ईरान ने अमेरिका के सामने जंग रोकने का 7 दिन का प्लान रखा है। ईरान का कहना है कि सबसे पहले लड़ाई बंद हो और ईरान के तेल बेचने पर लगी पाबंदियों में राहत दी जाए। इसके बाद सातवें दिन होर्मुज स्ट्रेट खोला जाएगा और फिर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नई बातचीत शुरू होगी। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने कहा है कि अब यह अमेरिका पर निर्भर है कि वह संघर्ष खत्म करना चाहता है या नहीं। जंग रोकने का प्रस्ताव ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने मध्यस्थ देशों के जरिए अमेरिका को भेजा है। पजशकियान बोले- समझौते के बाद हमला हुआ पजशकियान ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में कहा कि जून में दोनों देशों के बीच एक समझौते का आधार तैयार हो गया था और ईरान आगे बढ़ने के लिए राजी था। उन्होंने कहा कि उस समय होर्मुज खुला था और बातचीत का रास्ता भी खुला था, लेकिन इसके बाद अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला कर दिया। पजशकियान के मुताबिक, ईरान अब भी बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए अमेरिकी हमले रुकने जरूरी है। ट्रम्प की चेतावनी के बाद आया प्रस्ताव ईरानी प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में पजशकियान ने कहा था कि ईरान अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। इससे एक दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चेतावनी दी थी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान को ‘पूरी तरह तबाह’ कर सकता है। अमेरिका ने ईरान के 5 तेल टैंकरों पर हमला किया था अमेरिकी सेना ने 8 सितंबर को ईरान से जुड़े 5 तेल टैंकरों पर हमला किया था। इसके कुछ घंटे बाद ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकाने की ओर 20 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। जॉर्डन की सेना के मुताबिक, उसके एयर डिफेंस सिस्टम ने इनमें से 18 मिसाइलों को मार गिराया, जबकि 2 आबादी से दूर इलाकों में गिरीं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा था कि ईरान ने अमेरिकी नौसेना के एक युद्धपोत को दो बार बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाने की कोशिश की थी। इसी के जवाब में ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े तेल टैंकरों पर हमला किया। इसके बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में 10 जहाजों पर हमले की बात की थी। इनमें 2 अमेरिकी जहाज और 8 तेल टैंकर शामिल थे। इसी दौरान ईरान ने एक अमेरिकी सबमरीन ड्रोन भी पकड़ा था। 28 फरवरी से चल रही है अमेरिका-ईरान की लड़ाई अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और उन खाड़ी देशों में हमले किए, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। अमेरिका का कहना है कि उसका मकसद ईरान की परमाणु क्षमता को कमजोर करना है। वहीं ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे परमाणु तकनीक के इस्तेमाल का अधिकार है। —————————– यह खबर भी पढ़ें… ईरान बोला-फिर हमला हुआ तो युद्ध हिंद महासागर तक फैलेगा: इससे भारत-चीन पर असर ईरान ने चेतावनी दी है कि अमेरिका या इजराइल ने दोबारा हमला किया तो पश्चिम एशिया की जंग हिंद महासागर तक फैल सकती है। पूरी खबर पढ़ें…
ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका या इजराइल ने उस पर दोबारा हमला किया, तो पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध हिंद महासागर तक फैल सकता है। AFP के मुताबिक, ईरान के सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई के सलाहकार याह्या रहीम सफावी ने गुरुवार को कहा कि संघर्ष पहले ही फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट से निकलकर लाल सागर तक फैल चुका है। अगर दोबारा हमला हुआ तो युद्ध का दायरा और बढ़ सकता है। अगर ऐसा होता है तो इससे भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर बड़ा असर पड़ सकता है। हिंद महासागर यूरोप, पश्चिम एशिया को एशियाई देशों से जोड़ने के लिए बेहद अहम है। समुद्र में तनाव बढ़ने से पश्चिम एशिया से तेल लाने वाले जहाजों पर हमले की आशंका बढ़ जाएगी। दावा- मार्च में हिंद महासागर तक पहुंचा था युद्ध ईरान के मुताबिक, इस साल मार्च में भी युद्ध का असर हिंद महासागर तक पहुंचा था। उस समय अमेरिका के हमले में ईरान का युद्धपोत IRIS देना डूब गया था। यह घटना श्रीलंका के तट के पास हुई थी। रॉयटर्स के मुताबिक, ईरानी फ्रिगेट श्रीलंका के गाले शहर से करीब 19 नॉटिकल मील दूर डूबा था। यह जगह श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी EEZ में आती है। UN में ट्रम्प पर भड़के पजशकियान ईरान की यह चेतावनी ऐसे समय आई है, जब राष्ट्रपति मसूद पजशकियान UN महासभा में हिस्सा लेने अमेरिका पहुंचे हैं। UN में पजशकियान ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के रवैये को धौंस जमाने वाली मानसिकता बताया था। पजशकियान ने कहा कि ईरान अमेरिका के दबाव के आगे नहीं झुकेगा। UN महासभा में अपने भाषण के दौरान पजशकियान ने कहा कि धमकियों से ईरान का इरादा और मजबूत होगा। हालांकि, उन्होंने युद्ध खत्म करने के लिए बातचीत का रास्ता खुला रखने की बात भी कही। ट्रम्प ने कहा- समझौता करो या तबाह कर देंगे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने UN महासभा ईरान को एक बार फिर से तबाह करने की धमकी दी है। मंगलवार को UN में अपने भाषण में उन्होंने कहा- अमेरिका के पास दो रास्ते हैं- ईरान के साथ समझौता करना या उसे खत्म कर देना। उन्होंने आगे कहा, ‘मैंने यूरोपीय देशों को बताया था कि ईरान बैलिस्टिक मिसाइलों की आड़ में परमाणु बम बना रहा था। जब दूसरे नेता केवल इंतजार कर रहे थे, तब अमेरिका ने ईरान के खिलाफ कार्रवाई कर उसे रोका।’ अमेरिका-ईरान जंग शुरू होने के बाद से ट्रम्प पिछले 7 महीने में 10 से ज्यादा बार ईरान को तबाह करने की धमकी दे चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें पलटकर बातचीत का रास्ता अपनाना पड़ा। ईरानी सेना बोली- ट्रम्प ने UN के मंच का गलत इस्तेमाल किया इससे पहले ईरान की सेना ने भी ट्रम्प पर निशाना साधा था। ईरानी सशस्त्र बलों ने आरोप लगाया कि ट्रम्प ने UN के मंच का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ अमेरिकी आक्रामकता को सही ठहराने के लिए किया। अल जजीरा के मुताबिक, ईरानी सेना ने कहा कि ट्रम्प की बार-बार दी जा रही धमकियां ताकत की निशानी नहीं, बल्कि रणनीतिक हताशा की निशानी हैं। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट खोलने की शर्तें बताईं ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट दोबारा खोलने के लिए अपनी शर्तें अमेरिका के सामने रखी हैं। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, अराघची ने अमेरिकी अधिकारियों के सामने इन शर्तों को रखा। ईरान की मांग है कि अमेरिका तुरंत नौसैनिक नाकाबंदी हटाए, विदेशों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियां जारी करे। साथ ही लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्ध खत्म करे होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल शिपिंग रूट में से एक है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाले इस जलमार्ग से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और गैस का परिवहन होता है। ——————- यह खबर भी पढ़ें… न्यूयॉर्क में अमेरिका-ईरान के बीच 3 घंटे बातचीत: ईरान की शर्त- अमेरिका दबाव घटाए तो होर्मुज खोलने तैयार; ट्रम्प बोले- फिर मिलेंगे UN जनरल असेंबली के दौरान मंगलवार को न्यूयॉर्क में अमेरिका और ईरान के अधिकारियों के बीच करीब 3 घंटे बातचीत हुई। इस बातचीत में अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल हुए। कतर के अधिकारियों ने इसकी मध्यस्थता की। पूरी खबर पढ़ें…
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से तीखी बहस, जापान की पीएम को नीचा दिखाना, भारत के पीएम को टैरिफ की चेतावनी… अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ज्यादातर विदेशी नेताओं के साथ अपमानजनक तरीके से पेश आते रहे। लेकिन चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग के दौरे से पहले ट्रम्प के तेवर बदले-बदले से हैं। जिनपिंग के लिए रेड कार्पेट कैसे बिछा रहे ट्रम्प, चीन को खुश करने के पीछे क्या कोई खास मकसद और इस दौरे का दुनिया पर असर क्या पड़ेगा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: अमेरिका की जमीन पर जिनपिंग के स्वागत में क्या-क्या होगा? जवाब: शी जिनपिंग 11 साल बाद अमेरिका पहुंच रहे हैं। भारतीय समय के मुताबिक 23-24 सितंबर की रात 1 बजे के बाद उनका विमान वॉशिंगटन डीसी के जॉइंट बेस एंड्रयूज पर लैंड करेगा। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक… सवाल-2: आखिर जिनपिंग को इतनी तवज्जो क्यों दे रहे ट्रम्प, बदले में क्या चाहिए? जवाब: अमेरिका में दशकों पुरानी परंपरा रही है कि विदेशी नेता राष्ट्रपति से मिलने व्हाइट हाउस आते हैं, व्हाइट हाउस उनके स्वागत के लिए एयरपोर्ट नहीं जाता। ट्रम्प का प्रोटोकॉल तोड़ना सिर्फ शिष्टाचार नहीं, चीन की अहमियत का कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है। इसकी वजह मोटे-तौर पर 4 मांगों में छिपी है… 1. चीन रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई बनाए रखे 2. चाकू, बेलन, नोटबुक का कारोबार टैरिफ-फ्री हो 3. बड़ी डील की घोषणा, जिससे मिड-टर्म चुनावों में माहौल बने 4. चीन के साथ ‘AI हॉटलाइन’ बने, ताकि ये बेलगाम न हो अमेरिकी थिंकटैंक सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज में चीनी कारोबार के एक्सपर्ट स्कॉट कैनेडी के मुताबिक, ‘ट्रम्प प्रशासन को उम्मीद थी कि टैरिफ के एकतरफा भारी दबाव से चीन झुक जाएगा। ऐसा नहीं हुआ। चीन का निर्यात इस साल 28% बढ़ा है। इसलिए मोलभाव में शी की स्थिति ट्रम्प से मजबूत दिख रही है।’ सवाल-3: जिनपिंग अमेरिका से क्या हासिल करने की कोशिश करेंगे? जवाब: अमेरिकी टैरिफ के बावजूद लगातार दूसरे साल चीन का ट्रेड सरप्लस 1 ट्रिलियन डॉलर पार कर सकता है। यानी चीन ने जितना सामान दूसरे देशों से खरीदा उससे कहीं ज्यादा उन्हें बेचा है। साफ है कि चीन व्यापार के लिए सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं है। ऐसे में अमेरिकी दौरे से जिनपिंग 3 चीजें साधना चाहते हैं… 1. अमेरिका ताइवान की आजादी का विरोध करे 2. रेयर अर्थ मिनरल्स के एवज में ज्यादा टैरिफ छूट मिले 3. जिनपिंग का भव्य स्वागत, जिससे चीन में छवि मजबूत हो सवाल-4: क्या इस दौरे से भारत और दुनिया पर कोई बड़ा असर पड़ेगा? जवाब: एशियाई और यूरोपीय देशों को डर है कि अगर अमेरिका और चीन साथ आ गए तो ये वर्ल्ड ऑर्डर, यानी दुनिया के नियम खुद तय करेंगे। AI के क्षेत्र में अमेरिका और चीन ही सबसे तेजी से काम कर रहे हैं। दोनों नेताओं की मीटिंग के बाद पूरी दुनिया में AI को नियंत्रित करने का सिस्टम तैयार हो सकता है। ईरान जंग शुरू होने के बाद से तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है। अगर चीन की मध्यस्थता से अमेरिका ईरान जंग से बाहर निकल पाए और होर्मुज स्ट्रेट के कंट्रोल पर सहमति बन जाए, तो ग्लोबल ऑइल सप्लाई फिर पटरी पर आ सकती है। अमेरिका और चीन में ट्रेड वॉर की वजह से विदेशी कंपनियों के फैक्ट्री लगाने के लिए भारत विकल्प बनकर उभरा था। अमेरिका-चीन की सुलह से भारत के हाथ से यह मौका निकल सकता है। ब्रिगेडियर अनिल रमन (रि.) के मुताबिक, ‘एशिया-पैसेफिक क्षेत्र में चीन को मैनेज करने के लिए अमेरिका भारत से अच्छे रिश्ते बनाकर रखता था। अगर अब अमेरिका-चीन आपस में ही अपने रिश्ते संभालने लगेंगे, तो अमेरिका को भारत की जरूरत कम होगी। लेकिन अगर चीन-अमेरिका में सहमति नहीं बन पाती है, तो अमेरिका के लिए भारत की जरूरत बढ़ जाएगी।’ अमेरिका ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने वाला बिल पास हो गया है। अगर रेयर अर्थ मिनरल्स के बदले अमेरिका चीन को रूसी तेल खरीदने की ढील देता है, तो भारत पर अमेरिका को ऐसा कोई ऑफर देने का दबाव बढ़ेगा, जिससे उसे भी रियायत मिले। ———- ये खबर भी पढ़िए… खामेनेई को घर में मारा, अब ईरानी राष्ट्रपति को वीजा:अमेरिका के दुश्मनों को भी न्यूयॉर्क आकर खिलाफ बोलने की छूट क्यों; 5 किस्से ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान न्यूयॉर्क पहुंच गए हैं। वे हर साल होने वाले यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली (UNGA) में आज भाषण देंगे। उनके साथ विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी होंगे। इन नेताओं को अपना दुश्मन मानने वाले अमेरिका ने ही इन्हें वीजा दिया है। पूरी खबर पढ़िए..
UN जनरल असेंबली के दौरान मंगलवार को न्यूयॉर्क में अमेरिका और ईरान के अधिकारियों के बीच करीब 3 घंटे बातचीत हुई। इस बातचीत में अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल हुए। कतर के अधिकारियों ने इसकी मध्यस्थता की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बताया कि बातचीत अच्छी रही और दोनों पक्षों की जल्द ही एक और बैठक होगी। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक एक सीनियर ईरानी अधिकारी ने कहा कि अगर अमेरिका सैन्य और आर्थिक दबाव कम करने के लिए कदम उठाता है तो ईरान 7 दिन के भीतर होर्मुज स्ट्रेट खोल सकता है। सीधे नहीं मिले विटकॉफ-अराघची, मध्यस्थों के जरिए हुई बातचीत अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने बातचीत के बाद कहा कि उन्हें अच्छा महसूस हो रहा है। हालांकि, बाद में उन्होंने साफ किया कि उन्होंने ईरानी अधिकारियों से सीधे मुलाकात नहीं की। बातचीत में ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर भी शामिल रहे। विटकॉफ के मुताबिक, UN जनरल असेंबली के दौरान दोनों पक्षों के बीच बातचीत मध्यस्थों के जरिए हुई। मध्यस्थ पूरे दिन अमेरिका और ईरान के बीच संदेश लेकर आते-जाते रहे। उन्होंने बताया कि बातचीत का एक दौर पूरा हो चुका है और मध्यस्थ आगे भी दोनों पक्षों के बीच काम जारी रखेंगे। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट खोलने की शर्तें बताईं ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट दोबारा खोलने के लिए अपनी शर्तें अमेरिका के सामने रखी हैं। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, अराघची ने अमेरिकी अधिकारियों के सामने इन शर्तों को रखा। ईरान की मांग है कि अमेरिका तुरंत नौसैनिक नाकाबंदी हटाए, विदेशों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियां जारी करे। साथ ही लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्ध खत्म करे होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल शिपिंग रूट में से एक है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाले इस जलमार्ग से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और गैस का परिवहन होता है। खबर अपडेट हो रही है…
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान मंगलवार देर रात (भारतीय समयानुसार) न्यूयॉर्क पहुंच गए। वे 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देंगे। जिस अमेरिका से ईरान की जंग चल रही है, उसी ने पजशकियान और विदेश मंत्री अब्बास अराघची को UN की बैठक में शामिल होने के लिए अमेरिका आने की अनुमति दी है। पजशकियान और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प एक ही शहर में होंगे, लेकिन फिलहाल दोनों की बैठक तय नहीं है। ट्रम्प ने पजशकियान से मिलने की इच्छा जताई है। लेकिन ईरानी पक्ष ने कहा है कि दोनों नेताओं की कोई बैठक तय नहीं है। ईरान के नेताओं के UN भाषणों का इतिहास कई बड़े विवादों से जुड़ा रहा है। कभी अमेरिकी डेलिगेशन भाषण के दौरान सदन से बाहर चला गया, कभी एक प्रदर्शनकारी मंच तक पहुंच गया और कभी कई देशों के प्रतिनिधियों ने एक साथ वॉकआउट किया। पजशकियान के भाषण में 4 चीजों पर नजर रहेगी 1. अमेरिका के साथ जंग पर क्या कहेंगे? पजशकियान अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और ईरान पर दबाव को किस तरह पेश करते हैं, यह अहम होगा। खासकर यह कि युद्ध रोकने के लिए ईरान की क्या शर्तें हैं। 2. होर्मुज को लेकर क्या मैसेज देंगे? ईरान पहले ही कह चुका है कि अमेरिकी सैन्य दबाव और बंदरगाहों की नाकाबंदी कम होने पर वह 7 दिन में होर्मुज स्ट्रेट खोल सकता है। इसलिए भाषण में इस मुद्दे पर कोई नया संकेत महत्वपूर्ण होगा। 3. ट्रम्प को क्या मैसेज देंगे? दोनों नेताओं की बैठक तय नहीं है। ऐसे में पजशकियान अपने भाषण में सीधे या परोक्ष रूप से ट्रम्प और अमेरिकी प्रशासन को क्या संदेश देते हैं, इस पर भी नजर रहेगी। 4. बातचीत की कितनी गुंजाइश छोड़ेंगे? ईरानी डेलीगेशन के पास अमेरिका के साथ कूटनीति फिर शुरू करने का अधिकार है। इसलिए पजशकियान के भाषण से यह संकेत मिल सकता है कि ईरान आगे की बातचीत के लिए किन शर्तों पर तैयार है। पजशकियान के पास खास कानूनी सुरक्षा ईरानी राष्ट्रपति पजशकियान न्यूयॉर्क में गिरफ्तार नहीं हो पाएंगे। इसकी दो बड़ी वजहें हैं। 1. राष्ट्रपति को खास कानूनी सुरक्षा मिलती है किसी देश के मौजूदा राष्ट्रपति को दूसरे देश में जाकर सीधे गिरफ्तार करना आसान नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत मौजूदा राष्ट्राध्यक्षों को खास कानूनी सुरक्षा मिलती है। इसका मकसद यह है कि कोई देश अपनी मर्जी से दूसरे देश के मौजूदा राष्ट्रपति को गिरफ्तार न कर सके। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि राष्ट्रपति पर कभी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मामला किस अदालत में है, आरोप क्या हैं और उस देश के कानून क्या कहते हैं। निकोलस मादुरो का मामला इसका उदाहरण है। उन्हें अमेरिका ने गिरफ्तार किया था, लेकिन अमेरिका उन्हें उस समय वेनेजुएला का वैध राष्ट्रपति नहीं मानता था। 2. UNGA के लिए अमेरिका की अलग जिम्मेदारी है यह मामला सिर्फ अमेरिका और ईरान के बीच का नहीं है। UN का मुख्यालय न्यूयॉर्क में है और अमेरिका इसकी मेजबानी करता है। इसलिए UN की बैठकों में हिस्सा लेने वाले दूसरे देशों के प्रतिनिधियों को अमेरिका आने की अनुमति देना उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है। UN के नियमों के मुताबिक अमेरिका ऐसा नहीं कर सकता कि किसी विदेशी प्रतिनिधि को UN के आधिकारिक काम में हिस्सा लेने से ही रोक दे। हालांकि, UN के बाहर उसकी आवाजाही पर पाबंदी लगाई जा सकती है। इसी वजह से पजशकियान और अराघची को अमेरिका आने की अनुमति दी गई है। लेकिन ईरानी प्रतिनिधिमंडल छोटा रखा गया है और उसके सदस्यों की आवाजाही भी सीमित रहेगी। यात्रा और खरीदारी पर पाबंदियां रहेंगी अमेरिकी विदेश मंत्रालय के मुताबिक ईरानी अधिकारियों की न्यूयॉर्क में आवाजाही सीमित रहेगी। वे सिर्फ कुछ तय जगहों पर ही जा सकेंगे। आमतौर पर ऐसे अधिकारियों को UN मुख्यालय, ईरान के UN मिशन और कुछ तय इलाकों के बीच ही आने-जाने की अनुमति होती है। इसके अलावा लग्जरी सामान और कुछ दूसरी चीजें खरीदने पर भी रोक रहेगी। अमेरिका पहले भी ईरानी अधिकारियों पर इस तरह की पाबंदियां लगा चुका है।
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान मंगलवार देर रात (भारतीय समयानुसार) न्यूयॉर्क पहुंच गए। वे 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देंगे। जिस अमेरिका से ईरान की जंग चल रही है, उसी ने पजशकियान और विदेश मंत्री अब्बास अराघची को UN की बैठक में शामिल होने के लिए अमेरिका आने की अनुमति दी है। पजशकियान और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प एक ही शहर में होंगे, लेकिन फिलहाल दोनों की बैठक तय नहीं है। ट्रम्प ने पजशकियान से मिलने की इच्छा जताई है। लेकिन ईरानी पक्ष ने कहा है कि दोनों नेताओं की कोई बैठक तय नहीं है। ईरान के नेताओं के UN भाषणों का इतिहास कई बड़े विवादों से जुड़ा रहा है। कभी अमेरिकी डेलिगेशन भाषण के दौरान सदन से बाहर चला गया, कभी एक प्रदर्शनकारी मंच तक पहुंच गया और कभी कई देशों के प्रतिनिधियों ने एक साथ वॉकआउट किया। पजशकियान के भाषण में 4 चीजों पर नजर रहेगी 1. अमेरिका के साथ जंग पर क्या कहेंगे? पजशकियान अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और ईरान पर दबाव को किस तरह पेश करते हैं, यह अहम होगा। खासकर यह कि युद्ध रोकने के लिए ईरान की क्या शर्तें हैं। 2. होर्मुज को लेकर क्या मैसेज देंगे? ईरान पहले ही कह चुका है कि अमेरिकी सैन्य दबाव और बंदरगाहों की नाकाबंदी कम होने पर वह 7 दिन में होर्मुज स्ट्रेट खोल सकता है। इसलिए भाषण में इस मुद्दे पर कोई नया संकेत महत्वपूर्ण होगा। 3. ट्रम्प को क्या मैसेज देंगे? दोनों नेताओं की बैठक तय नहीं है। ऐसे में पजशकियान अपने भाषण में सीधे या परोक्ष रूप से ट्रम्प और अमेरिकी प्रशासन को क्या संदेश देते हैं, इस पर भी नजर रहेगी। 4. बातचीत की कितनी गुंजाइश छोड़ेंगे? ईरानी डेलीगेशन के पास अमेरिका के साथ कूटनीति फिर शुरू करने का अधिकार है। इसलिए पजशकियान के भाषण से यह संकेत मिल सकता है कि ईरान आगे की बातचीत के लिए किन शर्तों पर तैयार है। पजशकियान के पास खास कानूनी सुरक्षा ईरानी राष्ट्रपति पजशकियान न्यूयॉर्क में गिरफ्तार नहीं हो पाएंगे। इसकी दो बड़ी वजहें हैं। 1. राष्ट्रपति को खास कानूनी सुरक्षा मिलती है किसी देश के मौजूदा राष्ट्रपति को दूसरे देश में जाकर सीधे गिरफ्तार करना आसान नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत मौजूदा राष्ट्राध्यक्षों को खास कानूनी सुरक्षा मिलती है। इसका मकसद यह है कि कोई देश अपनी मर्जी से दूसरे देश के मौजूदा राष्ट्रपति को गिरफ्तार न कर सके। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि राष्ट्रपति पर कभी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मामला किस अदालत में है, आरोप क्या हैं और उस देश के कानून क्या कहते हैं। निकोलस मादुरो का मामला इसका उदाहरण है। उन्हें अमेरिका ने गिरफ्तार किया था, लेकिन अमेरिका उन्हें उस समय वेनेजुएला का वैध राष्ट्रपति नहीं मानता था। 2. UNGA के लिए अमेरिका की अलग जिम्मेदारी है यह मामला सिर्फ अमेरिका और ईरान के बीच का नहीं है। UN का मुख्यालय न्यूयॉर्क में है और अमेरिका इसकी मेजबानी करता है। इसलिए UN की बैठकों में हिस्सा लेने वाले दूसरे देशों के प्रतिनिधियों को अमेरिका आने की अनुमति देना उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है। UN के नियमों के मुताबिक अमेरिका ऐसा नहीं कर सकता कि किसी विदेशी प्रतिनिधि को UN के आधिकारिक काम में हिस्सा लेने से ही रोक दे। हालांकि, UN के बाहर उसकी आवाजाही पर पाबंदी लगाई जा सकती है। इसी वजह से पजशकियान और अराघची को अमेरिका आने की अनुमति दी गई है। लेकिन ईरानी प्रतिनिधिमंडल छोटा रखा गया है और उसके सदस्यों की आवाजाही भी सीमित रहेगी। यात्रा और खरीदारी पर पाबंदियां रहेंगी अमेरिकी विदेश मंत्रालय के मुताबिक ईरानी अधिकारियों की न्यूयॉर्क में आवाजाही सीमित रहेगी। वे सिर्फ कुछ तय जगहों पर ही जा सकेंगे। आमतौर पर ऐसे अधिकारियों को UN मुख्यालय, ईरान के UN मिशन और कुछ तय इलाकों के बीच ही आने-जाने की अनुमति होती है। इसके अलावा लग्जरी सामान और कुछ दूसरी चीजें खरीदने पर भी रोक रहेगी। अमेरिका पहले भी ईरानी अधिकारियों पर इस तरह की पाबंदियां लगा चुका है।
पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत 1000 रुपए प्रति लीटर तक महंगा हो सकता है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने रविवार को कहा कि अगर देश में पेट्रोल की कमी हुई तो कीमत और बढ़ सकती है। मंत्री के मुताबिक, पाकिस्तान में पेट्रोल अब तक करीब 50% महंगा हो चुका है। फिलहाल पेट्रोल 389.14 रुपए प्रति लीटर और डीजल 424.04 रुपए प्रति लीटर है। मिडिल ईस्ट में लड़ाई बढ़ने से दुनिया में कच्चे तेल की कीमत बढ़ रही है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल की सप्लाई को लेकर भी चिंता बढ़ी है। इसका असर पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत पर पड़ रहा है। बाइक और छोटे वाहनों को सब्सिडी दे रही सरकार बढ़ती कीमतों के बीच पाकिस्तान सरकार ने बाइक, रिक्शा, चिंगची और 800 सीसी तक की कारों के लिए पेट्रोल पर सब्सिडी योजना शुरू की है। इसमें पेट्रोल पर 100 रुपए प्रति लीटर तक की सब्सिडी दी जा रही है। हर पात्र व्यक्ति को महीने में 4 टोकन मिलेंगे। हर टोकन पर 500 रुपए की सब्सिडी मिलेगी। योजना में अब 1 जनवरी 2006 से रजिस्टर्ड मोटरसाइकिलें भी शामिल हैं। सरकार के मुताबिक, योजना में 17.5 लाख से ज्यादा लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया है। करीब 15 लाख टोकन जारी हो चुके हैं और 6.80 लाख से ज्यादा टोकन इस्तेमाल किए जा चुके हैं। अक्टूबर तक पाकिस्तान में मिल सकता है घरेलू तेल पाकिस्तान सरकार देश में नए तेल भंडार खोजने पर काम कर रही है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक के मुताबिक, तेल के कुओं पर काम शुरू हो चुका है और अक्टूबर तक कच्चा तेल मिलने की उम्मीद है। सरकार ने तेल और गैस की खोज के लिए नए ब्लॉक भी कंपनियों को दिए हैं। इसका मकसद देश में घरेलू उत्पादन बढ़ाना और विदेशों से तेल खरीदने पर खर्च कम करना है। अगर नए कुओं से व्यावसायिक स्तर पर तेल निकलता है, तो पाकिस्तान को अपनी जरूरत का कुछ हिस्सा देश में ही मिल सकेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने पर देश पर पड़ने वाला दबाव भी कम हो सकता है। खबर अपडेट हो रही है…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब भारत पर 100% तक टैरिफ लगा सकते हैं। ट्रम्प ने इस बिल पर साइन कर दिया है और यह कानून बन चुका है। अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने बुधवार को रूस से ज्यादा तेल खरीदने वाले 5 देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने वाला बिल पास किया था। पक्ष में 262 और विरोध में 159 वोट पड़े थे। सीनेट अगस्त में इसे 86-11 वोट से पास कर चुकी है। इसे आधिकारिक तौर पर लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 नाम दिया गया है। रूस से ज्यादा कच्चा तेल खरीदने वाले 5 देशों की अमेरिकी लिस्ट में चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। भारत अपनी जरूरत का 40% से ज्यादा क्रूड ऑयल रूस से खरीद रहा है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि हर 180 दिन में इस लिस्ट का आकलन करेंगे। अमेरिका की तरफ से 100% टैरिफ पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि देश के हितों से समझौता नहीं करेंगे। बीते 2 साल में भारत का रूस से तेल आयात यूक्रेन-रूस युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना तेजी से बढ़ाया। 2022-23 में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया। युद्ध से पहले भारत रूस से बहुत कम तेल खरीदता था, लेकिन बाद में यह बढ़कर रोजाना करीब 16 से 20 लाख बैरल तक पहुंच गया। अब भारत अपनी जरूरत के 40% से ज्यादा कच्चे तेल का आयात रूस से कर रहा है। इससे भारत रूस से तेल खरीदने वाले सबसे बड़े देशों में शामिल हो गया है। रूस के अलावा भारत के लिए 9 विकल्प रूस के अलावा, भारत मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और कतर से तेल खरीदता है। इसके अलावा, नाइजीरिया, अंगोला, ब्राजील और अमेरिका से भी कच्चा तेल आयात करता है। कानून का भारत पर असर पहली स्थिति: भारत रूस से तेल खरीदता रहे अमेरिका के 100% टैरिफ का सीधा असर भारत के निर्यात बिल पर पड़ सकता है। इससे भारतीय सामान अमेरिका में महंगा हो जाएगा। अमेरिकी खरीदार सस्ता विकल्प ढूंढेंगे, जैसे बांग्लादेश, वियतनाम, मैक्सिको, चीन। नतीजतन भारत के टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स, लेदर, समुद्री उत्पाद, केमिकल्स समेत कई चीजों के ऑर्डर घट जाएंगे। दूसरी स्थिति: भारत रूस को छोड़कर दूसरे देशों से तेल खरीदे तो… रूस से आने वाले तेल पर प्रतिबंध या टैरिफ का दबाव बढ़ता है तो भारत को दूसरे देशों से तेल खरीदना पड़ेगा। यह महंगा पड़ सकता है, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है। रूस के रक्षा क्षेत्रों पर भी प्रतिबंध लगेगा बिल का नाम ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ है। इस बिल में रूस के तेल और रक्षा से जुड़े कारोबार पर कड़े प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। साथ ही रूस के उन टैंकरों पर भी कार्रवाई हो सकती है, जो मौजूदा प्रतिबंधों से बचते हुए दूसरे देशों तक रूसी तेल पहुंचाते हैं। इन टैंकरों के नेटवर्क को रूस का ‘शैडो फ्लीट’ कहा जाता है। अमेरिका पहले भी रूस पर ऐसे प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर चुका है। लेकिन ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल की सप्लाई पर असर पड़ा और दुनिया में तेल की कमी का डर बढ़ गया। इसके बाद अमेरिकी सरकार को रूस के तेल की बिक्री पर कुछ समय के लिए लगी पाबंदियों में छूट देनी पड़ी थी। ईरान के साथ ट्रेड करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध बढ़ेगा बिल के कानून बनने के बाद 1996 का ‘ईरान प्रतिबंध कानून’ भी 2031 तक बढ़ जाएगा। यह कानून उन गैर-अमेरिकी कंपनियों पर पाबंदी लगाता है, जो ईरान के साथ व्यापार करती हैं। यह कानून इसी साल खत्म होने वाला था। इस बिल से अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार भी मिलेगा कि वे अमेरिका में आने वाले रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ लगा सकें। राष्ट्रपति का यह अधिकार 5 साल तक लागू रहेगा। यूरोपीय देशों को टैरिफ में राहत देगा अमेरिका रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले चीन, फ्रांस, जापान, हंगरी और बेल्जियम को भी इसके दायरे में रखा गया है। हालांकि, जो देश रूस की कुल गैस निर्यात का 15% से कम आयात करते हैं और अपनी निर्भरता घटाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें छूट मिल सकती है। सीनेट में पेश बिल के तहत 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100% टैरिफ से छूट दी गई है। इन देशों को राहत इसलिए दी गई है, क्योंकि ये रूस से 15% से कम प्राकृतिक गैस खरीदते हैं और धीरे-धीरे उस पर अपनी निर्भरता भी कम कर रहे हैं। डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह बिल यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ नहीं है। इसका निशाना सिर्फ वे देश हैं, जो अब भी रूस के तेल कारोबार को सबसे ज्यादा आर्थिक सहारा दे रहे हैं। बिल में रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा औद्योगिक ढांचे, कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। —————— यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका से पैसा निकालने लगे दुनिया के बड़े निवेशक: 40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज से बढ़ी चिंता, सोना खरीद रहे, चीन में निवेश बढ़ा रहे अमेरिका पर 40 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का कर्ज है। इसके साथ ब्याज दरें, टैरिफ और दूसरे देशों पर लगाए जा रहे आर्थिक प्रतिबंध भी बढ़ रहे हैं। इससे दुनिया के कुछ निवेशक अब सोच रहे हैं कि अपना पैसा अमेरिका के अलावा कहां लगाया जाए। पूरी खबर पढ़ें…
ईरान में शुक्रवार को सरकार के बुलावे पर लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। राजधानी तेहरान में हुई यह रैली युद्ध शुरू होने के बाद सरकार की सबसे बड़ी रैलियों में से एक थी। लोगों ने देश की रक्षा के लिए हथियार उठाने और सैन्य ट्रेनिंग लेने की तैयारी जताई। सरकार ने इस अभियान का नाम ‘जांफदाए ईरान’ रखा है। इसका मतलब है- ईरान के लिए जान तक देने को तैयार लोग। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, 6 लाख से ज्यादा लोग अब तक सैन्य ट्रेनिंग के लिए रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। रिवोल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख ने दावा किया कि ट्रेनिंग लेने वालों की संख्या 10 लाख से ज्यादा हो सकती है। ईरान में प्रदर्शन से जुड़ीं 4 फोटोज तेहरान में 3 लाख से ज्यादा लोग जुटे सरकारी प्रसारक के मुताबिक, शुक्रवार सुबह तेहरान की सड़कों पर 3 लाख से ज्यादा लोग मौजूद थे। कई लोग सैन्य वर्दी में थे और हाथों में ईरान के झंडे लिए हुए थे। सरकार की योजना इन लोगों को असॉल्ट राइफल चलाने समेत सीमित सैन्य ट्रेनिंग देने की है। इसके बाद इन्हें देश की सुरक्षा में मदद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इन लोगों को देश की सुरक्षा में मदद करने के लिए तैयार किया जा रहा है। ये रिवोल्यूशनरी गार्ड और बसीज मिलिशिया ईरान की एक सरकार समर्थक अर्धसैनिक संगठन है। इसका इस्तेमाल सरकार विरोधी प्रदर्शनों को रोकने में इस्तेमाल होता रहा है। रैली में अमेरिका-इजराइल की मौत के नारे लगे रैली में राष्ट्रपति मसूद पजशकियान, सैन्य कमांडर और सरकार के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। कुछ लोगों ने अमेरिका और इजराइल के झंडों को पैरों से रौंदा। यहां ‘अमेरिका की मौत’ और ‘इजराइल की मौत’ जैसे नारे भी लगाए गए। रैली में शामिल 24 साल की मरजिएह अफागी अपने छोटे बच्चे और पति के साथ पहुंची थीं। उन्होंने कहा कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को बताना चाहती हैं कि ईरान के लोगों को अपने देश को लेकर उनकी धमकियों से डर नहीं लगता। उन्होंने कहा कि इतिहास में कोई भी देश ईरान पर हमला करके यहां लंबे समय तक कब्जा नहीं कर सका। रैली में हथियार और ड्रोन भी दिखाए ईरान ने रैली के दौरान सिर्फ भीड़ ही नहीं दिखाई, बल्कि अपनी सैन्य ताकत का भी प्रदर्शन किया। वहां एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम, मशीनगन और ड्रोन दिखाए गए। रिवोल्यूशनरी गार्ड ने ऐसे ड्रोन भी प्रदर्शित किए, जिनका इस्तेमाल होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों के खिलाफ किए जाने का दावा किया गया है। होर्मुज स्ट्रेट खाड़ी का बेहद अहम समुद्री रास्ता है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने के बाद यहां जहाजों की आवाजाही काफी घट गई है। ————————
यह खबर भी पढ़ें… सऊदी का यूरोप को अगले महीने तेल देने से इनकार:इराक से ड्रोन हमले के बाद पाइपलाइन तबाह हुई, मरम्मत में 5-6 हफ्ते लगेंगे
सऊदी की तेल रिफाइनरी अरामको ने अगले महीने सभी यूरोपीय देशों को कच्चे तेल की सप्लाई रोक दी है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, कंपनी ने कम से कम दो यूरोपीय रिफाइनिंग कंपनियों को इसकी जानकारी दी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
सऊदी अरब ने अपनी एक अहम तेल पाइपलाइन पर हुए ड्रोन हमले के बाद अगले महीने यूरोपीय ग्राहकों को कच्चे तेल की सप्लाई रोक दी है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, सऊदी अरामको ने कम से कम दो यूरोपीय रिफाइनिंग कंपनियों को इसकी जानकारी दी है। यह फैसला सभी यूरोपीय खरीदारों पर लागू होगा। पिछले हफ्ते हुए हमले में ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के तीन पंपिंग स्टेशन क्षतिग्रस्त हुए हैं। सऊदी अरब ने इसके लिए इराक में सक्रिय ईरान समर्थित मिलिशिया के ड्रोन को जिम्मेदार ठहराया है। पहले समझें- कौन सी पाइपलाइन है? सऊदी अरामको की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन करीब 1,200 किलोमीटर लंबी है। यह सऊदी अरब के पूर्वी हिस्से में मौजूद तेल को लाल सागर तक पहुंचाती है, जहां से इसे दूसरे देशों तक भेजा जा सकता है। हमले के बाद पाइपलाइन को बंद कर दिया गया। 17 सितंबर को सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों और उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक, इसके रास्ते में मौजूद तीन पंपिंग स्टेशन को नुकसान पहुंचा है। यूरोप को अगले महीने नहीं मिलेगा सऊदी तेल अरामको ने कम से कम दो यूरोपीय रिफाइनिंग कंपनियों को बताया है कि अगले महीने उन्हें सऊदी अरब से कच्चे तेल की सप्लाई नहीं मिलेगी। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, यह फैसला सिर्फ इन कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी यूरोपीय खरीदारों पर लागू होगा। पाइपलाइन बंद होने के बाद यूरोप की कुछ कंपनियों ने सऊदी तेल की जगह दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदना शुरू कर दिया है। पोलैंड की तेल कंपनी ऑर्लेन ने 10 से ज्यादा टेंडर जारी किए हैं, ताकि वैकल्पिक सप्लाई हासिल की जा सके। यूरोप सऊदी से कितना तेल लेता है? अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक, OECD में शामिल यूरोपीय देशों ने जून में सऊदी अरब से रोजाना करीब 5.77 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा था। इसलिए अगले महीने सऊदी सप्लाई रुकने से यूरोपीय रिफाइनरियों को दूसरे स्रोतों से तेल खरीदना पड़ेगा। होर्मुज की रुकावट के बीच पाइपलाइन और अहम ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन ऐसे समय बंद हुई है जब पिछले छह महीने से होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट के कारण मध्य पूर्व से तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है। सऊदी अरब इस पाइपलाइन के जरिए तेल को लाल सागर तक भेजकर होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी निर्भरता कम कर सकता था। इसके जरिए रोजाना करीब 40 लाख से 50 लाख बैरल कच्चा तेल भेजा जा रहा था। यह मात्रा दुनिया की कुल तेल सप्लाई का करीब 4 से 5% है। इसी वजह से यह पाइपलाइन सऊदी अरब के लिए बेहद अहम रास्ता बनी हुई थी। अब पाइपलाइन बंद होने से अरामको के ग्राहकों में वैकल्पिक तेल की तलाश तेज हो गई है। यूरोपीय खरीदारों को भी सऊदी सप्लाई की जगह दूसरे देशों से कच्चा तेल जुटाना पड़ेगा।

