Ashadha Amavasya Upay: आज भौमवती अमावस्या पर जानें स्नान–दान का मुहूर्त और किन चीजों का दान करने का मिलता है पुण्य फल

Ashadha Amavasya 2026: मंगलवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को भौमवती अमावस्या भी कहा जाता है। इस बार भौमवती अमावस्या का संयोग आषाढ़ अमावस्या को बन रहा है। इसे हलहारिणी अमावस्या भी कहते हैं। हालांकि, यह साल 2026 की दूसरी भौमवती अमावस्या है। इससे पहले, मंगलवार, 17 फरवरी 2026 को फाल्गुन अमावस्या पर भौमवती अमावस्या का संयोग को हुआ था। इस साल, दूसरी बार भौमवती अमावस्या 14 जुलाई 2026 को आषाढ़ अमावस्या में हो रही है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भौमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और विशेष रूप से पितरों के निमित्त तर्पण व पिंडदान करने का अत्यधिक महत्व है। इसके साथ ही इस दिन मंगल ग्रह के निमित्त पूजा या हनुमान जी की आराधना करने से कर्ज से मुक्ति और मंगल दोषों से राहत मिलती है।

आषाढ़ अमावस्या तिथि

द्रिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ अमावस्या की तिथि 13 जुलाई को शाम 6 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 14 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 14 मिनट पर होगा। उदया तिथि को देखते हुए इस दिन आषाढ़ अमावस्या मानी जा रही है।

आषाढ़ अमावस्या शुभ मुहूर्त

इस दिन स्नान व दान का मुहूर्त सुबह 4 बजकर 30 मिनट से शुरू होगा और सुबह 5 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग जैसे अत्यंत शुभ संयोग बन रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन योगों में की गई पूजा, जप और दान का फल कई गुना बढ़ जाता है।

अमावस्या पर मिलता है दान का अक्ष्य पुण्य 

अमावस्या तिथि पर किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है। इस दिन अन्न और जल जैसे गेहूं, चावल, सत्तू, या मौसमी फल। काले तिल, छाता, चप्पल या सूती वस्त्र जैसे चीजें दान की जा सकती हैं। कई श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर दिनभर भजन-कीर्तन और मंत्र जाप भी करते हैं।

आषाढ़ अमावस्या का महत्व

ग्रह दोष शांति : ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अमावस्या के स्वामी शनि देव हैं। इस दिन हनुमान जी की पूजा करने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव कम होता है। साथ ही, मंगलवार का संयोग होने से राहू-केतु और मंगल के अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है।

पितृ दोष से मुक्ति : जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए आषाढ़ अमावस्या पर पिंड दान, तर्पण और अन्नदान करना अमोघ उपाय माना गया है। इससे अतृप्त पितर प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

Gupt Navratri Kalash Sthapana Subh Muhurat: आषाढ़ नवरात्रि पर बना रहा शश महालक्ष्मी योग, जानें महत्व और कलश स्थापना का मुहूर्त

Gupt Navratri Kalash Sthapana Subh Muhurat: आषाढ़ नवरात्रि पर बना रहा शश महालक्ष्मी योग, जानें महत्व और कलश स्थापना का मुहूर्त

Gupt Navratri Kalash Sthapana Subh Muhurat: आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नौ दिनों तक चलने वाला नवरात्रि पर्व आरंभ होने जा रहा है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे हिंदू वर्ष में चार नवरात्रि पर्व आते हैं, जिनमें से दो गृहस्थ जन काफी धूमधाम से मनाते हैं। जबकि दो गुप्त नवरात्रि पर्व आषाढ़ और माघ मास में आते हैं। इसमें देवी की नौ महाविद्याओं की साधना की जाती है।

इसमें भी मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा विधि-विधान की जाती है। सामान्य नवरात्रि की तरह इसमें अधिक सार्वजनिक आयोजन देखने को नहीं मिलते, लेकिन देवी उपासना करने वाले साधकों के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान पूरी श्रद्धा, संयम और विधि-विधान के साथ की गई पूजा कई गुना अधिक फल देने वाली मानी जाती है।

शश महालक्ष्मी योग का संयोग

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस बार आषाढ़ गुप्त नवरात्रि पर शश महालक्ष्मी नाम का एक दुर्लभ शुभ योग बन रहा है। देवघर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुदगल ने लोकल 18 को बताया कि यह अत्यंत शुभ संयोग दस महाविद्याओं की साधना और धन-समृद्धि की प्राप्ति के लिए बेहद फलदायी माना जाता है। शश-महालक्ष्मी जैसे दुर्लभ योग साधकों की सोई हुई किस्मत जगाने, भौतिक सुख-सुविधाओं की वृद्धि और सात पीढ़ियों तक की दरिद्रता मिटाने में अत्यंत शक्तिशाली माने जाते हैं। गुप्त नवरात्रि का उद्देश्य गुप्त मनोकामनाओं की पूर्ति और तंत्र साधना करना होता है।

आषाढ़ नवरात्रि कलश स्थापना मुहूर्त

पंडित नंद किशोर मुदगल ने बताया कि इस वर्ष आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की शुरुआत 15 जुलाई से हो रही है। जो श्रद्धालु अपने घर में कलश स्थापना करना चाहते हैं, उनके लिए सुबह 5 बजकर 33 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 30 मिनट तक अमृतकाल और पुष्य नक्षत्र रहेगा, जो शुभ माना जाता है। उन्होंने बताया कि इसी अवधि में कलश स्थापना कर मां दुर्गा का आह्वान करना उत्तम माना गया है।

आषाढ़ नवरात्रि पर इस विधि से करें कलश स्थापना

ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि गुप्त नवरात्रि के दौरान अपने घर में कलश स्थापना करने के लिए सबसे पहले घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। गंगाजल का छिड़काव जरूर करें। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर माता की दस महाविद्याओं का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें।

मिट्टी या तांबे के कलश में साफ जल भरकर आम के पत्ते और नारियल स्थापित करें और विधि-विधान से मां का आवाहन करें। कलश स्थापना के बाद अखंड दीप जलाना, दुर्गा सप्तशती का पाठ करना और नियमित रूप से माता की आरती करना भी बेहद शुभ माना गया है।

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