GK: किस देश में सबसे पहले बनीं थी बिरयानी? कहानी भले ही उलझी है, लेकिन खुशबू और स्वाद लाजवाब

चाहे वह हैदराबाद की स्मोकी दम बिरयानी हो, कोलकाता की मशहूर आलू वाली बिरयानी हो या लखनऊ की खुशबूदार अवधी बिरयानी….खाने के शौकीनों के बीच बहुत पसंद की जाती है। फिर भी एक सवाल दशकों से बहस का विषय बना हुआ है- असल में बिरयानी किस देश में बनी थी? हालांकि बहुत से लोग मानते हैं कि इसकी शुरुआत भारत में हुई थी, लेकिन इतिहासकारों का मानना ​​है कि इसका जवाब खुद इस डिश की तरह ही कई परतों वाला और कठिन है।

ज्यादातर खाने-पीने के इतिहासकार बिरयानी की शुरुआत प्राचीन फारस (आज का ईरान) से मानते हैं। माना जाता है कि ‘बिरयानी’ शब्द भी फारसी शब्दों ‘बिरिंज’ (जिसका मतलब है चावल) और ‘बिरयान’ (जिसका मतलब है ‘तला हुआ’ या ‘पकाने से पहले भुना हुआ’) से बना है। फारसी रसोइए चावल के साथ मीट, जड़ी-बूटियां, सूखे मेवे और केसर की परतें लगाकर शानदार चावल के व्यंजन बनाते थे। इसी से उस चीज की नींव पड़ी जो बाद में आधुनिक बिरयानी बनी।

बिरयानी असल में भारत कैसे पहुंची, यह आज भी बहस का विषय है। एक प्रचलित थ्योरी का श्रेय मुगल साम्राज्य को जाता है। माना जाता है कि वहां के शाही रसोइयों ने सैनिकों के लिए चावल, मांस और खुशबूदार मसालों को मिलाकर एक पौष्टिक ‘वन-पॉट मील’ (एक ही बर्तन में बनने वाला खाना) तैयार किया था। एक और मत यह है कि यह डिश फारसी व्यापारियों, तीर्थयात्रियों और रईसों के साथ बहुत पहले ही आ गई थी, जो मुगल आने से पहले काफी पहले दक्कन में बस गए थे।

कुछ इतिहासकार दक्षिण भारत में और भी पुराने कनेक्शन की ओर इशारा करते हैं। ऐतिहासिक संदर्भों में बताया गया है कि दूसरी सदी ईस्वी में ही आज के तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में योद्धाओं को चावल और मांस से बना एक खास व्यंजन परोसा जाता था। हालांकि यह आज की बिरयानी से अलग था, लेकिन ऐसे व्यंजनों के होने से पता चलता है कि सदियों के दौरान भारत की अपनी पाक-कला परंपराएं शायद फारसी खाना पकाने के तरीकों के साथ मिलकर कुछ बिल्कुल नया बन गईं।

जैसे-जैसे बिरयानी पूरे उपमहाद्वीप में फैली, हर इलाके ने इसमें अपनी खास पहचान जोड़ी। अवध की शाही रसोई में नाज़ुक लखनवी बिरयानी को और बेहतर बनाया गया, जिसमें खुशबूदार चावल और हल्के मसालेदार मीट को अलग-अलग पकाया जाता है और फिर उनकी परतें एक साथ लगाई जाती हैं। वहीं, हैदराबाद ने मशहूर ‘दम’ स्टाइल को बेहतरीन बनाया। इसमें मैरीनेट किए हुए मीट, केसर वाले चावल और खुशबूदार मसालों को एक बर्तन में सील करके धीमी आंच पर तब तक पकाया जाता है, जब तक कि चावल के हर दाने में स्वाद न समा जाए।

बिरयानी को साधारण पुलाव से जो चीज असल में अलग बनाती है, वह है इसे बनाने का खास तरीका और इसकी परतें। पारंपरिक रूप से, मीट को दही, मसालों, लहसुन और प्याज के साथ मैरीनेट करके थोड़ा पकाया जाता है। इसके बाद, खुशबूदार बासमती चावल, केसर वाला दूध, घी और साबुत मसालों की परतें लगाई जाती हैं और फिर बर्तन को ‘दम’ पर पकाने के लिए सील कर दिया जाता है। धीरे-धीरे भाप में पकाने की इस तकनीक से सभी स्वाद आपस में मिल जाते हैं और चावल भी खिले-खिले और खुशबूदार बने रहते हैं।

समय के साथ, बिरयानी में स्थानीय स्वाद और सामग्री के हिसाब से बदलाव आए। तटीय इलाकों में झींगे और मछली से सीफ़ूड बिरयानी बनाई गई, जबकि पनीर, सब्ज़ियों या कटहल वाली वेज बिरयानी भी उतनी ही लोकप्रिय हुई। कोलकाता ने इसमें आलू जोड़े, मालाबार में खुशबूदार छोटे दाने वाले चावल का इस्तेमाल हुआ, सिंधी बिरयानी अपने तेज़ मसालों के लिए मशहूर हुई और कश्मीर ने इसमें सूखे मेवे और नट्स शामिल किए, जिससे यह साबित हुआ कि कोई भी दो बिरयानी बिल्कुल एक जैसी नहीं होतीं।

आज, कोई भी एक देश सचमुच बिरयानी पर अपना मालिकाना हक नहीं जता सकता। हो सकता है कि इसकी शुरुआती प्रेरणा फारस से मिली हो, लेकिन इसे भारतीय उपमहाद्वीप में ही वह रूप मिला-खूब सारे मसालों वाली और अलग-अलग इलाकों की खासियत वाली डिश-जिसे लाखों लोग पसंद करते हैं। बिरयानी सिर्फ एक खाना नहीं है, बल्कि यह इस बात की एक स्वादिष्ट याद दिलाती है कि कैसे अलग-अलग संस्कृतियां, व्यापार, लोगों का आना-जाना और सदियों से खाने-पीने में हुए नए प्रयोग मिलकर दुनिया की सबसे मशहूर डिश में से एक बना सकते हैं।

भारत का बॉर्डर रेल प्रोजेक्ट! चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर 45000 करोड़ खर्च कर बिछेगा रेलवे का जाल

Indian Rail Border Project: बदलती रीजनल मोबिलिटी और रणनीतिक चुनौतियों के बीच केंद्र सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। ‘ब्लूमबर्ग’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपनी स्ट्रैटिजिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की कोशिशों के तहत चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश से लगती अपनी सीमाओं पर रेलवे नेटवर्क के विस्तार और अपग्रेडेशन के लिए लगभग ₹45000 करोड़ ($4.7 बिलियन) के निवेश की योजना बना रहा है। आने वाले 18 से 24 महीनों के भीतर लागू होने वाली यह परियोजना अगले दो वर्षों के लिए नियोजित कुल रेलवे इंफ्रा आउटले का करीब 22 फीसदी हिस्सा है।

इन सीमावर्ती राज्यों में बिछेगा रेलवे का जाल

रिपोर्ट के मुताबिक इस डेवलपमेंट से जुड़े लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस खर्च का इस्तेमाल देश के संवेदनशील सीमावर्ती राज्यों में नई पटरियां बिछाने, नए प्लेटफॉर्म बनाने और नेटवर्क को मजबूत करने के लिए किया जाएगा। इस योजना में पाकिस्तानी सीमा से लगते पश्चिमी राज्य पंजाब और राजस्थान, बांग्लादेश सीमा और सिलीगुड़ी कॉरिडोर से सटे पश्चिम बंगाल और असम के रणनीतिक क्षेत्र, चीन सीमा के पास और सुदूर पर्वतीय क्षेत्र वाले हिमाचल और पूर्वोत्तर के राज्य शामिल हैं।

आपको बता दें कि ये नया प्लान भारत सरकार के सीमावर्ती क्षेत्रों में रेलवे नेटवर्क, पुल और सुरंगों बनाने के उस $3.4 बिलियन ($340 करोड़) के प्लान से भी बड़ा है, जिसकी जानकारी पहले सामने आई थी।

संवेदनशील सीमाओं पर बदलती रणनीतिक स्थितियां

सीमावर्ती कनेक्टिविटी पर भारत का ये फोकस तब सामने आया है जब पड़ोसी देशों के साथ संबंध नए फेज में आगे बढ़े हैं। 6 साल पहले हुई घातक झड़प के बाद चीन के साथ संबंधों में अब स्थिरता आई है। आपको बता दें कि पिछले साल पाकिस्तान के साथ एक ब्रीफ कॉन्फ्लिक्ट देखने को मिला था। इसके अलावा साल 2024 में बांग्लादेश में हुए राजनीतिक उलटफेर ने भारत के पहले से स्थिर साझेदारी के संबंधों को जटिल बना दिया है।

नागरिक सुविधा के साथ सैन्य लॉजिस्टिक्स को मजबूती

इस भारी निवेश से डुअल यूजर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा। इसका मतलब है कि ये सिविलियन रेलवे नेटवर्क होंगे जिनका इस्तेमाल आम नागरिकों की आवाजाही के लिए तो होगा ही, साथ ही आपात स्थिति में ये सैन्य लॉजिस्टिक्स को भी पूरा सहारा देंगे।

हिमालयी क्षेत्रों, सिलीगुड़ी कॉरिडोर और पूर्वोत्तर के राज्यों जैसी संवेदनशील सीमाओं तक उच्च क्षमता वाले, ऑल-वेदर रेल नेटवर्क को मजबूत करके ट्रूप मोबलाइजेशन टाइम को भी स्ट्रैटिजकली कम किया जा सकता है। इसके साथ ही रिजनल प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ यह अहम सप्लाई लाइन को भी सुरक्षित करता है।

सीमावर्ती बुनियादी ढांचे पर पीएम मोदी का जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संवेदनशील क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को लगातार प्राथमिकता दी है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार ने इसे लेकर लगातार कदम उठाए हैं। पाकिस्तान सीमा के पास 1450 किलोमीटर नई सड़कें बनाई गई हैं। डोकलाम के करीब इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर जोर है।

पिछले साल कश्मीर घाटी को बाकी भारत से जोड़ने वाले दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे पुल का उद्घाटन किया गया। पिछले एक दशक में पूर्वोत्तर भारत में लगभग 1700 किलोमीटर नई रेल लाइनें जोड़ी गई हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर और सैन्य विमानों के इस्तेमाल के लिए 1962 से निष्क्रिय पड़े एयरसाइड इंफ्रास्ट्रक्चर को फिर से सक्रिय किया गया है।

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चीन की ओर से भी जारी है निर्माण

रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरी तरफ चीन ने भी 2017 में डोकलाम में हुए सैन्य गतिरोध के बाद से अपनी ओर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण काफी तेज कर दिया है। चीन अपनी सीमा में एयरपोर्ट और हेलीपोर्ट जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा है। चीन के इस विस्तार ने उपकरण और सैनिकों की तेजी से आवाजाही के जरिए पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की लॉजिस्टिक्स क्षमताओं को बढ़ाया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अभी भारत के रेल मंत्रालय की ओर से इस निवेश योजना पर कोई आधिकारिक बयान या टिप्पणी नहीं आई है।

CM धामी ने की बालेश्वर मंदिर आने की अपील, जानिए क्यों खास है चंपावत का यह शिवधाम?

baleshwar temple champawat

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सावन के पहले सोमवार को श्रद्धालुओं को चंपावत के प्राचीन बालेश्वर मंदिर के बारे में जानकारी दी। उन्होंने लोगों से चंपावत आगमन पर इस शिवधाम दर्शन करने की भी अपील की। 

 

सीएम धामी ने एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा कि देवभूमि उत्तराखंड के चंपावत जनपद में स्थित प्राचीन बालेश्वर मंदिर भगवान शिव की दिव्य आस्था, समृद्ध इतिहास और अद्भुत स्थापत्य कला का अनुपम संगम है। पत्थरों पर उकेरी गई इसकी बेजोड़ नक्काशी और प्राचीन शिल्पकला सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की गौरवगाथा सुनाती है।

उन्होंने कहा कि पने चंपावत आगमन पर इस पावन शिवधाम के दर्शन कर आध्यात्मिक शांति और हमारी समृद्ध विरासत का अविस्मरणीय अनुभव अवश्य प्राप्त करें।

 

क्यों खास है यह मंदिर

उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित बालेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्राचीन और कलात्मक मंदिर है। इसका निर्माण चंद वंश के राजाओं द्वारा 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच कराया गया था। अपनी बेजोड़ पत्थर की नक्काशी और अद्भुत वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध यह ऐतिहासिक स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में एक राष्ट्रीय धरोहर है।

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत काल में बाली ने यहां असुरों से शांति के लिए शिव जी की पूजा की थी, इसलिए इसे 'बालेश्वर' कहा जाता है। बालेश्वर मंदिर के अलावा इस परिसर में रत्नेश्वर मंदिर और चंपावती दुर्गा मंदिर भी स्थित हैं। मंदिर परिसर के पास एक प्राचीन प्राकृतिक जल स्रोत है, जिसके पवित्र जल का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है।

IAS Ojaswi Raj की सोच ने बदल दी बलिया के सत्तू की पहचान | Sattu Pops | Make In India |

जिस सत्तू को लोग कभी गरीबों का खाना समझते थे… आज वही Amazon, Blinkit और चीन की यूनिवर्सिटी कैफे तक पहुँच चुका है।
IAS ओजस्वी राज की सोच ने सिर्फ एक उत्पाद नहीं बदला, बल्कि किसानों, महिलाओं और पूरे बलिया की पहचान को नई उड़ान दी।
कभी-कभी बदलाव नई चीज़ बनाने से नहीं… अपनी विरासत पर भरोसा करने से आता है।
आपके राज्य का कौन-सा पारंपरिक उत्पाद दुनिया तक पहुँचना चाहिए?
कमेंट में ज़रूर बताइए।

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आगरा में बनेगा भव्य ‘शिव लोक थीम पार्क’, 8.81 करोड़ की लागत से होगा निर्माण; महाकाल लोक की तर्ज पर दिखेंगे भगवान शिव के 19 अवतार

योगी सरकार प्रदेश में बुनियादी ढांचे के साथ- साथ धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन को भी तेजी से बढ़ावा दे रही है। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए उज्जैन के 'महाकाल लोक' की तर्ज पर आगरा के ऐतिहासिक बल्केश्वर पार्क को अब एक भव्य 'शिव लोक थीम पार्क' के रूप में विकसित किया जाएगा।

8.81 करोड़ रुपये की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना का शिलान्यास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 जुलाई 2026 को किया था। शिलान्यास के बाद से इस कार्य में खासी तेजी आई है। आगरा नगर निगम ने 15वें वित्त आयोग के फंड से इस पार्क को विकसित करने का पूरा लेआउट और विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर ली है।

 

शिव के 19 अवतारों और शिव पुराण का सजीव चित्रण

यमुना नदी के किनारे स्थित प्राचीन बल्केश्वर महादेव मंदिर से कुछ ही दूरी पर बनने वाला शिव लोक थीम पार्क आस्था और आधुनिकता का एक अनूठा संगम होगा। इसका विजन भगवान शिव के 19 अवतारों पर आधारित एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गंतव्य बनाना है। कुल 16,000 वर्ग मीटर में फैले बल्केश्वर पार्क के मध्य में भगवान शिव की एक विशाल और आकर्षक प्रतिमा स्थापित की जाएगी। यहां आने वाले श्रद्धालु शिव पुराण पर आधारित भगवान शिव की लीलाओं का सजीव चित्रण देख सकेंगे। पार्क के प्रवेश पर एक भव्य 'नंदी द्वार' का निर्माण होगा। इसके अलावा शिव स्तुति पर आधारित आकर्षक साउंड एंड लाइट शो और रंग-बिरंगे फव्वारे इस पार्क की दिव्यता में चार चांद लगाएंगे।

 

पर्यटन और आस्था का नया केंद्र बनेगा यह शिव लोक

इस शिव लोक थीम पार्क का हर हिस्सा इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह भक्ति, सौंदर्य और मनोरंजन का अद्भुत अनुभव प्रदान करे। इसके निर्माण से बल्केश्वर मंदिर में दर्शन और परिक्रमा करने आने वाले श्रद्धालुओं को विश्राम के लिए एक सुंदर और शांत वातावरण मिलेगा। साथ ही आगरा आने वाले पर्यटक अब ताजमहल के अलावा इस दिव्य शिव लोक का भी अनुभव कर सकेंगे। यह थीम पार्क ब्रज क्षेत्र के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास में मील का प्रमुख पत्थर साबित होगा।

 

अधिशासी अभियंता अरविंद कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि शिव लोक थीम पार्क को 15वें वित्त आयोग के फंड से विकसित किया जा रहा है। 8.81 करोड़ रुपये के बजट से पुराने बल्केश्वर पार्क का पूरी तरह से कायाकल्प कर दिया जाएगा। हमारा उद्देश्य इसे एक अत्याधुनिक, सुंदर और शांतिपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित करना है।

 

स्थानीय पार्षद मुरारी लाल अग्रवाल ने बताया कि आगरा नगर निगम

 

“मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से बल्केश्वर क्षेत्र को यह बड़ी सौगात मिली है। इस शिव लोक थीम पार्क के निर्माण से न केवल बल्केश्वर मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं और परिक्रमार्थियों को विश्राम का एक पवित्र स्थान मिलेगा, बल्कि इससे पूरे ब्रज क्षेत्र के पर्यटन को भी काफी बढ़ावा मिलेगा। बल्केश्वर वासियों और पूरे आगरा के शिवभक्तों के लिए यह बहुत बड़ी सौगात है। यह थीम पार्क हमारी धार्मिक आस्था को एक नई और भव्य पहचान देगा। 

Ethanol Petrol Row: ‘…तो दिल्ली में पेट्रोल की कीमत ₹125 प्रति लीटर होती’; एथेनॉल विवाद पर सरकार का बड़ा दावा

Ethanol Blending E20 Petrol Row: पेट्रोलियम मंत्रालय ने एथेनॉल प्रोग्राम का बचाव करते हुए दावा किया है जब ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतें $135 प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, तब अगर तेल कंपनियों ने फ्यूल में एथेनॉल नहीं मिलाया होता, तो दिल्ली में पेट्रोल की कीमत लगभग ₹125 प्रति लीटर होती। मंत्रालय ने कहा कि लेकिन इसके बजाय ग्राहकों को ₹94.77 प्रति लीटर चुकाना पड़ा। दरअसल एथेनॉल पहले से तय कीमतों पर घरेलू स्तर पर खरीदा गया था। इसने क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल के असर से रिटेल कीमतों को बचाए रखने में मदद की, जिससे संकट के चरम पर लगभग ₹30 प्रति लीटर की बचत हुई।

सरकार ने 28 फरवरी को वेस्ट एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद लगभग 75 दिनों तक पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर रखीं। फिर मई में उन्हें 7.5 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिया। दिल्ली में स्टैंडर्ड E20 पेट्रोल (91-ऑक्टेन) की कीमत अब ₹102.12 प्रति लीटर है। जबकि 100-ऑक्टेन पेट्रोल की कीमत ₹169 है। मंत्रालय ने उन आरोपों को भी खारिज कर दिया कि गरीबों के लिए अनाज का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने के लिए किया जा रहा था, या इस प्रोग्राम को सपोर्ट करने के लिए सब्सिडी वाले FCI चावल का इस्तेमाल किया जा रहा था।

एफिशिएंसी में 2-6% की कमी!

फ्यूल एफिशिएंसी के सवाल पर सड़क परिवहन मंत्रालय ने लोकसभा में ARAI, SIAM और IOC की एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा कि E10 फ्यूल के लिए डिजाइन किए गए BS-III, BS-IV और BS-VI वाहनों में E20 पर चलने पर वाहन की कैटेगरी और उम्र के आधार पर एफिशिएंसी में 2-6% की कमी आ सकती है। मंत्रालय ने पहले 20 जुलाई को राज्यसभा को बताया था कि ऐसे वाहनों में यह कमी लगभग 3-5% तक सीमित है।

दोनों मंत्रालयों ने कहा कि इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम को एक चरणबद्ध, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित प्रक्रिया के माध्यम से शुरू किया गया था, जिसमें प्रोडक्शन कैपेसिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर के बढ़ने के साथ-साथ ब्लेंडिंग का स्तर धीरे-धीरे बढ़ाया गया। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने लोकसभा को बताया कि E20 पर स्विच करने का फैसला फ्यूल सिस्टम, इंजन की मजबूती, गाड़ी चलाने में आसानी, मटीरियल की अनुकूलता और उत्सर्जन पर असर की जांच-परख के बाद लिया गया।

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इस प्रक्रिया में वाहन बनाने वाली कंपनियों, तेल मार्केटिंग कंपनियों और चीनी एवं अनाज उद्योगों से भी सलाह-मशविरा किया गया। सरकार ने यह भी कहा कि लैब स्टडीज और असल दुनिया के डेटा से पता चला है कि E20 फ्यूल से गाड़ियों की परफॉर्मेंस पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है। साथ ही, 20 करोड़ से अधिक दो-पहिया वाहन और 3 करोड़ से ज्यादा पेट्रोल कारें इन ब्लेंड्स पर चल चुकी हैं। इनमें एथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से इंजन खराब होने का कोई पक्का सबूत नहीं मिला है।

Nirmal Purja: कौन थे निर्मल पुर्जा…जिनकी PoK में हुई मौत! 6 महीने में दुनिया की 14 सबसे ऊंची चोटियां फतह कर रचा था इतिहास

नेपाल के प्रसिद्ध पर्वतारोही निर्मल पुर्जा, जिन्हें लोग ‘निम्सदाई’ के नाम से भी जानते थे, की पाकिस्तान में स्थित दुनिया की 12वीं सबसे ऊंची चोटी ब्रॉड पीक पर हिमस्खलन (बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर गिरना) की चपेट में आने से मौत हो गई। इसकी जानकारी उनकी एडवेंचर कंपनी और अन्य लोगों ने इंस्टाग्राम पर साझा की।

शुक्रवार को ब्रॉड पीक पर हिमस्खलन होने के बाद निर्मल पुर्जा और पांच अन्य पर्वतारोही लापता हो गए थे। इसके बाद लगातार उनकी तलाश की जा रही थी। इस दुखद हादसे से कुछ घंटे पहले निर्मल पुर्जा ने भारत के पत्रकार विष्णु सोम को एक वॉयस मैसेज भी भेजा था। माना जा रहा है कि यह उनका आखिरी संदेश था।

कंपनी ने पोस्ट कर दी जानकारी 

निर्मल पुर्जा की एडवेंचर कंपनी एलीट एक्सपेड ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट जारी कर उनकी मौत की पुष्टि की। कंपनी ने कहा कि ब्रॉड पीक पर हुए हिमस्खलन के बाद निर्मल पुर्जा का निधन हो गया। साथ ही अभियान में शामिल अन्य सदस्य भी इस हादसे में जीवित नहीं बच सके। कंपनी ने अपने संदेश में कहा कि यह सभी के लिए बेहद दुखद क्षण है। उन्होंने केवल निर्मल पुर्जा ही नहीं, बल्कि इस हादसे में जान गंवाने वाले उनके साथी पर्वतारोहियों और गाइड पुर बहादुर गुरुंग और निमा शेरपा को भी श्रद्धांजलि दी।कंपनी ने कहा कि उनकी संवेदनाएं सभी मृतकों के परिवार, दोस्तों और करीबियों के साथ हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि इस कठिन समय में परिवारों की निजता का सम्मान किया जाए।

ब्रॉड पीक में हुई मौत

ब्रॉड पीक काराकोरम पर्वत श्रृंखला में स्थित दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों में से एक है। यह पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान और चीन के शिनजियांग क्षेत्र की सीमा के पास स्थित है। यह चोटी के2 पर्वत के बेहद करीब है। रिपोर्ट के अनुसार, हिमस्खलन ब्रॉड पीक के सामान्य वेस्ट रिज मार्ग पर हुआ। उस समय पर्वतारोही करीब 21,600 से 21,850 फीट की ऊंचाई पर मौजूद थे, जहां अचानक बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आ गया।

निर्मल पुर्जा की एडवेंचर कंपनी एलीट एक्सपेड ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि दुनिया ने पर्वतारोहण के सबसे महान पर्वतारोहियों में से एक को खो दिया है। कंपनी के अनुसार, निर्मल पुर्जा अपने साहस, विनम्र स्वभाव और मजबूत इरादों के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। उन्होंने अपने काम और उपलब्धियों से दुनिया भर के लाखों लोगों को बड़े सपने देखने और खुद पर भरोसा रखने की प्रेरणा दी। कंपनी ने कहा कि निर्मल पुर्जा का मानना था कि इंसान अपनी सोच से कहीं ज्यादा बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकता है। यही सोच उन्होंने अपने जीवन और अभियानों के जरिए लोगों तक पहुंचाई और अनगिनत लोगों को अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए प्रेरित किया।

पोस्ट में यह भी कहा गया कि एलीट एक्सपेड, निम्सदाई फाउंडेशन, स्काईडाइव निम्सदाई और निम्सदाई स्टोर जैसी संस्थाओं को आगे बढ़ाने में उनकी दूरदृष्टि, नेतृत्व और मजबूत संकल्प की सबसे बड़ी भूमिका रही। कंपनी ने कहा कि निर्मल पुर्जा की विरासत हमेशा उन लोगों के जरिए जीवित रहेगी, जिनकी जिंदगी उन्होंने बदली और जिन्हें अपने सपनों को पूरा करने का हौसला दिया।

रचा था ये इतिहास

निर्मल पुर्जा पहले ब्रिटेन की ब्रिगेड ऑफ गोरखा और रॉयल मरीन की स्पेशल बोट सर्विस (एसबीएस) में भी सेवाएं दे चुके थे। सेना से अलग होने के बाद उन्होंने पूरी तरह पर्वतारोहण को अपना करियर बनाया और दुनिया भर में कई बड़े रिकॉर्ड अपने नाम किए। साल 2019 में उन्होंने अपने ‘प्रोजेक्ट पॉसिबल’ अभियान के तहत केवल 6 महीने और 6 दिन में 8,000 मीटर से ऊंची दुनिया की सभी 14 चोटियों पर चढ़ाई पूरी कर इतिहास रच दिया। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इसके बाद साल 2021 में निर्मल पुर्जा उन 10 नेपाली पर्वतारोहियों की टीम का हिस्सा भी रहे, जिसने पहली बार सर्दियों के मौसम में दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची चोटी के2 पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की थी।

Vivo X500 Pro के लॉन्च से पहले लीक हुए फीचर्स, मिलेगा 144Hz डिस्प्ले और 2nm प्रोसेसर

Vivo X500 Pro इन दिनों अपने लीक और अफवाहों को लेकर काफी चर्चा में है। उम्मीद की जा रही है कि कंपनी इस स्मार्टफोन को अक्टूबर 2026 के आसपास चीन और अन्य ग्लोबल मार्केट्स में लॉन्च कर सकती है। लीक्स की मानें तो Vivo X500 Pro परफॉर्मेंस, कैमरा क्वालिटी और टेक्नोलॉजी के मामले में एक बेहद दमदार स्मार्टफोन साबित हो सकता है। हालांकि, कंपनी ने अभी तक इसकी आधिकारिक जानकारी शेयर नहीं की है।

अब आइए अलग-अलग अनऑफिशियल रिपोर्ट्स और लीक के आधार पर हम आपको इस अपकमिंग स्मार्टफोन से जुड़ी संभावित फीचर्स और स्पेसिफिकेशन की जानकारी देते हैं।

Vivo X500 Pro के लीक हुए स्पेसिफिकेशन्स और फीचर्स

जाने-माने टिप्सटर ‘डिजिटल चैट स्टेशन’ ने पहले ही इस बात का संकेत दे दिया है कि इस फोन में डिस्प्ले और प्रोसेसर कैसा होगा। Vivo X500 Pro में 6.37-इंच की फ्लैट LTPO डिस्प्ले हो सकती है, जिसका रिजोल्यूशन 1.5K और रिफ्रेश रेट 144Hz होगा।

इसके अलावा, यह भी कहा जा रहा है कि Vivo एक BOE OLED डिस्प्ले की टेस्टिंग कर रहा है, जिसमें नेक्स्ट-जेनरेशन लाइट-एमिटिंग मटीरियल का इस्तेमाल होगा। इतना ही नहीं, अफवाहें हैं कि Vivo X500 Pro में LIPO डिस्प्ले पैकेजिंग होगी, जिससे चारों तरफ पतले बेजल मिल सकेंगे। लीक से पता चलता है कि इस फोन में Vivo का सिग्नेचर सेंटर में स्थित गोल रियर कैमरा आइलैंड होगा।

उसी टिपस्टर ने यह भी बताया है कि यह फोन 2nm प्रोसेसर पर आधारित MediaTek Dimensity 9600 Pro चिपसेट से चलेगा। उम्मीद है कि फोन के बेस मॉडल में 12GB RAM और 256GB इंटरनल स्टोरेज होगी। इस बात की भी काफी संभावना जताई जा रही है कि Vivo X500 Pro में मेटल फ्रेम होगा। डिवाइस से जुड़ी बाकी सभी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। माना जा रहा है कि Vivo की तरफ से आधिकारिक घोषणा होते ही इसके बारे में और जानकारी मिल जाएगी।

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फ्रेंडशिप डे 2026: दोस्ती के ये 6 अवतार जानकर दंग रह जाएंगे आप

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दोस्ती का कोई एक रंग नहीं होता- यह तो सतरंगी गुलाल है! कभी बेपरवाह टांग खिंचाई, तो कभी ढाल बनकर साथ खड़े रहने का हौसला। कभी खट्टी-मीठी चटपटी, तो कभी सुकून देने वाली मीठी चाय जैसी। सच कहें तो हर दोस्ती अपने आप में एक अलग ही वाइब (Vibe) लेकर आती है। इस फ्रेंडशिप डे 2026 पर चलिए करते हैं दोस्ती के 6 अनोखे 'अवतारों' की एक मजेदार सैर!

 

1. 'बिज़नेस पार्टनर' वाली गाढ़ी दोस्ती

यह सिर्फ पैसों या काम का सौदा नहीं, बल्कि अटूट भरोसे पर टिकी एक ऐसी केमिस्ट्री है जहाँ दो दिमाग एक दिशा में सोचते हैं। जब दो दोस्त मिलकर कोई बिज़नेस खड़ा करते हैं, तो वे किसी सगे भाई-बहन से भी बढ़कर हो जाते हैं। अब आप इन्हें 'पार्टनर्स' कहें, 'फाउंडर्स' कहें या फिर 'लंगोटिया यार', इनकी ट्यूनिंग का कोई तोड़ नहीं होता!

 

2. '9-टू-5' का मरहम: लंच ब्रेक वाली दोस्ती

फाइलों के पहाड़, बॉस की डांट, टारगेट का प्रेशर या फिर घर की किचकिच—कॉलेज के बाद अगर कोई चीज़ कॉर्पोरेट लाइफ में बचाती है, तो वो है 'लंच टाइम गैंग'।

लंच के 30 मिनट में यहाँ सिर्फ टिफिन नहीं खुलते, बल्कि दिल के सारे दर्द बंट जाते हैं। यही वो जगह है जहाँ कोई सहयोगी आपके अटके सरकारी काम की जुगाड़ मिनटों में निकाल देता है या आपके पर्सनल संकट का एक्सपर्ट सॉल्यूशन दे देता है।

 

3. 'अरे! तुम्हें भी यह पसंद है?' वाली सिमिलर-वाइब दोस्ती

इस दोस्ती की शुरुआत सिर्फ एक जुमले से होती है—”क्या बात कर रहे हो, तुम्हें भी यह पसंद है?”

चाहे किसी हॉलीवुड मूवी की सनक हो, हैरी पॉटर का जादू, वही पुराना राइटर, या फिर स्ट्रीट फूड का सेम क्रेज़! बस जहाँ आपकी पसंद मैच हुई, वहीं बिना किसी मेहनत के एक नई और दिलचस्प 'हॉबी वाली दोस्ती' की शुरुआत हो जाती है।

 

4. 'डिजिटल दौर' वाली नो-बाउंड्री दोस्ती

टेक्नोलॉजी के पंखों पर सवार यह दोस्ती मीलों की दूरियों को पलक झपकते मिटा देती है। 80 के दशक के बिछड़े क्लासमेट्स हों या सरहद पार बैठा कोई अनजान साथी—इंटरनेट ने सबको एक धागे में पिरो दिया है। आपकी सोशल मीडिया प्रोफाइल पर जहाँ एक तरफ 75 साल के दादू की 'फ्रेंड रिक्वेस्ट' होती है, वहीं दूसरी तरफ 7 साल की छोटी भानजी का 'हार्ट इमोजी'!

 

5. नॉस्टैल्जिया का खजाना: स्कूल-कॉलेज वाली दोस्ती

यह दोस्ती का 'गोल्डन एरा' है—सबसे निश्चल, सबसे बेफिक्र!

किताबों में मोर का पंख छुपाने से लेकर, चाय-समोसे की 'कॉन्ट्री', रात-रात भर जागकर नोट्स की जुगाड़ और एक-दूसरे के कपड़े-जूते मांगकर पहनना… यह सब इसी दौर की देन है। इस दोस्ती की पार्टियां भले ही बजट-फ्रेंडली हों, लेकिन इनका 'धूम-धड़ाका' और यादें पूरी ज़िंदगी के लिए अनलिमिटेड होती हैं।

 

6. 'गली-मोहल्ले' वाली साझी दोस्ती

भर दोपहर में छत पर धूप से बचने का जुगाड़ हो, या संकरी गली में साइकिल को स्टंप बनाकर क्रिकेट खेलना—यह दोस्ती भारत के हर मोहल्ले की जान है। कटोरी लेकर पड़ोसी के घर से चीनी या अचार मांग लाना हो, या किसी एक के घर की शादी में पूरे मोहल्ले के अंकल-आंटी का अपना घर समझकर काम में जुट जाना। जैसे छत पर सूखते अमचूर पर पूरे मोहल्ले के बच्चों का हक होता है, ठीक वैसे ही इस दोस्ती पर पूरे इलाके का प्यार होता है!

 

चलते-चलते:

आपकी लाइफ में इनमें से कौन-कौन से दोस्त मौजूद हैं? इस फ्रेंडशिप डे पर उन्हें यह आलेख टैग करके शुक्रिया कहना मत भूलिएगा!

पहली बार बिना सामान के चीन पहुंचे भारतीय व्यापारी:6 साल बाद भारत-तिब्बत ट्रेड शुरू; 2019 से तकलाकोट में छूटा है करोड़ों का माल

उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से 6 साल बाद भारत-तिब्बत परंपरागत व्यापार शनिवार से फिर शुरू हो गया है। पहले दल में 16 भारतीय व्यापारी और 4 हेल्पर तिब्बत के तकलाकोट मंडी पहुंचे। खास बात यह रही कि इतिहास में पहली बार भारतीय व्यापारी बिना सामान के चीन गए। सीमा पर चीनी प्रशासन ने उनके दस्तावेजों की जांच के बाद प्रवेश दिया, जबकि व्यापारियों का सामान अब भी पिथौरागढ़ के गुंजी में रखा हुआ है। वहीं, वर्ष 2019 से भारतीय व्यापारियों का करोड़ों रुपए का माल भी तकलाकोट में छूटा हुआ है। जून से जुलाई तक टलता रहा व्यापार कोरोना महामारी और भारत-चीन संबंधों में आई तल्खी के कारण वर्ष 2020 से दोनों देशों के बीच परंपरागत व्यापार पूरी तरह बंद था। इस साल जून में व्यापार शुरू होना था, लेकिन औपचारिकताओं और चीन की ओर से लगातार बदलते नियमों के कारण प्रक्रिया टलती रही। 8 जुलाई को व्यापारी सामान लेकर गुंजी तक पहुंच गए थे। उन्हें ट्रेड पास भी जारी कर दिए गए थे, लेकिन रवाना होने से ठीक एक दिन पहले चीन के पुरांग काउंटी प्रशासन ने व्यवस्थाएं पूरी न होने का हवाला देकर व्यापारियों की एंट्री रोक दी। इसके बाद व्यापारी अपना सामान गुंजी में छोड़कर वापस धारचूला लौट आए। फिलहाल सिर्फ 20 लोगों को मंजूरी व्यापार शुरू होने को लेकर सीमांत क्षेत्र के व्यापारियों में काफी उत्साह था। प्रशासन ने 134 व्यापारियों और सहायकों के ट्रेड पास जारी किए थे। हालांकि बाद में चीन की ओर से नया आदेश जारी कर फिलहाल केवल 20 लोगों को तकलाकोट जाने की अनुमति दी गई। चीनी प्रशासन ने स्पष्ट किया कि पहले चरण में केवल उन्हीं व्यापारियों को प्रवेश मिलेगा, जो वर्ष 2019 में तकलाकोट गए थे और जिनका सामान वहां छूट गया था। SDM बोले- भारत-चीन व्यापार विधिवत शुरू हुआ धारचूला के एसडीएम एवं ट्रेड अधिकारी आशीष जोशी ने बताया कि 1 अगस्त को सुबह करीब 10:15 बजे लिपुलेख दर्रे से भारत-चीन परंपरागत व्यापार की औपचारिक शुरुआत हो गई। पहले दल में 16 व्यापारी और 4 हेल्पर, कुल 20 लोग तकलाकोट मंडी पहुंचे हैं। वहां वे व्यापारिक गतिविधियां शुरू करेंगे। उन्होंने कहा कि अगले बैचों को भेजने की तारीख तय करने के लिए चीनी प्रशासन से लगातार ईमेल के माध्यम से पत्राचार किया जा रहा है। अभी गुंजी में रखा है गुड़, मिश्री और बर्तन व्यापारियों का गुड़, मिश्री, बर्तन समेत अन्य व्यापारिक सामान अभी भी गुंजी में रखा हुआ है। बताया जा रहा है कि तकलाकोट में व्यवस्थाएं पूरी होने के बाद व्यापारी दोबारा सामान लेकर जाएंगे। यदि सब कुछ सामान्य रहा तो अगले कुछ दिनों में 20-20 व्यापारियों के अन्य दल भी चीन रवाना किए जाएंगे। तकलाकोट में आज भी पड़ा है करोड़ों का सामान वर्ष 2019 में कई भारतीय व्यापारी अपना माल तकलाकोट मंडी में ही छोड़कर लौटे थे। अगले ही वर्ष व्यापार बंद हो गया, जिससे करोड़ों रुपए का सामान वहीं फंस गया। व्यापारियों का कहना है कि धातु के बर्तन तो उपयोग में आ सकते हैं, लेकिन खाद्य सामग्री और अन्य सामान खराब होने की आशंका है। तकलाकोट में भारतीय व्यापारियों के लिए नए स्थान पर मंडी विकसित की गई है। अब व्यापारियों को इसी नई मंडी में किराये पर दुकानें उपलब्ध कराई जाएंगी, जहां से परंपरागत भारत-तिब्बत व्यापार संचालित होगा। भारतीय व्यापारी अब पुरानी नहीं, नई मंडी में करेंगे कारोबार छह साल के लंबे अंतराल में तकलाकोट की तस्वीर भी बदल गई है। पहले भारतीय व्यापारी पुरानी मंडी में किराए पर दुकानें लेकर कारोबार करते थे, लेकिन व्यापार बंद रहने के दौरान वहां की कई दुकानें नेपाली और अन्य व्यापारियों को आवंटित कर दी गईं। अब चीन ने भारतीय और नेपाली व्यापारियों के लिए नई ट्रेड मंडी विकसित की है। इस बार भारतीय व्यापारियों को इसी नई मंडी में दुकानें मिलेंगी। व्यापार समिति का कहना है कि नई मंडी पहले से ज्यादा व्यवस्थित है और वहां सामान रखने के लिए अधिक जगह उपलब्ध होगी। समिति ने भारतीय व्यापारियों के लिए रियायती किराए की भी मांग की है। पहली बार बदल जाएगा सदियों पुराना ढुलाई मॉडल इस बार सिर्फ मंडी ही नहीं, व्यापार का पूरा ढांचा बदल जाएगा। अब तक व्यापारी धारचूला से गुंजी, कालापानी और नाभीढांग होते हुए कई दिन की कठिन यात्रा के बाद लिपुलेख दर्रे तक पहुंचते थे। सामान घोड़े-खच्चरों और पोर्टरों के सहारे ढोया जाता था। खराब मौसम और भूस्खलन कई बार व्यापार रोक देते थे। अब सड़क बनने के बाद करीब 100 किलोमीटर तक वाहन सीधे सीमा के करीब पहुंच सकेंगे। सिर्फ अंतिम करीब 200 मीटर तक ही सामान पारंपरिक तरीके से ले जाना होगा। चीन की सीमा में प्रवेश करने के बाद सड़क पहले से उपलब्ध है, जहां से व्यापारी करीब 18 किलोमीटर दूर तकलाकोट मंडी तक आसानी से पहुंच सकेंगे। इससे परिवहन लागत और समय दोनों कम होने की उम्मीद है। 2019 में 3 करोड़ से ज्यादा का कारोबार भारत-चीन व्यापार समिति के अनुसार 2019 में करीब 250 भारतीय व्यापारी तकलाकोट पहुंचे थे। उस वर्ष करीब 3 करोड़ रुपए से अधिक का व्यापार हुआ था। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार लगभग 1.25 करोड़ रुपए का निर्यात और करीब 1.90 करोड़ रुपए का आयात हुआ था। इस बार सड़क, नई मंडी और बेहतर लॉजिस्टिक व्यवस्था के कारण कारोबार बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि व्यापारियों का कहना है कि भारतीय पक्ष को देरी से अनुमति मिलने के कारण इस साल शुरुआती कारोबारी अवसर काफी हद तक निकल चुके हैं। ——————- ये खबर भी पढ़ें : भारत-चीन व्यापार पर चाइना की टेढ़ी चाल: 1 अगस्त को बिना सामान के बुलाए 20 व्यापारी, नेपाल जून से कर रहा व्यापार करीब 6 साल बाद 1 अगस्त से लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत-चीन सीमा व्यापार फिर शुरू होने जा रहा है, लेकिन इस व्यापार पर एक बार फिर चीन ने टेढ़ी चाल चली है। दरअसल, चीन ने पहले बैच में सिर्फ उन्हीं व्यापारियों को तकलाकोट मंडी जाने की अनुमति दी है, जिनकी दुकानें या सामान 2019 से वहां फंसा हुआ है। पढ़ें पूरी खबर…