यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो: 5 एकड़ के पॉलीहाउस से ₹29 लाख की कमाई! जानिए मेरठ के किसान रवींद्र की कामयाबी की कहानी

इंडिया एक्सपो मार्ट में इस समय उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो चल रहा है। इस ट्रेड शो में मेरठ के किसान किसान रवींद्र कुमार चर्चा में हैं। रवींद्र का खेती और उससे जुड़े नए कारोबारी प्रयोग लोगों को काफी पसंद आ रहा हैं। ट्रेड शो में पॉलीहाउस तकनीक से तैयार की गई ताजी सब्जियां, रंग-बिरंगे फूल और शहद खास तौर पर लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। इन उत्पादों को देखने और खरीदने में देश-विदेश से आए कारोबारी और दर्शक भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ट्रेड शो में किसानों की आधुनिक खेती और उससे होने वाले कारोबार को भी दिखाया गया है। आइए जानते हैं क्या है रवींद्र की कहानी

बयान के मुताबिक, इंडिया एक्सपो मार्ट में हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट के आउटलेट पर मेरठ के किसान और एग्री-एंटरप्रेन्योर अपने अलग-अलग कृषि उत्पादों को प्रदर्शित कर रहे हैं। इनमें जरबेरा और गुलाब के फूल, कमल का तना, शिमला मिर्च, बैंगन और शहद जैसे उत्पाद शामिल हैं।

शिमला मिर्च की करते हैं खेती

मेरठ के सरधना क्षेत्र के खेड़ा गांव के किसान रवींद्र कुमार ने बागवानी विभाग की योजनाओं का लाभ उठाकर आधुनिक खेती की ओर कदम बढ़ाया है। उन्होंने करीब पांच एकड़ जमीन में पॉलीहाउस लगाकर खेती शुरू की। रवींद्र कुमार अपने पॉलीहाउस में अलग-अलग रंगों की शिमला मिर्च उगा रहे हैं, जिनका वजन करीब 300 से 400 ग्राम तक होता है। उनकी पीली, हरी और लाल शिमला मिर्च की दिल्ली की आजादपुर मंडी में अच्छी मांग है। रवींद्र कुमार के मुताबिक, इस खेती से उनका सालाना कारोबार 29 लाख रुपये से अधिक तक पहुंच गया है।

बढ़ गई फूलों की मांग

कुमार इससे पहले भी ट्रेड शो में हिस्सा ले चुके हैं और उनका मुताबिक कि ऐसे आयोजनों से उनके उत्पादों को नए खरीदार मिले और बाजार में उनकी पहचान बढ़ी। इस साल रवींद्र कुमार के जरबेरा और गुलाब के फूलों की मांग बढ़ी है। कई इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां फूल खरीदने के लिए उनसे संपर्क कर रही हैं, वहीं कुछ कंपनियों के साथ कारोबार को लेकर समझौता करने की बातचीत भी चल रही है। कुमार के मुताबिक, सरकारी योजनाओं की मदद से किसानों को खेती के नए तरीके अपनाने और बाजार की जरूरत के हिसाब से फसल तैयार करने का मौका मिल रहा है, जिससे उनकी आमदनी बढ़ाने में मदद मिल रही है।

शहद भी बना आकर्षण का केंद्र

उत्तर प्रदेश के बागवानी राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार दिनेश प्रताप सिंह ने ट्रेड शो में विभाग के स्टॉल का दौरा कर किसानों के उत्पादों की जानकारी ली और उनका उत्साह बढ़ाया। वहीं, मेरठ की रैंट्रोव नेचुरल कंपनी का शहद भी लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कंपनी चलाने वाले युवा भाई-बहन राखी अघेरा और भरत अघेरा ने बताया कि पिछले साल उनकी कंपनी को इंडोनेशिया, मलेशिया और वियतनाम से कुल 46 टन शहद का ऑर्डर मिला था।

एक जैसे फिंगरप्रिंट और रेटिना! जुड़वां बहनों का आधार कार्ड बनाने में छूटे पसीने, जानिए रामपुर DM अजय द्विवेदी ने कैसे सुलझाया ये केस

रामपुर की तुबा जुबैर और खिजरा जुबैर के लिए एक जैसी शक्ल-सूरत सिर्फ पारिवारिक समानता नहीं, बल्कि पहचान की बड़ी उलझन बन गई। दोनों बहनों की जिंदगी में एक ऐसा वक्त आया, जब खुद को अलग-अलग साबित करना भी आसान नहीं रहा। मामला इतना पेचीदा था कि एक जरूरी सरकारी दस्तावेज बन गया, जबकि दूसरी बहन के लिए वही प्रक्रिया बार-बार रुकती रही। परिवार ने इसे दूर करने के लिए कई कोशिशें कीं, लेकिन हर बार तकनीकी दिक्कत सामने आ गई। इस परेशानी का असर सिर्फ कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं था, बल्कि बच्ची से जुड़े जरूरी काम भी प्रभावित होने लगे।

आखिरकार मामला स्थानीय स्तर से निकलकर उच्च स्तर तक पहुंचा और कई हफ्तों की कोशिश के बाद रास्ता निकला। ये कहानी सिर्फ दो जुड़वां बहनों की नहीं, बल्कि उस परिवार के इंतजार, चिंता और राहत की भी है, जिसने अपनी ही बेटी की पहचान को सिस्टम के सामने साबित करने के लिए लंबी जद्दोजहद की।

एक बहन की पहचान बनी, दूसरी की फाइल अटक गई

रामपुर नगर के खारी कुआं मोहल्ले में रहने वाले जुबैर इलियास की जुड़वां बेटियां तुबा और खिजरा हैं। दोनों का पहचान पत्र बनवाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो शुरुआत में सब सामान्य रहा। एक बच्ची का पंजीकरण हो गया। मुश्किल तब सामने आई, जब दूसरी बेटी का नामांकन कराया गया। बायोमीट्रिक प्रणाली ने उसके डेटा को पहले से दर्ज रिकॉर्ड से अत्यधिक मिलता-जुलता पाया। सिस्टम ने इसे डुप्लीकेट नामांकन की आशंका माना और आवेदन आगे बढ़ने से रोक दिया। परिवार के लिए यह महज तकनीकी दिक्कत नहीं थी। पहचान पत्र न होने से बच्ची के स्कूल प्रवेश और सरकारी योजनाओं से जुड़े जरूरी काम प्रभावित होने लगे।

जुड़वां बहनों की समानता बनी सिस्टम की चुनौती

आम तौर पर बायोमीट्रिक प्रणाली किसी व्यक्ति की अलग पहचान सुनिश्चित करने के लिए उसके शारीरिक डेटा का इस्तेमाल करती है। लेकिन तुबा और खिजरा के मामले में दोनों के बीच मौजूद जैविक समानता ने यही व्यवस्था चुनौती के सामने खड़ी कर दी।

एक तरफ सिस्टम सुरक्षा के लिहाज से किसी संभावित डुप्लीकेट रिकॉर्ड को स्वीकार नहीं कर रहा था, दूसरी तरफ परिवार के सामने यह साबित करने की चुनौती थी कि दोनों बच्चियां अलग-अलग व्यक्ति हैं। यही वह मोड़ था, जहां एक तकनीकी समस्या धीरे-धीरे पूरे परिवार की चिंता बन गई।

जनता दर्शन में पहुंची फरियाद, डीएम ने बनाया रास्ता

कई स्तरों पर प्रयास के बावजूद जब समाधान नहीं निकला तो जुबैर इलियास ने रामपुर कलेक्ट्रेट में आयोजित जनता दर्शन में अपनी समस्या जिलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी के सामने रखी। मामले को सामान्य दस्तावेजी शिकायत मानने के बजाय प्रशासन ने इसे बायोमीट्रिक पहचान से जुड़ी तकनीकी समस्या के रूप में लिया। जिलाधिकारी के निर्देश पर स्थानीय स्तर पर दस्तावेजों की जांच और सत्यापन कराया गया। इसके बाद जिला प्रशासन ने यूआईडीएआई अधिकारियों से संपर्क किया और पूरे मामले का विवरण, जरूरी दस्तावेज तथा सत्यापन रिपोर्ट मुख्यालय भेजी।

जब मामला पहुंचा दिल्ली के तकनीकी विशेषज्ञों तक

चूंकि समस्या बायोमीट्रिक डी-डुप्लीकेशन प्रणाली से जुड़ी थी, इसलिए इसे यूआईडीएआई मुख्यालय, नई दिल्ली भेजा गया। वहां उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रशासन की ओर से भेजे गए सत्यापन दस्तावेजों की तकनीकी जांच की गई। सामान्य व्यवस्था में किसी नए नामांकन का बायोमीट्रिक डेटा पहले से मौजूद रिकॉर्ड से बहुत अधिक मेल खाने पर सिस्टम उसे संभावित डुप्लीकेट मानकर रोक देता है। इस मामले में भी यही हुआ था। लेकिन जिला प्रशासन के सत्यापन और विशेष अनुरोध के बाद मामले को असाधारण परिस्थिति के तौर पर लिया गया। जरूरी सुरक्षा और सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने के बाद तकनीकी स्तर पर विशेष समाधान निकाला गया।

तीन महीने बाद खत्म हुआ इंतजार

तकनीकी समाधान के बाद दूसरी बच्ची का नामांकन सफल हो सका। पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में करीब तीन महीने लगे। इस दौरान जिला प्रशासन और यूआईडीएआई अधिकारियों के बीच लगातार संपर्क बना रहा। आखिरकार वह दिन भी आया, जब तुबा और खिजरा दोनों के अलग-अलग पहचान पत्र जारी हो गए।

दो बहनें, दो पहचान और परिवार के चेहरे पर सुकून

पहचान पत्र हाथ में आने के बाद जुबैर इलियास अपनी दोनों बेटियों को लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे। उनके लिए ये कार्ड सिर्फ सरकारी दस्तावेज नहीं थे, बल्कि उस लंबे इंतजार के खत्म होने का प्रमाण थे जिसमें एक छोटी-सी तकनीकी अड़चन ने परिवार को महीनों परेशान रखा। तुबा और खिजरा की कहानी यह भी बताती है कि तकनीक जहां पहचान को आसान और सुरक्षित बनाने का काम करती है, वहीं असाधारण मामलों में मानवीय हस्तक्षेप और संवेदनशील प्रशासनिक कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी हो सकती है।

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Chintan Shivir: पीएम मोदी आज से शुरू करेंगे केंद्रीय मंत्रियों का ‘चिंतन शिविर’; ‘विकसित भारत 2047’ और बड़े सुधारों पर होगा मंथन

Chintan Shivir: केंद्रीय मंत्रियों की दो दिवसीय चिंतन बैठक आज यानी बुधवार (23 सितंबर) से शुरू होगी। इसमें सुधारों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करते हुए शासन और नीति-निर्माण के महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा होने की उम्मीद है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि 23 और 24 सितंबर को सेवा तीर्थ में मंथन सत्र आयोजित किया जाएगा। इसमें पूरी मंत्रिपरिषद शामिल होगी। सेवा तीर्थ में ही प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) स्थित है।

विचार-विमर्श करने के लिए छह समूह गठित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में सरकारी योजनाओं की प्रगति, नीतियों के कार्यान्वयन, समय प्रबंधन, मंत्रालयों के बीच तालमेल और जन-सेवाएं प्रदान करने जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। कार्यक्रमों (योजनाओं) के समयबद्ध कार्यान्वयन और शासन से जुड़े अन्य मुद्दों पर विचार-विमर्श करने के लिए छह समूह गठित किए गए हैं, जिनमें से प्रत्येक में आठ मंत्री होंगे।

ये समूह पहले ही कई बैठकें कर चुके हैं, जिनमें चिंतन बैठक में की जाने वाली मुद्दों पर चर्चा की गई थी। सूत्रों के अनुसार, कुछ मंत्रियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में सुधार को आगे बढ़ाने के लिए उनके मंत्रालयों द्वारा अपनाई गई नीतियों और उपायों पर प्रस्तुतियां देने की संभावना है।

इन विभिन्न सुधारों पर जोर

प्रधानमंत्री, विभिन्न सुधारों पर जोर देते रहे हैं। उन्होंने पहले भी अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों से कहा था कि लोगों की समस्याओं का समाधान करना और जीवन को आसान बनाना सरकार का मुख्य ध्येय होना चाहिए। सूत्रों के मुताबिक, चिंतन बैठक में होने वाली चर्चाओं में इन मुद्दों को उठाये जाने की उम्मीद है।

मंत्रियों की प्रस्तुतियों में नीति-निर्माण की प्रक्रिया को अधिक असरदार और प्रभावकारी बनाने के तरीकों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। इसी तरह की एक चिंतन बैठक 21 अक्टूबर 2021 को भी हुई थी। उस समय बातचीत का मुख्य विषय शासन और नीति निर्माण था तथा इस कवायद का उद्देश्य मंत्रियों को सरकार के समक्ष पेश आ रही चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करना है।

क्या है मकसद?

इसे शासन की समीक्षा करने, मंत्रालयों के बीच तालमेल बेहतर बनाने और सरकार का भविष्य का एजेंडा तैयार करने के तौर पर देखा जा रहा है। इस महीने की शुरुआत में, प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रियों से मंत्रालयों और विभागों की आधिकारिक वेबसाइट को अधिक से अधिक उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाने पर काम करने के लिए कहा था।

नए सुधारों पर रहेगा जोर

केंद्रीय मंत्रियों के बुधवार से शुरू हो रहे दो दिवसीय चिंतन शिविर में मुख्य रूप से सरकार के कामकाज की समीक्षा की जाएगी। साथ ही भविष्य की योजना बनाने और नए विचारों एवं सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इस बैठक में पूरी सरकार के कामकाज का जायजा लिया जाएगा। साथ ही भविष्य की योजना, जारी कार्यों की समीक्षा और ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए नए विचारों, सुधारों और प्राथमिकताओं की पहचान पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

‘विकसित भारत’ और ‘विजन 2047’

‘विकसित भारत’ की कवायद 2021 से चल रही है। ‘विजन 2047’ और इसके लघु अवधि एवं दीर्घ अवधि के रोडमैप को तैयार करने के लिए सचिवों के 10 क्षेत्र-आधारित समूह बनाए गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस कवायद के लिए हितधारकों के साथ व्यापक स्तर पर परामर्श भी किया गया। तब से, ‘विकसित भारत 2047’ के विभिन्न पहलुओं पर मंत्रिपरिषद के समक्ष आठ प्रस्तुतियां और चर्चाएं हो चुकी हैं।

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मौजूदा चिंतन शिविर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। यह सचिवों, मंत्रालयों और विभागों, कैबिनेट सचिवालय और नीति आयोग के समूहों द्वारा किए जा रहे काम को एक मंच पर लाता है, जिनमें सुधार, जीवन को आसान बनाना, नियमों के पालन को सहज करना और शासन से जुड़ी अन्य प्राथमिकताएं शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में होने वाली चर्चाओं में इन मुद्दों को उठाये जाने की उम्मीद है।

वेबदुनिया के 27 साल: इंटरनेट से AI तक भारतीय भाषाओं की नई उड़ान

वेबदुनिया के 27 साल: इंटरनेट से AI तक भारतीय भाषाओं की नई उड़ान

27 years of webdunia hindi

कुछ यात्राएँ केवल वर्षों में नहीं मापी जातीं। वे इस बात से पहचानी जाती हैं कि उन्होंने अपने समय में क्या बदला।

1999 में मध्य प्रदेश से शुरू हुई वेबदुनिया की यात्रा आज 27 वर्ष पूरी कर रही है। यह केवल एक डिजिटल पोर्टल की वर्षगांठ नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं की उस डिजिटल यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो इंटरनेट के शुरुआती दौर में शुरू हुई थी।

 

उस समय इंटरनेट पर अंग्रेजी का दबदबा था। भारतीय भाषाओं के लिए डिजिटल दुनिया में जगह बनाना एक चुनौती थी। वेबदुनिया ने हिंदी को इंटरनेट पर एक स्वतंत्र पहचान देने का प्रयास किया और आगे चलकर हिंदी के साथ सात अन्य भारतीय भाषाओं में भी अपनी उपस्थिति बनाई।

 

आज करोड़ों पाठकों तक पहुँचना इस बात का प्रमाण है कि भारत की डिजिटल कहानी केवल अंग्रेजी में नहीं लिखी जा सकती। लेकिन अब कहानी का अगला अध्याय शुरू हो चुका है।

 

AI Revolution.

 

अब सवाल इंटरनेट का नहीं, AI का है

 

पहली डिजिटल क्रांति का बड़ा सवाल था—क्या भारतीय भाषाएँ इंटरनेट पर अपनी जगह बना पाएंगी? आज सवाल है—क्या भारतीय भाषाएँ AI की दुनिया को भी आकार देंगी?

AI जिस तेजी से हमारे सूचना प्राप्त करने, ज्ञान हासिल करने और संवाद करने के तरीके को बदल रहा है, उसमें भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल तकनीक तक पहुँच नहीं है। चुनौती यह भी है कि AI भारत की भाषाओं, संस्कृति, संदर्भ और विविधता को कितनी गहराई से समझता है।

 

भारत में करोड़ों लोग अपनी मातृभाषा में सोचते और संवाद करते हैं। इसलिए भारत में AI की वास्तविक पहुँच तभी व्यापक होगी, जब वह केवल भारतीय भाषाओं को translate न करे, बल्कि उन्हें समझे। यहीं भारतीय भाषा मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

 

Content से Context तक

 

पिछले 27 वर्षों में भारतीय भाषा मीडिया ने डिजिटल कंटेंट का एक विशाल संसार तैयार किया है—समाचार, विचार, संस्कृति, इतिहास, मनोरंजन, खेल और समाज से जुड़ी जानकारी। AI के युग में यही कंटेंट एक नई भूमिका निभा सकता है।

 

अब चुनौती केवल यह नहीं कि हम कितना कंटेंट बनाते हैं। चुनौती यह है कि वह विश्वसनीय, संदर्भपूर्ण, संरचित और AI-ready हो। क्योंकि आने वाला पाठक शायद हमेशा वेबसाइट पर जाकर जानकारी न खोजे। वह AI से पूछेगा—

 

“मुझे बताइए…”

 

और उस उत्तर की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करेगी कि AI ने किस ज्ञान से सीखा है और उस ज्ञान का संदर्भ कितना विश्वसनीय है। इस बदलाव को समझना मीडिया के लिए आवश्यक है।

 

बदलाव शाश्वत है, मूल्य स्थायी

 

27 वर्षों में हमने इंटरनेट को बदलते देखा। वेबसाइट से मोबाइल, सोशल मीडिया से वीडियो और अब AI तक—तकनीक लगातार बदल रही है। आगे भी बदलाव रुकने वाला नहीं है। बदलाव शाश्वत है, लेकिन मूल्य स्थायी।

 

तकनीक बदल सकती है, प्लेटफॉर्म बदल सकते हैं, पाठक के व्यवहार बदल सकते हैं; लेकिन विश्वसनीयता, सत्यता, जिम्मेदारी और पाठक का विश्वास किसी भी दौर में मीडिया की बुनियाद बने रहेंगे।शायद यही किसी भी डिजिटल संस्था की सबसे बड़ी पूंजी है।

 

भारतीय भाषाओं का अगला अवसर

 

AI भारतीय भाषाओं के लिए एक बड़ी चुनौती है, लेकिन उससे भी बड़ा अवसर। एक किसान अपनी भाषा में AI से खेती के बारे में पूछ सके। एक विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में जटिल विषय समझ सके। कोई नागरिक अपनी भाषा में सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सके। कोई पाठक अपनी भाषा में इतिहास, विज्ञान या समसामयिक घटनाओं को समझ सके।

 

तब AI केवल तकनीक नहीं रहेगा।वह ज्ञान को लोकतांत्रिक बनाने का माध्यम बन जाएगा। लेकिन इसके लिए भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटल ज्ञान की आवश्यकता होगी।

 

27 साल बाद फिर एक शुरुआत

 

वेबदुनिया की 27 वर्ष की यात्रा को पीछे मुड़कर देखने पर एक दिलचस्प समानता दिखाई देती है।

 

1999 में चुनौती थी—भारतीय भाषाओं को इंटरनेट तक पहुँचाना।

 

2026 में चुनौती है—भारतीय भाषाओं को AI के केंद्र तक पहुँचाना।

 

तकनीक बदल गई है। माध्यम बदल गया है। उपयोगकर्ता का व्यवहार बदल रहा है। लेकिन एक चीज नहीं बदली—अपनी भाषा में जानकारी पाने की आवश्यकता। इसलिए 27 वर्ष पूरे होना हमारे लिए केवल अतीत का उत्सव नहीं है। यह भविष्य के बारे में सोचने का अवसर है।

 

AI की दुनिया में भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी तकनीकी प्रतिभा नहीं होगी। उसकी असली ताकत उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता भी होगी।

 

और शायद आने वाले वर्षों का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा—

 

क्या हम ऐसा AI बना पाएँगे जो भारत की भाषाएँ सिर्फ बोलता नहीं, बल्कि भारत को समझता भी हो?

 

वेबदुनिया की यात्रा इंटरनेट से शुरू हुई थी। अब अगला अध्याय AI के युग में भारतीय भाषाओं की नई कहानी लिखने का है। 27 वर्षों से साथ चल रहे करोड़ों पाठकों, पत्रकारों, रचनाकारों, सहयोगियों और शुभचिंतकों को हृदय से धन्यवाद।

व्यवस्था को चुभने वाले अधिकारी

मुंढे मई 2026 में एफडीए आयुक्त बने। कुछ ही महीनों में विभाग ने हजारों निरीक्षण किए, सैकड़ों लाइसेंस निलंबित किए, करोड़ों रुपये का मिलावटी या असुरक्षित माल जब्त किया और गुटखा-पान मसाला के अवैध कारोबार पर कठोर कार्रवाई की। बड़े ब्रांड, पुराने होटल, क्विक-कॉमर्स गोदाम, यहाँ तक कि मुंबई हाईकोर्ट की कैंटीन भी इस दायरे से बाहर नहीं रहे। संदेश साफ था, नियम छोटे-बड़े के भेद से नहीं चलेंगे। अब वही सख्ती निजी अस्पतालों के उपभोग्य सामान पर दिख रही है।

महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषध प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे इन दिनों एक बार फिर उन अधिकारियों की पंक्ति में खड़े दिखते हैं, जिनकी उपस्थिति व्यवस्था को असहज कर देती है। होटल-रेस्तरां की रसोइयों से शुरू हुआ उनका अभियान अब अस्पतालों के बिलों तक पहुँच गया है। सवाल केवल एक अधिकारी के तेवर का नहीं है। सवाल यह है कि जनता के स्वास्थ्य और जेब के बीच खड़ी लूट को रोकने वाले अधिकारी भारत में इतने दुर्लभ क्यों हैं? और जब वे दिखते हैं तो उनकी पदावधि इतनी छोटी क्यों रह जाती है?

मुंढे मई 2026 में एफडीए आयुक्त बने। कुछ ही महीनों में विभाग ने हजारों निरीक्षण किए, सैकड़ों लाइसेंस निलंबित किए, करोड़ों रुपये का मिलावटी या असुरक्षित माल जब्त किया और गुटखा-पान मसाला के अवैध कारोबार पर कठोर कार्रवाई की। बड़े ब्रांड, पुराने होटल, क्विक-कॉमर्स गोदाम, यहाँ तक कि मुंबई हाईकोर्ट की कैंटीन भी इस दायरे से बाहर नहीं रहे। संदेश साफ था, नियम छोटे-बड़े के भेद से नहीं चलेंगे। अब वही सख्ती निजी अस्पतालों के उपभोग्य सामान पर दिख रही है।

एक सर्वे में सामने आया कि अस्पताल ने आईवी इन्फ्यूजन सेट 11.05 रुपये में खरीदा, पर मरीज के बिल में उसकी कीमत 325 रुपये लिखी गई। यह करीब 2,841 प्रतिशत का अंतर है। सिरिंज 6.75 रुपये में खरीदी गई, बिल में 57.20 रुपये। कैथेटर 29.41 रुपये में लिया गया, मरीज से 310 रुपये वसूले गए। मुंढे ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और केंद्रीय औषध विभाग को पत्र लिखकर ट्रेड मार्जिन पर लगाम लगाने की माँग की है।

यह महज मूल्य का खेल नहीं है। अस्पताल के बिल का सबसे मोटा हिस्सा अक्सर वह होता है जिसका उपचार से सीधा संबंध कम और खरीद-बिक्री की श्रृंखला से ज्यादा होता है। उल्लेखनीय है कि जब मरीज सरकारी योजना या निजी बीमा के दायरे में होता है, तो यह लूट और निर्लज्ज हो जाती है। मरीज सोचता है कि खर्च कंपनी या सरकार उठाएगी। अस्पताल जानता है कि क्लेम पास होने की प्रक्रिया जटिल है, मरीज कमजोर है और पूछताछ कम होती है। नतीजा यह कि खपत की वस्तुएँ मनमाने मार्जिन पर चढ़ जाती हैं, कमरे-जांच-उपकरण के पैकेज फुला दिए जाते हैं और बीमा का पैसा अंततः समाज के उसी वर्ग से वसूला जाता है जो प्रीमियम चुकाता है। सरकारी योजनाओं में भी यही तर्क काम करता है और सार्वजनिक धन निजी लाभ में बदल जाता है।

भारत को तुकाराम जैसे अधिकारियों की जरूरत है क्योंकि हमारे नियामक ढांचे में कानून पर्याप्त हैं, पर प्रवर्तन चयनात्मक है। खाद्य सुरक्षा, औषधि नियंत्रण और अस्पताल शुल्क, तीनों क्षेत्र उन जगहों पर हैं जहाँ आम आदमी सबसे असहाय होता है। वह मेनू नहीं पढ़ सकता कि पनीर असली है या नहीं; वह बिल नहीं काट सकता कि सेट ग्यारह का है या तीन सौ पच्चीस का; वह बीमा कंपनी से नहीं लड़ सकता जब अस्पताल कहता है कि पैकेज में सब शामिल है।

ऐसे में यदि कोई अधिकारी बिना चेतावनी निरीक्षण करता है, लाइसेंस निलंबित करता है और आंकड़े सार्वजनिक करता है, तो वह केवल विभाग नहीं चला रहा होता, वह बाजार की नैतिक सीमा खींच रहा होता है। गौरतलब है कि तुकाराम मुंढे प्रभाव तेज़ी से फैल रहा है। रसोई साफ होने लगीं, मेनू पर एनालॉग पनीर लिखा जाने लगा और अस्पताल अब कम से कम कीमतों की चर्चा से बच नहीं सकते। यह डर सुधार का पहला कदम है। स्थायी सुधार तभी आएगा जब एक व्यक्ति का अभियान संस्था की आदत बनेगी।

सवाल उठता है कि ऐसे अधिकारी बार-बार तबादले का शिकार क्यों होते हैं? मुंढे 2005 बैच के महाराष्ट्र काडर के आईएएस हैं। करीब इक्कीस वर्ष की सेवा में उनके पच्चीस के आसपास तबादले हुए हैं। सोलापुर में रेत माफिया, नवी मुंबई में अनावश्यक परियोजनाओं का विरोध, पुणे परिवहन में अनुपस्थित ड्राइवरों की छँटनी, स्वास्थ्य आयुक्त रहते सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक, हर जगह उन्होंने स्वार्थी हितों से टकराव चुना। तबादला सजा नहीं कहा जाता, पर व्यवहार में वह सजा ही है। ईमानदार अधिकारी को बार-बार हटाकर व्यवस्था यह संकेत देती है कि स्थिरता सुविधा के पक्ष में है, असुविधा के नहीं। राजनेता, स्थानीय व्यापारिक लॉबी, कभी विभाग के भीतर के कर्मचारी, सभी को एक ही शिकायत होती है: काम का दबाव, अचानक छापे, छवि खराब होना। जनसमर्थन सोशल मीडिया पर दिखता है, पर फाइलें सचिवालय में चलती हैं। जब तक तबादले की शक्ति बिना पारदर्शी कारण के बनी रहेगी, मुंढे जैसे अधिकारी अपवाद रहेंगे, आदर्श नहीं।

ऐसे में आलोचना भी जरूरी है। व्यवसाय जगत कहता है कि बिना सुधार का समय दिए लाइसेंस काटना अति है। अदालत ने कभी कहा कि मच्छर मारने के लिए तलवार न चलाई जाए। विभाग के कुछ कर्मचारियों ने कार्यभार की शिकायत की। ये बातें अनसुनी नहीं की जानी चाहिए। प्रवर्तन कठोर हो, पर पूर्वानुमान योग्य और समान भी हो। छोटे ढाबे और बड़े अस्पताल दोनों पर एक ही पैमाना लगे। मूल्य नियंत्रण ऐसा हो कि गुणवत्ता न गिरे और इनोवेटर का मार्जिन भी पूरी तरह न मिटे। बीमा कंपनियों और सरकारी योजनाओं को अस्पताल के खरीद मूल्य से बिल का मिलान अनिवार्य बनाना चाहिए। मरीज को बाहरी फार्मेसी से दवा लेने की स्वतंत्रता कागज पर नहीं, व्यवहार में मिलनी चाहिए।

आखिरकार प्रश्न व्यक्ति का नहीं, संस्कृति का है। भारत में सेवा भाव वाले अधिकारी भी पैदा होते हैं, गाँव के किसान परिवार से आईएएस बनने वाले मुंढे इसका जीवंत उदाहरण हैं। कमी यह है कि व्यवस्था उन्हें टिकाए नहीं रखती। जब तक ईमानदारी को करियर का जोखिम माना जाएगा, रसोई में कीड़े और बिल में दो हजार प्रतिशत मुनाफा सामान्य बने रहेंगे। देश को मुंढे जैसे और अधिकारियों की जरूरत है। उससे भी ज्यादा जरूरत है ऐसी प्रशासनिक सुरक्षा की, जिसमें वे एक पद पर पूरा कार्यकाल काट सकें, आंकड़े सुधार सकें और लॉबी के दबाव में विस्थापित न हों। स्वास्थ्य और भोजन मौलिक जरूरतें हैं। इन पर लूट को सहना शासन की विफलता है। एक अधिकारी का अभियान चेतावनी है। चेतावनी को नीति बनाना अब बाकी है।

पावन दीयों का सियासी शस्त्रीकरण

गणेश जी का उत्सव दस दिनों तक मनाया जाता है। दुर्गापूजा भी नौ रात्रियों तक मनाई जाती है। रामलीला का आयोजन भी आमतौर पर दस दिनों तक चलता है। भगवान कृष्ण की जन्माष्टमी भी मथुरा-वृंदावन में पूरे सप्ताह मनाई जाती है। पुरी में भगवान जगन्नाथ का रथ उत्सव भी दस दिनों तक चलता है। तिरुपति बालाजी का श्रीवरी ब्रह्मोत्सव नौ दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। अब इस परंपरा में नरेंद्र भाई के ‘सेवा-संकल्प’ में पूरे एक महीने उत्सव और जुड़ने का हमें सौभाग्य मिला है।

ज़िंदगी रोशन करने के लिए अपने घर की मुंडेर पर दीया जलाने की हमारी परंपरा ज़्यादा नहीं तो कम-से-कम पांच हज़ार साल पुरानी तो है ही। मेरी दादी, मेरी नानी और फिर मेरी मां भी हर दिन गोधूलि बेला में घर के मंदिर और तुलसी के चौबारे पर घी का दीया जलाती थीं। मां जब तक थीं, उन्होंने इस रीत का अनवरत निर्वाह किया। वे नहीं रहीं तो बहुत अरसे तक मेरी पत्नी भी ऐसा ही करती रही। घर के छोटे-से मंदिर में रोज़ सुबह-शाम दीया-बाती करने का उस का नियम था। दिल्ली के घरों में चौबारा तो कहां से बनाएं, सो, तुलसी गमले में उगती है और मिट्टी का दीया वह हर शाम पूरे श्रद्धा भाव से उस पर रख दिया करती थी।

मगर कुछ बरस से यह नियम ज़रा लड़खड़ा-सा गया है। प्रतिदिन दीया बालने की पत्नी की हुमक अब वैसी नहीं रही है। एक तो कोरोना-काल में डर के मारे दिल्ली छोड़ कर बहुत दिनों मां, मैं और पत्नी अरण्यवास में चले गए तो गमले में लगी तुलसी सूख गई। और, सूखी तो ऐसी सूखी कि कई बार लगाने की कोशिश की, पर नहीं पनपी, तो नहीं पनपी। सो, तुलसी का दीया आजकल मौन है। फिर पत्नी-बेटियों के आग्रह पर अरसे बाद घर के भीतर हल्का-फुल्का नवीनीकरण कराया तो मंदिर के पट कुछ महीनों के लिए पूरी तरह बंद रखने पड़े और सुबह-शाम दीया लगाने का पत्नी का दस्तूर भंग हो गया। उस के बाद पट तो खुले, लेकिन दीये की निरंतरता नैपथ्य में चली गई।

नरेंद्र भाई मोदी के जन्मदिन पर देश भर में जले करोड़ों आशीर्वाद-दीयों ने मुझे दादी-नानी-मां-पत्नी के सहारे प्राणवान रहे अपने घर के परंपरागत दीये की याद दिला दी। वह दीया मेरे गांव, ननिहाल और जंगल-जंगल पदस्थ मेरे पिता के कवेलू-आवासों से ले कर अंततः दिल्ली तक के घर की सुखदायी-संतोषदायी जीवनीशक्ति बना रहा। दीये की यह भीनी टिमटिमाहट ही आज भी, जब-जब मन उदास होता है, हमारा संबल बनती है। सो, जब नरेंद्र भाई के जन्मदिन पर आशीर्वाद-दीये जलाने के आयोजन-प्रयोजन की होड़ में लगे उन के कल्याणाकांक्षियों की सघन उंदुर-दौड़ मैं ने देखी तो मेरे तो होश फ़ाख़्ता हो गए। मैं तो कभी सोच भी नहीं सकता था कि सनातनी सभ्यता की आधारशिला पावन दीये को भी कभी ऐसे सियासी शस्त्रीकरण का ज़रिया बनाने की हद तक हमारे हुक्मरान उतर सकते हैं।

मेरा जन्म मध्यप्रदेश में हुआ। अगर उसे लालन-पालन कहा जा सके तो लालन-पालन भी मध्यप्रदेश में हुआ। औपचारिक शिक्षा भी मध्यप्रदेश में हुई। पत्रकारिता के संस्कार भी मध्यप्रदेश से मिले। जब राजनीति में कूदने का चस्का लगा तो उस की मैदानी धरती भी मध्यप्रदेश ही रही। तो ज़ाहिर है कि मध्यप्रदेश से अतिरिक्त लगाव मेरी धमनियों में है। इसलिए नरेंद्र भाई के लिए देश भर में बुधवार को रोशन किए गए दीयों में मेरी नज़र सब से पहले मध्यप्रदेश के दीयों पर पड़ी। वहां के मुख्यमंत्री मोहन यादव इस वज़ह से थोड़े परिचित रहे हैं कि वे भी उज्जैन के उसी विक्रम विश्वविद्यालय से पढ़ कर निकले हैं, जहां से मैं। विक्रम की शिक्षण-अध्ययन परंपरा बहुत अर्थपूर्ण और संजीदा मानी जाती रही है। महाकाल के मंदिर से उत्तर दिशा में पांच-छह किलोमीटर दूर आज भी सांदीपनि ऋषि का आश्रम मौजूद है। इसी आश्रम में श्रीकृष्ण, उन के बड़े भाई बलराम और सुदामा ने एक साथ शिक्षा प्राप्त की थी।

तो मुझे लगा कि हमारे मोहन यादव में सांदीपनि की धरती की धूल का कुछ तो असर ज़रूर होगा। मगर फिर मैं ने पाया कि नरेंद्र भाई को आशीर्वाद देने के लिए 3 करोड़ 55 लाख दीये तो अकेले मध्यप्रदेश में जलाए गए। मुख्यमंत्री के ख़ुद के गृह-नगर उज्जैन में महाकाल महालोक के आसपास और क्षिप्रा नदी के घाटों पर 33 लाख 27 हज़ार दीये जला कर एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाया गया। अब तक नहीं समझ पा रहा हूं कि इस तिलिस्म की रचना पर गर्व करूं या दूर कहीं जा कर किसी चुल्लू की तलाश में जुटूं? मैं तो अब तक घर-बाहर के मंदिर में आनंद से झूमती दीये की लौ में ही ऐसे शक्तिपुंज के दर्शन करता रहा हूं कि ये लाखों-करोड़ों दीयो की आक्रामक दीपशिखाएं तो मेरे सामने डेढ़ दर्जन परमाणु अस्त्र ढो कर अठारह हज़ार किलोमीटर दूर तक चली जाने वाली सटन-2 मिसाइल का दृश्य पेश कर रही हैं।

नरेंद्र भाई के स्वयं गृह-प्रदेश गुजरात में साढ़े अठारह हज़ार स्थानों पर 88 लाख दीयों ने अपनी माटी के लाल पर आशीष बरसाया। अहमदाबाद की कांकरिया झील किनारे सवा लाख और अटल-पुल पर 76 हज़ार दीये जलाए गए। सूरत में दस हज़ार स्थानों पर दस लाख दीये जले। अहमदाबाद के विश्व उमियाधाम में नरेंद्र भाई के जीवन के 76 बरस पूरे होने पर 76 हज़ार दीये प्रज्वलित कर आरती की गई। गृह मंत्री अमित भाई शाह नरेंद्र भाई के जन्मस्थान वडनगर पहंुचे और आरती-पूजन समारोह का हिस्सा बने। उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों ने भी दीयों की झड़ी लगा दी। नरेंद्र भाई के निर्वाचन क्षेत्र बनारस में दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और काशी विष्वनाथ धाम क्षेत्र में 5 लाख से अधिक दीये जले। राजधानी लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रियों के साथ हज़ारों प्रज्वलित दीयों से बनाई गई नरेंद्र भाई की आकृति की आरती उतारी।

बिहार में 21 लाख आशीर्वाद-दीये जले। छत्तीसगढ़ में 36 लाख दीये जले। पश्चिम बंगाल में एक करोड़ घरों में दीप प्रज्वलन प्रायोजन हुआ। राजस्थान से ले कर महाराष्ट्र तक, आंध्र प्रदेश से ले कर अरुणाचल तक, ओडिशा से ले कर गोवा तक और हरियाणा से ले कर असम, त्रिपुरा, मणिपुर तक हर मतदान केंद्र के क्षेत्र को इकाई मान कर दीप प्रज्वलन के कार्यक्रम आयोजित हुए। सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से अपने-अपने घरों के बाहर पांच-पांच, ग्यारह-ग्यारह दीये जलवा कर नरेंद्र भाई मोदी को शुभाशीष दिलवाया गया। भारतीय जनता पाटी की सरकारों वाले 22 राज्यों के बीच इस मामले में एक-दूसरे को पटखनी देने की होड़-सी मच गई।

आजकल देश भर में गणपति विराजे हुए हैं। गणेश जी का उत्सव दस दिनों तक मनाया जाता है। दुर्गापूजा भी नौ रात्रियों तक मनाई जाती है। रामलीला का आयोजन भी आमतौर पर दस दिनों तक चलता है। भगवान कृष्ण की जन्माष्टमी भी मथुरा-वृंदावन में पूरे सप्ताह मनाई जाती है। पुरी में भगवान जगन्नाथ का रथ उत्सव भी दस दिनों तक चलता है। तिरुपति बालाजी का श्रीवरी ब्रह्मोत्सव नौ दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में तेजाजी महाराज का उत्सव छह दिनों तक मनाया जाता है। हमारे देश में प्रमुख से प्रमुख देवी-देवताओं और लोकदेवताओं तक के जन्मोत्सव कई दिनों तक मनाने की प्राचीन परंपरा है।

सो, भला हुआ कि नरेंद्र भाई 76 के हुए तो अब इस परंपरा में पूरे एक महीने मनाया जाने वाला सालाना ‘सेवा-संकल्प’ उत्सव और जुड़ने का सौभाग्य हमें मिल गया है। भारत एक उत्सवधर्मी देष है। हम हर बात का उत्सव मनाते हैं। जब सात बरस पहले नरेंद्र भाई ने कहा था कि ‘डर होना चाहिए, डर अच्छी चीज़ है’ तो मुझे नहीं मालूम था कि एक दिन आएगा कि वे मेरे मन के दीये को भी सियासी-धमक का डर फैलाने के साधन में तब्दील कर लेंगे। नरेंद्र भाई के लिए एक सद्भावना-दीप मैं भी दीप्तिमान करने का मेरा भी मन था। मगर अब मेरे उंगलियां ही नहीं, टांगें तक थर-थर कांप रही हैं।

UP Home Guard vacancies: यूपी में होने वाली है नौकरियों की बारिश, योगी सरकार अगले 6 महीने में बांटेगी एक लाख नौकरियां

UP Home Guard vacancies: उत्तर प्रदेश निवासियों के लिए यह खबर खुश करने वाली है। राज्य में अगले 6 महीनों में न सिर्फ सरकारी नौकरी की बारिश होने वाली है, बल्कि सरकार राज्य में पेंशन के तहत दी जाने वाली धनराशि और लाभार्थियों की संख्या बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। राज्य की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सरकार ने अगले छह माह में एक लाख युवाओं को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है। इनमें 77 हजार भर्तियां सिर्फ पुलिस व होमगार्ड विभाग में होंगी। इसकी शुरुआत 19 सितंबर से होने जा रही है।

इतना ही नहीं सीएम ने वृद्धजन, निराश्रित महिलाओं और दिव्यांगजन के लिए आर्थिक सहूलियत बढ़ाने की भी घोषणा की है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में 1 करोड़ 10 लाख वृद्धजन, निराश्रित महिलाओं व दिव्यांगजन को 12 हजार रुपये सालाना पेंशन दी जाती है। जल्द ही पेंशन की धनराशि और लाभार्थियों की संख्या भी बढ़ेगी। विकास व जनोपयोगी सुविधाओं के लिए कानून का राज और सुरक्षा का बेहतरीन वातावरण होना जरूरी है।

सीएम योगी बुधवार को गोरखपुर के वार्ड नंबर-53 उर्वरक नगर के अंतर्गत जंगल नकहा नंबर-2 में नवनिर्मित कल्याण मंडपम सहित गोरखपुर विकास प्राधिकरण, ग्रामीण अभियंत्रण विभाग और नगर निगम की करीब 40 करोड़ रुपये की लागत वाली 119 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास करने के बाद उपस्थित जनसमूह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि किसी भी गांव या शहर में नागरिकों के जीवन स्तर का पता विकास और वहां उपलब्ध जनोपयोगी सुविधाओं से चलता है। इसके लिए कानून का राज और सुरक्षा का बेहतरीन वातावरण होना जरूरी है। 2017 के बाद गोरखपुर और उत्तर प्रदेश में कानून का राज सुनिश्चित कर विकास एवं सुविधाओं की नई श्रृंखला खड़ी की गई है।

बीमारू राज्य से देश की अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन बना यूपी

मुख्यमंत्री ने सुदृढ़ कानून व्यवस्था के चलते हुए विकास और इससे आए बदलाव का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश अब बीमारू राज्य नहीं है। बल्कि अब यह देश की अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन है। उत्तर प्रदेश अब देश की सबसे तेज अर्थव्यवस्था में एक है। आज यहां आने को हर कोई लालायित है। यह मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, कल-कारखानों की नई श्रृंखला और सुदृढ़ कनेक्टिविटी के लिए जाना जा रहा है।

समाज की एकजुटता का परिणाम है विकास

सीएम योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में विकास और जन कल्याण से सकारात्मक माहौल बना है। ऐसे में समाज को बांटने वालों से सावधान रहना होगा। विकास समाज की एकजुटता का परिणाम है। शानदार वर्तमान और बेहतरीन भविष्य के लिए डबल इंजन सरकार जरूरी है।

गोरखपुर में बदलाव ने ले ली मच्छर और माफिया की जगह

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि यूपी और गोरखपुर में 2017 के बाद से दिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र को इंसेफेलाइटिस, मच्छर व माफिया से निजता मिली है। इंफ्रास्ट्रक्चर ने गोरखपुर और उत्तर प्रदेश को नई पहचान दिलाई गई है। पिछली सरकारों के निकम्मेपन से 2017 के पहले तक हर साल इंसेफेलाइटिस से सैकड़ों मौतें होती थी।

सीएम ने गोरखपुर में बंद पड़े खाद कारखाने के दोबारा चलने, फोरलेन कनेक्टिविटी, फ्लाईओवर, ओवरब्रिज के निर्माण, रामगढ़ताल के पर्यटन स्थल बनने, बीआरडी मेडिकल कॉलेज की स्थिति शानदार बनाने के साथ एम्स की सौगात मिलने का भी जिक्र किया।

अब तक साढ़े नौ लाख युवाओं को सरकारी नौकरी

सीएम योगी ने कहा कि सरकार ने अब तक साढ़े नौ लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दी है। चुनाव की घोषणा से पहले, सरकार अगले 6 माह में एक लाख और युवाओं को सरकारी नौकरी देने जा रही है। अब गोरखपुर के गीडा में 500 कारखाने लगे, जिससे अकेले गीडा में 50 हजार नौजवानों को रोजगार मिला और इस क्षेत्र को पलायन से मुक्ति मिली।

7 अक्टूबर से विशेष शिविर, मिलेगा योजनाओं का लाभ

मुख्यमंत्री ने कहा कि 7 अक्टूबर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के शासन प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ‘सेवा संकल्प अभियान’ शिविर लगने जा रहा है। यह एक सप्ताह का विशेष शिविर होगा। इसमें सरकारी योजनाओं का लाभ पाने से वंचित नागरिकों को उनमें शामिल करने की पहल चलाई जाएगी।

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कर्तव्य पथ पर जलेंगे सवा लाख दीये

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन पर गुरुवार को राष्ट्रीय राजधानी में बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। दिल्ली सरकार के ‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान के तहत कर्तव्य पथ पर सवा लाख दीये जलाए जाएंगे। इसके साथ रक्तदान शिविर, 108 कुंडीय यज्ञ और श्रमिक सेवा केंद्र की शुरुआत सहित कई कार्यक्रम होंगे।

दिल्ली के मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने राजधानी के प्रत्येक परिवार से गुरुवार शाम छह से सात बजे के बीच एक दीया जलाने की अपील की है। उन्होंने लोगों से प्रधानमंत्री के अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और ‘मां भारती की सेवा में निरंतर शक्ति’ के लिए प्रार्थना करने को कहा है।

सीएमओ के मुताबिक ‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान के तहत कर्तव्य पथ पर सरकारी योजनाओं के लाभार्थी सवा लाख दीये जलाएंगे।

मुख्यमंत्री के नेतृत्व में होने वाले कार्यक्रम को प्रधानमंत्री के निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में 25 वर्ष पूरे होने के अवसर से भी जोड़ा गया है। सरकार ने इसे सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण के प्रति प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता को समर्पित आयोजन बताया है।

दिल्ली सरकार कर्तव्य पथ पर दीप प्रज्वलन के अलावा त्यागराज स्टेडियम में विशाल रक्तदान शिविर आयोजित करेगी। खाटू श्याम दिल्ली धाम में 108 कुंडीय यज्ञ होगा और श्रमिकों के लिए ‘नमो श्रमिक सेवा केंद्र’ की शुरुआत की जाएगी। भाजपा और दिल्ली सरकार 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत राष्ट्रीय राजधानी में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करेंगी।

सीएमओ के मुताबिक त्यागराज स्टेडियम में सुबह 11 बजे से शाम पांच बजे तक मेगा रक्तदान शिविर होगा। इसमें 2,500 यूनिट रक्त संग्रह करने का लक्ष्य रखा गया है। रक्तदान शिविर में दिल्ली सरकार के 11 अस्पतालों के ब्लड बैंक के अलावा सेना अस्पताल, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज, सफदरजंग अस्पताल और इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी की भागीदारी होगी।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने दिल्लीवासियों से इन कार्यक्रमों में भाग लेने की अपील की है।

यूपी का मतलब अल्टीमेट पोटेंशियल, टेक्सटाइल सेक्टर बनेगा नई औद्योगिक ताकत : CM योगी

यूपी का मतलब अल्टीमेट पोटेंशियल, टेक्सटाइल सेक्टर बनेगा नई औद्योगिक ताकत : CM योगी

UP Textiles Conclave 2026

UP Textiles Conclave 2026: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यूपी का मतलब अप यानी ‘अल्टीमेट पोटेंशियल’ है। उत्तर प्रदेश के पास विरासत, हुनर, मानव संसाधन, उद्योग, उद्यमिता और देश का सबसे बड़ा बाजार है। दुनिया की सबसे युवा वर्कफोर्स भी हमारे पास है। अब इसी ताकत के सहारे उत्तर प्रदेश को ग्लोबल टेक्सटाइल हब बनाना है। हमारा लक्ष्य फाइबर से यार्न, यार्न से फैब्रिक, फैब्रिक से गारमेंट और गारमेंट से ब्रांड होते हुए ग्लोबल मार्केट तक पूरी वैल्यू चेन प्रदेश में विकसित करने का है।

 

मुख्यमंत्री योगी मंगलवार को दो दिवसीय यूपी टेक्सटाइल्स कॉन्क्लेव-2026 के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने यूपी टेक मित्र पोर्टल लॉन्च करने के साथ हथकरघा बुनकर समृद्धि योजना का शुभारंभ किया। कार्यक्रम में टेक्सटाइल सेक्टर में 5,196 करोड़ रुपये के नए निवेश प्रस्तावों के एमओयू किए गए। साथ ही 163 करोड़ रुपये के लेटर ऑफ कम्फर्ट और 60 करोड़ रुपये की सब्सिडी का वितरण किया गया। मुख्यमंत्री ने देशभर से आए टेक्सटाइल सेक्टर के प्रतिष्ठित उद्यमियों, निवेशकों, निर्यातकों, प्रदेश के परंपरागत बुनकरों, हथकरघा संचालकों और इस क्षेत्र में भविष्य तलाश रहे युवाओं का स्वागत और अभिनंदन किया।

फैब्रिक सेक्टर में यूपी चौथा सबसे बड़ा निर्यातक राज्य

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश की टेक्सटाइल पहचान हजारों वर्षों पुरानी है। वैदिक साहित्य से लेकर रामायण और महाभारत तक में काशी के रेशमी वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। वाराणसी की सिल्क साड़ी, भदोही का कारपेट, लखनऊ की चिकनकारी, बरेली की जरी, कानपुर का टेक्सटाइल इकोसिस्टम और मेरठ में टेक्निकल टेक्सटाइल की संभावनाएं प्रदेश की विरासत और औद्योगिक क्षमता का प्रमाण हैं।

 

प्रदेश में दो लाख हैंडलूम और पांच लाख से अधिक पावरलूम बुनकर इस सेक्टर की असली ताकत हैं। कृषि के बाद सर्वाधिक रोजगार का सृजन वस्त्र उद्योग करता है। उत्तर प्रदेश फैब्रिक मैन्युफैक्चरिंग में देश में तीसरे स्थान पर है और कुल फैब्रिक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी 13 से 14 प्रतिशत है। पिछले छह वर्षों में प्रदेश के वस्त्र, परिधान और हस्तशिल्प निर्यात में करीब 56 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यूपी इस सेक्टर में देश का चौथा सबसे बड़ा निर्यातक राज्य बन गया है। वर्ष 2025-26 में 21 हजार करोड़ रुपये से अधिक के निर्यात के साथ गौतमबुद्ध नगर देश के प्रमुख निर्यातक जिलों में दूसरे स्थान पर पहुंचा है।

यूपी के 17 टेक्सटाइल उत्पादों को जीआई टैग

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने 2030 तक 350 बिलियन अमेरिकी डॉलर की टेक्सटाइल एवं अपैरल इकोनॉमी और 100 बिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य रखा है। इस राष्ट्रीय संकल्प में उत्तर प्रदेश अपनी पूरी क्षमता से भागीदारी करेगा। ओडीओपी के माध्यम से प्रदेश के 35 से अधिक जिलों के वस्त्र और हैंडलूम उत्पादों को नई पहचान मिली है। प्रदेश के 17 टेक्सटाइल उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लाखों महिलाएं भी इस सेक्टर से जुड़कर आत्मनिर्भर हो रही हैं। दुनिया की सबसे युवा वर्कफोर्स प्रदेश में उपलब्ध है, जो टेक्सटाइल सेक्टर को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

2017 से पहले वसूली की पर्ची लेकर लौट जाते थे निवेशक

मुख्यमंत्री ने पिछली सरकारों पर हमला करते हुए कहा कि 2017 से पहले प्रदेश की पहचान ‘वन डिस्ट्रिक्ट-वन माफिया’ की बन गई थी। हर जनपद में माफिया की समानांतर सरकार चलती थी। कानून व्यवस्था चौपट थी। माफिया जहां हाथ रख देता, वह जमीन उसकी हो जाती और तत्कालीन सरकार मौन बनी रहती थी। निवेशक व्यापार का सपना लेकर आता था और वसूली की पर्ची लेकर लौट जाता था। दंगे, कर्फ्यू, गुंडा टैक्स और माफिया के कारण उद्योग लगाना मुश्किल था। बिजली और विकास एक परिवार तक सीमित था। आज यूपी कर्फ्यू, दंगा, माफिया और उपद्रव से मुक्त है। अब किसी ने बेटी, व्यापारी या निवेशक की सुरक्षा में सेंध लगाने का दुस्साहस किया तो उसके लिए दो ही जगह होंगी- जेल या जहन्नुम। अब कोई यूपी में खुलेआम पिस्टल लहरा कर नहीं चल सकता।

यूपी का नाम सुनकर दूरी बना लेते थे लोग

सीएम ने कहा कि 2017 से पहले प्रदेश के नागरिकों के सामने पहचान का संकट पैदा हो गया था। यूपी का नाम सुनकर प्रदेश के बाहर लोग यहां के नागरिकों को किराये पर मकान देने और होटल में कमरा देने तक से कतराते थे। किसी समाज और नागरिक के लिए इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है। यूपी का परिचय देने पर व्यक्ति को कई बार सामाजिक रूप से दूरी का सामना करना पड़ता था। यहां कोई पर्व और त्योहार शांतिपूर्ण तरीके से नहीं गुजरता था। उत्सव से पहले ही उपद्रव शुरू हो जाता था। पूरे प्रदेश में लोग दंगों की आग में झुलसते थे। बरेली, मथुरा के कोसीकलां, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर जैसे स्थानों पर बड़े दंगे हुए। व्यापक पैमाने पर पलायन हुआ और महीनों तक कर्फ्यू लगा रहा।

अराजकता का शिकार बनीं कानपुर की ऐतिहासिक कपड़ा मिलें

मुख्यमंत्री ने कहा कि कानपुर की ऐतिहासिक कपड़ा मिलें भी इसी अराजक व्यवस्था की शिकार बनीं। मगहर की कताई मिल 1977 में बनी और 1997 में बंद हो गई। बुनकरों और छोटे टेक्सटाइल उद्यमियों को बैंक से ऋण मिलने में भी कठिनाई होती थी। डीबीटी की व्यवस्था के अभाव में सरकारी योजनाओं का लाभ न तो नागरिकों तक पहुंचता था और न ही उद्यमियों तक। 2017 के बाद उत्तर प्रदेश में बड़ा बदलाव आया है। अब यहां कानून का राज है।

यूपी के पास हैं 36 सेक्टोरल पॉलिसी

सीएम ने कहा कि कानून व्यवस्था में बदलाव और निवेश अनुकूल नीतियों का परिणाम है कि आज प्रदेश के पास 36 सेक्टोरल पॉलिसी हैं। देश के 55 प्रतिशत मोबाइल और 60 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट का उत्पादन यूपी में हो रहा है। यूपी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के 6 स्ट्रेटेजिक नोड में 35 हजार करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। प्रदेश में एमएसएमई के 12 प्लेज पार्क भी तैयार हो रहे हैं।

 

पिछले 9 वर्ष में यूपी पर कैपिटा इनकम तीन गुना करने और वूमेन वर्कफोर्स की भागीदारी भी तीन गुना बढ़ाने में सफल रहा है। यूपी पिछले 6 वर्षों से रेवेन्यू सरप्लस स्टेट है। यह निवेशकों का भरोसा है कि हमें पिछले 9 वर्षों में 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए, जिसमें 15 लाख करोड़ रुपये के प्रस्ताव धरातल पर उतर चुके हैं। 65 लाख से अधिक युवाओं को रोजगार दिलाने में सफलता मिली है। हमने हर एमएसएमई को 5 लाख रुपये की सोशल सिक्योरिटी गारंटी दी है। आज यूपी में सर्वाधिक 96 लाख एमएसएमई यूनिट हैं।

नोएडा बन रहा है अपैरल सिटी

उन्होंने कहा कि टेक्सटाइल इंडस्ट्री अब केवल धागे, कपड़े और फैशन तक सीमित नहीं है। डिफेंस, हेल्थकेयर, कृषि और स्पोर्ट्स जैसे क्षेत्रों में टेक्निकल टेक्सटाइल तेजी से उभर रहा है। इसलिए उत्तर प्रदेश को ट्रेडिशनल टेक्सटाइल से आगे बढ़कर टेक्निकल टेक्सटाइल में भी अपनी ताकत बढ़ानी होगी। पीएम मित्र पार्क और संत कबीर टेक्सटाइल पार्क जैसी पहल इसी दिशा में आगे बढ़ रही हैं। वाराणसी, अमरोहा, बरेली, संतकबीरनगर और बिजनौर में परियोजनाओं के लिए भूमि आरक्षित की गई है। सीतापुर, मऊ, कानपुर, झांसी और रायबरेली में टेक्सटाइल एवं अपैरल पार्क के लिए भूमि चिन्हित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। नोएडा को अपैरल सिटी के रूप में विकसित किया जा रहा है।

ग्लोबल वैल्यू चेन पार्टनर बनें एमएसएमई

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार चाहती है कि एमएसएमई केवल सब-कॉन्ट्रैक्टर नहीं, ग्लोबल वैल्यू चेन के पार्टनर बनें। युवा केवल जॉब सीकर नहीं, टेक्सटाइल एंटरप्रेन्योर और इनोवेटर बनें तथा कारीगर केवल सप्लायर नहीं, अपने ब्रांड के मालिक बनें। ‘डिजाइन इन यूपी, मेड इन यूपी और एक्सपोर्टेड फ्रॉम यूपी’ के मंत्र से प्रदेश के हुनर को वैश्विक पहचान मिले। निफ्ट रायबरेली और उत्तर प्रदेश टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट कानपुर युवाओं को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप तैयार कर रहे हैं। यूपी आज पॉलिसी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, टैलेंट और मार्केट हर स्तर पर तैयार है। अब प्रदेश की सांस्कृतिक पूंजी को आर्थिक पूंजी में बदलना है। बुनकर का हुनर, उद्यमी का कारोबार, युवाओं का रोजगार, महिलाओं की भागीदारी, निवेश और निर्यात बढ़ाकर उत्तर प्रदेश को दुनिया के प्रमुख टेक्सटाइल केंद्रों में स्थापित किया जाएगा।

 

कार्यक्रम में खादी एवं ग्रामोद्योग, रेशम, हथकरघा एवं वस्त्र उद्योग मंत्री राकेश सचान, उत्तर प्रदेश ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के सीईओ मनोज कुमार सिंह, प्रमुख सचिव वस्त्र उद्योग अनिल कुमार सागर सहित देशभर के प्रमुख उद्यमी, निवेशक, निर्यातक और टेक्सटाइल सेक्टर के प्रतिनिधि मौजूद रहे।