चीनी महिला ने रोते हुए 4 महीने के अपने बेटे को सुनाया हनुमान चालीसा, 5 सेकंड में शांत हुआ बच्चा! वीडियो वायरल

Viral Video: बच्चे के रोने पर उसे चुप कराने के लिए अक्सर माता-पिता अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। कोई उसे गोद में लेकर टहलाता है, तो कोई लोरी सुनाता है। लेकिन कैलिफोर्निया के सबसे बड़े शहर लॉस एंजिल्स में रहने वाली 40 वर्षीय चीनी बिजनेसवुमन सारा जेन हो ने अपने चार महीने के बेटे के साथ अपनाई जाने वाली कुछ पेरेंटिंग आदतों को इंस्टाग्राम पर शेयर किया है। इन आदतों में बच्चे को रोजाना सुबह लूप में हनुमान चालीसा सुनाना, बच्चे को कुत्तों के आसपास रहने देना, और उसके नंगे पैरों को प्राकृतिक सतहों (घास या जमीन) के संपर्क में आने देना शामिल है।

इस दौरान उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरीए मां बनने के अपने अनुभव के बारे में भी बताया और दूसरे माता-पिता से अपने 4 महीने के बेटे की परवरिश को लेकर सुझाव भी मांगे। सारा ने पोस्ट में बताया कि वह अपने बेटे को Baby J कहकर बुलाती हैं।

सारा अपने बच्चे को सुनाती हैं ‘हनुमान चालीसा’

उन्होंने अपनी पोस्ट में बताया कि जब Baby J चिड़चिड़ा हो जाता है या रोने लगता है, तो वह उसे हनुमान चालीसा सुनाती हैं। हनुमान चालीसा एक हिंदू धार्मिक पाठ है। सारा के मुताबिक, जैसे ही वह हनुमान चालीसा चलाती हैं, उनका बेटा करीब 5 सेकंड में शांत हो जाता है और लगभग 2 मिनट में सो जाता है।

इंडियन दोस्त ने बताया ‘हनुमान चालीसा’ के बारे में

उन्होंने बताया कि हनुमान चालीसा के बारे में उन्हें एक इंडियन दोस्त से पता चला था, जिनसे उनकी मुलाकात Burning Man फेस्टिवल के दौरान हुई थी। जो लोग नहीं जानते उन्हें बताते चलें कि Burning Man अमेरिका के नेवादा के Black Rock Desert में होने वाला एक सालाना सांस्कृतिक फेस्टिवल है, जो करीब सात दिनों तक चलता है।

Sarah ने बताया कि अब वह हर सुबह हनुमान चालीसा को लूप पर चलाती हैं, यानी इसे बार-बार सुनाती हैं।

‘मैं उसे रोते हुए छोड़ने में यकीन नहीं रखती’

सारा ने यह भी बताया कि जब उनका बच्चा रोता है, तो वह कैसे रिएक्ट करती हैं।

उन्होंने बताया, “शुरुआती 9 महीनों में बच्चे को यह एहसास नहीं होता कि वह एक अलग इंसान है, इसलिए जब भी वह रोता है, मैं उसे तुरंत गोद में उठा लेती हूं। मैं उसे रोते-रोते सो जाने देने में यकीन नहीं रखती। अगर कुछ कोशिशों करने के बाद भी वह शांत नहीं होता, तो मैं तुरंत हनुमान चालीसा चला देती हूं, जिससे वह शांत हो जाता है।”

उनकी पोस्ट में उन दूसरे तरीकों का भी जिक्र था जिन्हें उन्होंने बेबी J की दिनचर्या में शामिल किया है।

सारा ने बताया कि वह अपने बेटे को रोजाना 8 मिनट तक ब्राह्म्स की लोरी (Brahms’ Lullaby) सुनाती हैं। उनका दावा है कि कुछ डेटा से पता चलता है कि यह म्यूजिक बच्चे के दिमाग के विकास की रफ्तार बढ़ाने में मदद कर सकता है।

40 की उम्र में सरोगेसी से मां बनी हैं सारा

अपनी पोस्ट में सारा बताती हैं वे 40 साल की उम्र में सरोगेसी की मदद से मां बनी हैं. वे बताती हैं कि बच्चा अभी सरोगेट मदर का ही दूध पीता है, इसीलिए वे उनको मूंगफली और सोया मिल्क भेज रही हैं ताकि बच्चे को इनकी आदत जल्दी हो जाए और उसे एलर्जी न हो। सारा बताती हैं कि वे अपनी समझ से ऐसा कर रही हैं, हालांकि साइंटिफिकली यह कितना सही है, इसका अंदाजा उन्हें नहीं है।’

उन्होंने अपने सरोगेसी के अनुभव में दिलचस्पी रखने वाले फॉलोअर्स को अपने पॉडकास्ट ‘हॉट वॉटर’ (Hot Water) के एपिसोड 69 को सुनने के लिए भी कहा।

एलर्जी से बचाने के लिए ये सब कर रहीं सारा

बेबी जे को किसी की तरह से की तरह की एलर्जी से बचाने के लिए सारा अभी से उसे दोस्तों और पड़ोसियों के कुत्तों के संपर्क में ले जाती हैं। साथ ही साथ रोजाना उसे बगीचे में ग्राउंडिंग भी करवाती हैं। वे कहती हैं कि बच्चे के पैरों में 2 लाख से ज्यादा नर्व एंडिंग्स होते हैं, और ऐसे करने से उसके न्यूरोलॉजिकल और शारीरिक विकास में मदद मिलती है।

सारा ने अपनी पोस्ट के आखिर में दूसरे माता-पिता से सुझाव मांगे कि वे अपने चार महीने के बच्चे के साथ क्या-क्या कर सकती हैं। उन्होंने लिखा, “क्या आप मेरे साथ कुछ और टिप्स शेयर कर सकते हैं जिन्हें मैं बेबी J के साथ आजमा सकूं?”

हनुमान चालीसा वाली पोस्ट पर यूजर्स ने दी प्रतिक्रिया

इंस्टाग्राम पर इन तस्वीरों और फोटोज को लोग खूब पसंद कर रहे हैं और कमेंट बॉक्स मेंज जमकर प्रतिक्रियाएं भी दे रहे हैं:-

एक यूजर ने लिखा, “हनुमान चालीसा सिर्फ एक इंडियन सॉन्ग नहीं है। यह गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित एक पवित्र भक्ति ग्रंथ है, जिसे हिंदू बहुत सम्मान देते हैं। इसे भगवान हनुमान के प्रति भक्ति और प्रार्थना के रूप में पढ़ा और गाया जाता है। कृपया एक सांस्कृतिक गीत और एक ऐसे पवित्र ग्रंथ के बीच का अंतर समझें, जिसका लाखों हिंदुओं के लिए गहरा आध्यात्मिक महत्व है।”

एक अन्य यूजर ने हनुमान चालीसा को अपनी रोजाना की पूजा का हिस्सा बताया। साथ ही, उन्होंने इसके ज्योतिषीय फायदों को लेकर भी एक दावा किया। यूजर ने लिखा, “हनुमान चालीसा मेरा रोज का मंत्र है। जिन लोगों की कुंडली में 8वें भाव में केतु होता है, उनके लिए यह बहुत फायदेमंद है। यह एक तरह की प्राकृतिक दवा है।”

एक तीसरे यूजर ने सारा के मां बनने के तरीके की तारीफ की। उन्होंने लिखा, “Baby J बहुत खुशकिस्मत है कि उसे आप जैसी मां मिली हैं।”

एक अन्य यूजर ने भगवान हनुमान से जुड़े धार्मिक पाठ सुंदरकांड का जिक्र किया। उन्होंने लिखा, “सुंदरकांड नाम की एक खूबसूरत किताब है, जिसमें भगवान हनुमान की महिमा बताई गई है। मेरी मां गर्भावस्था के दौरान इसका पाठ करती थीं। इससे बच्चे में भक्ति और साहस की अच्छी भावना जागती है। यह सूर्य का ज्ञान रखने वाले एक दिव्य और निस्वार्थ प्रेम करने वाले देवता की कहानी है।”

यह भी पढ़ें: Video: डोसा खाते-खाते अंदर दिखा मरा हुआ चूहा, मुंबई में ग्राहक की शिकायत के बाद फूड सेफ्टी पर सवाल

Single Father ने सिखाया कि प्यार किसी Gender का मोहताज नहीं | Father raised her daughter alone

Single Father ने सिखाया कि प्यार किसी Gender का मोहताज नहीं | Father raised her daughter alone

“तुम अकेले बेटी नहीं पाल पाओगे”
ये बात विराज़ ने कई बार सुनी।
लेकिन उन्होंने जवाब शब्दों से नहीं दिया।
हर रात कुछ नया सीखा।
हर सुबह एक बेहतर पिता बनने की कोशिश की।
आज उनकी 6 साल की बेटी स्कूल से लौटकर सबसे पहले अपने पापा को ही ढूँढती है, क्योंकि उसके लिए वही उसकी सबसे सुरक्षित जगह हैं।

कुछ कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि प्यार किसी रिश्ते का नाम नहीं, निभाने का नाम है।

क्या आपको लगता है कि Parenting किसी एक Gender की ज़िम्मेदारी है? कमेंट में बताइए।

@v_cube
@elvworld

Single Father Raising Daughter, Parenting Story By Single Father, Single Parent Success Story

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बच्चे की जिद को डील करने के पेरेंटिंग टिप्स, पहले वजह समझें, फिर बदलें व्यवहार!

बच्चों का हर बात पर तुरंत जवाब न देना या माता-पिता की बात को अनसुना करना अक्सर चिंता की वजह बन जाता है। ऐसे समय में कई पैरेंट्स बार-बार समझाने, डांटने या आवाज ऊंची करने लगते हैं। लेकिन हर बार बच्चे का बात न मानना जानबूझकर किया गया व्यवहार नहीं होता।

कई बार बच्चा खेल में इतना व्यस्त होता है कि उसे आसपास की बात सुनाई ही नहीं देती, तो कभी थकान, तनाव या भावनाओं की वजह से वह ठीक से प्रतिक्रिया नहीं दे पाता। इसलिए बच्चे को डांटने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह आपकी बात क्यों नहीं सुन रहा।

listen

 

1. बच्चे का ध्यान अपनी ओर करें

कोई बात कहने से पहले बच्चे के पास जाएं, उसका नाम लें और उसकी तरफ देखकर बात करें। दूर से बार-बार आवाज लगाने के बजाय उसके पास जाकर बोलें, ताकि वह आपकी बात अच्छे से सुन सके। बात करते समय टीवी, मोबाइल या दूसरे शोर को कम रखें। इससे बच्चे का ध्यान आपकी बात पर रहेगा और वह धीरे-धीरे ध्यान से सुनना भी सीखेगा।

 

2. बात छोटी और आसान रखें

एक साथ बहुत सारी बातें कहने के बजाय बच्चे को एक-एक काम बताएं। जैसे पहले खिलौने रखने को कहें और उसके बाद दांत साफ करने के लिए बोलें। इससे बच्चे को आपकी बात समझने में आसानी होगी बच्चे की उम्र के हिसाब से आसान शब्दों में बात करें। जरूरत हो तो उससे पूछें कि उसने क्या समझा, ताकि वह काम सही तरीके से कर सके।

 

3. बच्चे के इमोशन समझें

कई बार बच्चा गुस्से, थकान या किसी परेशानी के कारण आपकी बात नहीं सुन पाता। ऐसे समय में तुरंत डांटने के बजाय उसे थोड़ा शांत होने का समय दें। उससे प्यार से पूछें कि वह परेशान क्यों है या उसे किस बात पर गुस्सा आ रहा है। उसकी बात सुनने से बच्चा अपनी फीलिंग बताना सीखता है।

 

4. रोज का रूटीन बनाएं

बच्चों के लिए रोज का एक तय रूटीन बनाना अच्छा रहता है। जैसे रात में खिलौने रखना, नहाना, दांत साफ करना और फिर सोने जाना। इससे बच्चे को पहले से पता रहता है कि उसे क्या करना है। रूटीन बच्चे की उम्र के हिसाब से रखें और जब वह कोई काम सही समय पर करे, तो उसकी तारीफ करें। इससे वह अच्छी आदतें अपनाने के लिए तैयार होगा।

 

5. खुद भी शांत रहें

बच्चे माता-पिता को देखकर बहुत कुछ सीखते हैं। इसलिए बच्चे के बात न मानने पर चिल्लाने या गुस्सा करने के बजाय शांत रहने की कोशिश करें। अगर बच्चा तुरंत बात नहीं मानता, तो उसे थोड़ा समय दें और जरूरत हो तो प्यार से दोबारा समझाएं। इससे बच्चा धीरे-धीरे आपकी बात सुनना और सहयोग करना सीखेगा।

 

बच्चों का हर बात पर जवाब न देना या माता-पिता की बात न सुनना हमेशा उनकी जिद नहीं होती। कई बार बच्चा खेल में व्यस्त, थका हुआ या किसी बात से परेशान हो सकता है। माता-पिता का धैर्य और अच्छा व्यवहार बच्चे को धीरे-धीरे अपनी बात सुनने, समझने और सही तरीके से अपनी भावनाएं बताने में मदद कर सकता है।

Shweta Tiwari ने बेटी Palak Tiwari को दी जिंदगी की सबसे जरूरी सीख | Shweta Tiwari Parenting lesson

Shweta Tiwari ने बेटी Palak Tiwari को दी जिंदगी की सबसे जरूरी सीख | Shweta Tiwari Parenting lesson

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हर माँ चाहती है कि उसका बच्चा मजबूत बने।
लेकिन मजबूती हमेशा समझाने से नहीं आती। कभी-कभी बच्चे अपने माता-पिता के फैसलों से सीखते हैं कि कहाँ समझौता करना है… और कहाँ अपने लिए खड़ा होना है।
श्वेता तिवारी और उनकी बेटी पलक की कहानी इसी रिश्ते का एक बेहद मानवीय पहलू दिखाती है।
शायद बच्चों के लिए हमारी सबसे बड़ी सीख, हमारी अपनी जिंदगी होती है।

@shweta.tiwari

Shweta Tiwari ने बेटी Palak Tiwari को दी जिंदगी की सबसे जरूरी सीख | Shweta Tiwari Parenting lesson for her Daughter | Shweta Tiwari in Traitors 2

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बचपन से ही स्मार्ट बनेंगे बच्चे! पेरेंट्स आज ही शुरू कराएं ये 5 आसान काम, कभी नहीं होगी पैसों की तंगी

बच्चों में बचपन से ही पैसों की सही समझ और अच्छी आदतें डालना उन्हें भविष्य में वित्तीय रूप से समझदार और स्वतंत्र बनाता है। शुरुआती फाइनेंशियल लिटरेसी बच्चों को पैसे के स्मार्ट फैसले लेने में मदद करती है। पैसों का सही इस्तेमाल समझना कितना जरूरी है, ये उन्हें तभी समझ जाएगा, जब वे खुद पैसा संभलेंगे। लेकिन इसके लिए उन्हें तैयार करने की जिम्मेदारी हम बड़ों की है। पैसा सिर्फ जरूरतें पूरी करने के लिए ही नहीं, बल्कि बचाने और अपने सपने पूरे करने के लिए भी बेहद जरूरी है। पेरेंट्स आज से ही इन 5 आसान तरीकों को अपनाकर अपने बच्चों को पैसों के मामले में स्मार्ट बना सकते हैं:

थ्री-जार सिस्टम : बच्चों को कुछ पैसे दें, जिसे वे तीन हिस्सों में बांटें। इनमें एक बचत का, एक खर्च का और तीसरा दान का होना चाहिए। यह तरीका बच्चों को सिखाता है कि सब कुछ तुरंत खर्च करने के बजाय सोच-समझकर पैसे का इस्तेमाल करने से एक मजबूत नींव बनती है।

ग्रोसरी लिस्ट चैलेंज : अपने बच्चे को एक छोटा बजट और एक खास ग्रोसरी लिस्ट दें। उन्हें सुपर मार्केट में अपनी लिस्ट और बजट के हिसाब से चीजों का चुनाव करने दें। इससे उन्हें स्टोर ब्रांड की तुलना नामी ब्रांड से करनी आएगी, कीमतों में अंतर समझ आएगा और कुल बिल को बजट में रखने के लिए फैसले लेने की समझ बढ़ेगी।

सेविंग्स गोल मैच करना : अपने बच्चे को लंबे समय के किसी लक्ष्य के लिए पैसे बचाने और उसमें अपनी तरफ से कुछ जोड़ने का ऑफर दें। जैसे उसकी हर 10 रुपये की बचत पर आप उसे एक रुपया देंगे। यह कंपाउंड इंटरेस्ट और इंसेंटिव स्ट्रक्चर के बारे में जानकारी देता है। साथ ही सोच-समझकर बचत की आदत को बढ़ावा देता है।

जरूरतों और चाहतों में अंतर समझाएं : बच्चों को सिखाएं कि ‘जरूरत’ (जैसे पढ़ाई, खाना, कपड़े) और ‘चाहत’ (जैसे महंगे खिलौने, वीडियो गेम) में क्या फर्क होता है। जब भी वे किसी नई चीज की जिद्द करें, तो उनसे पूछें कि क्या यह उनकी जरूरत है या सिर्फ एक चाहत।

डिजिटल और बेसिक बैंक अकाउंट से जोड़ें : थोड़े बड़े बच्चों के लिए ‘माइनर सेविंग्स अकाउंट’ खुलवाएं। उन्हें बैंक की कार्यप्रणाली, पासबुक अपडेट करना और डिजिटल लेन-देन के सुरक्षित तरीकों के बारे में बुनियादी जानकारी दें।

स्लिम नहीं, फिट दिखना है जरूरी! जानिए सौम्या टंडन का फिटनेस मंत्र

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ये बात विराज़ ने कई बार सुनी।
लेकिन उन्होंने जवाब शब्दों से नहीं दिया।
हर रात कुछ नया सीखा।
हर सुबह एक बेहतर पिता बनने की कोशिश की।
आज उनकी 6 साल की बेटी स्कूल से लौटकर सबसे पहले अपने पापा को ही ढूँढती है, क्योंकि उसके लिए वही उसकी सबसे सुरक्षित जगह हैं।

कुछ कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि प्यार किसी रिश्ते का नाम नहीं, निभाने का नाम है।

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नौकरी छोड़ कर रहे बच्चे की परवरिश | Refining Fatherhood | Breaking Stereotypes | Good Parenting

नौकरी छोड़ कर रहे बच्चे की परवरिश | Refining Fatherhood | Breaking Stereotypes | Good Parenting

अकसर माना जाता है कि माँ बनने के बाद एक महिला को अपने सपने पीछे छोड़ने पड़ते हैं, अपना करियर त्यागना पड़ता है, क्योंकि बच्चे की परवरिश के लिए ये जरूरी है। लेकिन अगर उत्सव शर्मा के जैसी सोच हो तो, बच्चे को संभालना किसी एक की जिम्मेदारी नहीं, माता-पिता दोनों की साझेदारी बन जाता है।

उत्सव ने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर, घर पर रहकर अपने बच्चे को पालने का फैसला किया.. ताकि उनकी पत्नी के सपने ना रुकें।

आज वह Parenting की नई परिभाषा लिख रहे हैं, और लोगों को बताना चाहते हैं कि ये कोई महान काम नहीं, बल्कि हर पिता की ज़िम्मेदारी है।

@the_house_husband_

[A Husband from Madhya Pradesh Redefining Fatherhood, Breaking Stereotypes]

नौकरी छोड़ कर रहे बच्चे की परवरिश | Refining Fatherhood | Breaking Stereotypes | Good Parenting | Madhya Pradesh
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क्या आपका बच्चा पढ़ने बैठता है लेकिन ध्यान भटक जाता है? रोज की ये 5 आदतें तेज याददाश्त और फोकस बेहतर करने में करेंगी मदद

जैसे ही नया शैक्षणिक वर्ष शुरू होता है, कई माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे ध्यान भटकाने वाली चीज़ों को छोड़कर अपने स्कूल के काम पर बेहतर ढंग से ध्यान दें। हालांकि, आज की आधुनिक दुनिया में, स्मार्ट टेलीविजन, फ़ोन, सोशल मीडिया और किसी विषय को पूरी तरह से न समझ पाना पढ़ाई के दौरान रुकावटें पैदा कर सकता है।

ध्यान और याददाश्त को बेहतर बनाने के उपाय खोजने से पहले, ध्यान (फ़ोकस) और एकाग्रता (कॉन्सेंट्रेशन) के बीच के अंतर को समझना ज़रूरी है। फ़ोकस का मतलब है किसी गतिविधि या विचार पर ध्यान देना, जबकि एकाग्रता का मतलब है किसी चीज़ पर लगातार ध्यान बनाए रखने की क्षमता। फ़ोकस और एकाग्रता दोनों ही ज़रूरी कौशल हैं जिनकी बच्चों को सीखने, लक्ष्य हासिल करने, अपनी भावनाओं को संभालने और रचनात्मक रूप से सोचने में सफलता के लिए आवश्यकता होती है। बच्चों को कामों पर ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होने के कई कारण हैं।

ध्यान और एकाग्रता कौशल में सुधार एक क्रमिक प्रक्रिया है जिसके लिए धैर्य, निरंतरता और निश्चित रूप से माता-पिता, शिक्षकों और साथियों से उचित सहयोग की आवश्यकता होती है। आज की दुनिया में, जो ध्यान भटकाने वाली चीज़ों से भरी है, ऐसे कौशल विकसित करना एक रोज़मर्रा की दिनचर्या बन सकती है जो बच्चों को पढ़ाई में सफल होने और अधिक आत्मविश्वासी और मज़बूत व्यक्ति बनने में मदद करती है। हमने संस्कृति ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स के शिक्षक और ट्रस्टी प्रणीत मुंगाली से बात की, जिन्होंने 5 ऐसी आदतें बताईं जिनका अभ्यास स्कूली बच्चे कर सकते हैं और जो याददाश्त और फ़ोकस को बेहतर बनाने में सार्थक बदलाव ला सकती हैं:

1. शारीरिक व्यायाम को बढ़ावा देना

शारीरिक व्यायाम मस्तिष्क में रक्त के प्रवाह को बढ़ाने के साथ-साथ एकाग्रता और समन्वय कौशल को बेहतर बनाने में मदद करेगा।

a. योग और गहरी सांस लेने को बढ़ावा दें। योग मुद्राएं जैसे ‘ट्री पोज़’ (वृक्षासन) और ‘वॉरियर पोज़’ (वीरभद्रासन) शरीर में समन्वय बनाने और खुद पर नियंत्रण विकसित करने में मदद करती हैं। गहरी सांस लेने से बच्चे शांत और फिर से ध्यान केंद्रित करने में सक्षम होंगे।

b. क्रॉस-लेटरल मूवमेंट (शरीर के दोनों हिस्सों का इस्तेमाल करने वाली गतिविधियां) शुरू करें। ऐसी गतिविधियां जैसे अपने दाहिने कोहनी को अपने बाएं घुटने से छूना, मस्तिष्क के दोनों हिस्सों का उपयोग करने में मदद करती हैं।

2. ऐसी गतिविधियां करें जो आपके मस्तिष्क को सक्रिय करें

मज़ेदार ब्रेन गेम्स ध्यान देने, याद रखने और तार्किक रूप से सोचने की आपकी क्षमता को विकसित करते हैं।

a. अंतर पहचानें या छिपी हुई वस्तु खोजें। यह अवलोकन कौशल, दृश्य स्मृति और लंबे समय तक ध्यान बनाए रखने की क्षमता विकसित करने के लिए किया जाता है।

b. पैटर्न की नकल करें और उन्हें आगे बढ़ाएं। रंगीन मोतियों, ब्लॉकों या किसी अन्य आकार का उपयोग करके पैटर्न बनाना और उन्हें आगे बढ़ाना अनुक्रमण कौशल, तार्किक सोच और फ़ोकस विकसित करता है।

c. स्टोरी चेन एक्टिविटी- हर बच्चे को कहानी में एक वाक्य जोड़ना होता है, जिसमें उन्हें यह याद रखना होता है कि पहले क्या कहा गया था। इससे सुनने की क्षमता, मौखिक याददाश्त और रचनात्मकता को विकसित करने में मदद मिलती है।

3. बड़े कामों को छोटे हिस्सों में बांटें

कभी-कभी बच्चे काम से ध्यान हटा लेते हैं क्योंकि उन्हें वे काम बहुत मुश्किल लगते हैं। किसी नए या मुश्किल काम को कई आसान स्टेप्स में बांटने से उसे समझना, करना और याद रखना आसान हो जाता है।

4. पोमोडोरो तकनीक

पोमोडोरो तकनीक में कुछ समय (20-25 मिनट) तक किसी काम पर ध्यान देने और फिर थोड़ा ब्रेक (5 मिनट) लेने का सुझाव दिया जाता है। इस तकनीक से दिमाग की थकान कम होती है, प्रोडक्टिविटी बढ़ती है और ध्यान लगाने की क्षमता बेहतर होती है।

5. पढ़ाई के लिए ऐसी जगह बनाएं जहां ध्यान न भटके

बच्चों को पढ़ाई के लिए शांत और व्यवस्थित जगह देना बहुत ज़रूरी है। साथ ही, यह पक्का करें कि होमवर्क करते समय गैजेट्स जैसी चीज़ें उनका ध्यान न भटकाएं। आखिरी टिप लाइफ़स्टाइल के बारे में है। सही खान-पान, भरपूर पानी और अच्छी नींद से दिमाग बेहतर काम करता है, और ध्यान लगाने व याद रखने की क्षमता में सुधार होता है।

प्यार में की जा रही ये गलती आपके बच्चे को बना सकती है कम आत्मनिर्भर, Helicopter Parenting को समझिए और इससे बचिए

माता-पिता के तौर पर, अपने बच्चे के लिए हर काम करना स्वाभाविक है। चाहे उनके जूते के फीते बांधना हो, स्कूल बैग पैक करना हो या हर छोटी-मोटी समस्या को सुलझाना हो, मदद अक्सर प्यार की वजह से की जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बहुत ज्यादा मदद करने से असल में आपके बच्चे का विकास रुक सकता है?

जानकारों का कहना है कि हर समय मदद करने से अनजाने में बच्चों में आत्मविश्वास, मुश्किलों का सामना करने की क्षमता और जरूरी जीवन कौशल विकसित नहीं हो पाते। इसका मकसद मदद को पूरी तरह बंद करना नहीं है, बल्कि यह जानना है कि कब पीछे हटकर उन्हें खुद सीखने दिया जाए।

क्या आप ऐसी परेशानियां हल कर रहे हैं, जिन्हें आपका बच्चा खुद हल कर सकता है?

अगर आप हर मुश्किल को तुरंत सुलझाने की कोशिश करते हैं, तो खुद से पूछें- क्या मेरा बच्चा थोड़ी सी मदद से यह काम कर सकता है? बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से फ़ैसले लेने, नई चीज़ें आज़माने और यहां तक कि गलतियां करने का मौका देने से वे ज़्यादा आत्मनिर्भर बनते हैं। समस्या को सुलझाना एक ऐसा हुनर ​​है जो अभ्यास से आता है, न कि किसी और के उसे आपके लिए कर देने से।

बच्चों के लिए मुश्किलों का सामना करना हमेशा बुरी बात क्यों नहीं होती?

अपने बच्चे को संघर्ष करते देखना मुश्किल हो सकता है, लेकिन अक्सर यहीं से सबसे बड़ी सीख मिलती है। चाहे होमवर्क पूरा करना हो, किसी दोस्त के साथ अनबन सुलझाना हो या कोई नया हुनर ​​सीखना हो—चुनौतियों का सामना करने से डटे रहने की हिम्मत, सोच-समझकर फ़ैसला लेने की क्षमता और मुश्किल हालात में भी मज़बूत बने रहने का गुण आता है। अगर आप बहुत जल्दी मदद के लिए आगे आ जाते हैं, तो हो सकता है कि बच्चा कुछ ज़रूरी बातें सीखने का मौका गँवा दे।

क्या हर समय मदद करने से आपके बच्चे का आत्मविश्वास कम हो सकता है?

जब माता-पिता हर काम की ज़िम्मेदारी खुद ले लेते हैं, तो बच्चे अपनी काबिलियत पर शक करने लग सकते हैं। उन्हें अपने काम खुद पूरे करने देने से- भले ही वे उन्हें एकदम सही तरीके से न कर पाएं-एक बहुत अच्छा संदेश मिलता है- “मुझे भरोसा है कि तुम इसे खुद समझकर कर लोगे।” समय के साथ, इससे उनमें आत्मविश्वास और ज़िम्मेदारी की मज़बूत भावना पैदा होती है।

माता-पिता बच्चों में आत्मनिर्भरता को कैसे बढ़ावा दे सकते हैं?

छोटे-छोटे बदलाव बड़ा फ़र्क ला सकते हैं। तुरंत जवाब देने के बजाय, ऐसे सवाल पूछें जिनसे बच्चा स्थिति को समझकर सोच सके। मदद करने से पहले उन्हें खुद कोशिश करने के लिए प्रोत्साहित करें। सिर्फ़ नतीजे पर ध्यान देने के बजाय उनकी कोशिश की तारीफ़ करें और जैसे-जैसे वे बड़े हों, उन्हें धीरे-धीरे ज़्यादा ज़िम्मेदारियां सौंपें। इसका मकसद बच्चों को उनके हाल पर छोड़ देना नहीं है, बल्कि उन्हें सीखने और आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी आज़ादी देते हुए सहारा देना है।

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पेरेंटिंग का मतलब यह नहीं है कि आप अपने बच्चे के लिए सब कुछ करें। इसका मतलब है उन्हें ऐसे भविष्य के लिए तैयार करना जहां वे अपने काम खुद कर सकें। बच्चों को आज़ादी से काम करने का मौका देते हुए, उन्हें सही रास्ता दिखाना, हिम्मत बढ़ाना और इमोशनल सपोर्ट देना उन्हें काबिल और कॉन्फिडेंट इंसान बनने में मदद कर सकता है। कभी-कभी, अपने बच्चे की मदद करने का सबसे अच्छा तरीका यह नहीं होता कि आप हर काम में दखल दें, बल्कि थोड़ा पीछे हटकर उन्हें यह पता लगाने का मौका दें कि वे क्या-क्या कर सकते हैं।

Autism से नहीं, लोगों की सोच से जीती मेरी बेटी | Autism Awareness Story | Mother Daughter Story

“इसे घर में बंद कर दो…”
ये सिर्फ़ एक लाइन नहीं थी। ये उस सोच की आवाज़ थी, जो अलग दिखने वाले बच्चों को समझने के बजाय उनसे दूर भागती है।
लेकिन एक माँ ने हार नहीं मानी।
उसने अपनी बेटी को दुनिया से छिपाया नहीं, दुनिया से मिलवाया।
आज वही बेटी घर की ज़िम्मेदारियाँ निभाती है, हर दिन कुछ नया सीखती है और साबित करती है कि सही प्यार, धैर्य और भरोसा किसी भी इंसान की ज़िंदगी बदल सकता है।

@chandrima.dutta16

Autism Awareness India, Autism Parenting Journey, Mother and Autistic Daughter Story

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