दिल्ली-NCR रैपिड रेल नेटवर्क से जुड़ेगा मेरठ-हरिद्वार-ऋषिकेश ‘नमो भारत कॉरिडोर’, जानें इसका रूट और पूरा प्लान

Namo Bharat corridor: दिल्ली से हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा अब पहले से कहीं ज्यादा आसान और तेज होने वाली है। केंद्र सरकार ने मेरठ-हरिद्वार-ऋषिकेश नमो भारत (RRTS) कॉरिडोर को मंजूरी दे दी है। करीब 150 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर का डीपीआर (DPR) तैयार किया जा रहा है। इसके पूरा होने पर यह कॉरिडोर दिल्ली-एनसीआर के मौजूदा नमो भारत नेटवर्क से जुड़ जाएगा। इससे श्रद्धालुओं, पर्यटकों और रोजाना सफर करने वालों को बड़ा फायदा मिलेगा।

NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना के पूरा होने के बाद दिल्ली, एनसीआर, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बीच यात्रा का समय कम होगा। हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों तक तेज, सुविधाजनक और निर्बाध यात्रा संभव होगी, जिससे पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

कहां से कहां तक बनेगा यह रूट?

यह नया कॉरिडोर करीब 150 किलोमीटर लंबा होगा, जो दिल्ली-मेरठ नमो भारत कॉरिडोर के आखिरी स्टेशन मोदीपुरम से आगे बढ़ाया जाएगा:-

उत्तर प्रदेश में हिस्सा: यूपी में यह 72 किलोमीटर लंबा होगा, जो मेरठ और मुजफ्फरनगर जिलों से होकर गुजरेगी।

उत्तराखंड में हिस्सा: उत्तराखंड में इसकी लंबाई 78 किलोमीटर होगी, जिसके तहत रुड़की, हरिद्वार और ऋषिकेश को कवर किया जाएगा।

इन प्रमुख स्टेशनों से गुजरेगी रैपिड रेल

यह रैपिड रेल मोदीपुरम से शुरू होकर दौराला, खतौली, मुजफ्फरनगर, पुरकाजी, रुड़की, हरिद्वार में हर की पौड़ी और ऋषिकेश में लक्ष्मण झूला के पास तक जाएगी।

उत्तराखंड और यूपी सरकार मिलकर करेंगी काम

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल खट्टर के बीच हुई एक बैठक के दौरान इस प्रस्ताव को हरी झंडी दी गई। इस कॉरिडोर को नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (NCRTC), उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तराखंड सरकार मिलकर संयुक्त रूप से विकसित करेंगे।

काम में तेजी लाने के लिए उत्तराखंड सरकार ने अतिरिक्त सचिव रीना जोशी को नोडल अधिकारी नियुक्त किया है। वहीं, समय पर जमीन अधिग्रहण और रूट सर्वे के लिए NCRTC और यूपी सरकार ने भी अपने तालमेल अधिकारी तैनात कर दिए हैं।

दिल्ली-NCR और पूरे नेटवर्क से कैसे जुड़ेगा यह कॉरिडोर?

यह नया रूट मोदीपुरम में पहले से बन रहे 82.15 किलोमीटर लंबे दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ नमो भारत कॉरिडोर से सीधे जुड़ जाएगा। इसके फायदे कुछ इस तरह होंगे:-

दिल्ली-एनसीआर से डायरेक्ट एंट्री: यात्री सीधे साहिबाबाद, दुहाई, गुलधर, आनंद विहार और सराय काले खां जैसे स्टेशनों तक आ-जा सकेंगे। नोएडा और गाजियाबाद के लोगों के लिए भी हरिद्वार-ऋषिकेश जाना बेहद आसान हो जाएगा।

सराय काले खां बनेगा महा-हब: सराय काले खां स्टेशन दिल्ली-एनसीआर का सबसे बड़ा इंटरचेंज हब बनने जा रहा है। यहां से यात्री दिल्ली-गुरुग्राम-शाहजहाँपुर-नीमराना-अलवर कॉरिडोर के लिए ट्रेन बदल सकेंगे। यानी उत्तराखंड से आने वाले लोग सीधे गुरुग्राम या अलवर जा पाएंगे।

पानीपत और जेवर एयरपोर्ट की कनेक्टिविटी: यात्री सराय काले खां या हजरत निजामुद्दीन से दिल्ली-सोनीपत-पानीपत कॉरिडोर के लिए भी ट्रेन बदल सकेंगे। इसके अलावा, गाजियाबाद के रास्ते प्रस्तावित गाजियाबाद-नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट कॉरिडोर से सीधे जेवर एयरपोर्ट तक पहुंचा जा सकेगा।

मेट्रो और रेलवे से सीधा जुड़ाव: आनंद विहार स्टेशन पर नमो भारत नेटवर्क से उतरकर यात्री सीधे दिल्ली मेट्रो की ब्लू और पिंक लाइन, आनंद विहार रेलवे टर्मिनल और आनंद विहार ISBT (बस अड्डा) तक बिना किसी परेशानी के पहुंच सकेंगे।

पर्यटन और व्यापार को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

इस कॉरिडोर के पूरी तरह तैयार हो जाने के बाद न केवल सफर का समय बचेगा, बल्कि उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों (हरिद्वार-ऋषिकेश), पर्यटन केंद्रों और वाणिज्यिक (कमर्शियल) शहरों तक पहुंचना बेहद सुगम हो जाएगा, जिससे क्षेत्र के विकास को एक नई रफ्तार मिलेगी।

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पहाड़ों की चोटियों पर बसे भारत के वो मंदिर जहां सिर्फ कदम चलते है!

भारत को मंदिरों का देश कहा जाता है, जहां कई प्राचीन मंदिर पहाड़ों की ऊंची चोटियों पर बने हुए हैं। इन मंदिरों तक पहुंचना आसान नहीं होता, लेकिन भक्त कठिन रास्तों को पार करके भगवान के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पहाड़ों की शांति और सुंदर वातावरण इन मंदिरों की खासियत को और बढ़ा देते हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही प्रसिद्ध पहाड़ी मंदिरों के बारे में, जहां आस्था और प्रकृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है:

आदि बद्री मंदिर – शांत वातावरण में बसा प्राचीन धाम

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उत्तराखंड में स्थित आदि बद्री मंदिर प्राचीन धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि यह मंदिर सरस्वती नदी के उद्गम क्षेत्र के पास स्थित है। यहां पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है और भक्तों को कुछ दूरी पैदल चलकर तय करनी पड़ती है। पहाड़ों के बीच बसे इस मंदिर की यात्रा श्रद्धा, धैर्य और प्रकृति के करीब जाने का अनुभव देती है। यहां का शांत वातावरण मन को सुकून और आध्यात्मिक शांति का एहसास कराता है।

 

मध्यमहेश्वर मंदिर – कठिन रास्तों के बीच आस्था का केंद्र

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उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित मध्यमहेश्वर मंदिर पंच केदारों में से एक है। यह मंदिर हिमालय की ऊंची पहाड़ियों और सुंदर घाटियों के बीच स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए लंबी पैदल यात्रा करनी पड़ती है, क्योंकि सड़क मार्ग सीधे मंदिर तक नहीं पहुंचता। कठिन चढ़ाई के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। यह यात्रा धैर्य, भक्ति और मजबूत इच्छाशक्ति की मिसाल मानी जाती है।

 

तुंगनाथ मंदिर – दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर

तुंगनाथ मंदिर - विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर

 

उत्तराखंड में स्थित तुंगनाथ मंदिर को दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाता है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 12,000 फीट की ऊंचाई पर चंद्रशिला पर्वत के पास स्थित है। यहां पहुंचने के लिए भक्तों को ऊबड़-खाबड़ और चढ़ाई वाले रास्तों से गुजरना पड़ता है। बादलों और पहाड़ों के बीच स्थित यह मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। तुंगनाथ की यात्रा भक्तों को धैर्य और आत्मविश्वास का संदेश देती है।

 

वैष्णो देवी मंदिर – आस्था और विश्वास की कठिन यात्रा

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जम्मू-कश्मीर के कटरा में मां वैष्णो देवी मंदिर त्रिकूट पर्वत पर करीब 5,200 फीट की ऊंचाई पर बना है। माता रानी के दर्शन के लिए भक्तों को कठिन चढ़ाई और लंबी यात्रा पूरी करनी पड़ती है। रास्ते में कई मुश्किलों के बावजूद श्रद्धालु पूरे विश्वास और भक्ति के साथ आगे बढ़ते हैं। मान्यता है कि मां वैष्णो देवी के दर्शन करने से मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

 

केदारनाथ मंदिर – हिमालय की गोद में शिव का पवित्र धाम

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उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ मंदिर भगवान शिव के सबसे प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 3,583 मीटर की ऊंचाई पर हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच स्थित है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को कठिन पैदल यात्रा करनी पड़ती है, क्योंकि मंदिर तक सीधा सड़क मार्ग नहीं है। खराब मौसम और कठिन रास्तों के बावजूद भक्त बाबा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। केदारनाथ की यात्रा धैर्य, विश्वास और अटूट भक्ति का प्रतीक मानी जाती है।

 

Ashadha Amavasya Upay: आज भौमवती अमावस्या पर जानें स्नान–दान का मुहूर्त और किन चीजों का दान करने का मिलता है पुण्य फल

Ashadha Amavasya 2026: मंगलवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को भौमवती अमावस्या भी कहा जाता है। इस बार भौमवती अमावस्या का संयोग आषाढ़ अमावस्या को बन रहा है। इसे हलहारिणी अमावस्या भी कहते हैं। हालांकि, यह साल 2026 की दूसरी भौमवती अमावस्या है। इससे पहले, मंगलवार, 17 फरवरी 2026 को फाल्गुन अमावस्या पर भौमवती अमावस्या का संयोग को हुआ था। इस साल, दूसरी बार भौमवती अमावस्या 14 जुलाई 2026 को आषाढ़ अमावस्या में हो रही है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भौमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और विशेष रूप से पितरों के निमित्त तर्पण व पिंडदान करने का अत्यधिक महत्व है। इसके साथ ही इस दिन मंगल ग्रह के निमित्त पूजा या हनुमान जी की आराधना करने से कर्ज से मुक्ति और मंगल दोषों से राहत मिलती है।

आषाढ़ अमावस्या तिथि

द्रिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ अमावस्या की तिथि 13 जुलाई को शाम 6 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 14 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 14 मिनट पर होगा। उदया तिथि को देखते हुए इस दिन आषाढ़ अमावस्या मानी जा रही है।

आषाढ़ अमावस्या शुभ मुहूर्त

इस दिन स्नान व दान का मुहूर्त सुबह 4 बजकर 30 मिनट से शुरू होगा और सुबह 5 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग जैसे अत्यंत शुभ संयोग बन रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन योगों में की गई पूजा, जप और दान का फल कई गुना बढ़ जाता है।

अमावस्या पर मिलता है दान का अक्ष्य पुण्य 

अमावस्या तिथि पर किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है। इस दिन अन्न और जल जैसे गेहूं, चावल, सत्तू, या मौसमी फल। काले तिल, छाता, चप्पल या सूती वस्त्र जैसे चीजें दान की जा सकती हैं। कई श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर दिनभर भजन-कीर्तन और मंत्र जाप भी करते हैं।

आषाढ़ अमावस्या का महत्व

ग्रह दोष शांति : ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अमावस्या के स्वामी शनि देव हैं। इस दिन हनुमान जी की पूजा करने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव कम होता है। साथ ही, मंगलवार का संयोग होने से राहू-केतु और मंगल के अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है।

पितृ दोष से मुक्ति : जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए आषाढ़ अमावस्या पर पिंड दान, तर्पण और अन्नदान करना अमोघ उपाय माना गया है। इससे अतृप्त पितर प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

Gupt Navratri Kalash Sthapana Subh Muhurat: आषाढ़ नवरात्रि पर बना रहा शश महालक्ष्मी योग, जानें महत्व और कलश स्थापना का मुहूर्त

Gupt Navratri Kalash Sthapana Subh Muhurat: आषाढ़ नवरात्रि पर बना रहा शश महालक्ष्मी योग, जानें महत्व और कलश स्थापना का मुहूर्त

Gupt Navratri Kalash Sthapana Subh Muhurat: आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नौ दिनों तक चलने वाला नवरात्रि पर्व आरंभ होने जा रहा है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे हिंदू वर्ष में चार नवरात्रि पर्व आते हैं, जिनमें से दो गृहस्थ जन काफी धूमधाम से मनाते हैं। जबकि दो गुप्त नवरात्रि पर्व आषाढ़ और माघ मास में आते हैं। इसमें देवी की नौ महाविद्याओं की साधना की जाती है।

इसमें भी मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा विधि-विधान की जाती है। सामान्य नवरात्रि की तरह इसमें अधिक सार्वजनिक आयोजन देखने को नहीं मिलते, लेकिन देवी उपासना करने वाले साधकों के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान पूरी श्रद्धा, संयम और विधि-विधान के साथ की गई पूजा कई गुना अधिक फल देने वाली मानी जाती है।

शश महालक्ष्मी योग का संयोग

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस बार आषाढ़ गुप्त नवरात्रि पर शश महालक्ष्मी नाम का एक दुर्लभ शुभ योग बन रहा है। देवघर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुदगल ने लोकल 18 को बताया कि यह अत्यंत शुभ संयोग दस महाविद्याओं की साधना और धन-समृद्धि की प्राप्ति के लिए बेहद फलदायी माना जाता है। शश-महालक्ष्मी जैसे दुर्लभ योग साधकों की सोई हुई किस्मत जगाने, भौतिक सुख-सुविधाओं की वृद्धि और सात पीढ़ियों तक की दरिद्रता मिटाने में अत्यंत शक्तिशाली माने जाते हैं। गुप्त नवरात्रि का उद्देश्य गुप्त मनोकामनाओं की पूर्ति और तंत्र साधना करना होता है।

आषाढ़ नवरात्रि कलश स्थापना मुहूर्त

पंडित नंद किशोर मुदगल ने बताया कि इस वर्ष आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की शुरुआत 15 जुलाई से हो रही है। जो श्रद्धालु अपने घर में कलश स्थापना करना चाहते हैं, उनके लिए सुबह 5 बजकर 33 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 30 मिनट तक अमृतकाल और पुष्य नक्षत्र रहेगा, जो शुभ माना जाता है। उन्होंने बताया कि इसी अवधि में कलश स्थापना कर मां दुर्गा का आह्वान करना उत्तम माना गया है।

आषाढ़ नवरात्रि पर इस विधि से करें कलश स्थापना

ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि गुप्त नवरात्रि के दौरान अपने घर में कलश स्थापना करने के लिए सबसे पहले घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। गंगाजल का छिड़काव जरूर करें। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर माता की दस महाविद्याओं का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें।

मिट्टी या तांबे के कलश में साफ जल भरकर आम के पत्ते और नारियल स्थापित करें और विधि-विधान से मां का आवाहन करें। कलश स्थापना के बाद अखंड दीप जलाना, दुर्गा सप्तशती का पाठ करना और नियमित रूप से माता की आरती करना भी बेहद शुभ माना गया है।

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Shravan Essay: आस्था, प्रकृति और पवित्रता का उत्सव श्रावण मास, पढ़ें रोचक निबंध

Images and photographs related to the sacred festival of the Shravan month, featuring Lord Shiva, devotees performing worship, and the Kanwar Yatra, a procession that unites religion, nature, and human life

Shravan Festival Essay: श्रावण मास के दौरान देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करके शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग और पुष्प अर्पित करते हैं। 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है। इस महीने के प्रत्येक सोमवार को पड़ने वाले सावन सोमवार व्रत को अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की उपासना करने से मनोकामनाओं की पूर्ति और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

यहां श्रावण मास पर एक रोचक, सरल और ज्ञानवर्धक हिन्दी निबंध प्रस्तुत है।
 

प्रस्तावना

हिंदू कैलेंडर में 'श्रावण मास' यानी सावन को सभी महीनों में सबसे पवित्र और आनंददायक माना गया है। यह केवल एक महीना नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आत्मा का उत्सव है। ग्रीष्म ऋतु की तपती गर्मी के बाद जब सावन की फुहारें धरती पर गिरती हैं, तो न केवल प्रकृति का श्रृंगार होता है, बल्कि इंसानी मन भी भक्ति और उत्साह से सराबोर हो उठता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो सावन में वर्षा ऋतु के कारण हमारी पाचन शक्ति यानी जठराग्नि मंद हो जाती है। इसलिए आयुर्वेद और शास्त्रों में इस महीने के दौरान हल्का, सुपाच्य और सात्विक भोजन करने की सलाह दी गई है।

 

सावन का धार्मिक महत्व और शिव भक्ति

श्रावण मास पूरी तरह से देवाधिदेव महादेव भगवान शिव को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी महीने में समुद्र मंथन हुआ था। मंथन से निकले हलाहल विष को ब्रह्मांड की रक्षा के लिए भगवान शिव ने अपने कंठ में समाहित कर लिया था, जिससे उनका नाम 'नीलकंठ' पड़ा। विष की तीव्र जलन को शांत करने के लिए सभी देवताओं ने शिव जी पर शीतल जल वर्षण किया था। यही कारण है कि सावन में शिव जी का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने की अनूठी परंपरा है।

 

प्रकृति का अनुपम श्रृंगार

सावन का महीना अध्यात्म के साथ-साथ पर्यावरण के उत्सव का भी समय है। रिमझिम बारिश के कारण सूखी धरती पर मखमली हरी घास उग आती है, पेड़ों पर नए पत्ते आ जाते हैं और नदियां-झरने कल-कल कर बहने लगते हैं।

 

कांवड़ यात्रा

सावन के दौरान देश भर में भक्ति का एक अद्भुत रंग देखने को मिलता है। लाखों 'कांवड़िए' केसरिया वस्त्र धारण कर, नंगे पैर पवित्र नदियों से जल भरकर लाते हैं और मीलों पैदल चलकर अपने स्थानीय शिवलिंगों का अभिषेक करते हैं। 'बम-बम भोले' के जयकारों से पूरा माहौल शिवमय हो जाता है।

 

सावन के सोमवार

इस महीने में आने वाले सोमवार के व्रत का विशेष महत्व है। कुमारी कन्याएं अच्छे वर के लिए और विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं। इस महीने में हरे रंग का विशेष महत्व है। प्रकृति की इस हरियाली से तालमेल बिठाते हुए महिलाएं हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियां पहनती हैं। यह रंग समृद्धि, खुशहाली और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

 

सावन के लोक-रंग और परंपराएं

सावन का महीना भारतीय लोक संस्कृति को जीवंत कर देता है। गांवों से लेकर शहरों तक, बागों में पेड़ों पर झूले डाल दिए जाते हैं। मल्हार और कजरी जैसे पारंपरिक लोकगीत हवाओं में गूंजने लगते हैं।

 

रसोई के लिहाज से भी यह महीना बेहद स्वादिष्ट होता है। बारिश की फुहारों के बीच घरों में गरमा-गरम घेवर, मालपुआ, खीर और पकोड़े बनाए जाते हैं। इस महीने में सात्विक जीवनशैली का पालन किया जाता है, जिससे तन और मन दोनों शुद्ध रहते हैं।

 

सावन के प्रमुख त्योहार में हरियाली तीज, नाग पंचमी और रक्षाबंधन पर्व मनाया जाता है।

 

क्या है खास?

हरियाली तीज- महिलाएं सुहाग की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और पारंपरिक झूले झूलती हैं।

नाग पंचमी- नाग देवताओं की पूजा की जाती है, जो जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

रक्षाबंधन- श्रावण पूर्णिमा के दिन भाई-बहन के पवित्र प्रेम का यह त्योहार मनाया जाता है।

 

उपसंहार

श्रावण मास हमें सिखाता है कि कैसे ईश्वर की भक्ति, प्रकृति के सौंदर्य और मानवीय रिश्तों को एक सूत्र में पिरोया जाता है। यह महीना हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और जीवन को नए उत्साह से जीने की प्रेरणा देता है। सावन की हर बूंद धरती को जीवन देती है और इसकी भक्ति इंसानी जीवन को धन्य बनाती है। यह महीना केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति की हरियाली, वर्षा की फुहारों और आध्यात्मिक चेतना का भी संदेश देता है। 

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Badrinath Dham Donation Case: राम मंदिर के बाद अब बद्रीनाथ धाम में चढ़ावे की हेराफेरी का आरोप, SIT ने दान अधिकारी प्रमोद नौटियाल को किया गिरफ्तार

Badrinath Dham Donation Case: अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले के बाद अब बद्रीनाथ धाम से भी ऐसा ही घटना सामने आई है। दरअसल, सोमवार को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने बद्रीनाथ धाम में चढ़ावा और दान से जुड़े अधिकारी प्रमोद नौटियाल को कथित दान फंड में गड़बड़ी के मामले में गिरफ्तार किया है।

नौटियाल को बीती रात करीब 8 बजे देहरादून से गिरफ्तार किया गया और बाद में चल रही जांच के सिलसिले में बद्रीनाथ लाया गया।

SIT ने कहा कि नौटियाल पर इस मामले में गंभीर आरोप हैं और संकेत दिया कि जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, कई अन्य लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।

बता दें कि यह गिरफ्तारी देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल बद्रीनाथ धाम में चढ़ावे की कथित हेराफेरी के मामले की जांच में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

मंदिर में दान की गिनती में गड़बड़ी

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक आंतरिक जांच में 2 जुलाई, 2026 को ‘थाली’ में चढ़ाए गए दान की गिनती के दौरान गड़बड़ी पाई गई। जिसके आधार पर FIR दर्ज की गई और इसके बाद जांच का दायरा बढ़ा दिया गया।

अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि मंदिर के दान-गणना क्षेत्र से नकदी और चढ़ावे की वस्तुएं चोरी हो गईं। शुरुआती रिपोर्टों में इस मामले को श्रद्धालुओं के दान और कीमती सामान की कथित चोरी या गबन के रूप में बताया गया है।

इस मामले में शिकायत के बाद पहले विभागीय जांच हुई, जिसके बाद पुलिस ने आपराधिक कार्यवाही शुरू की।

मंदिर की जांच से आगे बढ़ा मामला

अब यह जांच मंदिर प्रशासन की आंतरिक जांच से आगे बढ़ चुकी है और पुलिस तथा स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) इसे संभाल रही हैं। गिरफ्तारी से पहले, नौटियाल ने कथित तौर पर FIR और अपने सस्पेंशन, दोनों को ही हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

बता दें कि SIT द्वारा उन्हें हिरासत में लिए जाने के बाद, जांच अधिकारी कथित गड़बड़ियों से जुड़े सभी पहलुओं की जांच कर रहे हैं।

SIT ने यह भी संकेत दिया है कि जांच जारी है और अगर सबूतों से अन्य लोगों की संलिप्तता साबित होती है, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।

मामले का बड़ा महत्व

यह मामला इसलिए भी ज्यादा चर्चा में है, क्योंकि बद्रीनाथ धाम देश के सबसे पवित्र हिंदू तीर्थ स्थलों में से एक है। नतीजतन, भक्तों के चढ़ावे के कथित दुरुपयोग को न केवल एक वित्तीय मामला, बल्कि जन-विश्वास का मुद्दा भी माना जा रहा है। इस विवाद के बाद कई धार्मिक नेताओं और जन-प्रतिनिधियों ने कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

उत्तराखंड सरकार के अधिकारियों ने भी कहा है कि जांच के दौरान जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

जांच जारी है

डोनेशन फंड में कथित गड़बड़ी की चल रही जांच में SIT द्वारा प्रमोद नौटियाल की गिरफ्तारी सबसे नया कदम है। जांच करने वाले अधिकारी मंदिर में चढ़ावे के लेन-देन, डोनेशन गिनने की प्रक्रिया और इस मामले से जुड़े लोगों की भूमिका की जांच कर रहे हैं।

SIT का कहना है कि जांच जारी है और संकेत दिया है कि जैसे-जैसे और सबूत मिलेंगे, आगे और कार्रवाई की जा सकती है।

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S Janaki passed away: 48 हजार से ज्यादा गाने गाए, पद्म भूषण को ठुकराया, राष्ट्रपति से लेकर पीएम मोदी ने ‘जानकी अम्मा’ को दी श्रद्धांजलि

S Janaki passed away: दक्षिण भारत की ‘नाइटिंगेल’ के नाम से मशहूर दिग्गज गायिका एस. जानकी का शनिवार को मैसूर में निधन हो गया। वह 88 साल की थीं। भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के कई लोगों ने सोशल मीडिया पर उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय के साथ-साथ सुपरस्टार रजनीकांत, कमल हासन और अन्य लोगों ने भी जानकी को श्रद्धांजलि दी।

राष्ट्रपति मुर्मू ने जानकी अम्मा को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर उन्हें याद किया।

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प्रधानमंत्री ने X पर जानकी को याद किया। उन्होंने लिखा, “मशहूर प्लेबैक सिंगर एस. जानकी अम्मा का निधन संगीत और संस्कृति की दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है। अलग-अलग भाषाओं में उनके गाने कई पीढ़ियों के बीच लोकप्रिय रहे। उन्होंने बेमिसाल खूबसूरती और विविधता के साथ हर भावना को आवाज़ दी। उनकी धुनें आने वाले सालों में भी सुनने वालों को मंत्रमुग्ध करती रहेंगी। दुख की इस घड़ी में उनके परिवार, अनगिनत प्रशंसकों और पूरे संगीत जगत के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं। ओम शांति।”

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और एक्टर विजय ने जानकी को श्रद्धांजलि दी और उनकी विरासत को याद किया। उन्होंने X पर लिखा, “भारतीय फ़िल्म संगीत की दुनिया में अपनी अनोखी आवाज़ से कई पीढ़ियों का दिल जीतने वाली मशहूर प्लेबैक सिंगर श्रीमती एस. जानकी के निधन से बहुत दुख हुआ है। तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, हिंदी और दूसरी कई भाषाओं में हज़ारों गाने गाकर उन्होंने संगीत की दुनिया पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है।”

उन्होंने आगे कहा, “कई नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड्स समेत अनगिनत प्रतिष्ठित पुरस्कार पाने वाली जानकी जी अपनी मीठी आवाज़, भावनाओं को व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता और संगीत के प्रति अटूट समर्पण के कारण हमेशा अपने फ़ैन्स के दिलों में बसी रहेंगी। उनका निधन भारतीय संगीत जगत के लिए एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। मैं उनके शोक-संतप्त परिवार, फ़िल्म जगत, संगीत कलाकारों और दुनिया भर में फैले उनके फ़ैन्स के प्रति अपनी गहरी संवेदना और सहानुभूति व्यक्त करता हूँ। मैं उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं।”

बोनी कपूर ने X पर लिखा, “जिस आवाज़ ने अनगिनत भावनाओं को ज़िंदगी दी, वह अब खामोश हो गई है, लेकिन उसकी गूंज पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी। दक्षिण भारत की सदाबहार ‘नाइटिंगेल’ और महान प्लेबैक सिंगर एस. जानकी अम्मा के निधन से गहरा दुख हुआ है। छह दशकों से भी ज़्यादा समय तक, उन्होंने अपनी आवाज़ से लाखों लोगों के दिलों को छुआ; उनकी आवाज़ में खुशी, प्यार, भक्ति, तड़प और दुख को बेहद खूबसूरती से बयां करने की अद्भुत क्षमता थी। उनके गाने भाषाओं, पीढ़ियों और सीमाओं से परे रहे और भारत की संगीत विरासत का एक अहम हिस्सा बन गए। भारत ने अपने संगीत के सबसे अनमोल रत्नों में से एक को खो दिया है। उनके परिवार, चाहने वालों और उन लाखों प्रशंसकों के प्रति गहरी संवेदनाएं, जिनकी ज़िंदगी को उन्होंने अपनी असाधारण कला से समृद्ध किया। ओम शांति। जानकी अम्मा, आपकी आत्मा को अनंत शांति मिले।”

चिरंजीवी ने X पर लिखा, “जनकम्मा गारू के निधन की खबर ने मेरे दिल को गहरा सदमा पहुँचाया है। मेरे फिल्मी सफर में, उन्होंने अनगिनत यादगार गानों को अपनी बेमिसाल आवाज़ दी। स्क्रीन पर हमने जो भावनाएँ दिखाईं, उनमें जान उनकी आवाज़ ने ही डाली थी। मेरे करियर के जिन गानों को दर्शक आज भी प्यार से याद करते हैं, उनके पीछे जनकम्मा गारू की मीठी आवाज़ है। जब भी वे गाने बजते हैं, तो वे दिन… वे यादें… एक बार फिर मेरी आँखों के सामने ताज़ा हो जाती हैं। जनकम्मा गारू सिर्फ़ एक गायिका नहीं थीं… वह एक असाधारण कलाकार थीं जिन्होंने भावनाओं को सुरों में ढाला। उनका गाया हर गाना एक याद है… एक एहसास है… एक जीवन भर का रिश्ता है। आज हमने संगीत की दुनिया की एक महान हस्ती को खो दिया है। लेकिन उनके गाने पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और हमारी ज़िंदगी के बैकग्राउंड स्कोर के तौर पर हमेशा गूंजते रहेंगे। मैं श्रीमती एस. जानकी गारू के परिवार, उनके चाहने वालों और उन्हें पसंद करने वाले लाखों संगीत प्रेमियों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूँ। जनकम्मा गारू… आपकी आवाज़ अमर है। ओम शांति।”

रजनीकांत ने X पर लिखा, “अपनी सुरीली आवाज़ से कई पीढ़ियों के लोगों को खुश करने वाली उनकी आत्मा को शांति मिले।”कमल हासन, जिन्होंने जानकी के साथ कई यादगार गाने गाए हैं, ने एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि लिखी है, जिसका अर्थ है: “यह गाना हमेशा गूंजता रहेगा। माँ, मैं वह प्यार दोबारा पाने के लिए कहाँ जाऊँगा? कई लोग ऐसा दुख लिए घूमते हैं जिसे वे कभी भुला नहीं पाते। उन सभी के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएँ।”

सिंगर उनके काम के साथ ही बेबाक अंदाज के लिए भी जानी जाती थीं। साल 2013 में उन्होंने भारत सरकार के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण को लेने से साफ मना कर दिया था। इसके बाद वो खबरों में छाई रही थीं। जानकी इस सम्मान को इसलिए नहीं रखना चाहति थीं, क्योंकि वह भारत रत्न की मांग कर रही थीं।

जानकी 20 साल की उम्र में प्लेबैक सिंगिंग करने के लिए चेन्नई चली गईं। उनका पहला गाना 1957 की तमिल फ़िल्म ‘विधिइन विलायाट्टु’ के लिए था और बाद में उन्होंने तेलुगु फ़िल्म ‘M.L.A.’ के लिए भी गाना गाया। अपने करियर के दौरान, उन्होंने 20 भारतीय भाषाओं में गाने गाए, जिनमें तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम, हिंदी, संस्कृत, ओडिया, तुलु, उर्दू, पंजाबी, बडागा, बंगाली और कोंकणी शामिल हैं। साथ ही, उन्होंने अंग्रेज़ी, जापानी, जर्मन और सिंहली जैसी विदेशी भाषाओं में भी गाने गाए। उन्हें कई सम्मान भी मिले, जिनमें चार नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड और 33 स्टेट फ़िल्म अवॉर्ड शामिल हैं।

CM योगी का तंज, सपा अध्यक्ष भी भगवा पहनकर कांवड़ यात्रा में शामिल होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं

Chief Minister Yogi Adityanath News: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में अब धार्मिक आस्था का सम्मान किया जा रहा है। अयोध्या से सरयू का जल लेकर भदेश्वरनाथ धाम जाने वाले कांवड़ यात्रियों पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा की जाती है, जबकि पहले कांवड़ यात्रा और अन्य धार्मिक आयोजनों पर रोक लगाई जाती थी। आज श्रद्धालुओं का उत्साह और आस्था देखकर लगता है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष भी भगवा वस्त्र पहनकर कांवड़ यात्रा में शामिल होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। विपक्ष को हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़ाने, जय श्रीराम बोलने वालों पर कार्रवाई कराने, परशुरामपुर दंगे और धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाने वाली घटनाओं के लिए जनता से माफी मांगनी चाहिए।

 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को बस्ती के हर्रैया व कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र में 504 करोड़ रुपए से अधिक लागत की 77 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण/ शिलान्यास किया। इसके अलावा विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों को प्रमाणपत्र/ स्वीकृतिपत्र और सहायता सामग्री का वितरित किया।

सपा के जिला अध्यक्ष का सीएम योगी ने सुनाया किस्सा

मुख्यमंत्री ने कहा कि 2017 से पहले सरकारी धन कब्रिस्तानों की बाउंड्रीवाल बनाने और अवैध कब्जों पर खर्च होता था, जबकि आज वही धन धार्मिक स्थलों के पुनरुद्धार और विकास में लगाया जा रहा है। उस समय वक्फ बोर्ड के नाम पर गरीबों, दलितों और वंचितों की जमीनों पर कब्जे किए जाते थे और समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी तथा कांग्रेस के शासन में यह आम बात थी। एक पुरानी घटना का जिक्र करते हुए कहा कि जब वह गोरखपुर के सांसद थे, तब समाजवादी पार्टी के एक जिला अध्यक्ष स्वयं उनके पास शिकायत लेकर आए थे कि उनके घर के पास कब्रिस्तान के नाम पर जबरन कब्जा किया जा रहा है। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को भेजकर कब्जा हटवाया और उनकी जमीन बचाई। उस समय सपा सरकार को केवल कब्रिस्तान दिखाई देता था, आम जनता नहीं।

सपा के शासन में शिक्षा व्यवस्था नकल संस्कृति की शिकार थी

मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले विकास योजनाएं कागजों तक सीमित रहती थीं, जबकि आज शिलान्यास और लोकार्पण की परियोजनाएं धरातल पर दिखाई देती हैं। उन्होंने हर्रैया में बन रहे मुख्यमंत्री कंपोजिट विद्यालय का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां प्री-प्राइमरी से 12वीं तक आधुनिक शिक्षा एक ही परिसर में उपलब्ध होगी। प्रत्येक विद्यालय पर 27 से 30 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जहां स्मार्ट क्लास, आधुनिक भवन, फर्नीचर और सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

 

समाजवादी पार्टी के शासन में शिक्षा व्यवस्था नकल संस्कृति की शिकार थी और युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो गया था। किसानों को सुविधाएं नहीं मिलती थीं, गरीबों को योजनाओं का लाभ नहीं मिलता था और बिजली व्यवस्था इतनी खराब थी कि बस्ती में लोग बिजली के तारों पर कपड़े सुखाते थे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जनता बिजली संकट से जूझ रही थी जबकि सैफई में फिल्मी कलाकारों के कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे।

राम मंदिर को लेकर विपक्ष कहता था कि खून की नदियां बहेंगी

मुख्यमंत्री ने कहा कि हनुमानगढ़ी की पवित्र सीढ़ियों पर नमाज पढ़वाने का काम इन्हीं लोगों ने किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि इन लोगों ने हर प्रमुख धर्मस्थल को विवादित बनाने का प्रयास किया और अयोध्या में भी लगातार विवाद खड़ा करने की राजनीति की। एक समय ऐसा था जब अयोध्या में कोई जय श्रीराम का उद्घोष कर देता था तो उसके खिलाफ लाठी और गोली चलती थी। उन्होंने आरोप लगाया कि राम मंदिर निर्माण का विरोध करने वाले कहते थे कि यदि मंदिर बना तो खून की नदियां बहेंगी। लेकिन हमने कहा था कि एक मच्छर भी नहीं मरेगा और आज पूरा देश देख रहा है कि राम मंदिर का भव्य निर्माण हुआ, प्राण प्रतिष्ठा भी संपन्न हुई और कहीं कोई अशांति नहीं हुई। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को कोई नहीं रोक पाया और यह करोड़ों रामभक्तों की आस्था, विश्वास और संकल्प की जीत है।

सीएम ने दुर्योधन के शासन से की सपा सरकार की तुलना  

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में प्रदेश में यह कहावत प्रचलित हो गई थी, देख सपाई, बिटिया घबराई। उस समय महिलाओं और बेटियों की सुरक्षा खतरे में थी और कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी। जब सरकार ही बहन-बेटियों की सुरक्षा के लिए खतरा बन जाए तो उसकी तुलना दुर्योधन के शासन से ही की जा सकती है। पहले बस्ती सहित प्रदेश में दुर्गा पूजा, होली, रामनवमी जैसे पर्वों पर दंगे होते थे। परशुरामपुर दंगे का उल्लेख करते हुए कहा कि दलितों और गरीबों की बस्तियां जला दी गईं, लेकिन सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। उस समय वे गोरखपुर से आकर पीड़ितों के बीच उनका दर्द बांटने आए थे। उन्होंने दावा किया कि पिछले नौ वर्षों में प्रदेश में कोई बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ और सभी त्योहार शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुए हैं। अब अपराधी कानून से डरते हैं।

करीब 1500 मंदिरों का पुनरुद्धार कराया

सीएम योगी ने कहा कि मखौड़ा धाम वही पावन भूमि है, जहां महाराजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया था और उसके फलस्वरूप भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया। मखौड़ा धाम, बाबा भदेश्वरनाथ धाम, तपसी धाम तथा महान साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जन्मस्थली इस क्षेत्र की गौरवशाली पहचान हैं। जनता जब अच्छे जनप्रतिनिधियों का चुनाव करती है, तभी विकास धरातल पर दिखाई देता है। मखौड़ा धाम, भदेश्वरनाथ धाम और तपसी धाम का तेजी से विकास कराया जा रहा है। कर्ण मंदिर विवाद का समाधान होने के बाद वहां भी सौंदर्यीकरण का कार्य शुरू किया जा रहा है। 

 

सीएम योगी ने कहा कि 84 कोसी परिक्रमा का मार्ग मखौड़ा धाम से शुरू होता है और इसे श्रद्धालुओं की सुविधा के साथ अयोध्या रिंग रोड के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। योगी ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी की सरकारें 84 कोसी, 14 कोसी और पंचकोसी परिक्रमा तक रोकती थीं, जबकि भाजपा सरकार धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए तीर्थ स्थलों का विकास कर रही है। प्रदेश में लगभग 1500 मंदिरों का पुनरुद्धार कराया जा चुका है और सरकार बदलने के साथ परिणाम भी बदल गए हैं। भाजपा सरकार विरासत और विकास को साथ लेकर चल रही है।

 

विकसित भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्प को पूरा करने के लिए विकसित उत्तर प्रदेश और विकसित बस्ती का निर्माण किया जा रहा है। बस्ती में मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, कृषि सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, मखौड़ा धाम और भदेश्वरनाथ धाम सहित अनेक विकास परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि हर्रैया और बस्ती में पिछले नौ वर्षों में जितना विकास हुआ, उतना आजादी के बाद कभी नहीं हुआ।

 

इस अवसर पर प्रदेश सरकार में मंत्री सूर्य प्रताप शाही, विधायक अजय सिंह, क्षेत्रीय अध्यक्ष विनोद राय, जिला अध्यक्ष विवेकानंद मिश्र, विधायक दूध राम, विधान परिषद सदस्य सुभाष यदुवंश, जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी, गो सेवा आयोग के उपाध्यक्ष महेश शुक्ल, पूर्व विधायक चंद्र प्रकाश शुक्ला, दयाराम चौधरी, रवि सोनकर आदि मौजूद रहे।

चंपत राय समेत 3 दिग्गजों की डिजिटल ID ब्लॉक, आखिर क्यों लिया गया यह फैसला?

Champat Rai digital ID blocked

Champat Rai digital ID blocked: अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा और दान चोरी प्रकरण के बाद अब एक और बड़ा भूचाल आ गया है। राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने एक बेहद कड़ा और अप्रत्याशित कदम उठाते हुए ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय, सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा और गोपाल राव की डिजिटल ID को तुरंत प्रभाव से डीएक्टिवेट (ब्लॉक) कर दिया है। अब अयोध्या में इन दिग्गजों की सिफारिश पर VIP या VVIP एंट्री नहीं मिल पाएगी। आइए जानते हैं क्या है यह पूरा माजरा और क्यों लिया गया इतना बड़ा फैसला।

क्यों ब्लॉक हुई डिजिटल ID?

दरअसल, यह पूरा एक्शन राम मंदिर में हुए चढ़ावा और दान चोरी प्रकरण से जुड़ा हुआ है। इस मामले की जांच कर रही SIT (विशेष जांच दल) की तफ्तीश में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ। सूत्रों और SIT जांच के मुताबिक, ट्रस्ट के इन वरिष्ठ पदाधिकारियों की डिजिटल ID का दुरुपयोग करके भारी संख्या में VIP और VVIP दर्शन पास जारी किए गए थे। ALSO READ: अयोध्या आहत है… रामलला के घर 'लूट' ने आस्था को घायल किया, सरयू किनारे गूंज रहा एक ही सवाल— 'अब न्याय कब?'

 

डिजिटल ID का मुख्य काम मंदिर दर्शन के लिए विशेष पास बनाना था। पास जारी करने में किसी भी तरह की और अनियमितता या हेरफेर न हो, इसलिए ट्रस्ट ने यह 'डिजिटल स्ट्राइक' की है। दूसरी तरफ, चढ़ावा चोरी मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपियों से SIT लगातार सघन पूछताछ कर रही है, जिससे कई और राज खुलने की उम्मीद है।

अब किसे मिली यह जिम्मेदारी?

ट्रस्ट में हुए इस बड़े फेरबदल के बाद अब जिम्मेदारी के समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। यह सख्त फैसला ट्रस्ट के कार्यवाहक महासचिव कृष्ण मोहन को नई जिम्मेदारी मिलने के ठीक बाद लिया गया है। अब चंपत राय और अनिल मिश्रा की जगह ट्रस्ट के सदस्य और निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेन्द्र दास को विशिष्ट (VIP) पास जारी करने का अधिकार सौंप दिया गया है। ALSO READ: राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के बाद श्रद्धालुओं की संख्या घटी, अयोध्या की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर

क्या है अयोध्या से जुड़ा यह पूरा मामला?

उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले अयोध्या के भव्य राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले दान और चढ़ावे की रकम में हेराफेरी (चोरी) का मामला सामने आया था। करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े इस मंदिर में वित्तीय गड़बड़ी की बात सामने आते ही हड़कंप मच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच SIT को सौंपी गई।

 

जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, इसमें न सिर्फ पैसों की चोरी बल्कि VIP पास के काले खेल का भी पर्दाफाश हुआ। वीआईपी पास के जरिए अवैध रूप से लोगों को दर्शन कराने और उसमें इन डिजिटल आईडी के दुरुपयोग की आशंका सच साबित होती दिख रही है। इसी के बाद ट्रस्ट को अपनी साख बचाने और पारदर्शिता लाने के लिए अपने ही सबसे बड़े चेहरों (चंपत राय व अन्य) के खिलाफ इतना सख्त कदम उठाना पड़ा।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 

 

Avatar Meher Baba: अवतार मेहेर बाबा कौन थे, कब और क्यों मनाया जाता है मौन पर्व?

The picture shows Avatar Meher Baba, who observed silence continuously for 44 years

Spiritual Guru Merwan Sheriar Irani: अवतार मेहेर बाबा 20वीं शताब्दी के प्रसिद्ध आध्यात्मिक संत और गुरु थे। उनका वास्तविक नाम मेरवान शेरियार ईरानी था। वे प्रेम, करुणा, सेवा और मानव एकता का संदेश देने के लिए जाने जाते हैं। मेहेर बाबा का सबसे अनूठा संकल्प था कि उन्होंने 10 जुलाई 1925 से आजीवन मौन धारण किया और फिर कभी बोलकर संवाद नहीं किया। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में हर वर्ष 10 जुलाई को मौन पर्व/ Silence Day मनाया जाता है।ALSO READ: कब है गुरु पूर्णिमा 2026 में? जानें तिथि, मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि

 

अवतार मेहेर बाबा कौन थे?

जन्म और मूल नाम: उनका जन्म 25 फरवरी 1894 को पुणे में एक पारसी (ईरानी) परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम मेरवान शेरियर इरानी था। 'मेहेर बाबा' नाम उन्हें उनके शुरुआती शिष्यों ने दिया, जिसका अर्थ है 'दयालु पिता'।

 

आध्यात्मिक यात्रा: जब वे 19 वर्ष के थे, तब उनकी मुलाकात एक प्रसिद्ध सूफी संत हजरत बाबाजान से हुई, जिन्होंने मेरवान के भीतर आध्यात्मिक चेतना जागृत की। इसके बाद वे शिरडी के साईं बाबा, उपासना महाराज, नारायण महाराज और ताजुद्दीन बाबा जैसे महान आध्यात्मिक गुरुओं के संपर्क में आए।ALSO READ: Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी से शुरू होंगे चातुर्मास, 4 महीने के लिए लग जाएगी मंगल कार्यों पर रोक

 

कार्य: उन्होंने महाराष्ट्र के अहमदनगर के पास 'मेहेराबाद' को अपना मुख्य केंद्र बनाया। उन्होंने कुष्ठ रोगियों, गरीबों और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों, जिन्हें वे 'मस्त' कहते थे की सेवा के लिए कई औषधालय, स्कूल और आश्रम खोले।

 

प्रसिद्ध संदेश: उनका सबसे प्रसिद्ध कथन है: 'I have come not to teach, but to awaken' (उन्होंने अपने प्रसिद्ध 'यूनिवर्सल मैसेज'/ Universal Message में कहा था, मैं यहां सिखाने नहीं, बल्कि जगाने आया हूं) और उनका एक सार्वभौमिक नारा है— 'Don't worry, be happy' (चिंता मत करो, खुश रहो)। 31 जनवरी 1969 को मेहराबाद, अहमदनगर (महाराष्ट्र) में उन्होंने महासमाधि ली। 

 

मौन पर्व (Silence Day) कब मनाया जाता है?

मेहेर बाबा के अनुयायियों और प्रेमियों द्वारा हर साल 10 जुलाई को 'मौन पर्व' के रूप में मनाया जाता है। आध्यात्मिक गुरु मेहेर बाबा के अनुयायियों के लिए आज का दिन बेहद खास है। मेहेर बाबा ने 10 जुलाई 1925 से आजीवन मौन धारण किया था, इसलिए उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए प्रतिवर्ष 10 जुलाई को 'मौन दिवस' मनाया जाता है।

 

मौन पर्व क्यों मनाया जाता है?

मेहेर बाबा ने 10 जुलाई 1925 को मौन धारण किया था, जो उनके जीवन के अंत (1969 में देहत्याग) तक यानी 44 वर्षों तक लगातार जारी रहा। इसी ऐतिहासिक दिन की याद में हर साल 10 जुलाई को मौन पर्व मनाया जाता है। 

 

बाबा के मौन रहने और इस पर्व को मनाए जाने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

 

शब्दों से परे संवाद: मेहेर बाबा का मानना था कि ईश्वर अनादि काल से मौन रहकर काम कर रहा है। इंसानों ने ईश्वर की वाणी यानी शब्दों को समझने के बजाय उन पर विवाद करना शुरू कर दिया। इसलिए उन्होंने कहा कि वे वाणी से नहीं, बल्कि सीधे लोगों के 'हृदय' से संवाद करेंगे।

 

आध्यात्मिक अनुशासन: जब बाबा मौन थे, तो वे शुरू में एक 'अल्फाबेट बोर्ड'/ अक्षर पट्टिका की मदद से और बाद में केवल हाथ के इशारों से बात करते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को सिखाया कि जीभ का मौन दरअसल मन को शांत करने और आंतरिक ऊर्जा को संचित करने की पहली सीढ़ी है।

 

प्रेम की गहराई: बाबा के शिष्यों के अनुसार, बाबा का कहना था कि जब दो लोग गुस्से में होते हैं तो उनके दिलों की दूरी बढ़ जाती है, इसलिए वे चिल्लाते हैं। लेकिन जब दो लोग गहरे प्रेम में होते हैं, तो वे बहुत धीरे बोलते हैं, और जब प्रेम पराकाष्ठा पर होता है, तो शब्दों की जरूरत ही नहीं पड़ती; केवल मौन ही काफी होता है।

 

मौन पर्व कैसे मनाया जाता है?

हर साल 10 जुलाई को मेहेर बाबा के अनुयायी स्वेच्छा से 24 घंटे (9 जुलाई की आधी रात से 10 जुलाई की आधी रात तक) का पूर्ण मौन व्रत रखते हैं। आज भी इस दिन वे अपनी सामान्य दिनचर्या के काम करते हुए भी किसी शब्द का उच्चारण नहीं करते और ईश्वर के नाम का मानसिक स्मरण करते हैं। उनका प्रमुख आश्रम मेहराबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र) में स्थित है, जहां देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। उनके अनुयायी भारत के अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और अन्य देशों में भी बड़ी संख्या में हैं। 

 

अवतार मेहेर बाबा मौन पर्व- FAQs

 

1. अवतार मेहेर बाबा कौन थे?

वे 20वीं शताब्दी के प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु थे, जिन्होंने प्रेम, सेवा और मानव एकता का संदेश दिया।

 

2. मौन पर्व कब मनाया जाता है?

हर वर्ष 10 जुलाई को मौन पर्व मनाया जाता है।

 

3. मेहेर बाबा ने मौन कब धारण किया था?

उन्होंने 10 जुलाई 1925 को मौन धारण किया था।

 

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