देहरादून में स्वाइन फ्लू और कोरोना का बढ़ता कहर, H1N1 के 105 मामले, 5 मरीजों की मौत

देहरादून में स्वाइन फ्लू और कोरोना का बढ़ता कहर, H1N1 के 105 मामले, 5 मरीजों की मौत

swine flue

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में स्वाइन फ्लू (Influenza H1N1) के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। जिले में सोमवार को 24 नए स्वाइन फ्लू के मामले सामने आए। इसके साथ ही कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 105 हो गई है। अब तक इस संक्रमण से 5 मरीजों की मौत हो चुकी है।

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खबरों के मुताबिक स्वाइन फ्लू के साथ-साथ कोरोनावायरस (Covid-19) के नए मामले भी सामने आ रहे हैं। रविवार को एम्स ऋषिकेश में 1 और श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल में 2 नए कोविड मामले दर्ज किए गए। देहरादून के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनोज कुमार शर्मा ने बताया कि जिले में सामने आए कुल 105 मामलों में 71 मरीज देहरादून जिले के, जबकि 34 मरीज दूसरे राज्यों और जिलों से हैं।

 

देहरादून में 36 एक्टिव केस

 

सीएमओ के मुताबिक, सोमवार को सामने आए 24 नए मामलों में 16 देहरादून और 8 अन्य राज्यों व जिलों से हैं। फिलहाल जिले में 36 एक्टिव केस हैं।

 

इनमें से 22 मरीज श्री महंत इंदिरेश अस्पताल, 7 मरीज एम्स ऋषिकेश, 4 मरीज हिमालयन अस्पताल, 1 मरीज कैलाश अस्पताल, 1 मरीज राजकीय दून मेडिकल कॉलेज (GDMC) अस्पताल और 1 मरीज ग्राफिक एरा अस्पताल में भर्ती है।

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3-4 दिन से बुखार तो तुरंत कराएं जांच

 

डॉ. मनोज कुमार शर्मा ने लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को तीन से चार दिनों तक लगातार बुखार रहता है और इसके साथ सीने में दर्द या सांस लेने में परेशानी होती है, तो उसे तुरंत स्वाइन फ्लू की जांच करानी चाहिए।

 

उन्होंने लोगों से संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए जरूरी सावधानियां बरतने की अपील की है।

 

कोरोना के मामलों पर भी नजर

 

देहरादून में स्वाइन फ्लू के साथ कोरोना संक्रमण के मामलों को लेकर भी स्वास्थ्य विभाग सतर्क है। विभाग की ओर से स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और अस्पतालों में भर्ती मरीजों की स्थिति पर नजर बनाए रखी जा रही है।

Delhi-NCR में H1N1 और डेंगू का बढ़ा खतरा, डॉक्टरों ने बताया किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

दिल्ली-NCR के अस्पतालों में इन दिनों बुखार, फ्लू और डेंगू जैसी मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। ओपीडी (OPD) और इमरजेंसी में इनकी संख्या काफी ज्यादा देखी जा रही है। डॉक्टरों ने बताया है कि पिछले कुछ हफ्तों में इन्फ्लूएंजा A या H1N1 के मामलों में तेजी से उछाल आया है।

डॉक्टरों ने News18 को बताया कि मॉनसून के दौरान ज्यादा नमी और रुक-रुक कर होने वाली बारिश, साथ ही भीड़-भाड़ वाली बंद जगहें और फ्लू का टीका लगवाने वालों की कम संख्या इस बढ़ोतरी की वजह हैं।

हालांकि, ज्यादातर मरीज घर पर आराम और देखभाल से ठीक हो जाते हैं। लेकिन डॉक्टरों ने सलाह दी है कि सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द या ऑक्सीजन लेवल गिरने जैसे लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें। ऐसी स्थिति में बिना देर किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

मौसम और घर के अंदर भीड़-भाड़ की वजह से बढ़ीं बीमारियां

दिल्ली के BLK-Max सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में इंटरनल मेडिसिन विभाग के हेड और वाइस चेयरमैन डॉ. राजिंदर कुमार सिंघल ने कहा, “पिछले कुछ हफ्तों में, पूरे इलाके में तेज बुखार वाली बीमारियों के लिए आउटपेशेंट (OPD) आने वालों और इमरजेंसी में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है।”

उन्होंने कहा कि मामलों में रेस्पिरेटरी वायरस इन्फेक्शन और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का मिला-जुला असर दिख रहा है। उन्होंने आगे कहा, “मौसम का बदलना, ज्यादा नमी और बीच-बीच में होने वाली बारिश से कम्युनिटी में पैथोजन (बीमारी फैलाने वाले कीटाणु) के जिंदा रहने और फैलने की रफ्तार काफी बढ़ जाती है।”

सिंघल ने कहा कि H1N1 के मामलों में बढ़ोतरी तीन वजहों से हो रही है: पहला, नमी वाला गर्म मौसम, जिससे इन्फेक्शन वाली बूंदें हवा में ज्यादा देर तक बनी रहती हैं। दूसरा, ” लोगों का बंद और एयर कंडीशन वाले कमरों में ज्यादा समय बिताना जहां हवा का बहाव ठीक नहीं होता और वायरस तेजी से फैलता है। और तीसरा, “फ्लू का सालाना वैक्सीनेशन कम होना और साफ-सफाई की आदतों में लापरवाही बरतना, जिससे बहुत से लोग बीमारी की चपेट में आ सकते हैं।”

दिल्ली में H1N1 के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी

फरीदाबाद के अमृता हॉस्पिटल में पल्मोनोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. अर्जुन खन्ना ने हाल की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि इस साल दिल्ली में H1N1 के 1,449 मामले सामने आए हैं, जो पिछले साल इसी समय के मुकाबले लगभग छह गुना ज्यादा हैं। उन्होंने कहा कि संक्रमण शुरू में हल्का लग सकता है, लेकिन कमजोर मरीजों में यह निमोनिया, खून में ऑक्सीजन का खतरनाक स्तर तक गिरना और कभी-कभी फेफड़ों के गंभीर रूप से फेल होने जैसी स्थिति में बदल सकता है।

खन्ना ने कहा, “बात साफ है: हर बार बुखार होने पर घबराएं नहीं, लेकिन इन्फ्लूएंजा को हल्के में भी न लें।” उन्होंने आगे कहा, “हम ऐसे बहुत से मरीज देख रहे हैं जिन्हें तेज बुखार, शरीर में तेज दर्द, खांसी, गले में खराश और बहुत ज्यादा थकान है। हमें चिंता है कि कुछ मरीजों की हालत उतनी तेजी से बिगड़ रही है, जितनी आम वायरल बुखार में उम्मीद नहीं की जाती।”

खन्ना ने बढ़ते मामलों के पीछे मानसून का मौसम, स्कूलों, ऑफिस और सार्वजनिक परिवहन जैसी भीड़भाड़ वाली बंद जगहों में खराब वेंटिलेशन और फ्लू वायरस में लगातार होने वाले बदलाव को जिम्मेदार बताया। उनका मतलब है कि पिछले संक्रमण या वैक्सीन से मिली सुरक्षा हमेशा के लिए नहीं रहती।

फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीमार बाग में रेस्पिरेटरी मेडिसिन और रेस्पिरेटरी क्रिटिकल केयर के HOD, डॉ. विकास मौर्य ने भी कहा कि पिछले साल की तुलना में इस साल H1N1 पॉजिटिव पाए जाने वाले मरीजों की संख्या में “भारी उछाल” आया है। उन्होंने बताया कि फ्लू जैसे लक्षणों वाले मरीजों में से लगभग 70-80% H1N1 पॉजिटिव पाए जा रहे हैं, और इसके बाद इन्फ्लूएंजा के अन्य स्ट्रेन और रेस्पिरेटरी वायरस का नंबर आता है।

मौर्य ने कहा, “मानसून के दौरान होने वाला हर बुखार H1N1 की वजह से नहीं होता। हम अन्य वायरल रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन भी देख रहे हैं, जिनमें इन्फ्लूएंजा के अन्य स्ट्रेन जैसे H3N2 के साथ-साथ राइनोवायरस, एडेनोवायरस और COVID-19 जैसे इन्फेक्शन शामिल हैं। चिंता की एक और बात वे वायरस हैं जिनकी पहचान अभी उपलब्ध टेस्ट से नहीं हो पाती, लेकिन मरीज के लक्षणों से लगता है कि यह वायरल इन्फेक्शन है।”

लक्षण और खतरे के संकेत

डॉक्टरों ने News18 को बताया कि H1N1 का असर आम सर्दी-जुकाम की तुलना में अचानक और ज्यादा गंभीर होता है। इसमें तेज बुखार और कंपकंपी, शरीर में तेज दर्द, सिरदर्द और बहुत ज्यादा थकान, सूखी खांसी और गले में खराश जैसे लक्षण होते हैं। बच्चों में उल्टी या दस्त जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं।

खन्ना ने कहा, “सिर्फ 102 या 103 डिग्री बुखार खतरनाक नहीं है। खतरे के संकेत तब होते हैं जब इसके साथ सांस लेने में तकलीफ, सीने में बेचैनी, असामान्य रूप से बहुत ज्यादा नींद आना, उलझन या ऑक्सीजन का स्तर कम होना जैसे लक्षण दिखें।”

उन्होंने कहा, “ऐसे में इसका इलाज घर पर नहीं किया जाना चाहिए।”

खन्ना ने आगे कहा कि अगर कोई मरीज ठीक होता हुआ दिखे और फिर अचानक उसे दोबारा तेज बुखार आ जाए और खांसी बढ़ जाए, तो इसे निमोनिया या किसी दूसरी गंभीर समस्या का संभावित संकेत मानकर इलाज किया जाना चाहिए।

किन्हें और कब टेस्ट करवाना चाहिए?

डॉ. सिंघल के अनुसार, हल्के मामलों में फ्लू के लिए रूटीन टेस्टिंग की जरूरत नहीं होती, लेकिन ज्यादा जोखिम वाले ग्रुप्स के लिए इसकी पुरजोर सलाह दी जाती है — जैसे 65 साल से ज्यादा उम्र के लोग, 5 साल से कम उम्र के बच्चे, गर्भवती महिलाएं, और डायबिटीज, फेफड़ों की पुरानी बीमारी, अस्थमा, किडनी की बीमारी, दिल की बीमारी या कमजोर इम्यूनिटी (जैसे कैंसर के इलाज या ऑर्गन ट्रांसप्लांट की वजह से) वाले लोग।

ऐसे लोगों के लिए भी टेस्टिंग की सलाह दी जाती है जिनकी हालत बिगड़ रही हो, जैसे सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द या ऐसा बुखार जो ठीक न हो रहा हो।

खन्ना ने अस्पताल में भर्ती 29,000 से ज्यादा H1N1 मरीजों पर हुई एक बड़ी स्टडी का भी जिक्र किया, जिसमें पाया गया कि एंटीवायरल दवाएं जल्दी शुरू करने से मौतें कम हुईं। उन्होंने कहा कि डॉक्टर बहुत ज्यादा बीमार और ज्यादा जोखिम वाले मरीजों में टेस्ट के नतीजे आने से पहले ही एंटीवायरल इलाज शुरू कर सकते हैं।

सिंघल ने कहा कि ओसेल्टामिविर (Oseltamivir) जैसी एंटीवायरल दवाएं तब सबसे अच्छा काम करती हैं जब उन्हें लक्षण शुरू होने के 48 घंटों के अंदर शुरू किया जाए।

मानसून के दौरान डेंगू के मामले भी बढ़ रहे हैं

दिल्ली के श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट में इंटरनल मेडिसिन के डायरेक्टर डॉ. अरविंद अग्रवाल ने कहा, “हमारी OPD सेवाओं में हर दिन डेंगू या H1N1 के शक वाले 15 से 20 मामले सामने आ रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “इनमें से 2 से 3 मरीजों को गंभीर पेट दर्द, लगातार उल्टी या ब्लड प्लेटलेट काउंट में तेजी से गिरावट जैसे गंभीर लक्षणों के कारण भर्ती करना पड़ता है।” उन्होंने आगे कहा कि बाकी मरीजों का इलाज OPD में ही हो जाता है, जिसमें वे खुद अपनी सेहत पर नजर रखते हैं और ओरल रिहाइड्रेशन (मुंह से तरल पदार्थ लेना) का तरीका अपनाते हैं।

अग्रवाल ने कहा, “हम लोगों को सलाह देते हैं कि वे अपने आस-पास पानी जमा न होने दें, मच्छर भगाने वाली चीजों का इस्तेमाल करें, साफ-सफाई बनाए रखें और लगातार बुखार होने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।”

डॉक्टरों की सलाह और सावधानियां

डॉक्टरों ने गंभीर बीमारी से बचने के लिए सालाना फ्लू वैक्सीन लगवाने की सलाह दी है, खासकर ज्यादा जोखिम वाले लोगों और हेल्थकेयर वर्कर्स के लिए। इसके साथ ही, खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को ढकने, कम से कम 20 सेकंड तक साबुन और पानी से हाथ धोने या हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करने, और बिना बुखार की दवा लिए बुखार उतरने के कम से कम 24 घंटे बाद तक घर पर रहने की भी सलाह दी गई है।

उन्होंने खुद से एंटीबायोटिक्स लेने के खिलाफ भी चेतावनी दी है, क्योंकि ये फ्लू जैसे वायरल इन्फेक्शन पर असर नहीं करतीं और भविष्य में होने वाले इन्फेक्शन का इलाज मुश्किल बना सकती हैं। जब तक डॉक्टर खास तौर पर एंटीवायरल दवा न लिखें, तब तक पैरासिटामोल जैसी बुखार कम करने वाली दवाएं लेना और खूब तरल पदार्थ (fluids) लेना पहला कदम होना चाहिए।

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वेस्टइंडीज को बदहाल क्रिकेट को सुधारने के लिए मिली 1.28 करोड़ डॉलर की बड़ी राशि

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) द्वारा घोषित अभिशासन, सदस्यता और सदस्यों की सहायता में में बदलावों के तहत कैरिबियाई क्रिकेट को लोन मिलेगा। एडिनबर्ग में हुई सिलसिलेवार वार्षिक बैठक के बाद सदस्यों से जुड़े कई फ़ैसले लिए गए, जिनमें वेस्टइंडीज़ क्रिकेट को आर्थिक मदद देना भी शामिल रहा।

अफ्रीकी देश मॉरिशस को ICC का 111वां मेंबर बनाया गया है, जिससे इसके 12 स्थायी सदस्य और 98 अन्य एसोसिएट सदस्य की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है। इसके अलावा, ICC ने घोषणा की कि क्रिकेट कनाडा के लिए बहाली की शर्तें मंज़ूर कर ली गई हैं; इस बोर्ड पर लगे मौजूदा निलंबन को हटाने से पहले इन शर्तों को पूरा करना ज़रूरी है।

वहीं दूसरी ओर ICC को श्रीलंका क्रिकेट से संशोधित संविधान के बारे में अपडेट मिला है। फ़िलहाल, चुनाव होने तक श्रीलंका क्रिकेट ICC बोर्ड की बैठकों में प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएगा। इस बीच, ICC सदस्यता मानदंड का उल्लंघन करने के कारण फ़्रांस क्रिकेट को नोटिस दिया गया है।

वेस्टइंडीज़ क्रिकेट के लिए समर्थन

ICC ने क्रिकेट वेस्टइंडीज़ को समर्थन के तौर पर 1.28 करोड़ डॉलर का लोन दिया है। यह बोर्ड, जो कई सालों से आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहा है, आईसीसी से मदद की मांग करता रहा है। यह बात समय-समय पर कई पूर्व क्रिकेटरों ने भी उठाया है।

30 सितंबर, 2025 को समाप्त हुए साल के वित्तीय विवरण के अनुसार, CWI को 28 मिलियन डॉलर का शुद्ध घाटा हुआ, जबकि पिछले साल उसे 24 मिलियन डॉलर का शुद्ध लाभ हुआ था। 2026 चक्र में 26 मिलियन डॉलर के लॉस के अनुमान के साथ, CWI के स्टेटमेंट में अनुदान की कमी को पूरा करने के लिए ICC से Loan Financing और Commercial Banking क्रेडिट सुविधाओं का ज़िक्र किया गया था। अब यह हकीकत बन गया है।

इससे पहले 2012 में, तत्कालीन वेस्टइंडीज़ क्रिकेट बोर्ड को ज़िम्बाब्वे के साथ ICC से सहायता फ़ंडिंग मिली थी। 2020 में, COVID-19 महामारी के दौरान, क्रिकेट वेस्टइंडीज़ को ECB से 3 मिलियन अमेरिकी डॉलर का लोन मिला था, जिसे समय पर चुका दिया गया।

COVID 19 Case Mumbai: ‘चीन से आया मेरा दोस्त…’, कुमार सानू के बेटे जान को हुआ कोरोना, दिया हेल्थ अपडेट

COVID 19 Case Mumbai: सिंगर और ‘बिग बॉस’ के पूर्व कंटेस्टेंट जान कुमार सानू को COVID-19 पॉजिटिव पाए जाने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया। सिंगर ने रविवार, 12 जुलाई को कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में रिकॉर्ड किए गए एक वीडियो के जरिए यह जानकारी दी। उन्होंने फैंस के साथ यह अपडेट हल्के-फुल्के अंदाज में शेयर किया।

मशहूर प्लेबैक सिंगर कुमार सानू के बेटे जान ने सोशल मीडिया पर कोविड 19 की पुष्टी करते हुए वीडियो डाला है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि उनके लक्षण कब शुरू हुए या उन्हें कितने समय तक मेडिकल निगरानी में रहना होगा। वीडियो शेयर करते हुए जान ने चिंता के बजाय मजाक किया और लिखा, “चीन से आया मेरा दोस्त। कोविड को सलाम करो।”

उन्होंने अस्पताल में रहने और अपने कपड़ों के बारे में भी मजाक किया और कहा, “फिट चेक – अपने पसंदीदा डिजाइनर। कोकिलाबेन के कपड़े पहने हैं। किसलिए भर्ती हुआ- वुहान से आए COVID के कारण।”

यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और फैंस ने कमेंट सेक्शन में उनके जल्द ठीक होने की कामना की। एक यूजर ने लिखा, “क्या जबरदस्त लुक है। भाई, जल्दी ठीक हो जाओ,” वहीं दूसरे ने कमेंट किया, “जल्द ठीक हो जाओ, जान। अपना ख्याल रखना।”

कुमार सानू बॉलीवुड के सबसे मशहूर प्लेबैक सिंगर्स में से एक हैं, जो 1990 के दशक में कई सुपरहिट गाने देने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में कई अवॉर्ड जीते हैं और इंडियन म्यूजिक इंडस्ट्री में एक लोकप्रिय हस्ती बने हुए हैं। उनके बेटे, जान कुमार सानू ने भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलना चुना।

जान ने भी एक सिंगर के तौर पर अपना करियर बनाया है और अक्सर सोशल मीडिया पर फैंस के साथ अपने म्यूजिक और पर्सनल लाइफ से जुड़ी बातें शेयर करते रहते हैं। बिग बॉस 14 में हिस्सा लेने के बाद उन्हें काफी पहचान मिली।

Volkswagen Group to cut model line-up by up to 50 percent by 2030

VW

The Volkswagen Group plans to reduce its global model line-up by up to 50 percent by 2030 as part of a wider restructuring of its business. The Group will also cut the number of variant options offered across its portfolio by up to 75 percent and reduce production capacity, as it looks to lower costs and simplify its operations. Volkswagen has not named the models that will be discontinued.

  1. Future line-up to focus on the ‘most attractive market segments’
  2. Annual production capacity to fall to around 9 million vehicles, from 10 million
  3. Platforms and electronic architectures will also be consolidated

Volkswagen Group to halve model line-up by 2030

The product changes form part of 12 initiatives that the Volkswagen Group plans to implement by 2030. The company said it will gradually “streamline” its model line-up by up to 50 percent, concentrating its portfolio on “the most attractive market segments”.

Volkswagen is also targeting a 75 percent reduction in what it calls “offering complexity”, which includes the number of equipment options available across its models. The company said this will allow it to focus investment and development resources on products that deliver the “greatest added value for customers and the highest value contribution” to the Group.

The Group has not confirmed which models will be affected by the reduction. Its portfolio spans Volkswagen, Skoda, Seat, Cupra, Audi, Porsche, Bentley and Lamborghini, among other brands.

“We are making the Volkswagen Group faster, more resilient and more competitive, through less complexity, focused technologies, and an even stronger alignment of products, development and production with regional markets,” said Volkswagen Group CEO Oliver Blume.

VW Group to reduce platforms, production capacity

Volkswagen also plans to reduce the number of platforms and electronic architectures used across the Group, with the aim of increasing the use of common technologies across its brands. The company will focus on technologies with what it describes as “high scaling potential”.

Annual production capacity will be reduced to around 9 million vehicles. Before the Covid-19 pandemic, the Group had established capacity to produce around 12 million vehicles annually and has already reduced this by about 2 million units. Volkswagen said further reductions are planned in Europe and China.

The restructuring comes as Volkswagen faces increased competition from Chinese carmakers, regulatory pressures, tariffs and geopolitical tensions. These factors have contributed to the Group’s profits falling by around half since 2021.

Up to 100,000 Volkswagen Group job cuts reported

The restructuring could also result in further workforce and factory reductions. Around 50,000 job cuts had already been outlined under earlier restructuring measures. Reports suggest Volkswagen could increase its planned workforce reduction to a total of 100,000 jobs and close four plants in Germany. However, the Group has not confirmed further job cuts or factory closures. 

The plants reportedly under consideration for closure are Hanover, Emden, Zwickau and Audi’s Neckarsulm facility. It remains unclear whether the sites would be closed or whether Volkswagen could seek buyers for them.

ऑक्सफोर्ड MBA ग्रेजुएट ने छोड़ी नौकरी, गांव में एवोकाडो उगाकर कमाए 8 लाख

आखिर क्या वजह है कि कोई व्यक्ति विदेश में मिली शिक्षा और कॉर्पोरेट की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गांव में खेती करने का फैसला करता है? जयपाल नाइक के लिए यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि कॉर्पोरेट की एक जैसे रूटीन से परेशान और गांव की जिंदगी के प्रति बढ़ते लगाव के कारण धीरे-धीरे हुआ बदलाव था।

उनका सफर लंदन से शुरू हुआ, जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से मार्केटिंग में MBA किया। इसके बाद उन्होंने हीथ्रो एयरपोर्ट के कस्टम्स डिपार्टमेंट में और फिर हैदराबाद में कॉर्पोरेट नौकरी की। इतने अच्छे करियर के बावजूद, धीरे-धीरे उनका ध्यान हैदराबाद से लगभग 45 किलोमीटर दूर अपने गाँव, डेबडागुडा की ओर मुड़ने लगा।

क्या खेती से होने वाली कमाई, समय के साथ कॉर्पोरेट नौकरी से मिलने वाली स्थिर आय की बराबरी कर सकती है?

जयपाल को इसका जवाब कई सालों की कोशिशों, नुकसान और बदलावों के बाद मिला। ’30Stades’ के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया, “एक साल बाद मैंने नौकरी छोड़ दी क्योंकि मुझे 9-से-5 वाली कॉर्पोरेट जिंदगी का एक जैसापन पसंद नहीं आ रहा था। मैंने खेती में अपने परिवार का साथ देने का फैसला किया।”

उस समय, उनका परिवार पारंपरिक खेती करता था और केमिकल का इस्तेमाल करके मक्का, ज्वार, सब्जियां और अरहर की दाल उगाता था। लेकिन, बढ़ती लागत और अस्थिर कीमतों की वजह से मुनाफा कम हो रहा था। उन्होंने बताया, “बाजार में कीमतें अस्थिर थीं और खेती की लागत बढ़ती जा रही थी, जिससे मुनाफ़े पर असर पड़ रहा था। मिट्टी में केमिकल का इस्तेमाल करना अब फ़ायदेमंद नहीं रह गया था।”

जब आमदनी कम होने लगी, तो जयपाल ने बागवानी में दूसरे विकल्पों पर विचार करना शुरू किया। लेकिन उन्होंने देखा कि कई पारंपरिक फल उगाने वाले किसान पहले से ही ज़्यादा सप्लाई और कीमतों में भारी गिरावट के कारण नुकसान उठा रहे थे। उन्होंने कहा, “यह साफ़ था कि विदेशी फलों की खेती करना सही रहेगा क्योंकि इसमें कॉम्पिटिशन कम है और मांग ज़्यादा है।”

2013 में, उन्होंने एवोकाडो की खेती की दिशा में अपना पहला बड़ा कदम उठाया। उन्होंने इज़राइल से 200 ‘हस’ (Hass) एवोकाडो के पौधे 1,200 रुपये प्रति पौधे की दर से मंगवाए। यह प्रयोग नाकाम रहा। उन्होंने याद करते हुए कहा, “हस एवोकाडो ठंडी जलवायु के लिए उपयुक्त होते हैं और 30°C से ज़्यादा तापमान में जीवित नहीं रह सकते। तेलंगाना में ये पौधे ठीक से नहीं पनपे और सारा निवेश डूब गया।”

इस झटके के बाद, वह सिविल कॉन्ट्रैक्टिंग के काम में लौट आए, लेकिन COVID-19 महामारी के दौरान वह काम भी बंद हो गया। इसके बाद वह फिर से खेती की ओर मुड़े, लेकिन इस बार बेहतर प्लानिंग और हालात की बेहतर समझ के साथ। जयपाल ने बताया कि एवोकाडो इसलिए खास थे क्योंकि भारतीय बाज़ार अभी विकसित हो रहा था, जबकि पारंपरिक फलों के मामले में अक्सर ज़्यादा सप्लाई के कारण कीमतें गिर जाती हैं।

पौधों के बीच जगह की समस्या के बावजूद, बागान के पौधे अच्छी तरह से पनपे और लगातार बढ़ते रहे। शुरुआत में, हर पेड़ से लगभग 5 से 10 किलो फल मिलते थे। शुरुआती बिक्री एक एक्सपोर्टर के जरिए होती थी जो उपज को कुवैत भेजता था। उन्होंने याद करते हुए कहा, “मैंने अपने एक दोस्त के ज़रिए इन्हें कुवैत भेजा, जो एक एक्सपोर्टर था।”

एक दुर्घटना के कारण एक्सपोर्ट रुकने पर, जयपाल ने घरेलू बाजार में बिक्री शुरू कर दी। उन्होंने स्थानीय स्तर पर लगभग 250 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचना शुरू किया, जहां मांग स्थिर बनी रही। जैसे-जैसे बागान के पेड़ बड़े हुए, पैदावार में काफ़ी सुधार हुआ। उन्होंने बताया, “अब, जब पौधे अपने छठे साल में हैं, तो पैदावार बढ़कर लगभग 20 किलो प्रति पेड़ हो गई है।”

1.2 एकड़ ज़मीन पर फल देने वाले लगभग 250 पेड़ों से उन्हें एवोकाडो से सालाना लगभग 8 लाख रुपये की कमाई होती है। उन्होंने आगे कहा, “यही ऑर्गेनिक एवोकाडो खेती की मुख्य खूबी है। इससे प्रति एकड़ अच्छा मुनाफ़ा मिलता है और जैसे-जैसे पेड़ बड़े होते हैं, पैदावार भी बढ़ती जाती है।”

उनके खेती के मॉडल में एक अहम बात ऑर्गेनिक खेती है। वह केमिकल वाले फ़र्टिलाइज़र और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि गाय के गोबर, गोमूत्र, नीम की खली और ऑर्गेनिक खाद का इस्तेमाल करते हैं। जयपाल ने बताया, “आप 1 किलो ऑर्गेनिक एवोकाडो को ₹1,000 प्रति किलो के भाव से भी बेच सकते हैं। वहीं, केमिकल का इस्तेमाल करके उगाए गए एवोकाडो से ₹100 प्रति किलो भी नहीं मिलते। केमिकल से पैदावार तो बढ़ सकती है, लेकिन इससे कीमत कम हो जाती है, साथ ही मिट्टी को नुकसान पहुxचता है और लागत भी बढ़ती है।”

वे मंडियों या बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय, फसल कटने से पहले ही WhatsApp और सोशल मीडिया के ज़रिए सीधे ग्राहकों को अपना माल बेचते हैं। खेती के साथ-साथ जयपाल ने नर्सरी का बिज़नेस भी शुरू किया है। वे एवोकाडो के पौधे बेचते हैं; बल्ब वैरायटी के पौधे ₹300 और पिंकर्टन वैरायटी के पौधे ₹400 में मिलते हैं। वे हर साल 5,000 से 10,000 पौधे बेचते हैं, जिससे उनकी कमाई में लगभग ₹5 लाख का योगदान होता है।

जयपाल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि खेती में कामयाबी सिर्फ़ फ़सल चुनने से नहीं, बल्कि प्लानिंग, बाज़ार की समझ और स्थानीय हालात के हिसाब से काम करने से मिलती है। उन्होंने कहा, “खेती में कामयाबी का मतलब सिर्फ़ कोई विदेशी फल उगाना नहीं है। इसका मतलब है बाज़ार की मांग के हिसाब से फ़सल चुनना, स्थानीय मौसम के अनुकूल ढलना और लागत कम रखते हुए ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा कमाना।”

उन्होंने यह भी माना कि विदेशी फलों की खेती में शुरुआत में जोखिम होते हैं, लेकिन उनका कहना था कि जो लोग डटे रहते हैं, उन्हें लंबे समय में बहुत फ़ायदा हो सकता है। उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, “विदेशी फलों की खेती में शुरू में ज़्यादा जोखिम होता है, लेकिन लंबे समय में मिलने वाला फ़ायदा काफ़ी ज़्यादा हो सकता है।”

Crude Oil Price: US-ईरान बातचीत में अनिश्चितता के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, ब्रेंट क्रूड $73 के पास

US-ईरान युद्ध: बुधवार, 1 जुलाई को शुरुआती कारोबार में तेल की कीमतों में तेजी आई, जब ईरान ने कहा कि वह US अधिकारियों के साथ सीधी बातचीत नहीं करेगा, जिससे दोनों देशों के बीच चार महीने से चल रहे संघर्ष को कुछ समय के लिए रोकने वाले नाज़ुक सीज़फ़ायर को लेकर नई चिंताएं बढ़ गई।

ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 50 सेंट, या 0.69% बढ़कर $73.45 प्रति बैरल हो गया, जबकि US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 63 सेंट, या 0.91% बढ़कर $70.13 प्रति बैरल हो गया।

आज कच्चे तेल की कीमतों में क्या तेजी है?

US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के दामाद, जेरेड कुशनर, और स्पेशल दूत स्टीव विटकॉफ मंगलवार को दोहा पहुँचे, जिसे व्हाइट हाउस ने हाई-लेवल बातचीत बताया। हालाँकि, ईरान और मेज़बान देश कतर ने साफ़ किया कि US डेलीगेशन सीधे ईरानी प्रतिनिधियों के बजाय मीडिएटर्स से बात करेगा। कतर ने कहा कि प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी उन अधिकारियों में शामिल थे जो विटकॉफ और कुशनेर से मिले थे।

बुधवार की बढ़त के बावजूद, तिमाही आधार पर भारी गिरावट के बाद तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। ब्रेंट क्रूड साल की पहली और दूसरी तिमाही के बीच लगभग $45 प्रति बैरल गिरा, जो 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल संकट के बाद सबसे बड़ी तिमाही गिरावट है। इसी दौरान US क्रूड फ्यूचर्स लगभग $31 प्रति बैरल गिरा, जो 2020 के बाद सबसे बड़ी गिरावट है, जब COVID-19 महामारी ने ग्लोबल फ्यूल डिमांड को बुरी तरह प्रभावित किया था।

यह तेज गिरावट तब आई जब मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने की दिशा में हुई प्रगति ने उस रिस्क प्रीमियम को उलट दिया जिसने संघर्ष के दौरान कीमतों को बढ़ा दिया था।

मंगलवार को जारी रॉयटर्स के एक पोल से पता चला कि एनालिस्ट्स ने ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद पहली बार 2026 के लिए अपने तेल कीमतों के अनुमान को कम किया, जिससे लगातार पांच महीनों से ऊपर की ओर बदलाव का सिलसिला खत्म हो गया। होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने से ग्लोबल तेल सप्लाई में लंबे समय से रुकावटों की चिंता कम हो गई है। इस बीच, US के वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने फिर कहा कि वॉशिंगटन ईरान को होर्मुज स्ट्रेट से गुज़रने वाले जहाजों पर ट्रांज़िट फीस लगाने की इजाज़त नहीं देगा। उन्होंने कहा कि यह स्थिति ईरान के स्ट्रेटेजिक रूप से ज़रूरी इस पानी के रास्ते का इस्तेमाल करने वाले “जहाजों पर टोल वसूलने” से खत्म नहीं होगी।

Crude Oil Price: US-ईरान बातचीत की संभावना से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, ब्रेंट $72 प्रति बैरल के करीब

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Byju’s के लेंडर्स सेटलमेंट के लिए तैयार, लेकिन बदले में आकाश एजुकेशनल सर्विसेज में चाहते हैं 30% हिस्सा

एडटेक प्लेटफॉर्म Byju’s के ग्लोबल लेंडर्स (कर्ज देने वाले) फाउंडर बायजू रवींद्रन के खिलाफ सभी कानूनी कार्रवाई वापस लेने को तैयार हैं। लेकिन बदले में कंपनी की हिस्सेदारी वाली आकाश एजुकेशनल सर्विसेज में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी चाहते हैं। इस प्रस्ताव पर बातचीत चल रही है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों का कहना है कि Byju’s के लेंडर्स विवाद को सुलझाने के अंतिम चरण में हैं और संभावना है कि वे ऑफलाइन कोचिंग संस्थान आकाश एजुकेशनल सर्विसेज में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी लें।

समझौते के तहत सभी पक्ष एक साथ सभी मामले वापस ले लेंगे। Byju’s ने 2021 में 1 अरब डॉलर की डील में आकाश एजुकेशनल सर्विसेज को खरीदा था। लेकिन तब से अब तक इसमें Byju’s की हिस्सेदारी काफी कम हो चुकी है और अब यह माइनॉरिटी स्टेकहोल्डर है। अब आकाश में मणिपाल हेल्थ सबसे बड़ी शेयरहोल्डर है।

Aakash पूरे भारत में 300 से ज्यादा सेंटर चलाती है, जो मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं के साथ-साथ स्कूल परीक्षाओं के लिए तैयारी कराते हैं। इसमें 5,000 से ज्यादा एक्सपर्ट्स की फैकल्टी है और इसकी पिछली रिपोर्ट के अनुसार सालाना रेवेन्यू लगभग 25.4 करोड़ डॉलर था। रॉयटर्स के सूत्रों का कहना है कि सेटलमेंट की बातचीत में बायजू रवींद्रन, ग्लास ट्रस्ट, आकाश और मणिपाल हेल्थ शामिल हैं। आकाश की वैल्यू लगभग 2 अरब डॉलर आंकी गई है।

Byju’s: अर्श से यूं आई फर्श पर

Byju’s एक समय 21 से ज्यादा देशों में ऑपरेशनल थी और COVID-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन कोर्सेज के जरिए लोकप्रिय हुई थी। लेकिन 2023 की शुरुआत में हालात बदल गए, जब अमेरिका स्थित लेंडर्स के साथ कंपनी का बड़ा विवाद शुरू हुआ। अमेरिका स्थित ग्लास ट्रस्ट ने बायजू रवींद्रन पर कुप्रबंधन का आरोप लगाया और 2024 में Byju’s के भारत में दिवालियापन के लिए आवेदन करने के बाद 1 अरब डॉलर के बकाया की मांग की।

Volkswagen Layoffs: 1 लाख तक लोगों की जा सकती है नौकरी, 4 फैक्ट्रियां बंद करने का भी प्लान

हालांकि रवींद्रन और Byju’s ने किसी भी गलत काम से इनकार किया है। लेकिन इस विवाद के चलते Byju’s ढह गई और 2024 में रवींद्रन ने कहा कि कंपनी की वैल्यू शून्य है। कानूनी विवाद Byju’s के दिवालिया होने के बाद से जारी है और भारत, सिंगापुर और अमेरिका की अदालतों में चल रहा है।

न IIT, न MIT… फिर भी 19 साल में करोड़ों की कमाई! जानिए आयुष सिंह की पूरी कहानी

आयुष सिंह मात्र 19 वर्ष की उम्र में ही चर्चा में आ गए हैं, क्योंकि बताया जा रहा है कि वे हर महीने करीब ₹1 करोड़ की आय अर्जित कर रहे हैं। उनकी यात्रा बेहद साधारण परिस्थितियों से शुरू हुई, जब 13 साल की उम्र में COVID-19 महामारी के दौरान उनके परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सीमित संसाधनों और चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और खुद से मशीन लर्निंग जैसी उन्नत तकनीक सीखनी शुरू की। धीरे-धीरे उनकी रुचि और मेहनत ने उन्हें टेक्नोलॉजी की दुनिया में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।

शुरुआती दौर में ही उन्होंने स्टार्टअप्स के साथ काम करना शुरू कर दिया, जिससे उनका अनुभव बढ़ता गया। कम उम्र में ही उनकी पहचान एक उभरते हुए टैलेंट के रूप में बनने लगी, और उनकी कहानी आज युवाओं के बीच प्रेरणा और चर्चा दोनों का विषय बनी हुई है।

टीनएज में ही स्टार्टअप्स की दुनिया में एंट्री

कुछ ही महीनों की मेहनत के बाद आयुष स्टार्टअप्स के साथ काम करने लगे। 14 साल की उम्र में ही उनके काम को MIT से भी सराहना मिली, जो इतनी कम उम्र में बेहद दुर्लभ माना जाता है। इसके बाद उन्होंने NLP सिस्टम पर काम किया और अमेरिका की एक कंपनी में योगदान दिया।

AI इंजीनियर से उद्यमी बनने तक का सफर

आयुष ने धीरे-धीरे खुद को डेटा साइंटिस्ट और MLOps इंजीनियर के रूप में स्थापित किया। इसके बाद उन्होंने Antern नाम की कंपनी की शुरुआत की और Second Brain Labs की सह-स्थापना की, जहां AI इनोवेशन पर काम किया जाता है।

सीखने के साथ ‘सेलिंग स्किल’ ने बदली किस्मत

एक X पोस्ट के अनुसार, असली टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्हें अपनी स्किल्स को सही तरीके से पेश करना और बेचना सीखने को मिला। इसी रणनीति ने उनकी ग्रोथ को तेज कर दिया और उन्होंने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए शिक्षा देना शुरू किया।

ऑनलाइन टीचिंग से बना बड़ा नेटवर्क

आयुष ने अपने सरल तरीके से AI जैसे कठिन विषयों को इंजीनियरों के लिए आसान बना दिया। इससे हजारों छात्रों ने उनसे सीखकर नौकरी पाई और उनका नेटवर्क तेजी से बढ़ता गया।

आज ₹1 करोड़ महीना और लगातार बढ़ती चर्चा

आज आयुष सिंह Topmate जैसे प्लेटफॉर्म से करीब ₹1 करोड़ महीना कमाते हैं। वे युवाओं को AI सिखाकर ग्लोबल लेवल पर प्रभाव बना रहे हैं। उनकी कहानी को लेकर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं।

सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं

कुछ लोगों ने उनकी मेहनत और सालों की सीख को सराहा, तो कुछ ने कोर्स बेचने की रणनीति पर सवाल उठाए। वहीं कई यूजर्स ने अपनी तुलना करते हुए हैरानी और मज़ाकिया प्रतिक्रियाएं भी दीं, जिससे यह कहानी और चर्चा में आ गई।

“मैं बॉस हूं’ वाले बयान पर ट्रंप की सफाई, बोले- मैं मजाक कर रहा था, मेरी बात को गलत समझा गया

Donald Trump: G7 नेताओं से “मैं बॉस हूं” (I’m the boss) वाली बात कहने के बाद, जब यह टिप्पणी वायरल हो गई और समिट के दौरान दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा और लोगों को इस बात पर हंसी भी आई, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सफाई देते हुए कहा, “मैं मजाक कर रहा था। मैं बॉस बनने की कोशिश नहीं कर रहा था।” ट्रंप ने यह बात The Axios Show पर एक इंटरव्यू के दौरान कही। उन्होंने बताया कि उनकी टिप्पणी का मकसद मजाक करना था, लेकिन उसे गलत संदर्भ में लिया गया।

उस पल को याद करते हुए जब शो के होस्ट ने ट्रंप से पूछा, “आप कमरे में आए और कहा, ‘मैं बॉस हूं।’ उनमें से कितने लोगों ने इस बात पर यकीन किया होगा?”

इस पर ट्रंप ने जवाब दिया कि जब वह उस कमरे में पहुंचे, जहां पहले से ही दुनिया के कई बड़े नेता बैठे थे, तो उन्होंने माहौल हल्का करने के लिए मजाक में यह बात कही थी। उनका कहना है कि इस बयान को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं थी, लेकिन यह तेजी से वायरल हो गया।

“मैं बॉस हूं…” G7 बैठक में बोले ट्रंप 

बता दें कि बुधवार को, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने G7 शिखर सम्मेलन के अंतिम दिन बैठक में प्रवेश करते समय एक मजाकिया टिप्पणी की, जिस पर सब हंस पड़े।

जब वह तीन दिवसीय जी7 समिट के अंतिम दिन की सुबह की बैठक में पहुंचे, तो बाकी देश के नेता पहले से अपनी सीटों पर बैठे हुए थे। उसी दौरान ट्रंप ने अंदर आते हुए कहा, “मैं बॉस हूं।”

इसी हंसी-मजाक के बीच, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने इस टिप्पणी को हल्के-फुल्के अंदाज में लिया। फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने पूछा, “आप कैसे हैं?” ट्रंप ने जवाब दिया, “अच्छा हूं, धन्यवाद।”

G7 समिट का आयोजन कैसे होता है, और इसमें कितने देश शामिल हैं?

गौरतलब है कि G7 देश बारी-बारी से कार्यक्रमों की मेजबानी और आयोजन करते हैं। इस बार फ्रांस को पिछले साल के मेजबान कनाडा से G7 की अध्यक्षता मिली थी और 2027 में यह अमेरिका को सौंपी जाएगी।

वहीं, इस समूह का पहला शिखर सम्मेलन 1975 में फ्रांस के रैम्बौइलेट में हुआ था। इसमें छह देशों – फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका – के नेता एक साथ आए थे। उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के बाद आई सबसे बड़ी आर्थिक मंदी से उबरने की गति तेज करने के तरीकों पर विचार-विमर्श किया था। अगले साल कनाडा भी इसमें शामिल हो गया, जिससे यह G7 बन गया।

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