Janmashtami 2026 Durlabh Sanyog: द्वापर युग जैसे दुर्लभ संयोग में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आज, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त

Janmashtami 2026 Durlabh Sanyog: भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो आज यानी 4 सितंबर 2026 को है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन द्वापर युग में भगवान विष्णु ने देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण के जन्म के समय ग्रह-नक्षत्रों की जैसी स्थिति, लगभग वैसी की स्थिति आज श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के समय भी बन रही है।

शिव पुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्म पुराण आदि में बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में भादपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि दिन बुधवार को रोहिणी नक्षत्र में अर्धरात्रि के समय वृषभ राशि के चंद्रमा में हुआ था। 2026 में भी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि का चंद्रमा है। हालांकि दिन शुक्रवार है। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय जो ग्रह-नक्षत्र थे, वैसी ही स्थिति 4 सितंबर को बन रही है।

कृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर 2026

पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 3-4 सितंबर की मध्य रात्रि 2:30 बजे से शुरू होगी और 5 सितंबर को रात 12:30 बजे तक रहेगी। इसलिए जन्माष्टमी 4 सितंबर दिन शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त 11.05 बजे से प्रारंभ हो रहा है और 12.35 तक रहने वाला है। वहीं इस दिन रोहिणी नक्षत्र रात 11 बजकर 04 मिनट तक है। जन्माष्टमी के दिन सूर्योदय सुबह में 06:00 बजे होगा और सूर्यास्त शाम को 06:39 बजे होगा। उस दिन चंद्रोदय रात 11 बजकर 29 मिनट पर होगा, वहीं चंद्रास्त 5 सितंबर को दोपहर 01:05 बजे होगा।

जन्माष्टमी 2026 तिथि, ग्रह, नक्षत्र की स्थिति

  • वैदिक पंचांग के अनुसार, 4 सितंबर को मध्यरात्रि 2:30 बजे से भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि प्रारंभ है, जो 5 सितंबर को मध्यरात्रि 12:13 बजे तक मान्य रहेगी।
  • 4 सितंबर को रोहिणी नक्षत्र का समय प्रात:काल से लेकर रात 11 बजकर 04 मिनट तक है। 27 नक्षत्रों में रोहिणी नक्षत्र चौथे स्थान पर आता है। रोहिणी नक्षत्र का स्वामी ग्रह चंद्रमा और राशि वृषभ है।
  • 4 सितंबर को चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में पूरे दिन रहेगा। 5 सितंबर को सुबह 10:18 बजे से चंद्रमा मिथुन राशि में प्रवेश करेगा।
  • 4 सितंबर को शुक्रवार दिन है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय दिन बुधवार था।
  • 4 सितंबर की जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में चंद्रमा का द्वापर युग वाला योग बन रहा है।

जन्माष्टमी 2026 मुहूर्त

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी मुहूर्त के लिए निशिता मुहूर्त का ध्यान रखते हैं। जन्माष्टमी का मुहूर्त रात में 11 बजकर 57 मिनट से देर रात 12 बजकर 43 मिनट तक है। इस मुहूर्त में कान्हा का हैप्पी बर्थडे मनाया जाएगा।

जन्माष्टमी 2026: इस समय भूल कर भी न करें पूजा

इस बार की जन्माष्टमी के दिन राहुकाल सुबह में 10 बजकर 45 मिनट से दोपहर 12 बजकर 20 मिनट तक है। वहीं यमगंड दोपहर में 03 बजकर 30 मिनट से शाम 05 बजकर 05 मिनट तक है। इन अशुभ समय में जन्माष्टमी पर कोई नया काम न करें।

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श्रीकृष्‍ण जन्माष्टमी विशेष: जब जीवन हारने लगे, तब श्री कृष्ण का जीवन पढ़िए

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Shri Krishna Janmashtami Traditions

आज मनुष्य के पास पहले से अधिक साधन हैं, लेकिन शायद पहले से कम धैर्य है। उसके पास संवाद के लिए अनेक माध्यम हैं, फिर भी भीतर का अकेलापन बढ़ता जा रहा है। छोटी-सी असफलता उसे भीतर तक हिला देती है, संबंधों में आया मामूली तनाव निराश कर देता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों के लिए 'डिप्रेशन' जैसे शब्द सहजता से बातचीत का हिस्सा बन गए हैं।

 

ऐसे समय में प्रश्न यह नहीं है कि कठिनाइयां क्यों आती हैं; प्रश्न यह है कि कठिनाइयों के बीच मनुष्य स्वयं को कैसे संभाले? इस प्रश्न का उत्तर हजारों वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण के जीवन में छिपा है। यदि कृष्ण को केवल मंदिर में विराजमान भगवान के रूप में देखा जाए, तो हम उनके व्यक्तित्व का एक अत्यंत सीमित भाग ही देख पाएंगे। कृष्ण को समझने के लिए उनके जीवन को देखना होगा—एक ऐसा जीवन जिसमें जन्म से लेकर अंतिम समय तक परिस्थितियां कभी अनुकूल नहीं थीं, लेकिन उन्होंने कभी परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।

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1. संघर्षों से घिरा जन्म और बाल्यकाल का आनंद

कारागार में जन्म: उनका जन्म किसी उत्सव के बीच नहीं, बल्कि कारागार में हुआ। माता-पिता के जीवित रहते हुए भी जन्म लेते ही उनसे दूर होना पड़ा। आधी रात को पिता वसुदेव उन्हें लेकर यमुना पार कर गोकुल पहुंचाते हैं। जिस उम्र में बालक को माता-पिता का आश्रय चाहिए, उस उम्र में कृष्ण का जीवन सुरक्षा और संघर्ष की कहानी बन चुका था।

 

संकटों के बीच मुस्कान: गोकुल में उन्हें यशोदा का वात्सल्य, नंदबाबा का स्नेह और मित्रों का साथ मिला। किंतु वहां भी पूतना से लेकर कालिया नाग तक अनेक संकट सामने आए। बाल-कान्हा हर संकट के बाद मुस्कुराते दिखाई देते हैं। यह मुस्कान सिखाती है कि जीवन में संकट का आना हमारे नियंत्रण में नहीं है, लेकिन संकट के समक्ष हमारी प्रतिक्रिया हमारे हाथ में है।

 

दायित्वों के बीच जीवन का रस: श्रीकृष्ण के बाल्यकाल को प्रायः माखन, बांसुरी, गोपियों और रास की कथाओं तक सीमित कर दिया जाता है। वास्तव में ये प्रसंग सिखाते हैं कि गंभीर जिम्मेदारियों के बीच भी जीवन से आनंद और सहजता समाप्त नहीं होनी चाहिए।

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2. त्याग, विरक्ति और नए दायित्वों की ओर कदम

संसार को पीछे छोड़ना: एक दिन कृष्ण गोकुल छोड़ देते हैं। जिस भूमि ने बचपन दिया, जिन मित्रों के साथ खेले, जिससे उनका भावनात्मक संसार बसा था—सब पीछे छूट गया।

 

समय की मांग स्वीकारना: आज हम नौकरी या शिक्षा के लिए शहर छोड़ते हैं तो विचलित हो जाते हैं। कृष्ण ने तो अपने बचपन का संपूर्ण संसार ही छोड़ दिया, लेकिन वे पीछे मुड़कर रुके नहीं। वे आगे बढ़े क्योंकि समय उनसे नई भूमिका की मांग कर रहा था। मथुरा में कंस का अंत किया और आगे चलकर द्वारका की स्थापना की। राज्य, समाज, राजनीति और सुरक्षा के अनेक उत्तरदायित्व उनके सामने आए।

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3. कुरुक्षेत्र का संदेश: कर्म की गरिमा और आत्मनिर्भरता

अर्जुन का संशय और भगवद्गीता का सार: कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट आज के मनुष्य के संकट जैसा ही था। उसके सामने निर्णय लेने की चुनौती थी, लेकिन भावनाएं और संबंध आड़े आ रहे थे। जब अर्जुन का गांडीव छूट गया, तब श्रीकृष्ण ने उसे जीवन को देखने की नई दृष्टि दी—मनुष्य का अधिकार केवल अपने कर्म पर है, उसके परिणाम पर नहीं। यदि परिणाम की चिंता में कर्म ही छूट जाए, तो जीवन का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।

 

कर्म की गरिमा: स्वयं राजा होते हुए भी कृष्ण शस्त्र उठाने के बजाय अर्जुन के सारथी बने। आज के समाज में जहां पद के आधार पर काम को छोटा-बड़ा समझा जाता है, कृष्ण बताते हैं कि काम की गरिमा पद में नहीं, उसके उद्देश्य और निष्ठा में होती है।

 

सक्षम बनाने का दर्शन: कृष्ण चाहते तो अपनी शक्ति से युद्ध का परिणाम क्षण भर में बदल सकते थे, लेकिन उन्होंने मनुष्य को उसकी जिम्मेदारी स्वयं निभाने दी। वे मनुष्य को आश्रित नहीं, बल्कि सक्षम बनाते हैं।

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4. विपाद के बीच संतुलन और आधुनिक युग की प्रासंगिकता

जीवन के प्रति संतुलन: कृष्ण के जीवन में केवल विजय नहीं थी। उन्होंने वियोग, मृत्यु, युद्ध, प्रियजनों को खोना और अंततः अपने ही वंश का विनाश देखा। इसके बावजूद उन्होंने जीवन का संतुलन कभी नहीं खोया।

युवाओं के लिए प्रेरणा: आज का युवा असफलता, नौकरी न मिलने या संबंध टूटने पर बिखर जाता है। ऐसे समय में कृष्ण का जीवन कहता है:

 

  • तुम्हारी एक असफलता तुम्हारा पूरा जीवन नहीं है।
  • एक परिस्थिति तुम्हारी संपूर्ण पहचान नहीं है।
  • दुःख आएगा, लेकिन दुःख ही अंतिम सत्य नहीं है।
  • वियोग होगा, लेकिन जीवन वहीं समाप्त नहीं होता।

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5. जीवन को साधने की कला

श्रीकृष्ण जीवन से पलायन का दर्शन नहीं देते; वे जीवन के बीच खड़े होकर जीवन को साधने की कला सिखाते हैं। जब मन भ्रमित हो, विकल्प बहुत हों और निर्णय कठिन हो—तब श्रीकृष्ण के विचारों को पढ़िए। जब परिणाम की चिंता कर्म से बड़ी हो जाए या असफलता आत्मविश्वास कम करने लगे—तब कृष्ण के जीवन को देखिए।

 

वे केवल गोकुल के नटखट कान्हा, द्वारका के राजा या कुरुक्षेत्र के सारथी नहीं हैं; वे योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं। वे आज भी संदेश देते हैं कि परिस्थिति चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हो, अपने कर्म, विवेक और धर्म का मार्ग कभी मत छोड़ो। जीवन की सबसे बड़ी विजय कठिनाइयों का समाप्त हो जाना नहीं, बल्कि कठिनाइयों के बीच स्वयं को संभाले रखना है।

 

जय श्री कृष्ण!

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Janmashtami Kab Hai 2026: 4 सितंबर को वज्र योग में मनाया जाएगा भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव, जानें शुभ मुहूर्त और रोहिणी नक्षत्र का समय

Janmashtami Kab Hai 2026: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहार है। यह पर्व भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश और दुनिया में अपार श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद (भादों) माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधी रात रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में हुआ था।

भगवान विष्णु ने माता देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में धर्म की स्थापना, अधर्म का नाश और अत्याचारी राजा कंस के पापों से पृथ्वी को मुक्ति दिलाने के लिए लिया था। श्री कृष्ण के देवकी और वसुदेव पुत्र थे, लेकिन उनका लालन-पालन गोकुल में यशोदा माता और नंदबाबा ने किया। इस साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को है या फिर 5 सितंबर को? इस पर कन्फ्यूजन दूर करने के लिए पंचांग से जानते हैं जन्माष्टमी की सही तारीख और मुहूर्त के बारे में।

जन्माष्टमी की सही तारीख 2026

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस साल 4 सितंबर को 2:25 एएम पर भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि शुरू हो रही है, जो 5 सितंबर को 12:13 एएम तक विद्यमान रहेगी। उदयातिथि के आधार जन्माष्टमी की तिथि 4 सितंबर को पूरे दिन है। वहीं रोहिणी नक्षत्र में रात 11 बजकर 04 मिनट तक है।

पूरे दिन रोहिणी नक्षत्र

4 सितंबर को रोहिणी नक्षत्र पूरे दिन है। यह में 4 सितंबर को मध्यरात्रि 00:29 पर आरंभ होगा और सितम्बर 04 को रात 11 बजकर 04 मिनट तक व्याप्त रहेगा।

जन्माष्टमी पर राहुकाल का ध्यान रखें

जन्माष्टमी के दिन राहुकल सुबह में 10 बजकर 45 मिनट पर प्रारंभ होगा और दोपहर में 12 बजकर 20 मिनट पर खत्म होगा।

वज्र योग और मृगशिरा नक्षत्र में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 

4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के समय मृगशिरा नक्षत्र और वज्र योग होगा। भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन हर्षण योग प्रात:काल से लेकर दोपहर 03:44 पी एम तक रहेगा। उसके बाद से वज्र योग प्रारंभ होगा, जो 5 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगा।

जन्माष्टमी मुहूर्त 2026

इस साल जन्माष्टमी का मुहूर्त रात में 11:57 बजे से लेकर देर रात 12:43 बजे तक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण का जन्म होगा और उत्सव मनाया जाएगा।

जन्माष्टमी का ब्रह्म मुहूर्त 04:30 ए एम से 05:15 ए एम तक रहेगा। इस समय में स्नान करके व्रत का संकल्प कर लें। अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:55 बजे से लेकर दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा। अमृत काल रात में 08:03 पी एम से लेकर 09:33 पी एम तक है।

जन्माष्टमी व्रत का पारण

जन्माष्टमी व्रत का पारण रात 12:43 बजे के बाद कर सकते हैं। जिनके यहां उदयातिथि यानि सूर्योदय के बाद पारण होता है, वे 5 सितंबर को सूर्योदय बाद पारण करेंगे।

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Aja Ekadashi 2026 Date: भादों की पहली एकादशी होगी अजा एकादशी, इस दिन बन रहे दुर्लभ संयोग में पूजा और व्रत का मिलेगा राजसुख

Aja Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। यह व्रत हर हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से सभी कष्टों का निवारण होता है। ऐसा ही एक व्रत है अजा एकादशी का भी। यह व्रत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। यह भादों माह की पहली एकादशी होती है। यह भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत है। सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। आइए जानें इस साल ये व्रत कब किया जाएगा, किस दुर्लभ योग में पूजा और व्रत करने से मिलेगा राजसुख और इसका महत्व क्या है?

अजा एकादशी 2026 तारीख

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 6 सितंबर को शाम 07:29 बजे शुरू होगी और 7 सितंबर को शाम 5 बजकर 3 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर दिन सोमवार को रखा जाएगा। इस व्रत का पारण 8 सितंबर मंगलवार को सुबह में 6 बजकर 2 मिनट से सुबह 8 बजकर 33 मिनट के बीच कर सकते हैं।

सर्वार्थ सिद्धि योग में अजा एकादशी

इस बार की अजा एकादशी पर सर्वार्थ सिद्धि योग शाम को 06 बजकर 14 मिनट पर बनेगा और यह अगले दिन 8 सितंबर को सुबह 06 बजकर 02 मिनट तक रहेगा। व्रत वाले दिन प्रात:काल से लेकर सुबह 06:41 ए एम तक व्यतीपात योग है, उसके बाद से वरीयान् योग बनेगा, जो 8 सितंबर को तड़के 03:38 ए एम तक है, फिर परिघ योग होगा।

अजा एकादशी 2026 मुहूर्त

यदि आपको अजा एकादशी का व्रत रखना है तो पूजा का मुहूर्त सुबह में 06:02 ए एम से 07:36 ए एम तक है, उसके बाद सुबह में 09:10 ए एम से 10:45 ए एम तक है। इस समय में आप भगवान विष्णु की पूजा कर सकते हैं। उस दिन ब्रह्म मुहूर्त 04:31 ए एम से 05:16 ए एम तक है, वहीं अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:54 ए एम से दोपहर 12:44 पी एम तक है।

अजा एकादशी महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने अपने खोए हुए राज्य, परिवार और सम्मान को वापस पाने के लिए महर्षि गौतम के सुझाव पर अजा एकादशी का व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से उन्हें उनका सब कुछ पुनः प्राप्त हो गया था। माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से अजा एकादशी का व्रत रखता है और भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसके समस्त पाप और पूर्व जन्म के बुरे कर्म नष्ट हो जाते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

पूजा विधि

  • एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु के ऋषिकेश स्वरूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उन्हें पीले फूल, तुलसी दल, फल, धूप और दीप अर्पित करें।
  • अजा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें और अंत में भगवान विष्णु की आरती करें।
  • इस दिन गरीबों या जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या तिल का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण किया जाता है।

Rakhi Shubh Muhurat: सुबह का शुभ मुहूर्त चूक गए तो जानिए आज रक्षाबंधन पर कब-कब बांधी जा सकती है राखी और कब नहीं

Rakhi Shubh Muhurat: रक्षा बंधन का पर्व सावन माह की पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाता है। साल 2026 में 27 अगस्त को सुबह 9.08 बजे शुरू हुई पूर्णिमा तिथि आज यानी 28 अगस्त को सुबह 9.48 बजे तक ही व्याप्त थी। 27 अगस्त को सावन पूर्णिमा तिथि सूर्य व्यापिनी नहीं थी। साथ ही, पूर्णिमा तिथि लगने के साथ ही सुबह 9.08 बजे से भद्रा भी लग रही थी। भद्रा को हिंदू धर्म में सबसे अशुभ समय माना जाता है, जिसमें शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। रक्षा बंधन का पर्व भी भद्रा काल में करने की मनाही है।

वहीं, आज यानी 28 अगस्त को उदयातिथि में सावन पूर्णिमा होने और भद्रा रहित समय मिलने की वजह से रक्षा बंधन का पर्व आज मनाया जा रहा है। लेकिन पूर्णिमा तिथि सुबह जल्दी समाप्त होने के करण ऐसे बहुत से भाई-बहन हैं, जो इस समय में राखी नहीं बांध पाए होंगे। ऐसे में क्या अब वे अपना त्योहार नहीं मना पाएंगे? अगर आप भी ऐसा ही कुछ सोच रहे हैं, तो आज यानी 28 अगस्त को दिन के कुछ अन्य शुभ मुहूर्त हम आपको बता रहे हैं, जिसमें बहनें अपने भाइयों को बिना किसी दुविधा या संकोच के राखी बांध सकती हैं और धूमधाम से पर्व का आनंद ले सकती हैं।

राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

सावन माह की पूर्णिमा तिथि 28 अगस्त 2026 को सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक थी। रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने का सबसे उत्तम मुहूर्त सुबह 6 बजकर 23 मिनट से सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 14 मिनट से दोपहर 1 बजकर 5 मिनट तक रहेगा।

राखी बांधने का मुहूर्त 28 अगस्त 2026

चल चौघड़िया : सुबह में 5 बजकर 57 मिनट से 7 बजकर 33 मिनट तक।

लाभ चौघड़िया : सुबह में 7 बजकर 33 मिनट से 9 बजकर 10 मिनट तक।

अमृत चौघड़िया : सुबह में 9 बजकर 10 मिनट से 10 बजकर 46 मिनट तक।

शुभ चौघड़िया : दोपहर में 12 बजकर 22 मिनट से 1 बजकर 58 मिनट तक।

आज इस समय भूलकर भी न बांधें राखी

ऊपर बताए गए मुहूर्त राखी बांधने के लिए शुभ रहेंगे। लेकिन, इस दौरान आपको कुछ बातों का विशेष ख्याल रखना होगा। जैसे की राहुकाल और रोग चौघड़िया जैसे अशुभ मुहूर्त में राखी न बांधे। 28 अगस्त को राहुकाल का समय सुबह 10 बजकर 30 मिनट से दोपहर 12 बजकर 00 मिनट तक है। वहीं, इस दिन रोग चौघड़िया का समय दोपहर में 1 बजकर 58 मिनट से 3 बजकर 35 मिनट तक है। इसके अलावा उद्वेग चौघड़िया दोपहर में 3 बजकर 35 मिनट से 7 बजकर 11 मिनट तक रहेगा।

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Rakhi Bandhne Ke Niyam: राखी बांधते समय ध्यान रखें दिशा का यह नियम, जानें राखी बांधने के ये जरूरी नियम

Rakhi Bandhne Ke Niyam: रक्षा बंधन का त्योहार 28 अगस्त को मनाया जाएगा। सावन माह की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस पर्व का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट रिश्ते, भरोसे और प्रेम का प्रतीक है। बहनें इस दिन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और भगवान से उनके लिए लंबी आयु, सुख-समृद्धि और संपन्नता का आशीर्वाद मांगती हैं। इस रक्षा सूत्र के बदले भाई अपने बहन की हमेशा रक्षा करने का वचन देते हैं।

इस दिन भाई और बहन को राखी बांधते समय कुछ बातों को लेकर बेहद सतर्क रहना चाहिए। माना जाता है कि राखी बांधते समय सही दिशा और विधि का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। ऐसा करने से भाई-बहन के रिश्ते में मिठास बनी रहती है। साथ ही, जीवन में सकारात्मकता और खुशहाली आती है। हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राखी बांधते समय भाई और बहन दोनों की दिशा का ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है :

भाई का मुख : राखी बंधवाते समय भाई का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। ज्योतिष और वास्तु दोनों ही शास्त्रों में इस दिशा को शुभ माना गया है। माना जाता है कि सही दिशा का ध्यान रखते हुए रक्षा बंधन करने पर जीवन में सकारात्मकता बनी रहती है। यह बात ध्यान रखनी बहुत जरूरी है कि राखी बांधते समय गलती से भी भाई का चेहरा दक्षिण दिशा की ओर नहीं होना चाहिए। यह दिशा यम और पितरों की होती है।

बहन का मुख : भाई का मुख पूर्व या उत्तर में होने पर बहन का मुख अपने आप पश्चिम या दक्षिण दिशा की ओर होगा। इस विधि से राखी बांधना शास्त्र सम्मत और सकारात्मक माना जाता है।

राखी बांधने के मुख्य नियम

सिर पर कपड़ा रखें : भाई को नंगे सिर राखी नहीं बंधवानी चाहिए। राखी बंधवाते समय सिर पर रुमाल या कोई कपड़ा अवश्य रखें।

अक्षत और तिलक : सबसे पहले भाई के माथे पर कुमकुम/रोली का तिलक लगाएं और उस पर अक्षत (चावल) लगाएं। ध्यान रखें कि चावल टूटे हुए न हों।

दाहिने हाथ की कलाई : राखी हमेशा भाई की दाहिनी कलाई पर ही बांधी जानी चाहिए।

तीन गांठें लगाएं : राखी बांधते समय उसमें 3 गांठें लगाना शुभ माना जाता है। ये तीन गांठें ब्रह्मा, विष्णु, महेश यानी त्रिदेव का प्रतीक मानी जाती हैं।

आरती उतारें : राखी बांधने के बाद भाई की आरती उतारें, उसका मुंह मीठा कराएं और भाई अपनी बहन के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद ले या उससे छोटी बहन को आशीर्वाद व उपहार दे।

भद्रा काल और राहूकाल का ध्यान : भद्रा काल और राहूकाल में राखी बांधना वर्जित माना जाता है, इसलिए हमेशा शुभ मुहूर्त में ही रक्षासूत्र बांधें।

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Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन पर्व कब है और इसका शुभ मुहूर्त कब है? महंत रोहित शास्त्री से जानें किस समय राखी बांधने से बचें

Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करती हैं। भाई अपनी बहनों का ध्यान रखने और उनकी सुरक्षा करने का वचन देते हैं। हिंदू धर्म में इस पर्व को काफी उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। रक्षा बंधन का पर्व हर साल सावन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं स्टेट अवॉर्डी महंत रोहित शास्त्री ज्योतिषाचार्य ने बताया कि रक्षाबंधन का पावन पर्व इस वर्ष 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा।

कब से लग रही सावन पूर्णिमा तिथि

महंत रोहित शास्त्री के अनुसार, श्रावण पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त, गुरुवार को सुबह 09:09 बजे प्रारंभ होकर 28 अगस्त, शुक्रवार को सुबह 09:49 बजे समाप्त होगी। चूंकि 28 अगस्त को सूर्योदय-व्यापिनी पूर्णिमा है, इसलिए रक्षाबंधन का पर्व इसी दिन मनाया जाएगा।

राहुकाल में नहीं बाधें रखी

महंत रोहित शास्त्री ने बताया कि राहुकाल सुबह 10:45 बजे से दोपहर 12:22 बजे तक रहेगा। अतः इस इस बहनों का भाई का राखी बांधना अशुभ होगा। इस अवधि को छोड़कर पूरे दिन राखी बांध सकते हैं।

रक्षा बंधन में नहीं होगा चंद्रग्रहण का भेद

महंत रोहित शास्त्री ने बताया कि इस दिन चंद्रग्रहण अवश्य है, लेकिन यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इसलिए भारत में रहने वाले लोगों के लिए इससे संबंधित किसी प्रकार की विशेष धार्मिक या सामाजिक नियम करने की आवश्यकता नहीं है। मंदिरों के कपाट बंद करने अथवा पूजा-पाठ रोकने जैसी कोई आवश्यकता नहीं होगी। जब ग्रहण भारत में दिखाई ही नहीं देगा, तो सूतक आदि को लेकर अनावश्यक भय या तनाव पालना उचित नहीं है। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि गर्भवती महिलाओं को घबराने अथवा किसी प्रकार के नियमों का पालन करने की जरूरत नहीं है। गर्भवती महिलाएं अपनी सामान्य दिनचर्या जारी रखें और बेवजह की पाबंदियों से स्वयं को परेशान न करें।

उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्थाओं का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन आस्था के साथ विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी आवश्यक है। किसी भी प्राकृतिक खगोलीय घटना को लेकर डर, भ्रम या अफवाह फैलाने के बजाय सही जानकारी को समझना और दूसरों तक पहुंचाना बेहतर है। अतः इस दिन लोग सामान्य रूप से अपना कार्य करें। गर्भवती महिलाएं निश्चिंत रहें, मंदिरों के कपाट सामान्य रूप से खुले रहें और चंद्रग्रहण को लेकर किसी प्रकार का अनावश्यक भय या भ्रम न रखा जाए।

पूरे दिन मना सकते हैं रक्षा बंधन का पर्व

महंत रोहित शास्त्री ने कहा कि 28 अगस्त को सूर्योदय व्यापिनी तिथि पूरे दिन है, इसलिए रक्षा बंधन का पर्व पूरे दिन मनाया जा सकेगा। पूर्णिमा तिथि के सुबह 9.49 बजे तक ही रहने का कोई प्रभाव नहीं होगा।

पूर्णिमा व्रत को लेकर भी दूर किया भ्रम

श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं स्टेट अवॉर्डी महंत रोहित शास्त्री ज्योतिषाचार्य ने सावन पूर्णिमा के व्रत को लेकर भी भ्रम दूर किया है। उन्होंने कहा कि जो लोग पूर्णिमा तिथि पर रात के समय पूजा करते हैं वे 27 अगस्त को व्रत करेंगे, जबकि दिन में पूर्णिमा व्रत की पूजा करने वाले श्रद्धालु 28 अगस्त 2026 को उपवास करेंगे।

राखी बांधने की पारंपरिक विधि

  • बहन सर्वप्रथम भाई को तिलक लगाए, आरती करें और अक्षत अर्पित करें।
  • इसके बाद भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधे और उसका पूजन करे।
  • भाई को मिठाई खिलाएं।
  • इसके पश्चात भाई बहन के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करें।
  • भाई अपनी बहन को उपहार भेंट करें।
  • यह संपूर्ण प्रक्रिया व्रत अथवा उपवास रखकर संपन्न करना श्रेष्ठ माना गया है।

अगर पास में न हो भाई, तो क्या करें?

यदि भाई-बहन एक स्थान पर उपस्थित न हो सकें, तो बहन भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को राखी बांधकर पूजा करें और भाई की मंगलकामना करें। भाई भी राखी को भगवान से स्पर्श कर रक्षा का संकल्प ले सकता है। श्रद्धापूर्वक किया गया यह प्रतीकात्मक राखी बंधन भी धार्मिक दृष्टि से फलदायी माना जाता है।

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Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन पर ग्रहण और भद्रा के साथ रहेगा पंचक का साया, जानें त्योहार पर पंचक का क्या होगा असर

Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम का पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहनों की हमेशा रक्षा करने का वचन देते हैं और राखी बांधने पर उन्हें उपहार देते हैं। यह पर्व हर साल सावन की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व और इस दिन का विशेष स्थान है। इसके अलावा इस साल रक्षा बंधन पर कई दुर्लभ संयोग बन रहे हैं।

इस साल रक्षा बंधन पर साल 2026 का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण लग रहा है। सावन पूर्णिमा पर भद्रा का साया रहेगा और साथ ही पंचक भी रहेगा। यह तीनों ही ऐसी बातें हैं, जिनमें शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। राखी बांधते समय भद्रा, ग्रहण और पंचक का विचार किया जाता है। ऐसे में लोगों के मन में राखी के त्योहार को लेकर भ्रम हो रहा है कि भद्रा और पंचक के दौरान राखी बांधने को लेकर क्या नियम और मान्यताएं हैं :

भद्रा का विचार : शास्त्रों में भद्रा के समय राखी बांधना पूरी तरह वर्जित माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण को उसकी बहन सूर्पणखा ने भद्रा काल में ही राखी बांधी थी, जिसके कारण उसके पूरे कुल का नाश हो गया। इसलिए भद्रा समाप्त होने के बाद ही राखी बांधी जाती है।

पंचक का विचार : पंचक के दौरान राखी बांधने पर कोई प्रतिबंध या दोष नहीं होता है। पंचक का प्रभाव मुख्य रूप से नए घर के निर्माण, छत ढालने, लकड़ी इकट्ठा करने, दक्षिण दिशा की यात्रा करने या अंतिम संस्कार जैसे कार्यों पर लागू होता है। रक्षाबंधन जैसे शुभ और धार्मिक त्यौहार पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। इस बार पंचक का आरंभ गुरुवार से हो रहा है। गुरुवार से जो पंचक आरंभ होता है उसे सामान्य माना जाता है।

राखी बांधने का सही नियम :

यदि रक्षाबंधन पर भद्रा का साया है, तो भद्रा काल बीतने का इंतजार करें।

पंचक चल रहा हो तब भी आप भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में आराम से राखी बांध सकते हैं।

रक्षाबंधन पर पंचक और भद्रा का समय

27 अगस्त को पंचक दोपहर 1 बजकर 36 मिनट पर लग जाएगा। 28 तारीख को रक्षाबंधन है और पंचक पूरे पांच दिन रहता है। पंचक 1 सितंबर को सुबह 3 बजकर 24 मिनट पर समाप्त होगा।

27 अगस्त को भद्रा पूर्णिमा तिथि आरंभ होने के साथ ही लग जाएगी और रात 9 बजकर 29 मिनट तक रहेगी। इसलिए रक्षाबंधन 27 की बजाय 28 अगस्त को मनाया जाएगा। 28 को सूर्योदय के साथ पूर्णिमा तिथि 9 बजकर 49 मिनट तक ही है जो भद्रा मुक्त है।

रक्षाबंधन के दिन शतभिषा नक्षत्र रहेगा। इसलिए इस दिन राखी बांधने को कोई दोष नहीं लगेगा। रक्षाबंधन शतभिषा नक्षत्र में होगा। इसलिए आप बेफिक्र होकर राखी बांध सकते हैं।

रक्षाबंधन पर रहेगा चंद्र ग्रहण?

इस साल का दूसरा और अंतिम चंद्रग्रहण 28 अगस्त को लगने जा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि चंद्रग्रहण के दिन क्या राखी बांध सकते हैं। चंद्रग्रहण का सूतक काल ग्रहण आरंभ होने से 9 घंटे पहले लग जाता है। लेकिन, यह चंद्रग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा इसलिए इसका सूतक भी मान्य नहीं होगा। इसलिए रक्षाबंधन का पर्व आप बिना किसी के चिंता का मना सकते हैं।

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Sawan Purnima 2026: सावन का महीना अब समापन की ओर बढ़ रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार, उत्तर भारत में मुख्य रूप से प्रचलित पूर्णिमान्त कैलेंडर में श्रावण मास का समापन श्रावण पूर्णिमा के दिन होता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र यानी राखी बांधती हैं और भाई उनकी रक्षा का वचन देते हैं। इसी दिन ब्राह्मण और द्विज समाज के लोग पुराना यज्ञोपवीत उतार कर नया धारण करते हैं। साथ ही, श्रावण पूर्णिमा को ‘विश्व संस्कृत दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है।

सावन पूर्णिमा के दिन सिर्फ रक्षाबंधन का पर्व ही नहीं, गायत्री जयंती, वरलक्ष्मी व्रत और नारली पूर्णिमा भी मनाई जाती है। इस साल सावन का अंतिम दिन और भी खास है, क्योंकि इस दिन चंद्र ग्रहण भी लग रहा है। हालांकि ये ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, जिस कारण से इसका यहां कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। बता दें, हर हिंदू माह में पूर्णिमा का दिन माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा के लिए भी खास माना जाता है। सावन की पूर्णिमा पर भगवान शिव की भी पूजा की जाती है। इसलिए इस दिन को जीवन में खुशहाली और सुख समृद्धि लाने के लिए बेहद अहम माना जाता है। अगर आप इस दिन कुछ खास उपाय करते हैं तो घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है।

कब है श्रावण पूर्णिमा 2026?

सावन महीना 28 अगस्त 2026 को खत्म हो रहा है। इस दिन श्रावण पूर्णिमा है, जो 27 अगस्त 2026 की सुबह 09:08 बजे से 28 अगस्त 2026 की सुबह 09:48 बजे तक रहेगी।

सावन पूर्णिमा के उपाय

  • श्रावण पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि विधान पूजा जरूर करें, उन्हें मखाने की खीर का भोग लगाएं। साथ ही कनकधारा स्तोत्र या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। कहते हैं ऐसा करने से धन-धान्य में वृद्धि के रास्ते खुलते हैं।
  • सावन के आखिरी दिन मां लक्ष्मी के चरणों में 5 साबुत पीली कौड़ियां और थोड़ा अक्षत अवश्य चढ़ाएं। पूजा के बाद इन कौड़ियों और चावल को एक लाल रेशमी कपड़े में बांधकर घर की तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रख दें। मान्यता है इस उपाय को करने से घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती।
  • सावन के अंतिम दिन शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद शिवलिंग पर शुद्ध जल भी जरूर चढ़ाएं। इसके बाद शिवजी को बेलपत्र और शमी के पत्ते चढ़ाएं। मान्यता है कि सावन के आखिरी दिन भक्तिभाव से यह उपाय करने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
  • सावन के अंतिम दिन यानी श्रावण पूर्णिमा की रात में चंद्र देव की पूजा भी जरूर करें। रात में चांदी के पात्र में साफ जल, थोड़ा सा कच्चा दूध, अक्षत और सफेद फूल मिलाकर चंद्र देव को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय चंद्र देव के मंत्र को 3 बार जरूर बोलें। मंत्र है ‘ॐ चंद्राय नमः’।
  • सावन के आखिरी दिन पीपल के वृक्ष पर जल अर्पित करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। साथ ही पीपल के पेड़ पर सरसों के तेल का दीपक भी जलाएं। कहते हैं इससे सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है।
  • सावन के अंतिम दिन किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को तिल, सफेद वस्त्र, चावल, दूध या भोजन का दान जरूर करें। कहते हैं इससे माता लक्ष्मी की असीम कृपा प्राप्त होती है।

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Rakshabandhan 2026: इस रक्षाबंधन पर एक नहीं बल्कि 7 शुभ योग बन रहे हैं, जानें रक्षाबंधन की तारीख और राखी बांधने के शुभ मुहूर्त

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Rakshabandhan 2026: रक्षाबंधन 2026 शुक्रवार, 28 अगस्त को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, इस साल यह त्योहार खास तौर पर शुभ माना जा रहा है क्योंकि एक ही दिन सात अत्यंत दुर्लभ और शुभ योग बन रहे हैं। ग्रहों और नक्षत्रों का ऐसा मेल होने की उम्मीद है, जिसका परिणाम बहुत शुभ होगा। इससे भी जरूरी बात यह है कि भद्रा त्योहार पर असर नहीं डालेगी, जिससे बहनों को अपने भाइयों की कलाई पर पवित्र धागा बांधने के लिए ज्यादा समय मिलेगा।

रक्षाबंधन पर भद्रा नहीं

पंचांग के अनुसार, भद्रा गुरुवार, 27 अगस्त को सुबह 9:08 बजे शुरू होगी और उसी दिन रात 9:27 बजे खत्म होगी। इसलिए, 28 अगस्त को भद्रा नहीं होगी, जिससे परिवार बिना इस रोक के रक्षाबंधन मना सकेंगे। भद्रा को राखी बांधने के लिए अशुभ समय माना जाता है। हालांकि, इस साल यह त्योहार से एक दिन पहले खत्म हो जाएगी।

रक्षाबंधन पर सात शुभ योग

रक्षाबंधन 2026 को खास बनाने के लिए कई अच्छे ज्योतिषीय संयोग बनने की उम्मीद है। इनमें शतभिषा नक्षत्र, सुकर्मा योग, त्रिपुष्कर योग और सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ-साथ दूसरे शुभ ग्रहों की स्थिति शामिल है।

शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव में चंद्रमा कुंभ राशि में रहेगा। ज्योतिष में, यह नक्षत्र वरुण देव से जुड़ा है और राहु इसका स्वामी है। इस दौरान की जाने वाली पूजा, दान और दूसरे आध्यात्मिक कामों का खास महत्व माना जाता है।

कर्क राशि में बृहस्पति का होना भी अच्छा माना जाता है। इसके अलावा, भद्रा का न होना भी उन वजहों में गिना जा रहा है जो इस दिन को रक्षाबंधन की रस्में करने के लिए ज़्यादा सही बनाती हैं।

सावन पूर्णिमा तिथि कब से कब तक है?

पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह करीब 9:09 बजे शुरू होने और 28 अगस्त को सुबह करीब 9:48 बजे खत्म होने की उम्मीद है। पूर्णिमा 28 अगस्त को सूर्योदय के समय रहेगी, इसलिए उदया तिथि की परंपरा के अनुसार उसी दिन रक्षाबंधन मनाया जाएगा। पूर्णिमा का व्रत करने वाले श्रद्धालु 27 अगस्त को उपवास कर सकते हैं, जबकि बहनें 28 अगस्त को राखी बांध सकती हैं।

राखी बांधने का सबसे अच्छा समय

सुबह का मुहूर्त : सुबह 5:57 बजे से 9:48 बजे तक

शुभ चौघड़िया के आधार पर एक और शुभ समय इस समय रहने की उम्मीद है:

शुभ चौघड़िया : सुबह 11:45 बजे से दोपहर 1:19 बजे तक

राहु काल में राखी बांधने से बचें

राहु काल सुबह 10:11 बजे से 11:45 बजे तक रहने की उम्मीद है। ज्योतिष के हिसाब से समय मानने वाले परिवार इस दौरान राखी बांधने से बच सकते हैं।

पंचांग का समय शहर और कैलेंडर के हिसाब से थोड़ा अलग हो सकता है। इसलिए परिवार यह रस्म करने से पहले लोकल मुहूर्त देख सकते हैं।

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