NTPC Jobs 2026: एनटीपीसी में डिप्टी मैनेजर के पदों पर भर्ती का नोटिफिकेशन, हर महीने मिलेगी 70,000 से 2 लाख रुपये तक सैलरी

NTPC Jobs 2026: अच्छे सैलरी पैकेज के साथ ऊंचे पद पर नौकरी करना चाहते हैं, तो ये मौका आपको देश की प्रतिष्ठित कंपनी एनटीपीसी में मिल सकता है। एनटीपीसी ने डिप्टी मैनेजर के पदों पर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है। इस भर्ती प्रक्रिया के जरिए देश की सबसे बड़ी बिजली उत्पादन कंपनी इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल और सी एंड आई (C&I)विभाग में कुल 135 पदों योग्य उम्मीदवारों का चयन करेगी। इस भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने के इच्छुक उम्मीदवार 12 अगस्त 2026 से 26 अगस्त 2026 तक एनटीपीसी की आधिकारिक वेबसाइट careers.ntpc.co.in पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे।

इन विभागों में होगी भर्ती

एनटीपीसी की यह भर्ती तीन प्रमुख तकनीकी विभागों के लिए निकाली गई है। इनमें इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल और कंट्रोल एंड इंस्ट्रूमेंटेशन (C&I) विभाग शामिल हैं। सभी पद डिप्टी मैनेजर के स्तर के हैं और इन पर अनुभवी उम्मीदवारों की नियुक्ति की जाएगी।

आवेदन के लिए जरूरी योग्यता

हर पद के लिए संबंधित इंजीनियरिंग शाखा में फुल टाइम बीई या बीटेक डिग्री होना जरूरी है।

डिप्टी मैनेजर (इलेक्ट्रिकल)पद के लिए उम्मीदवार के पास किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग या इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में फुल टाइम बीई/बीटेक डिग्री होनी चाहिए।

डिप्टी मैनेजर (मैकेनिकल) पद के लिए मैकेनिकल,प्रोडक्शन,थर्मल या संबंधित इंजीनियरिंग शाखा में फुल टाइम बीई/बीटेक डिग्री आवश्यक है।

डिप्टी मैनेजर (C&I)पद के लिए उम्मीदवार के पास इंस्ट्रूमेंटेशन,कंट्रोल एंड इंस्ट्रूमेंटेशन,इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंस्ट्रूमेंटेशन या इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में फुल टाइम बीई/बीटेक डिग्री होनी चाहिए।

अनुभवी उम्मीदवारों को मिलेगा मौका

एनटीपीसी ने स्पष्ट किया है कि यह भर्ती अनुभवी उम्मीदवारों के लिए है। अभ्यर्थियों के पास डिग्री पूरी करने के बाद संबंधित क्षेत्र में निर्धारित कार्य अनुभव होना चाहिए। अनुभव की अवधि और अन्य पात्रता से जुड़ी विस्तृत जानकारी आधिकारिक भर्ती नोटिफिकेशन में दी गई है। इसलिए आवेदन करने से पहले उम्मीदवारों को सभी शर्तें ध्यान से पढ़ने की सलाह दी गई है।

चयन प्रक्रिया

एनटीपीसी डिप्टी मैनेजर के पदों पर भर्ती के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के अनुभव की जांच करेगा। इसके आधार पर योग्य उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया जाएगा। शॉर्टलिस्ट उम्मीदवारों को पर्सनल इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा। इंटरव्यू में सफल होने वाले अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन किया जाएगा। इसके बाद अंतिम चयन प्रक्रिया पूरी होगी।

कितनी मिलेगी सैलरी?

चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति ई-4 (E4) ग्रेड में की जाएगी। इस पद के लिए वेतनमान 70,000 रुपये से 2,00,000 रुपये प्रति माह (IDA Pay Scale)निर्धारित किया गया है। इसके अलावा एनटीपीसी के नियमों के अनुसार अन्य भत्ते और सुविधाएं भी मिलेंगी।

12 अगस्त से शुरू होगी आवेदन प्रक्रिया

एनटीपीसी ने आवेदन की तारीखें भी घोषित कर दी हैं। ऑनलाइन आवेदन 12 अगस्त 2026 से शुरू होंगे और 26 अगस्त 2026 तक आवेदन किए जा सकेंगे। इसके बाद किसी भी आवेदन को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

ऐसे करें ऑनलाइन आवेदन

आवेदन करने के लिए सबसे पहले उम्मीदवारों को NTPC की आधिकारिक वेबसाइट careers.ntpc.co.in पर जाना होगा। वहां Recruitment/Careers सेक्शन में जाकर NTPC Deputy Manager Recruitment 2026 के लिंक पर क्लिक करना होगा। इसके बाद नया रजिस्ट्रेशन कर लॉगिन आईडी और पासवर्ड बनाना होगा। फिर आवेदन फॉर्म में व्यक्तिगत जानकारी, शैक्षणिक योग्यता और कार्य अनुभव से जुड़ी सभी जानकारी भरनी होगी। उम्मीदवारों को अपनी फोटो, हस्ताक्षर और जरूरी प्रमाणपत्र भी अपलोड करने होंगे। यदि आवेदन शुल्क लागू है तो उसका ऑनलाइन भुगतान करना होगा। अंत में सभी जानकारी अच्छी तरह जांचकर आवेदन फॉर्म सबमिट करना होगा और भविष्य के लिए उसका प्रिंट या कॉपी सुरक्षित रखनी चाहिए।

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Rhetan TMT को अहम BIS सर्टिफिकेशन मिला, सरकारी प्रोजेक्ट्स में सप्लाई का रास्ता खुला

स्टील बार बनाने वाली कंपनी Rhetan TMT ने अपने कारोबार के विस्तार की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। कंपनी को प्रीमियम TMT ग्रेड के लिए ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) का सर्टिफिकेशन मिल गया है। इसके साथ ही कंपनी ने अपना 1 मेगावाट का कैप्टिव सोलर पावर प्रोजेक्ट भी पूरा कर लिया है। कंपनी का दावा है कि इससे उसकी उत्पादन क्षमता, लागत दक्षता और बाजार पहुंच मजबूत होगी।

प्रीमियम TMT ग्रेड बनाने की मिली मंजूरी

Rhetan TMT को Fe500D, Fe550 और Fe550D ग्रेड के TMT बार बनाने के लिए BIS लाइसेंस मिला है। इस मंजूरी के बाद Rhetan TMT अब देशभर में सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र (PSU) के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए प्रीमियम ग्रेड TMT बार की सप्लाई कर सकेगी। इससे कंपनी के लिए नए बाजार खुलेंगे और उसके प्रोडक्ट पोर्टफोलियो का भी विस्तार होगा।

सोलर प्रोजेक्ट से घटेगी बिजली की लागत

Rhetan TMT ने अपना 1 मेगावाट का कैप्टिव ग्राउंड-माउंटेड सोलर पावर प्रोजेक्ट भी पूरा कर लिया है। कंपनी को GEDA रजिस्ट्रेशन और NHAI समेत सभी जरूरी मंजूरियां मिल चुकी हैं। उम्मीद है कि यह प्रोजेक्ट अगस्त 2026 के पहले सप्ताह के अंत तक बिजली उत्पादन शुरू कर देगा। कंपनी का मानना है कि इससे ऊर्जा लागत कम होगी और मैन्युफैक्चरिंग ज्यादा टिकाऊ बनेगी।

क्या बोले मैनेजिंग डायरेक्टर?

Rhetan TMT के मैनेजिंग डायरेक्टर शालिन शाह ने कहा कि कंपनी पिछले कुछ वर्षों से क्वालिटी, टेक्नोलॉजी और ऑपरेशनल एक्सीलेंस पर लगातार निवेश कर रही है। उनके मुताबिक, BIS सर्टिफिकेशन से प्रीमियम स्टील सेगमेंट में कंपनी की मौजूदगी मजबूत होगी। वहीं, सोलर पावर प्रोजेक्ट से उत्पादन प्रक्रिया ज्यादा कुशल बनेगी और लंबे समय में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में मदद मिलेगी।

Rhetan TMT का कारोबार

Rhetan TMT, TMT स्टील बार बनाने वाली कंपनी है। इसके प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल रिहायशी, कमर्शियल और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में होता है। कंपनी का कहना है कि वह आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग तकनीक, गुणवत्ता और क्षमता विस्तार पर लगातार फोकस कर रही है, ताकि भारत के बढ़ते स्टील और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में अपनी मौजूदगी मजबूत कर सके।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Juniper Green Energy IPO: जुनिपर ग्रीन का आईपीओ 30 जुलाई को खुलेगा, रिन्यूएबल एनर्जी पर दांव लगाने का बड़ा मौका

Juniper Green Energy IPO: जुनिपर ग्रीन एनर्जी का आईपीओ 30 जुलाई को खुल जाएगा। यह आईपीओ 1,800 करोड़ रुपये का है। कंपनी इश्यू के जरिए इनवेस्टर्स को नए शेयर इश्यू करेगी। इस आईपीओ में ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) शामिल नहीं है। इसका मतलब है कि कंपनी के प्रमोटर्स या पुराने इनवेस्टर्स आईपीओ में अपने शेयर नहीं बेचेंगे।

एंकर इनवेस्टर्स के लिए 29 जुलाई को खुलेगा इश्यू

Juniper Green Energy ने पहले आईपीओ से 3,000 करोड़ रुपये जुटाने का प्लान बनाया था। बाद में उसने इश्यू का साइज घटा दिया। कंपनी आईपीओ में शेयरों के प्राइस बैंड सहित कई जानकारियां सोमवार यानी 27 जुलाई को इश्यू करेगी। यह इश्यू एंकर इनवेस्टर्स के लिए एक दिन पहले यानी 29 जुलाई को खुल जाएगा।

6 जुलाई को स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्ट होंगे शेयर 

शेयरों का एलॉटमेंट 4 अगस्त को होने की उम्मीद है। कंपनी के शेयर स्टॉक एक्सचेंज में 6 जुलाई को लिस्ट होंगे। कंपनी ने 2 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर अपने एंप्लॉयीज के लिए रिजर्व रखा है। इश्यू के आधे शेयर (एंप्लॉयीज का हिस्सा छोड़कर) क्वालिफायड इंस्टीट्यूशनल बायर्स के लिए रिजर्व हैं। 35 फीसदी शेयर्स रिटेल इनवेस्टर्स के लिए रिजर्व हैं।

 टॉप 10 इंडिपेंडेंट रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों में शामिल 

जुनिपर ग्रीन एनर्जी गुरुग्राम की कंपनी है। यह देश के सबसे बड़े 10 रिन्यूएबल इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स में शामिल है। इसके पोर्टफोलियो में 50 प्रोजेक्ट्स हैं। कंपनी की कुल बिजली उत्पादन क्षमता इस साल जून में 7,910.20 MW की थी। मार्च 2020 में कंपनी का सिर्फ एक सोलर प्रोजेक्ट था, जिसकी क्षमता 100 मेगावॉट थी। कंपनी के 50 प्रोजेक्ट्स में 20 ऑपरेशनल प्रोजेक्ट्स हैं। 19 कॉन्ट्रैक्टेड प्रोजेक्ट्स है, जिन पर काम चल रहा है। बाकी 11 अवॉर्डेड प्रोजेक्ट्स पर भी काम चल रहा है।

कंपनी आईपीओ से आए पैसे का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए करेगी

कंपनी आईपीओ से आए 1,411.9 करोड़ रुपये का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए करेगी। बाकी पैसे का इस्तेमाल सामान्य कारोबारी जरूरतों के लिए होगा। इस साल जून में कंसॉलिडेटेड आधार पर कंपनी पर 13,266 करोड़ रुपये का कर्ज था। जुनिपर ग्रीन की प्रतिद्वंद्वी कंपनियों में ACME Solar Holdings, NTPC Green Energy और Adani Green Energy शामिल हैं। ये सभी कंपनियां स्टॉक्स एक्सचेंज में सूचीबद्ध (Listed) हैं।

FY26 में कंपनी का रेवेन्यू 41 फीसदी बढ़ा

जुनिपर ग्रीन का प्रॉफिट FY26 में 10.9 फीसदी बढ़कर 40.5 करोड़ रुपये रहा। रेवेन्यू 41.3 फीसदी बढ़कर 718.9 करोड़ रुपये रहा। यह इश्यू उन निवेशकों के लिए एक मौका है, जो रिन्यूएनबल एनर्जी पर दांव लगाना चाहते हैं। देश में कुल बिजली उत्पादन में रन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। यह हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी पर पहुंच गई है।

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शेयर बाजार का सेंटिमेंट फिलहाल कमजोर

यह आईपीओ ऐसे वक्त आ रहा है, जब मध्यपूर्व में बढ़ते टेंशन और क्रूड में उछाल से मार्केट का सेंटिमेंट कमजोर है। इस हफ्ते पांचों कारोबारी सत्रों में बाजार के प्रमुख सूचकांकों निफ्टी और सेंसेक्स में गिरावट आई। इस हफ्ते निफ्टी करीब 600 अंक गिरा है, जबकि सेंसेक्स 1500 अंक से ज्यादा टूटा है। निवेशकों को इश्यू में निवेश करने से पहले अपने फाइनेंशियल एडवाइजर्स की राय लेने की सलाह है।

Adani Power Q1 Results: अदाणी पावर को ₹4806 करोड़ का मुनाफा, रेवेन्यू भी रिकॉर्ड स्तर पर

Adani Power Q1 Results: अदाणी ग्रुप की बिजली कंपनी Adani Power ने जून तिमाही में अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। कंपनी का मुनाफा, रेवेन्यू और ऑपरेटिंग प्रॉफिट तीनों रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह देश में रिकॉर्ड बिजली मांग, ज्यादा बिजली बिक्री और बेहतर टैरिफ रही। नतीजों के बाद कंपनी के शेयर में भी अच्छी तेजी देखने को मिली।

मुनाफा और रेवेन्यू में दमदार बढ़त

अप्रैल-जून तिमाही में अदाणी पावर का कंसोलिडेटेड शुद्ध मुनाफा 42% बढ़कर ₹4,806 करोड़ हो गया। पिछले साल इसी तिमाही में यह ₹3,385 करोड़ था।

कंपनी का ऑपरेशंस से रेवेन्यू भी 34% बढ़कर ₹18,902 करोड़ पहुंच गया। एक साल पहले यह ₹14,109 करोड़ था। वहीं, EBITDA करीब 40% बढ़कर ₹7,948 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। EBITDA मार्जिन भी 40.3% से बढ़कर 42% हो गया।

भीषण गर्मी का फायदा मिला 

इस बार गर्मी ने बिजली की मांग को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया। मई महीने में देश की पीक पावर डिमांड 270.8 गीगावॉट रही। वहीं, जून तिमाही में बिजली की कुल खपत 8.4% बढ़कर 485.4 बिलियन यूनिट हो गई।

इसका सीधा फायदा Adani Power को मिला। कंपनी ने इस तिमाही में 31 बिलियन यूनिट बिजली पैदा की, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। वहीं, बिजली की बिक्री 16.9% बढ़कर 28.8 बिलियन यूनिट रही।

बिजली महंगी बिकी, कमाई बढ़ी

लॉन्ग टर्म PPA के तहत बिजली बिक्री 30% से ज्यादा बढ़कर 24.5 बिलियन यूनिट हो गई। इसके साथ ही औसत टैरिफ 8.5% बढ़कर ₹5.95 प्रति यूनिट पहुंच गया।

मर्चेंट और शॉर्ट टर्म मार्केट में भी कंपनी को बेहतर दाम मिले। यहां औसत टैरिफ 13.1% बढ़कर ₹7.04 प्रति यूनिट रहा। कंपनी ने कहा कि बुटीबोरी और मुतियारा (तूतीकोरिन) जैसे पहले बिना PPA वाले प्लांट्स को नए करार मिलने से भी बिजली बिक्री बढ़ी। इंडियन एनर्जी एक्सचेंज में बिजली की कीमतें बढ़ने का फायदा भी कंपनी को मिला।

कोयला महंगा हुआ, फिर भी बढ़ा मुनाफा

ज्यादा बिजली उत्पादन और आयातित कोयले की ऊंची कीमतों की वजह से ईंधन लागत 30% बढ़कर ₹9,513 करोड़ हो गई। इसके बावजूद कंपनी का मुनाफा बढ़ा। इसकी वजह बेहतर ऑपरेटिंग एफिशिएंसी और फाइनेंस कॉस्ट पर मजबूत नियंत्रण रहा।

इस तिमाही में कंपनी ने ₹1,386 करोड़ की पिछली अवधि की आय भी दर्ज की। वहीं, अतिरिक्त कोयला लागत के बदले ₹898 करोड़ के टैरिफ मुआवजे को भी रेवेन्यू में शामिल किया गया।

विस्तार पर बड़ा दांव

अदाणी पावर के बोर्ड ने ₹15,000 करोड़ तक जुटाने की मंजूरी दी है। यह रकम QIP या दूसरे रास्तों से जुटाई जाएगी। साथ ही कंपनी ने अपनी उधारी सीमा ₹75,000 करोड़ से बढ़ाकर ₹1 लाख करोड़ करने का प्रस्ताव भी रखा है। इसके लिए शेयरधारकों की मंजूरी लेनी होगी।

Adani Power ने हाल ही में दिवाला प्रक्रिया के तहत Jaiprakash Associates की कई बिजली परिसंपत्तियां भी खरीदी हैं। इनमें 180 मेगावॉट का Churk थर्मल पावर प्लांट, Jaiprakash Power Ventures में 24% हिस्सेदारी और Prayagraj Power Generation Company में 11.49% हिस्सेदारी शामिल हैं।

आगे की क्या है योजना?

अदाणी पावर के CEO एस.बी. ख्यालिया ने कहा कि रिकॉर्ड EBITDA दिखाता है कि कंपनी का बिजनेस मॉडल मजबूत है। उन्होंने कहा कि Adani Power 45 गीगावॉट उत्पादन क्षमता के लक्ष्य पर तेजी से काम कर रही है। इसके साथ ही कंपनी हाइड्रो पावर में विस्तार कर रही है और भविष्य में न्यूक्लियर पावर सेक्टर के अवसरों पर भी नजर बनाए हुए है।

अदाणी पावर के शेयरों का हाल

Adani Power का शेयर बुधवार को शेयर 1.51% गिरकर ₹217.05 पर बंद हुआ। नतीजों के बाद ₹211.90 के निचले स्तर से उछलकर ₹221.70 के इंट्राडे हाई तक पहुंचा था। पिछले 1 साल में स्टॉक ने 83.77% रिटर्न दिया है।

HFCL Q1 Results: घाटे से ₹229 करोड़ के मुनाफे में आई कंपनी, 6 महीने में 250% उछला स्टॉक

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

केन-बेतवा परियोजना: ‘विकास’ की राह में क्यों खड़े ग्रामीण

समीरात्मज मिश्र

केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को सरकार बुंदेलखंड की जल समस्या का समाधान बताती है, लेकिन जिन गांवों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है वहां इसका विरोध काफी तेज हो गया है। ALSO READ: दिल्ली में छात्रों पर बर्बरता से लाठीचार्ज, पीएम मोदी चुप

 

बुंदेलखंड को पानी चाहिए, इस पर शायद ही किसी को आपत्ति हो या किसी तरह का विवाद हो। लेकिन सवाल यह है कि उस पानी की कीमत कौन चुकाएगा? यही सवाल इन दिनों मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में हो रहे आंदोलन के केंद्र में है। सरकार इसे बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने वाली परियोजना बताती है, जबकि प्रभावित गांवों के लोग कहते हैं कि विकास के नाम पर उनका घर, खेत और आजीविका दांव पर लगा दी गई है।

 

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में पिछले दो हफ्ते से केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में ग्रामीण कई तरह से आंदोलन कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना से प्रभावित ग्रामीणों के मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही बांध का निर्माण शुरू कर दिया गया है।

 

ग्रामीणों ने दो महीने पहले भी आंदोलन किया था लेकिन तब अधिकारियों ने उन्हें सब ठीक कर लेने का आश्वासन देकर आंदोलन स्थगित करा दिया था। ग्रामीणों का आरोप है कि आश्वासन पूरा किए बिना ही काम फिर से शुरू कर दिया गया है।

 

केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की पहली प्रमुख नदी जोड़ो परियोजना है और इसे राष्ट्रीय नदी जोड़ो कार्यक्रम की पहली बड़ी परियोजना माना जाता है।

 

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 45 हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना से 11 लाख हेक्टेयर सिंचाई, 62 लाख लोगों को पेयजल और 130 मेगावॉट बिजली उत्पादन का लक्ष्य है। इसके लिए छतरपुर और पन्ना के 21 गांव प्रभावित होंगे।

 

प्रभावित गांवों में ज्यादातर आदिवासी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी लड़ाई परियोजना रोकने की नहीं, बल्कि सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित करने की है। अपनी मांगों को लेकर वे छतरपुर जिले में केन की सहायक बराना नदी के किनारे पिछले 15 दिन से आंदोलन कर रहे हैं। ALSO READ: कमजोर हो सकती है दुनिया की सबसे असरदार पर्यावरण नीति 'ईटीएस'

 

‘फांसी सत्याग्रह' और ‘चिता आंदोलन'

प्रदर्शनकारी सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए विरोध के नए तरीके अपना रहे हैं। पिछले दिनों प्रभावित आदिवासी महिलाओं ने आंदोलन को नया रूप देते हुए प्रतीकात्मक 'फांसी सत्याग्रह' और ‘चिता आंदोलन' शुरू कर दिया है। महिलाओं ने गले में फांसी का फंदा डालकर सरकार से मांग की कि यदि उन्हें उचित पुनर्वास और न्याय नहीं मिल सकता, तो कम से कम इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए।

 

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि परियोजना के कारण हजारों परिवारों की जमीन, जंगल, जल स्रोत, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान छिन गई है। उनका आरोप है कि कई परिवारों को अवैध रूप से बेदखल किया गया, झूठे मुकदमे दर्ज किए गए और बिजली कनेक्शन तक काट दिए गए। साथ ही परियोजना प्रभावितों की सूची तैयार करने में भी अनियमितताएं बरती गईं।

 

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर पिछले 13 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। उनका आरोप है कि प्रशासन ने अप्रैल महीने में किए गए आश्वासन अब तक पूरे नहीं किए हैं।

 

डीडब्ल्यू से बातचीत में अमित भटनागर कहते हैं, “प्रशासन के रवैये की वजह से पचास हजार लोग बेघर हो गए हैं। दरअसल, सरकार यह नहीं समझना चाहती है कि विस्थापन का मतलब सिर्फ घर बदलना नहीं होता है बल्कि विस्थापन में एक पूरा समुदाय, समाज और इकोसिस्टम खत्म होता है। ऐसे में प्रभावितों के लिए सरकार को थोड़ा संवेदनशील होना चाहिए। लेकिन सरकार यह सब काम डरा-धमकाकर कराना चाहती है।”

 

आंदोलन में ज्यादातर आदिवासी महिलाएं हैं। उन्हीं में से एक लक्ष्मी डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, “अप्रैल में जब हमने चिता आंदोलन किया था, उसके बाद प्रशासन ने हमारी मांगें पूरी करने के वादे किए थे लेकिन उस वक्त जितने वादे किए गए थे, उनमें से एक का भी पालन नहीं किया गया। बल्कि हम लोगों को ही डराने-धमकाने का का काम किया गया। फर्जी केस, गैरकानूनी बेदखली, बिजली काट देना, स्कूल तोड़ना जैसे गैरकानूनी और अमानवीय कृत्य किए जा रहे हैं और लोग खौफ में हैं।” ALSO READ: चैट जीपीटी के ज्यादा इस्तेमाल से दिमाग कमजोर होने का डर

 

प्रशासन का पक्ष

लेकिन प्रशासन का कहना है कि पुनर्वास पैकेज पहले ही बढ़ाया जा चुका है। छतरपुर के जिला कलेक्टर पार्थ जायसवाल के मुताबिक, अप्रैल में जो वादे किए गए थे, उन्हें पूरा कर दिया गया है और अब जो मांगें हैं वो केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से संबंधित नहीं हैं।

 

डीडब्ल्यू से बातचीत में छतरपुर के कलेक्टर पार्थ जायसवाल कहते हैं, “प्रदर्शनकारियों से लगातार बातचीत चल रही है। अप्रैल में उठाई गई ज्यादातर मांगों पर कार्रवाई की जा चुकी है। राज्य मंत्रिमंडल ने हाल ही में राहत एवं पुनर्वास पैकेज बढ़ाने को मंजूरी दी है, लेकिन अब प्रदर्शनकारी और ज्यादा मुआवजे की मांग कर रहे हैं।”

 

दरअसल, इस आंदोलन में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना के अलावा मझगांव और रुंझ सिंचाई परियोजना से विस्थापित हुए लोग भी शामिल हैं। आंदोलन इन परियोजनाओं में हुए कथित भ्रष्टाचार और विस्थापितों के सही पुनर्वास की मांग को लेकर तो है ही, साथ ही पन्ना टाइगर रिजर्व के 43 लाख पेड़ों को बचाने के लिए भी है।

 

आंदोलनकारियों की मांग है कि गांव के विस्थापन की स्थिति में नया गांव बसाकर दिया जाए, परिवार में सबको मसलन पति और पत्नी को अलग-अलग आर्थिक राहत दी जाए, फर्जी ग्राम सभा की बैठकों पर रोक लगे और तीनों परियोजना के लिए हुई जनसुनवाई और सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं।

 

केन-बेतवा रिवर लिंक परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दिसंबर 2021 में मंजूरी दी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2024 में इसे शुरू किया था। इसका मकसद यमुना की सहायक नदियों केन और बेतवा नदियों को जोड़कर सूखा प्रभावित बुंदेलखंड इलाके में पानी पहुंचाना है।

 

सरकारी अनुमानों के मुताबिक केन-बेतवा रिवर लिंक परियोजना में मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिले के 21 गांव डूब जाएंगे और करीब सात हजार परिवार विस्थापित होंगे। यही नहीं, इस प्रोजेक्ट के तहत, पन्ना नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व के अंदर केन नदी पर एक बांध बनाया जाएगा।

 

न सिर्फ विस्थापन और मुआवजा बल्कि पर्यावरण और वन्य जीव को लेकर भी इस परियोजना पर कई सवाल उठ रहे हैं। बुंदेलखंड के सामाजिक और पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष सागर कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी ने इस बात पर सवाल उठाए हैं कि केन नदी में 'अतिरिक्त' पानी है और चेतावनी दी है कि यह परियोजना पर्यावरण और आर्थिक रूप से विनाशकारी होगा।

 

डीडब्ल्यू से बातचीत में आशीष सागर कहते हैं, “केन छोटी नदी है इसका पानी बड़ी नदी बेतवा में डालना है। सरकार मानती है कि केन में बाढ़ से सरप्लस पानी बचता है जिसको बेतवा में डालकर सिंचाई का साधन मुहैया कराया जा सकता है जबकि केन नदी का हाल यह है कि साल के आठ महीने इसमें घुटनों के नीचे पानी रहता है। दूसरे, मौरम खनन के जरिए इसे मृतप्राय बना दिया गया है।”

 

आशीष सागर आगे कहते हैं, “यहां बन रहे दौधन बांध से नौ हजार हेक्टेयर से ज्यादा घना जंगल डूब जाएगा जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर जोन का करीब छह हजार हेक्टेयर इलाका भी शामिल है। यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं बल्कि यह एक जीवित इकोसिस्टम है जो बाघ, घड़ियाल, डॉल्फिन, गिद्ध, चिंकारा, भेड़ियों और दुर्लभ महाशीर मछलियों का घर है। प्रोजेक्ट में वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी के वन्यजीव और गिद्धों का प्रजनन केंद्र भी खत्म हो जाएगा। यानी इस परियोजना से यह पूरा इकोसिस्टम नष्ट हो जाएगा। इसे आप कहां विस्थापित करेंगे?”

 

केन-बेतवा परियोजना पूरी होने पर बुंदेलखंड के बड़े हिस्से को पानी मिलने की उम्मीद है लेकिन छतरपुर के आंदोलनकारी गांवों में फिलहाल चर्चा सिंचाई की नहीं, विस्थापन की है। यही वजह है कि यह विवाद अब सिर्फ एक बांध या नदी जोड़ो परियोजना का नहीं, बल्कि उस सवाल का बन गया है जो भारत की लगभग हर बड़ी विकास परियोजना के साथ उठता है- क्या विकास की कीमत सबसे ज्यादा वही लोग चुकाते हैं, जिन्हें विकास का लाभ सबसे बाद में मिलता है?

Core Sector Growth: जून में 5% पर पहुंची कोर सेक्टर की ग्रोथ, 5 महीने की सबसे तेज रफ्तार

Core Sector Growth: भारत के कोर सेक्टर ने जून 2026 में 5% की सालाना वृद्धि दर्ज की है। यह पिछले 5 महीनों की सबसे तेज ग्रोथ है। मई में कोर सेक्टर की वृद्धि दर 3.2% रही थी। जून में तेज बढ़त की सबसे बड़ी वजह आयरन ओर (लौह अयस्क) का उत्पादन, साथ ही बिजली और सीमेंट सेक्टर का मजबूत प्रदर्शन रहा।

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में कोर सेक्टर की कुल वृद्धि 3.6% रही। पिछले साल इसी अवधि में यह सिर्फ 1% थी। इससे संकेत मिलता है कि वित्त वर्ष की शुरुआत में सुस्ती के बाद औद्योगिक गतिविधियों ने फिर रफ्तार पकड़ ली है।

आयरन ओर बना सबसे बड़ा सहारा

रिवाइज्ड कोर सेक्टर इंडेक्स में इस बार पहली बार आयरन ओर को शामिल किया गया है। जून में इसका उत्पादन 43.9% बढ़ा। मई में इसमें 19% की वृद्धि दर्ज की गई थी। नए बेस ईयर 2022-23 के तहत इसे इंडेक्स में शामिल किए जाने से इसका योगदान भी बढ़ गया है।

बिजली और सीमेंट सेक्टर ने बनाए रखा दम

भीषण गर्मी के चलते बिजली की मांग बढ़ी, जिससे बिजली उत्पादन 9.8% बढ़ा। मई में इसमें 11.2% की वृद्धि हुई थी। वहीं, सीमेंट उत्पादन भी 9.8% बढ़ा। इससे साफ संकेत मिलता है कि देश में निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं।

स्टील और कोयला उत्पादन भी बढ़ा

स्टील प्रोडक्शन जून में 4.6% बढ़ा। हालांकि यह मई के 5.1% से थोड़ा कम है, लेकिन सेक्टर लगातार बढ़त में बना हुआ है। मई में 9.5% की गिरावट के बाद कोयला उत्पादन भी वापसी करते हुए 1.4% बढ़ा, जिससे कोर सेक्टर को अतिरिक्त सहारा मिला।

इन सेक्टरों में रही कमजोरी

दूसरी ओर, कुछ सेक्टरों का प्रदर्शन कमजोर रहा।

  • रिफाइनरी प्रोडक्ट्स का उत्पादन 4.7% घटा। हालांकि मई में इसमें 8.2% की गिरावट थी।
  • कच्चे तेल (Crude Oil) का उत्पादन 4.2% घटा। यह लगातार तीसरा महीना है जब इसमें गिरावट आई है।
  • प्राकृतिक गैस (Natural Gas) का उत्पादन 7.4% घटा, जो एक साल से ज्यादा समय की सबसे बड़ी गिरावट है।
  • उर्वरक (Fertiliser) उत्पादन भी 3.3% घटा। मार्च से इस सेक्टर में कमजोरी बनी हुई है।

बदला कोर सेक्टर इंडेक्स

जून के आंकड़ों के साथ सरकार ने कोर सेक्टर इंडेक्स की नई सीरीज भी जारी की है। इसमें 2011-12 की जगह अब 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है।

अब इंडेक्स में 9 उद्योग शामिल हैं। पहली बार आयरन ओर को इसमें जगह मिली है। वहीं, स्टील इंडेक्स को इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (IIP) के आंकड़ों के मुताबिक किया गया है। इसके अलावा, पुराने कोयला मापदंड की जगह रॉ कोल (Raw Coal) को शामिल किया गया है, ताकि दोहरी गिनती से बचा जा सके।

क्या संकेत देते हैं ये आंकड़े?

बिजली, सीमेंट, स्टील, कोयला और आयरन ओर में मजबूत बढ़त बताती है कि निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी गतिविधियां अभी भी मजबूती से आगे बढ़ रही हैं। हालांकि, कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और रिफाइनरी सेक्टर की कमजोरी अब भी औद्योगिक विकास की रफ्तार पर दबाव बनाए हुए है।

पीएम सूर्य घर योजना : CM योगी के नेतृत्व में देश में दूसरे स्थान पर पहुंचा UPPM

UPPM ranks second in country under leadership of Chief Minister Yogi

– सूर्य घर योजना में 6.74 लाख से अधिक घरेलू रूफटॉप सोलर स्थापित, गुजरात के बाद देश में दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश

– योगी सरकार के प्रयासों से प्रदेश में 2,283.8 मेगावाट घरेलू रूफटॉप सोलर क्षमता विकसित

– प्रदेश में तेजी से विकसित हुई सोलर इकोनॉमी, 85 हजार से अधिक लोगों को मिला रोजगार

Chief Minister Yogi Adityanath : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचा है। प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना के अंतर्गत घरेलू रूफटॉप सोलर स्थापना में उत्तर प्रदेश ने महाराष्ट्र को पीछे छोड़ते हुए देश में दूसरा स्थान हासिल कर लिया है। प्रदेश में अब तक 6,74,393 घरेलू रूफटॉप सोलर संयंत्रों की स्थापना हो चुकी है। पीएम सूर्य घर योजना की राष्ट्रीय रैंकिंग में गुजरात 7,49,839 स्थापनाओं के साथ पहले स्थान पर, जबकि उत्तर प्रदेश 6,74,393 स्थापनाओं के साथ दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। महाराष्ट्र 6,73,717 स्थापनाओं के साथ तीसरे स्थान पर है।

   
उत्तर प्रदेश की यह उपलब्धि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में योजना के प्रभावी क्रियान्वयन, उच्चस्तरीय मॉनिटरिंग, विभागीय समन्वय और मिशन मोड में किए गए प्रयासों का परिणाम है। प्रदेश सरकार द्वारा उपभोक्ताओं को योजना से जोड़ने से लेकर सोलर संयंत्रों की स्थापना, बैंक ऋण, डिस्कॉम निरीक्षण और सब्सिडी प्रक्रिया को गति देने के लिए विभिन्न स्तरों पर लगातार प्रयास किए गए हैं।

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2,283.8 मेगावाट घरेलू रूफटॉप सोलर क्षमता हुई विकसित

इस दौरान यूपी नेडा डायरेक्टर रविन्दर सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश में घरेलू रूफटॉप सोलर के तेजी से विस्तार के परिणामस्वरूप अब तक लगभग 2,283.8 मेगावाट यानी 2.28 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित की जा चुकी है। इससे प्रदेश के लाखों घर अपनी छतों पर स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं।उन्होंने बताया कि रूफटॉप सोलर से उपभोक्ताओं की पारंपरिक ग्रिड बिजली पर निर्भरता कम होने के साथ-साथ उनके मासिक बिजली बिल में भी उल्लेखनीय कमी आई है। प्रदेश के लाखों परिवारों को प्रतिदिन लगभग 6.5 करोड़ रुपए मूल्य की निःशुल्क सौर बिजली का लाभ प्राप्त हो रहा है।

यह परिवर्तन उत्तर प्रदेश को केवल बिजली उपभोग करने वाली व्यवस्था से आगे बढ़ाकर विशेष आर्थिक दिशा में ले जा रहा है, जहां उपभोक्ता स्वयं अपने घर की छत पर बिजली का उत्पादन कर अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में भेजने में भी सक्षम हो रहे हैं।

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7,000 से अधिक कंपनियां, 85 हजार से अधिक रोजगार

पीएम सूर्य घर योजना के व्यापक विस्तार ने उत्तर प्रदेश में एक मजबूत सोलर इकोनॉमी इकोसिस्टम विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रदेश में सोलर सेक्टर से जुड़ी 7,000 से अधिक कंपनियां एवं व्यावसायिक इकाइयां सक्रिय हैं, जिनके माध्यम से 85,000 से अधिक लोगों के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं।

   
सोलर पैनल इंस्टॉलेशन से लेकर सर्वे, डिजाइनिंग, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल कार्य, नेट मीटरिंग, लॉजिस्टिक्स, सेल्स, मार्केटिंग तथा ऑपरेशन एवं मेंटेनेंस तक एक व्यापक रोजगार श्रृंखला विकसित हुई है। इससे विशेष रूप से युवाओं, तकनीकी पेशेवरों, इलेक्ट्रिशियन, इंजीनियरों, स्थानीय उद्यमियों और छोटे व्यवसायों के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं।

UPPM ranks second in country under leadership of Chief Minister Yogi

मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली इकोसिस्टम को भी मिली नई गति

उत्तर प्रदेश में रूफटॉप सोलर की तेजी से बढ़ती मांग ने प्रदेश के सोलर मैन्युफैक्चरिंग एवं सप्लाई चेन इकोसिस्टम को भी नई गति प्रदान की है। सोलर मॉड्यूल एवं संबंधित उपकरणों के क्षेत्र में नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और असेंबली लाइंस विकसित हुई हैं। इसके साथ ही इन्वर्टर, माउंटिंग स्ट्रक्चर, केबल, इलेक्ट्रिकल कंपोनेंट्स, मीटरिंग उपकरण, वेयरहाउसिंग, परिवहन और लॉजिस्टिक्स से जुड़े व्यवसायों को भी नई मांग मिली है। इससे प्रदेश में सौर ऊर्जा केवल बिजली उत्पादन का माध्यम नहीं रही, बल्कि यह निवेश, औद्योगिक विकास, एमएसएमई विस्तार, स्थानीय उद्यमिता और ग्रीन जॉब्स को गति देने वाली एक नई आर्थिक शक्ति के रूप में उभरी है।

 

9,000 एकड़ से अधिक भूमि की आवश्यकता में बचत

घरेलू रूफटॉप सोलर मॉडल की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें बिजली उत्पादन के लिए अलग से बड़े भू भाग की आवश्यकता नहीं होती। घरों और भवनों की उपलब्ध छतों का उपयोग स्वच्छ बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है। प्रदेश में विकसित रूफटॉप सोलर क्षमता को यदि समान क्षमता वाले बड़े ग्राउंड-माउंटेड सोलर प्रोजेक्ट्स के माध्यम से स्थापित किया जाता, तो इसके लिए बड़े भू-भाग की आवश्यकता होती।

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रूफटॉप सोलर के विस्तार से अनुमानतः 9,000 एकड़ से अधिक अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता में बचत हुई है। इससे प्रदेश की बहुमूल्य भूमि को कृषि, आवास, औद्योगिक एवं अन्य विकासात्मक गतिविधियों के लिए संरक्षित रखने में मदद मिल रही है। 

 

हर साल लगभग 27 लाख टन कार्बन उत्सर्जन में कमी

प्रदेश में स्थापित लगभग 2,283.8 मेगावाट (2.28 गीगावाट) घरेलू रूफटॉप सोलर क्षमता स्वच्छ एवं हरित ऊर्जा उत्पादन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। अनुमानित सौर ऊर्जा उत्पादन और भारतीय विद्युत ग्रिड के उत्सर्जन कारकों के आधार पर, इस स्थापित क्षमता से सालाना लगभग 3.8 अरब यूनिट (3.8 बिलियन kWh) स्वच्छ बिजली का उत्पादन संभव है।

इससे जीवाश्म ईंधन आधारित पारंपरिक बिजली उत्पादन को प्रतिस्थापित कर प्रतिवर्ष अनुमानतः 27 लाख टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड  उत्सर्जन से बचाव हो सकता है। पर्यावरणीय प्रभाव को सरल रूप में समझें तो, यदि एक परिपक्व पेड़ द्वारा औसतन लगभग 22 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड प्रति वर्ष अवशोषित करने का मानक लिया जाए, तो यह वार्षिक कार्बन बचत लगभग 12 करोड़ से अधिक परिपक्व पेड़ों द्वारा एक वर्ष में किए जाने वाले कार्बन अवशोषण के तुलनीय है।

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इस प्रकार पीएम सूर्य घर योजना के माध्यम से उत्तर प्रदेश न केवल लाखों परिवारों को स्वच्छ एवं किफायती ऊर्जा उपलब्ध करा रहा है, बल्कि बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन से मुकाबले और भारत के दीर्घकालिक नेट-जीरो लक्ष्यों में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

अब बिना कोयले और पानी के 24 घंटे में बनेगी बिजली, लद्दाख के पहाड़ों में ONGC ने कर दिखाया चमत्कार! दूसरा जियोथर्मल वेल खोदा गया

India’s first pilot geothermal power plant: भारत को रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ी कामयाबी मिली है। सरकारी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) ने लद्दाख की पुगा घाटी में अपने दूसरे जियोथर्मल वेल की ड्रिलिंग का काम पूरा कर लिया है। यह सफलता भारत के पहले पायलट जियोथर्मल पावर प्लांट को विकसित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और मजबूत कदम है।

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक ओएनजीसी की अनुसंधान और विकास शाखा ओएनजीसी एनर्जी सेंटर ने 14000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर करीब एक महीने के भीतर 1000 मीटर की गहराई तक इस दूसरे कुएं की ड्रिलिंग की है। कंपनी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि इस बार की ड्रिलिंग में पहले अभियान के मुकाबले समय और लागत दोनों में काफी सुधार आया है।

आइए विस्तार से जानते हैं कि यह पूरा प्रोजेक्ट क्या है और इससे लद्दाख और पूरे देश को कैसे बिना कोयले और पानी के 24 घंटे बिजली मिलेगी।

पहले कुएं की सफलता पर टिकी है इस दूसरे वेल की नींव

ओएनजीसी का यह दूसरा कुआं पुगा में खोदे गए पहले जियोथर्मल वेल की शानदार सफलता पर आधारित है। पुगा में कंपनी के पहले कुएं से पानी के बॉयलिंग पॉइंट से भी अधिक तापमान पर भाप पैदा हुई थी। पहले कुएं से निकले इस बेहद हाई टेंप्रेचर ने यह साबित कर दिया था कि लद्दाख के इस क्षेत्र में भू-तापीय (Geothermal) संसाधनों की अपार क्षमता मौजूद है।

1 मेगावाट का लगेगा पहला पायलट प्लांट, 24 घंटे मिलेगी बिजली

ONGC के मुताबिक यह दूसरा कुआं भारत के पहले 1-मेगावाट इलेक्ट्रिक पायलट जियोथर्मल पावर प्लांट के विकास में बेहद मददगार साबित होगा। यह सफलता देश में जियोथर्मल एनर्जी के व्यावसायिक इस्तेमाल का रास्ता साफ कर सकती है। इस परियोजना के अगले चरण में 1-मेगावाट का पायलट पावर प्लांट स्थापित करने की योजना है। दीर्घकालिक योजना के तहत इन भू-तापीय संसाधनों का विकास किया जाएगा ताकि लद्दाख जैसे सुदूर क्षेत्र को चौबीसों घंटे भरोसेमंद और निरंतर बेसलोड बिजली जी जा सके।

क्या है जियोथर्मल एनर्जी और क्यों है यह सौर-पवन ऊर्जा से बेहतर?

जियोथर्मल ऊर्जा बिजली पैदा करने और हीटिंग देने के लिए पृथ्वी की सतह के नीचे से निकलने वाली प्राकृतिक गर्मी का इस्तेमाल करती है। सौर और पवन ऊर्जा के उलट इसपर मौसम की स्थितियों का असर नहीं पड़ता। जियोथर्मल एनर्जी पूरी तरह से कम-कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा है जो बिना किसी रुकावट के चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति कर सकती है।

भारत का सबसे भरोसेमंद क्षेत्र है पूर्वी लद्दाख का पुगा

पूर्वी लद्दाख में स्थित पुगा जियोथर्मल क्षेत्र को लंबे समय से भारत का सबसे प्रॉमिसिंग (उम्मीद से भरा) भू-तापीय संसाधन माना जाता रहा है। हालांकि इस क्षेत्र में दशकों से रुक-रुक कर खोज का काम किया जा रहा था लेकिन तकनीकी और आर्थिक चुनौतियों के कारण देश में अब तक व्यावसायिक रूप से भू-तापीय बिजली उत्पादन शुरू नहीं हो पाया था। अब ONGC के इस प्रयास से इसे नई रफ्तार मिली है।

2030 तक का भारत का महा-लक्ष्य

भारत इस समय सौर, पवन और जलविद्युत से आगे बढ़कर अपने रिन्यूएबल एनर्जी मिक्स में विविधता लाने का प्रयास कर रहा है। देश ने साल 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म-ईंधन आधारित बिजली क्षमता स्थापित करने का बड़ा लक्ष्य रखा है। लद्दाख का यह जियोथर्मल प्रोजेक्ट इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

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Explainer: भारत को यूरेनियम सप्लाई करेगा ऑस्ट्रेलिया, दोनों देशों के बीच हुई डील क्यों है इतना अहम

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच गुरुवार को यूरेनियम डील पर मुहर लग गई है। मेलबर्न में पीएम मोदी और ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बनीज ने मीटिंग के बाद जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस में समझौते का ऐलान हुआ है। इसके तहत अब ऑस्ट्रेलिया भारत को शांतिपूर्ण नागरिक न्यूक्लियर प्रोग्राम के लिए यूरेनियम की कमर्शियल सप्लाई कर सकेगा। इस फैसले के साथ करीब दस साल से लंबित प्रक्रिया पूरी हो गई है। इस बड़े फैसले की घोषणा मेलबर्न में आयोजित तीसरे भारत-ऑस्ट्रेलिया वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान की गई।

यह समझौता दोनों देशों के बीच ऊर्जा क्षेत्र में नई साझेदारी की शुरुआत माना जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है, जबकि भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते ऊर्जा बाजारों में से एक है। ऐसे में यह समझौता भारत की भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

यूरेनियम डील पर भारत-ऑस्ट्रेलिया ने जताई खुशी

समझौता लागू होने के बाद ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते भरोसे और साझा हितों पर आधारित हैं। उन्होंने कहा, “भारत और ऑस्ट्रेलिया सिर्फ अच्छे साझेदार ही नहीं, बल्कि बेहद करीबी दोस्त भी हैं।” अल्बनीज ने बताया कि इस समझौते से ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम की आपूर्ति आसान होगी। इससे भारत को स्वच्छ और गैर-जीवाश्म ईंधन से बिजली उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी। साथ ही ऑस्ट्रेलिया के संसाधन क्षेत्र को भी एक नया और बड़ा बाजार मिलेगा।

वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह समझौता दोनों देशों के लिए कई नए आर्थिक अवसर लेकर आएगा। उन्होंने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के पास ऊर्जा समेत कई क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करने का सुनहरा मौका है। प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों से भारत के बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) क्षेत्र में अधिक निवेश करने का भी आग्रह किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत निवेश के लिए एक सुरक्षित, स्थिर और लंबे समय तक बेहतर विकास वाला देश है। उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई निवेशकों से भारत में ज्यादा निवेश करने की अपील की।

ये डीस क्यों है खास?

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने 2014-15 में नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन इसके बाद भी भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी थी। इसकी वजह यह थी कि दोनों देशों ने व्यावसायिक यूरेनियम आपूर्ति के लिए जरूरी प्रशासनिक और सुरक्षा प्रक्रियाएं पूरी नहीं की थीं।

ऑस्ट्रेलिया परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का सदस्य है। इसलिए वहां से यूरेनियम का निर्यात कड़े नियमों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के तहत ही किया जाता है। अब सभी जरूरी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की आपूर्ति का रास्ता साफ हो गया है।

IAEA की निगरानी में होगा यूरेनियम का इस्तेमाल

भारत परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का सदस्य नहीं है, लेकिन उसने अपने नागरिक परमाणु संयंत्रों के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के सुरक्षा नियमों को स्वीकार किया है। नए समझौते के तहत एक ऐसी निगरानी और सत्यापन व्यवस्था बनाई गई है, जिससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाला यूरेनियम केवल भारत के नागरिक परमाणु कार्यक्रम में ही इस्तेमाल हो। समझौते के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया से आने वाले सभी यूरेनियम की आपूर्ति IAEA की निगरानी में होगी। एजेंसी यह सुनिश्चित करेगी कि इस यूरेनियम का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों और बिजली उत्पादन के लिए ही किया जाए।

भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की जरूरत क्यों है?

भारत ने स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश को यूरेनियम की लगातार और भरोसेमंद आपूर्ति की जरूरत होगी। हालांकि, भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े थोरियम भंडार में से एक है, लेकिन यूरेनियम का घरेलू भंडार सीमित है। यही वजह है कि परमाणु बिजली परियोजनाओं के लिए भारत को दूसरे देशों से यूरेनियम आयात करना पड़ता है। फिलहाल भारत में बनने वाली करीब 75 प्रतिशत बिजली अभी भी कोयले से तैयार होती है। वहीं, सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोत पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, लेकिन ये हर समय लगातार बिजली नहीं दे सकते। ऐसे में परमाणु ऊर्जा को भविष्य की स्वच्छ और भरोसेमंद बिजली का महत्वपूर्ण स्रोत माना जा रहा है।

परमाणु ऊर्जा से मिलेगा स्वच्छ और भरोसेमंद बिजली उत्पादन

परमाणु ऊर्जा को कम कार्बन उत्सर्जन वाला और लगातार बिजली देने वाला ऊर्जा स्रोत माना जाता है। यही वजह है कि 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने की भारत की योजना में परमाणु ऊर्जा की अहम भूमिका है। ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाला यूरेनियम भारत के तीन चरणों वाले परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को भी मजबूती देगा। इस योजना के तहत पहले यूरेनियम आधारित परमाणु रिएक्टरों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके बाद भविष्य में भारत अपने विशाल थोरियम भंडार का उपयोग कर परमाणु ऊर्जा उत्पादन को और बढ़ाएगा।

भारत तेजी से बढ़ा रहा है परमाणु ऊर्जा क्षमता

भारत इस समय देश के 7 स्थानों पर 24 परमाणु रिएक्टर चला रहा है। इनकी कुल बिजली उत्पादन क्षमता 8.78 गीगावाट (GW) है। फिलहाल देश के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी करीब 3.1 प्रतिशत है। हालांकि, कई नए परमाणु रिएक्टरों का निर्माण जारी है। सरकार को उम्मीद है कि 2031-32 तक यह क्षमता बढ़कर करीब 22 गीगावाट हो जाएगी। सरकार का लक्ष्य 2047 तक परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को 100 गीगावाट तक पहुंचाना है, ताकि देश की बढ़ती बिजली जरूरतों को स्वच्छ ऊर्जा से पूरा किया जा सके। इस दिशा में भारत ने हाल ही में एक बड़ी उपलब्धि भी हासिल की है। कलपक्कम में बने 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने पहली बार सफल नियंत्रित परमाणु फर्स्ट क्रिटिकलिटी हासिल की है। इसे भारत के तीन चरणों वाले परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण की बड़ी सफलता माना जा रहा है।

पाकिस्तान बोला- हमारा पानी रोका तो हाथ काट देंगे:सिंधु जल संधि अब भी लागू, भारत इसे एकतरफा खत्म नहीं कर सकता

पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि पर एक बार फिर भारत को धमकी दी है। पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने कहा कि अगर किसी ने पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने की कोशिश की तो हम उन हाथों को काट देंगे। उन्होंने दावा किया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी को रोकना चाहता है। मुसादिक मलिक ने सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार के साथ जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री के हाथ में एक नल है। वह कहते हैं कि पाकिस्तान में पानी की एक बूंद भी नहीं जाने देंगे। जो हमारे हिस्से के पानी पर दावा करेंगे, उनके हाथ काट दिए जाएंगे। वहीं अताउल्लाह तरार ने कहा कि सिंधु जल संधि कानूनी रूप से अब भी लागू है। उनके मुताबिक, भारत इसे न तो एकतरफा स्थगित कर सकता है, न रद्द कर सकता है और न ही इसमें बदलाव कर सकता है। सिंधु जल संधि पर सेमिनार करेगा पाकिस्तान पाकिस्तानी मंत्रियों ने बताया कि मंगलवार को इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि पर पहला अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जाएगा। इसमें कानूनी एक्सपर्ट, जल एक्सपर्ट्स और विदेशी प्रतिनिधि शामिल होंगे। सेमिनार में संधि के कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर चर्चा होगी। डॉन के मुताबिक, तरार ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पाकिस्तान के अधिकार सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पहले भी साफ कर चुके हैं कि पानी हमारी जीवनरेखा है और यह हमारी रेड लाइन भी है। 21 जून को PAK रक्षा मंत्री बोले थे- भारत के खिलाफ जंग छेड़ सकते हैं पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने 21 जून को सिंधु जल संधि स्थगित रहने को लेकर भारत को धमकी दी थी। पाकिस्तानी चैनल ARY न्यूज से बातचीत में आसिफ ने कहा कि अगर पाकिस्तान को लगा कि उसकी जल सुरक्षा खतरे में है, तो वह भारत के खिलाफ जंग छेड़ सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी के प्रवाह में दखल दे रहा है और रणनीतिक हथियार के तौर पर इसका इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पिछले एक साल में इस मामले में क्या नए घटनाक्रम हुए हैं, इसकी उन्हें पूरी जानकारी नहीं है। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि बहाल नहीं की जाएगी। भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौता क्या है? सिंधु नदी प्रणाली में कुल 6 नदियां हैं- सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज। इनके किनारे का इलाका करीब 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसमें 47% जमीन पाकिस्तान, 39% जमीन भारत, 8% जमीन चीन और 6% जमीन अफगानिस्तान में है। इन सभी देशों के करीब 30 करोड़ लोग इन इलाकों में रहते हैं। 1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के पहले से ही भारत के पंजाब और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच नदियों के पानी के बंटवारे का झगड़ा शुरू हो गया था। 1947 में भारत और पाकिस्तान के इंजीनियरों के बीच ‘स्टैंडस्टिल समझौता’ हुआ। इसके तहत दो मुख्य नहरों से पाकिस्तान को पानी मिलता रहा। ये समझौता 31 मार्च 1948 तक चला। 1 अप्रैल 1948 को जब समझौता लागू नहीं रहा तो भारत ने दोनों नहरों का पानी रोक दिया। इससे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की 17 लाख एकड़ जमीन पर खेती बर्बाद हो गई। दोबारा हुए समझौते में भारत पानी देने को राजी हो गया। इसके बाद 1951 से लेकर 1960 तक वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में भारत पाकिस्तान में पानी के बंटवारे को लेकर बातचीत चली और आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के PM नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच दस्तखत हुए। इसे इंडस वाटर ट्रीटी या सिंधु जल संधि कहा जाता है। सिंधु जल समझौता स्थगित करने का पाकिस्तान पर असर पाकिस्तान में खेती की 90% जमीन यानी 4.7 करोड़ एकड़ एरिया में सिंचाई के लिए पानी सिंधु नदी प्रणाली से मिलता है। पाकिस्तान की नेशनल इनकम में एग्रीकल्चर सेक्टर की हिस्सेदारी 23% है और इससे 68% ग्रामीण पाकिस्तानियों की जीविका चलती है। ऐसे में पाकिस्तान में आम लोगों के साथ-साथ वहां की बेहाल अर्थव्यवस्था और बदतर होने लगी है। पाकिस्तान के मंगल और तारबेला हाइड्रोपावर डैम को पानी नहीं मिल पा रहा है। इससे पाकिस्तान के बिजली उत्पादन में 30% से 50% तक की कमी आ सकती है। साथ ही औद्योगिक उत्पादन और रोजगार पर असर पड़ेगा। —————– ये भी पढ़ें… सिंधु नदी का पानी न मिलने से पाकिस्तान परेशान:आर्मी चीफ भारत के खिलाफ जंग की सा​जिश रच रहे, LoC पर 35 ड्रोन यूनिट तैनात पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु नदी का पानी रोका, तो पाकिस्तान की परेशानियां बढ़ गई हैं। पाकिस्तान ने यह मसला अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में भी लेकिन वहां भी इस पर कोई फैसला नहीं हुआ। इसके बाद अब रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भारत को जंग छेड़ने की धमकी दे रहे हैं। वहीं, आर्मी चीफ आसिम मुनीर जंग की साजिश रचने में जुटे हैं। नियंत्रण रेखा यानी LoC पर पाकिस्तानी सेना की 8 ब्रिगेड ने 35 एंटी ड्रोन यूनिट तैनात की हैं। पाकिस्तान ने एआई फेंसिंग भी की है। इसके तहत टारगेटिंग और सर्विलांस को तेज किया गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…