आस्था की विजय: जब पंढरपुर में एक बालक के रक्षक बने स्वयं विट्ठल

Pictured is a view of the Lord Shri Vitthal-Rukmini Temple in Pandharpur, Maharashtra

एक सत्य घटना पर आधारित संस्मरण

 

एक पारिवारिक संस्मरण, जो बताता है कि श्रद्धा का सबसे बड़ा प्रमाण अनुभव होता है, भारत की सांस्कृतिक परंपरा में कुछ पर्व केवल तिथियां नहीं होते, वे लोकजीवन की आत्मा बन जाते हैं। आषाढ़ी एकादशी ऐसा ही एक महापर्व है, जो महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

इस दिन 'पंढरपुर' स्थित भगवान श्री विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर में दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। चंद्रभागा नदी में स्नान, हरिनाम, संकीर्तन, वारकरी परंपरा की पदयात्राएं और 'जय जय राम कृष्ण हरी' का अखंड घोष इस तीर्थ को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। सदियों से यह विश्वास जीवित है कि पांडुरंग विट्ठल अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं।

 

ऐसी ही आस्था से जुड़ा एक सत्य संस्मरण मध्य प्रदेश के देवास स्थित 'पवार परिवार' में आज भी श्रद्धापूर्वक सुनाया जाता है। यह घटना लगभग 'एक शताब्दी पूर्व की है, 'किंतु परिवार की स्मृतियों में आज भी उतनी ही जीवंत है, मानो कल की बात हो।

मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के देवास निवासी श्रीमती मंजुलाबाई अमृतराव पवार साहेब अपने पांच से सात वर्षीय पुत्र के साथ आषाढ़ी एकादशी के अवसर पर पंढरपुर पहुंची थीं। उस समय न आधुनिक परिवहन था, न यात्रियों के लिए आज जैसी सुविधाएं। फिर भी श्रद्धा के बल पर लोग कठिन यात्राएं करते थे। 

 

पंढरपुर पहुंचकर उन्होंने पहले अपने पुत्र को चंद्रभागा नदी में स्नान कराया और फिर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठाकर मराठी में स्नेहपूर्वक कहा- 'बाळा, इथेच बस. मी आंघोळ करून लगेच येते.'- अर्थात् , 'बेटा, यहीं बैठे रहना। मैं स्नान करके अभी आती हूँ।' किन्तु नियति ने उस दिन उनके विश्वास की एक कठिन परीक्षा लेनी थी।

जब मंजुलाबाई साहेब स्नान कर लौटीं, तो उनका पुत्र वहां नहीं था। देखते ही देखते उनका हृदय आशंका से भर उठा। अपार भीड़ में वे व्याकुल होकर अपने पुत्र को खोजने लगीं। दूसरी ओर नन्हा बालक भी अपनी मां को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते रोने लगा। मां और पुत्र दोनों एक-दूसरे को पुकार रहे थे, पर लाखों श्रद्धालुओं के शोर में उनकी आवाज़ें कहीं विलीन हो गईं। 

 

इसी बीच एक वृद्ध, संतस्वरूप बाबा उस रोते हुए बालक के पास आए। उन्होंने बड़े स्नेह से उसके आंसू पोंछे और मराठी में पूछा, 'बाळा, का रडतोस?' बालक ने मासूमियत से उत्तर दिया, 'माझी आई दिसत नाही. 'अर्थात्, 'मेरी आई दिखाई नहीं दे रही है।' वृद्ध ने प्रेमपूर्वक उसे प्रसाद के दो लड्डू दिए, उसका भय दूर किया और मंदिर के समीप एक चबूतरे पर बैठाकर कहा, 'इथेच बस. तुझी आई नक्की येईल।' यानी, 'यहीं बैठे रहो, तुम्हारी मां अवश्य आ जाएगी।' 

 

कुछ समय बाद पुत्र की खोज में व्याकुल मंजुलाबाई साहेब की दृष्टि उसी चबूतरे पर बैठे अपने पुत्र पर पड़ी। वे भावविह्वल होकर 'बाळा… बाळा…' पुकारती हुई उसके पास दौड़ीं और उसे अपने हृदय से लगा लिया। उस क्षण शब्द गौण हो गए; मां और पुत्र दोनों की आंखों से बहते आंसू ही उनके मिलन की भाषा बन गए।

बालक ने शांत होने पर पूरी घटना अपनी मां को सुनाई। मंजुलाबाई साहेब ने चारों ओर उस वृद्ध संत को खोजा, पर वे कहीं दिखाई नहीं दिए। उसी क्षण उनके अंतर्मन में यह अनुभूति जागी कि वह कोई सामान्य वृद्ध नहीं थे, बल्कि स्वयं पांडुरंग विट्ठल थे, जिन्होंने भक्त की पुकार सुनकर उसके पुत्र की रक्षा की।

 

यह अनुभूति किसी तर्क का विषय नहीं थी। यह एक मां के विश्वास और उसके अनुभव का सत्य था। वे श्रद्धा से अभिभूत होकर भगवान विट्ठल के दर्शन करने पहुंचीं और कृतज्ञ मन से देवास लौट आईं। समय बीतता गया।

वही बालक आगे चलकर देवास के प्रथम फोटोग्राफर एवं आर्टिस्ट श्री गणपतराव पवार साहेब के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने अपने परिवार के साथ-साथ तत्कालीन देवास रियासत का भी नाम गौरवान्वित किया। आज उनके चौथी पीढ़ी तक परिवार कला, संस्कृति और सामाजिक योगदान के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।

 

परिवार के सदस्यों के अनुसार, स्व. श्री गणपतराव साहेब जब भी इस घटना का स्मरण करते थे, उनकी आँखें स्वतः भर आती थीं। उन्होंने यह संस्मरण दशकों पूर्व एकादशी के अवसर पर अपनी चौथी पुत्रवधु श्रीमती ज्योति प्रेमराव पवार जी को सुनाया था। उस समय भी वे भावुक हो उठे थे। तभी से यह प्रसंग परिवार की अमूल्य धरोहर के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित है।

ऐसे संस्मरणों को केवल चमत्कार की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। भारतीय समाज में परिवारों के भीतर पीढ़ियों से संजोई गई स्मृतियां हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे यह बताती हैं कि कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को संबल देने वाली सबसे बड़ी शक्ति उसका विश्वास होता है। आस्था का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि वह आत्मिक आश्रय है जो विपत्ति के क्षणों में मनुष्य को टूटने नहीं देता।

 

पंढरपुर की परंपरा भी यही कहती है कि भगवान विट्ठल केवल मंदिर के गर्भगृह तक सीमित नहीं हैं। वे अपने भक्त के विश्वास, करुणा और जीवन के अनुभवों में उपस्थित रहते हैं। संभव है कि किसी के लिए यह एक संयोग हो, किसी के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव; किंतु जिन लोगों ने इसे जिया है, उनके लिए यह ईश्वर की कृपा का सजीव प्रमाण है।

आषाढ़ी एकादशी का संदेश भी यही है कि निष्कलुष श्रद्धा मनुष्य को भीतर से दृढ़ बनाती है। जब विश्वास निर्मल हो और भक्ति निष्कपट, तब ईश्वर किसी न किसी रूप में अपने भक्त का हाथ थाम ही लेते हैं। शायद इसी विश्वास ने पंढरपुर को केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के हृदय का आध्यात्मिक आश्रय बना दिया है।

 

जय जय राम कृष्ण हरी।

पांडुरंग विट्ठल महाराज की जय।।

कांवड़ यात्रा को देखते हुए 5 दिन बंद रहेगा दिल्ली मेरठ एक्सप्रेसवे का ये खास हिस्सा, चेक कीजिए पूरी डिटेल

Ghaziabad Traffic Diversion: सालाना कांवड़ यात्रा के लिए पुलिस ने दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे के UP वाले हिस्से को बंद करने का फैसला किया है, जिससे 7 अगस्त से दिल्ली आने-जाने वाले ट्रैफिक में रुकावट आएगी। एडिशनल DCP (ट्रैफिक) वरुण सिंह ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि एक्सप्रेसवे की सभी छह लेन पर वाहनों की आवाजाही बंद रहेगी। यह प्रतिबंध दिल्ली बॉर्डर स्थित यूपी गेट से लेकर मेरठ बॉर्डर के पास काशी टोल प्लाजा तक लागू होगा। इस दौरान कार, ट्रक और बस समेत सभी तरह के वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित रहेगी। हालांकि, इसके पास से गुजरने वाली NH-9 की लेन खुली रहेंगी।

पिछले साल, पुलिस ने कुछ समय के लिए दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे से ट्रैफिक को दूसरी तरफ मोड़ दिया था, जिससे NH-9 पर जाम लग गया था। इसके बाद ज्यादातर वाहनों को NH-9, ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे (EPE) और नोएडा के रास्ते भेजा गया था।

भारी वाहनों के लिए 29 जुलाई से रोक

बता दें कि इस बार हल्की और मध्यम गाड़ियों के लिए ये पाबंदियां 7 अगस्त को सुबह 8 बजे से शुरू होंगी और 12 अगस्त को शिवरात्रि तक लागू रहेंगी। भारी गाड़ियों को 29 जुलाई से ही इस रास्ते पर आने की इजाजत नहीं होगी। रास्ता बंद होने से ‘डाक कांवड़’ वालों यानी नंगे पैर दौड़कर यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों को बिना किसी रुकावट के चलने में आसानी होगी। उनके साथ ट्रकों और बाइकों पर रिले टीमें भी होती हैं और वे ज्यादातर एक्सप्रेसवे का ही इस्तेमाल करते हैं।

तीन रास्तों का करते हैं इस्तेमाल श्रद्धालू 

आस-पास के यूपी जिलों और दिल्ली से आने वाले श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचने के लिए तीन रास्तों का इस्तेमाल करते हैं, जहां से वे सालाना यात्रा के लिए अपनी कांवरों में गंगाजल भरते हैं। पैदल यात्रा करने वाले ज्यादातर श्रद्धालु लोनी बॉर्डर और निवाड़ी के बीच पाइपलाइन रोड का इस्तेमाल करते हैं, जबकि काफी संख्या में लोग GT रोड होते हुए नेशनल हाईवे 34 से जाते हैं। कुल मिलाकर, ये तीनों रास्ते गाजियाबाद में 150 km तक फैले हैं।

किन रूट के वाहनों को किया जाएगा डायवर्ट

दिल्ली से तुलसी निकेतन, सीमापुरी और आनंद विहार बॉर्डर से आने वाली गाड़ियों को UP गेट पर रोका जाएगा और उन्हें चौधरी चरण सिंह मार्ग, गाजीपुर मंडी और NH-9 से होते हुए (दासना इंटरसेक्शन से EPE का इस्तेमाल करके) या अक्षरधाम से दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे और EPE इंटरसेक्शन होते हुए हरिद्वार, अमरोहा, मुरादाबाद या लखनऊ भेजा जाएगा।

ADCP ने दी जानकारी

ADCP ने बताया कि बागपत से दिल्ली जाने वाले वाहनों को ट्रोनिका सिटी या सोनिया विहार और दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के रास्ते भेजा जाएगा, जबकि हापुड़ या बुलंदशहर से आने वाले वाहन सीधे डासना, लाल कुआं या आत्माराम स्टील प्लांट क्रॉसिंग से गाजियाबाद में घुसने के बजाय NH-9 का इस्तेमाल करेंगे।

पाइपलाइन मार्ग पर भी गाड़ियों की आवाजाही पर रोक

यह प्रतिबंध लोनी बॉर्डर से लोनी कस्बा जाने वाले मार्ग और सिद्धार्थ विहार स्थित संतोष मेडिकल कट से मेरठ तिराहे की ओर जाने वाले रास्ते पर लागू होगा। इसके अलावा, इंदिरापुरम क्षेत्र में गौर ग्रीन एवेन्यू, खोड़ा, कालापत्थर, नोएडा सेक्टर-62, छिजारसी और कनावनी पुस्ता से NH-9 की ओर जाने वाले रास्तों पर भी भारी वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित रहेगी।

ट्रैफिक प्रतिबंध गंगनहर पटरी कांवड़ मार्ग, पाइपलाइन मार्ग, NH-34 (पूर्व में NH-58) और दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे (DME) पर भी लागू रहेगा। इसके साथ ही गंगनहर पटरी कांवड़ मार्ग और पाइपलाइन मार्ग पर भी वाहनों की आवाजाही पूरी तरह बंद रहेगी।

NH-34 की मेरठ जाने वाली लेन का इस्तेमाल

पुलिस के अनुसार, मोहननगर, मेरठ क्रॉसिंग, राजनगर एक्सटेंशन या हापुड़ चुंगी से आने वाली कारें और दूसरी हल्की गाड़ियां NH-34 की मेरठ जाने वाली लेन का इस्तेमाल करेंगी। पुलिस ने बताया कि 5 अगस्त से पलवल या कुंडली से ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे (EPE) होते हुए गाजियाबाद शहर, मुरादनगर या मोदीनगर जाने वाली हल्की गाड़ियों को दुहाई कट से बाहर निकलने की इजाजत नहीं होगी। उन्हें NH-9 पर जाने से पहले दसना कट से बाहर निकलना होगा।

इसके अलावा, चौधरी मोड़, गौशाला क्रॉसिंग, हापुड़ क्रॉसिंग या कैला भट्टा से दूधेश्वरनाथ मंदिर की ओर जाने-आने पर पूरी तरह रोक रहेगी, और पटेल नगर फ्लाईओवर पर भी गाड़ियों की आवाजाही बंद रहेगी। रेलवे स्टेशन रोड, किराना मार्केट, रामतेताराम रोड, घंटाघर, बजरिया रोड और दिल्ली गेट से आने वाली हल्की गाड़ियों को भी मंदिर की ओर जाने की इजाजत नहीं होगी।

वहीं, मेरठ क्रॉसिंग से आने वाली गाड़ियों को मोक्षधाम हिंडन ब्रिज, कनावनी या इंदिरापुरम की ओर जाने की इजाजत नहीं होगी। इसके बजाय, उन्हें नया बस अड्डा से चौधरी मोड़, विजय नगर रेलवे ब्रिज होते हुए NH-9 पर भेजा जाएगा। सीमापुरी बॉर्डर और लाल कुआं के बीच, NH-34 के कांवड़ मार्ग वाले हिस्से पर, या मोहननगर और आनंद विहार के बीच ऑटो चलाने की इजाजत नहीं होगी।

पुलिस ने बताया कि 5 से 12 अगस्त के बीच सभी रोडवेज, प्राइवेट, सिटी और इलेक्ट्रिक बसों को सीमापुरी बॉर्डर या तुलसी निकेतन से शहर में घुसने की इजाजत नहीं होगी। इसके बजाय, उन्हें चौधरी चरण सिंह मार्ग, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-गाज़ीपुर मंडी, यूपी गेट और NH-9 से होते हुए दसना इंटरसेक्शन और EPE, या अक्षरधाम से दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के रास्ते भेजा जाएगा।

बुलंदशहर से गाजियाबाद जाने वाली बसों पर भी रोक

बुलंदशहर से गाजियाबाद आने वाली बसें लाल कुआं पर ही रुक जाएंगी और उन्हें शहर के अंदर आगे जाने की इजाजत नहीं होगी। अधिकारी ने बताया कि आनंद विहार और कौशांबी से आने वाली बसों को गाज़ियाबाद में घुसने से पूरी तरह रोका जाएगा और उन्हें चौधरी चरण सिंह मार्ग, गाज़ीपुर मंडी, NH-9 और दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के रास्ते डायवर्ट किया जाएगा।

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Jana Nayagan Box Office Collection Day 1: विजय की फिल्म ने भारत में 41 करोड़ का किया कलेक्शन, अपनी ही फिल्मों का नहीं तोड़ पाए रिकॉर्ड

Jana Nayagan Box Office Collection Day 1: थलपति विजय की नई फिल्म ‘जन नायकन’, जो सेंसर सर्टिफिकेट की वजह से अटकी हुई थी, कल सिनेमाघरों में रिलीज हुई। फैंस के जबरदस्त उत्साह और चर्चा के बीच, Sacnilk के अनुसार फिल्म ने घरेलू बाजार में 41 करोड़ (नेट) की कमाई की। ट्रेड-ट्रैकर पोर्टल के मुताबिक, विदेशों में फिल्म ने कुल 30.00 करोड़ का ग्रॉस कलेक्शन किया है। कुल मिलाकर, ‘जन नायकन’ विजय की पिछली हिट फिल्मों जैसे ‘बीस्ट’ और ‘GOAT’ की ओपनिंग कमाई के बराबर नहीं पहुँच पाई।

ट्रेड ट्रैकर Sacnilk के अनुसार, ‘जन नायकन’ ने 13,067 शो में 41.00 करोड़ का नेट कलेक्शन किया। इससे भारत में कुल ग्रॉस कलेक्शन 48.27 करोड़ और कुल नेट कलेक्शन अब तक 41.00 करोड़ हो गया है। विदेशों में फ़िल्म ने कुल ₹30.00 करोड़ कमाए, जिससे इसका कुल वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन ₹78.27 करोड़ हो गया। ओपनिंग-डे के आंकड़ों में हिंदी वर्ज़न का योगदान ₹1.75 करोड़ रहा। सबसे ज़्यादा योगदान तमिल वर्ज़न का रहा, जिसने ₹36.50 करोड़ कमाए। तेलुगु वर्ज़न ने ₹2.75 करोड़ की कमाई की।

‘जन नायकन’ भी विजय की ब्लॉकबस्टर फ़िल्मों की ओपनिंग का रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाई। ‘बीस्ट’ ने ₹49.30 करोड़ और ‘GOAT’ ने ₹44 करोड़ की कमाई की थी। ‘जन नायगन’ उन खास तमिल फ़िल्मों की लिस्ट में शामिल नहीं हो पाईं जिन्होंने ओपनिंग डे पर ₹50 करोड़ कमाए। इस लिस्ट में विजय की ‘लियो’ (₹64.80 करोड़), रजनीकांत की ‘कूली’ (₹65 करोड़) और ‘कूली 2.0’ (₹60.25 करोड़) सबसे आगे हैं।

ओपनिंग डे के आंकड़ों के बारे में पूछे जाने पर रमेश बाला ने कहा, “भारत में, मुझे ₹60 करोड़ की ओपनिंग का अनुमान है। दुनिया भर में, मेरा अनुमान ₹90 करोड़ का है।” ओपनिंग वीकेंड के लिए, बाला ने भारत में ₹150–180 करोड़ और दुनिया भर में ₹250 करोड़ का अनुमान लगाया। ट्रेड एक्सपर्ट तरण आदर्श ने सटीक आंकड़े बताने से इनकार कर दिया, लेकिन विजय की फ़िल्म के लिए “ज़बरदस्त” ओपनिंग की भविष्यवाणी की।

एच. विनोथ के निर्देशन में बनी ‘जाना नायकन’ के बारे में कहा जा रहा है कि यह एक्टर के तौर पर विजय की आखिरी फ़िल्म होगी। असल में इसे चुनावों से पहले फ़ैन्स के लिए उनके विदाई तोहफ़े के तौर पर प्लान किया गया था। KVN प्रोडक्शंस ने इसे लगभग 500 करोड़ रुपये के बजट में बनाया है। इस फ़िल्म में पूजा हेगड़े, बॉबी देओल और ममिता बैजू जैसे कई बड़े स्टार्स हैं और इसका म्यूज़िक अनिरुद्ध रविचंदर ने दिया है।

Jana Nayagan: तमिलनाडु में विजय की ‘जना नायकन’ को लेकर लोग हुए क्रेजी, हाउसफुल चल रहे शोज

Jana Nayagan: चेन्नई में गुरुवार सुबह मुख्यमंत्री सी. विजय जोसेफ की फिल्म ‘जना नायकन’ का ‘पहला शो’ देखने के लिए एक्साइटेज फैंस और TVK के जोशीले कार्यकर्ता सिनेमाघरों में उमड़ पड़े और उन्होंने इस विदाई फिल्म का जश्न अलग-अलग तरीकों से मनाया।

कई सिनेमाघरों में फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान आतिशबाजी, म्यूजिक, ड्रोन लाइट शो और बड़े केक काटे गए। जोश से भरे फैंस नाच-गा रहे थे और कई लोगों ने कहा कि वे खुश भी हैं और दुखी भी। खुश इसलिए क्योंकि फिल्म काफी देरी के बाद रिलीज हो रही है और दुखी इसलिए क्योंकि ‘जन नायकन’ विजय की आखिरी फिल्म होगी।

रोहिणी सिल्वरस्क्रीन, वुडलैंड्स और कैसीनो जैसे सिनेमाघरों में ‘जना नायकन’ के बड़े-बड़े होर्डिंग देखे जा सकते थे। चेन्नई में लगे एक होर्डिंग में विजय को तमिलनाडु का “एकमात्र पावर सेंटर” बताया गया। इसके अलावा, पूरे राज्य में विजय की “शान” की तारीफ करते हुए दीवार पर पोस्टर लगाए गए और उनके कई फैंस और समर्थकों ने फिल्म की जबरदस्त सफलता के लिए प्रार्थना करने के लिए मशहूर मंदिरों का दौरा किया।

चेन्नई के पास एक शहर में फिल्म के स्वागत के लिए रथ जैसा वाहन तैयार किया गया था और एक फैन ने अपनी लग्ज़री कार पर विजय की बड़ी-बड़ी तस्वीरें बनवाकर सबका ध्यान खींचा। कई फैंस ‘थंगमे थलापति’ लिखी टी-शर्ट पहने हुए थे। जश्न के साथ-साथ टिकट की ज़्यादा कीमत के आरोप भी सामने आए और टिकट के दाम बढ़ने को लेकर बहस का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

उम्मीद है कि सीनियर मिनिस्टर एन. आनंद और प्रोड्यूसर वेंकट नारायण शहर में यह फिल्म देखेंगे। फैंस अपने पसंदीदा स्टार विजय का ज़बरदस्त अंदाज़ और तीखे डायलॉग देखने के लिए बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं, जिसमें वे अच्छी राजनीति के ज़रिए अच्छा शासन देने और देश की सेवा करने की बात करते हैं।

यह फिल्म तमिलनाडु के 1,000 से ज़्यादा सिनेमाघरों में से लगभग 950 में दिखाई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री विजय ने बुधवार शाम को कुछ अधिकारियों के साथ यहां फिल्म की एक स्पेशल स्क्रीनिंग देखी।

Azad Jayanti 2026: जयंती विशेष: चन्द्रशेखर आजाद के जीवन की ऐसी घटनाएं, जिन्हें हर युवा को जानना चाहिए

A photo reflecting the great freedom fighter Chandrashekhar Azads love for India, on the occasion of his birth anniversary

Chandra Shekhar Azad Biography: भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में कई नायक हुए, लेकिन पंडित चन्द्रशेखर 'आजाद' का व्यक्तित्व अद्वितीय है। वे केवल एक महान क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि आत्मसम्मान, संगठन कुशलता और अटूट निष्ठा के प्रतीक थे। उनका साहस, अनुशासन और नेतृत्व आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज के युवाओं के लिए आजाद का जीवन केवल वीरता की कहानियों तक सीमित नहीं है; यह इस बात का अध्ययन है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में चरित्र का निर्माण कैसे किया जाता है। 

 

चन्द्रशेखर आजाद जयंती 2026 पर जानें उनके जीवन की प्रेरक घटनाएं, साहस, बलिदान, संघर्ष और ऐसे अनसुने तथ्य जो हर युवा को प्रेरित करते हैं।

 

1. 'आजाद' नाम का जन्म: 

1921 के असहयोग आंदोलन के दौरान मात्र 15 वर्ष का एक किशोर पुलिस की गिरफ्त में आया। अदालत में जब अंग्रेज जज ने सवाल पूछे, तो उस बालक के उत्तर ऐतिहासिक थे:

 

नाम: 'आजाद'

पिता का नाम: 'स्वतंत्रता'

पता: 'जेलखाना'

 

जज ने क्रुद्ध होकर 15 कोड़ों की सजा सुनाई। उस समय हर कोड़े की मार पर चमड़ी उधड़ जाती थी, लेकिन वह किशोर हर मार के साथ 'भारत माता की जय' का हुंकार भरता रहा।

 

* यह घटना केवल एक बच्चे के दुस्साहस की नहीं है। यह दर्शाती है कि जब कोई व्यक्ति अपने आत्म-बोध और राष्ट्र-बोध को पहचान लेता है, तो शारीरिक दर्द या भय उसके सामने बौना साबित हो जाता है। युवाओं के लिए सीख यह है कि अपने सिद्धांतों के लिए खड़े होने का साहस उम्र का मोहताज नहीं होता।

 

2. काकोरी कांड और संगठन पुनर्निर्माण

सन् 1925 का काकोरी ट्रेन एक्शन या काकोरी कांड क्रांतिकारी आंदोलन की महत्वपूर्ण घटना थी। इसके बाद जब राम प्रसाद बिस्मिल्ला, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां और अन्य प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए, तो ऐसा लगा कि संगठन समाप्त हो जाएगा।

आजाद ने न केवल खुद को गिरफ्तारी से बचाया, बल्कि बिखर चुके आंदोलन को समेटा। उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) को पुनर्गठित कर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे युवाओं को जोड़कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का रूप दिया।

 

* आजाद केवल बंदूक उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे, वे एक बेहतरीन संगठनकर्ता और रणनीतिकार थे। जब सब कुछ बिखर रहा था, तब नेतृत्व संभालना और नए विचार यानी समाजवाद को जोड़कर संगठन को आगे बढ़ाना उनकी बौद्धिक क्षमता और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।

 

3. साधु के वेश में ओरछा प्रवास

काकोरी के बाद जब अंग्रेजों की सीआईडी आजाद के पीछे पड़ी थी, तब वे मध्य प्रदेश में ओरछा के जंगलों यानी सातार नदी के किनारे 'हरिशंकर ब्रह्मचारी' के नाम से छिपकर रहे। वहां वे स्थानीय बच्चों को पढ़ाते थे, कुश्ती सिखाते थे और साथ ही अपने साथियों को निशानेबाज़ी का प्रशिक्षण देते थे।

 

* इस दौर से उनके कठोर आत्म-नियंत्रण और परिस्थितियों के अनुकूल खुद को ढालने की क्षमता का पता चलता है। एक क्रांतिकारी का जीवन केवल उत्तेजना का नहीं, बल्कि लंबे धैर्य और अनुशासन का नाम है- यह सबक आज के उस युवा के लिए जरूरी है जो तुरंत परिणाम की अपेक्षा रखता है।

 

4. अलफ्रेड पार्क में अंतिम संघर्ष

प्रयागराज/ इलाहाबाद के अलफ्रेड पार्क में जब मुखबिरी के कारण पुलिस ने उन्हें घेर लिया, तब आजाद के पास पिस्टल में केवल कुछ गोलियां बची थीं। उन्होंने अपने साथी सुखदेव राज को सुरक्षित बाहर निकाला और अकेले पूरी पुलिस टुकड़ी का सामना किया। जब अंतिम गोली बची, तो उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा को याद किया- 'दुश्मन की गोली का सामना हम करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।' उन्होंने वह अंतिम गोली स्वयं को मार ली और जीवित रहते कभी अंग्रेजों के हाथ न आने का अपना वादा पूरा किया।

 

* आजाद का अंतिम क्षण किसी पराजय का नहीं, बल्कि अंतिम विजय का प्रतीक था। उन्होंने मृत्यु का वरण अपनी शर्तों पर किया। यह घटना सिखाती है कि व्यक्ति का जीवन कितना लंबा है, यह महत्वपूर्ण नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि वह अपने जीवन के मूल्यों और प्रतिज्ञाओं के प्रति कितना निष्ठावान रहता है।

 

आज के युवाओं के लिए संदेश

चन्द्रशेखर आजाद का जीवन आज के दौर में इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वे किसी बाहरी शक्ति से ज्यादा अपने विचारों और आत्म-सम्मान के प्रति जवाबदेह थे।

 

स्पष्ट उद्देश्य: आजाद के जीवन में कोई भ्रम यानी कंफ्यूजन नहीं था। उनका लक्ष्य भारत की स्वाधीनता था, और उनका हर कदम उसी ओर उठा।

 

नेतृत्व क्षमता: एक सच्चे नेता की तरह उन्होंने खुद को कभी आगे नहीं रखा, बल्कि अपने साथियों- भगत सिंह आदि को वैचारिक रूप से आगे बढ़ने का पूरा अवसर दिया।

 

स्वाभिमान: उन्होंने कभी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके।

 

चन्द्रशेखर आजाद का इतिहास पढ़ना केवल बीते हुए समय को याद करना नहीं है, बल्कि अपने अंदर उस 'अजेय भावना' को जगाना है जो किसी भी कठिनाई के आगे झुकने से इंकार कर देती है।

 

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क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ : होमर के महाकाव्य की उदास सिनेमाई पुनर्रचना

The Odyssey

एक राजा और महानायक होते हुए भी ओडिसस की ज़िंदगी कोई जश्न नहीं है, बल्कि एक लंबा इंतज़ार, एक बेबसी और ज़िंदगी के आख़िर में पसरा हुआ एक अंतहीन सन्नाटा है। यह एक ऐसे दुख की किरच के साथ घर लौटने की कहानी है, जिसके अंत में यही अर्थ मिलता है कि अंततः ज़िंदगी का कोई अर्थ नहीं। फिर वह ज़िंदगी स्वयं महाकवि होमर के ओडिसस की ही क्यों न हो।

इस फ़िल्म को देखते हुए बार-बार मुझे यह अहसास होता रहा कि ज़िंदगी और समंदर एक ही चीज़ हैं। ज़िंदगी बार-बार समंदर की तरह उफनती है, स्थिर होती है और फिर किसी अंतहीन गहराई की तरह पसर जाती है। इस गहराई का दूर-दूर तक कोई अर्थ नहीं, सिवाय इसके कि वह बस हमारी आँखों के सामने कभी बेसाख़्ता, तो कभी बेतरतीब-सी फैली रहती है—अपने अनंत और विराट विस्तार में फैले नीले समंदर की तरह।

न जाने क्यों, मुझे ‘द ओडिसी’ की कहानी में मुख्य किरदार (प्रोटैगोनिस्ट) समंदर लगता है। उसकी आवाज़, उसका मौन, उसकी गहराई, उसकी आत्मीयता और उसका विद्रोह। दूर तक फैले इस बे-शक्ल पानी में कितना कुछ है, जबकि असल में कुछ भी नहीं।

निर्देशक क्रिस्टोफ़र नोलन का ओडिसस भी समंदर की तरह अपनी गहराई, अपने अकेलेपन, अपनी विफलता और अपनी अंतहीन निरर्थकता के बीच अपनी ज़िंदगी के दस साल गुज़ारता है। वह कई बार एक ऐसे योद्धा की तरह नज़र आता है, जो लहरों के ख़िलाफ़ लड़ना चाहता है; तो कई जगह एक उलझा हुआ आदमी दिखाई देता है।
हालाँकि ट्रॉय के युद्ध के बाद इथाका के राजा ओडिसस के पास घर लौटने का एक मक़सद है। उसकी स्मृति में इंतज़ार करती हुई एक औरत है, जो उसकी पत्नी है। उसका एक मृतप्रायः कुत्ता भी इसलिए इंतज़ार कर रहा है कि जब ओडिसस लौटेगा, तभी वह मरेगा। और ऐसा ही होता है। ओडिसस के आते ही कुत्ता मर जाता है।
ओडिसस की वफ़ादार और बेहद ख़ूबसूरत पत्नी पेनेलोप उसका इंतज़ार कर रही है। वह ओडिसस के लिए अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर देने को तैयार है।

मैं हैरान हूँ। इस ख़ूबसूरत औरत को देखते हुए दृश्य नहीं, बल्कि पंक्तियाँ याद आती हैं। एक पंक्ति याद आती है—Waiting is the most intense way of living.

क्रिस्टोफ़र नोलन की फ़िल्म ‘द ओडिसी’ मानो समंदर पर लिखी हुई कोई उदास कविता हो।

यही वजह है कि ‘द ओडिसी’ में मुझे युद्ध के साथ-साथ प्रेम और इंतज़ार भी दो बड़े तत्त्व महसूस होते हैं। हालाँकि ‘द ओडिसी’ में भावनाओं का ट्रीटमेंट कुछ टूटा, खोया और दरका हुआ-सा है। मैं एक बार भी किसी दृश्य या किसी जेस्चर पर सिहर नहीं पाया। किंतु इसकी सिनेमाई भव्यता, ओडिसस की ज़िंदगी की त्रासदी और इस कहानी का दृश्य-विन्यास इसे इतना बड़ा बना देते हैं कि हम अपनी अदृश्य और नाज़ुक भावनाओं को कुछ देर के लिए कुचलकर भूल जाने को तैयार हो जाते हैं।

लुडविग गोरान्सन का संगीत—जिसमें सिंथेसाइज़र के साथ-साथ प्राचीन और पुनर्निर्मित ग्रीक वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया गया है, शायद ब्रॉन्ज़ गोंग भी—समंदर की लहरों, गहरे अँधेरों, दृश्यों की विराटता, कहीं-कहीं पसरी हुई ख़ामोशी और समंदर की विशालता के बीच कभी-कभी शोपाँ की याद दिलाता है।

फ़िल्म में परदे पर अतीत और वर्तमान किसी मौसम की तरह आते-जाते रहते हैं। इन दृश्यों के बीच ओडिसस अपने घर लौटने की कहानी कहता हुआ लड़ाई लड़ रहा है। इस संघर्ष में एक बाहर की लड़ाई है और भीतर की एक भावुक लड़ाई भी। ओडिसस राक्षसों से लेकर प्रेतात्माओं तक से लड़ता है। कभी अच्छी आत्माएँ और देवता उसकी मदद करते हैं। वह अपने स्मृतिलोप से भी लड़ता है और अपने अपराधबोध से भी।

घर लौटने के इस संघर्ष में वह अपने सारे योद्धाओं को खो देता है। कभी समंदर, तो कभी राक्षस उसके सारे प्रिय साथियों को निगल जाते हैं और आख़िर में वह अकेला, ख़ाली हाथ घर लौटता है। इसलिए कई जगह ओडिसस की आत्मा मुझे कलिंग के युद्ध में जीतकर भी अपनी आत्मा से हार चुके सम्राट अशोक की आत्मा जैसी लगती है। कलिंग विजय के लिए सम्राट अशोक ने एक ओर भीषण नरसंहार किया और दूसरी ओर, जीत के बाद भी वह अकेले और एक उलझे हुए दार्शनिक की तरह खड़ा नज़र आया—नितांत अकेला और निसंग। हज़ारों लाशों के बीच खड़ा एक सम्राट, जो यह तय नहीं कर पाया कि वह जीता है या हार गया।

दिलचस्प बात यह है कि जिस अनुवादक एमिली विल्सन ने ‘द ओडिसी’ का अँग्रेज़ी में अनुवाद किया है, उसकी पहली पंक्ति ही कहती है—”Tell me, Muse, of the man of many ways.”

‘द ओडिसी’ महाकवि होमर की लिखी तक़रीबन तीन हज़ार वर्ष पुरानी कविता पर आधारित ग्रीक साहित्य का एक मील का पत्थर है। यह भारत के महाकाव्यों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के समकक्ष माना जाने वाला काव्य है, जिसके रचयिता होमर के वजूद को लेकर भी अनेक रहस्य और मत हैं। कुछ उन्हें एक ही व्यक्ति मानते हैं, तो कुछ का कहना है कि होमर एक नहीं, बल्कि इस नाम के कई व्यक्ति थे।

कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि ‘होमर’ कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि प्राचीन ग्रीस के चारणों (घूम-घूमकर कविता गाने वाले कवियों) के एक समूह का नाम मात्र था। कई सदियों से चली आ रही इन मौखिक या वाचिक रचनाओं को जब एक साथ संकलित किया गया, तो उसे ‘होमर’ का नाम दे दिया गया। इस रहस्य को होमरिक प्रश्न (The Homeric Question) कहा गया है।

बहरहाल, क्रिस्टोफ़र नोलन ‘ओपनहाइमर’ बनाकर फ़िल्म-निर्माण का वह बेंचमार्क स्थापित कर चुके हैं कि अगले स्तर पर ‘द ओडिसी’ जैसी फ़िल्म लगभग अनिवार्य थी। अब उनके दर्शकों को भी ‘द ओडिसी’ केवल एक दृश्य-अनुभव की तरह नहीं, बल्कि एक महाकाव्य, एक त्रासदी और मनुष्य के अकेलेपन की यात्रा की तरह देखनी चाहिए। शायद तभी वे उस जगह तक पहुँच पाएँगे, जहाँ पहुँचकर नोलन ने इस फ़िल्म की कल्पना की है।

VIDEO: ‘बैग छुआ, मेरी ड्रेस खींची’ कपल के लिए बुरा सपना बना सर्बिया ट्रिप, कैमरे में कैद हुई पूरी घटना

Viral Video: सर्बिया घूमने गए एक भारतीय कपल के साथ कथित छेड़छाड़ का मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। सर्बिया में जब कपल व्लॉग बना रहे थे उसी समय कुछ लोगों ने उनके साथ अभद्र व्यवहार किया। घटना का वीडियो सामने आने के बाद लोगों में नाराजगी है और कई यूजर्स दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। वहीं कुछ ने कपल के शांत रवैये की भी तारीफ की है। सोशल मीडिया पर ये वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है।

क्या है पूरी घटना

भारतीय कपल अपर्णा मालू और अजमल कोलंबिल सर्बिया पहुंचने के बाद अपना ट्रैवल व्लॉग शूट कर रहे थे। इसी दौरान तीन लोग उनके पास आ गए और कथित तौर पर उनसे अभद्र व्यवहार करने लगे। वायरल वीडियो में दिखाई देता है कि जब दोनों सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे, तभी पीछे से आए तीन लोगों में से एक शख्स महिला के बेहद करीब पहुंचा और उसके बैग को खींचने की कोशिश करता हुआ नजर आया। अपर्णा और अजमल को शुरुआत में ये समझ नहीं आया कि उनके साथ क्या हो रहा है, इसलिए वे आगे बढ़ते रहे।

कैमरे में रिकॉर्ड हुई पूरी घटना

लेकिन जब एक शख्स ने दोबारा अपर्णा का बैग खींचा, तब उन्होंने पीछे मुड़कर उन लोगों का सामना किया। कपल ने उनसे पूछा, “क्या आप महिलाओं के साथ ऐसा ही बर्ताव करते हैं? आपकी प्रॉब्लम क्या है?” इस पर उनके साथ मौजूद एक व्यक्ति ने इशारा करते हुए कहा कि बैग खींचने वाले शख्स की दिमागी दिक्कतें है। इस पर अपर्णा के पति ने जवाब दिया, “अगर उसे कोई दिक्कत है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह ऐसा करे। यह बिल्कुल गलत है। हम दूसरे देश से आए हैं।” जैसे ही उन लोगों को पता चला कि उनकी हरकत कैमरे में रिकॉर्ड हो रही है, वे वहां से गालियां देते हुए चले गए।

बैग से कुछ निकाल रहा था

घटना के बारे में अपर्णा ने अपने पोस्ट में लिखा, “जब हम व्लॉग बना रहे थे, तभी ये तीन लोग हमारे पीछे आ गए। पहले उन्होंने मेरे बैग से कुछ निकालने की कोशिश की, लेकिन मुझे तुरंत इसका एहसास नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद महसूस हुआ कि कोई मेरे बैग को छू रहा है, इसलिए मैंने बैग आगे कर लिया। तभी उनमें से एक ने मेरी ड्रेस खींच दी।” वीडियो वायरल होने के बाद कई सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाया कि उनके पति ने उन लोगों का सामना क्यों नहीं किया।

 

एक्शन फिल्म नहीं चल रही थी

इस पर अपर्णा ने जवाब देते हुए कहा, “मैं आपकी चिंता समझती हूं, लेकिन ये भी याद रखिए कि हमें उस देश में पहुंचे मुश्किल से दो घंटे ही हुए थे। उस समय हम सिर्फ शाम की सैर पर निकले थे। ऐसी स्थिति में हमारे दिमाग में सबसे पहले लड़ाई करने का विचार नहीं आया।” उन्होंने आगे लिखा, “असल जिंदगी किसी एक्शन फिल्म जैसी नहीं होती। मेरे पति न तो ‘रॉकी भाई’ हैं और न ही विजय। कोई भी अकेला व्यक्ति तीन लोगों से लड़कर हीरो की तरह बाहर नहीं निकलता। उस समय हमारी पहली प्राथमिकता अपनी सेफ्टी थी, न कि किसी को कुछ साबित करना।”

लोगों ने दिए रिएक्शन

अपर्णा ने ये भी बताया कि उन्होंने इस घटना की शिकायत स्थानीय अधिकारियों से की है और उन्हें भरोसा दिलाया गया है कि मामले में उचित कार्रवाई की जाएगी। इस वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दीं। एक यूजर ने लिखा, “यह बेहद शर्मनाक व्यवहार है। उम्मीद है कि आप दोनों सुरक्षित होंगे।” दूसरे यूजर ने कहा,”आपको उसी समय मौके पर ही पुलिस को फोन कर देना चाहिए था।” एक अन्य व्यक्ति ने लिखा, “सबसे पहले अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है। अपना ख्याल रखें और मजबूत बने रहें।”

FIFA WC में सिर्फ एक गोल कर पाए फेराल टोरस पर दिला गए खिताबी जीत

Ferran Torres

फेरान टोरेस, यह नाम शायद फीफा विश्वकप के शुरुआत तो छोड़िए फीफा विश्वकप फाइनल शुरु होने से पहले भी शायद ही किसी ने सुना हो। लेकिन फीफा विशवकप फाइनल खत्म होने से पहले अंतिम लम्हों में उन्होंने गोल कर अपना नाम मशहूर कर लिया। यह गोल उन्होंने अतिरिक्त समय में मैच के 106 वें मिनट में किया जब उनको हेडर के रुप में असिस्ट मिला।

स्पेन के लिये विश्व कप फाइनल में विजयी गोल भले ही फेरान टोरेस ने दागा हो लेकिन यह टीम के दो सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों और दो स्थानापन्न खिलाड़ियों के आपसी तालमेल से ही संभव हो सका।गोल के लिये तैयारी अतिरिक्त समय के दूसरे हाफ की शुरूआत में ही हो चुकी थी जब एंजो फर्नांडिस को 93वें मिनट में दूसरा पीला कार्ड मिलने के कारण बाहर जाना पड़ा और अर्जेंटीना दस खिलाड़ियों तक सिमट गई थी।

युवा लामिन यमाल ने दाहिने विंग से गेंद को लपका और पेड्रो पोरो को पास दिया। पोरो का दाहिने पैर से लगा क्रॉस लगभग बाहर ही चला गया था लेकिन 75वें मिनट में मैदान पर आये निको विलियम्स ने हेडर से गेंद टोरेस के हवाले की।स्थानापन्न खिलाड़ी के तौर पर आये टोरेस ने बायें पैर से गेंद लपक ली और अर्जेंटीना के चुस्त गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज को चकमा देकर 106वें मिनट में गोल कर दिया।

टोरेस ने बाद में कहा ,‘‘ यह 47 मिलियन लोगों द्वारा किया गया गोल था। मैं बहुत खुश हूं। विश्व कप में मेरी काफी आलोचना हुई लेकिन शायद यह गोल मेरी किस्मत में था।’उन्होंने कहा ,‘‘ जो हकदार होते हैं और भरोसा रखते हैं, भगवान उनकी झोली भर देता है।’’

विश्वकप ही नहीं गोल्डन बॉल और ग्लब्स समेत कई अवार्ड मिले स्पेन को

Rodri

स्पेन के गोलकीपर रो़ड्री ने फीफा विश्वकप 2026 में सारे मैचों में एक दीवार का काम किया। स्पेन की पूरी टीम ने ग्रुप स्टेज से लेकर फाइनल तक सिर्फ एक गोल ही खाया। यह गोल बेल्जियम के खिलाफ आया। इसका काफी कुछ श्रेय स्पेन के गोलकीपर उनाई सिमोन को जाता है।

स्पेन ने रविवार को न्यू जर्सी के मेटलाइफ स्टेडियम में अर्जेंटीना को 1-0 से हराकर अपना दूसरा पुरुष विश्व कप खिताब जीतकर व्यक्तिगत पुरस्कारों की हैट्रिक अपने नाम की।स्पेन फुटबॉल टीम के कप्तान और मिडफील्डर रोड्रिगो हर्नाडेज कैस्केन्टे (रोड्री) ने टूर्नामेंट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के रूप में गोल्डन बॉल का पुरस्कार जीता, उनाई सिमोन ने गोलकीपर के रूप में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए गोल्डन ग्लव जीता, और पाउ कुबार्सी ने अपने साथी 19 वर्षीय टीम के साथी लामिन यामल को हराकर सर्वश्रेष्ठ युवा खिलाड़ी का पुरस्कार अपने नाम किया।

स्पेन के गोलकीपर उनाई साइमन ने ना केवल इस विश्वकप बल्कि पिछले विश्वकप में भी कई मैचों तक स्पेन को गोल खाने से रोका था।साइमन ने दो विश्वकपों को मिलाकर प्रतिद्वंदी टीम को 519 मिनट तक गोल करने से रोका है। उन्होंने 36 साल पुराने इटनी के वाल्टर जेंगा के 517 मिनट तक गोल बचाने के रिकॉर्ड को पार किया।

पुरस्कार के बाद रोडी ने कहा, “यह टीम अविश्वसनीय है। हम दो बार विश्व चैंपियन बने हैं। यह एक कठिन उपलब्धि है, जिसे हासिल करना सबसे मुश्किल है। और हमने अर्जेंटीना जैसी टीम के खिलाफ यह खिताब जीता।”उन्होंने कहा, “मुझे गर्व है और मैं चाहता हूं कि आने वाली पीढ़ियां देखें कि यह संभव है। एक खिलाड़ी जो आसमान छूता है और फिर नीचे में गिर जाता है, वह फिर से उठने में भी सक्षम होता है। यह विपरीत परिस्थितियों पर विजय पाने का एक उदाहरण है, और आपको विश्वास रखना होगा। सच कहूं तो, यह अविश्वसनीय है।”

मैनचेस्टर सिटी के इस मिडफील्डर ने टूर्नामेंट में एक भी गोल नहीं किया, लेकिन उनके पास देने और गेंद पर नियंत्रण रखने की क्षमता स्पेन की खेल शैली का अहम हिस्सा है। वे विश्व कप, यूईएफए चैंपियंस लीग और बैलोन डी’ओर जीतने वाले सिर्फ 11वें खिलाड़ी बने।

CJP Delhi Protest : जंतर-मंतर पर भारी बवाल, प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने बरसाई लाठियां

CJP Sansad March Lathicharge: दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘संसद चलो मार्च’ के बीच भारी बवाल हो गया है। संसद भवन की तरफ बढ़ने की कोशिश कर रहे हजारों प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने बैरिकेड्स लगा रखे थे, लेकिन जैसे ही भीड़ आगे बढ़ी, माहौल तनावपूर्ण हो गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया है।

इस समय जंतर-मंतर और दिल्ली के वीआईपी इलाकों में क्या हालात हैं, आइए जानते हैं अब तक के सभी बड़े अपडेट्स।

बैरिकेड्स तोड़ने की कोशिश के बाद एक्शन, पुलिस का लाठीचार्ज

सोमवार को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन CJP के नेतृत्व में हजारो प्रदर्शनकारी संसद की तरफ मार्च निकालने के लिए जंतर-मंतर पर जमा हुए है। नई दिल्ली जिले में धारा 163 लागू होने के कारण पुलिस लगातार प्रदर्शनकारियों से मार्च न निकालने की अपील कर रही थी।

जैसे ही प्रदर्शनकारियों ने संसद मार्ग और रफी मार्ग की तरफ बढ़ने के लिए पुलिस के मल्टी-लेयर बैरिकेड्स को धक्का देना और उन्हें पार करना शुरू किया, पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज कर दिया।

सफदरजंग अस्पताल में भी बढ़े सुरक्षा घेरे, समर्थक आक्रोशित

जंतर-मंतर पर हुए लाठीचार्ज के बाद सफदरजंग अस्पताल के बाहर भी हलचल काफी तेज हो गई है। अस्पताल में भर्ती पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक पहले से ही अनशन पर बैठे हैं। CJP समर्थकों का आरोप है कि शांतिपूर्ण ढंग से मार्च निकाल रहे छात्रों और युवाओं पर पुलिस ने जानबूझकर बल प्रयोग किया है, जिससे कई लोग घायल हुए हैं।

लुटियंस जोन पूरी तरह ठप, ट्रैफिक व्यवस्था चरमराई

लाठीचार्ज और हंगामे के बाद पूरी नई दिल्ली को छावनी में बदल दिया गया है, जिससे लुटियंस दिल्ली में ट्रैफिक पूरी तरह चरमरा गया है। पार्लियामेंट स्ट्रीट, रायसीना रोड, रफी मार्ग और अशोक रोड को सामान्य यातायात के लिए पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया है।

पटेल चौक और विजय चौक पर पर सुरक्षा बलों और दंगा नियंत्रण वाहनों (RAF) की भारी तैनाती के कारण वाहनों की लंबी कतारें लग गई हैं। ऑफिस जाने वाले लोगों और आम जनता को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रशासन ने चेतावनी दी है कि जो भी व्यक्ति धारा 163 के नियमों का उल्लंघन कर सड़कों पर हुड़दंग मचाने की कोशिश करेगा, उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।