Russia-Ukraine War: यूक्रेन में लक्ष्मी मित्तल के स्टील प्लांट पर रूस का मिसाइल अटैक! 2 की मौत, ब्लास्ट-फर्नेस तबाह

Russian Attack on ArcelorMittal Ukraine: रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। भारतीय मूल के अरबपति लक्ष्मी मित्तल के स्वामित्व वाले ‘आर्सेलरमित्तल’ (ArcelorMittal) के यूक्रेन स्थित विशाल स्टील प्लांट पर रूस ने भीषण मिसाइल हमला किया है। यह हमला यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के गृहनगर क्रिवी रिह (Kryvyi Rih) में स्थित प्लांट पर हुआ, जिसमें 2 लोगों की मौत हो गई और 14 कर्मचारी गंभीर रूप से घायल हो गए।

रॉयटर्स के अनुसार, इस हमले से देश के सबसे बड़े स्टील प्लांट की पावर-जनरेशन और ब्लास्ट-फर्नेस इकाइयों को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे प्लांट का उत्पादन आंशिक रूप से रोकना पड़ा है।

ब्लास्ट-फर्नेस और पावर यूनिट तबाह, उत्पादन ठप

कंपनी ने मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम पर जारी एक बयान में पुष्टि की कि रात के समय हुए इस मिसाइल हमले ने प्लांट के मुख्य इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया। आर्सेलरमित्तल क्रिवी रिह ने कहा कि पावर जनरेशन और ब्लास्ट-फर्नेस सेक्टर की प्रमुख सुविधाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई हैं, जिसके कारण विनिर्माण प्रक्रियाओं को अस्थायी रूप से रोकना पड़ा है।

यह प्लांट यूक्रेन के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक परिसरों में से एक है। ऊर्जा आपूर्ति और ब्लास्ट-फर्नेस को नुकसान पहुंचने से देश के स्टील उद्योग को बड़ा झटका लगा है।

राष्ट्रपति जेलेंस्की का गृहनगर बना निशाना, दागे 62 मिसाइलें

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने सोशल मीडिया पर इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि रूसी सेना नागरिक और औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार निशाना बना रही है। जेलेंस्की के मुताबिक, पिछले केवल एक हफ्ते में ही रूस ने यूक्रेन के शहरों पर 1,550 से अधिक अटैक ड्रोन, करीब 1,560 गाइडेड एरियल बम और 62 मिसाइलें दागी हैं। क्रिवी रिह के अलावा कीव और अन्य शहरों में हुए हमलों में भी कई नागरिक घायल हुए हैं और इमारतों में आग लग गई।

रूस ने कीव और क्रिवी रिह के सैन्य-औद्योगिक ठिकानों को बनाया निशाना

रूसी रक्षा मंत्रालय ने हमले की पुष्टि करते हुए अपनी दलील दी कि उसने क्रिवी रिह के मेटलर्जिकल प्लांट और कीव में स्थित सैन्य-औद्योगिक सुविधाओं को ही निशाना बनाया था। इसके साथ ही मॉस्को ने दावा किया कि उसने अपनी सीमा की ओर आ रहे 822 यूक्रेनी ड्रोनों को हवा में ही मार गिराया है।

जवाब में यूक्रेन का रूस पर भीषण ड्रोन हमला

यूक्रेन ने भी रूस के अंदर गहराई तक जाकर लंबी दूरी के ड्रोनों से करारा पलटवार किया है। मॉस्को क्षेत्र के गवर्नर आंद्रेई वोरोब्योव के अनुसार, युद्ध की शुरुआत के बाद से यूक्रेन द्वारा किया गया यह अब तक का सबसे बड़ा ड्रोन हमला था, जिसमें 83 वर्षीय एक बुजुर्ग की मौत हो गई। पोडॉल्स्क में रूस की सबसे बड़ी ऑनलाइन रिटेलर ‘वाइल्डबेरीज’ (Wildberries) के एक बड़े गोदाम पर ड्रोन गिरा, जिससे वहां धुएं का विशाल गुबार उठता देखा गया।

बेलगोरोड शहर के पास एक बस पर हुए ड्रोन हमले में 1 व्यक्ति की मौत हुई, जबकि रोस्तोव (Rostov) क्षेत्र में यूक्रेन ने रूस की मिसाइल ईंधन उत्पादन इकाई को निशाना बनाने का दावा किया।

नाटो क्षेत्र में घुसा संदिग्ध रूसी ड्रोन, स्पेनिश लड़ाकू विमान ने मार गिराया

युद्ध का यह तनाव अब नाटो (NATO) देशों की सीमा तक पहुंच गया है। रोमानिया के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, मोलदोवा की दिशा से एक ड्रोन रोमानियाई हवाई क्षेत्र में घुस आया।

नाटो के एयर-पुलिसिंग मिशन पर तैनात स्पेनिश वायुसेना के F-18 फाइटर जेट ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उस ड्रोन को मार गिराया। नाटो प्रवक्ता के अनुसार यह एक संदिग्ध रूसी ड्रोन था। चालू वर्ष में रोमानियाई सीमा पर इस तरह की यह चौथी घटना है।

फ्रंटलाइन पर युद्ध की गति धीमी पड़ने और शांति वार्ताओं के अधर में लटके होने के कारण, अब रूस और यूक्रेन दोनों ही एक-दूसरे के ऊर्जा, औद्योगिक और आर्थिक ठिकानों को मिसाइल व ड्रोनों से नष्ट करने की रणनीति अपना रहे हैं। लक्ष्मी मित्तल के प्लांट पर हुआ यह हमला इस बात का प्रमाण है कि यह युद्ध अब वैश्विक और क्षेत्रीय व्यापार परिसंपत्तियों को भी भारी नुकसान पहुंचा रहा है।

रूस का यूक्रेन पर मिसाइल हमला:भारतवंशी अरबपति लक्ष्मी मित्तल की स्टील कंपनी को निशाना बनाया, 2 की मौत

रूस ने शनिवार रात यूक्रेन के क्रिवी रिह शहर में भारतीय मूल के अरबपति लक्ष्मी मित्तल की कंपनी आर्सेलरमित्तल के स्टील प्लांट पर मिसाइल हमला किया। हमले में दो लोगों की मौत हो गई और 13 कर्मचारी व ठेकेदार घायल हुए हैं। यह यूक्रेन का सबसे बड़ा स्टील प्लांट है। हमले के बाद प्लांट में प्रोडक्शन का कुछ काम रोकना पड़ा। प्लांट की ऊर्जा व्यवस्था और ब्लास्ट फर्नेस से जुड़े अहम हिस्सों को नुकसान पहुंचा है। हमले के बाद दमकलकर्मी, बचाव दल और मेडिकल टीमें मौके पर पहुंचीं। राहत और बचाव का काम जारी है। प्लांट में क्या बनता है? क्रिवी रिह का आर्सेलरमित्तल प्लांट यूक्रेन का सबसे बड़ा स्टील प्लांट है। यहां स्टील बनाने के लिए बड़े ब्लास्ट फर्नेस और दूसरी उत्पादन इकाइयां हैं। रूस के हमले में इन्हीं उत्पादन से जुड़े कुछ अहम हिस्सों को नुकसान पहुंचा है। इसलिए कंपनी ने प्लांट का कुछ काम अस्थायी रूप से रोक दिया है। 2022 में भी हुआ था हमला इस प्लांट पर रूस पहले भी हमला कर चुका है। 2022 में हुए रूसी मिसाइल हमले में प्लांट की एक रोलिंग मिल नष्ट हो गई थी और एक कर्मचारी की मौत हुई थी। इस बार का हमला ऐसे समय हुआ है, जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है और रूसी हमले यूक्रेन के अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बना रहे हैं। लक्ष्मी मित्तल की कंपनी यूक्रेन में क्यों अहम है? आर्सेलरमित्तल क्रिवी रिह यूक्रेन की अर्थव्यवस्था के लिए अहम औद्योगिक इकाई है। यह कंपनी दुनिया की बड़ी स्टील कंपनियों में शामिल आर्सेलरमित्तल का हिस्सा है, जिसके चेयरमैन और प्रमुख शेयरधारक भारतीय मूल के उद्योगपति लक्ष्मी निवास मित्तल हैं। प्लांट यूक्रेन के बड़े औद्योगिक शहर क्रिवी रिह में स्थित है। यह शहर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की का गृहनगर भी है। मित्तल ने 2005 में खरीदा था यूक्रेन का यह स्टील प्लांट यूक्रेन का क्रिवी रिह स्टील प्लांट पहले सरकारी कंपनी के पास था। 2005 में लक्ष्मी मित्तल की कंपनी मित्तल स्टील ने इसे खरीद लिया। इसके बाद मित्तल स्टील का आर्सेलर के साथ विलय हुआ और 2006 में आर्सेलरमित्तल बनी। तब से यह प्लांट इसी कंपनी का हिस्सा है। लक्ष्मी मित्तल भारतीय मूल के बड़े उद्योगपतियों में गिने जाते हैं। उनकी कंपनी आर्सेलरमित्तल दुनिया की बड़ी स्टील कंपनियों में शामिल है और कई देशों में कारोबार करती है। ———————- ये खबर भी पढ़ें…. रूस पर यूक्रेन का सबसे बड़ा ड्रोन हमला:6 की मौत; मॉस्को के पास ई-कॉमर्स गोदाम में आग लगी; रूस ने 1400 ड्रोन मार गिराए यूक्रेन ने रविवार को रूस पर युद्ध शुरू होने के बाद अब तक का सबसे बड़े ड्रोन हमला किया है। इसमें कम से कम 6 लोगों की मौत हो गई। इन ड्रोन हमलों में मॉस्को के पास रूसी ई-कॉमर्स कंपनी वाइल्डबेरिज के डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर में आग लग गई। पूरी खबर यहां पढ़ें…

रूस पर यूक्रेन का सबसे बड़ा ड्रोन हमला:6 की मौत, मॉस्को के पास गोदाम में आग लगी; रूस ने 1400 ड्रोन मार गिराए

यूक्रेन ने रविवार को रूस पर युद्ध शुरू होने के बाद अब तक का सबसे बड़े ड्रोन हमला किया है। इसमें कम से कम 6 लोगों की मौत हो गई। इन ड्रोन हमलों में मॉस्को के पास रूसी ई-कॉमर्स कंपनी वाइल्डबेरिज के डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर में आग लग गई। यह गोदाम करीब 2 लाख वर्ग मीटर में फैला है। सामने आई तस्वीरों में इमारत का बड़ा हिस्सा आग की चपेट में दिखाई दिया। आसमान में दूर तक काला धुआं उठता नजर आया। रूस के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि उसने पिछले 24 घंटे में 9 यूक्रेनी क्रूज मिसाइल और कुल 1,478 ड्रोन मार गिराए हैं। मॉस्को के मेयर सर्गेई सोब्यानिन ने बताया कि करीब 600 ड्रोन राजधानी की ओर दागे गए थे। उन्होंने इसे पिछले दो साल में मॉस्को पर हुआ सबसे बड़ा हवाई हमला बताया। यूक्रेन ने 1,500 मील तक हमला करने की क्षमता बढ़ाई यूक्रेन ने 2026 में अपनी लंबी दूरी की ड्रोन और मिसाइल क्षमता में तेजी से इजाफा किया है। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, अब वह रूस की सीमा से करीब 1,500 मील दूर तक मौजूद ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम है। यूक्रेन इन हथियारों से रूस के गोदामों, तेल रिफाइनरियों, बंदरगाहों और सैन्य ठिकानों पर हमले कर रहा है। इससे युद्ध में पहली बार रूस की लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता को कड़ी चुनौती मिल रही है। दोनों देशों की एयर डिफेंस यानी हवाई हमलों को रोकने वाले सिस्टम पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा है। वाइल्डबेरीज के ठिकाने क्यों निशाने पर? पिछले एक महीने में यूक्रेन ने वाइल्डबेरीज से जुड़ी कई इमारतों और सुविधाओं को निशाना बनाया है। कंपनी रूस के ऑनलाइन कारोबार में बड़ी भूमिका निभाती है और इसके डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर देशभर में फैले हैं। यूक्रेन के हमलों में करीब 20 गोदामों और दूसरी इमारतों को निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है। ऐसे हमलों का मकसद रूस की सप्लाई चेन और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है। रूस के हमलों में यूक्रेन में 7 लोगों की मौत इसी दौरान रूस ने यूक्रेन पर भी ड्रोन और मिसाइल हमले किए। इन हमलों में कम से कम 7 लोगों की मौत हुई। यूक्रेन के सूमी सीमा क्षेत्र में 2 लोगों की मौत हुई, जबकि देश के दूसरे हिस्सों में 3 और लोगों के मारे जाने की जानकारी सामने आई है। रविवार सुबह करीब 3 बजे कीव पर बैलिस्टिक मिसाइल से हमला किया गया। इसमें 6 लोग घायल हुए और राजधानी में कई जगह आग लग गई। कीव के ओबोलोंस्की जिले में पेट्रोव्का बुक मार्केट का बड़ा हिस्सा जल गया। दुकानदारों के मुताबिक, आग में उनकी किताबों का पूरा स्टॉक नष्ट हो गया। जेलेंस्की बोले- रूस नागरिक इलाकों को निशाना बना रहा यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने इमरजेंसी सर्विस के कर्मचारियों की तारीफ की। उन्होंने रूस पर नागरिक इलाकों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने का आरोप लगाया। जेलेंस्की ने कहा कि रूस अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों की पहुंच वाले इलाकों में नागरिक ढांचे पर हमला कर रहा है। उनके मुताबिक, पिछले एक हफ्ते में रूस ने यूक्रेन के शहरों और दूसरे इलाकों पर 1,550 से ज्यादा ड्रोन, करीब 1,560 गाइडेड बम और 62 मिसाइल दागीं। इनमें बड़ी संख्या बैलिस्टिक मिसाइलों की थी। बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकना यूक्रेन के लिए बड़ी चुनौती यूक्रेन धीमी गति से आने वाले ड्रोन को रोकने में काफी हद तक सफल रहा है। लेकिन तेज गति से आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकना उसके लिए बड़ी चुनौती है। ऐसी मिसाइलों को रोकने में अमेरिका की Patriot एयर डिफेंस प्रणाली अहम भूमिका निभाती है। हालांकि, लगातार हो रहे रूसी हमलों के कारण यूक्रेन के पास इन इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार सीमित हो गया है।

Suryapath Tiranga 2026: सूरज की चाल के साथ पूरी दुनिया में फहरा तिरंगा! जानें क्या है ‘सूर्यपथ तिरंगा’ रिले

Suryapath Tiranga: स्वतंत्रता दिवस 2026 के अवसर पर एक अनोखा वैश्विक जश्न देखने को मिला, जिसमें तिरंगा सूरज की उगती किरणों के रास्ते के साथ पूरी दुनिया में यात्रा करते हुए नजर आया। संस्कृति मंत्रालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में इस वैश्विक आयोजन की पूरी जानकारी साझा की गई है, जिसे सूर्यपथ तिरंगा नाम दिया गया है। यह विशेष पहल हर घर तिरंगा 2026 अभियान के तहत आयोजित की गई थी।

फिजी से शुरू हुई सूर्यपथ तिरंगा की वैश्विक यात्रा

संस्कृति मंत्रालय के बयान के मुताबिक सूर्यपथ तिरंगा की इस अनूठी यात्रा की शुरुआत भारतीय समयानुसार (IST) रात 1:30 बजे फिजी से हुई, जहां रिले के पहले प्वाइंट पर तिरंगा फहराया गया। फिजी के बाद यह प्रतीकात्मक यात्रा सूरज की चाल के साथ पश्चिम की ओर बढ़ी और न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जापान, कोरिया गणराज्य, चीन, इंडोनेशिया, वियतनाम, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड और म्यांमार से होते हुए आगे बढ़ी। दुनिया भर में स्थित भारतीय मिशनों और पोस्ट्स पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया जिससे समय क्षेत्रों और महाद्वीपों के पार तिरंगे की एक निरंतर दृश्य रिले तैयार हुई।

सुबह 8:00 बजे तक यह यात्रा बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव तक पहुंच चुकी थी, जो पूरे क्षेत्र में भारत के गौरव और एकता का संदेश ले जा रही थी। इसके बाद यह रिले पश्चिम की ओर बढ़ते हुए उज्बेकिस्तान और ओमान से गुजरी, सुबह 9:45 बजे संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और भारतीय समयानुसार सुबह 10:30 बजे कतर तक जा पहुंची। मात्र नौ घंटों में तिरंगे ने प्रशांत महासागर में दिन के सबसे पहले उजाले से लेकर पश्चिम एशिया तक की प्रतीकात्मक यात्रा पूरी की, जिसके जरिए 21 देशों और मिशनों/पोस्ट्स को एक साझा राष्ट्रीय प्रतीक से जोड़ा गया। ‘सूर्यपथ तिरंगा’ ने उगते सूरज को देशभक्ति के एक वैश्विक रिले में बदल दिया।

अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका तक फैला तिरंगे का कारवां

संस्कृति मंत्रालय की विज्ञप्ति के अनुसार, भारतीय समयानुसार सुबह 10:45 बजे के बाद ‘सूर्यपथ तिरंगा’ की पश्चिम की ओर यात्रा लगातार जारी रही। यह सफर कुवैत, सऊदी अरब, इथियोपिया, रूस, केन्या, इजराइल, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका से होकर गुजरा। हर एक झंडा फहराने के साथ तिरंगा नए टाइम जोन और भूगोल को पार करता हुआ पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरेशिया तक पहुंच गया। दोपहर 12:30 बजे तक यह रिले प्रिटोरिया पहुंच चुकी थी।

इसके बाद यात्रा ने यूरोप में प्रवेश किया, जहां लातविया से लेकर जर्मनी, इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, स्पेन, मोरक्को और आइसलैंड तक लगातार तिरंगा फहराया गया। दोपहर 12:45 बजे रीगा से शुरू होकर दोपहर 3:00 बजे रेकजाविक तक इस रिले ने पूरे यूरोप में जश्न की एक अद्भुत श्रृंखला बना दी। जैसे-जैसे ‘सूर्यपथ तिरंगा’ और पश्चिम की ओर बढ़ा, यह यात्रा अटलांटिक पार करते हुए अमेरिका की तरफ बढ़ गई।

क्या है सूर्यपथ तिरंगा का उद्देश्य?

हर घर तिरंगा 2026 के तहत इस विशेष पहल पर बात करते हुए संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने कहा कि सूर्यपथ तिरंगा हमारे देश के शक्तिशाली प्रतीक तिरंगे के जरिए भारत की भावना को पूरी दुनिया तक पहुंचाता है। उन्होंने कहा कि उगते सूरज के पथ का अनुसरण करते हुए यह अनूठी रिले हमारे मिशनों और भारतीय प्रवासियों को भारत की एकता, विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों के साझा जश्न में पिरोती है। यह दुनिया भर के भारतीयों के लिए एक आमंत्रण है कि वे एक साथ आएं और भारत की चिरस्थायी भावना को दुनिया के साथ साझा करें। कुल मिलाकर 40 से अधिक देशों में भारतीय नागरिकों और भारत के मित्रों को जोड़ने वाली इस ग्लोबल तिरंगा रिले ने यह साबित कर दिया कि सूरज जहां भी उगता है, वहां तिरंगे की भावना साथ चलती है।

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के 5 साल पूरे:महिलाओं की आजादी छीनी, प्रेस पर पाबंदियां बढ़ीं, लोगों को कोड़े से मारने की सजा दी गईं

तालिबान के काबुल पर कब्जे के आज पांच साल पूरे हो गए हैं। पांच साल में अफगानिस्तान की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। तालिबान ने पूरे देश पर अपना नियंत्रण मजबूत किया और अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार आया। लेकिन दूसरी तरफ महिलाओं के अधिकारों पर सख्त पाबंदियां लगीं, प्रेस की आजादी घटी और शारीरिक सजाएं फिर आम हो गईं। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2021 से नवंबर 2022 के बीच अदालतों ने कम से कम 18 मामलों में शारीरिक सजा का आदेश दिया। इनमें ज्यादातर मामले तथाकथित नैतिक अपराधों से जुड़े थे। दिसंबर 2022 में परवान प्रांत के एक स्टेडियम में भीड़ के सामने 27 लोगों को सबके सामने कोड़े मारे गए। तालिबान से पहले की अफगान सरकारों के दौर में भी शारीरिक सजा मौजूद थी, लेकिन तालिबान के शासन में इसे खुले तौर पर और नियमित रूप से लागू किया जाने लगा। 15 अगस्त 2021: काबुल में दाखिल हुआ तालिबान अफगानिस्तान में 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया। कुछ ही घंटों में अफगान सरकार का पतन हो गया। कमर्शियल फ्लाइट रद्द हो गईं और हजारों लोग देश छोड़ने के लिए काबुल एयरपोर्ट पहुंच गए। तालिबान ने उस समय महिलाओं के अधिकार बनाए रखने और अमेरिका व पिछली अफगान सरकार के साथ काम करने वालों को माफी देने का वादा किया था। प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा था कि लोगों को अपनी संपत्ति, जान या सम्मान को लेकर खतरा नहीं होगा। लेकिन अगले पांच साल में तस्वीर इन वादों के बिल्कुल उलट नजर आई। छात्राओं को सेकेंडरी स्कूल और यूनिवर्सिटी जाने से रोका अफगानिस्तान अब दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां छात्राओं को औपचारिक रूप से सेकेंडरी स्कूल और यूनिवर्सिटी में पढ़ने से रोक दिया गया है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद महिलाओं पर पाबंदियां लगातार बढ़ती गईं। नौकरी करने, और सार्वजनिक जगहों पर जाने को लेकर भी कई तरह की पाबंदियां लगाई गईं। UN की रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान के राज में अब तक महिलाओं के खिलाफ 100 से ज्यादा फरमान जारी हो चुके हैं। सर्वे में शामिल 10 में से 7 महिलाओं ने अपनी मानसिक स्थिति को खराब या बहुत खराब बताया। आधे से ज्यादा महिलाओं ने कहा कि वे महीने में सिर्फ एक या दो बार घर से बाहर निकलती हैं। करीब तीन-चौथाई महिलाओं ने पुरुष अभिभावक के बिना घर से बाहर निकलने में असुरक्षा महसूस होने की बात कही। रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में सिर्फ 7% महिलाएं नौकरी कर रही हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 84% है। प्रेस पर दबाव, सैकड़ों पत्रकारों ने देश छोड़ा तालिबान शासन में पत्रकारिता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स यानी CPJ ने अफगानिस्तान को पत्रकारों के लिए दुनिया की सबसे खतरनाक और मुश्किल जगहों में शामिल किया है। 2021 के बाद से कई अफगान पत्रकार देश छोड़ चुके हैं। तालिबान शासन में अफगानिस्तान की इकोनॉमी बढ़ीं तालिबान के शासन में अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद नहीं हुई। कुछ क्षेत्रों में सुधार के संकेत मिले हैं। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक 2025 में अफगानिस्तान की वास्तविक GDP 4.8% बढ़ी। सरकार का घरेलू राजस्व भी बढ़कर GDP का 19.8% हो गया। लेकिन इस ग्रोथ का फायदा आम लोगों तक व्यापक रूप से नहीं पहुंचा। प्रति व्यक्ति आय घटी है और महंगाई बढ़ी है। देश अभी भी बड़े स्तर पर आयात पर निर्भर है। बिजली की कमी, बैंकिंग सुविधाओं तक सीमित पहुंच, बड़े अनौपचारिक कैश सेक्टर और विदेशी मदद में कमी भी आर्थिक विकास के लिए बड़ी चुनौती हैं। अफीम की खेती में 95% गिरावट तालिबान के सत्ता में आने के समय अफगानिस्तान दुनिया में अफीम का सबसे बड़ा स्रोत था। UNODC के मुताबिक 2022 में दुनिया की करीब 80% अफीम अफगानिस्तान से आती थी। अप्रैल 2022 में तालिबान ने पोस्ता (अफीम का पौधा) की खेती पर रोक लगा दी। इसका सीधा असर खेती पर पड़ा। UNODC के 2023 के सर्वे के मुताबिक पोस्ता की खेती में 95% की गिरावट आई। रूस ने तालिबान सरकार को मान्यता दी तालिबान सरकार को अब तक सिर्फ रूस ने औपचारिक रूप से मान्यता दी है। हालांकि तालिबान का कहना है कि वह करीब 40 देशों के संपर्क में है और औपचारिक मान्यता के लिए जरूरी शर्तें पूरी कर चुका है। भारत ने भी तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दिए बिना काबुल के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं। अक्टूबर 2025 में तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी भारत आए थे। यह तालिबान सरकार के किसी वरिष्ठ अधिकारी की भारत की पहली यात्रा थी। चीन और UAE ने भी तालिबान द्वारा नियुक्त राजदूतों को स्वीकार किया है, हालांकि दोनों ने अब तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है। —————- यह खबर भी पढ़ें… PM रहमान की भारत यात्रा से पहले बांग्लादेश की शर्त: शेख हसीना को राजनीति से दूर रखा जाए; 21 अगस्त को दिल्ली आ सकते हैं बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान 21 अगस्त को पहली बार भारत दौरे पर आ सकते हैं। यात्रा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, लेकिन इसे अंतिम रूप देने से पहले दोनों देशों के बीच कुछ अहम मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का है। पूरी खबर पढ़ें…

दावा- चीनी सामान भारत के रास्ते अमेरिका भेजा जा रहा:टैरिफ से बचने की कोशिश; अमेरिकी रिपोर्ट में पुणे, गुजरात और चेन्नई नेटवर्क का हिस्सा

अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए चीनी प्रोडक्ट्स को भारत के रास्ते अमेरिकी बाजारों में पहुंचाया जा रहा है। यह दावा व्हाइट हाउस की रिपोर्ट ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम: राइज, स्कोप एंड कॉस्ट्स’ में किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन से आने वाले सामान या पार्ट्स को पहले भारत समेत दूसरे एशियाई देशों में भेजा जाता है। वहां उन्हें प्रोसेस, असेंबल या किसी दूसरे प्रोडक्ट में इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद तैयार सामान को अमेरिका निर्यात किया जाता है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि इससे चीन पर लगाए गए टैरिफ से बचने का रास्ता मिल सकता है। रिपोर्ट में इसके लिए दुनिया भर में ट्रेड रूट्स का नेटवर्क बनने की बात कही गई है। भारत के पुणे, गुजरात और चेन्नई को चीन से आने वाले सामान के एक अहम रास्ते के तौर पर बताया गया है। रिपोर्ट में यहां बनने वाले इंडस्ट्रियल पंप और कंप्रेसर में चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल होने की संभावना का खास तौर पर जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में रूट नेटवर्क को ‘अग्ली सिस्टर सिटीज’ कहा गया चीनी सामान को तीसरे देशों के जरिए अमेरिका भेजने के लिए इस्तेमाल हो रहे रूट नेटवर्क को रिपोर्ट में ‘अग्ली सिस्टर सिटीज’ कहा गया है। इसका मतलब शहरों की सुंदरता या बदसूरती से नहीं है। यह शब्द अलग-अलग देशों के ऐसे औद्योगिक शहरों के लिए इस्तेमाल किया गया है, जहां एक जैसे प्रोडक्ट बनते हैं और वे अमेरिकी बाजार में एक-दूसरे से मुकाबला करते हैं। भारत के मामले में रिपोर्ट ने पुणे, गुजरात और चेन्नई की तुलना अमेरिका के ओहायो राज्य के सिनसिनाटी, डेटन और कोलंबस से की है। इन अमेरिकी शहरों में भी पंप, कंप्रेसर और दूसरे औद्योगिक सामान का उत्पादन और कारोबार होता है। रिपोर्ट का तर्क है कि अगर तीसरे देशों के जरिए कम टैरिफ पर सामान अमेरिका पहुंचता है, तो वहां के स्थानीय निर्माताओं को नुकसान हो सकता है। अमेरिकी कंपनियों को कम कीमत वाले आयात से मुकाबला करना पड़ सकता है। इसका असर उत्पादन, ऑर्डर और नौकरियों पर भी पड़ सकता है। मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम और थाईलैंड का भी जिक्र व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में सिर्फ भारत का जिक्र नहीं है। इसमें मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम और थाईलैंड के उन इलाकों का भी जिक्र है, जहां बड़े पैमाने पर सामान बनाया और दूसरे देशों को भेजा जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे रास्तों से हर साल अरबों डॉलर का सामान अमेरिकी बाजार तक पहुंच सकता है, जिसमें चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल किया गया हो। क्या ये टैरिफ से बचने की कोशिश को साबित करता है? किसी प्रोडक्ट में चीनी पार्ट का इस्तेमाल होना और चीन का सामान सिर्फ भारत के रास्ते अमेरिका भेजना, दोनों अलग बातें हैं। अगर भारत में किसी प्रोडक्ट की असली मैन्युफैक्चरिंग, असेंबली और उस पर काफी काम हो रहा है, तो उसे सिर्फ चीन का सामान घुमाकर अमेरिका भेजना नहीं माना जा सकता। इसलिए यह देखा जाता है कि प्रोडक्ट बनाने में असल काम और प्रोडक्ट की कीमत में कितना हिस्सा किस देश में तैयार हुआ है। सिर्फ किसी प्रोडक्ट में चीनी पार्ट लगा होने से यह साबित नहीं होता कि टैरिफ से बचने की कोशिश हुई है। आज की ग्लोबल सप्लाई चेन में एक प्रोडक्ट के अलग-अलग पार्ट कई देशों में बनते हैं और उसकी आखिरी असेंबली किसी दूसरे देश में हो सकती है। अमेरिका अब AI और डेटा से संदिग्ध शिपमेंट पकड़ेगा रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब अमेरिका तीसरे देशों के जरिए टैरिफ से बचने की कोशिशों पर निगरानी बढ़ा रहा है। व्हाइट हाउस ने सीमा पर आने वाले सामान की जांच में टेक्नोलॉजी और डेटा एनालिसिस के ज्यादा इस्तेमाल की बात कही है। रिपोर्ट में ऐसे AI सिस्टम का भी जिक्र है, जो अमेरिकी कस्टम अधिकारियों को संदिग्ध शिपमेंट की पहचान करने में मदद कर सकता है। इसका मकसद पूरी सप्लाई चेन को ट्रैक करना है। —————— यह खबर भी पढ़ें… अमेरिकी सर्वे-10 में 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं: भारतीयों के लिए रूस सबसे अहम पार्टनर, पाकिस्तानियों की पहली पसंद चीन 10 में से 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं, ये बात अमेरिकी प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में सामने आई है। इंडियंस भी अपना सबसे बड़ा दुश्मन पाकिस्तान को ही मानते हैं। सर्वे में कहा गया कि दोनों देशों के लोग पड़ोसी के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं, लेकिन भरोसे की कमी है। पूरी खबर पढ़ें…

इंडियन आर्मी में अग्निवीर बनना गल्फ जाने से बेहतर…जानिए गोरखा भर्ती में अड़ंगा लगाना नेपाल को कैसे पड़ रहा भारी

भारतीय सेना प्रमुख की काठमांडू यात्रा (16 अगस्त) से ठीक पहले नेपाल के पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों और उनके समर्थकों ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया है। इन पूर्व सैनिकों की मुख्य मांग है कि भारत सरकार अपनी अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती करने की प्रक्रिया को तुरंत फिर से शुरू करे। हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट के एक एक्सप्लेनर आर्टिकल के मुताबिक यह प्रदर्शन बुधवार को इंडियन एक्स-सर्विसमेन गोरखा ब्रिगेड नेपाल पोखरा द्वारा आयोजित किया गया था। प्रदर्शनकारियों ने पोखरा स्टेडियम से कास्की जिले के जिला प्रशासन कार्यालय तक रैली निकाली और बाद में नेपाल की फेडरल गवर्नमेंट को दो सूत्री ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में अग्निवीर भर्ती को तत्काल बहाल करने और अपने नाम में सैनिक शब्द का इस्तेमाल करने वाले पूर्व सैनिक संगठनों का नवीनीकरण करने की मांग की गई है।

प्रदर्शन के दौरान पूर्व सैनिक और उनके परिजन अपने हाथों में बैनर और तख्तियां लिए हुए थे। इन पर ‘अग्निपथ के तहत नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती करो’, ‘गृह मंत्रालय के पत्र को रद्द करो’ और ‘पूर्व सैनिकों की आवाज सुनो’ जैसे नारे लिखे थे। प्रदर्शन को संबोधित करते हुए ब्रिगेड के अध्यक्ष कर्नल कृष्ण बहादुर खत्री ने चेतावनी दी कि सुगौली संधि के दौर से चली आ रही 200 साल से भी अधिक पुरानी परंपरा अब खतरे में पड़ गई है। उन्होंने कहा कि सुगौली संधि के बाद भारत में नेपाली युवाओं की भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई थी और यह 207 वर्षों से लगातार जारी थी। भारत द्वारा अग्निपथ योजना लागू किए जाने के बाद नेपाल सरकार ने विभिन्न कारणों का हवाला देते हुए नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती होने से रोक दिया है, जिससे सैकड़ों युवाओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।

नेपाल की ‘रातोपाटी’ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व सैनिकों द्वारा सरकार को सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है कि 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले खाड़ी (गल्फ) देशों में जाकर न्यूनतम वेतन पर काम करने की तुलना में भारतीय सेना में नौकरी करना सैकड़ों गुना बेहतर है। अग्निपथ योजना के तहत चार साल की सेवा के दौरान युवा विभिन्न सुविधाओं के साथ लगभग 45 से 50 लाख रुपये कमा लेते हैं।

क्या है भारत की अग्निपथ योजना?

भारत सरकार ने साल 2022 में सैन्य भर्ती प्रक्रिया में बदलाव लाने के उद्देश्य से अग्निपथ योजना की घोषणा की थी। इस योजना के तहत भारतीय सशस्त्र बलों में अधिकारी रैंक से नीचे (सैनिक, एयरमैन और नाविक) के जवानों को चार साल के कार्यकाल के लिए भर्ती किया जाता है। चार साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद योग्यता और संगठनात्मक जरूरतों के आधार पर अधिकतम 25 प्रतिशत अग्निवीरों को 15 साल के स्थायी कमीशन के लिए शामिल किया जाता है, जबकि बाकी 75 प्रतिशत को एकमुश्त राशि देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है। इन्हें पेंशन नहीं दी जाती।

अगर किसी अग्निवीर की ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो जाती है तो उनके परिवार को 1 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि और बची हुई सेवा अवधि का पूरा वेतन मिलता है। वहीं दिव्यांगता के मामले में सैन्य सेवा के कारण हुई विकलांगता के प्रतिशत के आधार पर 44 लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाता है। इस योजना की घोषणा के समय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि अग्निपथ सशस्त्र बलों के लिए एक गेम चेंजर है और यह सेना को युवा, हाई-टेक और अति-आधुनिक बनाता है। इस योजना का उद्देश्य सशस्त्र बलों में युवा खून को शामिल करना और सेना के वेतन तथा पेंशन बिल को कम करना है।

नेपाल को अग्निपथ योजना पर क्यों थी आपत्ति?

अग्निपथ योजना से पहले भारतीय सेना स्वतंत्रता के समय नेपाल, भारत और ब्रिटेन के बीच साइन की गई त्रिपक्षीय संधि के तहत नेपाली गोरखा सैनिकों की भर्ती करती थी। इस संधि के तहत गोरखा सैनिकों की चार रेजिमेंट (2nd, 6th, 7th और 10th) ब्रिटिश सेना को सौंपी गई थीं। बाकी रेजिमेंट (1st, 3rd, 4th, 5th, 8th और 9th) भारतीय सेना के पास रहीं। आजादी के तुरंत बाद भारत ने 11वीं गोरखा राइफल्स नाम से एक नई रेजिमेंट भी बनाई थी। इस समझौते में भारतीय सेना में सेवारत नेपाली गोरखा सैनिकों के नियम, शर्तें, सेवानिवृत्ति के लाभ और पेंशन तय की गई थी।

रिपोर्टों के मुताबिक किसी भी समय भारतीय सेना में लगभग 32000 से 35000 नेपाली गोरखा सैनिक अपनी सेवाएं देते थे। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नेपाल में भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों की आबादी लगभग 1.32 लाख है। जब भारत ने अग्निपथ योजना की शुरुआत की तो काठमांडू स्थित नेपाल सरकार ने भारतीय सेना में अपने युवाओं की भर्ती पर रोक लगा दी। नेपाल सरकार का तर्क था कि यह योजना 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है और भर्ती नियमों में किसी भी बदलाव से पहले नेपाल से चर्चा की जानी चाहिए थी। नेपाली टाइम्स से बातचीत में नेपाल के इतिहासकार प्रत्युष ओंटा ने भी कहा था कि त्रिपक्षीय समझौते का सदस्य होने के नाते भारत सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले नेपाल से राय लेनी चाहिए थी।

गोरखा भर्ती रोकने से नेपाल को क्या हो रहा है नुकसान?

भारतीय सेना में गोरखा भर्ती पर रोक लगाने का नेपाल का फैसला खुद उसी पर भारी पड़ रहा है और देश को इसका बड़ा आर्थिक व सामाजिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। जब नेपाली गोरखा भारतीय सेना में सेवा देते थे तो वे हर साल लगभग 1000 करोड़ रुपये का रेमिटेंस अपने घर नेपाल भेजते थे। भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत रणजीत राय के मुताबिक यह पैसा नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा सहारा था।

त्रिभुवन विश्वविद्यालय (काठमांडू) के सेन्ट्रल डिपार्टमेंट ऑफ रूरल डेवलपमेंट स्टडीज के लेक्चरर डॉ. रत्न मणि नेपाल के शोध पत्र ‘द गुरखा रिक्रूटमेंट, रेमिटेंस एंड डेवलपमेंट’ के मुताबिक विदेशी सेनाओं में काम करने वाले गोरखाओं से मिलने वाला रेमिटेंस नेपाल के दूर-दराज गांवों में सामाजिक आधुनिकीकरण और उद्यमिता विकास का एक स्थायी जरिया रहा है। इसके अलावा सेवानिवृत्त गोरखा राइफल्स के जवान दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण सद्भावना कड़ी (का काम करते हैं।

भारतीय सेना में नौकरी के अवसर बंद होने की वजह से नेपाल के कई युवा अब आजीविका के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना की ओर से लड़ने चले गए हैं। काठमांडू सरकार के अनुमान के मुताबिक 200 से अधिक नेपाली युवा पुतिन की सेना में शामिल होने के लिए रूस जा चुके हैं। आपको बता दें कि पूर्व रक्षा प्रमुख (CDS) जनरल अनिल चौहान ने इस मुद्दे पर कहा था कि भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती पर अंतिम फैसला काठमांडू सरकार को ही लेना है। अब यह काठमांडू पर निर्भर करता है कि वह अग्निपथ योजना के तहत अपने सैनिकों को भारतीय सेना में सेवा के लिए भेजता है या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि नेपाल के नागरिकों के लिए अलग योजना और भारतीय नागरिकों के लिए अलग योजना नहीं हो सकती।

अमेरिकी सर्वे-10 में 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं:भारतीयों के लिए रूस सबसे अहम पार्टनर, पाकिस्तानियों की पसंद चीन

अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर के नए सर्वे में सामने आया है कि करीब 10 में से 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं। वहीं भारतीय भी पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। सर्वे में दावा किया गया है कि दोनों देशों के लोग अपने पड़ोसी के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं। लेकिन दोनों के बीच भरोसे की कमी साफ नजर आ रही है। दूसरी ओर, भारत रूस को अपना सबसे बड़ा दोस्त मानता है। वहीं, पाकिस्तान ने चीन को अपना सबसे बड़ा सहयोगी देश माना है। 21% भारतीय मुस्लिमों ने पाकिस्तान पर पॉजिटिव राय रखी प्यू के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में पाकिस्तान को लेकर नेगेटिव सोच कोई नई बात नहीं है। हालांकि, भारत के अलग-अलग समुदायों में राय एक जैसी नहीं है। 21% भारतीय मुस्लिमों ने पाकिस्तान के बारे में पॉजिटिव राय जताई। हिंदुओं में यह आंकड़ा 6% रहा। खतरे के सवाल पर भी अंतर दिखा। 34% भारतीय मुस्लिमों ने पाकिस्तान को भारत का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक खतरा बताया, जबकि हिंदुओं में यह आंकड़ा 57% था। दूसरी ओर, सर्वे में पाकिस्तानियों की भारत को लेकर यह नेगेटिव सोच पाकिस्तान के अलग-अलग साजाजिक समूहों में ज्यादा दिखाई दी है। पहलगाम हमले के बाद रिश्ते और बिगड़े सर्वे में भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव का भी जिक्र है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने 26 लोगों की हत्या कर दी थी। इनमें ज्यादातर पर्यटक थे। इसके बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव बढ़ गया। इसके बाद भारत सरकार ने 1960 की सिंधु जल संधि को रोकने का फैसला किया। सिंधु जल संधि पाकिस्तान के लिए खास तौर पर अहम है। पाकिस्तान की खेती और पानी की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। 58% भारतीयों की रूस को लेकर पॉजिटिव राय भारत में 36% लोगों ने रूस को अपना सबसे जरूरी सहयोगी बताया। अमेरिका को 16% लोगों ने चुना। वहीं, पाकिस्तान में 75% लोगों ने चीन को अपना बड़ा सहयोगी माना। 12% ने सऊदी अरब को देश का दोस्त बताया। रूस चीन अमेरिका भारत की विदेश नीति किसी एक देश के साथ नहीं जुड़ी सर्वे से भारत की विदेश नीति की एक और अहम बात सामने आती है। भारत में किसी एक विदेशी देश को लेकर पाकिस्तान जैसी एकतरफा मजबूत पसंद नहीं दिखती। भारत की विदेश नीति में कई बड़े देशों के साथ एक साथ रिश्ते बनाए रखने की कोशिश दिखाई देती है। भारत अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहा है। दूसरी तरफ रूस के साथ उसके पुराने रक्षा संबंध हैं। चीन के साथ सीमा पर तनाव और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है, लेकिन बहुपक्षीय मंचों पर दोनों देश कई मुद्दों पर साथ भी काम करते हैं। इसे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और मल्टी-अलाइनमेंट की नीति से जोड़कर देखा जा सकता है। मल्टी-अलाइनमेंट यानी कई देशों के साथ अपने हित के हिसाब से रिश्ते रखना। यानी भारत किसी एक बड़े देश के खेमे में पूरी तरह जाने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने हित के हिसाब से रिश्ते बनाए रखना चाहता है। ——————- पाकिस्तान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तानी PM की धमकी- पानी रोका तो मुंहतोड़ जवाब देंगे: कश्मीर पर रुख कभी नहीं बदलेंगे, मुनीर की लीडरशिप में हमने दुश्मन को हराया पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु जल समझौते को लेकर भारत को एक बार फिर धमकी दी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर कोई समझौता नहीं होगा। अगर इसे रोकने या कम करने की कोशिश हुई तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…

ट्रम्प ने ड्रोन इंपोर्ट पर 100% तक टैरिफ लगाया:राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया, चीनी कंपनियों को सबसे ज्यादा नुकसान

अमेरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अनमैन्ड ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स के आयात यानी इंपोर्ट पर 100% तक का टैरिफ लगाने का ऐलान किया। अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों और चीनी कंपनियों के वर्चस्व वाले इस सेक्टर में दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से यह फैसला लिया है। व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इस फैसले से अमरीका में ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स का घरेलू प्रोडक्शन बढ़ेगा और विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता कम होगी। पिछले साल तक अमेरीकी कॉमर्शियल ड्रोन बाजार में चीनी कंपनी की लगभग 70% हिस्सेदारी थी। ड्रोन के वजन और क्षमता के हिसाब से टैरिफ तय हुआ व्हाइट हाउस के मुताबिक, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील माने जाने वाले ड्रोन पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा। लागू होने की समय-सीमा और छूट के नियम नया टैरिफ स्ट्रक्चर अलग-अलग समय-सीमा में लागू किया जाएगा… विशेष छूट: हस्ताक्षर के 20 दिनों के भीतर अमरीकी युद्ध विभाग यानी डिपार्टमेंट ऑफ वॉर द्वारा FCC की कवर्ड लिस्ट से छूट प्राप्त प्रोडक्ट्स और कंपोनेंट्स पर भी टैरिफ 180 दिनों बाद प्रभावी होगा। ब्रिटेन और यूरोप समेत 7 सहयोगी देशों पर भी टैरिफ अमेरिका ने केवल विरोधी देशों पर ही नहीं, बल्कि अपने सहयोगी देशों से आने वाले ड्रोन पर भी टैरिफ लागू किया है… चीन की ड्रोन कंपनियों पर नकेल कसने की तैयारी फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ट्रम्प प्रशासन चीनी ड्रोन तकनीक पर अपनी कार्रवाई तेज कर रहा है। पिछले साल दिसंबर में फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) ने चीनी ड्रोन के आयात पर प्रतिबंध की घोषणा की थी और विरोधी देशों के ड्रोन को वायरलेस कम्युनिकेशंस की मंजूरी देने पर रोक लगा दी थी। वैश्विक बाजार में शेनझेन स्थित कंपनी DJI टेक्नोलॉजीज का दबदबा है, जिसकी पिछले साल तक अमेरीकी कॉमर्शियल ड्रोन बाजार में लगभग 70% हिस्सेदारी थी। इसके अलावा, हाल ही में चीन ने भी अमरीकी व्यापारिक प्रतिबंधों के जवाब में अमेरीका को ड्रोन एक्सपोर्ट पर रोक लगा दी थी और छह कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया था। रूस-यूक्रेन युद्ध और हाइब्रिड वॉर से बढ़ी चिंता ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, रूस-यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक युद्धक्षेत्र में ड्रोन की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर किया है। दोनों देशों द्वारा इलाके की रक्षा और उस पर कब्जा करने के लिए ड्रोन के इस्तेमाल ने एक नए हाइब्रिड वॉर को जन्म दिया है। ट्रम्प ने अपने आधिकारिक पत्र में अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम को अमरीका की राष्ट्रीय और आर्थिक सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी करार दिया है। एक्सपर्ट्स की राय: कॉमर्शियल मार्केट का ढांचा पूरी तरह बदलेगा अमरीका-चीन टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा के विशेषज्ञ क्रेग सिंगलेटन ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि यह फैसला कॉमर्शियल मार्केट को पूरी तरह से नया आकार देगा। क्रेग सिंगलेटन ने कहा कि अमरीकी कॉमर्शियल और सरकारी खरीदारों को तुरंत एक बड़े पूंजीगत बदलाव की जरूरत होगी। उन्हें अब अमरीका या सहयोगी देशों के सप्लायर्स की तरफ रुख करना होगा, भले ही उनके प्रोडक्ट्स की कीमत ज्यादा क्यों न हो। यह फैसला चीन के ड्रोन बाजार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है और ट्रम्प तथा चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली आगामी बैठक से पहले तनाव बढ़ा सकता है। क्या है अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम (UAS)? अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम (UAS) को सामान्य भाषा में ड्रोन कहा जाता है। ये ऐसे विमान होते हैं जिन्हें बिना किसी इंसानी पायलट के रिमोट कंट्रोल या ऑटोमैटिक सॉफ्टवेयर के जरिए उड़ाया जाता है। इनका इस्तेमाल फोटोग्राफी, सामान की डिलीवरी से लेकर मिलिट्री सर्विलांस और सटीक हमलों तक में किया जाता है। ये खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट बोला- पैकेज्ड फूड पर वॉर्निंग लेबल लगाओ: ज्यादा चीनी-नमक और फैट की जानकारी दो, सरकार ऐसा नहीं करती तो हम आदेश देंगे सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स के वॉर्निंग लेबल पर केंद्र सरकार और फूड सेफ्टी अथॉरिटी (FSSAI) को आखिरी चेतावनी दी है। कोर्ट ने कहा कि नमकीन, बिस्किट और चिप्स के पैकेट पर ज्यादा चीनी-नमक और फैट की चेतावनी देने वाले वॉर्निंग लेबल लगाने पर अगर सरकार फैसला नहीं ले पा रही है तो हम आदेश जारी करेंगे। पूरी खबर पढ़ें…

पीएम रात में नहीं सोते, अमित शाह संसद से भाग गए…राहुल गांधी ने दिखाए तेवर, कहा- हम इनको पागल कर देंगे!

पीएम रात में नहीं सोते, अमित शाह संसद से भाग गए...राहुल गांधी ने दिखाए तेवर, कहा- हम इनको पागल कर देंगे!

Rahul Gandhi vs PM Modi: कांग्रेस सांसद राहुल गांधी एक कार्यक्रम में एकदम बेबाक और आक्रामक अंदाज में नजर आए। 'रचनात्मक कांग्रेस राष्ट्रीय अधिवेशन' के मंच से उन्होंने न सिर्फ केंद्र सरकार की नीतियां पर सवाल खड़े किए, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और संघ (RSS) पर भी ऐसा तंज कसा कि सियासी गलियारों में खलबली मच गई। अपनी चिर-परिचित बेबाकी में राहुल ने कहा कि सरकार किसी की सुनना नहीं चाहती, लेकिन हम इनको पागल कर देंगे।

पीएम को रात को नहीं सोते… 

राहुल गांधी ने पीएम मोदी की कार्यशैली पर सीधा कटाक्ष करते हुए कहा कि पीएम रात-रात भर नहीं सोते। इसके पीछे कई गहरे और छुपे हुए कारण हैं। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लपेटे में लेते हुए कहा कि खुद को चाणक्य और सरदार पटेल बताने वाले अमित शाह संसद में घुस भी नहीं पाए और भाग निकले। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वे पहली बार देश की असली आवाज (एक्सप्रेशन) सुन रहे हैं।

राहुल ने लोगों से निडर होने की अपील की। उन्होंने कहा कि देश में कई लोग इन कायरों की फौज के सामने खुद भी कायरों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। जब आपकी लड़ाई जोकरों के एक समूह से है, तो फिर किसी से डरने की क्या जरूरत? राहुल ने मंच से कार्यकर्ताओं को दिल खोलकर बोलने की आजादी का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा कि जो दिल में है, बेझिझक बोलिए। अगर हिंदू हैं तो शिव की बात कीजिए, मुस्लिम हैं तो अल्लाह की बात कीजिए। अगर कोई भटक जाएगा तो हम प्यार से सही राह दिखा देंगे।

सरकार की विदेश नीति पर सवाल

राहुल गांधी ने कहा कि अमेरिका-ईरान युद्ध हुआ। ऐसे में अगर इंदिरा गांधी जैसा नेतृत्व होता, तो हमारे पास सबसे बड़ा अवसर होता। क्योंकि ईरान हमारा पुराना दोस्त है, अमेरिका और रूस भी हमारा दोस्त है तो हम इनकी आपस में दोस्ती करा सकते थे। लेकिन पाकिस्तान हमारी जगह उठाकर ले गया और नरेंद्र मोदी देखते रह गए।

आरएसएस को भारत की समझ ही नहीं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधते हुए राहुल ने कहा कि संघ के लोगों को 3000 साल पुराने भारत का ताना-बाना नहीं, बल्कि आज के आधुनिक भारत को समझने की जरूरत है। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में मंच से आरएसएस के स्टाइल में सैल्यूट करने की बात कही और जोड़ा कि आरएसएस का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन अगर कोई आरएसएस को अनुचित तरीके से दबाने की कोशिश करेगा, तो हम उसकी रक्षा के लिए भी खड़े होंगे।

पीएम पीसी क्यों नहीं करते?

मोदी के प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने के मुद्दे पर राहुल ने अपनी एक पुरानी मुलाकात का दिलचस्प किस्सा सुनाया। उन्होंने कहा कि मैं पहले सोचता था कि पीएम मोदी का प्रेस कॉन्फ्रेंस न करना कोई 'मार्केटिंग स्ट्रेटजी' है। लेकिन जब मैं 5 मिनट उनके साथ एक कमरे में बैठा, तब मुझे समझ आ गया कि वे बहुत देर तक बिना लिखे-पढ़े बोल ही नहीं सकते।

बचपन का एक यादगार संस्मरण

जब मैं 12 साल का था, तब दादी (इंदिरा गांधी), मां, प्रियंका और मैं अमेरिका गए थे। आधिकारिक रात्रिभोज में दादी और मां गईं। लौटकर दादी ने मां से कहा— 'ये अमेरिकन हमें क्या समझते हैं? हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री केवल हाथ मिलाने या दोस्ती करने नहीं जाता, वह हमेशा अपने देश के स्वाभिमान और हित के लिए जाता है।