है या नहीं।

CBSE’s 3-language policy: अंतरिम राहत से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, सर्वोच्च अदालत ने पूछा, क्या अंग्रेजी को भारतीय भाषा मान लिया गया है?

CBSE’s 3-language policy: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने अपने सभी संबद्ध स्कूलों में 6ठी कक्षा से 3 भाषा नीति लागू करने का फैसला किया है। बोर्ड के इस फैसले के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर की गई है। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि यह दोबारा देखने लायक है कि क्या इंग्लिश को देसी भाषा माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने पॉलिसी पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि यह हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के संवैधानिक मकसद को आगे बढ़ाने वाला कदम लगता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की बेंच नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) के तहत तीन-भाषा पॉलिसी को लागू करने को चुनौती देने वाली पिटीशन के एक बैच पर सुनवाई कर रही थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं दी अंतरिम राहत

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि डिटेल में सुनवाई के बिना ऐसी राहत पर विचार नहीं किया जा सकता। अब इस मामले की सुनवाई 22 जुलाई को होगी। साथ ही कोर्ट ने केंद्र और सीबीएसई को अपने जवाब फाइल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने अपनी टिप्पणि में कहा कि देसी भाषाओं के नाम और क्या इंग्लिश को उनमें से एक माना जा सकता है? इस सवाल पर फिर से सोचने की जरूरत हो सकती है।

पिटीशनर्स ने प्रैक्टिकल चुनौतियों को उठाया

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि छात्रों को 22 भाषाओं में से चुनाव करने की सुविधा के बावजूद तीन-भाषा पॉलिसी को लागू करने से गंभीर प्रैक्टिकल चुनौतियां आएंगी। उन्होंने कहा कि स्कूलों को इतनी सारी भाषाओं के लिए काबिल टीचर नियुक्त करने और जरूरी आधारभूत संरचना तैयार करने में मुश्किल होगी। उन्होंने यह भी बताया कि एनसीईआरटी ने 1 जुलाई तक सभी 22 भाषाओं के लिए शिक्षा सामग्री अपलोड करने का वादा किया था, लेकिन अभी सिर्फ तीन भाषाओं के लिए टेक्स्टबुक्स उपलब्ध हैं। पिटीशनर्स ने तर्क दिया कि यह निर्देश तब दिया है जब सीबीएसई ने मौजूदा शैक्षिक सत्र से कक्षा 9 के लिए तीन-भाषा फॉर्मूला जरूरी करने वाला अपना पिछला सर्कुलर वापस ले लिया है।

केंद्र ने दिया नेशनल एजुकेशन पॉलिसी का हवाला

केंद्र और सीबीएसई की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि सरकार और शिक्षा बोर्ड 10 दिनों के अंदर अपने विस्तृत जवाब दाखिल करेंगे। योजना का बचाव करते हुए, केंद्र ने कहा कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 भारतीय मूल्यों पर आधारित एक शिक्षा व्यवस्था की कल्पना करती है। इसका मकसद देश को एक बराबर और जीवंत नॉलेज सोसाइटी में बदलना है।

CBSE 2nd Board Exam Result Class 10: इस हफ्ते जारी होगा 10वीं कक्षा दूसरी बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट? जानें नतीजों में क्यों हो रही है देरी