लंदन में पहली बार गंगा आरती, हजारों लोग शामिल हुए:थेम्स नदी के किनारे वाराणसी घाटों जैसी झलक

लंदन में रविवार को पहली बार थेम्स नदी के किनारे गंगा आरती का आयोजन हुआ। इस आरती में हजारों लोग शामिल हुए थे। भजन और मंत्रों के जाप के साथ हुई आरती ने थेम्स के किनारे वाराणसी के घाटों जैसी झलक दिखाई। चिन्मय मिशन UK ने टोटली थेम्स फेस्टिवल के साथ मिलकर यह आयोजन किया। यह चिन्मय मिशन के 75 साल पूरे होने के मौके पर हो रहे कार्यक्रमों का हिस्सा था। आरती के जरिए नदी, प्रकृति और जीवन के लिए आभार जताया गया। फीडबैक को देखते हुए थेम्स नदी के किनारे गंगा आरती हर साल आयोजित की जा सकती है। भजन, मंत्र और दीपों के साथ हुई आरती कार्यक्रम में भजन, मंत्रोच्चार और संगीत प्रस्तुतियां हुईं। बड़ी संख्या में लोगों ने आरती में हिस्सा लिया और दिए जलाकर नदी के लिए सम्मान जताया। चिन्मय मिशन UK की रेजिडेंट टीचर ब्रह्मचारिणी श्रीप्रिया चैतन्य ने कहा कि पीढ़ियों से लोग गंगा के किनारे नदी, प्रकृति और जीवन के लिए सम्मान जताने के लिए दिए जलाते हैं। थेम्स पर हुई यह आरती इसी भावना को लंदन तक पहुंचाने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि चिन्मय मिशन के लिए गंगा सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रवाह का भी प्रतीक है। मिशन के संस्थापक स्वामी चिन्मयानंद ने वेदांत के ज्ञान को लोगों तक पहुंचाने के लिए अपना जीवन लगा दिया था। चिन्मय मिशन के 75 साल पूरे होने के मौके पर यह आयोजन उनकी इसी विरासत को याद करने का एक तरीका था। थेम्स में नहीं बहाए गई पूजा सामाग्री इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि आरती के दौरान थेम्स नदी में कोई दिए, फूल या दूसरी पूजा सामग्री नहीं डाली गई। चिन्मय मिशन के प्रवक्ता ने बताया कि आरती में इस्तेमाल किए गए दीपक भी नदी में नहीं छोड़े गए, बल्कि किनारे पर ही रखे गए। कार्यक्रम में कचरा कम करने और सिंगल-यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल घटाने पर भी ध्यान दिया गया। यानी आयोजन में धार्मिक परंपरा के साथ नदी और पर्यावरण की जिम्मेदारी को भी जोड़ा गया। चिन्मय मिशन के 350 से ज्यादा केंद्र चिन्मय मिशन की स्थापना 1951 में हुई थी। यह वेदांत पर आधारित वैश्विक संगठन है और दुनिया भर में इसके 350 से ज्यादा केंद्र हैं। वहीं, टोटली थेम्स फेस्टिवल 1997 से आयोजित हो रहा है। इसमें थेम्स नदी से जुड़े कला, पर्यावरण, विरासत और शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम होते हैं। ————————– ये खबर भी पढ़ें… ब्रिटेन पहुंचे मोहन भागवत, हिंदू संगठनों ने स्वागत किया 100 से ज्यादा ब्रिटिश हिंदू संगठनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का ब्रिटेन पहुंचने पर स्वागत किया। पूरी खबर पढ़ें…

इस भारतीय मूल के कपल की शादी के लिए गीजा पिरामिड में रोकी गई पर्यटकों की एंट्री, जानें कौन हैं दोनों

शादी को यादगार बनाने के लिए लोग अक्सर खूबसूरत जगहों का चुनाव करते हैं, लेकिन लंदन में रहने वाले भारतीय मूल के एक कपल ने ऐसा ठिकाना चुना, जहां शादी करना लगभग नामुमकिन माना जाता है। डॉ. मोनिका नय्यर और इन्वेस्टमेंट बैंकर विवेक नंदा ने मिस्र के मशहूर गीजा पिरामिड के पास अपनी शादी का जश्न मनाया। खास बात यह रही कि इसके लिए उन्हें मिस्र के अधिकारियों से बेहद दुर्लभ अनुमति मिली।

सिर्फ तीन कपल को मिली है ऐसी इजाजत

कपल की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, अब तक सिर्फ तीन कपल को गीजा पिरामिड परिसर में निजी समारोह करने की अनुमति मिली है। मोनिका और विवेक इस खास अनुमति पाने वाले भारतीय मूल के पहले कपल बताए जा रहे हैं। इस आयोजन के लिए मिस्र के पर्यटन और पुरावशेष मंत्रालय के साथ लंबी प्रक्रिया चली। ऐतिहासिक स्थल होने की वजह से शादी के हर हिस्से की बारीकी से समीक्षा की गई और अधिकारियों की निगरानी में कार्यक्रम को मंजूरी मिली।

रात में तैयार होता था शादी का पूरा सेटअप

इस शादी की तैयारी भी किसी फिल्मी सीन से कम नहीं थी। जानकारी के अनुसार, मेहमानों के लिए खास आयोजन स्थल तैयार करने में टीम को लगातार 10 रातें लगीं। हर शाम पर्यटकों के लिए पिरामिड परिसर बंद होने के बाद टीम वहां पहुंचती थी। रातभर मंच, रसोई, रोशनी और दूसरी अस्थायी सुविधाएं तैयार की जाती थीं। कार्यक्रम खत्म होने के बाद इस पूरे अस्थायी ढांचे को हटाने की भी व्यवस्था की गई। यानी दिन में जहां दुनिया भर से पर्यटक इतिहास देखने पहुंचते हैं, उसी जगह रात के समय एक खास शादी की तैयारियां चलती रहीं।

स्फिंक्स के सामने हुआ सबसे खास जश्न

तीन दिन तक चले इस समारोह का सबसे खास हिस्सा गीजा के स्फिंक्स के सामने आयोजित रिसेप्शन था। मेहमानों को एक निजी प्रवेश द्वार से अंदर लाया गया। रोशनी से जगमगाते पिरामिडों के बीच कपल ने अपनी एंट्री की और इसके बाद डिनर का आयोजन हुआ। दुनिया के सबसे पहचाने जाने वाले ऐतिहासिक स्थलों में से एक के सामने ऐसा निजी समारोह अपने आप में बेहद खास था।

कई देशों से पहुंचे 170 मेहमान

इस खास शादी में करीब 170 मेहमान शामिल हुए, जो अलग-अलग देशों से मिस्र पहुंचे थे। समारोह में भारतीय शादी की पारंपरिक रस्में भी हुईं और इसके बाद पिरामिड परिसर में भव्य जश्न के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। कपल ने मिस्र को चुनने की वजह भी खास बताई। उनके मुताबिक, देश के इतिहास और वहां से उनके निजी जुड़ाव ने इस जगह को उनके लिए और खास बना दिया। विवेक नंदा अपने करियर के शुरुआती दौर में मिस्र में काम भी कर चुके हैं।

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Diljit Dosanjh: दिलजीत दोसांझ ने लंदन कॉन्सर्ट में किया बड़ा ऐलान, नवंबर में अहमदाबाद स्टेडियम में सिंगर करेंगे कॉन्सर्ट

Diljit Dosanjh: दिलजीत दोसांझ अब अहमदाबाद आ रहे हैं। अपने ‘ऑरा वर्ल्ड टूर’ के तहत पंजाबी सिंगर-एक्टर ने शनिवार 12 सितंबर को लंदन के मशहूर वेम्बली स्टेडियम में एक जबरदस्त कॉन्सर्ट से दर्शकों का मनोरंजन किया। शो के दौरान दिलजीत ने एक चौंकाने वाला ऐलान किया, जिससे उनके फैन्स बहुत खुश हुए। उन्होंने बताया कि वह अगली बार अहमदाबाद में परफॉर्म करेंगे।

दिलजीत ने भारत के सबसे बड़े स्टेडियम अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम के बारे में बात की। उन्होंने वहां कोल्डप्ले (Coldplay) के सफल कॉन्सर्ट को भी याद किया। दिलजीत ने कहा, “सबसे बड़ा स्टेडियम भारत में है – नरेंद्र मोदी स्टेडियम। एक गोरे ग्रुप (कोल्डप्ले) ने वहां सारे टिकट बेच दिए थे। शो हाउसफुल रहा था। उनके लिए सम्मान है, बहुत-बहुत बधाई। भारत में स्टेडियम हो और वहां कोई पंजाबी न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता।”

बाद में उन्होंने अहमदाबाद कॉन्सर्ट की तारीख कन्फर्म की और वेम्बली में मौजूद भीड़ से कहा, “हम 21 नवंबर 2026 को नरेंद्र मोदी स्टेडियम में शो करेंगे,” जिसके बाद फैन्स खुशी से झूम उठे। यह ऐलान 2024 में उनके सफल ‘दिल-लुमिनाटी इंडिया टूर’ के बाद अहमदाबाद में दिलजीत की वापसी का संकेत है। नवंबर के शो के लिए टिकट कीमत और बुकिंग की जानकारी अभी घोषित की जानी बाकी है।

इस बीच दिलजीत दोसांझ ने शनिवार को लंदन के वेम्बली स्टेडियम में इतिहास रच दिया। वह इस मशहूर वेन्यू पर हेडलाइन करने वाले पहले पंजाबी सिंगर बन गए। “पंजाबी आ गए वेम्बली ओये!” के साथ अपने शो की शुरुआत करते हुए, दिलजीत ने खचाखच भरे स्टेडियम में मौजूद लोगों से कहा कि यह पल “इतिहास की किताबों में दर्ज हो जाएगा।” दो घंटे से ज़्यादा चले इस कॉन्सर्ट में उन्होंने G.O.A.T., Lover, Hass Hass और Born to Shine जैसे हिट गाने गाए।

90,000 लोगों की क्षमता वाले इस वेन्यू में अलग-अलग बैकग्राउंड के फैन्स एक साथ गाते और नाचते दिखे। दिलजीत ने दर्शकों से बातचीत करते हुए कुछ फैन्स को, जिनमें बच्चे और एक बुज़ुर्ग महिला भी शामिल थीं, स्टेज पर भी बुलाया। कॉन्सर्ट का एंड ‘मैं हूं पंजाबी’ गाने और आतिशबाजी के साथ हुआ।

VIDEO: गाउन, सूट और बॉलरूम डांस… ‘ब्रिजर्टन’ की शाही दुनिया में पहुंचा बेंगलुरु! यूजर्स का फूटा गुस्सा

बेंगलुरु शहर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है। इसमें एक खास शाम के दौरान शहर का रंग-रूप पूरी तरह बदला नजर आया। इस खास कार्यक्रम में लोगों ने ‘ब्रिजर्टन’ के शाही अंदाज को अपनाया। महिलाएं लंबे गाउन और ग्लव्स पहने नजर आईं, वहीं पुरुष फॉर्मल सूट में नजर आए। शानदार हेयरस्टाइल और बॉलरूम डांस ने इस शाम को और भी खास बना दिया। वहीं इस खास इंवेट का नाम ‘लेडी व्हिसलडाउन अफेयर’ रखा गया। ये खास इवेंट रविवार, 6 सितंबर को बेंगलुरु के इंदिरानगर स्थित एरिना ब्रूहाउस में आयोजित किया गया।

इस कार्यक्रम का आयोजन सोशल क्लब टुगेदर ने किया था। इसका मकसद लोगों को नेटफ्लिक्स की मशहूर पीरियड ड्रामा सीरीज ‘ब्रिजर्टन’ जैसा शाही और रोमांटिक माहौल देने का था।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो

इंस्टाग्राम पर इवेंट का वीडियो शेयर करते हुए टुगेदर ने इसे “शान, रोमांस और थोड़े स्कैंडल से भरी शाम” बताया। इसे बेंगलुरु का पहला ‘ब्रिजर्टन बॉल’ भी कहा गया। वीडियो में लोग शानदार कपड़ों में नजर आए, वहीं कई कपल्स ने डांस फ्लोर पर वाल्ट्ज समेत बॉलरूम डांस किया। X पर ShaabaashKat के वीडियो रीपोस्ट करने के बाद इस इवेंट को लेकर लोगों की मिली-जुली रिएक्शन सामने आईं। जहां कुछ लोगों को यह आयोजन रीजेंसी दौर की शाही और ग्लैमरस दुनिया जैसा लगा, वहीं कई सोशल मीडिया यूजर्स इससे ज्यादा प्रभावित नहीं हुए। कुछ लोगों ने तो इस पूरे इवेंट को “क्रिंग ओलंपिक्स” तक कह दिया।

यूजर ने किया कमेंट

एक यूजर ने इस इवेंट की तुलना थिएटर के नाटक से करते हुए लिखा कि “ये किसी नाटक में होने जैसा है। वे एक्टिंग कर रहे हैं, बस स्टेज पर नहीं। मज़ेदार चीज तभी हो सकती है जब वे असलियत से जुड़े हों। यह अगला ट्रेंड नहीं बन सकता प्लीज। यह अब पुराना हो गया है।” एक यूजर ने कमेंट किया, “जब आपको उनकी जरूरत होती है तो संस्कार के गार्डियन कहां होते हैं। प्लीज यह क्रिंग बंद करें।” तीसरे यूजर ने कमेंट किया, “ये क्या बकवास है, मैं सेकंड हैंड एम्बैरेसमेंट से दूर रहना चाहता हूं। वे बिना किसी झिझक के यह सब कैसे कर रहे हैं। इतना अजीब, घिनौना और सिपाही जैसा बर्ताव” एक अन्य यूज़र ने इवेंट पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “कर ये रहे हैं और शर्म मुझे आ रही है।” इससे पता चलता है कि कुछ लोगों को यह पूरा आयोजन काफी अजीब लगा।

कुछ लोगों ने की तारीफ

इवेंट में पहने गए कॉस्ट्यूम भी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय रहे। एक यूजर ने लिखा, “सच कहूं तो वे डांस और कॉस्ट्यूम के साथ अनकम्फर्टेबल लग रहे थे। और उस लंबे आदमी ने असल में क्या पहना है?” GOT में भी ऐसा कुछ नहीं देखा, ब्रिजर्टन को तो भूल ही जाओ।” यूजर के मुताबिक, “यह बेंगलुरु की आम बार और पब वाली नाइटलाइफ़ से अलग तरह का अनुभव था और सोशल मीडिया की वजह से लोग हर चीज को लेकर जरूरत से ज्यादा आलोचना करने लगे हैं।” एक और यूजर ने कहा कि, “उसने ‘GOT’ में भी ऐसा कुछ नहीं देखा, ब्रिजर्टन की तो बात ही छोड़िए।”

ब्रिजर्टन के बारे में

‘ब्रिजर्टन’ नेटफ्लिक्स की मशहूर ड्रामा सीरीज है, जो लेखिका जूलिया क्विन के लोकप्रिय नॉवेल पर आधारित है। इसकी कहानी रीजेंसी दौर के लंदन के अमीर परिवारों और उनकी जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमती है। सीरीज में शाही पार्टियों, प्रेम कहानियों और खूबसूरत कॉस्ट्यूम को खास अंदाज में दिखाया गया है। साथ ही, इसमें पुराने दौर की कहानी को आधुनिक अंदाज के साथ पेश किया गया है।

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।)

GFF: महाराष्ट्र से बदल सकता है दुनिया के फाइनेंस का फ्यूचर! फडणवीस ने बताया मुंबई कैसे बन रही ग्लोबल फिनटेक कैपिटल

Global Fintech Fest 2026: मुंबई में आयोजित ‘ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026’ में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र देश का पहला ऐसा राज्य बनने जा रहा है जो जमीनों के टोकनाइजेशन के लिए कानून और ब्लॉकचेन आधारित फ्रेमवर्क तैयार कर रहा है। इसके तहत राज्य सरकार ‘महाराष्ट्र डिजिटाइजेशन एंड एक्सचेंज ऑफ लैंड टोकनाइजेशन एक्ट’ लाने की तैयारी में है।

ग्लोबल फिनटेक दिग्गजों को संबोधित करते हुए फडणवीस ने कहा कि दुनिया के वित्तीय तंत्र का भविष्य अब केवल न्यूयॉर्क, लंदन और सिंगापुर जैसे पारंपरिक केंद्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी नई नींव भारत और मुंबई में रखी जा रही है।

देश का पहला ‘लैंड टोकनाइजेशन’ फ्रेमवर्क

महाराष्ट्र सरकार जमीनों के टोकनाइजेशन के लिए एक कानूनी ढांचा तैयार कर रही है। इसके साथ बनने वाला ब्लॉकचेन फ्रेमवर्क SEBI, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE), नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के विशेषज्ञों, उद्योग और शिक्षा जगत के सहयोग से विकसित किया जा रहा है।

फडणवीस ने साफ किया कि टोकनाइजेशन को सिर्फ क्रिप्टोकरेंसी या सट्टेबाजी के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसका असली मकसद अटकी हुई संपत्ति से पूंजी अनलॉक करना, पारदर्शिता लाना और मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ाना है।

‘महाराष्ट्र को सिर्फ बाजार नहीं, अपनी प्रयोगशाला बनाएं’

फिनटेक कंपनियों और इनोवेटर्स को आमंत्रित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, ‘महाराष्ट्र को केवल अपना बाजार न समझें, बल्कि इसे अपनी प्रयोगशाला के रूप में देखें। अगर कोई टेक्नोलॉजी या फाइनेंशियल सॉल्यूशन महाराष्ट्र में इतने बड़े पैमाने पर सफल हो सकता है, तो वह दुनिया में कहीं भी काम कर सकता है।’ राज्य सरकार फिनटेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टोकनाइजेशन के क्षेत्र में नए प्रयोगों और सॉल्यूशंस के लिए एक बड़ा टेस्टबेड देने को तैयार है।

न्यूयॉर्क, लंदन और सिंगापुर से आगे निकलेगी मुंबई

फिनटेक के वैश्विक परिदृश्य पर बोलते हुए फडणवीस ने कहा, ग्लोबल फाइनेंस का भविष्य अब न्यूयॉर्क, लंदन या सिंगापुर के बजाय भारत में डिजाइन किया जा रहा है।मुंबई वो शहर बनना चाहिए जहां वैश्विक वित्त के भविष्य को आकार दिया जाए। अगली बड़ी ग्लोबल फिनटेक कंपनी या रिस्पॉन्सिबल फाइनेंशियल AI का बड़ा इनोवेशन मुंबई से ही निकल सकता है।

क्रेडिट, इनवेस्टमेंट और ओनरशिप का डेमोक्रेटाइजेशन

भारत की अब तक की फिनटेक यात्रा को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा, भारतीय फिनटेक क्रांति की पहली बड़ी उपलब्धि डिजिटल पेमेंट्स (UPI) का आम आदमी तक पहुंचना रहा है। अब क्रेडिट, इनवेस्टमेंट और ओनरशिप को इसी तरह आम जनता तक पहुंचाना और आसान बनाना है। एजेंटिक AI और टोकनाइजेशन अंतिम व्यक्ति तक इन सेवाओं को पहुंचाने में मदद करेंगे।

AI पर कंट्रोल और साइबर सुरक्षा सबसे जरूरी

फाइनेंशियल सिस्टम में AI और टेक्नोलॉजी के बढ़ते इस्तेमाल के बीच फडणवीस ने सुरक्षा और जवाबदेही पर जोर दिया। AI नागरिकों के लिए काम कर सकता है, लेकिन अंतिम नियंत्रण हमेशा नागरिक के हाथ में होना चाहिए। इंटेलिजेंस के साथ-साथ जवाबदेही अनिवार्य है। ‘भरोसा’ ही वह आधारभूत तकनीक है जिस पर बाकी सभी प्रौद्योगिकियां टिकी हैं।

जैसे-जैसे भारत दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन रहा है, वैसे-वैसे हमारी साइबर सुरक्षा और सिस्टम की मजबूती को भी मजबूत करना होगा।

ब्रिटेन में एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम में खराबी:425 फ्लाइट्स रद्द, ब्रिटिश एयरवेज और ईजीजेट समेत कई एयरलाइंस प्रभावित

ब्रिटेन में एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम में तकनीकी खराबी के चलते मंगलवार को 425 फ्लाइट्स रद्द कर दी गईं। फ्लाइट मॉनिटरिंग वेबसाइट फ्लाइटरडार24 ने इसकी जानकारी दी। ब्रिटेन की नेशनल एयर ट्रैफिक सर्विसेज ने बताया कि यह समस्या उड़ानों के टेकऑफ पर असर डाल रही थी। फ्लाइट सिस्टम धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। फ्लाइटरडार24 ने X पर बताया कि ब्रिटिश एयरवेज, ईजीजेट, KLM और लुफ्थांसा समेत कई एयरलाइंस की फ्लाइट्स प्रभावित हुई हैं। लंदन के हीथ्रो, स्टैनस्टेड और सिटी एयरपोर्ट के साथ ही मैनचेस्टर, बर्मिंघम, स्कॉटलैंड और ब्रिटेन के अन्य एयरपोर्ट्स की भी कुछ उड़ाने प्रभावित हुई हैं। ईजीजेट की उड़ानें पूरे यूरोप में प्रभावित बजट एयरलाइन ईजीजेट ने बताया कि उसकी कुछ फ्लाइट्स ऑपरेट नहीं हो सकीं। कंपनी के मुताबिक, सिस्टम में खराबी के कारण पूरे यूरोप में उसकी फ्लाइट्स में देरी हुई। हीथ्रो एयरपोर्ट की वेबसाइट पर मंगलवार को यूरोप के अलग-अलग शहरों के लिए जाने वाली कई शॉर्ट-हॉल फ्लाइट्स कैंसल या लेट दिखाई गईं। हालांकि, एयरपोर्ट पर आने वाली फ्लाइट्स पर इसका असर नहीं दिखा। अभी यह साफ नहीं हो पाया है कि एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम में तकनीकी खराबी किस वजह से हुई। खबर लगातार अपडेट हो रही है…

फ्रांस में कर्मचारियों की हड़ताल से एफिल टॉवर बंद रहा:आरोप- हिंदू संगठन के दौरे पर महिला कर्मचारियों को हटाया

फ्रांस का मशहूर एफिल टॉवर कर्मचारियों की हड़ताल के चलते सोमवार को बंद रहा। हड़ताल हिंदू संगठन BAPS के प्रतिनिधिमंडल के दौरे को लेकर हुई। कर्मचारियों का आरोप है कि शनिवार को BAPS के दौरे के दौरान महिला कर्मचारियों को उनकी ड्यूटी की जगह से हटा दिया गया। स्टाफ यूनियन की प्रतिनिधि डायने डावोआन ने रॉयटर्स से कहा कि प्रतिनिधिमंडल के पहुंचने पर महिलाओं से अपनी जगह छोड़ने को कहा गया, ताकि वहां पुरुष कर्मचारियों को लगाया जा सके। उन्होंने कहा कि इस घटना से महिला कर्मचारी काफी आहत और अपमानित महसूस कर रही हैं। गुस्सा बढ़ने के बाद सोमवार को कर्मचारियों ने बैठक की और प्रबंधन से बात की। मैंनेजमेंट बोला- ऐसा अनुरोध नहीं मानना चाहिए था एफिल टॉवर चलाने वाली कंपनी SETE ने AFP को बताया कि BAPS ने ऐसा इंतजाम करने को कहा था, जिसमें महिलाओं से बातचीत कम से कम हो। SETE ने माना कि उसे यह अनुरोध नहीं मानना चाहिए था। कंपनी ने कहा कि यह उसकी नीतियों और महिला-पुरुष बराबरी के खिलाफ था। SETE के अध्यक्ष एरियल वील ने इसे “बिल्कुल गलत” बताया। उन्होंने कहा कि एफिल टॉवर महिला-पुरुष बराबरी और फ्रांस के नियमों का सम्मान करता है। BAPS ने घटना पर माफी मांगी BAPS ने कहा कि करीब 100 लोगों का दौरा एफिल टॉवर की टीम के साथ मिलकर तय किया गया था। समय ऐसा रखा गया था कि दूसरे पर्यटकों को कम परेशानी हो। संगठन ने कहा कि उसकी जानकारी में किसी को टॉवर में जाने से नहीं रोका गया। फिर भी, इस घटना से किसी को दुख या परेशानी हुई हो तो उसने माफी मांगी। BAPS खुद को हिंदू आध्यात्मिक और स्वयंसेवी संगठन बताता है। लंदन, लॉस एंजिल्स और सिडनी समेत कई शहरों में इसके मंदिर हैं। रविवार को पेरिस के एक उपनगर में BAPS के फ्रांस में पहले बड़े मंदिर का उद्घाटन हुआ। पेरिस के मेयर बोले- घटना की जांच होगी पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोआर ने मामले की जांच कराने की बात कही। उन्होंने कर्मचारियों के गुस्से को जायज बताया। फ्रांस की समानता मंत्री ऑरोर बर्जे ने कहा, “फ्रांस में महिलाओं से खुद को छिपाने के लिए नहीं कहा जाता। कोई धर्म देश के कानून से ऊपर नहीं है।” दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने कहा कि फ्रांस महिलाओं की मौजूदगी को सीमित करने की बात कभी नहीं मानेगा। पूर्व प्रधानमंत्री गैब्रियल अताल ने कहा कि कोई संस्कृति, आस्था या धर्म महिलाओं को यह नहीं बता सकता कि उन्हें कहां रहना चाहिए। खबर अपडेट हो रही है…

फ्रांस में कर्मचारियों की हड़ताल से एफिल टॉवर बंद रहा:आरोप- हिंदू संगठन के दौरे पर महिला कर्मचारियों को हटाया

फ्रांस का मशहूर एफिल टॉवर कर्मचारियों की हड़ताल के चलते सोमवार को बंद रहा। हड़ताल हिंदू संगठन BAPS के प्रतिनिधिमंडल के दौरे को लेकर हुई। कर्मचारियों का आरोप है कि शनिवार को BAPS के दौरे के दौरान महिला कर्मचारियों को उनकी ड्यूटी की जगह से हटा दिया गया। स्टाफ यूनियन की प्रतिनिधि डायने डावोआन ने रॉयटर्स से कहा कि प्रतिनिधिमंडल के पहुंचने पर महिलाओं से अपनी जगह छोड़ने को कहा गया, ताकि वहां पुरुष कर्मचारियों को लगाया जा सके। उन्होंने कहा कि इस घटना से महिला कर्मचारी काफी आहत और अपमानित महसूस कर रही हैं। गुस्सा बढ़ने के बाद सोमवार को कर्मचारियों ने बैठक की और प्रबंधन से बात की। मैंनेजमेंट बोला- ऐसा अनुरोध नहीं मानना चाहिए था एफिल टॉवर चलाने वाली कंपनी SETE ने AFP को बताया कि BAPS ने ऐसा इंतजाम करने को कहा था, जिसमें महिलाओं से बातचीत कम से कम हो। SETE ने माना कि उसे यह अनुरोध नहीं मानना चाहिए था। कंपनी ने कहा कि यह उसकी नीतियों और महिला-पुरुष बराबरी के खिलाफ था। SETE के अध्यक्ष एरियल वील ने इसे बिल्कुल गलत बताया। उन्होंने कहा कि एफिल टॉवर महिला-पुरुष बराबरी और फ्रांस के नियमों का सम्मान करता है। BAPS ने घटना पर माफी मांगी BAPS ने कहा कि करीब 100 लोगों का दौरा एफिल टॉवर की टीम के साथ मिलकर तय किया गया था। समय ऐसा रखा गया था कि दूसरे पर्यटकों को कम परेशानी हो। संगठन ने कहा कि उसकी जानकारी में किसी को टॉवर में जाने से नहीं रोका गया। फिर भी, इस घटना से किसी को दुख या परेशानी हुई हो तो उसने माफी मांगी। BAPS खुद को हिंदू आध्यात्मिक और स्वयंसेवी संगठन बताता है। लंदन, लॉस एंजिल्स और सिडनी समेत कई शहरों में इसके मंदिर हैं। रविवार को पेरिस में BAPS के फ्रांस में पहले बड़े मंदिर का उद्घाटन हुआ। पेरिस के मेयर बोले- घटना की जांच होगी पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोआर ने मामले की जांच कराने की बात कही। उन्होंने कर्मचारियों के गुस्से को जायज बताया। फ्रांस की समानता मंत्री ऑरोर बर्जे ने कहा, “फ्रांस में महिलाओं से खुद को छिपाने के लिए नहीं कहा जाता। कोई धर्म देश के कानून से ऊपर नहीं है।” दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने कहा कि फ्रांस महिलाओं की मौजूदगी को सीमित करने की बात कभी नहीं मानेगा। पूर्व प्रधानमंत्री गैब्रियल अताल ने कहा कि कोई संस्कृति, आस्था या धर्म महिलाओं को यह नहीं बता सकता कि उन्हें कहां रहना चाहिए। —————————- ये खबर भी पढ़ें…. ट्रम्प को रेयर-अर्थ मिनरल नहीं भेज पा रहा पाकिस्तान:बलूच हमलों से अमेरिकी कंपनी का काम बंद; मुनीर ने वॉशिंगटन में दिखाए थे सैंपल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का ड्रीम प्रोजेक्ट अटक गया है। पाकिस्तान से रेअर अर्थ मिनरल (दुर्लभ खनिज) की अगस्त में प्रस्तावित खेप अमेरिका रवाना नहीं हो सकी। इसके बाद कराची और इस्लामाबाद में अमेरिकी कंपनी यूएस स्ट्रेटेजिक मेटल्स (USSM) के दफ्तरों में काम बंद हो गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

जर्मनी में पहली बार कट्टरपंथी AfD पार्टी ने चुनाव जीता:यूरोप में दक्षिणपंथी पार्टियों का दबदबा बढ़ा, फ्रांस में ले-पेन, ब्रिटेन में नाइजल फराज मजबूत

पूर्वी जर्मनी के छोटे से राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट में रविवार को दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी जीत हासिल की। AfD के जीत की चर्चा सिर्फ जर्मनी तक सीमित नहीं रही। लंदन की डाउनिंग स्ट्रीट से लेकर पेरिस के एलिसी पैलेस तक इस नतीजे को लेकर चिंता जताई गई। यूरोप में शायद पहली बार हुआ है जब किसी राज्य चुनाव के नतीजे को लोकतंत्र के भविष्य से इतना जोड़कर देखा गया है। इसकी वजह जर्मनी का इतिहास है। नाजी शासन की तबाही के बाद जर्मनी ने लंबे समय तक दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी दलों को राजनीतिक मुख्यधारा से दूर रखा। लेकिन 2013 में बनी AfD लगातार मजबूत होती गई। अब यह पार्टी जर्मनी की राजनीति में ही नहीं, बल्कि यूरोप की राजनीति में भी अपना असर बढ़ाती दिखाई दे रही है। AfD की जीत का असर दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है एक्सपर्ट्स का मानना है कि जर्मनी में AfD की सफलता दूसरे यूरोपीय देशों के दक्षिणपंथी दलों को भी बढ़ावा दे सकती है। यूरोप इस समय गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है। सरकारें महंगाई और बढ़ती रोजमर्रा की लागत जैसी समस्याओं को दूर नहीं कर पा रही हैं। इससे लोगों में मौजूदा सरकारों और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है। अगले साल यूरोप के कई देशों में चुनाव होने हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और स्पेन में दक्षिणपंथी पार्टियां महंगाई, रोजगार और इमिग्रेशन के मुद्दे पर सरकारों को घेर रही हैं। उनका कहना है कि मौजूदा पार्टियां आम लोगों की समस्याएं दूर नहीं कर पाई हैं। फ्रांस: मरीन ले पेन के जीतने की संभावना सबसे ज्यादा फ्रांस को लेकर यूरोप की सेंटर पार्टियों की चिंता और ज्यादा है। अगले साल देश में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। इस चुनाव में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन चौथी बार राष्ट्रपति पद के लिए दावेदारी पेश करेंगी। ले पेन पिछले 14 साल से राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति में सक्रिय हैं और इस बार उनकी स्थिति सबसे मजबूत मानी जा रही है।हालांकि, ले पेन की जीत अभी तय नहीं है। अगर सेंटर-राइट और सेंटर-लेफ्ट पार्टियां मिलकर मजबूत उम्मीदवार उतारती हैं तो उनके सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। लेकिन अगर सेंटर का वोट बंटा रहा तो ले पेन के लिए राष्ट्रपति चुनाव जीतने का रास्ता आसान हो सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर पेरिस में दक्षिणपंथी सरकार बनती है तो इसका असर पूरे यूरोपीय संघ पर पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि फ्रांस यूरोप की बड़ी राजनीतिक और सैन्य ताकत है। वह परमाणु शक्ति भी है और यूरोपीय संघ की नींव रखने वाले देशों में शामिल रहा है। ब्रिटेन: दक्षिणपंथी पार्टियां मजबूत हो रहीं ब्रिटेन में नाइजल फराज की अगुआई वाली रिफॉर्म यूके ने हाल के स्थानीय चुनावों में बड़ी सफलता हासिल की। पार्टी ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर लेबर और कंजरवेटिव जैसी बड़ी पार्टियों को पीछे छोड़ दिया। वहीं, लेबर और कंजरवेटिव दोनों की सीटें घटीं। इससे साफ हुआ कि ब्रिटेन में पारंपरिक पार्टियों से नाराज मतदाताओं का एक हिस्सा अब फराज की पार्टी की ओर जा रहा है। हालांकि उनकी पार्टी के असंतुष्ट नेता रूपर्ट लोव अलग होकर एक अलग दक्षिणपंथी पार्टी बना चुके हैं। इससे दक्षिणपंथी वोटों के बंटने का खतरा पैदा हो गया है। इटली: मेलोनी को दक्षिणपंथी नेता से ही चुनौती इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को यूरोप की दूसरी दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए एक उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। उनकी पार्टी की शुरुआत फासीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों ने की थी। फासीवादी विचारधारा- ऐसी राजनीति जिसमें एक मजबूत नेता और मजबूत सरकार को सबसे ऊपर रखा जाता है, विरोध को दबाया जाता है और देश की पहचान के नाम पर दूसरे समूहों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया जाता है। पिछले हफ्ते मेलोनी सरकार ने इटली गणराज्य के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार सत्ता में रहने का रिकॉर्ड बनाया है। इटली में अगले साल चुनाव होने हैं और मेलोनी के दोबारा सत्ता में आने की उम्मीद है। लेकिन उनके सामने उनसे भी ज्यादा दक्षिणपंथी नेता रॉबर्टो वान्नाची की चुनौती बढ़ रही है। वान्नाची की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए मेलोनी ने इमिग्रेशन जैसे मुद्दों पर अपना रुख और सख्त कर लिया है। हंगरी में दक्षिणपंथी सरकार की हार हंगरी में प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की दक्षिणपंथी पार्टी फिदेज को अप्रैल में बड़ा झटका लगा। पार्टी करीब 16 साल तक सत्ता में रहने के बाद चुनाव हार गई। ओर्बान लंबे समय से हंगरी की राजनीति में मजबूत नेता माने जाते थे, लेकिन इस बार लोगों ने उनकी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। ओर्बान की सरकार के खिलाफ लोगों में कई मुद्दों को लेकर नाराजगी थी। इनमें भ्रष्टाचार, कमजोर होती अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसी आर्थिक परेशानियां शामिल थीं। इसके अलावा यूरोपीय संघ के साथ सरकार का लगातार टकराव भी लोगों के बीच चर्चा का मुद्दा बना रहा। यानी हंगरी का उदाहरण यह बताता है कि सिर्फ दक्षिणपंथी मुद्दों पर राजनीति करने से किसी पार्टी की जीत हमेशा पक्की नहीं होती। अगर लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार लोगों की रोजमर्रा की परेशानियां दूर नहीं कर पाती, तो मतदाता उससे भी नाराज हो सकते हैं। ओर्बान की हार से यूरोप की मुख्यधारा की पार्टियों को भी उम्मीद मिली है। जर्मनी, फ्रांस और दूसरे देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों के बढ़ते असर के बीच हंगरी का नतीजा यह दिखाता है कि दक्षिणपंथ का बढ़ना एकतरफा कहानी नहीं है। कहीं ऐसी पार्टियां मजबूत हो रही हैं, तो कहीं जनता उन्हें सत्ता से बाहर भी कर रही है। ————————– यह खबर भी पढ़ें… जर्मनी में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी पहली बार सत्ता के करीब:ट्रम्प ने नतीजे की तस्वीर शेयर की, फ्रांस बोला- यह यूरोप के लिए गंभीर समय
जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने सक्सोनी-आनहाल्ट के राज्य चुनाव में बड़ी जीत हासिल की है। एग्जिट पोल के मुताबिक, AfD को करीब 44% वोट मिले हैं और वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

जर्मनी में पहली बार कट्टरपंथी AfD पार्टी ने चुनाव जीता:यूरोप में दक्षिणपंथी पार्टियों का दबदबा बढ़ा, फ्रांस में ले-पेन, ब्रिटेन में नाइजल फराज मजबूत

पूर्वी जर्मनी के छोटे से राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट में रविवार को दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी जीत हासिल की। AfD के जीत की चर्चा सिर्फ जर्मनी तक सीमित नहीं रही। लंदन की डाउनिंग स्ट्रीट से लेकर पेरिस के एलिसी पैलेस तक इस नतीजे को लेकर चिंता जताई गई। यूरोप में शायद पहली बार हुआ है जब किसी राज्य चुनाव के नतीजे को लोकतंत्र के भविष्य से इतना जोड़कर देखा गया है। इसकी वजह जर्मनी का इतिहास है। नाजी शासन की तबाही के बाद जर्मनी ने लंबे समय तक दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी दलों को राजनीतिक मुख्यधारा से दूर रखा। लेकिन 2013 में बनी AfD लगातार मजबूत होती गई। अब यह पार्टी जर्मनी की राजनीति में ही नहीं, बल्कि यूरोप की राजनीति में भी अपना असर बढ़ाती दिखाई दे रही है। AfD की जीत का असर दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है एक्सपर्ट्स का मानना है कि जर्मनी में AfD की सफलता दूसरे यूरोपीय देशों के दक्षिणपंथी दलों को भी बढ़ावा दे सकती है। यूरोप इस समय गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है। सरकारें महंगाई और बढ़ती रोजमर्रा की लागत जैसी समस्याओं को दूर नहीं कर पा रही हैं। इससे लोगों में मौजूदा सरकारों और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है। अगले साल यूरोप के कई देशों में चुनाव होने हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और स्पेन में दक्षिणपंथी पार्टियां महंगाई, रोजगार और इमिग्रेशन के मुद्दे पर सरकारों को घेर रही हैं। उनका कहना है कि मौजूदा पार्टियां आम लोगों की समस्याएं दूर नहीं कर पाई हैं। फ्रांस: मरीन ले पेन के जीतने की संभावना सबसे ज्यादा फ्रांस को लेकर यूरोप की सेंटर पार्टियों की चिंता और ज्यादा है। अगले साल देश में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। इस चुनाव में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन चौथी बार राष्ट्रपति पद के लिए दावेदारी पेश करेंगी। ले पेन पिछले 14 साल से राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति में सक्रिय हैं और इस बार उनकी स्थिति सबसे मजबूत मानी जा रही है।हालांकि, ले पेन की जीत अभी तय नहीं है। अगर सेंटर-राइट और सेंटर-लेफ्ट पार्टियां मिलकर मजबूत उम्मीदवार उतारती हैं तो उनके सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। लेकिन अगर सेंटर का वोट बंटा रहा तो ले पेन के लिए राष्ट्रपति चुनाव जीतने का रास्ता आसान हो सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर पेरिस में दक्षिणपंथी सरकार बनती है तो इसका असर पूरे यूरोपीय संघ पर पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि फ्रांस यूरोप की बड़ी राजनीतिक और सैन्य ताकत है। वह परमाणु शक्ति भी है और यूरोपीय संघ की नींव रखने वाले देशों में शामिल रहा है। ब्रिटेन: दक्षिणपंथी पार्टियां मजबूत हो रहीं ब्रिटेन में नाइजल फराज की अगुआई वाली रिफॉर्म यूके ने हाल के स्थानीय चुनावों में बड़ी सफलता हासिल की। पार्टी ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर लेबर और कंजरवेटिव जैसी बड़ी पार्टियों को पीछे छोड़ दिया। वहीं, लेबर और कंजरवेटिव दोनों की सीटें घटीं। इससे साफ हुआ कि ब्रिटेन में पारंपरिक पार्टियों से नाराज मतदाताओं का एक हिस्सा अब फराज की पार्टी की ओर जा रहा है। हालांकि उनकी पार्टी के असंतुष्ट नेता रूपर्ट लोव अलग होकर एक अलग दक्षिणपंथी पार्टी बना चुके हैं। इससे दक्षिणपंथी वोटों के बंटने का खतरा पैदा हो गया है। इटली: मेलोनी को दक्षिणपंथी नेता से ही चुनौती इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को यूरोप की दूसरी दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए एक उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। उनकी पार्टी की शुरुआत फासीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों ने की थी। फासीवादी विचारधारा- ऐसी राजनीति जिसमें एक मजबूत नेता और मजबूत सरकार को सबसे ऊपर रखा जाता है, विरोध को दबाया जाता है और देश की पहचान के नाम पर दूसरे समूहों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया जाता है। पिछले हफ्ते मेलोनी सरकार ने इटली गणराज्य के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार सत्ता में रहने का रिकॉर्ड बनाया है। इटली में अगले साल चुनाव होने हैं और मेलोनी के दोबारा सत्ता में आने की उम्मीद है। लेकिन उनके सामने उनसे भी ज्यादा दक्षिणपंथी नेता रॉबर्टो वान्नाची की चुनौती बढ़ रही है। वान्नाची की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए मेलोनी ने इमिग्रेशन जैसे मुद्दों पर अपना रुख और सख्त कर लिया है। हंगरी में दक्षिणपंथी सरकार की हार हंगरी में प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की दक्षिणपंथी पार्टी फिदेज को अप्रैल में बड़ा झटका लगा। पार्टी करीब 16 साल तक सत्ता में रहने के बाद चुनाव हार गई। ओर्बान लंबे समय से हंगरी की राजनीति में मजबूत नेता माने जाते थे, लेकिन इस बार लोगों ने उनकी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। ओर्बान की सरकार के खिलाफ लोगों में कई मुद्दों को लेकर नाराजगी थी। इनमें भ्रष्टाचार, कमजोर होती अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसी आर्थिक परेशानियां शामिल थीं। इसके अलावा यूरोपीय संघ के साथ सरकार का लगातार टकराव भी लोगों के बीच चर्चा का मुद्दा बना रहा। यानी हंगरी का उदाहरण यह बताता है कि सिर्फ दक्षिणपंथी मुद्दों पर राजनीति करने से किसी पार्टी की जीत हमेशा पक्की नहीं होती। अगर लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार लोगों की रोजमर्रा की परेशानियां दूर नहीं कर पाती, तो मतदाता उससे भी नाराज हो सकते हैं। ओर्बान की हार से यूरोप की मुख्यधारा की पार्टियों को भी उम्मीद मिली है। जर्मनी, फ्रांस और दूसरे देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों के बढ़ते असर के बीच हंगरी का नतीजा यह दिखाता है कि दक्षिणपंथ का बढ़ना एकतरफा कहानी नहीं है। कहीं ऐसी पार्टियां मजबूत हो रही हैं, तो कहीं जनता उन्हें सत्ता से बाहर भी कर रही है। ————————– यह खबर भी पढ़ें… जर्मनी में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी पहली बार सत्ता के करीब:ट्रम्प ने नतीजे की तस्वीर शेयर की, फ्रांस बोला- यह यूरोप के लिए गंभीर समय
जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने सक्सोनी-आनहाल्ट के राज्य चुनाव में बड़ी जीत हासिल की है। एग्जिट पोल के मुताबिक, AfD को करीब 44% वोट मिले हैं और वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…