रूस के कामचटका प्रायद्वीप में शुक्रवार को 7 तीव्रता का भूकंप आया। यूरोपियन-मेडिटेरेनियन सीस्मोलॉजिकल सेंटर (EMSC) के मुताबिक यह दोपहर 3:30 बजे आया। भूकंप 152 किमी की गहराई में आया। फिलहाल वहां सुनामी का खतरा नहीं है। पिछले साल 30 जुलाई को रूस के कामचटका प्रायद्वीप के तट के पास 8.8 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया था। यह 2025 का सबसे शक्तिशाली भूकंप था। इसके बाद आई सुनामी ने तटीय इलाकों में तबाही मचाई और एक गांव का कुछ हिस्सा समुद्र में बह गया। जापान में 9.9 तीव्रता का गलत अलर्ट, 12 मिनट में वापस लिया जापान की मौसम एजेंसी ने शुक्रवार को गलती से 9.9 तीव्रता के भूकंप का अलर्ट जारी कर दिया। यह चेतावनी रूस के कामचटका प्रायद्वीप में 7.0 तीव्रता का भूकंप आने के बाद जारी हुई थी। हालांकि, एजेंसी ने करीब 12 मिनट बाद इसे वापस ले लिया। जापान टाइम्स के मुताबिक, अलर्ट स्थानीय समय के अनुसार दोपहर करीब 12:36 बजे जारी हुआ था। इसमें होक्काइडो से तोकाई इलाके तक तेज झटके आने की चेतावनी दी गई थी। NHK के मुताबिक, जापान मौसम एजेंसी ने दोपहर 12:48 बजे चेतावनी रद्द कर दी। एजेंसी ने कहा कि भूकंप की तीव्रता का अनुमान जरूरत से ज्यादा लगाया गया था। 2025 में यहां 1200 से ज्यादा भूकंप आए थे यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में कामचटका में 1200 से ज्यादा भूकंप दर्ज किए गए थे। इनमें से अधिकांश छोटे-मोटे (मैग्निट्यूड 2.0 से 4.0 के बीच) थे, लेकिन 4.0 या इससे ऊपर के 150 से ज्यादा भूकंप हुए। इस क्षेत्र में पिछले साल 3 बड़े भूकंप 7.0 या उससे अधिक तीव्रता के दर्ज किए गए थे। साल 2025 का सबसे विनाशकारी भूकंप जुलाई को रूस के कामचटका में पर आया, जिसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 8.8 मापी गई। यह पिछले 10 वर्षों का सबसे बड़ा झटका था। इसने कई देशों को प्रभावित किया। यह भूकंप समुद्री क्षेत्र में आए जिसके कारण ज्यादा तबाही नहीं हुई। कामचटका में बार-बार भूकंप क्यों आते है? कामचटका प्रशांत महासागर के उस इलाके में है, जिसे ‘रिंग ऑफ फायर’ कहा जाता है। यह प्रशांत महासागर के चारों ओर फैला ऐसा क्षेत्र है, जहां दुनिया के सबसे ज्यादा भूकंप आते हैं और ज्वालामुखी फटते हैं। कामचटका में बार-बार भूकंप आने की मुख्य वजह जमीन के नीचे मौजूद विशाल प्लेटों की हलचल है। यहां प्रशांत प्लेट धीरे-धीरे ओखोत्स्क प्लेट के नीचे खिसक रही है। इस प्रक्रिया को सबडक्शन कहते हैं। दोनों प्लेटों के बीच घर्षण से चट्टानों में दबाव जमा होता रहता है। जब यह दबाव अचानक बाहर निकलता है, तो भूकंप आता है। प्लेटों की इसी हलचल से जमीन के नीचे गर्म पिघला हुआ पदार्थ बनता है, जिसे मैग्मा कहते हैं। यह बाहर निकलता है तो ज्वालामुखी फटता है। यहां कई सक्रिय ज्वालामुखी मौजूद हैं। समुद्र के नीचे तेज भूकंप आने पर सुनामी का खतरा भी रहता है। इस इलाके में जमीन के नीचे प्लेटों की हलचल लगातार जारी रहती है। इसलिए यहां भविष्य में भी भूकंप आने की आशंका बनी रहेगी। ——————– यह खबर भी पढ़ें… पनामा में 7.6 तीव्रता का भूकंप, 400 इमारतों को नुकसान:18 घंटे में 100 और झटके आए, 9 देशों में सुनामी की चेतावनी जारी पनामा में शुक्रवार दोपहर आए 7.6 तीव्रता के भूकंप से भारी नुकसान हुआ। अब तक 27 लोगों के घायल होने की खबर है। भूकंप का केंद्र राजधानी पनामा सिटी से करीब 200 किलोमीटर दूर अजुएरो प्रायद्वीप के पास था। पूरी खबर पढ़ें…

Porsche has unveiled the Mission S concept as part of its ‘Sportwagenschmiede ’35’ strategy. It previews a new mid-engined platform for a model positioned above the 911, which Porsche says is intended to become a permanent part of its line-up rather than a one-off hypercar. The concept also signals the brand’s future design direction, with styling inspired by historic Porsche models.
Porsche Mission S: Exterior

The Porsche Mission S features a low front end with rounded headlights, raised ‘torpedo’ fenders and slim LED daytime running lights. It also has a large air intake at the front of the roof, a sloping roofline and sculpted side panels. The rear features narrow split taillights, an integrated active wing, a large diffuser and a cooling fan above the engine bay.
The design draws inspiration from several historic Porsche models. The roofline takes cues from the 959, while the rear bodywork is influenced by the 911 GT1. The wheels feature a telephone-dial design inspired by the 928.

Explaining the raised front fenders, Tobias Sühlmann, head of Style Porsche said, “The Bauhaus rule is that form and function work together and that’s vital in the exterior and interior of our cars.” He added that the fenders sit higher than the bonnet to help drivers judge the position of the front wheels and the edges of the car.
The concept also features an active rear wing that retracts when not required, while its rear cooling arrangement takes inspiration from the Porsche 917.

The Renault Duster will get a strong-hybrid powertrain in India on October 17, joining the existing 1.0-litre and 1.3-litre turbo-petrol options. Bookings are open for Rs 21,000. Here’s what to expect from the new hybrid variant, including its powertrain, features and rivals.
1. What is the claimed mileage of the Renault Duster hybrid?

The Renault Duster hybrid has an ARAI-rated fuel efficiency of 29kpl, compared with 19.41kpl for the 1.0-litre turbo-petrol manual, 17.75kpl for the 1.3-litre turbo-petrol manual and 18.45kpl for the 1.3-litre turbo-petrol DCT. The hybrid is Renault’s answer for the absence of a diesel option on the new Duster and is expected to give buyers seeking better fuel efficiency an alternative to the turbo-petrol versions.
Its claimed efficiency is also higher than that of the Maruti Suzuki Grand Vitara and Toyota Urban Cruiser Hyryder strong hybrids, both rated at 27.97kpl, and the Maruti Suzuki Victoris strong hybrid, rated at 28.65kpl.
2. How does the Duster’s hybrid system work?

The E-Tech system combines a 1.8-litre four-cylinder naturally aspirated petrol engine with two electric motors: a 20hp unit that acts as a generator and a 49hp motor that drives the wheels. The system produces a combined 160hp and 172Nm, supported by a 1.4kWh battery.
A multi-mode automatic gearbox with fixed gear ratios sends power to the wheels. Unlike the e-CVT used by the Maruti Suzuki Grand Vitara, Victoris and Toyota Urban Cruiser Hyryder, Renault’s transmission can shift between ratios. Engine revs may therefore rise and fall more noticeably as the system changes between electric drive, engine drive and combined operation. The battery charges while driving and does not need to be plugged in.
Renault says the hybrid system can cover up to 80 percent of city driving in electric mode, using the battery and electric motor at low speeds and switching on the petrol engine when required. Regenerative braking helps recharge the battery while driving.
3. Which SUVs will rival the Renault Duster hybrid?

The Duster hybrid will compete with the strong-hybrid versions of the Maruti Suzuki Grand Vitara, Maruti Suzuki Victoris and Toyota Urban Cruiser Hyryder. The Toyota and Suzuki siblings use Toyota’s strong-hybrid system, which pairs a 1.5-litre, three-cylinder petrol engine with electric motors and a 0.60kWh battery, producing a combined 116hp and 141Nm.
4. Will the Renault Duster hybrid look different from the regular Duster?

The hybrid is expected to retain the regular Duster’s exterior design and cabin layout, along with a broadly similar feature list. A hybrid badge could help distinguish it from the turbo-petrol variants, with the powertrain being the main difference.
5. What is the expected price of the Renault Duster hybrid?

The Renault Duster hybrid is expected to be priced between Rs 20 lakh and Rs 22 lakh (ex-showroom), commanding a premium over the turbo-petrol variants due to its more complex hybrid powertrain and the added fuel-efficiency benefits it offers.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11-12 दिसंबर को कनाडा के दौरे पर जाएंगे। इस दौरान दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर बातचीत होगी। भारत-कनाडा व्यापार समझौते (CEPA) पर हस्ताक्षर होने की संभावना भी है। भारत और कनाडा 2030 तक आपसी कारोबार को बढ़ाकर सालाना 7 लाख करोड़ रुपए करना चाहते हैं। अभी दोनों देशों के बीच करीब 3 लाख करोड़ रूपए का व्यापार होता है। पीएम मोदी का दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब कनाडा और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर की स्थिती है। ट्रम्प के टैरिफ दबाव के बीच कनाडा नए बाजार तलाश रहा है। PM मोदी ने पीएम कार्नी से फोन पर बात की प्रधानमंत्री मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच 13 अक्टूबर को फोन पर बातचीत हुई। मोदी ने इसे अच्छी बातचीत बताया। दोनों नेताओं ने व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, सुरक्षा और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर सहमति जताई। कनाडा के प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक, दोनों नेता चाहते हैं कि भारत और कनाडा के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत जल्द पूरी हो। बातचीत में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के हालात पर भी चर्चा हुई। कार्नी ने रूस-यूक्रेन युद्ध का शांतिपूर्ण समाधान निकालने की कोशिशों के लिए मोदी की तारीफ भी की। 2023 में निज्जर की हत्या के बाद रिश्ते बिगड़े थे भारत और कनाडा के रिश्तों में 2023 में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद तनाव बढ़ गया था। इसके बाद दोनों देशों के रिश्ते काफी तनावपूर्ण हो गए। लेकिन मार्क कार्नी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से रिश्ते सुधारने की कोशिशें तेज हुई हैं। पिछले साल नवंबर में भारत दौरे के दौरान कार्नी ने भारत को भरोसेमंद व्यापारिक साझेदार बताया था। दिसंबर में पीएम का 3 देशों के दौरे का कार्यक्रम रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी दिसंबर में कनाडा के अलावा अमेरिका और बेल्जियम भी जा सकते हैं। इन दौरों में व्यापार और दूसरे अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। 11-12 दिसंबर: कनाडा – मोदी टोरंटो और ओटावा जाएंगे। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत होगी। 13-15 दिसंबर: अमेरिका – फ्लोरिडा में G20 समिट में शामिल होने का कार्यक्रम है। 16-17 दिसंबर: बेल्जियम – ब्रसेल्स में भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते पर चर्चा हो सकती है। कनाडा दौरे की तारीख की पुष्टि हो चुकी है। अमेरिका और बेल्जियम के कार्यक्रमों की तारीखों की आधिकारिक घोषणा होना बाकि है। ——————– ये खबर भी पढ़ें…. भारत पर 100% टैरिफ लगेगा या नहीं,10 दिन में फैसला: ट्रम्प तय करेंगे रूसी तेल खरीदने वाले किन देशों पर प्रतिबंध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत पर 100% टैरिफ लगाने को लेकर करीब 10 दिन में फैसला ले सकते हैं। यह बात अमेरिकी दूत सर्जियो गोर ने ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में कही। गोर ने कहा कि भारत को प्रतिबंधों से छूट मिलेगी या नहीं, यह भी ट्रम्प ही तय करेंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 से 12 दिसंबर को कनाडा के दौरे पर रहेंगें। इस दौरान दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर बातचीत होगी। भारत-कनाडा व्यापार समझौते (CEPA) पर हस्ताक्षर होने की संभावना भी है। इसके तहत दो देश व्यापार, निवेश और कारोबार बढ़ाने के लिए नियम तय करते हैं। भारत और कनाडा 2030 तक आपसी कारोबार को बढ़ाकर सालाना 7 लाख करोड़ रुपए करना चाहते हैं। अभी दोनों देशों के बीच करीब 3 लाख करोड़ रूपए का व्यापार होता है। PM मोदी का दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब कनाडा और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर की स्थिती है। ट्रम्प के टैरिफ दबाव के बीच कनाडा नए बाजार तलाश रहा है। PM मोदी ने मार्क कार्नी से फोन पर बात की थी प्रधानमंत्री मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच 13 अक्टूबर को फोन पर बातचीत हुई। मोदी ने इसे अच्छी बातचीत बताया। दोनों नेताओं ने व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, सुरक्षा और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर सहमति जताई। कनाडा के प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक, दोनों नेता चाहते हैं कि भारत और कनाडा के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत जल्द पूरी हो। बातचीत में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के हालात पर भी चर्चा हुई। कार्नी ने रूस-यूक्रेन युद्ध का शांतिपूर्ण समाधान निकालने की कोशिशों के लिए मोदी की तारीफ भी की। 2023 में निज्जर की हत्या के बाद रिश्ते बिगड़े थे भारत और कनाडा के रिश्तों में 2023 में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद तनाव बढ़ गया था। इसके बाद दोनों देशों के रिश्ते काफी तनावपूर्ण हो गए। लेकिन मार्क कार्नी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से रिश्ते सुधारने की कोशिशें तेज हुई हैं। पिछले साल नवंबर में भारत दौरे के दौरान कार्नी ने भारत को भरोसेमंद व्यापारिक साझेदार बताया था। PM मोदी का 11 साल बाद द्विपक्षीय दौरा जून 2025 – PM मोदी का यह द्विपक्षीय दौरा नहीं था। वे G7 समिट में शामिल होने गए थे। हालांकि बैठक के इतर उन्होंने PM कार्नी से मुलाकात की थी। अप्रैल 2015 – PM मोदी कनाडा के द्विपक्षीय दौरे पर गए थे। उस समय कनाडा के प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर थे। इस दौरे के बाद भारत ने कनाडा से यूरेनियम खरीदने का समझौता भी किया था। दिसंबर में PM का 3 देशों के दौरे का कार्यक्रम रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी दिसंबर में कनाडा के अलावा अमेरिका और बेल्जियम भी जा सकते हैं। इन दौरों में व्यापार और दूसरे अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। 11-12 दिसंबर: कनाडा – मोदी टोरंटो और ओटावा जाएंगे। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत होगी। 13-15 दिसंबर: अमेरिका – फ्लोरिडा में G20 समिट में शामिल होने का कार्यक्रम है। 16-17 दिसंबर: बेल्जियम – ब्रसेल्स में भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते पर चर्चा हो सकती है। अमेरिका और बेल्जियम के कार्यक्रमों की तारीखों की आधिकारिक घोषणा होना बाकि है। ——————– ये खबर भी पढ़ें…. भारत पर 100% टैरिफ लगेगा या नहीं,10 दिन में फैसला: ट्रम्प तय करेंगे रूसी तेल खरीदने वाले किन देशों पर प्रतिबंध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत पर 100% टैरिफ लगाने को लेकर करीब 10 दिन में फैसला ले सकते हैं। यह बात अमेरिकी दूत सर्जियो गोर ने ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में कही। गोर ने कहा कि भारत को प्रतिबंधों से छूट मिलेगी या नहीं, यह भी ट्रम्प ही तय करेंगे।
Imran Khan Controversy: बॉलीवुड अभिनेता इमरान खान की कानूनी टीम ने अब उन दावों को खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि उन्होंने 10 अक्टूबर को मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। टीम का कहना है कि वह बस उस इलाके से गुजर रहे थे। यह स्पष्टीकरण तब आया है जब अधिकारियों ने अभिनेता – जो अमेरिकी नागरिक हैं और जिनके पास ‘ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया’ (OCI) कार्ड है – को 28 अक्टूबर तक भारत छोड़ने का निर्देश दिया है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, खान के वकीलों ने इस दावे को चुनौती दी है कि उन्होंने उस विरोध प्रदर्शन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की गई थी।
वहीं, विरोध प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी को लेकर यह विवाद तब और अहम हो गया, जब ‘फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस’ (FRRO) ने उन्हें देश छोड़ने का नोटिस जारी किया।
इस घटनाक्रम ने अभिनेता के आव्रजन (इमिग्रेशन) दर्जे और भारत में विदेशी नागरिकों की राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े नियमों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
अगस्त क्रांति मैदान में क्या हुआ?
10 अक्टूबर को मुंबई पुलिस ने अगस्त क्रांति मैदान में जुटे या वहां पहुंचने की कोशिश कर रहे सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया था। ये लोग कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से बुलाए गए प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे थे। इस प्रदर्शन में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जा रही थी।
पुलिस की इस कार्रवाई के दौरान हिरासत में लिए गए लोगों में इमरान खान भी शामिल थे। बाद में उन्होंने सोशल मीडिया पर पुलिस वैन के अंदर की अपनी एक तस्वीर शेयर की और कैप्शन लिखा, “लगता है मैं ड्राइव पर जा रहा हूं।”
वहीं, बीजेपी नेता किरीट सोमैया के पुलिस से संपर्क करने के बाद, उस जगह पर अभिनेता की मौजूदगी विवाद का विषय बन गई। सोमैया ने सवाल उठाया कि विदेशी नागरिक होने के बावजूद, अभिनेता ने एक राजनीतिक प्रदर्शन में कैसे हिस्सा लिया। सोमैया ने खान के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि प्रदर्शन में उनकी भागीदारी से यह सवाल उठता है कि क्या उन्होंने विदेशी नागरिकों और OCI कार्डधारकों पर लागू नियमों का पालन किया है। इसके बाद खान को 28 अक्टूबर तक भारत छोड़ने का नोटिस दिया गया, जिससे यह विवाद और गहरा गया।
अब अभिनेता के वकीलों ने प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी को लेकर लगाए गए आरोपों को चुनौती दी है। उनका कहना है कि अभिनेता प्रदर्शन में हिस्सा नहीं ले रहे थे, बल्कि वे बस उस इलाके से गुजर रहे थे।
इमरान खान को भारत छोड़ने के लिए क्यों कहा गया है?
‘जाने तू… या जाने ना’ और ‘डेल्ही बेली’ जैसी फिल्मों के लिए पहचाने जाने वाले इमरान खान, अमेरिका के नागरिक हैं और उनके पास OCI कार्ड है। हालांकि, OCI का दर्जा पात्र विदेशी नागरिकों को कुछ शर्तों के साथ भारत आने और यहां रहने की अनुमति देता है, लेकिन इससे उन्हें भारत की नागरिकता नहीं मिल जाती।
नागरिकता अधिनियम के तहत, OCI कार्ड धारकों को वे राजनीतिक अधिकार नहीं मिलते जो भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं; इनमें वोट देने या चुनाव लड़ने का अधिकार शामिल है। अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाले संवैधानिक संरक्षण – जिनमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने का अधिकार शामिल है – विशेष रूप से केवल भारतीय नागरिकों को ही दिए गए हैं।
हालांकि, भारत में विदेशी नागरिकों के राजनीतिक प्रदर्शनों में शामिल होने को लेकर कानूनी स्थिति इतनी सीधी नहीं है कि उन पर पूरी तरह से रोक हो। इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 के तहत सरकार को भारत में विदेशी नागरिकों की मौजूदगी और उनके आचरण को नियंत्रित करने के व्यापक अधिकार मिले हैं। लेकिन इस कानून में स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया है कि विदेशी नागरिकों या OCI कार्डधारकों के प्रदर्शन में शामिल होने पर पूरी तरह प्रतिबंध है।
ऐसे में इमरान खान के मामले में यह जानना अहम है कि उन्हें भारत छोड़ने का नोटिस किन कानूनी आधारों पर जारी किया गया है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि उनके खिलाफ कार्रवाई किस वजह से की गई।
वकीलों ने अपने दावे के समर्थन में CCTV फुटेज मांगी
इमरान खान की कानूनी टीम ने संकेत दिया है कि वे घटना के दिन उनकी गतिविधियों का पता लगाने के लिए उस इलाके की CCTV फुटेज मांगेंगे। वकीलों का कहना है कि फुटेज से यह स्पष्ट हो सकेगा कि अभिनेता वहां प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे थे या सिर्फ उस इलाके से गुजर रहे थे।
अधिवक्ता जुल्फिकार मेमन ने ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ से कहा, “पुलिस इलाके की CCTV फुटेज निकलवाए, सब कुछ साफ हो जाएगा।”
बचाव पक्ष के मुताबिक, खान नाना चौक से गुजर रहे थे, तभी पुलिस की बैरिकेडिंग के कारण रास्ता रुक गया और मीडिया के लोग उनके पास आ गए। वकीलों ने शिकायतकर्ता के उस आरोप को चुनौती दी है, जिसमें दावा किया गया है कि अभिनेता ने प्रदर्शन में उसी तरह हिस्सा लिया था, जैसा शिकायत में बताया गया है।
बता दें कि हिरासत में लिए जाने से कुछ समय पहले मीडिया से बात करते हुए, खान ने वहां अपनी मौजूदगी के बारे में एक अलग ही बात कही थी। उन्होंने कहा, “मैं यहां एक नागरिक के तौर पर हूं, एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जो इसी शहर में रहता है। मैं यह देखने आया हूं कि लोगों की आवाजाही की आजादी पर रोक क्यों लगाई जा रही है, और लोगों की आवाज को क्यों दबाया जा रहा है।”
यह भी पढ़ें: कनॉट प्लेस में CJP के ‘लहरा दो तिरंगा’ कार्यक्रम के बाद धरने की आशंका, खुफिया एजेंसियों ने किया अलर्ट
Gift Nifty Indicator: शुक्रवार को भारतीय बेंचमार्क सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी के बढ़त के साथ खुलने की संभावना है। गुरुवार की जोरदार तेजी के बाद, GIFT निफ्टी एक सकारात्मक शुरुआत का संकेत दे रहा है। हाल ही में टेक्नोलॉजी शेयरों में हुई बिकवाली के बाद एशियाई बाजारों में सुधार, वॉल स्ट्रीट में तेजी और कच्चे तेल की कीमतों में मामूली गिरावट बाजार के सेंटिमेंट को सहारा दे सकती है। हालांकि, ऊर्जा की ऊंची कीमतें, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली बाजार में सुधार के लिए मुख्य जोखिम बने हुए हैं।
सुबह करीब 8 बजे GIFT निफ्टी 84 अंक या 0.37 फीसदी की बढ़त के साथ 23,072 पर कारोबार कर रहा था। यह गुरुवार को निफ्टी के 23,000 के स्तर के करीब बंद होने के बाद एक सकारात्मक शुरुआत का संकेत है। पिछले सत्र में भारतीय बाजारों में जोरदार तेजी देखी गई थी। सेंसेक्स 1,533.72 अंक (2.11 प्रतिशत) उछलकर 74,315.61 पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी 374.65 अंक (1.66 प्रतिशत) की बढ़त के साथ 22,997.35 पर बंद हुआ। विदेशी संस्थागत निवेशकों ने लगभग 5,285 करोड़ रुपये के शेयर बेचे, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 3,319 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे।
शुक्रवार को एशियाई बाजारों में तेजी रही
सप्ताह की शुरुआत में सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली हुई थी, जिसके बाद निवेशकों ने फिर से खरीदारी की। MSCI एशिया पैसिफिक इंडेक्स में 1.1 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, जिसमें गिरने वाले शेयरों की तुलना में बढ़ने वाले शेयरों की संख्या लगभग तीन गुना अधिक रही। दक्षिण कोरिया का कोस्पी (Kospi) सूचकांक 2.5 प्रतिशत चढ़ा। इसने गुरुवार की उस गिरावट से उबरने में मदद की, जिसने सूचकांक को अप्रैल के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था।
जापान का टॉपिक्स (Topix) 1.7 प्रतिशत, हांगकांग का हैंग सेंग 0.9 प्रतिशत और शंघाई कंपोजिट 0.4 प्रतिशत ऊपर रहे। इसके विपरीत, इंडोनेशिया के बाजार में 8 प्रतिशत की भारी गिरावट आई। इसका कारण यह चिंता है कि इंडोनेशिया को वैश्विक स्टॉक सूचकांकों से बाहर किया जा सकता है। अमेरिकी इक्विटी फ्यूचर्स में कोई खास बदलाव नहीं दिखा; S&P 500 फ्यूचर्स लगभग स्थिर स्तर पर कारोबार कर रहे थे।
निवेशकों के AI शेयरों से हटने के बीच वॉल स्ट्रीट में तेजी
गुरुवार को अमेरिकी शेयर बाजार बढ़त के साथ बंद हुए। शुरुआती नुकसान से उबरते हुए, निवेशकों ने अपना ध्यान हेल्थकेयर और कंज्यूमर शेयरों की ओर मोड़ा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी कंपनियों के वैल्यूएशन और कर्ज के स्तर को लेकर चिंताएं बनी हुई थीं। डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 1.08 प्रतिशत बढ़कर 52,177.69 पर पहुंच गया, जबकि S&P 500 में 0.33 प्रतिशत की तेजी आई और यह 7,744.06 पर बंद हुआ। नैस्डैक कंपोजिट 0.08 प्रतिशत बढ़कर 26,713.03 पर पहुंच गया।
हेल्थकेयर शेयरों (जैसे एली लिली और यूनाइटेडहेल्थ) में खरीदारी देखने को मिली, जबकि कई टेक्नोलॉजी शेयरों पर दबाव बना रहा, क्योंकि निवेशक बढ़ती उधारी लागत (borrowing costs) के बीच अपने निवेश पर पड़ने वाले असर का आकलन कर रहे थे।
ब्रेंट क्रूड की कीमतों में नरमी, लेकिन अभी भी $105 के ऊपर
शुक्रवार को कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में थोड़ी गिरावट आई। निवेशक एक तरफ मध्य पूर्व से होने वाली सप्लाई के जोखिमों पर विचार कर रहे थे, तो दूसरी तरफ इस बात पर भी नजर रखे हुए थे कि क्या अमेरिका वैश्विक ‘शैडो फ्लीट’ (अघोषित टैंकर बेड़े) पर लगी पाबंदियों को कम करने के लिए कोई कदम उठा सकता है। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 0.39 प्रतिशत गिरकर $105.51 प्रति बैरल पर आ गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 0.55 प्रतिशत की गिरावट के साथ $97.43 प्रति बैरल पर आ गया।
इंडेक्स पर क्या हो रणनीति
एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर ने कहा कि भारतीय शेयर बाजारों के लिए निकट भविष्य का नजरिया ‘सावधानी के साथ सकारात्मक’ (cautiously positive) बना हुआ है। हालांकि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बाजार में लगातार तेजी की गुंजाइश को सीमित कर सकती हैं। उन्होंने भू-राजनीतिक अनिश्चितता, वैश्विक बॉन्ड यील्ड और विदेशी संस्थागत निवेश (FII) प्रवाह को ऐसे महत्वपूर्ण कारक बताया, जो बाजार की दिशा तय कर सकते हैं।
पोनमुडी के अनुसार, निवेशक विदेशी निवेश प्रवाह पर बारीकी से नजर रखेंगे, ताकि यह पता चल सके कि जोखिम लेने की क्षमता (risk appetite) में कोई टिकाऊ सुधार हो रहा है या नहीं। वहीं, बाजार में आई यह रिकवरी कितनी टिकाऊ होगी, यह काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक बॉन्ड यील्ड और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगा।
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Gold Investment: कुछ म्यूचुअल फंड हाउसेज ने अस्थायी तौर पर गोल्ड ईटीएफ फंड ऑफ फंड्स (FoFs) में नए निवेश पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी है। यह रोक आज 16 अक्टूबर से ही लागू हो चुकी है। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड, एचडीएफसी म्यूचुअल फंड, आदित्य बिड़ला सन लाइफ म्यूचुअल फंड, इनवेस्को इंडिया म्यूचुअल फंड, डीएसपी म्यूचुअल फंड, टाटा म्यूचुअल फंड और श्रीराम म्यूचुअल फंड जैसे कई फंड हाउसों ने निवेशकों को नोटिस जारी कर के इसकी जानकारी भेज दी है। इस पाबंदी के बाद अब ये इन म्यूचुअल फंड्स के पास गोल्ड ईटीएफ FoF में नया एकमुश्त निवेश नहीं कर सकेंगे, नई एसआईपी नहीं शुरू कर सकेंगे और न ही मौजूदा एसआईपी में टॉप अप कर सकेंगे। कुछ में तो स्विच-इन ट्रांजैक्शन और नए सिस्टेमैटिक ट्रांसफर प्लान (STP) रजिस्ट्रेशन पर भी रोक लगाई गई है।
क्या है इन नोटिसों में
श्रीराम म्यूचुअल फंड ने नोटिस में कहा कि यह रोक सेबी के के निर्देशों के तहत लगाई गई हैं, जिसे AMFI (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया) के जरिए सूचित किया गया है। हालांकि कोई वजह नहीं बताई गई है। फंड हाउस का कहना है कि 16 अक्टूबर से नए एकमुश्त निवेश, नए एसआईपी रजिस्ट्रेशन और मौजूदा एसआईपी में निवेश की राशि बढ़ाने यानी स्टेप-अप की मंजूरी नहीं होगी।
डीएसपी म्यूचुअल फंड ने 15 अक्टूबर के अपने नोटिस में कहा है कि 15 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे के कट-ऑफ समय के बाद के सभी एप्लीकेशन खारिज हो सकते हैं और पैसा निवेशकों को वापस कर दिया जाएगा।
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की 15 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक कोटक महिंद्रा म्यूचुअल फंड, यूटीआई म्यूचुअल फंड और एचडीएफसी म्यूचुअल फंड समेत कई बड़े भारतीय म्यूचुअल फंडों ने गोल्ड ईडीएफ में बल्क सब्सक्रिप्शन यानी एक साथ भारी निवेश रोकने के लिए नोटिस जारी किए हैं।
दशहरा-दिवाली से ठीक पहले रोक
गोल्ड ईटीएफ एफओएफ में निवेश पर रोक दशहरा और दिवाली से ठीक पहले लगाई गई हैं, जब आमतौर पर सोने की मांग बढ़ जाती है। गोल्ड ईटीएफ एफओएफ म्यूचुअल फंड की वह स्कीम है, जिसका पैसा गोल्ड ईटीएफ में लगाया जाता है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल त्योहारी सीजन के दौरान गोल्ड और सिल्वर ETF में निवेश बढ़ा था, क्योंकि स्टॉक मार्केट से कमजोर रिटर्न मिलने के कारण सोने-चांदी का क्रेज बढ़ गया। वहीं इस साल मांग थोड़ी सुस्त पड़ी और भारत में सोने का आयात अगस्त के $230 करोड़ से घटकर सितंबर में $180 करोड़ रह गया।
डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

GSRTC Employees DA Hike: गुजरात राज्य सड़क परिवहन निगम (GSRTC) के कर्मचारियों के लिए राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल द्वारा निगम के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) में 2 प्रतिशत की वृद्धि को मंजूरी दी गई है। इस नई बढ़ोतरी के बाद अब कर्मचारियों को 58 प्रतिशत के बजाय 60 प्रतिशत की दर से महंगाई भत्ता दिया जाएगा।
एरियर के भुगतान से कर्मचारियों को मिलेगा वित्तीय लाभ
राज्य सरकार के इस फैसले से गुजरात एसटी निगम के हजारों कर्मचारियों को बड़ी आर्थिक राहत मिलेगी। इससे पहले जून 2026 में महंगाई भत्ता 3 प्रतिशत बढ़ाकर 58 प्रतिशत किया गया था, और अब इसमें 2 प्रतिशत की और बढ़ोतरी की गई है। नियमित महंगाई भत्ते के अलावा कर्मचारियों को बकाए एरियर (Arrears) का भुगतान भी किया जाएगा, जिससे उन्हें अतिरिक्त वित्तीय लाभ मिलेगा।
नियम और पात्रता से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी
गौरतलब है कि महंगाई भत्ते की गणना हमेशा कर्मचारी के मूल वेतन (Basic Pay) पर ही की जाती है, इसमें मकान किराया भत्ता या अन्य भत्ते शामिल नहीं होते हैं। एसटी निगम में शुरुआत में फिक्स वेतन पर जुड़ने वाले कर्मचारियों को इस महंगाई भत्ते का लाभ नहीं मिलता है। यह विशेष लाभ केवल नियमित पे-स्केल (Regular Pay-scale) प्राप्त करने वाले कर्मचारियों के लिए ही मान्य है।

History of protests in India: हाल के दिनों में चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग को लेकर दिल्ली के मध्य भागों (जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस) में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे युवा प्रदर्शनकारियों, छात्र संगठनों और विपक्षी दलों ने जब सड़कों का रुख किया, तो देश को एक बार फिर भारत के समृद्ध और संघर्षशील लोकतांत्रिक आंदोलनों के इतिहास की याद आ गई।
प्रशासन और सत्ता द्वारा अक्सर ऐसे आंदोलनों को “कानून-व्यवस्था का संकट” या “राष्ट्रविरोधी” करार देने की कोशिशें की जाती रही हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि औपनिवेशिक काल से लेकर आज तक जन-आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का ‘लाइफब्लड’ (प्राणतत्व) रहे हैं।
आइए एक नज़र डालते हैं भारत के उन ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शनों पर, जिन्होंने न केवल नीतियां बदलीं, बल्कि सत्ता के समीकरण भी पलट दिए:
दक्षिण भारत का ‘हिंदी विरोधी आंदोलन’ (1965): भाषा और अस्मिता की लड़ाई
संविधान के तहत 26 जनवरी 1965 से केंद्र सरकार के कामकाज में हिंदी को प्राथमिक आधिकारिक भाषा बनाने की योजना थी। तमिलनाडु के लोगों को आशंका थी कि इससे उनके रोजगार और प्रशासनिक अवसरों पर बुरा असर पड़ेगा।
- नेतृत्व और असर : द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के शीर्ष नेताओं—सी.एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि—के नेतृत्व में तमिलनाडु में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।
- क्या बदला? तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आश्वासन दिया कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहेंगे, तब तक अंग्रेजी का इस्तेमाल जारी रहेगा। इसका राजनीतिक नतीजा यह हुआ कि 1967 के चुनाव में DMK ने कांग्रेस को तमिलनाडु की सत्ता से उखाड़ फेंका और राज्य की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई।

जेपी आंदोलन (1970 का दशक): ‘संपूर्ण क्रांति’ और पहली गैर-कांग्रेसी सरकार
1973-74 में गुजरात और बिहार से शुरू हुआ छात्र आंदोलन जब वयोवृद्ध गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण (JP) के हाथों में आया, तो यह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ एक राष्ट्रीय जनाक्रोश बन गया।
- ऐतिहासिक प्रभाव : जेपी के ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान के जवाब में 25 जून 1975 को देश में आपातकाल (Emergency) लागू कर दिया गया।
- क्या बदला? 1977 में आपातकाल हटने के बाद पूरा विपक्ष एकजुट हुआ और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई। भारत के इतिहास में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार (जनता पार्टी) बनी।
मंडल आयोग का विरोध और उदारीकरण के खिलाफ आंदोलन (1990 का दशक)
1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (V.P. Singh) ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की।
- मंडल बनाम कमंडल : इसके विरोध में जहां देश भर में सवर्ण छात्रों ने तीखे विरोध प्रदर्शन किए, वहीं सामाजिक न्याय के समर्थक इसके पक्ष में खड़े हुए। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर रखते हुए आरक्षण को वैध ठहराया, जिसने भारतीय राजनीति में ‘जातिगत समीकरणों’ को केंद्र में ला दिया।
- आर्थिक सुधारों के खिलाफ हड़ताल (1991) : तत्कालीन पीएम पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा लाए गए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) का ट्रेड यूनियनों और वामपंथियों ने कड़ा विरोध किया। हालांकि, यह आंदोलन नीतिगत सुधारों को रोक नहीं सका और भारत आधुनिक अर्थव्यवस्था की राह पर बढ़ गया।
राम मंदिर आंदोलन (1990 ) आडवाणी की राम रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जनसमर्थन जुटाना था। यह यात्रा 10 हजार किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या पहुंचने वाली थी, लेकिन 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया।
- इस यात्रा से क्या बदला? : इस यात्रा के बाद राम मंदिर आंदोलन ने और तेजी पकड़ी साथ ही आडवाणी की इस यात्रा का भाजपा को चुनावी फायदा मिला। भाजपा के सत्ता में पहुंचने की बड़ी वजह आडवाणी की इस रथयात्रा को भी माना जाता है। हालांकि राम मंदिर आंदोलन का इतिहास काफी पुराना है। 1853 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद परिसर के आसपास पहली बार धार्मिक हिंसा दर्ज की गई थी, जिसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने परिसर के बाहर हिंदुओं को पूजा के लिए चबूतरा (राम चबूतरा) बनाने की अनुमति दी थी।

अन्ना हजारे का ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन’ (2011): इंडिया अगेंस्ट करप्शन
UPA सरकार के कार्यकाल में बड़े भ्रष्टाचार विवादों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की।
- जन-आक्रोश और नतीजा : इस आंदोलन से अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण जैसे चेहरे उभरे। दिसंबर 2013 में संसद ने जन लोकपाल कानून पारित किया। बाद में केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी (AAP) का गठन किया और दिल्ली की सत्ता हासिल की।
‘निर्भया’ आंदोलन (2012): महिलाओं की सुरक्षा और सख्त कानूनी सुधार
16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए भीषण सामूहिक दुष्कर्म और हत्या कांड के बाद पूरा देश उबल पड़ा। इंडिया गेट से लेकर देश के हर कोने में युवाओं और महिलाओं ने स्वप्रेरित होकर विरोध जताया।
- क्या बदला? जनता के भारी दबाव में सरकार ने जस्टिस वर्मा समिति का गठन किया। संसद ने क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट 2013 पारित किया, जिसके तहत यौन अपराधों की कानूनी परिभाषाओं को विस्तृत किया गया और कड़ी सजा का प्रावधान किया गया।
CAA, NRC और NPR विरोधी आंदोलन (2019-20)
दिसंबर 2019 में पारित नागरिकता संशोधन कानून (CAA) ने पड़ोसी देशों से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए नागरिकता का रास्ता आसान किया, जिससे इसके संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर देशव्यापी बहस शुरू हुई। NRC और NPR को लेकर भी आंदोलन हुआ।
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प्रतीक और असर : दिल्ली के शाहीन बाग में हुआ आंदोलन नागरिकता संशोधन कानून (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) का विरोध करने के लिए आयोजित किया गया था।
इस दौरान ‘शाहीन बाग’ महिलाओं के नेतृत्व वाले धरने का प्रमुख प्रतीक बना। हालांकि, आंदोलन कानून को निरस्त नहीं करा सका, लेकिन इसके क्रियान्वयन में देरी हुई और सरकार ने मार्च 2024 में इसके नियम अधिसूचित किए।

किसान आंदोलन (2020-21) : कृषि सुधारों के खिलाफ ऐतिहासिक घेराबंदी
केंद्र सरकार ने 2020 में कृषि बाजारों को उदार बनाने के उद्देश्य से तीन कृषि कानून पारित किए। किसानों को आशंका थी कि इससे सरकारी मंडियों (APMC) और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था कमजोर हो जाएगी।
- ऐतिहासिक वापसी : संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं (सिंघू, टिकरी, गाजीपुर) पर महीनों तक कड़े मौसम के बावजूद डटे रहे।
- क्या बदला? लगभग एक वर्ष तक चले इस आंदोलन के बाद नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में जन-दबाव द्वारा सरकार से बड़ी नीतिगत रियायत हासिल करने का सबसे प्रमुख उदाहरण बना।
‘कॉकरोच’ और युवा आंदोलन (2026): परीक्षा धांधली से प्रशासनिक जवाबदेही तक
हालिया दौर में छात्रों और युवाओं का असंतोष एक नए स्वरूप में सामने आया है। बेरोजगारी पर प्रशासनिक बयानों और राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा (NEET/मेडिकल परीक्षाओं) में हुई कथित अनियमितताओं के विरोध में युवाओं ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम का दबाव समूह बनाया।
- क्या बदला? जुलाई 2026 में व्यापक छात्र प्रदर्शनों के चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ना पड़ा। वर्तमान में यही युवा और विपक्षी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे को लेकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।
भारत का इतिहास गवाह है कि सत्ता किसी भी दल की रही हो, जब-जब नीतियों में आम जनता की उपेक्षा हुई है या लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं, तब-तब सड़कों पर उठे असंतोष के सुरों ने देश की राजनीति को नई दिशा दी है। ये प्रदर्शन साबित करते हैं कि भारतीय लोकतंत्र केवल हर पांच साल में वोट देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जन-विरोध इसका एक जीवित और सशक्त स्तंभ है।





